Wednesday, April 15, 2009

बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग- प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह

बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग

-प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह

 

अतीत आऽ भविष्यक संग सम्बन्ध स्थापित कऽ कए साहित्य अपन अस्तित्वक सत्यताक उद्घोषणा करैछ। विश्व-मानव अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक साहित्यक गवाक्षसँ अतीतक गिरिगह्वरक गुफामे प्रवाहित जीवन-धाराक अवलोकन करैछ आऽ अपन गम्भीरतम उद्देश्यक विविध प्रकारक साधन भूल आऽ संशोधन द्वारा प्राप्त करैत अपन भावी जीवनकेँ सिंचित होइत देखबाक उत्कट अभिलाषा रखैछ। अतीतक प्रेरणा आऽ भविष्यक चेतना नहि तँ साहित्य नहि। अतीत, वर्तमान आऽ भविष्यक कड़ीक अनन्त शृंखलाक रूपमे भावक सृष्टि होइत चल जाइछ आऽ मानव अपन प्रगतिक नियमादि, सिद्धान्तादिकेँ अपन वास्तविक सत्ताक विकासक मंगल कंगन पहिरि कए अपन दुनू हाथसँ आवृत्त कयने रहैछ। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१८६१-१९४१)क कथन छनि जे विश्व-मानवक विराट जीवन साहित्य द्वारा आत्मप्रकाश करैछ। एहन साहित्यक आकलनक तात्पर्य काव्यकार एवं गद्यकारक जीवनी, भाषा तथा पाठ सम्बन्धी अध्ययन तथा साहित्यक विविध विधादिक अध्ययन करब मात्र नहि, प्रत्युत ओकर सम्बन्ध संस्कृतिक इतिहाससँ अछि, मानव-मनसँ, सभ्यताक इतिहासमे साहित्य द्वारा सुरक्षित मनसँ अछि।

 

उन्नैसम शताब्दीमे भारतवर्षमे नवजागरणक प्रबल ज्वार उठल। तकर कोनो प्रभाव मिथिलांचलपर नहि पड़ल, कारण मिथिलावासी प्राचीन परम्पराक पृष्ठपोषक रहलाक कारणेँ संस्कृत शिक्षामे लागल रहलाह आऽ अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य विचारधाराक महत्वकेँ नहि स्वीकारलनि। नवजागरणक फलस्वरूप षष्ठ दशकमे भारतीय परतन्त्रताक बेड़ीसँ मुक्त होएबाक निमित्त सन् १८३७ ई. मे सिपाही विद्रोह कएलक। मिथिलाक नव शासक मैथिलीकेँ कोनो स्थान नहि देलनि। एहि दशकक अन्तिम बेलामे मिथिलाक प्रशासन “कोर्ट ऑफ वार्ड्स”क अधीन चल गेल जकरप्रभाव मिथिलापर पड़लैक। जे एहिठामक निवासीकेँ प्रथमे-प्रथम पश्चिमक स्पर्शानुभूति भेलनि। किन्तु दुर्भाग्य भेलैक जे “कोर्ट ऑफ वार्ड्स” द्वारा मिथिलाक भाषा मैथिली आऽ ओकर लिपिकेँ बहिष्कृत कऽ कए ओकरा स्थानापन्न कयलक उर्दु आऽ फारसी तथा देवनागरी। मिथिलेश महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह (१८५८-१९९८)क गद्देनशीन भेलापर उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे मिथिलावासीक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नव चेतनाक संचार भेलैक। हुनक चुम्बकीय व्यक्त्तित्व, कृपापूर्ण व्यवहार, विद्या-व्यसन आऽ असीम देशभक्ति एवं दानशीलताक फलस्वरूप विद्वान साहित्य सर्जककेँ आकृष्ट कएलक। हुनक उत्तराधिकारी मिथिलेश महाराज रमेश्वर सिंह (१८९८-१९२९) सेहो उक्त परम्पराकेँ कायम रखलनि।

 

उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे भारतीयमे अभूतपूर्व जनजागरण भेलैक, जकर फलस्वरूप स्वतन्त्रता संग्रामक नव स्फुलिंग जागृत भेल आऽ ओऽ सभ स्वतन्त्रताक निमित्त अत्यधिक सचेष्टताक संग सन्नद्ध भेलाह, जकर प्रभाव साहित्य सृजनिहारपर पड़लनि। यद्यपि शताब्दीक अन्तिम वर्ष धरि धार्मिक आऽ सांस्कृतिक चिन्तनपर रुढ़िवादिताक पुनः प्रकोपक विस्तृत छायासँ बौद्धिक आऽ साहित्यिक प्रगतिक समक्ष अवसादपूर्ण वातावरणक परिव्याप्त भऽ गेलैक। तथापि मैथिली साहित्य जगतमे उत्कर्ष अनबाक निमित्त अपन परम्परागत परिधानक परित्याग कऽ नव प्रवृत्तिक रचनाकारक प्रादुर्भाव भेल जाहिमे मातृभाषानुरागी आऽ प्रकाशनक सौविध्यसँ साहित्य नव रूप धारण करय लागल जकर नेतृत्व कयलनि कवीश्वर चन्दा झा (१८३०-१९०७), कविवर जीवन झा (१८४८-१९१२), पण्डित लालदास(१८५६-१९२१), परमेश्वर झा (१८५६-१९२४), तुलापति सिंह (१८५९-१९१४), साहित्य रत्नाकर मुन्शी रघुनन्दन दास (१८६८-१९४५), मुकुन्द जा बक्शी (१८६०-१९३८), जीवछ मिश्र (१८६४-१९२३), चेतनाथ झा (१८६६-१९२१), खुद्दी झा (१८६६-१९२७), मुरलीधर झा (१८६८-१९२९), जनार्दन झा “जनसीदन”, सर गंगानाथ झा (१८७२-१९४१), दीनबन्धु झा (१८७३-१९५५), रामचन्द्र मिश्र (१८७३-१९३८), बबुआजी मिश्र (१८७८-१९५९), गुणवन्तलालदास (१८८०-१९४३), कुशेश्वर कुमर (१८८१-१९४३), विद्यानन्द ठाकुर (१८९०-१९५०), कविशेखर बद्रीनाथ झा (१८९३-१७४), पुलकितलालदास (१८९३-१९४३), गंगापति सिंह (१८९४-१९६९), उमेश मिश्र (१८९६-१९६७), धनुषधारीलालदास (१८९६-१९६५), भोलालालदास (१८९७-१९७७), अमरनाथ झा (१८९७-१९५५), राजपण्डित बलदेव मिश्र (१८९७-१९६५), कुमार गंगानन्द सिंह (१८९८-१९७०), ब्रजमोहन ठाकुर (१८९९-१९७०) एवं रासबिहारीलालदास आदि-आदि जे विविध साहित्यिक विधादिक जन्म देलनि आऽ एकरा सम्वर्धित करबाक दृढ़ सन्कल्प कयलनि।

 

वस्तुतः विगत शताब्दी मैथिली साहित्यक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। अंग्रेजी राज्यक स्थापना देशक साहित्यिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक, आर्थिक आऽ सामाजिक क्षेत्रमे एक नव स्फूर्ति प्रदान कऽ कए मिथिलांचलक जीवन-शैली आऽ सोचक पुनर्संस्कार कयलक। एहि शताब्दीमे आधुनिक शिक्षा, छापाखाना आऽ सरल यातायातक सुविधाक अभाव रहितहुँ मैथिलीमे साहित्य सृजनक परम्परा वर्तमान रहल। बहुतो दिन धरि मैथिली साहित्य संस्कृत साहित्यक प्रतिछाया सदृश रहल। एहिमे साहित्यिक एवं अन्य प्रकारक लेखन निरन्तर होइत रहल। दुइ विश्व युद्धक बीचक कालमे मैथिली साहित्यक सर्वांगीन समुद्धारक चेतना अनलक। एहि कालक लेखनमे ई नव मनोदशा प्रतिफलित भेल आऽ साहित्यक विभिन्न विधामे उल्लेख्य योग्य परिवर्तन भेल।

