Monday, March 02, 2009

फानी-कथा-श्रीधरम

पंच सभ एकाएकी कारी मड़रक दुअरा पर जमा हुअ’ लागलछल । दलान पर चटाइ बिछा देल गेल रहै । देबालक खोधली मे राखल डिबिया धुआँ बोकरि रहल छल । मात्र रामअधीन नेताक अयबाक देरी रहै
बिना रामअधीन नेताक पंचैती कोना शुरु भ’ सकैए? डोमन पाँच दिन पहिनहि सँ पंच सभक घूर-धुआँ मे लागल छल । डोमन चाहैत रहए जे सभ जातिक पँच आबय, मुदा रामअधीन नेता मना क’ देने रहै, “बाभन-ताभन केँ बजेबेँ तँ हम नइँ पँचैती मे रहबौ जातिनामा पँचैती जातिए मे होना चाही ।“ डोमन केँ नेताजीक बात काटबाक साहस नइँ भेलै । रामअधीन आब कोनो एम्हर-ओम्हर वला नेता नइँ रहलै, दलित पाटीक प्रखंड अध्यक्ष छिऐ । थानाक बड़ाबाबू, सीओ, बीडीओ, इसडीओ सभ टा चिन्है छै । कुसी पर बैसाक’ कनफुसकी करै छै । मुसहरी टोलक बिरधापेंशनवला कागज-पत्तर सेहो आब नेतेजी पास करबै छै । कोन हाकिम कतेक घूस लै छै, से सभ टा रामअधीन नेता केँ बूझल छै । कारी मड़र तँ नामे टाक माइनजन, असली माइनजन तँ आब रामअधीने नेता किने?
डोमन पँच सभ केँ चटाइ पर बैसा रहल छल आ सोमन माथा-हाथ देने खाम्ह मे ओङठल, जेना किछु हरा गेल होइ । टील भरिक मौगी सभ कारी मड़रक अँगना मे घोदिया गेल रहै—सोमन आ डोमनक भैयारी-बँटवारा देख’ लेल । ओना दुनू भाइक झगड़ा आब पुरना गेल रहै । मौगी सभक कुकुर-कटाउझ सँ टोल भरिक लोक आजिज भ’ ग्र्ल रहय तेँ रामअधीन नेता डोमन केँ तार द’क’ दिल्ली सँ बजबौलकै । सभ दिनक हर-हर खट-खट सँ नीक बाँट-बखरा भइए जाय ।
झगड़ाक जड़ि सीलिंग मे भेटलाहा वैह दसकठबा खेत छिऐ जे सोमनक बापे केँ भेटल रहै । रामअधीन नेताक खेतक आरिये लागल दसकठबा खेत । कैक बेर रामअधीन नेता, सोमनक बाप पँचू सदाय केँ कहने रहै जे हमरे हाथेँ खेत बेचि लैह, मुदा पँचू सदाय नठि गेल रहै । रामअधीन नेता आशा लहौने रहए जे बेटीक बियाह मे खेत भरना राखहि पड़तनि, मुदा पँचू सदाय आशा पर पानि फेर देने छलै । एकहक टा पाइ जोगाक’ बेटीक बियाह सम्हारि लेलक तेँ खेत नइँ भरना लगेलक । मरै सँ चारि दिन पहिनहि पँचू सदाय सोमन आ डोमन केँ खेतक पर्ची दैत कहने रहै,”ई पर्ची सरकारक देल छिऐ, जोगाक’ रखिहेँ बौआ, बोहबिहेँ । नइँ । दस कट्ठा केँ बिगहा बनबिहेँ, भरि पेट खाइत देखिक’ सभकेँ फट्टै छनि । बगुला जकाँ टकध्यान लगेने रहैए ।“
डोमन बापक मुइलाक बाद परदेश मे कमाय लागल रहय आ सोमन गामे मे अपन खेतीक संग-सग मजूरी । फसिलक अधहा डोमनक बहु रेवाड़ीवाली केँ बाँटि दैक । मुदा, जेठकीसियादिनी महरैलवाली केँ ईबड्ड अनसोहाँत लागै, “मर्र, ई कोन बात भेलै, पसेना चुवाबै हमर साँय, चास लगाब’ बेर मे सभ निपत्ता आ बखरा लेब’ बेर गिरथाइन बनि जायत । लोकक साँय बलू गमकौआ तेल-साबुन डिल्ली से भेजै हय त’ हम कि हमर धीया-पुत्ता आरु सुङहैयो ले’ जाइ हय् ।“
सभ दिन कने-मने टोना-टनी दुनू दियादिनी मे होइते रहै । मुदा, ओहि दिन जे भेलै...
