Monday, November 10, 2008

उदाश मोन - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

उदाश मोन

अपन प्रेमीकाकेँ कहलापर उमेश विना विवाह भेनेमे ओ वावुजी सँ भिन– भिनाउजक वात करऽ लगलनि । सन्तान जाहिसँ खुस रहे वोहीमे अपन खुसी बुझिकऽ बाबुजी सबकिछ मे सँ हिसा लगाकऽ उमेशके अपना नामपर कऽ दैछथि । सम्पती उमेशकेँ नामपर देखिकऽ उमेशकऽ प्रेमिका आशाकेँ ओ सम्पती पर लोभ भऽ जाइछैन । उमेश सऽ करिब १० वर्ष जेठ विधवा प्रेमिका उमेश सँ सम्बन्ध तखन वनबैय जखन ओ कक्षा नौ मे बढैत रहैक । एकदिन उमेशकऽ माँ विमार भऽगेली आ हुनका जचाबऽ लेल जखन उमेशकेँ बाबुजी पटना लजाइत रहैथ त अपन परोशी विधवा आशाकेँ कैहगेली जे उमेशके भोजन वनादेबऽ लेल जाही सँ उमेशके कोनो प्रकारक दिकत नहि होइन । आशा उमेशकेँ लेल बडशासन भोजन बनाक खुएलनि आ ओही अंगनामे सतएली । आ कनेक वेर बाध आशा से हो ओही पलंगपर आविकऽ सुतिरहली । रातिमे उमेशके ओ भैर पाजकऽ पकरली । उमेशकेँ निन त टुटिगेलैक मुदा ओ अन्ठिआदेलन । दोसर दिन ई वात उमेशक दिमागपर नचैत रैह गेलैक । जे ई रातिमे डेरागेलनि कि केना ? कथिला ओ हमरा ओना पकरलनि ?" आ ई वात सोचैत उमेशके रातिमे निन सेहो नइ परैक । कर बदलवेरमे उमेशक हात आशाकऽ स्तन पर परिगेलैक । एतवेमे ओ उमेश दिश धुमिगेली । आ उमेशकेँ पैरपर अपन एकटा पैर धऽदेली फेरु ओ उमेशकेँ सहलाबऽ लगली आ............। फेर, ताही दिनसँ उमेशके आशाकेँ संग एकटा देहकेलेल गलत सम्बन्ध स्थापना भऽगेलैक । उमेशकें आशा सँऽप्रेम भऽगेलनि । आ तहिया सँ सबदिन उमेश सब निक बेजाय आशाकेंसुनाबऽ लगलनि आ आशाकेँ कहलपर चलऽ लगलाह । आशाके कहैछलनि वोहे उमेश करैछलाह । आ उमेश अपन लक्ष्य तक आशाके बुझिलेने रहैथ । आ ओ ईहो सोचिलेने रहैथ जे जीब संगैह आ मरब संगैह । जखन उमेशकऽ बाबजुी उमेशकेँ बखडा अदालत आ मालपोतमेँ जाक उमेशकनामपर कऽ देलनि । तखन किछे दिन बाद उमेश अपन नाम बाला सारा सम्पत्ती आशाके नामपर कऽदेलनि । तकदिरक लिखल आशा उमेशसँऽ बिना पुछने नैहर चैलगेली ताँही सँऽ दुनु गोटाके एकआपसमे मनमोटाब भऽगेलनि । उमेशक उझट बाली सुनि आशा हुनका सँऽ बाजब सेहो बन्द कऽ देलनि । ओ सोच आ चिन्तामे एहन भ गेला कि चञ्चल स्वभावके उमेशक मोन उदाश भ गेलनि ।उमेशकेँ ई दशा देखकऽ उमेशक बाबुजी आ माँ हुनका पुनः अपनालेलनि । भोरक भुतलायल जौ साँझक घर आबेतऽ ओकरा हेयायल नहि कहि बुझिक उमेशके निकसँ राखऽ लगलनि ।उमेशके उदाश रहब देखिकऽ हुनक माँ आ बाबुजी सब हुनका विवाहकेँ वातचित कर लगलनि । विवाहकऽ नाम सुनिते उमेश आशाकेँ वारेमे अनेक वात सोचाए लगलनि । मुदा, उमेश विवाहक बारेमे कनेक देर सोचलनि आ सोचिक पुनः ई दिमागमे अएलनि जे "विवाह जौ कलिअ त आशा त हमरा धोखा देलनि मुदा हम ओकरा किया धोखा दिए ।" ओ फेर सोचलनि हम जौ अखन विवाह कऽ लेब तऽ कल्हिखन जाकऽ हमर कनियाकऽ कोनो प्रकारक इच्छा जौ पुरा नहि कर सकबै त ओकरा मोनमे कतेक किसिमक वात अएतैक । ओ फेर ई सोचला जे "अपन हिस्सा सम्पती त हम बुरालेललहँु आ बाँकी लेल......