यथार्थतः मैथिली सहित्य अपन परम्परावादी प्रशस्त मार्गक परित्याग कऽ कए गद्यक आश्रय ग्रहण कऽ नवीन मार्गपर डेग राखि शनैः-शनैः अग्रसर भेल तकर श्रेय आऽ प्रेय दुनू विगत शताब्दीकेँ छैक जे साहित्य सरिताक प्रवहमान धारा सदृश कलकल छलछल करैत अग्रसर भेल, तकर साक्षी थिक विभिन्न विधादिक साहित्येतिहासक प्रकाशन। एहि स्वर्णिम कालक सहस्राब्दीक सम्पूर्ण साहित्यकेँ स्थूल रूपेँ दू धारामे विभाजित कयल जा सकैछ- काव्य-धारा अऽ गद्य धारा। युग संधिक उत्कर्ष बेलामे साहित्यिक गतिविधिक क्षेत्र काव्यसँ बेशी गद्यकेँ प्रधानता भेटल। लोकक ध्यान राजनीति आऽ सामाजिक सुधार दिस गेलैक आऽ काव्यक विकासक लेल अनुकूल आराम वा पलखतिक वातावरण आब नहि रहलैक। नवोदित रचनाकारकेँ कविता सदृश विलास-वस्तुक लेल साधन आऽ समय नहि रहलनि। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे उद्भूत विभिन्न साहित्यिक विधादि भीतिपर दृष्टिनिक्षेप अकारान्त क्रमसँ कयल जाइत अछि, जे विगत शताब्दी कोन रूपेँ एकरा स्वर्णकाल उद्घोषित करबाक दिशामे अवदान कयलक तकर संक्षिप्त रूपरेखा अपनेक समक्ष प्रस्तुत कयल जाऽ रहल छल।

 

कविता सकल जीवनकेँ अपनामे समाहित करैत अछि आऽ मैथिली कविता एकर अपवाद नहि। विगत शताब्दीक मैथिली काव्यधाराक सर्वेक्षणसँ ज्ञात होइछ जे काव्यकार दुइ भागमे विभक्त छथि- किछु तँ परम्परागत रूपक अनुयायी छथि तँ किछु नव प्रयोग कयनिहार सेहो। शताब्दीक सन्धि बेलामे मैथिली काव्यकेँ पारम्परिक एवं नवीन दुनू रूपमे अभिव्यक्ति भेटलैक। पारम्परिक एवं आधुनिक काव्य जटिल रूपेँ मिझरा गेल अछि। काव्यकार लोकनि लोकप्रिय धुन एवं शैलीपर आधारित गीतक रचनाक सामाजिक, राजनीतिक चेतना जगयबाक प्रयास कयलनि। स्वाधीनताक पश्चात् मैथिली काव्यकेँ आगू बढ़यबामे मैथिली पत्रिकादि महत्त्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक। स्वाधीनोत्तर काव्यक प्रवृत्ति सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थितिक कारणेँ आऽ समाजवादी विचारधाराक प्रसादक कारणेँ प्रगतिशील कहल गेल अनेक काव्यक रचना भेल। चीनी आक्रमण तथा पाकिस्तानक संग भेल युद्धसँ राष्ट्रवादी जोश, एकताक भावना एवं देश-भक्तिक स्फुरण भेल। राष्ट्रीय जागरण एवं वीरताक चित्रण करैत कतोक काव्यक रचना भेल। मैथिली काव्यधारा भारतीय भाषाक समकालीन प्रवृत्तिसँ सेहो प्रभावित भेल। किछु कवि एहनो दृष्टिगोचर भऽ रहल छथि जनिक रचनामे कोनो विशेष प्रवृत्तिक कारणेँ हुनका फराक कयल जाऽ सकैछ। आलोच्यकालक काव्य-साहित्यकेँ निम्नस्थ वर्गमे विभाजित कयल जा सकैछ:

 

१.महाकाव्य, खण्डकाव्य, प्रबन्ध काव्य।

२.पारम्परिक गीति काव्य।

३.मुक्तक काव्य।

४.नव रूप आऽ नव विषय एवं अन्यान्य जकरा अन्तर्गत पद्यबद्ध कथा, हास्य ओ व्यंग्य, प्रगतिशील, देशप्रेम, देशभक्तिपरक सम्बोधगीत एवं शोक गीत, प्रेम ओ शृंगार तथा नव कविता।

 

विगत शताब्दीक सत्तरिक दशकक मध्यमे किछु युवा कवि नवकविताक रचना करब प्रारम्भ कयलनि। जीवनक प्रति रुचि, मानवीय मूल्य आऽ वातावरणमे परिवर्तन तथा व्यक्तिवादी प्रवृत्ति एहन कविताक प्रमुख स्वर अछि। एहि आन्दोलनक फलस्वरूप काव्य साहित्यमे परिवर्तनक स्वर गुंजित होमय लागल जे सम्पूर्ण साहित्यमे दृष्टिगोचर होइछ।

 

विवेच्य शताब्दीमे कविक ध्यान आजुक मानव एवं ओकर बहुविध समस्या तथा ओकर बहुविध तत्व दिस विशेष रूपेँ आकृष्ट भेल अछि, तथापि प्राचीन विषय-वस्तु जेना सत्यता, वीरता, प्रेम, पराक्रम आदि तँ आदर्श रूपेँ रहबे करत। एहि प्रकारेँ आधुनिक काव्य-धारा विषय-वस्तुक क्षेत्रमे निस्संदेह समृद्ध भेल अछि, तथा नव-नव काव्य रूपक सेहो स्थापित भेल अछि। अमित्राक्षर वामुक्तवृत्त तथा अनेक नव-नव लय तथा छन्द-बन्धनक सफल प्रयोग एहि युगक प्रवृत्ति भऽ गेल अछि।

 

छन्दकेँ वर्तमान पीढ़ीक कवि पूर्णतः त्यागि देलनि से एक ध्यानाकर्षक वैलक्षण्य थिक। स्वयं कोनो मौलिक छन्द उद्भाषित करबाक एकोगोट प्रयोग नहि देखि पड़ैछ। एहन काव्यकारक संदर्भ, संकेत, उपमा, प्रतीक सभ नव-नव आऽ पारम्परिक कविताक रसिक लोकनिकेँ काव्योपयुक्त शब्द राशि छलनि तँ ऐंस्ट युगक बहुतो कवि अपन नव शब्द भण्डार बनौलनि। एकर कारण थिक जे कवि लोकनि कृत्रिमताक कोनो खास दर्शन अपनौलनि। नव तूरक कोनो कविक विषयमे ई नहि कहल जाऽ सकैछ, जे आयामिक वा अन्य प्रकारक कोनो खासवादक प्रभाव हुनकापर पड़लनि अछि। तथापि बहुतो दृष्टान्त, सन्दर्भ, संकेत, प्रतीक, मिथकक प्रयोग तथा शब्दावलीमे किछु प्रभाव ताकल जाऽ सकैछ। काव्यक भाषा, बिम्ब आऽ अलंकारक क्षेत्रमे हुनका सभकेँ नव-नव उद्भावना करबाक छनि।

 

