Thursday, January 29, 2009

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अयलाह आऽ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कय आऽ गाबि कय सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आऽ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि आऽ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आऽ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतय चोर बनि जाइत छथि आऽ जतय सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजाक/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पदावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आयल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहय प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण करैत अछि आऽ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आऽ आजीविका लेल मोन-मारि कय प्रवास, ताहिसँ फराक अछि। तखन जाऽ कय हमरा सात टा विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देशाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ ६ टा विद्यापतिक नेपाल पदावलीसँ भेटल, आऽ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पदावलीसँ।

विद्यापतिक पिआ देशाँतर
दृश्य १
स्टेजपर हमर बिदेसिया बिदेस नोकरीक लेल बिदा होइत छथि आऽ जुवती गबैत छथि- गीतक बीचमे एकटा पथिक अबैत छथि आऽ मंचक दोसर छोड़पर चोर लोकनि धपाइत नुकायल छथि। मंचक दोसर छोड़पर कोतवाल आऽ शुभ्र धोतीधारी पेटपर हाथ देने निफिकिर बैसल छथि।
धनछी रागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
हम जुवती, पति गेलाह बिदेस। लग नहि बसए पड़उसिहु लेस।
हम युवती छी आऽ हमर पति बिदेस गेल छथि। लगमे पड़ोसीक कोनो अवशेष नहि अछि।

सासु ननन्द किछुआओ नहि जान। आँखि रतौन्धी, सुनए न कान।
सास आऽ ननदि सेहो किछु नहि बुझैत छथि। हुनकर सभक आँखिमे रतौँधी छन्हि आऽ ओऽ सभ कानसँ सेहो किछु नहि सुनैत छथि।

जागह पथिक, जाह जनु भोर। राति अन्धार, गाम बड़ चोर।
हे पथिक! निन्नकेँ त्यागू। काल्हि भोरमे नहि आऊ। अन्हरिया राति अछि आऽ गाममे बड्ड चोर सभ अछि।

सपनेहु भाओर न देअ कोटबार। पओलेहु लोते न करए बिचार।
कोतबाल स्वनहुमे पहड़ा नहि दैत अछि आऽ नोत देलोपर विचार नहि करैत अछि।

नृप इथि काहु करथि नहि साति।
पुरख महत सब हमर सजाति॥
ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आऽ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि।

विद्यापति कवि एह रस गाब। उकुतिहि भाव जनाब।
विद्यापति कवि ई रस गबैत छथि। उकतीसँ भाव जना रहलीह अछि।

विद्यापति कविक प्रवेश होइत छन्हि। कोतवालक लग शुभ्र-धोतीधारी आऽ एकटा गरीबक आगमन होइत अछि। कोतवाल आभाससँ धोतीधारीक पक्षमे निर्णय सुनबैत छथि आऽ मंचक दोसर कोनपर बैसलि जुवती माथ पिटैत छथि। गीतक अन्तिम चारि पाँती विद्यापति कवि गबैत छथि।

दृश्य २
जुवती एकटा दोकान खोलने छथि, सांकेतिक। मंचक दोसर छोरसँ सासु आऽ ननदिकेँ जएबाक आऽ क्रेता पथिकक अयबाक संग युवती गेनाई शुरू करैत छथि आऽ सभ पाँतिक बाद विद्यापति मंचपर अबैत छथि अर्थ कहैत छथि आऽ अंधकारमे विलीन भऽ जाइत छथि। मुदा अन्तिम पाँती विद्यापति गबैत छथि आऽ जुवती ओकर अर्थ बँचैत छथि।
मालवरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि, ठामे ठामे बस गाम।
एहि गाछक छाह बड्ड शीतल अछि। ठामे-ठाम गाम बसल अछि।
हम एकसरि, पिआ देसाँतर, नहि दुरजन नाम।
हम असगरि छी, प्रिय परदेसमे छथि, कतहु दुर्जनक नाम नहि अछि।

पथिक हे, एथा लेह बिसराम। हे पथिक! एतय विश्राम करू।
जत बेसाहब किछु न महघ, सबे मिल एहि ठाम।
जे किछु कीनब, किछुओ महग नहि। सभ किछु एतय भेटत।
सासु नहि घर, पर परिजन ननन्द सहजे भोरि।
घरमे सासु नहि छथि, परिजन दूरमे छथि आऽ ननदि स्वभावसँ सरल छथि।
एतहु पथिक विमुख जाएब तबे अनाइति मोरि।
एतेक रहितो जे अहाँ विमुख भय जायब तँ आब हमर सक्क नहि अछि।
भन विद्यापति सुन तञे जुवती जे पुर परक आस।
विद्यापति कहैत छथि- हे युवती! सुनू जे अहाँ दोसराक आस पूरा करैत छी।

