Thursday, April 09, 2009

भ्रमित शब्द- सतीश चन्द्र झा


हेरा गेल छल हमर शब्द किछु
फेर आइ घुरिया क’ आयल।
बास भेलै नहि कतौ जगत मे
थाकि हारि क’ अपने आयल।
नुका गेल सब रही नीन्न मे
मोनक कागत सँ उड़िया क’।
केना ? कखन ? सब के ल’ भगलै
आन - आन भाषा फुसिया क’।
आतुर मोन उचटि क’ ताकय
बैसल बाट दूर धरि कखनो।
राति बिराति द्वार के खोलत
छी जागल अबेर धरि एखनो।
पसरल देखि हमर निर्धनता
भागि गेल छल सब उबिया क’।
खोजि रहल छल सुख जीवन केँ
भोग वासना मे बौआ क’।
अर्थ बाँटि सम्मान समेटब
छलै मोन मे इच्छा जागल।
मान प्रतिष्ठा के इजोत मे
भ्रमित भेल सबटा छल भागल।
शब्द अभागल चीन्हि सकल नहि
हम बताह कवि छी वसुधा मे।
बिसरि जाइत छी हम जीवन भरि
की अंतर छै गरल - सुधा मे।
नहि अछि लोभ अर्थ के हमरा
नहि चाही सम्मान जगत के।
निज भाषा केँ स्नेह,कलम सँ
निकलत धार रत्त अमृत के।
हम कविता सँ दिशा दैत छी
दृष्टिहीन व्याकुल समाज के।
जगा रहल छी जे अछि सूतल
गीत गावि क’ बिना साज के।
नहि छपतै कविता जनिते छी
पत्रा पत्रिाका के पन्ना मे।
छपतै नग्न देह नारी के
मुख्य पृष्ट ,अंतित पन्ना मे।
मुदा केना हम कलम छोड़ि क’
मौन भेल आँगन मे बैसू।
केना हेतै किछु व्यथा देखि क’
द्रवित मोन मे नहि किछु सोचू।
कोमल हृदय अपन अंतर सँ
प्रतिक्षण आगि उगलिते रहतै।
पढ़तै कियो लोक नहि तैयो
कलम हाथ केँ चलिते रहतै।

21 comments:

  1. मोनक कागतसँ उड़िया क' भागल/ दोसर भाषा द्वारा फुसिआएल शब्दक घुरिया क' अएबाक कथा जे अहाँ कवितामे लिखलहुँ से देखि (पढ़ैत काल) मोन तृप्त भ' गेल ।

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  2. shabdak rahasyamayi prayoga nik lagal,

    matribhashak shabd matribhashe me bhetai chhai, dosar bhasha me lok parangat nahi bhay sakai ye

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  3. klisht rachna muda bhavk nirupan lel etek klishtata anivarya

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  4. मुदा केना हम कलम छोड़ि क’
    मौन भेल आँगन मे बैसू।

    sochab jahiya band hoyat tahiya te kavi ji bujhu srishtiye khatam,
    bad nik, bad nik

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  5. din par din nikhar aabi rahal achhi,
    aa mon hamra sabhak jura rahal achhi

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  6. कोमल हृदय अपन अंतर सँ
    प्रतिक्षण आगि उगलिते रहतै।
    पढ़तै कियो लोक नहि तैयो
    कलम हाथ केँ चलिते रहतै।

    bah bhai, ehina band nahi homay debai aagi kahiyo

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  7. bhramit shabd ghuri aayal se ki kam

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  8. शब्द अभागल चीन्हि सकल नहि
    हम बताह कवि छी वसुधा मे।

    hoit chhai bhai

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  9. Apane lokani ke 'SNEH'aa bhai Gajendra jee ke maithili bhasha s 'AGADH PREM' hamara likhay ke shakti dait achi.
    jatek lok padhalahu Danyabad. je nahi...tinko.

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  10. Anonymous10:17 AM

    YOUR MAITHILIPOEM "BHRAMIT SHABD"
    TOUCHED THE VERY CORE OF MY HEART.
    WISH YOU A DAZZLING ASPECT OF MAITHILI SERVICE ALSO
    ---HARI NARAYAN JHA
    SBI MADHUBANI

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  11. bahut sunder lagal anhank kabita jahi me kabi satish jee apan bital byatha ke bad nik dhang sa kahne chathinh.

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  12. Anonymous10:44 AM

    hamara anhak kavita bad nik lagal
    tahi lel dhanyabad anha ahina kavita likhait rahbai se hum ummed karet chhi
    chandramany
    at +po -nagwas

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  13. kavita padhay me sundar lagal
    nik sabdk rachna.

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  14. bhramit shabdak ghurbak bimb me bahut kichhu dekhi lelahu bhai

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  15. kabita aha k bad nik lagal.

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  16. Anonymous12:24 AM

    शब्द अभागल चीन्हि सकल नहि
    हम बताह कवि छी वसुधा मे।

    bah satish ji,

    mahesh jha

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  17. Anonymous8:44 PM

    bad nik bhai, lagal je baji kichhu rahal chhi aa ishara katahu aar achhi,

    mon me ghurmait saval jena kono rahasya rakhne hoi apna bheetar

    shyam sundar

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  18. आहॉ के कविता पढलौ॑ बहूत नीक लागल। लेकिन एना एक एक टा पढि कय मोन नहि भरैत अछि।
    आहा॑ के कविता के पुस्तक कहिया प्रकासित भय रहल अछि। हम बहुत बेसब्री सऽ इन्तजार कऽ रहल छीा

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  19. apnek kavya rachana bahut sargarvit chal.apnek lekhani me je unchai dekhaba me abait achi se dosar katau nahi.Shabd vinyas seho bahut prakhar achi.I think just parallel to Dinkar jee.


    H. N. JHA
    S.B. I.
    MADHUBANI

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  20. The poetic presentation "bhramit shabd" was very nice to read.I express my thanks from the very core of my heart on your writing.


    from : HARI NR.JHA
    SBI MADHUBANI

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  21. बहुत नीक प्रस्तुति

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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