नहि बाबुजी कि सोच्ता ?" आ, ई वात सोचिक उमेश सब किछ छोरिकऽ सबहक माया मोह त्यागीक घर सँऽ बहुत दुर जाएकें सोचिकऽ चैलदेलाह । जखन उमेश पटना स्टेशन पर पहुचलनि त आगुमे आशा ठाह–रहैक । उमेशकेँ देखक ओ हुनका आर नजदिक अएली आ कहलनि– "उमेश ! आहाँके मनमे होयत जे आहाँके हम बरबाद कऽदेलहँु मुदा ई बाते नहि छैक । आउ आहाँके हम अशल बात सुनबैतछि ,आ बिना सुनने हम आहाँके एतऽ सँऽजाहू नहि देब ।"ई सुनिक उमेश बजलनि "आब सुनला ...कि बाँकी छैक से ?"आशा उमेशके हाथ पकरिक कातमे लजाइछैक आ कहैछै "अहि के लेल .........आहाँके कने समय देबऽ परत ।"कनिक समय सोचैत उमेश कहलनि"— ठिक छै चलु कातमे ।"एकान्त ठाममे जाक दुनु बैसलनि तब आशा कहलनि "सुनु,.....हमरा एकटा परी सँ श्रापित भऽ ई मृत भुवनमे आबऽ परलअछि.....। हम एक दिन गगन—विहारभऽ स्वर्ग जातिरही । बाटमे सपन नामक ऋषि कमण्डलमे जल लऽकऽ पुजा करला जातिरहैथ । हम ऋषिके खौझाव लेल बाटपर आबिकऽ ठाह् भऽ गेलहु आ ऋषीके आखि पर ताकऽ लगलहुँ । हम ऋषी पर आ ओ हमरा पर बहुते देर तक एक आपसमे तकैत रहिगेलहूँ । ऋषी हमरा नजदिक आबऽ लगलनि आ ओ हमरा नजदिक आविक छुबऽ चाहलनि । मुदा हम ऋषी सऽछलिगेलहँु , आ ओ खसिपरला ।" ई ऋषी आ परीक वात उमेशकेँ सुनल नहि गेलनि आ ओ कहला "चुप,.....झुठफुस आ नौटकी कनेक कम बाजु बुझलहु कि नहि,......रे ई सत्ययुग, द्वापर आ त्रेता नहि न छैक ?" मुदा आशा कऽ आँखि आइ सच वाजिरहलछैक ओ फेर कहली " त आहाँ खाली बात सुनिलिअ.......विश्वास करु या नहि करु आहाँ पर अछि । तखन ऋषी हमरा कमण्डलमे सँ पानि लऽ श्राप देलाह " जो, हम तोरा श्राप दैछिऔक कि तोरा स्वर्गक सुख त्यागीकऽ एकटा नहि वल्की दुँटा पुरुशके साथ सम्भोग कर परतौक । जे एकटा तोहर पती रहतौक आ देसर एकटा तोहर परोशके बच्चा । ऋषी फेर कहलनि " ओ बच्चा जखन श्यान भऽ जतैक त तोरा द्वारा ओकर धन सम्पत्ती सबकिछ खतम भऽ जएतै आ जखन तोरा छोरिक ओ चैलजतौ तखन तोहर मृत्यु भऽ तोहर जीवन तृप्त भऽ जएतौ ।" ऋषीक कुवचन सुनिकऽ हम निराश भऽ गेलहु । बड कनलहु ।" आशा वजली ।ई वात सुनऽके इच्छामे आविकऽ उमेश वजलाह–"तव ...........कि भेल ?"उमेशक प्रश्नकेँ जबाब दैत आशा कहली – " हम मृत भुवन अएलहु । आ नदिकातमे आमक गाछलग बसिकऽ सोचऽ लगलहु जे आब कि करु । नदी कातक गाममे एकटा नँया फूसक घर रहैक । हम अप्पन दिव्य शक्ति सँ ओकरा वारेमे देखलहु । हुनका सबकेँ गाममे के ओ नहि चिन्हैत रंहनि । हम अप्पन मायाबी शक्ति सँ हुनका सबकेँ मन वदलीकऽ आ एकटा बच्चकऽ रुपमे प्रवेश कैलहँु । आ, ओ दुनुगोटा हमरा अप्पन बेटी जका मानऽ लगलनि । गामक स्कुलसँ एस.