दृश्य ३
एहि गीतमे विद्यापति नहि छथि। जुवतीक ननदि पथिककेँ दबाड़ि रहल छथि, से देखि जुवतीकेँ अपन पिआ देशाँतर मोन परि जाइत छन्हि। ओ ननदि आऽ सखीकेँ सम्बोधित कय गीत गबैत छथि। गीतक अर्थ सखी कहैत छथि, सभ पाँतीक बाद।
धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-

परतह परदेस, परहिक आस। विमुख न करिअ, अबस दिस बास।
परदेसमे नित्य दोसराक आस रहैत अछि। से ककरो विमुख नहि करबाक चाही। अवश्य वास देबाक चाही।

एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा।
हे सखी! प्रियतमक लेल एतबी कथा बुझू।
भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि। पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि।
हे ननदि! मोनमे नीक-अधलाहक अनुमान कऽ पथिककेँ टूटल गप नहि बाजू।

चरन-पखारन, आसन-दान। मधुरहु वचने करिअ समधान।
चरण पखारू, आसन दियौक आऽ मधुर वचन कहि सान्त्वना दियन्हि।

ए सखि अनुचित एते दुर जाए। आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ।
हे सखी पथिक एतयसँ दूर जायत से अनुचित से ओकर आर बड़ाई करू।

दृश्य ४
जुवती आ ननदि नगर आबि ठौर धेने छथि। एकटा पथिक आबि आश्रय मँगैत छथि तँ जुवती गबैत छथि आऽ ननदि सभ पाँतीक बाद अर्थ कहैत छथि। बीचमे चारि पाँती बिना अर्थक नेपथ्यसँ अबैत अछि। फेर जुवती आगाँ गबैत छथि आ ननदि अर्थ बजैत छथि। अन्तमे अन्तिम दू पाँती विद्यापति आबि गबैत छथि। दृश्यक अन्तमे ननदि कहैत छथि जे हम जे ओहि दिन पथिककेँ दबाड़ि रहल छलहुँ से अहाँकेँ नीक नहि लागल रहए, मुदा आइ पथिककेँ आश्रय किएक नहि देलियैक।
कोलाररागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
हम एकसरि, पिअतम नहि गाम। तेँ मोहि तरतम देइते ठाम।
हम एकसरि छी आऽ प्रियतम गाममे नहि छथि। ताहि द्वारे राति बिताबए लेल कहाबामे हमरा तारतम्य भऽ रहल अछि।
अनतहु कतहु देअइतहुँ बास। दोसर न देखिअ पड़ओसिओ पास।
यदि क्यो लगमे रहितथि तँ दोसर ठाम कतहु बास देखा दैतहुँ।

छमह हे पथिक, करिअ हमे काह। बास नगर भमि अनतह चाह।
हे पथिक क्षमा करू आऽ जाऊ आऽ नगरमे कतहु बास ताकू।

आँतर पाँतर, साँझक बेरि। परदेस बसिअ अनाइति हेरि।
बीचमे प्रान्तर अछि सन्ध्याक समय अछि आऽ परदेसमे भविष्यकेँ सोचैत काज करबाक चाही।


मोरा मन हे खनहि खन भाँग। जौवन गोपब कत मनसिज जाग।
चल चल पथिक करिअ प... काह। वास नगर भमि अनतहु चाह।
सात पच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसान्तर आन्तर भेल।
बारह वर्ष अवधि कए गेल। चारि वर्ष तन्हि गेला भेल।

घोर पयोधर जामिनि भेद। जे करतब ता करह परिछेद।
भयाओन मेघ अछि, रतुका गप छी सोचि कए निर्णय करू।

भनइ विद्यापति नागरि-रीति। व्याज-वचने उपजाब पिरीति।
विद्यापति कहैत छथि, ई नगरक रीति अछि जे कटु वचनसँ प्रीति अनैत अछि।

दृश्य ५
अहू दृश्यमे विद्यापति नहि छथि। एकटा पथिक अबैत छथि मुदा सासु-ननदि ककरो नहि देखि बास करबासँ संकोचवश मना कय आगाँ बढ़ि जाइत छथि। जुवती गबैत छथि।
घनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर।
कामदेव रूपी चोरक लेल हमर अवस्था ठीक अछि। बुढ़िया चेरी पहरा दऽ रहल छथि।

बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल।
बारहम बरखक रही तखन ओऽ गेलाह आऽ आब चारि बर्ख तकर भऽ गेल।

बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज।
सास आऽ ननदि क्यो संग नहि छथि आऽ पथिक सेहो डेरा देबासँ लजाइत छथि।

सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल।
ओऽ कामदेव लेल घर सजा कय देशान्तर चलि गेलाह आऽ हमरा सभक बीचमे अन्तर आबि गेल।

पड़ेओस वास जोएनसत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल।
पड़ोसक बास जेना सय योजनक भऽ गेल सभ सर-सम्बन्धी जतय ततय चलि गेलाह।

नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि।
लोकक समूह अन्हारमे विलीन भऽ गेल, पड़ोसिन फाटकि बन्न कय लेलन्हि।

मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग।
हमर मोन क्षण-क्षण भागि रहल अछि। कामदेव जागि रहल छथि गमनकेँ कतेक काल धरि नुकाएब।

दृश्य ६
एहि दृश्यमे सेहो नहि तँ ननदि छथि नहिये सासु आऽ नहिये विद्यापति। एकटा अतिथि अबैत छथि आकि तखने मेघ लाधि दैत अछि आऽ जुवती गबैत छथि।
धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
अपना मन्दिर बैसलि अछलिहुँ, घर नहि दोसर केवा।
अपन घरमे बैसल छलहुँ, घरमे क्यो दोसर नहि छल,
तहिखने पहिआ पाहोन आएल बरिसए लागल देवा।
तखने पथिक अतिथि अएलाह आऽ बरखा लाधि देलक।

के जान कि बोलति पिसुन पड़ौसिनि वचनक भेल अवकासे।
की बजतीह ईर्ष्यालु पड़ोसिन से नहि जानि, बजबाक अवसर जे भेटि गेलन्हि।
घोर अन्धार, निरन्तर धारा दिवसहि रजनी भाने।
दिनहिमे रात्रि जेकाँ होमय लागल।
कञोने कहब हमे, के पतिआएत, जगत विदित पँचबाने।
हम ककरा कहब आऽ के पतियायत। कारण कामदेव ख्याति तँ जगत भरिमे अछि।

दृश्य ७
मंचक एक दिससँ सासुक मृत्युक बाद हुनकर लहाश निकलैत छन्हि आ मंचपर अन्हार होइत अछि। फेर इजोत भेलापर ननदिक वर हुनका सासुर लय जाइत छन्हि। पथिक रस्तापर छथि दर्शकगणक मध्य आऽ दर्शकगणकेँ इशारा करैत जुवती गीत गबैत छथि आऽ विद्यापति सभ पाँतिक बाद अर्थ कहैत छथि। अन्तिम दू पाँति विद्यापति गीत आ अर्थ दुनू बजैत छथि- विद्यापति अन्तिम दू पाँति आ ओकर अर्थ कैक बेर दोहराबैत छथि।
नगेन्द्रनाथ गुप्त सम्पादित पदावली-
सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली।
सासु चलि बसलीह, ननदि सेहो सासुर गेलीह
तैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई।
क्यो नहि सम्भाषणक लेल पर्यन्त,
एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे।
एतुका एहन बेबहार, ककरो क्यो पुछारी नहि करैत अछि।
मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा।
हमर पिअतमकेँ कहब, हम असगरे कतेक दिन रहब।
पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता।
पथिक हुनका कहबन्हि, हमरा सन रमणिक रसक तेज कखन धरि रहत।
भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे।
विद्यापति गबैत छथि, विरहनि घूमि-घूमि कय पथिककेँ कहि रहल छथि।

विद्यापति गबैत-गबैत कनेक खसैत छथि- अन्हार पसरय लगैत अछि तँ एक गोटे जुवती दिस अन्हारसँ अबैत अस्पष्ट देखना जाइत छथि। की वैह छथि पिआ देसान्तर!! हँ, आकि नहि!!!

पिआ देसान्तरक घोल होइत अछि आ मंचपर संगीतक मध्य पटाक्षेप होइत अछि।

पिआ देसान्तरक ई कन्सेप्ट सुधीगणक समक्ष अछि आ बिदेसियाक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि।

5 comments:

  1. vidyaapati par nibandha bad nik lagal

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  2. kono blog par vidya pati par likhal ee nootan lekh achhi

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  3. vidyapatik bidesia par ee shodhparak lekh axchhi

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  4. बहुत नीक प्रस्तुति।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...