Thursday, April 02, 2009

1.नहि सोभैया रंगदारी-2.हे नेता जी अहाँ के प्रणाम: दयाकान्त

1.नहि सोभैया रंगदारी

अहॉं विदेहक छी संतान
राखु याज्ञवल्क्यक मान
नहि बिसरू मंडन, ंअयाची
वाचस्पति, विद्यापति केर नाम
गौरब-गाथा सॅ पूर्ण धरा पर
नहि करू एकरा संग गद्दारी
नहि सोभौया रंगदारी

हमर ज्ञान संस्कृतिक चर्चा
हाई छल जग में सदिखन
छल षिक्षाक केन्द्र बनल
पसरल नहि षिक्षाक किरण जखन
आई ठाड़ छी निम्न पॉंतिमें
नहि करू षिक्षाक व्यपारी
नहि सोभौया रंगदारी

कियो बनल स्वर्णक पक्षघर
किया बनल अवर्णक नेता
आपस में सब ‘ाडयंत्र रचिके
एक-दोसराक संग लड़ेता
अहॉं सॅ मिथिला तंग भ गेल
छोरू आब जातिक ठीकेदारी
नहि सोभौया रंगदारी

बाढिंक मारल रौदीक झमारल
जनता के आब कतेक ठकब
गाम-घर सब छोरी परायल
अहॉ आब ककरा लुटब
भलमानुश किछु डटल गाम में
नहि फुकु घर में चिंगारी
नहि सोभौया रंगदारी

आबो जागु आबो चेतु
कहिया धरि अहॉं सुतल रहब
देखु दुनियॉ चांद पर चली गेल
अहॉं आबों कहिया उठब
अहीं सनक भायक खातिर
कनैत छथि वैदेही बेचारी
नहि सोभौया रंगदारी


2.हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

एक बेर नहि  सत्त-सत्त बेर
करैत छी अहाँ के नित्य प्रणाम
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

दू अक्षर सँ बनल ई नेता
देशक बनल अछि भाग्यविधाता
आई-काल्हि ओहा अछि नेता
जकरा लग अछि गुंडाक ठेका
जाल-फरेब फुसि में माहिर
घोटाला में सतत प्रधान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

खादी कुरता नीलक छीटका
मुंह में चबेता हरदम पान
मौजा ऊपर नागरा जूता
उज्जर गमछा सोभय कान्ह
जखन देखू चोर-उच्चका
भरल रहै छैन सतत दलान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

केने छैथ ई भीष्म प्रतिज्ञा
झूठ छोडि  नहिं बाजब सत्य
हाथी दांतक प्रयोग कय के
मुंह पर बजता सबटा पद्य
कल-बल-छल के वल पर सदिखन
जीत लैत छैथ अप्पन मतदान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

गाम विकाशक परम विरोधक
होबय नहि देता एकोटा काज
बान्ह-धूर स्कूल  पाई सँ
बनबैत छैथ ओ अप्पन ताज
स्त्री शिक्षाक जँ बात करू तँ
मुईन लैत छैथ अप्पन कान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

10 comments:

  1. नहि सोभैया रंगदारी

    अहॉं विदेहक छी संतान
    राखु याज्ञवल्क्यक मान
    नहि बिसरू मंडन, ंअयाची
    वाचस्पति, विद्यापति केर नाम
    गौरब-गाथा सॅ पूर्ण धरा पर
    नहि करू एकरा संग गद्दारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    हमर ज्ञान संस्कृतिक चर्चा
    हाई छल जग में सदिखन
    छल षिक्षाक केन्द्र बनल
    पसरल नहि षिक्षाक किरण जखन
    आई ठाड़ छी निम्न पॉंतिमें
    नहि करू षिक्षाक व्यपारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    कियो बनल स्वर्णक पक्षघर
    किया बनल अवर्णक नेता
    आपस में सब ‘ाडयंत्र रचिके
    एक-दोसराक संग लड़ेता
    अहॉं सॅ मिथिला तंग भ गेल
    छोरू आब जातिक ठीकेदारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    बाढिंक मारल रौदीक झमारल
    जनता के आब कतेक ठकब
    गाम-घर सब छोरी परायल
    अहॉ आब ककरा लुटब
    भलमानुश किछु डटल गाम में
    नहि फुकु घर में चिंगारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    आबो जागु आबो चेतु
    कहिया धरि अहॉं सुतल रहब
    देखु दुनियॉ चांद पर चली गेल
    अहॉं आबों कहिया उठब
    अहीं सनक भायक खातिर
    कनैत छथि वैदेही बेचारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    दयाकान्त
    bah