सोमन गहूँम दौन क’ क’ दू टा कूड़ी लगा देलक आ नहाय ले’ चलि गेल । गहूमक सऊँग देह मे गड़ैत रहै । रेवाड़ीवाली अपन हिस्सा गहूम पथिया मे उठाब’ लागल रहए कि देखते जेना महौलवाली केँ सौंसे देह मे फोँका दड़रि देलकै, “रोइयोँ नइँ सिहरै हय जेना अपने मरदबाक उपजायल होइ ।” रेवाड़ीवाली कोना चुप रहितय ? कोनो कि खेराअँत लै छै? झट द’ जवाब देलकै, “कोनो रंडियाक जिरात नइँ बाँटै हय कोइ अधहाक मालिक छिऐ छाती पर चढ़िक बाँटि लेबै।” ’रंडिया’ शब्दा महीरैलवालीक छाती मे दुकैम जकाँ धँसि गेलै-“बरबनाचो...के लाज होइ हय बजैत साँय मुट्ठा भेजै हय आइँठ-कुइठ धोइ क’ आ एत’ ई मौगी थिराएल महिंस जकाँ टोले-टोल डिरियायल फिरै हय, से बपचो...हमरा लग गाल बजाओत।“ सुनिते रेवाड़ीवालोक देह मे जेना जुरपित्ती उठि गेलै ओ हाथ चमकबैत महरैलवालीक मुँह लग । चलि गेल, “ऐ गै धोँछिया निरासी! तूँ बड़ सतबरती गै! हे गै उखैल क’ राखि देबौ गै । भरि-भरि राति सुरजा कम्पोटर पानि चढ़ा-चढ़ा क’ बेटीक ढीढ़ खसेलकौ से ककरा स’ नुकायल हौ गै? कोना बलू फटा-फटि बेटीक ’दीन क’ ससुरा भेज देलही।”
बेटीक नाम सुनिते महरैलवालीक तामस जवाब द’ देलकै झोँ टा पकड़िक’ रेवाड़ीवाली केँ खसा देलक । दुनू एकदोसराक झोँ ट पकड़ने गुत्थम-गुत्थी भेल । ओम्हर सँ सोमनक बेटा गँगवा हहासल-फुहासल आयल आ मुक्के-म्य्क्की रेवड़ीवाली केँ पेटे ताके मार’ लागल । रेवाड़ीवाली एसगर आ एमहर दू माइ-पूत । कतेक काल धरि ठठितया, ओ बपहारि काट’ लागल । टोल पड़ोसक लोक सभ जमा भ’ गेल रहै, दुनू केँ डाँटि-दबाड़ि क’ कात कयलक । दुनू दियादिनीक माथक अधहा केस हाथ मे आबि गेल रहै ।
ओहि राति रेवाड़ीवालीक पेट ने तेहन ने दरद उखड़लै जे सुरज कम्पोटर पानि चध्आ क’ थाकि गेलै, मुदा नइँ सम्हरेलै । चारिये मासक तँ भेल रहै, नोकसान भ’ गेलै । बेहोसियो मे रेवाड़वाली गरियबिते रहलै, “ईडनियाही हमरा बच्चा केँ खा गेल । सोचै हय कहुना निर्वश भ’ जाय जे सभ टा सम्पैत हड़पि ली । डनियाहीक बेटा मरतै । धतिंगबाक हाथ मे लुल्ही-करौआ धरतै । काटल गाछ जकाँ अर्रा जेतै...। ”
दिसरे दिन रेवाड़ईवाली थाना दौगल जाइत रहे, रिपोट लिखाव’ । रस्ता सँ रामअधीन नेता घुरेने रहै, “समाजे मे पँचैती भ’ जैतौ” आ नेताजी सोमन केँ मार’-मास्क छूटल रहै, “रौ बहि सोमना । मौगी केँ पाँज मे राखबेँ से नै । आइए सरबे सब परानी जहल मे चक्की पिसैत रहित’ । मडर केस भ’ जइतौ । सरबे हाइकोट तक जमानति नहि होइत ।” सोमन बीतर धरि काँपि उठल रहय । नहि जानि पँचैती मे की सभ हेतै । एक मोन भेलै, जाय आ पटुआ जकाँमहरैलवाली केँ डंगा दैक । ’ई, छिनरी के हरदम फसादे वेसाहैत रहैए ।’
रामअधीन नेताक अबिते पँचैतीक करबाइ शुरु भ’ गेलै । फौदारक चीलम सँ निकलैत धुँआक टुकड़ी किछु दूर उपर उठि बिला जाइत रहे गंधक माध्यम सँ अपन उपस्थितिक आभास दैत एअहय ।