गद्य धारा-

आधुनिक भारतीय भाषामे गद्य-साहित्यक आविर्भाव भारतीय जीवनमे ओहि मंजिलक द्योतक थिक, जखन मध्ययुगीन वातावरणसँ बहरा कऽ वैज्ञानिकताक प्रतीक बनल। हमर समग्र गद्य साहित्य जीवनक परिष्करण आऽ उत्थानक साहित्य थिक। आइ एकरा माध्यमे हम अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञानक सम्पर्कमे अयलहुँ। मुसलमानी शासन कालमे अरबी-फारसी साहित्यक सम्पर्क भेलासँ गद्य रचनाकेँ प्रोत्साहन नहि भेटि सकल। पूर्व आऽ पश्चिमक सम्पर्कक फलस्वरूप नवचेतना उत्पन्न भेल, समाज अपन हेरायल शक्तिकेँ जमाकऽ गतिशील भेल, साहित्यमे गद्यक श्रीवृद्धि भेल। अतएव विगत शताब्दी मैथिली गद्यक स्वर्णकाल थिक। आब तेँ ई साहित्यक प्रधान अंग बनि गेल अछि। एहि समयमे मिथिलांचलवासी पश्चिमक एक सजीव आऽ उन्नत्तिशीलजातिक सम्पर्कमे अयलाह आऽ ओऽ जाति अपना संग यूरोपीय औद्योगिक क्रान्तिक पश्चात् सभ्यता लऽ कए आयल। नवीन शिक्षा पद्धति, वैज्ञानिक आविष्करादिक प्रवृत्तिसँ मैथिली साहित्य अछूत नहि रहल। शासन सम्बन्धी आवश्यकता तथा जीवन परिस्थितिक कारणेँ गद्य सदृश नवीन साहित्यक माध्यमक आवश्यकता भेल आऽ वास्तवमे गद्य द्वारा मैथिलीमे आधुनिकताक बीज वपन भेलैक। वस्तुतः नवयुगमे नव शिक्षा-पद्धतिमे पालित-पोषित शिक्षित समुदायक आविर्भावक कारणेँ मैथिली गद्य-परम्पराक क्रमबद्ध इतिहास विगत शताब्दीसँ उपलब्ध भऽ रहल अछि। नवीनता जँ भेटैत अछि मात्र गद्यक रूपमे- नवीनता एहि अर्थमे जे ई साहित्यक प्रमुख आऽ स्थायी अंग बनि गेल अछि। गद्यक अटूट परम्परा भेटैछ जे एकर उज्जवल भविष्यक संकेत करैछ। मिथिलांचलमे आधुनिकताक बीजवपन गद्य रचनासँ मानल जयबाक चाही। वास्तवमे गद्यक इतिहासमिथिलांचलक जीवनमे बढ़ैत पाश्चात्य प्रभावक इतिहास कही तँ अनुचित नहि हैत।

 

गद्य-साहित्यक प्रसंगमे ई बात स्मरण रखबाक चाही जे विगत शताब्दीमे अधिकांश उपयोगी आऽ व्यावहारिक विषयसँ सम्बन्धित रचना भेल। वर्तमान समयमे गद्यमे अनुनाद, आलोचना, इतिहास, उपन्यास, कथा, नाटक-एकांकी, निबन्ध, पत्रिका तथा विविध रूपमे रचित गद्य साहित्यक रचना भऽ रहल, कारण जाहि-जाहि साधन द्वारा गद्यक विकास भेल अछि ओऽ सभ नवीन आवश्यकताक पूर्तिक लेल व्यावहारिक दृष्टिकोणमे सन्निहित अछि। साहित्यकार सभक द्वारा एकरा सजयबाक आऽ सँवारक कार्य कयल गेल। मैथिली गद्यक गाथा मिथिलांचलक नवजीवनक प्रभातकालीन चेतना, स्फूर्ति, ग्राहिका शक्ति आऽ गतिशीलताक आशा भरल गाथा थिक। जाहि दिन गद्यक कोनो प्रथम पृष्ठ प्रेसमे मुद्रित भेल हैत से दिन निस्सन्देह साहित्यक क्रान्तिक दिन रहल हैत।

 

अनुवाद

 

विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे मैथिली साहित्यान्तर्गत अनुवादक सूत्रपात भेल। आरम्भिक कालमे ओकर गति मन्थर रहलैक; किन्तु स्वाधीनताक पश्चात् एकर विकासमे गति आयल आऽ वर्तमान समयमे ई एक अत्यन्त सशक्त विधाक रूपमे प्रतिफलित भेल अछि तथा एकर सर्वोपरि उपलब्धि थिक जे प्रचुर परिमाणमे गद्य आऽ पद्य प्रकाशमे आयल अछि। एहि प्रकारक सहित्यिक उपलब्धि अतीतमे नहि छल। आधुनिक, प्राचीन भारतीय भाषाक संगहि संग पाश्चात्य भाषा आऽ साहित्यक सहस्राधिक गद्य-पद्य मैथिली गद्य साहित्यक श्रीवृद्धिमे सहायक भेल अछि।

 

आलोचना

 

साहित्यिक सृजन आऽ ओकर आलोचनाक धारा समानान्तर चलैछ। प्रत्येक युगक साहित्य एक एहन आलोचनाक उद्भावना करैछ जे ओकर अनुरूप होइछ। एहि प्रकारेँ प्रत्येक युगक आलोचना सेहो ओहि युगक रचनाकेँ अनुकूल स्वरूप प्रदान करैछ। वस्तुतः देश आऽ समाजक परिवर्तनशील प्रवृत्ति एक भाग साहित्य निर्माणकेँ दिशा दैछ आऽ समीक्षा ओकर स्वरूप निर्धारित करैछ। अतएव रचनात्मक साहित्यक इतिहास आऽ समीक्षाक इतिहासमे धारावाहिकताक समानता रहैछ।

 

मैथिलीमे आलोचनाक उदय विगत शताब्दीमे भेल आऽ एकर विचित्र स्थिति अछि तथा ई ओकर सभसँ दुर्बल अंग थिक। विवेच्य कालक मैथिली आलोचना विधाक सम्पूर्ण विकास यात्राकेँ दृष्टिमे राखि हम एकर तीन रूप निर्धारित कयल अछि। प्रथम रूप संस्कृत समालोचना सिद्धांत वा निर्णयात्मक अछि। एहि प्रणालीक अनुगमन कयनिहार संस्कृत आचार्य लोकनिक रूप थिक। द्वितीय अछि पाश्चात्य समालोचना सिद्धांत। तृतीय रूप अछि जाहिमे प्राचीन भारतीय आऽ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वय कयल गेल अछि। जीवनक नव परिस्थिति एवं नव सामाजिक चेतनाक कारणेँ विशुद्ध भारतीय दृष्टिकोण अपनायब तँ असम्भव थिक। किन्तु दुर्भाग्यवश अन्य दू रूपक कोनो विशिष्ट आऽ निश्चित परम्परा स्थापित नहि भऽ सकल अछि। साहित्यक उत्कर्षक सन्धि बेलामे आलोचना शास्त्र विभिन्न मत वादक अजायब घर बनि गेल अछि। ओकर प्रधान आधार वैयक्तिक रुचि-अरुचि अछि ने कि कोनो सिद्धान्तक आधार। एकहि आलोचकक समीक्षामे परस्पर विरोधी बात आऽ ओकर सुसंगत रूप नहि भेटैछ।

 

वर्तमानमे प्रवणता सभसँ बेशी देखल जाइछ जे भारत एवं पाश्चात्यक विभिन्न विश्वविद्यालयमे मैथिली विषयपर अनुसंधान भेल अछि आऽ भऽ रहल अछि, जकर संख्या लगभग तीन सहस्रादिसँ अधिक अछि। किन्तु मैथिली अनुसंधानक जे स्थिति अछि ताहिपर कतिपय प्रश्न चिन्ह लागि गेल अछि। अधिकांशतः अनुसंधान अप्रकाशित अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे ओकर प्रकाशनक प्रयोजन अछि, जाहिसँ यथार्थ स्थितिक रहस्योद्घाटन भऽ सकय तथा ई विधा अभिवद्धिति भऽ सकय।

 

इतिहास-लेखन

 