एल.सी. पास कैैलहु । आ तखन ओ सब हमरा कैम्पस मे पढला शहर पढादेलनि । मनोविज्ञानकेँ ज्ञानी तऽ हम रहबे करी । हम मनोविज्ञान सँऽ स्नातक कैलहु आ कैम्पसेमे हुनका हमरा सँऽ प्रेम भऽगेलीन । हुनक माँ विमार रहवाक कारण सँ ओ दुईए महिना वितलाक वाद हमरा सँ विवाह कऽ लेलनी आ साल वितिते हुनक मृत्यु भऽ गेलनी ई त होबहे के रहैक । श्राप अहि प्रकारक रहैक । बहुत दिन बाद हमरा आहाँ सँ सम्वन्ध बनल । ऋषीकऽ बचन अनुसार आँहा बरबाद भऽ गेलहु ।" एतेक बाजिकऽ ओ चुप भऽ गली । ओ फेर कहली– "हमर समयक अन्त भऽ गेल अछि, मात्र दु दिन वाँकि अछि हमर मृत्युकेँ ।ई वात त ओना किनको पचऽ बाला नहिरहैक । मृत्युकऽ नाम सुनिकऽ उमेश बजलाह ".............दु दिन मात्र वाँकीे कोनाक ?""जँऽ आँहा पतियाए चाहैतछि त.........मात्र दु दिन हमरा संगे रैहजाउ । "आशा कहली । उमेश झुठाकेँ नेङ्गराबकेँ विचारमे ओ "ठिक छै" कहला ।उमेश त पहिलदिन बड निकजका आशाक सगं वितएलाह आ एकबेर फेर आशा ओ राति उमेशपर समर्पित कऽ देलनि । उमेशके वस आशाके देह सँ प्रेम रहैक जेना वझाएल । मुदा दोसर दिन उमेशकेँ आशासँ डर लागऽ लगलनि । मँुहपर डर आ चिन्ता देखिक आशा बुझिगेली जे उमेशकेँ पक्का हमर मृत्यु सँ डर लागिरहल छनि । आ, ई देखिक आशा उमेशकेँ तखने ज्ञात करौलनि जे "काल्हिखन सूर्य जखन उदय भऽ जतएतैक तखने हमर समयकऽ अन्त भऽ जाएत ।" जखन हुनका आशा मृत्युक समयके बारेमे ज्ञात करौलनि तखन जाकऽ हुनका मोनमे संतोष भेलनि ।आ, आई राति आशा आ उमेश दुनुगोटा मे सँ किनको निन नहि परिलनि । राति भरि ओ दुनु बितल समय, आ साथे बितल राति सबकेँ वारेमे बतीयाति रहिगेलाह । जखन भोरकें पाँच बजलैक ओ जल्दीसँ जाकऽ नहाएली आ उमेशकेँ कहली– "दुनियामे आठटा मात्र चिरंजीवी पुरुश छथि । जै मे सँ हनुमानजी से हो छथि । हम हनुमान मन्दिर जाइतछी । आहाँ हमरा गेलाकऽ ठिक आधा घण्टाकऽ बाद मन्दिर तर्फ आएब ।"ई सुनिकऽ उमेश लाशकेँ बारेमे पुछला ।हुनका सम्झबित आशा कहली "ओ अपने जरि जएतै" बड अबेर भेल जाइत रहैक । ओ जल्दी सँ निकली । किछ समय बाद ओ एकवेर फेर आविक कहलनि–"उमेश भगवान अहाकेँ कल्याण करौथ ।"उमेशकेँ हुनक बात पर अखनो विश्वास नहि भेलनि ओ आधा घण्टा सँ पहिनही ओतऽ सँऽ निकललनि । जखन हनुमान मन्दिर लग पहुचलाह तँ लोक सवहक बाहरमे भिर लागल रहैक । एकटा आदमी सँ उमेश पुछला जे कि भेलैय ? ओ आदमी बडा उदाश भऽ कहलनि जे मन्दिरमे सँ दर्शन कऽकऽ निकलिते अपनेमने देहमे आगि लागि गेलन । ई सुनिक उमेश लोक सवहक भिरमे पसिक देखलनि त ओत मात्र छाउर बाँकी रहैक । उमेशक मोनमे एकटा अलग उदाशी पकरिललकनि । आ ओ ओत सऽ उदाश भऽकऽ पुनः घर आपस चलिअएलाह । ओ अखनो कतौ बसिकऽ मौन रहैछथि ।

