Sunday, November 23, 2008

हर आ’ बरद

मोन गेल भोथियायल,
जोति बरद सोचिमे पड़लहुँ,
एतय-ओतय केर बात,
हर जोतने भेल साँझ,
हरायल बरद ताकी चारू कात।
कहबय ककरा ई गप्प,
सुनि हँसत हमरा पर आइ,
मोने अछि भोथियायल,
अप्पन सप्पत कहय छी भाय।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...