साहित्येतिहासक लेखन तँ ओहि साहित्यक दर्पण समान होइछ जकर अवलोकनहि सँ साहित्यक यथार्थताक परिज्ञान पाठककेँ होइछ। विगत शताब्दीकेँ स्वर्णकाल उद्घोषित करबाक आऽ मातृभाषानुरागी प्रबुद्ध पाठककेँ अपन मातृभाषाक गौरव-गरिमाक आख्यान प्रस्तुत करबाक लेल कतिपय इतिहासकार एकर साहित्यिक परम्पराक पुनराख्यान निमित्त साहित्येतिहासिक ग्रन्थक रचना आऽ ओकर प्रकाशन कयलनि। किन्तु एहि साहित्येतिहासक ग्रन्थक अवलोकनोपरान्त निराश होमय पड़ैछ, कारण निष्पक्ष भावेँ मैथिलीक वैज्ञानिक पद्धतिक अनुसरण कऽ कए अद्यापि इतिहास नहि लिखल गेल अछि जे चिन्तनीय विषय थिक। प्रत्येक इतिहासकार दलगत भावनासँ उत्प्रेरित छथि जाहि कारणेँ  महत्त्वपूर्ण कृतिकारक चरचा पर्यन्त नहि भऽ सकल अछि। एहि सन्दर्भमे हम दुइ इतिहासक चर्चा करब। साहित्य अकादमीक सत्प्रयाससँ “इण्डियन लिटरेचर सिन्स इण्डिपेनडेन्स” (१९७३) प्रकाशित भेल जकर त्रुटिक विषयमे मिथिला मिहिरक कतोक अंकमे एकर भर्त्सना कयल गेल। युग-संधिक उत्कर्ष बेलामे “ए हिस्ट्री ऑफ मोडर्न मैथिली लिटेरेचर”(२००४) प्रकाशमे आयल अछि जकरा कतिपय कारणेँ साहित्य जगतमे विवादास्पद ओ अपूर्ण सेहो अछि जकरा इतिहास कहबामे संकोचक अवबोध होइछ। वर्तमान संदर्भमे प्रयोजन अछि एक एहन साहित्येतिहासक जाहिमे साहित्यिक यथार्थ स्वरूपक उद्घाटन हो तथा उपेक्षित लेखक लोकनिक कृतित्वक सम्यक रूपेण उल्लेख प्रवृत्तिक अनुरूप हो।

 

उपन्यास

 

आधुनिक भारतीय भाषा साहित्यक अन्तर्गत उपन्यास लेखनक प्रादुर्भाव पश्चिमक नव सभ्यता आऽ प्रिंटिंग प्रेसक देन थिक आऽ मानव जीवनकेँ समग्र रूपसँ देखबाक प्रयास मैथिली उपन्यासान्तर्गत विगत शताब्दीक प्रथम दशकमे भेल। ई.एम.फॉस्टर (१८७९- ) क कथन छनि जे जीवनक गुप्त रहस्यकेँ समग्र रूपसँ अभिव्यक्तिक क्षमता जतेक उपन्यासमे अछि ओतेक अन्य कोनो विधामे नहि। इएह कारण अछि जे विगत शताब्दीमे उपन्यास अपन सीमाक कारणेँ महत्त्वपूर्ण विधाक रूपमे साहित्यमे प्रवेश पौलक तथा प्रधान साहित्यिक रूप बनि गेल जकर द्वारा मानव अपन वाह्य एवं आन्तरिक समस्यादिकेँ सोझरयबाक प्रयासमे संलग्न अछि।

 

मिथिलांचलक नव-चेतना, आकांक्षा आऽ विषमता, राष्ट्रीय संग्रामक विभिन्न मतवाद सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक विषमता आदिक अभिव्यक्ति मैथिली उपन्यासक प्रमुखरूपेँ मुखरित भेल। विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकक आरम्भिक साल मैथिली उपन्यास जगतमे विशेष महत्त्व रखैत अछि। “मिथिला” (१९२९) मासिक पत्रमे हरिमोहन झा (१९०८-१९८९)क “कन्यादान” धारावाहिक रूपेँ उपन्यास प्रकाशित होमय लागल। उपन्यास लिखबाक प्रेरणा हुनका जनार्दन झा “जनसीदन” सँ भेटलनि। स्त्री-शिक्षाक आवश्यकता तथा नव-पुरान सम्बन्धी विचारक संघर्ष देखयबाक लेल एकर रचना कयल गेल छल। पुस्तकाकार प्रकाशित होइतहि ई उपन्यास लोकप्रिय भऽ गेल। सामाजिक जीवनक एतेक व्यापक चित्रण एहिसँ पूर्व नहि भेल छल। सामाजिक कुरीतिक पर्दाफाश होइत देखि कए रुढ़िवादी तिलमिला गेलाह, किन्तु नवयुवक वृन्द एकर स्वागत कयलनि। एहि उपन्यासक प्रभाव मुख्यतः तीन रूपमे पड़ल- प्रथम समाजक मनोवृत्तिकपर, द्वितीय कन्या लोकनिक व्यक्तिगत जीवनपर तथा तृतीय मैथिली लेखक समुदायपर।

 

जतय स्वाधीनतापूर्व मैथिली उपन्यासक संख्याअत्यल्प छल ततय स्वाधीनोत्तर युगक प्रवेश एहि विधामे नव स्पन्दन आनि देलक आऽ एकर सहस्रमुखी धारा प्रवाहित भेल आऽ युग संधिक उत्कर्ष बेलामे अनेक उपन्यासकार प्रादुर्भूत भऽ अपन प्रतिभाक किरण बिखेरि कऽ एकरा समुन्नतशील बनौलनि तथा संदर्भमे बना रहल छथि। उपन्यास-लेखनक क्षेत्रमे एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि विलक्षण प्रतिभासम्पन्न उपन्यासकार ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (१९१८-१९८६) जे क्वालिटी आऽ क्वान्टिटीक दृष्टिएँ डेढ़ दर्जन उपन्यास एहि साहित्यकेँ भेंट देलनि जे अद्यापि कोनो उपन्यासकार द्वारा सम्भव नहि भऽ सकल अछि। हिनक एक नवतम् उपन्यास “सोना रूपा हीरा” प्रकाशनक पथपर अछि।

दुइ शताब्दीक संधि बेलामे उपन्यास साहित्यमे नव-नव मार्ग प्रशस्त भेल अछि, जाहिसँ ई एक सशक्त विधाक रूपमे चर्चित-अर्चित भऽ रहल अछि। प्रथम विसशव-युद्धक पश्चात् कांग्रेसक नेतृत्वमे राजनीतिक चेतनाक जागरण भेल संगहि सामाजिक आऽ आर्थिक आन्दोलनक जन्म भेल। उपन्यासकार जमीन्दारीक अत्याचार, दरिद्र किसान, अंग्रेज शासक नीति, नागरिक जीवन, नारी समस्या, समाजमे व्याप्त कुसंस्कार, विवाह प्रथा, शिक्षा आदि अनेक विषयकेँ लऽ कए उपन्यासक निर्माण कयलनि। मिथिलांचलक ग्रामीण जीवनक चित्रणक प्रमुखता आरम्भिक कालमे अवश्य रहलैक, किन्तु आब ओहिमे शहरी मध्यवर्गक मजदूरक जीवनक आर्थिक, राजनैतिक आऽ मनोवैज्ञानिक समस्याक प्रमुखता भऽ गेल अछि। एहि दृष्टिएँ उपन्यास क्षेत्रमे अनेक प्रयोग भेल अछि तथा पाश्चात्य विचरक प्रभाव साहित्यपर स्पष्ट लक्षित भऽ रहल अछि। अधुनातन समयमे मैथिलीक अनेक आधुनिक जीवनक विसंगति, अनेक जटिल राजनीतिक, आर्थिक आऽ मनोवैज्ञानिक यथार्थताकेँ लऽ कए अपन कृतिक निर्माण कऽ रहक छथि आऽ शैली आऽ व्यक्तित्वक दृष्टिसँ नवीनता उद्भासित कऽ रहल छथि।

कथा

साहित्यिक विधानमे कथा नवीनतम अछि। मैथिली कथा-साहित्यक इतिहास पूर्णरूपेण बीसम शताब्दीक देन थिक, जकर विकास तीतीय दशकक पूर्व नहि भऽ सकल छल। प्रारम्भमे संस्कृत कथाक रूपान्तरण प्रकाशित भेल। मैथिली कथा-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबाक श्रेय अछि मैथिलीक पत्रिकादिकेँ। मैथिली कथामे परिवर्तनक सूत्रपात होइत अछि विगत शताब्दीक द्वितीय दशकक पश्चात् जाऽ कऽ। मैथिली कथा साहित्यपर विचार करैत एकरा निम्नस्थ कालखण्डमे विभाजित कयल जाऽ सकैछ।

१.        प्रारम्भ युग- १९२० ई.सँ १९३५ ई.