“हँ त’ डोमन किऐ बैसेलही हेँ पँचैती, से पँच केँ कहबिही किने” रामअधीन नेता बाजल । डोमन ठाढ़ होइत बाजल, “हम परदेस कामाइ छिऐ । रेवाड़ीवाले एत’ एसगर रहै हय । पँचू सदाय बलू भैयाक बाप रहै त’ हमरो बाप रहै । हमहुँ पँचूए सदायक बुन्न स’ जनमल छिऐ आ बोए केँ सरकार जमीन देने रहै महंथ स’ छीनिक । अइ जमीन पर जतने अधिकार एकर हइ ओतने हमरो हय । तहन जे स’ब मिलि क’ रेवाड़ीवालीक गँजन केलकै, तकर निसाफ पँच आरु क’ दइ जाउ । हमरा आर कुछो नइँ कहनाइ हय ।“ सब चुप...फेर नेतेजी सोमन केँ टोकलके, “की रौ । तोहर की कहनाम छौ?”
“आब हम बलू की कहबै ? जे भ’ गेलै से त’ घुरिक नइँ एतै ग’ । समाज आरूक बीच मे छिऐ । जते जुत्ता मारै केँ हइ, मारि लौ । दुनू मौगी रोसाएल रहै, तहन त’ बलू ओकर नोकसान भ’ गेलै तेँ ओकर दिख त लोक नइँ देतै । तहन जे भ’ गेलै से भ’ गेलै । पंच आरू मिलिक’ बाँट-बखरा क’ दौ । खेतो केँ आ घरो केँ । झगड़े समापत भ’ हेतै ।”
“रौ बहिं सिमना, बात केँ लसियबही नइँ । तहन त’ अहिना ककरो कियो खून क’ देतै आ समाज मुँह देखैत रहतै । कोना बभना आरू पुक्की मारै जाइ हइ से तूँ सभ की जान’ गेलही । परसू बेलौक पर सार मुखिया हमरा देखि-देखिक’ हँसैत रहय, चुटकी लैत रहय, “की हौ रामअधीन! जहन टोले नइँ सम्हरै छ’ त’ बिधायक बनलाक बाद पूरा एलाका कोना सम्हरतह? सुनै छिय’ एहि बेर टिकट तोरे भेटत’ । चल’ अइहबा मे पार लागिऐ जेत’।...” नेताजी गुम्हरल, “टिकटेक नाम सुनिक’ सार सब केँ झरकै छनि, आगू की सभ जरतनि?” रामअधीन नेता एक बेर मोँ छ केँ चुटकी सँ मीड़ि उपर उठेक फेर आक्रामक मुद्रा बनबैत बाजल, “सुनि ले बहिं, से सभ नइँहेतौ । गलती दुनू के छौ । पाँच-पाँच हजार दुनू केँ जुर्बाना देम’ पड़तौ, जातिनाम खाता मे।” नेताजीस्वाभाविक गति सँ पुन: एक बेर मोंछक लोली केँ चुटकी पर चढ़बैत मड़र कका दिस देखलनि, “की हौ मरड़ कका बजैत किऐ ने छहक?” मड़र कका बदहा जकाँ मूड़ी डोला देलकै ।
डोमन भाइ सँ बदला लैक धुन मे एखन धरि गुम्हरि रहल छल, मुदा नेताजीक बात सुनिते झमान भ’ खसल । एक मोन भेलै, कहि दै—जे भेलै से भेलै भैयारी मे । नइँ करेबाक य’ पंचैती । ई किन बात भेलै ! हमरे बहु मारियो खेलक आ जुर्बान सेहो हमहीं दियौ, मुदा चुप रहल । डरें बाजल नइँ भेलै । डोमन केँ देखल छै जे रामअधीन नेता पंचैती नइँ माननिहार केँ कोना ताड़क गाछ मे बान्हिक’ पीटै छै । एखन धरि जुर्बाना वला पचासो हजार टाका जातिनाम खाता मे गेल हेतै, मुदा हिसाब? ककर बेटी बियेलैहेँ जे रामअधीन नेता सँ हिसाब माँगत!
रामअधीन नेताक पी.ए. जकाँ हरदम संग रहनिहार मोहन सदाय बाजि उठल, “की रौ सोमना, हम दुनू भाइ स’ पुछै छियो; कहिया तक पाइ जमा क’ देमही ? एक सप्ताह स’ बेसीक टेम नइँ देल जेतौ । अहि पाइ स’ कोनो छिनरपन नइँ हतै, सारबजनिक काम हेतै । दीना-भदरीक गहबर बनतै ।”
“कतौ स’ चोरी कए क’ त’ नइँ आनबै हमर हालति बलू ककरो स’ नुकाएल त’ नइँ हय ।“ सोमन कलपल ।
मोहन सदाय केँ रामअधीनक कृपा सँ जवाहर-रोजगार वला ठिकेदारी सभ भेट’ लागल छै । सीओ, बीडीओ केँ चेम्बरे मे बंद क’ दैत अछि आ मनमाना दस्तखत करा लैत अछि तेँ ओकरा सभ टभजियायल छै जे घी किना निकालल जाइत छै । ओ सभक चुप्पी केँ तौलैत मड़रककाअक नाड़ी पकड़लक “की हौ मड़र कका! तोरा आरूक की बिचार छह? दीना भदरीक गहबर मे ओ पाइ लागि जाए त’ नीके किने ?”