अशल खिलाडी - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

अशल खिलाडी

एकटा देशमे कोचर नामक जादुगर रहे । कोचरकें जादुबाला चमत्कारी शक्तिकें देखकऽ गामक लोक हुनक प्रशंशक बनिगेल रहै । एकदिन कोचर सपनामे एकटा तलवार देखलनि जाहि तलबारमे एकटा अलौकिक शक्ति रहैछ । तलबार प्राप्त करै वाला व्यक्तिके कोनो प्रकारक इच्छा पूर्ण भऽ सकैत अछि । आब, कोचर ओही तलबारके पत्ता लगाबऽ लेलअपन प्रत्येक शक्ति लगादैछैक । अन्ततः ओ एकटा उपाय निकालैय जे ई तलवार राजा गोपाल सिंहक संग्राहालयमे राखलगेल अछि । ओइ तलवारक सुरक्षाके लेल अनेक प्रकार व्यवस्था कएलगेल अछि । आ, ई तलवार एकहि आदमी लाबि सकैय जेकर नाम सरोज खिलाडी थिक । कोचर खिलाडी लग जाकऽ अपन सब समस्या सुनौलनि । खिलाडी ओ तलबार जेनाक होई लाबऽकें लेल मनमे अठोट कैलनि । खिलाडी जखन सब किछ पार कऽ कऽ तलवार वाला कोठरीमे पहुचला त हुनका आगि, पानि आ पाथरि सवकिछ क सामना कऽरऽ परलनि । खिलाडी सामना करैत ओ तलवार प्राप्त कैलाह । जखन ओतऽ सँऽ ओ बाहर निकललनि त ओ एकटा चक्रव्यूहमे फसिगेलाह । निकलऽ कें लेल जखन ओ अकक्ष भऽ गेला तऽ ओतै माथ पर हाथ धऽ कऽ बसिगेलाह । खिलाडी अपन ईच्छा अनुसार रुप बदलिसकैय । मुदा तैंयो निराश भेलाक कारण सँऽ तलवारके भित्तर सँ एकटा चमत्कारी बालक निकललनि आ पुछलनि—"हे खिलाडी जी ! हम आहाँके कि सेवा कऽ सकैछि ?"एकाएक एहन आवाज सुनिक खिलाडी उपर देखलनि त एकटा शुन्दर बालक नजरि परलनि बालक के देखिकऽ खिलाडी पुछलनि –"अपने के छि ?""हम त आहाँक दाशछि । आज्ञा कएल जाँए ।"बालकके एहन नम्रता भरल आवाज सुनिक खिलाडी कहलनि "हम एतऽ सँऽ निकल चाहैत छि ।" एते मात्र बजिते खिलाडी बाहर निकलि गेलाह आ ओ बालक लोप भऽ गेल । तलवार लकऽ खिलाडी कोचरकें घर नहि गेला । ओ सिधा अपन घर पहुँचलनि । ओतऽ खिलाडीक माँ आ बाबुजी तिन दिन सँऽ भोजन नहि कैने रहैथ । जखन खिलाडी पहुचला त हुनको बड जोर सँऽ मुख लागल रहनि । सव गोटा चिन्तामे परल रहैथ । तखने फेर ओ चमत्कारी बालक आएला आ एकटा चौकी पर खुब निकजका सजाओल पकमानक थारी खिलाडीक सेवामे हाजीर कैलाह । एवं प्रकारके जते वातमे हुनका कोनो प्रकारक दिकत होयन त ओ चमत्कारी बालक आविक पुरा कऽ दै । एक दिन खिलाडीक घरक बाट दने एकटा राजकुमारी जातिरहैछैक । ओ राजकुमारी के देखकऽ खिलाडी मोहित भऽ जाइछ आ मनमे अहि राजकुमारी सँ विवाह करऽ कें वात सोचैय । राजकुमारीके देखला वाद खिलाडीक मोनमे एकटा अलग बेचैनी अबैछ ओ जखन तखन मात्र राजकुमारीके बारेमे सोचऽ लगैय । खिलाडी कें सोच मे परल देखिकऽ तलवारवाला चमत्कारी बालक पुनः उपस्थित होइय आ खिलाडीके लेल खुब शुन्दर गहना जेवर सँऽ भरल घर बनादैछ । खिलाडीक बाबुजी खुब बहुते गहना–जेवर लऽ कऽ राजकुमारीक हाथ मांग करऽ लेल तयारी से हो भऽ जाइछ । विवाह से हो बड निकजका सम्पन्न होइछैक । समय एतेक बितला बादो कोचर पिताएले छैक । आ ओ खिलाडीक पत्ता लगाबलेल अनेक प्रकारक बिधाके प्रयोग कऽरहल छैक । बहुतो बिधाक प्रयोग कएलाक बाद ओ खिलाडीक पत्ता लगाबमे सफल भेला । तखन ओ खिलाडीक घर लग एकटा छिट्ठीमे बहुते तलवार लऽकऽ पहुचल आ हल्ला करऽ लागल "पुरान एकटा तलबारके नयाँ दुटा तलबार । "ई बात खिलाडीक माँक कान तक गेलै ओ घरमेका जाँदू बाला तलबार लऽकऽ नयाँ तलबार लेबऽ पहुचैछथी ।कोचरके हाथमे तलबार पैरते कोचर ओतऽ सब तलबार छोरिकऽ गायबभऽजाइय । घरसँऽ तलबार के जाइते खिलाडी पुनः पहिलके स्थितीमे पहुचजाईय । आहे पुरान घर, भोजन करऽमे दिकत आदी ।खिलाडी अपना इक्षानुसार रुप बदलके क्रममे ओ एक दिन कोचरके कनिया बनिकऽ हुनक घरमे पैसलनि । कनियाके देखते कोचर मदिरा देबऽला कहलनि । खिलाडी मदिरा संगैह किछ आर मिलाक कोचरकें पिया देलनि । कोचर बेहोश भऽगेल आ खिलाडी अपन तलबारके खोजमे लागल । तलबार बहुत खोजला बाद भेटलनि । बादमे खिलाडी एहन ढंग सँ ओ तलबारके रखलनि जैके केओ देख नहि सकैय ।

मुमफली बाली - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

मुमफली बाली

काठमाण्डूकेँ टुंडीखेलमे हम आ दुटा आओर हमर साथी बैसल छलहुँ । ताबते एकटा छौरी आबिकऽ हमरा सबके मुमफली खाएला कहलक । जेना मंगनीए दऽदेतै तहिना ओ हमरा आगुमे दु डिबा ममफली धऽ देलक । हम पाइकेँ लेल पुछली त बिस रुपैया कहलक । ममफली खाएवाक इच्छा त नहि, रहे मुदा साथी सबलग प्रतिष्ठाके देखकऽ जेबसँ पाइ निकालिकऽ दऽ देलहँु । करीब एक–डेढ घण्टाक बाद ममफली खतम भऽ गेल त हमसब ओतऽ सँ उठिकऽ रौदमे वैसऽ चैल गेलहु । फेर, एकटा दोसर छौरी आबिकऽ कागज निकालिकऽ ममफली छोटका डिब्वा सँ एक डिब्वा धऽ देलकै । हमहुँ सब ममफली खाए लगलहँु । ओ छौरी हमरा सवहक नजदिक बैसिकँ गीत गाबऽ लागल "यो मायाको सागर.....।" हमर साथी ओकरा भऽगाब केँ लेल "तो बड सुन्दर गीत गवैछ"े कह लगलैक । ई सुनिकऽ ओ छौरी कहैछै "एह, हम त........ गीते नहि नेपाली, हिन्दी, अंग्रेजी गीतमे डान्सो करैछी ।"फेर ओ अपन कुर्तीके उपरका बट्टम खोलिकऽ कहैय "आई कते गर्मी छै.........।"ई देखकऽ हमर साथी पुछलकै "एक दिनमे कते.......कमालैछही ।"ओ ढिठेसँ जाबाव देलक "मुला जौ फसिगेल त........हजारो भऽ जाइए ।"हम व्यंग करित कहलि " तब त हम अपनो घरवालीके ममफलीके व्यपार कऽ देबै.....।"फेर ओ कहली "आँहा सब तिन आदमी छि ..........मात्र तिन सय रुपैया जँ खर्च करब तऽ आइ राति आँहा सब साथे हम चैल सकैत छि ।"