Saturday, April 25, 2009

हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही ....---अमरनाथ झा

हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही ....

" हमरा मोन नहि पड़ि रहल अछि जे एतेक रुचि कोनो पछुलका चुनावमे लोकक रहल अछि। ई शब्द अछि हिन्दुस्ताम समाचार पत्रमे खुशवन्त सिंह जीक आइ काल्हिक चुनावपर।

अनायास एहन लागल जेना क्यो एहि परिस्थितिकेँ बुझबाक लेल एकटा पुरान चित्र राखि देने होअए।

आइ.बी.एन ७ केर प्रबन्ध सम्पादक आशुतोषक निबन्धक पक्तिकेँ एहि सन्दर्भमे एतए राखि रहल छी:

"ई कहल जा सकैत अछि जे जखन देशक राजनीतिक दिशा बदलि रहल अछि आ वोटर बुधियार भऽ रहल छथि, एकटा नव सिविल सोसाइटी ठाढ़ भऽ रहल अछि जे नेता लोकनिक लेल एकटा जिम्मेदारी तैयार कए रहल अछि।  ..." ।

माने आब चुनावक परिदृश्य बदलि रहल अछि, एहि गपमे किछु सत्यता अछि। हमरा १९७४ केर पछुलका दौराक स्मृति नहि अछि। १९७१ क भारत-पाक युद्धक कालमे गामक चौबटिया पर ठरल साँझमे घूर तापैत किछु बूढ़-पुरान लोककक गर्वित ललाटक छाहक स्मृति अछि जे भारतीय सैनिकपर गर्व कए रहल रहथि।

फेर १९७४ क आसपासक जे.पी.आन्दोलनक मोन पड़ैत अछि जे कोना सभ युवा न्यायवादी-आन्दोलनकारी भए गेल रहथि। हमर पैघ भाए आ छोट बहनोइ दुमकामे प्रदर्शनमे भाग लेने रहथि आ पुलिस द्वारा पकड़ल जएबापर बाबूजीक नाम लए कऽ अपन जान बचेने रहथि।

हमर पितियौत भाए आ हुनकर तीन टा संगीक मैट्रिकक परीक्षा बड्ड खराप गेल छलन्हि से ओ आन्दोलनकारी बनि गेल रहथि आ जेल गेल रहथि। एहिमेसँ एक गोटे कहियो कांग्रेस तँ कहियो बी.जे.पी.क शरणमे जाइत छथि मुदा हाथ कतहु नहि मारि पबैत छथि, दोसर शुरूसँ कांग्रेसी रहलथि आ चौअनिया नेता बनि जिनगी गुजारि देलन्हि तँ तेसर राजनीतिसँ हाथ जोड़ि अलग भए गेल छथि।

मुदा कहियो हिनको चलती रहन्हि। हमरा सन छठम-सातम कक्षाक लोक सेहो आन्दोलित होइत रहथि आ इन्कलाब-जिन्दाबादक नारा लगबैत रहथि। १९७५-७६ मे तँ हमहूँ अपनाकेँ पैघ क्रान्तिकारी बुझए लागल छलहुँ ओना तहिया हम कक्षा ७-८ मे पढ़ित रही। आपात कालक विरोधमे हम अपन पहिल कविता सेहो लिखने रही। जकरा हमर माझिल भाए हँसीमे फाड़ि कए उड़ा देलन्हि।

फेर १९७७ क चुनावमे किछुकेँ छोड़ि सभ गोटे जनता पार्टीक संग देलन्हि। एतए धरि जे हमर परिवारक कुलगुरु सेहो आएल रहथि आ कहए लगलाह जे एहि बेर जनते पार्टीकेँ भोट देल जाए।

नारा लागए लागल अन्न खाऊ कौरवक ,गुण गाऊ पांडवक। हमर १४ वर्षीय किशोर मन तँ पूर्ण क्रांतिकारी भऽ गेल रहए। हँ ई नहि बिसरब जे हम आइक झारखण्डक संताल परगनाक एक गामक खिस्सा कहि रहल छी। हम ओहि हाई स्कूलक गप कहि रहल छी जकर माटिक धरतीकेँ गोबरसँ निपबाक हेतु हमरा सभकेँ १ किलोमीटर सँ पानि आनए पड़ैत छल आ लग-पासक जंगलसँ २-३ किलोमीटरसँ गोबर आनए पड़ैत छल।तँ अहाँ आब बुझि गेल होएब जे हम ओहि ठामक आ ओहि समयक गप कहि रहल छी जतुक्का विषयमे अहाँ आइयो कहब जे ओहि ठाम तँ भूखाएल-आ नंगटे रहनिहार निवास करैत छथि। पहिने ओतए रोटी दियौक आ तखन फेर राजनीतिक गप करब।

 

तखन ओहू समयमे जनसाधारण मात्र नहि वरन् धर्मगुरु धरि हस्तक्षेप कएने रहथि(आइ-काल्हि बला धर्मगुरु नहि बुझि लेब)। आ ओहि समएक राजनीतिक अर्थ ओ नहि छल जे आइ भए गेल अछि। आशुतोषक प्रारम्भिक पंक्ति शाइत परिस्थितिक स्वाभाविक अभिव्यक्ति अछि जखन ओ कहैत छथि जे गरि-गूरिक बीच ई धारणा बनैत अछि जे राजनीति अपन योग्य नहि अछि... आ जनधारणा सएह तँ सामाजिक सत्य अछि। तखन हम की करी? हम तँ विशिष्ट लोक छी ने। ई कोन गप भेल जे हम करोड़ो खरचि कए टिकट नहि कीनि सकैत छी आ पढ़ाईमे भुसकौल भए नेता नहि बनि सकैत छी? तेँ की? छी तँ हम कलमक जादूगर। हमर कलमसँ जादू चलि रहल अछि आ दुनियाँ बदलि रहल अछि।

 

 

पटना, भोपाल आ रायपुर सभ बदलि रहल अछि। हिन्दुस्तान पत्रक संपादिकाक भावुकता पूर्ण ललित निबंध होअए वा अहाँक-हमर एहन स्वयम्भू चिंतकक लेख ,हम सभ बदलि रहल छी। अरे भाइ ककरा बुरबक बना रहल छी। टी.वी.मे आबि गेल छी आ जे मोन से करबाक अनुमति भेटि गेल अछि।

अखबार हाथमे आबि गेल अछि ,लिखबाक-छापबाक छूट भेटि गेल अछि तखन विचारक बनबामे की हरज? कहियो लिखब तखन अपन मालिकक विरुद्ध.....

4 comments:

  1. बड्ड नीक लागल ई लेख, नव रंगक, सामयिक।

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  2. vishisht prastuti

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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