मरड़ कका आइ दस साल सँ हरेक पंचैती मे अहिना दीना-भदरीक गहबर बनैत देखि रहलछै’ मुदा एखनो दीना-भदरीक पीड़ी पर ओहिना टाँग अलगा क’ कुकूर मुतिते छै । मड़रकका मने-मन कुकू केँ गरियेलक, “सार, कुकूरो केँ कतौ जगह नइँ भेटै हय, देबते-पितरक पीड़ी केँ घिनायत ।” खैनीक थूक कठ धरि ठेकि गेल रहै, पच्चा द’ फेकैत बाजल’ “जे तूँ सभ उचित बुझही !”
पंचैती मे रामधीन नेता आ मोहन सदाय बजैत जा रहल छल । बाकी सभ पमरियाक तेसर जकाँ हँ मे हँ मिलबैत । सोमन पंच सभक मुँह ताकि रहल अछि, मुदा दिन भरिक हट्ठाक थाकल-ठेहियायल पंच सभक मुँह स्पष्ट कहै छै जे कतेक जल्दी रामअधीन नेता निर्णय दै आ ओ सभ निद्राक कोरा मे बैसि रहय । मड़र ककाक हुँहकारी सँ मोहन सदायक मनोबल एक इँच आरो उपर उठलै । ओ बाजल, “नगदी ई दुनू भाइ जमा क’ सकत से उपाय त’ नइँ छै तहन पाइ कोना एकरा सभ केँ हेतै, तकरो इन्तिजाम त’ आइए भ्’ जेबाक चाही । आब अहि ले’ दोसर दिन त’ बैसार नइँ हेतै । हम्र एक टा प्रस्ताब छै जे दुनू भाइक साझिया दसकठबा खेत ताबत केओ दस हजार मे भरना ल’ लौ । जहिया दुनू भाइ पाइ जमा क’ देतै तहिया खेत घुरि जेतै ।”
बिना ककरो विचार लेनहि मोहन सदाय डाक शुरु क’ देलक, “बाज’के लेबहक! जमीन अपने टोला मे रहतै बभनटोली मे नइँ जेनाय छै खपटा ल’क”
सभ चुप्प!
फेर मोहन सहाय बाजल, “जँ नइँ कियो लेबहक त’ नेताजी सोचतै, टोलक इज्जति त’ बलू बचाब’ पड़तै ओकरे किने ।” अंतिम श्ब्द बजैत मोहन सदायक आँखि नेताजीक आँखि सँ टकरा गेलै । मड़रकका आँखि मुनने भरिसक कुकूरे केँ खिहारि रहल छलाह । खैनीक सेप मुँह मे एतेक भरि गेल रहनि जे कने घोँ टाइयो गेलनि । खूब जोर सँ खखसैत बजलाह, :सुनि ले’ बहिं पिछला बेर जकाँ एहू बेर नइँ पजेबा खसि क’ उठि जाइ ।“ मड़र ककाक शंका मे आरो एक-दू गोटा अपन हामी भरलक । मोहन सदाय पहिनहि सँ तैयार रहय, झट द’ बाजि उठल, “नइँ हौ। दसक हहास बलू अपना कपार पर के लेत? जुर्बानाक पाइ देबते-पितर मे जेतै । दीना-भदरी संगे जे सार फ़द्दारी करत, तकरा घर पर खढ़ो बचतै ? घटतै त’ एक-दू हजार नेताजी अपन जेबियो स’ लगा देतै । कोनो अंत’ जेतै? धरम-खाता मे जमा रहतै । बभना आरू जेहन डीहबारक गहबर बनेलकै, ओहू स’ निम्मन दीना-भदरीक गहबर बनतै।”
महरैलवाली बड़ी काल सँ मुँह दबने रहय । आब ओकर धैर्य जबाव द’ देलक, “हइ के हमर जमीन लेतै? दीना-भदरीक गहबर बनै ले’ हमरे जमीन हइ । मोंछवला सभ बेहरी द’क’ बनेतै से नइँ।” रेवाड़ीवाक्लीक हृदय सेहो आब बर्फ भ’ गेल रहय । दियादनीक बात मे ओकरो मौन समर्थन रहै ।
रामअधीन नेता केँ कहियो-कहिओ दिन तका क’ तामस उठै छै जहन ओकरा मोनक विपरीत कोनो काज होइत छै। एहन परिस्थिति मे नेताजी टोल भरिक छौड़ी-मौगी सँ गारिक माध्यम सँ लैंगिक संबंध स्थापित क’ लैत छथि । “छिनरी केँ तूँ बीच मे बजनाहर के? हम सोमना नइँ छी, ततारि देब ।“ नेताजी मारैक लेल हाथ उठेलनि । महरसिलवली नेताजीक लग मे आरो सटैत बाजल, “माय दूध पियेने हइ त’ मारि क’ देख लौ ।” नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’ बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ । आगि-पानि बारि देबौ, देखै छी कोना गाम मे तूँ रहि जाइत छें।”
