Saturday, November 15, 2008

अंधेर नगरी चौपट राजा - मदन कुमार ठाकुर

एक समयक बात अछि, एक दिन गुरु आर चेला चिंता मणि दुनु गोटे तीर्थयात्रा पर निकललाह बहुत दूर जखन गेला रास्ता मे दुनु आदमी केँ भूख लागि गेल छलनि तs दुनु गोटा एगो मिठाई के दोकान पर गेलाह दोकानदार सँ कहलखिन जे हमरा दुनु आदमी के भोजन करबाक अछि अहाँ कतेक पाई लेब !

दोकानदार कहलकनि हम अहाँ दुनु आदमी सँ ५० - ५० पाई के हिसाब सँs भोजनक रेट लेब ! दुनु आदमी सोचलथि ई नगरी मेs बहुत महगाय छैक आगू जा के कुनू दोसर दोकान पर भोजन करब ! हुनका सभ केँ भूख बहुत जोर लागल छलनि ओ सभ दोसर दोकान पर पहुचला दोकानदार सँs पुछलखिन तँs दोकानदार कहलकनि जे हम अहाँ दुनु आदमीक २५ - २५ पाई केँ हिसाब सँs भोजन करायब !

गुरूजी आ चिंतामणिजी सोचलथि जे ई नगरी मे सबसँ सस्ता छैक अहि सँ सस्ता दोसर नगरी मे नञि भेटत हम भोजन एतहि करब ! अहिठामक भोजन सेहो बहुत स्वादिष्ट होइत अछि ! चिंतामणिजी गुरूजी सँs कहलखिन गुरूजी हम अहि नगरी मे रहब कियेकी अहिठाम सब किछ बहुत सस्ता भेटैत छैक आर भोजन सेहो बहुत स्वादिष्ट होइत अछि ! गुरुजी कहलखिन अहाँ अहिठाम नञि रहू कियेकी अहि नगरी मे भारी संकट आबय बला अछि ! अहाँ केँs अपन जानक बलिदान देबय पड़त ! चिंतामणि गुरुक बात नञि मान्अलथि ओ अपन गुरुजीक संग छोड़ि देलखिन ! चिंतामणि केँs अहिनगरी मे बहुत सुख आर आनंद आबय छलनि ! तहि सँs खा's पीs क' बहुत मोटाक' सिल भ's गेलथि !

समय बितलगेल भादव के महिना सेहो आबिगेल छल, कोसी नदी मेs बाढ़ि सेहो आबी गेल तहि सँs कतेक गाम सेहो दहा गेल छल, ओही नगरीमे सेहो पानि आबिगेल छल ! मंगला अपन जान बचबैक खातिर अपन घर - आँगन छोड़ि के भागिगेल आ बच्चा सभ के सेहो छोड़िक' चलि गेल छल ! ओकर घर - द्वार सभ खसि पड़ल ताहि सँ ओकर बेटाक मृत्यु भ's गेल छलय ! ई बात पूरा गाम मे सोर भ' गेलय जे मंगला अपन जान बचबै के खातिर अपन बेटाक बलिदान द् देलक ई बात ओही नगरी के राजा क's खबर भेलनि त's राजा अपन सेनापति सँs कहलखिन जे मंगला कs खोजि क's ला' हम ओकरा फाँसीक सजा देब ओ बहुत जुर्म केलक हन ! मंगलाक खोजि केs राजदरवार मेs पेस करल गेल ओकरा सँs राजा कहलखिन रोऊ मंगला तू ई गलती किये करले ? !

मंगला बजलथि .... हजूर हम त कुनू गलती नञि केलहुँ, हम त बच्चा केs छोड़िये टा क' भगलहुँ ई गलती तs राजमिस्त्री केलक जे हमर घर के छत ठीक सँs नञि बनेलक !


राजाक हुकुम भेलनि जे जल्दी सँs जल्दी राजमिस्त्री केँ दरवार मेs पेस कर'लए जे ओ बड गलती केलक जे कच्चा मकान बनेलक ........

दोसर दिन राज मिस्त्री राजदरवार मेs हाजिर भेलाह ओ राजा सँs कहलखिन हजूर गलती हम नञि केलहुँ, हम तँs छते टा बनेलहुँ, गिलेबा ख़राब त's हमर हेल्फर चुनचुनमा केलक आब अहीं कहू हमर कतय गलती अछि !

राजा फेर सेनापति केँs आदेश देलखिन जे चुनचुनमा केँs जल्दी बजा'क' लाऊ .......

तेसर दिन चुनचुनमा राजदरवार मेs हाजिर भेल... राजा हुनका सँ पुछलखिन जे रोऊ चुनचुनमा तू एहेंन गलती कियेक केलाह ...?

चुनचुनमा बाजल हजूर सभटा गलती हमही नञि केलहुँ गलती तँs ओही मईटो मेs छल जे ओ मईट बलुवाहा छल तैयो हम मज़बूरी मेs गिलेबा बनेलहुँ कियेकी हमरा पाई के बहुत जरुरत छल ! इहे हमरा सँs गलती भेल ! आब हजूर हमरा अहां जे सजा दी सभ हमरा मंजूर अछि !