२.      प्रगति युग १९३६ ई. सँ १९४६ ई.

३.      प्रयोग युग १९४७ ई.क पश्चात्

स्वाधीनता पूर्वमे कतिपय कथाकार साहित्यमे प्रवेश कयलनि, किन्तु हुनक परिपक्व कथा स्वाधीनताक पश्चात् प्रकशमे आयल। देशक स्वाधीन भेलाक पश्चात् मैथिली कथामे तीव्र विकास  भेल। मैथिली गल्प-साहित्यक विकासमे पत्रिकादिक योगदान सर्वाधिक रहल अछि। प्रत्येक पत्रिकक रुझान साधारणतः कथा दिस रहल अछि। अतः नव-नव कथाक रचनाक संगहि-संग नव-नव कथाकारक आविर्भाव अत्यन्त द्रुत गतिएँ भेल। अति आधुनिक कथा-साहित्यमे जाहि नवयुवक कथाकारक अवदान अछि ओऽ गल्प वाङमयक जे मानदण्ड अछि ओकर सम्यक् परिचय रखैत गल्प रचनामे संलग्न भेलाह।

शनैः-शनैः सामाजिक जीवनमे घटित भेनिहार साधारण घटनाकेँ आधार बना कऽ कथाक रचना भेल तथा यथार्थवादी आऽ कल्पना प्रसूत कथाक दुइ धारा जकर प्रवर्तक हरिमोहन झा एवं व्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” कयलनि जाहिमे राजकमल (१९२९-१९६७), ललित (१९३२-१९८३), मायानन्द (१९३४), प्रभास कुमार चौधरी (१९४१-१९९८) आदि कतिपय कथाकार योगदान छलनि। उपर्युक्त कथाकार लोकनिमे सामाजिक चेतना छलनि आऽ हुनका सभक कथा-आदर्श पूर्ण संवेदनशीलताक विशेष गुण आऽ मनोविज्ञानक हल्लुक पुट अछि। परवर्ती कथाकार लोकनि रोमांसपूर्ण कथाक सर्जन कयलनि। युग-संधिक उत्कर्ष बेलाक कथाकार जीवनक कथानक चुनलनि, मध्यवर्गक जीर्ण-जीवनक वर्णन कयलनि, व्यक्तिक मनक विश्लेषण कयलनि, स्त्री-पुरुषक प्रेमक चित्रण कयलनि आऽ आधुनिक जीवनक मानसिक आऽ भौतिक विषमताक पार्श्वभूमिपर अपन कथाकेँ आधारित कयलनि।

मैथिली कथा साहित्यक क्षेत्र व्यापक भेल त्तथा मूल्य एवं दृष्टिकोणमे परिवर्तनक संग विषय-वस्तुमे अधिक वैविध्य आयल अछि। सत्तरिक दशकमे कथा सभमे यथार्थवादी एवं व्यक्तिवादी स्वर तीख आऽ सुस्पष्ट भेल। मैथिली कथाक प्रमुख भाग सामाजिक कथा थिक। सामाजिक जीवन एवं विचारधारामे परिवर्तनकेँ चित्रित कयनिहार कथाक रचना भेल। सामाजिक संरचना, परिवार एवं व्यक्तिगत जीवनक विभिन्न पक्षमे भऽ रहल परिवर्तनक यथार्थ निष्ठ चित्रण कथाकार लोकनि कयलनि अछि। मैथिलीमे लघु कथा, व्यंग्य कथा, लोक कथा इत्यादि विविध रोपक रचना सेहो भेल अछि। सर्वविध मैथिली कथा साहित्यक सम्वर्द्धक कथाकार लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप ई एक सुविकसित विधाक रूपमे अपन स्थान सुरक्षित कऽ लेलक अछि।

नाटक-एकांकी

विगत शताब्दी मैथिली नाटक-एकांकीक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। आधुनिक मैथिली नाट्य जगत जखन अन्धकारमे टापर-टोइया दऽ रहल छल तखन युग-पुरुष जीवन झा गद्यक नव-ज्योतिसँ सम्पूर्ण मैथिली नाट्य-साहित्यकेँ आलोकित कयलनि। आधुनिक मैथिली नाटकक जन्म एही शताब्दीमे भेल जकरा प्रवर्तन कयलनि कीर्ति-पुरुष जीवन झा। ई मैथिली गद्यक महान उन्नायक रहथि। ओऽ गद्यकेँ नवीन स्वरूप प्रदान कयलनि। अपन नाट्यादिक माध्यमे मैथिली गद्यक मंगल द्वारकेँ खोललनि तथा भविष्यक नाटककारकेँ एक नव प्रेरणा देलनि। मैथिलीमे उच्च कोटिक नाट्य-साहित्यक निर्माण कार्य विगत शताब्दीक अनुपम उपहार एहि साहित्यकेँ भेटलैक। विगत शताब्दीक नाटककार जीवनक विभिन्न क्षेत्रसँ सामग्री ग्रहण कऽ कए सामाजिक, धार्मिक, विशुद्ध साहित्यिक, पौराणिक आऽ राष्ट्रीय एवं राजनीतिक नाटकक परम्पराकेँ जन्म देलनि आऽ भारतीय नवोत्थानकालीन भावनाक प्रचार कयलनि। जीवन झाक पश्चात् मैथिलीक दोसर नाटककार साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दास आऽ पण्डित लालदास आऽ हुनका सभक पश्चातो नाटकक क्षेत्रमे एहि परम्पराक निर्वाह होइत रहल। देशक आवश्यकतानुसार विगत शताब्दीमे ऐतिहासिक नाटकक रचना भेल। पौराणिक कथाकेँ नव-ढ़ंगे प्रतिपादित कयल जाय लागल। मैथिलीक किछु नाटककार प्रतीकात्मक नाटकक रचना कयलनि, किन्तु ई परम्परा अधिक पुष्ट नहि भऽ सकल। यद्यपि गीति नाट्यक रचना सेहो विगत शताब्दीमे भेल तथापि मैथिलीमे सुन्दर गीति-नाट्यक रूपमे सोमदेव (१९३४-) क “चरैवेति” (१९८२) एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। विवेच्य कालावधिमे समस्या नाटकक रचना भेल अछि। यूरोपीय प्रभावक अन्तर्गत समस्या नाटकमे बुद्धिवादक आधारपर सामाजिक, व्यक्तिगत तथा जीवनक अन्य क्षेत्रमे व्यर्थक आडम्बर आऽ वाह्याचार तथा परम्परा पालनक विरोध कयल गेल अछि। किन्तु मैथिलीक समस्या नाटकक बुद्धिवाद कूंडित आऽ ओकर क्षेत्र सीमित अछि, जाहिमे जार्ज बर्नाड शॉ आऽ हेनरिक इब्सनक तीक्ष्ण दृष्टिक अभाव अछि। ओहुना ई परम्परा मैथिलीमे विकसित नहि भेल अछि।

आलोच्यकालमे रंगमंचक अभावक कारणेँ एकर प्रगतिमे बाधक सिद्ध भेल अछि। मैथिलीमे एक साधु अभिनयशाला नहि भेलासँ पाठ्य साहित्यक विकासक गति एक विशेष दिशामे झुकि गेल अर्थात् एहन नाटकक निर्माण होइत रहल जे साहित्यिक आनन्दक दृष्टिएँ सुन्दर रचना थिक, किन्तु रंगमंचीय विधानक दृष्टिएँ दोषपूर्ण अछि। विगत शताब्दीक नाट्य-साहित्यपर विवेचन करबाकाल मात्र रंगमंचपर ध्यान नहि देबाक चाही। जँ रंगमंचकेँ नाटकक कसौटी मानि लेल जाए तँ विश्वक अनेक प्रसिद्ध नाटकादिकेँ नाटकक श्रेणीसँ निष्कासित करए पड़त। शैलीक दृष्टिसँ मैथिली नाट्य साहित्य पूर्व आऽ पश्चिमकेँ लऽ कए चलल छल, किन्तु शनैः-शनैः ओऽ पश्चिमाभिमुख अधिक भऽ गेल अछि आऽ भारतीय तत्त्व नगण्य भेल जाऽ रहल अछि।

विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दासकेँ श्रेय आऽ प्रेय दुनू छनि जे मैथिलीमे एकांकी रचनाक शुभारम्भ कयलनि जे पश्चात् जाऽ कऽ एक सबल प्राणवन्त विधाक रूपमे पल्लवित भेल। वर्तमान समयमे एकांकी लिखल जाऽ रहल अछि अवश्य, किन्तु किछु अपवादकेँ छोड़ि कऽ एकांकीक वास्तविक कलाक कसौटीपर खरारहनिहार एकांकीक अनुसंधान करबा-काल निराश होमए पड़ैछ। पृष्ठभूमि, वातावरण आऽ कार्य व्यापारक अभाव प्रायः सभ एकांकीमे भेटैछ। एकर उद्देश्यक परिधि विस्तृत अछि। ओऽ सामाजिक, ऐतिहासिक, राष्ट्रीय, मनोवैज्ञानिक, हास्य-व्यंग्यपूर्ण आदि अनेक उद्देश्यकेँ लऽ कए लिखल गेल अछि। वैश्वीकरणक फलस्वरूप आधुनिक जीवनक विडम्बनापर गम्भीर प्रहार करब एकांकीकारक कर्तव्य भऽ गेलनि अछि। रेडियो आऽ टेलीभीजनक कारणेँ नाटकक नवीनतम रूप ध्वनि रूपकमे भेटैछ, जकर टेकनिक एकांकीक टेकनिकसँ भिन्न होइछ। रंगमंचीय कलाक दृष्टिसँ एकांकीक ध्वनि रूपककेँ आघात पहुँचबाक पूर्ण सम्भावना अछि, ओहिना जेना फिल्मक प्रचारसँ नाट्यकलाकेँ क्षति पहुँचल अछि।

निबन्ध

भारतीय समाजमे एक नव सांस्कृतिक आऽ राजनैतिक चेतनाक उदय, पत्रिकाक प्रकाशन, साधारण विषय, सामाजिक आन्दोलनक फलस्वरूप पत्रिकाक संग जाहि साहित्यरूपक जन्मक संगहि ओकर स्वाभाव पत्रकारिताक विशेषताक झलक भेटैछ। विषय वैविध्य, सामाजिक आऽ राजनैतिक, शैलीक रोचकता आऽ गांभीर्य, गौरवक अभाव आदि आरम्भिक निबन्धक एहन गुण अछि जे पत्रकारितासँ सम्बद्ध अछि। निबन्ध तँ ज्ञान राशिक संचित कोश थिक।

निबन्धकार समाजक भाष्यकार आऽ आलोचक सेहो होइत छथि। अतएव सामाजिक परिस्थितिक जेहन प्रभाव निबन्धमे देखबामे अबैछ ओऽ साहित्यक अन्य रूपमे नहि। विवेच्य कालावधिमे निबन्धक विषय जीवनक अनेक क्षेत्रसँ लेल गेल तुच्छसँ तुच्छ तथा गम्भीरसँ गम्भीर विषयपर निबन्ध उपलब्ध होइछ। यद्यपि ओहिमे चिन्तन-मननक गम्भीरताक अभाव अछि तथापि ओकर सामाजिक चेतना व्यापक छल। समयानुकूल विविध विषयपर बिनु कोनो पूर्वाग्रहक स्वच्छन्द भऽ कए निबन्धकार आत्मीयताक संग अपन हृदय पाठकक समक्ष रखलनि। बिनु कोनो संकोचक विदेशी शासक वा शोषककेँ डाँटि-फटकारि सकैत रहथि तँ अपना ओतयक पण्डित मुल्ला आऽ पुरान शास्त्रकार धरि हुनक कठहुज्जतिपर नीक अधलाह कहलनि। निबन्धकार एक भाग आतुर वा प्रवाह पतित परिवर्त्तनवादी अंग्रेजी सभ्यताक गुलामक खबरि लेलनि तँ दोसर भाग नूतनता भीरू रुढ़िवादीक भर्त्सना कयलनि।

विगत शताब्दीमे गद्य शैलीक निर्माण निबन्धकारक वैयक्तिक प्रयासक प्रतिफल थिक। भाषाक दृष्टिएँ तत्कालीन निबन्धकार लोकनिमे सामूहिक भाव कॉरपोरेट सेन्स- क अभाव छल। गद्यक कोनो स्वीकृत रूप नहि भेलाक कारणेँ ओकर भाषा सार्वजनिक रूप नहि प्राप्त कऽ सकल। आलोच्य्कालक आरम्भिक निबन्धमे विषय आऽ शैलीक दृष्टिएँ वैविध्य भेटैछ।

शनैः-शनैः निबन्धमे पत्रकारिताक स्वच्छन्दता क्षीण होमय लागल। पत्रिकाक संख्या बढ़लाक कारणेँ साप्ताहिक, मासिक एवं त्रैमासिक पत्रक दूरी बढ़ैत गेल आऽ निबन्धकार शनैः-शनैः शिक्षित आऽ शिष्ट समाजक समीप अबैत गेलाह। पश्चात् जाऽ कऽ गम्भीर विषयपर निबन्ध लिखल जाय लागल जाहिसँ ओकर रूप-रंग गम्भीर भऽ गेलैक। साहित्यिक समालोचनात्मक निबन्धक धारा जतेक पुष्ट भेल ओतेक रचना विषयक नियमानुवर्तिता छोड़ि कऽ नव ढ़ंगसँ कम अधिक स्वच्छन्दतापूर्वक शैलीमे निबन्ध नहि लिखल गेल।

हरिमोहन झा प्रचुर परिमाणमे व्यंग्य प्रधान निबन्धक रचना कयलनि जकर विकास युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे भऽ रहल अछि। व्यंग्यक मूल वृत्ति सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे आलोचना भऽ रहल अछि। एकरा मूलमे नव सामाजिक चेतना आऽ ओहिसँ उत्पन्न आलोचना वृत्ति प्रखर व्यंग्यक रूप धारण कऽ कए एहन निबन्धमे अबैत अछि। एहन निबन्धकार लैंब आऽ लूकसक अपेक्षा, प्रवृत्तिक विचारसँ चेस्टरटन, प्रत्युत स्विफटक अधिक समीप छथि। मैथिली निबन्ध अपन अत्यल्प जीवनकालमे कोन प्रकारेँ विविध रूप-रंगमे विगत शताब्दीसँ विकसित होइत आयल जे आगाँ साहित्यमे विषय-नैविध्य जहिना-जहिना विकसित होइत जायत तहिना-तहिना भावी पीढ़ीक निबन्धकार बढ़ैत जयतह।

पठन-पाठनमे स्वीकृति

एकर प्राचीन साहित्यक गौरव-गरिमासँ अवगत भऽ कए विगत शताब्दीक द्वितीय दशकमे आधुनिक भारतक प्राचीनतम कलकत्ता विश्वविद्यालयमे प्रथमे-प्रथम मैथिली भाषा आऽ साहित्यक एम.ए. स्तर धरि पठन-पाठनक शुभारम्भ कएलनि सर आशुतोष मुखर्जी (१८६४-१९२४) आधुनिक भारतीय भाषा विभागक अन्तर्गत। तत्पश्चात् आलोच्य शताब्दीक शष्ठ दशकक पूर्वार्द्धमे पटना विश्वविद्यालयक संगहि संग बिहारक अन्यान्य विश्वविद्यालयमे सेहो एकर पठन-पाठनक व्यवस्था भेलैक। शिक्षण संस्थानमे मैथिलीक मान्यता भेटलाक पश्चात् साहित्यकार लोकनिक दायित्व बढ़लनि जे एहि निमित्त तदनुरूप पाठ्य-ग्रन्थक निर्माणार्थ ओऽ सभ सक्रिय भेलाह आऽ सहित्यान्तर्गत नव स्पन्दनक प्रादुर्भाव भेल।