“है केहन-केहन गेलै त’ मोछवला एलै । बहरा गाम मे रहि जेबै तें जमीन पर नइँ ककरो चड़ह’ देबै । ई नेताबा आरू गुरमिटी क’क जमीन हड़प चाहै हय । जमीन भरना लेनिहार केँ त’ खपड़ी स’ चानि फोड़ि देबै । दीना-भदरी गरीबेक जमीन लेतै । अइ नेताबा आरूक कपार पर हरहरी बज्जर खसतै । घुसहा पंच सभ केँ मुँह मे जाबी लागि गेल हय । निसाफ बात बजैत लकबा नारने हइ ।“
महरैवालीक ई हस्तक्षेप सोमनक पक्ष केँ आरो कमजोर क’ देलकै । पंच सभ सोमन केँ धुरछी-धुरछी कर’ लगलै । फौदार कहलकै, “त’ रौ बहिं सोमना, ई मौगी ठिके झँझटिक जड़ि छियौ । एकरा अँगना क’ बइलेबेँ से नइँ? गाइरे सुनबै ले’ पंच आरू केँ बजेलही हें ।” सोमन केँ भरल सभा मे ई बेइज्जती बड़ अखड़लै “जहन मरदा-मरदी बात होइ हय त’ ई मौगी किऐ बीच मे टपकै हय ।” सोमन, महरैलवालीक ठौठ पकड़ि क’ अँगना मे जा क’ धकेलि देलक । महरैवाली आँगने सँ गरियाबैत रहल, “अइ मुनसा केँ त’ जे नइँ ठकि लइ । बोहा दौ सभ टा । नेतबा सभ त’ तौला मे कुश द’क’ रखनै हय।”
आब नेताजीक तामस मगजो सँ उपर चढ़ि गेल, “ई सार सभ ओना नइँ सुधरत । एखने बभना आरू दस टा गारि दैतनि आ चारि डंटा पोन पर मारितन्हि त’ तुरते पंचैती मानितय । कोन सार पंचैती नइँ मानत से हमरा देखनाइ यए ।” नेताजीक ठोरक लय पर मोंछो थरथरा रहल छल ! “सरबे सभ केँ हाथ-पयर तोड़िक’ राखि देबनि । घर मे आगि लगा क’ भक्सी झोंकान झौकि देबनि । देखै छी कोन छिनरी भाइ दरोगा हमरा खिलाफ एन्ट्री लैयए ।” चारू भर श्मशानक नीरवता पसरि गेल छल । पंच सभ आगाँक बातव् केँ रोकबाक लेल डोमन आ सोमन दिस याचक दृष्टएँ ताकि रहल छल । मोहन सदाय कागत-कजरौटी निकालैत सोमनक कान मे बाजल, “की विचार छौ, फसाद ठाढ़ करबें?” आ फेर सोमनक थरथराइत औंठा पकड़िक’ कजरौटी मे धँसा देलक ।
अही बीच महरैलवाली वसात जकाँ हहाइत आयल आ दुनू हाथ सँ कागत आ कजरौटी केँ पकड़ि क’ ओहि पर सूति रहल! ओ बाजय चाहैत रहय, मुदा मुँह सँ आवाज नहि निकलि रहल छलै । रामअधीन नेता कागत आ कजरौटी महरैलवालीक हाथ सँ छीन’ चाहैत छल, मुदा महरैलवाली पाथर भ’ गेल रहय । जेना ओ कागत नहि, ओ दसकठवा खेत हो जकरा ओ अपना छाती सँ अलग नहि कर’ चाहैत रहय ।
“छिनरी केँ तू एना नहि मानवें ।” महरैलवालीक मुँह पर घुस्सा मारैत ओकर मुट्ठी केँ हल्लुक कर’ चाहलक ।
एम्हर रेवाड़ीवालीक चेहरा तामसे लाल भ’ गैल रहै । ओकर सभ टा चिद्रोह नेता सभक कूटनीति केँ बुझिते पिघलि गेल रहै । ओ डोमनक देह झकझौरैत बाजल, “बकर-बकर की ताकै छ’ । नार’ ने पूतखौका नेताबा आरू केँ । जब खेते नहि बचत’ त’ बाँटब’ की?” रेवाड़ीवालीक ई रूप देखि नेताजीक हाथ ढील हुअ’ लागल । पंच सभ हतप्रभ रेवाड़ीवाली दिस ताक’ लागल