राजा चुनचुनमा केs फाँसी के सजा सुनेल्खिन...........

राजा चंडाल केँs चुन्चुनमा के लेल फाँसीक फंदा तैयार करे के आदेश देलखिन चंडाल फाँसीक फंदा अपन हिसाब सँs तैयार केलक, चारिम दिन चुन्चुनमा केँ फाँसी के फंदा पर चढ़ाओल गेल ! फाँसीक फंदा लम्बा - चौरा छल .... चुन्चुनमा बहुत दुबर पातर ताहिसँs ससरिके फाँसीक फंदा सँs निचा उतरि गेल आ बगल मे जा's कएs ठाढ़ भ'sगेल....

सब कियो टकटक देखते रहि गेल ............

चंडाल चुन्चुनमा केँs दुबारा फाँसीक फंदा पर चढ्बए लागल...मुदा राजा ओकरा मना क' देलखिन ! राजा क हुकुम भेलनि जे चुनचुनमा केँs दुबारा सजा नञि हेतनि कियेकी राजदरवारक नियम होइत अछि जे एक आदमी केँs सजा एके बेर होइत छैक.... ताहि दुवारे अहि फंदा पर ओकरा सजा भेटतनि जकर गरदनि अहि फंदा मेs ठीक सँs बैसतैक..... सेनापति केँs राजा आदेश देलखिन जे अहाँ फंदा क हिसाब सँs कुनू आदमी पकड़ि क' लाऊ हम ओकरा फाँसीक सजा देबयs .......

सेनापति पूरा राज मेs घुमलाह हुनका चिंतामणिक गरदनि फंदाक हिसाबे सही बुझेलनि ! राजा केँ जे आदेश रहनि से ओ चिंतामणि सँs सुनेलखिन ! राजाक आदेश सुनि कएs चिंतामणि बहुत चिंतित भेलाह, ओ सोचए लगलाह की आब हम की करी चारू दिस हुनका किछ नञि सुझैत छनि ! तखने हुनका गुरूजीक बात याद परलनि ओ सोचलथि जे आब हमरा अपन जानक बलिदान सँs गुरुवेजी टा बचेताह दोसर कियो नञि !


चिंतामणि गुरुजीक ध्यान करए लगलाह.......

बनदे बोदमयंनितयंग गुरुर शंकर रूपनं !

यमासर्तोही बक्रोपि चन्द्रः सरबस्तर बन्देयेत !!
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर: !
गुरुर साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम: !!
अखंडमंडलाकारंग व्याप्त येनग चराचरम !
तत्पदं दर्शितंग तस्मै श्री गुरुवे नम: !!
अज्ञान तिमरामिराधस्य ज्ञानानां शलाकय: !
चक्षुरपितयेंग तस्मै श्री गुरुवे नम: !! इत्यादि .........


चिंतामणिक स्मरण केला सँs गुरूजी केँ अचानक याद अलयनि जे हमर चेला चिंतामणि काफी संकट मेs फसल छथि ! हुनका अहि संकट सँs उबारनाय हमर धर्म अछि ! गुरूजी फेर ओही नगरी मे वापस आबि गेलाह आ चिंतामणि सँs हुनकर वार्तालाप सेहो भेलनि ! गुरूजी सब बात सँ अवगत भेला के बाद चिंतामणि केँs बोल भरोस देलखिन जे अहाँ चिंता जूनि करू हम आबि गेल छी !

चारिम दिन चिंतामणि राज दरवार मेs हाजिर भेलाह ! राजा हुनका फाँसी के सजा सुनेलकनि .....

तखने गुरूजी राजा सँs अर्जी केलनि हे राजन चिंतामणि एखन नवयुवक छथि हम बृध सेहो भ's गेल छी ताहि दुवारे अहाँ हमरा फाँसी के सजा दिअ जे हम अहि फाँसी पर चढ़ि क's स्वर्गलोक चलि जायब जाहिसे हमर तीनो लोक मेs जय - जय कार होमए लागत !

ई बात सुनि कए राज दरवार मेs जतेक लोक सभ बैसल छल सब कियो बेरा - बेरी राजा सँs अर्जी आर विनती केलथि जे हे राजन अहि फाँसी पर चढ़ि क' हम स्वर्गलोक जायब जाहिसँ हमर जय - जय कार तिनोलोक मेs होयत !

ई बात सुनि क' राजा अपना मोन मेs विचार केलथि जे कियेक नञि हमही अहि फाँसी पर चढ़ि क' स्वर्गलोक चलि जाइ जे हमर जय - जय कार तीनो लोक मेs होयत ! राजा झटसं अपन गद्दी सँ उतरि क's फाँसी क फंदा मे जा's क's लटकि गेलाह आ चंडाल केँs आदेश देलखिन जे फाँसी केँ उठा दे .....

राजा यमलोक चलि गेलाह .....

अहि दुवारे कहल गेल अछि अंधेर नगरी चौपट राजा ......


जय मैथिली, जय मिथिला


मदन कुमार ठाकुर, कोठिया पट्टीटोल, झंझारपुर (मधुबनी) बिहार - ८४७४०४,
मोबाईल +919312460150 , ईमेल -
madanjagdamba@rediffmail.com

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...