Saturday, January 03, 2009

मजाक - कथा - जितमोहन झा (जितू)

हमरा गाम मे एगो पंडीजी काका छलाह, ओ एतेक मजाकिया छला जुनि पुछू .... मजाक करै मे दूर - दूर तक हुनक चर्चा होइ छन्हि ! सच पुछू तँ मजाक करै मे ओ किनको नञि छोड़ैत छथिन्ह !

एक दिनक बात छल हुनक अर्धांग्नी (पंडीतैन) हुनका कहलखिन अहाँ सभसँ मजाक करै छी ... एतऽ धरि जे मजाकक मामला मे दूर - दूर तक अहँक चर्चा होइत अछि ! मुदा अहाँ हमरासँ कहियो मजाक नञि केलहुँ ......

पंडीजी काका बजलाह ... देखू सुनेना के माय, ई बात सत्य अछि जे हम सभसँ मजाक करै छी ! एकर मतलब ई थोड़े ने की हम अहूँसँ मजाक करी ?

ताहि पर पंडीतैन कहलखिन- से नञि हएत, एक दिन अहाँ हमरासँ मजाक कs ई देखाबू ताकि हमहूँ तँ देखी जे अहाँ कोना मजाक करैत छी ?

पंडीजी काका हारि क्s बजलाह- ठीक अछि। जहिया मौका भेटत हम अहूँसँ मजाक करब ......

किछु दिनक बाद पंडीजी काका अपन सासूर पहुँचलाह , सासुर मे हुनकर खूब मोन आदर भेलन्हि, भोजन - भातक बाद ओ जाय लेल निकलश ताबे मे हुनकर छोटका सार सुनील बाबु हुनका आग्रह कs कए कनि देर बैसे लेल कहलखिन !

सुनील बाबु ... झाजी बहुत दिनक बाद आयल छलहुँ, किछु गाम - घरक समाचार सुनाबू !

पंडीजी काका मूह बनबैत बजलाह की कही सुनील बाबु किछ दिनसँ हम बहुत परेसान छी ....

सुनील बाबु ... झाजी की बात अछि अहाँ बहुत दुखी लागैत छलहुँ, कनि खोइल के कहू अहाँ केँ कोन परेसानी अछि ? हम अपनेक कुनू काज आबी तेँ ख़ुशी हएत !

सुनील बाबु बात ई अछि जे घरमे आधा राति केँ एक प्रेत सुन्दर युवतिक रूप मे अर्धनग्न अवस्था मे दलान पर आबैत छलीह आ जतेह अनार, लताम, नेबो सभ गाछ में रहैत अछि सभ टा तोड़ि कs चलि जाइत छलीह ! हम रोज ओकरा देखैत छलहुँ मुदा हिम्मत नञि होइत अछि जे ओकरा रोकी ! आब अहीं कहू जे हमरा ई अनार, लताम आ नेबोक गाछ लगेनेसँ कोन फायदा ? परेसान भs कs आब सोचने छी जे सभ टा गाछ केँ काटि देब .... जखन फल खेबे नञि करब तँ गाछ राखिये कs कोन फायदा ?

सुनील बाबु हँसैत - हँसैत बजलाह ... बस एतबे टा बात सँ अहाँ परेसान छी ? अहाँ चिंता जुनि करू । काल्हि हम आबय छी, काल्हि राति हम ओ प्रेत केँ देखब .. आब अहाँ जाऊ, हम काल्हि आबए छी !

पंडीजी काका ठीक अछि, कनि सांझे केँ आयब हम अहाँक बहिन केँ कहि देबनि भोजन - भात तैयार रखतीह।

ई कहि केँ पंडीजी काका बिदा भेलाह ......

घर पहुँचते चौकी पर चारि-चित पड़ि रहलाह ।

पंडीतैन हुनका चौकी पर चारि-चित परल देख कए दौगल अएलीह .... नाथ की भेल अहाँ केँ ? अहाँ किछु परेसान लगै छी !

पंडीतैन केँ परेसान देखि कऽ पंडीजी काका उदास मने बजलाह ... हाँ पंडीतैन, बाते किछु एहेन अछि जै सँ हम परेसान छी !

पंडीतैन .... देखू हमरासँ किछ छुपबई के प्रयास नञि करू अहाँक ई हालत हमरासँ देखल नञि जएत, जल्दी कहू की बात छल ..?

-की कही पंडीतैन आय हम अहाँक नैहर गेल छलहुँ, अबैत घरी रस्ता मे एगो ज्योतिष महाराज जबरदस्ती हमर हाथ देखलन्हि .......

-की भेल सेतँ कहू ?

-भेल ई जे हुनकर कहब छनि, हम आब खाली ५ दिनक मेहमान छी .......

पंडीतैन जोर - जोर सँ छाती पिटैत कानए लगलीह- हे कालि मैया हम ई की सुनय छी ....... नाथ अहाँ चिंता नञि करू हम कुनू निक ज्योतिष सँ अहाँ केँ देखाएब । यदि कुनू कलमुहीक छाया अहाँ पर अछि तs ज्योतिष महाराज कुनू ने कुनू उपाय ओकर निकालताह.....

पंडीजी काका ... भाग्यवान उपाय तँ इहो ज्योतिष महाराज बतेल्न्हि......

पंडीतैन.. की उपाय बतेलक से कहू ?

-किछ नञि, हुनक कहब छन्हि जे आमावस्याक रातिमे यदि कुनू सुहागिन नारी अर्धनग्न अवस्था मे आधा राति केँ यदि कुनू नेबोक गाछसँ नेबो तोड़ि केँ आनथि आ यदि सूर्योदय सँ पहिने हमरा ओकर सरबत पीएय लेल देल जाय तs ई बिघ्न दूर कएल जाऽ सकैत अछि !

पंडीतैन..... नाथ तखन अहाँ चिंता किए करै छी, काल्हि अमावस्या छी आ अपने दलान पर नेबोक गाछ अछि, काल्हि हम अपने ई काज करब अहाँ चिंता नञि करू ! राति भ्s गेल, चलू सुइत रही, काल्हि सभ ठीक भऽ जएत ......

दुनु प्राणी सुतए लेल चली गेलाह मुदा पंडीतैन केँ भरि राति निंद नञि भेलनि ..... ओ भोरक इंतजार करए लगलीह ! भोर भेल आब ओ रातिक इंतजार करए लागलीह .... ताबे धरि सांझ के सुनील बाबु पहुँचलाह ....

पंडीतैन ... भैया आय अहाँकेँ बहिन कोना मोन पड़ल ... कहीं रस्ता तs नञि बिसरि गेलहुँ ?

सुनील बाबु ... बहिन आय दफ्तरक छूटी छलए तँ सोचलहुँ जे अपन गुडियांक हाल - समाचार लs आबी !

बाद मे बहुत देर तक हाल समाचारक बाद सभ भोजन केलक । भोजनक बाद सुनील बाबु सुतए लेल दलान पर चलि गेलाह !एम्हर पंडीजी - पंडीतैन सेहो सुतए लेल चलि गेलाह .... किनको निंद नञि आबैत छन्हि .... पंडीजी काका अपन मजाकक बारे मे सोचैत छलाह तँ पंडीतैन अपन जीवन साथीक जीवनक लेल .... सभसँ हटि कs सुनील बाबु बहुत खुश छथि ! कियेकी हुनकर सोचब छन्हि जे ई अनार, लताम, नेबो तोरब कुनू प्रेतक काज नञि ई कुनू परोसिनक काज थीक ! आय ओ मने मन सोचलथि जे कियो भी होए हम ओकरा नञि छोड़ब, किये की ओ हमर झाजीक जिनाय हराम कए देने अछि ! ओ एखने सँ नेबोक जड़िमे जाऽ कए बैसि गेलाह ! देखते - देखते राति सभ केँs अपन कोरमे लs लेलक ....

पंडीतैन धरफड़ाएले उठलीह, अपन कपड़ा उतारलन्हि, माथ झुका कालि मैया केँ प्रणाम कs कए विनती केलन्हि जे हे मैया हमर पतिक रक्षा करिहैथ....

आ ओ चलि देल्न्हि नेबो तोड़ए लेल .....

पंडीतैन जहिना नेबो गाछ तर पहुँचलीह सुनील बाबु भरि-पाँज हुनका पकड़ि लेलखिन आ मूह दबेने दलान दिस चलि देलन्हि .... ताबे धरी पंडीजी काका हाथ मे लालटेन लेने दौगल अएलाह ....

-सुनील बाबु ssssss, सुनील बाबु रुकू ssssss रुकू, ई कियो आर नञि अहींक बहिन छलीह ......

ई सुनिते सुनील बाबु भोर होए के इन्तजारो नञि केलन्हि, भागलाह अपन गामक दिस .....

एम्हर पंडीतैन पंडीजी काकासँ लिपटि केँ कलपि-कलपि कऽ कानए लगलीह ..... नाथ अहाँ हमरा संग एहेन मजाक किये केलहुँ ......?

7 comments:

  1. अति सुन्दर, पंडीजी तँ गोनू झाक जोड़ीदार निकललाह।

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  2. etek nik rachna par badhai, ee blog 2009 me ehina sabh kshetrak soochna dait rahay se aasha.

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  3. shabd chayan, bhashayi pakar, bhashak ksamta aa samarthya adbhut

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  4. ee katha vyangya srenik ekta nik prayatn

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  5. घर पहुँचते चौकी पर चारि-चित पड़ि रहलाह ।

    पंडीतैन हुनका चौकी पर चारि-चित परल देख कए दौगल अएलीह .... नाथ की भेल अहाँ केँ ? अहाँ किछु परेसान लगै छी !

    पंडीतैन केँ परेसान देखि कऽ पंडीजी काका उदास मने बजलाह ... हाँ पंडीतैन, बाते किछु एहेन अछि जै सँ हम परेसान छी !

    पंडीतैन .... देखू हमरासँ किछ छुपबई के प्रयास नञि करू अहाँक ई हालत हमरासँ देखल नञि जएत, जल्दी कहू की बात छल ..?

    atyttam

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  6. कथा बहुत निक लागल अहिना लीखैत रहू ...

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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