Thursday, April 02, 2009

हमर प्रेम- कृष्णमोहन झा


हमर ठोरक पपड़ी पर जे एकटा मर्म सुखा रहल अछि
हमर जिह्वा पर जे धूरा उड़ि रहल अछि
हमर सोनितक धार सँ जे धधरा उठि रहल अछि
हमर देहक शंख सँ जे समुद्रक आवाज आबि रहल अछि
हमर आत्माक अंतरिक्ष मे जे चिड़ै-चुनमुनी कलरव क’ रहल अछि
हमर स्मृतिक गाछ पर जे झिमिर-झिमिर बरखा भ’ रहल अछि
तकरा सभक चोट आ खोंच केँ
टीस आ मोंच केँ
रूप आ रंग केँ
स्वर आ गंध केँ
कोना पानक एकटा बीड़ा बनाक’
हम अहाँक आगू राखि दी आ कही-
लिअ’ ग्रहण करू
ई थिक अहाँक प्रति हमर प्रेम…

जखन कि हमरा बूझलए
जे हमर प्रेम
गुड़ियाम मे बान्हल एक टा पियासल बरद अछि
जे खाली बाल्टी केँ देखि-देखिक’ भरि राति हुकरैत अछि

हमर प्रेम अछि
छिट्टा सँ झाँपल एक टा छागर
जे बन्द दुनिया सँ बहरयबाक बेर-बेर चेष्टा करैत अछि

हमर प्रेम धूरा-गर्दा मे जनमल एक टा टुग्गर चिलका अछि
जे दीने-देखार हेरा गेल अछि
बीच बाजार मे

तखन अहीं कहू
कोना हम अपन आत्माक फोका केँ
एक टा मृदुल भंगिमाक संग अहाँक सम्मुख तस्तरी मे राखि दी
आ कही-
लिअ’ ग्रहण करू…

हमर प्रेम जँ किछु अछि तँ एक टा फूजल केबाड़
हमर प्रेम जँ किछु अछि तँ एक टा कातर पुकार
कि आउ
अइ दुनियाक सभ सँ कोमल आ सभ सँ धरगर चीज बनिक’
आबि जाउ

अहाँक स्वागत मे
हमरा ठोर सँ ल’क’ अहाँक ओसार धरि जे ओछाओल अछि
ओ कोनो कालीन नहि
अहाँक तरबा लेल व्यग्र
खून सँ छलछ्ल करैत हमर ह्रदय अछि

आ हमर हड्डीक प्राचीन अंधकार मे
ओसक एक टा बुन्न सन कोमल
अनेक युग सँ अहाँक बाट ताकि रहल अछि हमर प्राण…

हमर प्राण अछि अहाँक आघात लेल आतुर
अहाँक आघात एहि जीवनक एक मात्र त्राण


24 comments:

  1. bah bahut dinuka bad ahank kavita padhlahu, baD nik lagal

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  2. तखन अहीं कहू
    कोना हम अपन आत्माक फोका केँ
    एक टा मृदुल भंगिमाक संग अहाँक सम्मुख तस्तरी मे राखि दी
    आ कही-
    लिअ’ ग्रहण करू

    bad sundar

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  3. आ हमर हड्डीक प्राचीन अंधकार मे
    ओसक एक टा बुन्न सन कोमल
    अनेक युग सँ अहाँक बाट ताकि रहल अछि हमर प्राण…

    हमर प्राण अछि अहाँक आघात लेल आतुर
    अहाँक आघात एहि जीवनक एक मात्र त्राण

    ahank agila padyak pratiksha me

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  4. dhanyavad..dhanyavad..dhanyavad

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  5. हमर ठोरक पपड़ी पर जे एकटा मर्म सुखा रहल अछि
    हमर जिह्वा पर जे धूरा उड़ि रहल अछि
    हमर सोनितक धार सँ जे धधरा उठि रहल अछि
    हमर देहक शंख सँ जे समुद्रक आवाज आबि रहल अछि
    हमर आत्माक अंतरिक्ष मे जे चिड़ै-चुनमुनी कलरव क’ रहल अछि
    हमर स्मृतिक गाछ पर जे झिमिर-झिमिर बरखा भ’ रहल अछि
    तकरा सभक चोट आ खोंच केँ
    टीस आ मोंच केँ
    रूप आ रंग केँ
    स्वर आ गंध केँ
    कोना पानक एकटा बीड़ा बनाक’
    हम अहाँक आगू राखि दी आ कही-

    bhavpravn kavita

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  6. bah.bah
    aah nikali delahu

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  7. hriday samrat chhi ahan

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  8. vidyapatik ke patiya lay jayat re mon pari delahu virhak kavi ji

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  9. bah bhaiya, bad nik lagal kavita,
    sabh line guru gambhir achhi

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  10. svagat achhi,
    ehina ras barsabait rahu

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  11. bad nik krishnamohan ji,
    aar rachnak pratiksha r

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  12. poora kavita eke sans me padha gel,

    kavitak pathak kiye kam hoyat je ehen rachna bhetat, takhan

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  13. Anonymous1:46 AM

    आत्मीय ओ ममत्वपूर्ण टिप्पणी लेल बहुत-बहुत आभार!हमरा त लगैत रहय जे कविता प्रायः केओ नै
    पढैत अछि।
    हमर आर कविता केँ सार्थक क'र'लेल कृपया हमर ब्लॉग-देसिल बयना- पर आउ। पता अछि-http://paraati.blogspot.com

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  14. krishnamohan Jhajee bahut-bahut dhanyabad, ber-ber padhlahu muda tripti nahi bhel pher se padhwak mon karait achhi. Asa karait chhi je ahina apan kavita se pathak ke khush karait rahab, dhanyabad.

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  15. कविता बड्ड नीक लागल , हमहूँ बेर-बेर पढ़ि रहल छी।

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  16. हमर ठोरक पपड़ी पर जे एकटा मर्म सुखा रहल अछि
    हमर जिह्वा पर जे धूरा उड़ि रहल अछि
    हमर सोनितक धार सँ जे धधरा उठि रहल अछि
    हमर देहक शंख सँ जे समुद्रक आवाज आबि रहल अछि
    हमर आत्माक अंतरिक्ष मे जे चिड़ै-चुनमुनी कलरव क’ रहल अछि
    bahut- bahut dhanywad
    jha ji
    Aasha achhi ahina likhal karab ,

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  17. अहांक आगमनसं ई ब्लॊग सुन्दर भए गेल।

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  18. sudhanshu9:01 AM

    hamar monak gap ahank kalam se niklal dekhi mon tript bhel

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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