हम फेर व्यंग कैलिए "तोहर वाप कमाकऽ धऽ गेलछौ से......... ।"ओ हसऽ लगली आ फेरु थेथरियाएल जका बसिगेली । हमरा त बुझले नहि छल जे ओकर ई व्यपार होतैक । आ ओकर पहिरन–ओढ्न सँऽ बुझाय परैक जेना ओ कानो सेठकेँ वेटी होतैक । हमर साथी रामबाबु अपन जेबमे हाथ दैत कहैय "हे यो......हमरा लग त दु सय टका अछि.......आँहा लग एक सय अछि त दिअनै पैचे सही.....।"मुदा हम बड डटली ओ ओतऽ सँ उठिक तिनु आदमी भद्रकाली दने जाइत रही । भद्रकाली मन्दिर सँऽ कनिकें आगु आवीक रामबाबु कहलनि "अाँहा सब बढु ...........हम एक आदमी सँ भेटने अवैछी ।" हम आ संजय त बुझिगेलहु कि ई कतऽ गेल होएत ।करिब एक महिना वाद जखन हम ओहि दकऽ जाइत रही त ओही छौरी पर नजरि परल ओकर कपडा फटल रहैक मुदा ठोह् मे लाली बड. मोटसँऽ लगौने रहैक । आ जतेक आदमी ओइ दऽ कऽ जाइक सबके मुह पर तकै । ओही साँझमे हमर साथीरामबाबूकें फोन आयल आ कहलनि "हमर मोन खराब अछि ।"भोरमे हम ओकर डेरालग जाक ओकरा टिचिङ्ग अस्पताल जचाव लऽ गेलहु । डाक्टर बोखारक दवाइ दऽ पठादेलनि आ कहलनि जे एक हप्तावाद भेट करला । ओ, दवाइ खाइ, मुदा ओकर वोखार त ठिके नहि होइक । दिनदिने कमजोर भेल जाइक । फेर ओकरा लऽकऽ हम अस्पताल गेलहुँ । डाक्टर खुन, दिशा, पेशाब जचाबऽ लेल कहलनि । दिशा आ पिसाबक रिर्पोट तऽ तुरते दऽ देलक मुदा खुनक रिर्पोट ४२ दिनक वाद देबऽ कहलनि । ४२ दिन बाध हम रिर्पोट लऽकऽ डाक्टर लग गेलहुँ । वै दिन डाक्टर सब सँ अन्तमे हमरा बजौलनि । मितकेँ पकरिक डाक्टर लग लगेलियन । डाक्टर मित सँऽ पुछलनि "आहाँ बजारक लैरकी सँ..........सम्बन्ध रखैछी ।"किछ नहि बाजिकऽ ओ मुरी निचा कैने रहि गेलैक । आ, ई, सुनिक हम कहलियनि "डाक्टर साहेब,..................."डाक्टर हमरा किछ बाजऽ नहि देलनि आ हमरा कहलनि कृपया बिचमे नई, बाजल करी ।"फेर डाक्टर आवेशमे आविक कहलनि "हिनका छैन एड्स लागीगेल ।"ओ पुनः हमरा पर ताकिक कहलनि "ओना त एड्सकेँ इलाज त नहि छैक मुदा जौ संयम सँ रही त किछ दिन बाचि सकैछी । आँहा सब नयाँ उमेरक लरिका सब एना कर लगबै त कोना हेतैक ।"डाक्टर हाथमे कलम आ, आगामे सँ पुर्जी लैत कहलनि "देखु, आहाकेँ चित बुझावलेल किछ दवाई लिख दैछि ।"डाक्टर पुर्जी हमरा हाथमे देलाह । आ हम सब ओतऽ सँऽ निकलँहु । हमर मितत वड उदाश रहे भऽ गेल । ई देखक हम कहलियनि "चल वल्की गामे पर रहब ।"तखन त ओ हमरा हँ कहलक मुदा जखन हम तैयारी भऽ ओकरा डेरामे पहुचलहु त देखलहँु ओकरा खिरकी केवार चारु तर्फसँऽ लोक भरल । हमर मन धबरागेल । जखन हम नजदिक पहुचलहुँ त देखलहुँ एकटा हवलदार ओकरा गरदनिमे सँ डोरी खोलैतरहै । ओकरा शव बाहनमे धऽ कऽ अस्पताल लऽ गेलैक । आ हम ओकरा गामपर फोन कऽ कऽ ओकर बावुजीकँ खवर कऽ बजालेलियनि ।

विवाहक—प्रतिक्षा - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