    ReplyDelete
  2. आबो जागु आबो चेतु
    कहिया धरि अहॉं सुतल रहब
    देखु दुनियॉ चांद पर चली गेल
    अहॉं आबों कहिया उठब
    अहीं सनक भायक खातिर
    कनैत छथि वैदेही बेचारी
    नहि सोभौया रंगदारी
    nik lagal

    ReplyDelete
  3. ठीक लिखलहुँ दयाकांत जी।

    ReplyDelete
  4. bah bhai,
    muda suntah ke se nahi kahi,
    etay te ek dosar kwe kat me hamra sabh chhi

    ReplyDelete
  5. ahank tesar kavita maithil aar mithila me padhlahu,
    aashu kavi chhi ahan,
    aar rachna kahiya dhari pathayab

    ReplyDelete
  6. shikshak vyapar te bhaiye gel achhi,
    rangdari ke rokat,
    muda kavik kaj te ahan apna bhari kaybe kelahu

    ReplyDelete
  7. Anonymous12:28 AM

    rangdari katahu sobhlai ye bhai.ehina likhait rahu

    mahesh jha

    ReplyDelete
  8. Anonymous9:34 AM

    dunu kavita samyik- mohan

    1.नहि सोभैया रंगदारी

    अहॉं विदेहक छी संतान
    राखु याज्ञवल्क्यक मान
    नहि बिसरू मंडन, ंअयाची
    वाचस्पति, विद्यापति केर नाम
    गौरब-गाथा सॅ पूर्ण धरा पर
    नहि करू एकरा संग गद्दारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    हमर ज्ञान संस्कृतिक चर्चा
    हाई छल जग में सदिखन
    छल षिक्षाक केन्द्र बनल
    पसरल नहि षिक्षाक किरण जखन
    आई ठाड़ छी निम्न पॉंतिमें
    नहि करू षिक्षाक व्यपारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    कियो बनल स्वर्णक पक्षघर
    किया बनल अवर्णक नेता
    आपस में सब ‘ाडयंत्र रचिके
    एक-दोसराक संग लड़ेता
    अहॉं सॅ मिथिला तंग भ गेल
    छोरू आब जातिक ठीकेदारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    बाढिंक मारल रौदीक झमारल
    जनता के आब कतेक ठकब
    गाम-घर सब छोरी परायल
    अहॉ आब ककरा लुटब
    भलमानुश किछु डटल गाम में
    नहि फुकु घर में चिंगारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    आबो जागु आबो चेतु
    कहिया धरि अहॉं सुतल रहब
    देखु दुनियॉ चांद पर चली गेल
    अहॉं आबों कहिया उठब
    अहीं सनक भायक खातिर
    कनैत छथि वैदेही बेचारी
    नहि सोभौया रंगदारी

    2.हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

    हे नेता जी अहाँ के प्रणाम
    एक बेर नहि सत्त-सत्त बेर
    करैत छी अहाँ के नित्य प्रणाम
    हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

    दू अक्षर सँ बनल ई नेता
    देशक बनल अछि भाग्यविधाता
    आई-काल्हि ओहा अछि नेता
    जकरा लग अछि गुंडाक ठेका
    जाल-फरेब फुसि में माहिर
    घोटाला में सतत प्रधान
    हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

    खादी कुरता नीलक छीटका
    मुंह में चबेता हरदम पान
    मौजा ऊपर नागरा जूता
    उज्जर गमछा सोभय कान्ह
    जखन देखू चोर-उच्चका
    भरल रहै छैन सतत दलान
    हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

    केने छैथ ई भीष्म प्रतिज्ञा
    झूठ छोडि नहिं बाजब सत्य
    हाथी दांतक प्रयोग कय के
    मुंह पर बजता सबटा पद्य
    कल-बल-छल के वल पर सदिखन
    जीत लैत छैथ अप्पन मतदान
    हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

    गाम विकाशक परम विरोधक
    होबय नहि देता एकोटा काज
    बान्ह-धूर स्कूल पाई सँ
    बनबैत छैथ ओ अप्पन ताज
    स्त्री शिक्षाक जँ बात करू तँ
    मुईन लैत छैथ अप्पन कान
    हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

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  9. बहुत नीक प्रस्तुति

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...