8 comments:

  1. shreedharam ji svagat achhi,

    ee katha gam ghar se jural satya achhi

    ReplyDelete
  2. महरैलवाली बड़ी काल सँ मुँह दबने रहय । आब ओकर धैर्य जबाव द’ देलक, “हइ के हमर जमीन लेतै? दीना-भदरीक गहबर बनै ले’ हमरे जमीन हइ । मोंछवला सभ बेहरी द’क’ बनेतै से नइँ।” रेवाड़ीवाक्लीक हृदय सेहो आब बर्फ भ’ गेल रहय ।

    ati sundar,
    lok jamin harpay lel mahadevak ling dosrak khet se upari mandir dhari bana dait chhathi,
    ehi kathak jatek prashansa kayal jay se kam.

    ReplyDelete
  3. phanik girah katbak lel badhai ho shreedharam ji

    ReplyDelete
  4. apan larai me dosar phaida uthabite achhi,
    muda strik psychology mithila me pahinahiye se besi majboot rahal achhi se ee katha seho siddha karait achhi,

    phani ke sasarphani bana deit chhathi strigan samaj, nik prastuti shreedharam ji

    ReplyDelete
  5. ehi blog par ek se ek rachna padhay le bhetai ye,
    dhanyavad jitu ji aa shreedharam ji

    ReplyDelete
  6. NAMASKAAR
    FANI-KATHA ke lel SREEDHARAM JI ke dhanyawwad . halanki ea baat sahi achhi je ehi KATHA ke PATRA akhano maujood achi apane samaj me,aur ahan san katha-kaar KAHANI ke madhyam s,a SAMAJ AA YUVA varga ke dhyaan khinchai ke koshish kayalau jahi apane safal seho bhelau. ummid karait chhi je ehina samaaj ke saamne aa samaaja,k samasya ke, aanai ke koshish jaari rakhane rahab.
    PRABANDHA KUMAR SINH
    MANIGACHI
    DARBHANGA

    ReplyDelete
  7. बहुत नीक प्रस्तुति।

    ReplyDelete

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...