विवाहक—प्रतिक्षा

अमरकेँ माँ आ भाई अमरके विवाहक चर्चा करैत रहैत अछि । आ हाथमे फोटो लऽक केओ बजैय –"लैरकी त सिनेमाक हिरोनी सनकें छैक"फेर के ओ बजैय "लाखौ कि..... करोरोमे एक छै ।"ई वातक चर्चा करिते बेरमे अमर घरमे प्रवेश करैत अछि । केवारक आवाज सुनिकऽ अमरकेँ माँ केवारदिश तकैत अछि आ अमरके देखिक पुछैछथि "कि रौ आइ त...... सवेरे कलेज सँ चैलएलही ।"अमर जुत्ता खोलैत कनी स्तीरे सँ जवाब दैत अछि "हँ, आइ कलेजमे दुनु पाटीवाला छौरा सब झगरा झंझट कैलकै ताहीसँ......... कलेज अनिश्चित कालके लेल बन्द भगेलैक ।"ई सुनिक माँ बजैछठि "ई छौरा सब कौलेज पढ.ऽ जाइतछै कि राजनितीकरऽ ...किछ बुझ्वे नहि करैछी ।"अमर फेर कहैय "तो सब कथीके चर्चा करैत छलेह ?"प्रश्न सुनिते अमरके भाई सुवोध बजैय "भैया .......ई फोटो देखीयौ ने ।"अमर भाइकेँ हाथस फोटो लऽकऽ देख लगैछैक ।फेर ओ फोटो उल्टवै छैक । फोटोक पाछामे लिखल पत्ता अमर पढिकऽ ओ फोटो द दै छैक ।दोसर दिन अमर भोजन कऽकऽ तैयार होइछै आ अपनमाँ के कहैछै–"माँ, हम कने मधुबनी जाइतछि ।"माँ ई सुनिक जवाब दैत छथि "परसु तोरा ओमहर सँ देखऽ अबैत छौ आ तो......""नहि माँ हम कल्हिए चैल अवौ ।"माँ कहैत छथि "ठिक छै जो ........मुदा वातमे फरक नहि परबाक चाही ।"अमर अपनसाथी रंजीतके साथमे लऽकऽ फोटोपर लिखल वाला पतापर चैलजाइए । गाँउमे जखन ओ सब पहुचैय तँऽ ओत देखैय कि लोक सब केओ केमहरो, कओकेमहरो भगैत रहैछ । अमर आ रंजीत दनूु ओमहरे जाइए जेमहर आगि लागल रहैत छैक ।ओहीठाँम एकटा विधवा, दुटा महिला आ एकटा स्यान लैरकी खुब कनैत रहैतछैक । ओकरा सबहक मुहसँऽ "बौआ रौ बौआ" निकलैत रहैक छै । ई देखिक रंजीत बुदिया सँऽ पुछैत अछि "कि भेलैय जे वौआ, वौआ कहैछि ।"बुदिया कनैत जवाव दैय "वौआ...... रे हमर पोता ओहिमे.....।"ई सुनिते अमर पहिनही दौरजाइत अछि । आ पाछा सँ रंजीत हल्ला करैय "रुक !!! रुकिजो अमर........ ।"अमर आगि आगल घरमे पैस जाइय । रंजीत पाछु सँ दौरैत अछि मुदा पैसऽ सँऽ पहिनही केवार खसिपरैछैक । करिब तिन–चारि मिनटककेँ वाद अमर वच्चाकेँ लऽकऽ खिरकी दने कुदैत छैक । ई देखक रंजीत कने नमहर श्वाश लैय । जखन पुरा आगि मिझा जातिछै त अमर आ रंजीत अपन घरकेँ लेल चैलदैय मुदा बुदिया वड आग्रह करऽलगैछै "बौआ आई एतै रैहजाउ ।"वुदियाके आग्रह देखकऽ रंजीत अमरकेँ रुकिए जाएला कहैछै । केओ गोटा अमर आ रंजीत सँ परिचय सेहो नहि पुछै छैक । किया त ई सब अमर परिचय वच्चाकेँ जान बचाक दऽदेनेरहैछैक । घर जरिगेलाक वादो वुदिया अमर पाहुनके दलानपर वैसबैय आ वुढि. ओतऽ सँ चलिजाइए ।