Tuesday, March 17, 2009

प्यास- श्यामल सुमन

हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
भूख लागल अछि एखनहुँ, उमिर बीत गेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
नौकरी की भेटल, अपनापन छूटल!
नेह डूबल वचन केर आश टूटल!!
दोस्त यार कतऽ गेल, नव-लोक अपन भेल!
गाम केर हम बुधियार, एतऽ बलेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!

आयल पाविन-त्योहार, गाम जाय केर विचार!
घर मे चचार् केलहुँ तऽ, भेटल फटकार!!
निह नीक कुनु रेल, रहय लोक ठेलम ठेल!
किनयाँ कहली जाऊ असगर, आ बन्द क खेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
की कहू मन के बात, छी पड़ल काते कात!
लागय छाती पर आबि कियो राखि देलक लात!!
घर लागय अछि जेल, मुदा करब निह फेल!
नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!

9 comments:

  1. nik kavita lagal, pravasak vednak marmsparshi anubhuti

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  2. नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!!

    nik

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  3. pyas ahank aar kavita padhbak pyas aani delak

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  4. हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
    भूख लागल अछि एखनहुँ, उमिर बीत गेल!!
    हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
    नौकरी की भेटल, अपनापन छूटल!
    नेह डूबल वचन केर आश टूटल!!
    दोस्त यार कतऽ गेल, नव-लोक अपन भेल!
    गाम केर हम बुधियार, एतऽ बलेल!!
    हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!

    आयल पाविन-त्योहार, गाम जाय केर विचार!
    घर मे चचार् केलहुँ तऽ, भेटल फटकार!!
    निह नीक कुनु रेल, रहय लोक ठेलम ठेल!
    किनयाँ कहली जाऊ असगर, आ बन्द क खेल!!
    हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
    की कहू मन के बात, छी पड़ल काते कात!
    लागय छाती पर आबि कियो राखि देलक लात!!
    घर लागय अछि जेल, मुदा करब निह फेल!
    नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!!
    हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!

    श्यामल सुमन जी,
    बड्ड नीक प्रस्तुति

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  5. avismarniya rahat ee kavita

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  6. atyttam prastuti,
    monak baj bujhalahu hamar

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  7. बहुत नीक प्रस्तुति।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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