पत्रिका

पुनर्जागरणक एहि प्रवृत्तिक मैथिलीक सचेष्ट मनीषी तपः सपूत संघर्षरत भऽ साहित्यक नव निर्माणक दिशामे उन्मुख भेलाह। एहिमे सन्देह नहि जे प्रगतिशील आऽ सामान्य पूर्वाग्रह मुक्त शिक्षित समाजकेँ वाणी देबाक निमित्त प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्प्रयाससँ जयपुरसँ “मैथिल हितसाधन” (१९०५) तथा काशीसँ “मिथिला मोद” (१९०६) क प्रकाशनक शुभारम्भ भेलैक, जकरा एक क्रान्तिकारी डेग कहल जाऽ सकैछ, जे गद्य साहित्यक गतिविधिसँ पाठककेँ परिचय करौलनि। एकरा माध्यमे सामयिक साहित्यिक परम्पराक अध्ययन, चिन्तन आऽ मननक क्रम स्वाभाविक आऽ वांछनीय नहि, प्रत्युत भविष्यक हेतु मार्ग निर्देश करबाक, रुढ़ि आऽ विश्वास, शास्त्रीय मान्यतादिक मूल्यांकन करबाक, युगक नवीन आवश्यकता आऽ परखबाक दृष्टिएँ अत्यावश्यक छ्ल। एहि दृष्टिएँ साहित्य निर्माता आऽ अध्येता एक दोसराक समीप आबि गेलाह आऽ कोनो ठोस वस्तु प्राप्ति करबाक प्रशस्त मार्गक निर्माण कयलनि। एक नव शक्ति उद्भाषित भेल, पर्युषितक स्थान अपर्युषितक जन्म भेल। एकर जोरदार प्रभाव पड़लैक मिथिलांचलक मैथिल समुदायपर जे ओऽ सभ एहिसँ अनुप्राणित भऽ दरभंगासँ “मिथिला मिहिर” (१९०९-) क प्रकाशनक शुभारम्भ कयलनि जे विगत शताब्दीक नवम दशक धरि अनवरत चलैत रहल जे पाठकक संगहि लेखक वर्गक सबल दल तैयार कयलक आऽ ओकर नवीनतम अंक देखबाक निमित्त जहिना पाठकमे उत्सुकता रहैत छलनि तहिना लेखक लोकनि में सेहो औत्सुक्य रहैत छलनि जे हुनक कोन रचना प्रकाशित भेल अछि।

मैथिली पत्रकारिताक दोसर चरणक प्रारम्भ प्रथम विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) क पश्चात् प्रारम्भ भेल। एहि समयमे सामाजिक, बौद्धिक आऽ औद्योगिक विकासक रचनात्मक कार्यक्रम हेतु मेधावी जनशक्तिक लोप भऽ गेलैक। विश्व-युद्धक समाप्तिक पश्चात् लोकक मोह भंग भऽ गेलैक जे विदेशी आधिपत्यक चापसँ किछु आशा कऽ रहल रहथि। एहि निराशासँ १९२० ई. मे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा समाज सुधार आऽ असहयोग आन्दोलनक शुभारम्भ मिथिलांचलक चम्पार्णसँ भेल। एहि आन्दोलनक हेतु परिस्थिति अनुकूल भेल अपन किछु गम्भीर मन, देशी लोकक विपरीत एहि आन्दोलनक स्वागत सोत्साह कयलनि आऽ मैथिली पत्रिका आलोच्य कालक तृतेय दशाब्दमे प्रकाशनक पथपर अग्रसर भेल।

मैथिली पत्रिकाक तेसर चरणक शुभारम्भ आलोच्य शताब्दीक चतुर्थ दशकमे गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट (१९३५) द्वारा देशमे संवैधानिक परिवर्तनसँ भेल। एहि समयक अवसान बेलामे द्वितीय विश्व-युद्ध (१९३९-१९४५) प्रारम्भ भेलैक तथा कतिपय नव-नव पत्रिका साहित्य जगतमे प्रवेश कयलक। विगत शताब्दीक षष्ठ दशकमे अनेक पत्रिका प्रकाशित भेल जाहिमे वैदेही (१९५०) एवं मिथिला दर्शन (१९५३) मैथिली साहित्यक नव-निर्माण अहम् भूमिकाक निर्माणे नहि कएलक प्रत्युत रचनाकारक संगहि पाठक वर्गक निर्माण कयलक। युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे गोट बीसेक पत्रिका चलि रहल अछि जाहिमे कोलकातासँ प्रकाशित कर्णामृत विगत २६ वर्षसँ अनवरत चलि रहल अछि, किन्तु शेष पत्रिकादि कखन काल कवलित भऽ जायत ओऽ तँ भविष्यपर निर्भर करैछ।

प्रकाशन

विगत एवं वर्तमान सहस्राब्दी मैथिलीक जे उत्कर्ष जनमानसक समक्ष प्रस्तुत अछि तकर ज्वलन्त साक्षी थिक जे साहित्य निर्माताक संगहि संग प्रकाशनक सौविध्यक फलस्वरूप मैथिली साहित्यमे विपुल परिमाणमे गद्य-पद्य साहित्यक प्रकाशन भेल अछि, तकर श्रेय आऽ प्रेय मैथिली अकादमी आऽ साहित्य अकादमीकेँ छैक। मैथिली अकादमी द्वारा विविध विधादिक स्तरीय ग्रंथ अद्यापि लगभग अढ़ाय सय तथा साहित्य अकादेमी द्वारा डेढ़ सय ग्रन्थक प्रकाशन भऽ सकल अछि। एहि दृष्टिसँ कोलकाताक प्रवासी संस्थादिकेँ छैक जे ओतएसँ विविध-विधादिक सहस्राधिक मौलिक अनूदित पुस्तकक प्रकाशन संभव भऽ सकल अछि जे एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। एहि दिशामे चेतना समिति अर्द्ध शतकसँ बेशी पुस्तकक प्रकाशन कयलक अछि जे उल्लेख्य योग्य अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे अन्यान्य संस्थादि जे पुस्तक प्रकाशनमे सक्रिय अछि तकर सिलसिलेवार ढ़ंगसँ पुस्तक-प्रकाशनमे सहयोग देथि। एहिसँ अतिरिक्त कतिपय साहित्यिक संस्था तथा लेखक लोकनि अपन रुचिक अनुकूल साहित्यिक प्रकाशन कऽ कए एकरा सम्वर्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि जे एहि साहित्यक रीढ़केँ सुदृढ़ कयलक अछि। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे जेना पुस्तक प्रकाशनक बाढ़ि आबि गेल अछि।

महिला साहित्यकारक प्रादुर्भाव

स्वातन्त्र्योत्तर साहित्यान्तर्गत जनजागरणक जे मन्त्र फूकल गेल तकर महिला साहित्यकारपर अत्यन्त तीव्र प्रभाव पड़ल। विगत शताब्दीमे पुरुष लेखकक समानहि महिला लेखक प्रचुर परिमाणमे साहित्यक प्रत्येक विधामे अपन उपस्थिति दर्ज करौलनि जकरा नहि अस्वीकारल जाऽ सकैछ। शताब्दीक सन्धि बेलामे महिला साहित्यकारक कृतित्वक अवगाहनोपरान्त स्पष्ट प्रतिभाषित होइत अछि, जे हुनकामे साहित्य साधनाक अपरिमित सम्भावना छनि। हुनका सभक रचनाक क्षमता एवं गुणवत्ता दुनू दृष्टिएँ उल्लेखनीय अछि। साहित्यक क्षेत्रमे मिथिलांचलक नारी समाजक जागरण विगत शताब्दीक अर्द्धशतकक पश्चात् भेल जे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक। महिलामे साहित्यिक अभिरुचि जगयबाक श्रेय छैक मैथिली पत्रिकादिकेँ जकर कतिपय उदाहरण अछि। साहित्यक कोनो एहन विधा बाकी नहि अछि जाहिमे ई लोकनि अपन हस्ताक्षर नहि कयलनि। हमरा दृष्टिएँ हुनका सभमे साहित्य-साधनाक अपरिमित सम्भावना युग सन्धिक उत्कर्षमे स्पष्ट परिलक्षित भऽ रहल अछि।

