Sunday, December 14, 2008

किछु गद्य कविता-आशीष अनचिन्हार

१) सीमा

अर्थ मास्टरमाइन्ड भए सकैत छैक । मास्टरपीस भए सकैत छैक । मास्टर नहि ।

२ ) काटब

पेट भरबाक लेल घेंट कटैत छी आ घेंट ऊँच रखबाक लेल पेट

३ ) दोसराति

जखन भए जाइत छी हम अपने अशक्त ।
तखने जरूरति परैत अछि दोसरातिक ।

४ )

प्रगति १.

शंख । महाशंख । डपोरशंख । हराशंख ।

प्रगति २.

कनिया देशी । पिया परदेशी । बच्चा विदेशी ।

५) मूलमंत्र

अपन कनियांक हाथ पकड़ू आ दोसरक कनियांक करेज । चिन्हारक गरिदन पकरू आ अनचिन्हारक पैर । कहियो कोनो काजमे असफलता नहि भेटत ।

६ ) मोश्किल काज

कोनो कनैत जीव के चुप्प करब ओतबे मोश्किल काज छैक , जतेक की अपन आँखिक नोर के रोकब ।

७ ) सुआद

सोहारी आ गप्प दूनू नून मरचाई लगेला सं सुअदगर भए जाइत छैक ।

'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

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