विविध गद्य

युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे मैथिलीमे आत्मकथा, जीवनी, यात्रा, संस्मरण, साक्षात्कार आऽ परिचर्चा विषयपर साहित्य पाठकक समक्ष आयल अछि। विभिन्न पत्रिकादिमे समय-समयपर एहन रचनादि अवश्य प्रकाशित भेल अछि, किन्तु ओऽ सभ प्रकाशनाभावक कारणेँ धूल-धूसरित भऽ रहल अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रथम दशाब्दमे ब्रजलिशोर वर्मा “मणिपद्म”क एक अनमोल संस्मरण प्रकाशमे आयल अछि, “हुनकासँ भेट भेल छल”(२००४) जकर सम्पादन कयलनि प्रेमशंकर सिंह एवं इन्द्रमोहन लाल दास, जे अत्यधिक चर्चित-अर्चित भेल अछि। एकरा माध्यमे मिथिलाक अनेक कीर्तिपुरुषक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक संगहि मिथिलाक सांस्कृतिक चेतना तथा गौरवमय परम्पराक चित्रण कऽ मैथिली पाठककेँ अनुप्राणित कयलनि अछि।

संस्थादिक सक्रिय सहभागिता

मैथिली साहित्यक उत्कर्ष बेलामे विगत शताब्दीमे मातृभाषानुरागी लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप मैथिली भाषा आऽ साहित्यक उन्नयनार्थ भारतक विभिन्न क्षेत्रमे यथा- मैथिल महासभा (१९१०), मैथिल छात्र सम्मेलन (१९१०), मैथिली क्ल्ब (१९१८), मैथिल शिक्षित समाज (१९१९), मैथिल सम्मेलन (१९२३), मैथिल युवक संघ (१९३०), मैथिली साहित्य परिषद (१९३०), मिथिला लोक संघ (१९४७), अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति (१९५०), चेतना समिति (१९५४), कर्णगोष्ठी (१९७४) आदि-आदि साहित्यिक संस्थादिक प्रादुर्भूत भेल जे योजना वद्ध रूपेँ मनसा वाचा कर्मणा दत्तचित्त भऽ कार्यरत भेल, जकर फलस्वरूप एकर विकासक अवरुद्ध मार्ग शनैः-शनैः प्रशस्त होइत गेल। सन् १९४७ ई.मे विश्व लेखक सम्मेलन पी.ई.एन.मे, १९६० ई. मे इलाहाबादमे एवं १९६३ ई. मे दिल्लीमे पुस्तक प्रदर्शनीक फलस्वरूप १९६५ ई. मे साहित्य अकादेमीमे आऽ वर्तमान शताब्दीमे भारतीय संविधानमे एहि भाषा आऽ साहित्यकेँ अष्टम अनुसूचीमे एक प्राचीन भाषाक रूपमे मान्यता भेटलाक तत्पश्चात् एकर विकासक गति तीव्रतर होइत गेल।

वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे समग्र संस्थादिक सिलसिलेवार ढ़्गसँ अनुसंधान कऽ कए तथ्योपलब्ध ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्तुत कयल जाय जे भावी पीढ़ीकेँ ई दिशा निर्देश करत। एहि प्रकारक संस्थादिक संख्या बड़ विशाल अछि तेँ ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा करब आवश्यक अछि।

निःसारण

युग-सन्धिक उत्कर्षबेलामे बीसम शताब्दीकेँ स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक पाछाँ कतिपय आर्थिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक तत्त्वक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली साहित्यक उन्नयनार्थ जे क्रिया-कलाप भेल तकर वास्तविक रूपेँ विवरण प्रस्तुत करब एक दुर्वह कार्य थिक तथापि साहित्यिक गवाक्षसँ उल्लेख योग्य परिस्थिति एवं परिवेशमे एकरा स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक उपक्रम कयल गेल अछि। विगत शताब्दीक मैथिली साहित्य जाहि सजीवता, प्रतिभा आऽ विभिन्न विचारादर्श आऽ गतिविधिक परिचय दैत अछि ओकर जड़िमे जाहि प्रकारेँ उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्धमे जमल ओहिना बीसम शताब्दीक उत्तरार्धक बौद्धिक क्रियाशीलताक पूर्वाभास हमरा भेटैछ।

वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे ई श्रेय आऽ प्रेय बीसम शताब्दीकेँ छैक जे आलोच्य कालक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक गद्य-साहित्य। जतय एक भाग परम्परागत मैथिली साहित्य अपन बन्धनमे बरोबरि बन्हने रहल आऽ अपनाकेँ मेटबैत रहल ओतय निश्चये अभूतपूर्व आऽ निस्सन्देह गद्यक रूपमे प्रतिष्ठित भेल। आलोच्य कालीन गद्य मैथिली साहित्यमे एक नव युगक अवतरण कयलक। साहित्येतिहासमे क्रमबद्ध परम्परा एहि शताब्दीक महत्वपूर्ण अवदान थिक जे अपन भविष्यक प्रति आशाक सम्बल लेने साहित्यमे प्रवेश कयलक आऽ ओकर शब्दकोशमे आश्चर्यजनक वृद्धि भेलैक। वस्तुतः आलोच्य शताब्दी गद्य-युग थिक जे अवतारणा आलोच्यकालीन गद्य थिक।

युगसन्धिक उन्मेषबेलामे गद्य जगतक संगहि संग काव्य जगतक अभूतपूर्व समागम एहि कालावधिमे भेल जे मैथिली साहित्यान्तर्गत कतिपय नव-नव विधादिक जन्म भेलैक, ओकर संस्कार भेलैक आऽ ओकर प्रचार-प्रसार द्रुतगतिएँ भेलैक आऽ भऽ रहल अछि जे वर्तमान सन्दर्भमे ओऽ साहित्यक सर्वाधिक प्रमुख अंग बनि कऽ अपन अस्तित्वकेँ सुरक्षित कयलक आऽ लोकप्रिय भऽ गेल अछि। वर्तमानमे साहित्यक कोनो एहन विधा नहि अछि जाहिमे तिल-तिल नूतनताक संचार नहि भऽ रहल हो आऽ साहित्य नव स्पंदनसँ भरि गेल अछि। वर्तमान समयमे हमरा लोकनि अपन मातृभाषाक अत्यन्त समीपमे छी आऽ एहिमे कतिपय उलझन आऽ सन्देहपूर्ण स्थल अछि। तथापि निस्सन्देह कहल जा सकैछ जे मैथिली जीवनक सहस्राब्दीक कालावधि मानसिक उथल-पुथल आऽ बौद्धिक क्रान्तिक संधि-स्थल थिक। विविध-धारा अन्तर्धाराक बीच वर्तमानमे हम मैतिली साहित्यक संधि स्थलपर स्थिर भऽ नवयुगक आशा भरल प्रतीक्षा कऽ रहल छी। गेटेक कथन छनि “वी बिड यू होप”- इतिहास हमरा एहिसँ नीक संदेश नहि दऽ सकैछ। 

6 comments:

  1. 20m shatabdik maithili sahitya par vistrit tika

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  2. sampoorna jankari eke lekh me bheti gel

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  3. bahut vistrit aa tathyapoorna jankari

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  4. shodh aalekh vidvatapoorna

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  5. बहुत नीक शोध लेख

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  6. maithili sahityak 20m shadabdik jhalak bhetal, nik jankari

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...