पोखरिदिश जाएके बहाना बनाकऽ दुनुसाथी घुमऽ केँ लेल निकलैय किया त हुनका सबके एकटा दोसर काज सेहो छैन । ओमहरसँऽ एकटा मर्द हाथमे लोटा लेने अबैत रहै छथि । हुनका बजाकऽ रंज्ीत पुछैय—"भाईजी व्रज मोहनजीक घर केमहर छैक ।"ओ वटोही जवाब दैय "ओ हुनकरे घरमे त आइ .........आगि लागीगेल छलैय ।"अमर विचार करऽ लगैय ओ लैरकी कें बारेमे किया कि ओहे लैरकी सँ बिबाहक बात रहैछै । दुनुसाथी चिन्तामे पैरजाइए । आ चुपचाप अपन दलान पर आबिक बैसजाइए । के ओ किनको सँ वजितो नहि रहैछैक । कनिके देरके वाद ओ लैरकी खाना लकऽ अबैय । भोजनक साज देखक रंजीत कहैय "एतेक करऽकेँ कोनो जरुरीए नहि छलैक ।"मुदा ओ लैरकी कोनो प्रकारक जबाब नहि दैत कहैछैक "आहाँसबकेँ भुख लागिगेल होयत जल्दिसँऽ .....भोजन कलिअ ।"दुनु गोटा भोजन कएलाकवाद रंजित अमरकेँ लैडकी केँ आगातक अरीयाति देवऽ ला कहैतछै । अमर वै लैरकीके अरीयातऽ चैलजाइए । रंजीत तऽ मोनेमोन खुसी रहैय कि अमर ओकरा सँऽ किछ नहि किछ त पछबे करतै । मुदा अमरकेँ ओकारासँ किछ पुछवाक लेल हिम्मत काजेनहि करेछैक । किछ आगु अएलाक वाद ओ लरकी कहैछैक –"आँहा जाउ, आरम करु ।"अमर दलानपर फिर्ता भऽ जाइए ।प्रातःकाल सूर्योदय होबऽ सँऽ पहिनही रंजीत आ अमर ओतऽ सँऽ चैलजाइय । अमर घर पहुंचकऽ माँ आ बाबुजीकें दहेजक बिक्रीतीके बारेमे चर्चा सुनबैय । मुदा अमरके बाबुजी ई सब सुनलाक वाद जवाब दैछथि–"रे तो सब नहिने वुझबे जे कतेक आशा राखिक तोरा सबमे खर्च कैलि आ अखनो करैछी ।" पोर साल जे तोरा वहीनक बिबाहमे तिन लाख तिलक गनलहुँ से । ओइ समयमे दहेगकऽ विक्रिती त केओ नहि सुनैलनि ।"ई सुनिक" अमर वावुजीक विचारकेँ वारेमे नहि सोचैछ कि मुदा ओ लैरकि वाला सवकेँ वारेमे सोचऽ लगैछय जे ओ सब पहिने घर पर ध्यान देता कि तिलक गन्ता । ई वात सोचिते अमरकेँ बाबुजी सऽ सहमति नहि भऽ ओही साझँ घर सँ कतौ भागिजाइय ।लैरकी देखाबऽ के लेल जानकी मन्दिरमे अबैय । अमर नइ होबऽके कारणसँऽ अमरके माँ अमरके फोटो लऽकऽ पहुचैय । जलपान आदी भेलाकवाद आब सबगेटा लैरका के बजाबके लेल कहैय । ई सुनिकऽ अमरकेँ माँ कहैछथि "अमर त कने कौलेजके काजसँऽ काठमाण्डौ गेलअछि ।"फेर अमरके फोटो वेगमेसँ निकालिकऽ दैत कहैछथी "हे, लिअ ...........फोटो लैरकाकेँ ।"लैरकि वाला सव फोटो देखिते एकआपसमे कानफुस्की करऽ लगैय । सवगोटा फोटो देखिते–देखित फोटो लैरकीके हातमे परैय । फोटो देखिते ओ चिन्हलैय । अमर के प्रतिक्षा करऽ केँ क्रममे विवाहक वात कतेकवेर पक्का भभऽ कऽ टुटिजाइछनि । एक–डेढ वर्ष तक अमरके वाट तकिकऽ लैरकिक बाबुजी विवाहकऽ वात दोसर ठाम करैछथि मुदा ओ लैरकी अपन बाबुजीकेँ कहैय "बाबुजी, जौ हम विवाह करब त..................अमर सँ नहि त अहिना रहब । बल्कि हम अमरके प्रतिक्षा करब मञ्जुर अछि ।"अपन संतान त केकरो भारी नहि होइछैक । बाबुजी किछ जवाव नहि देलाह । आ ओ अमरसँऽ विवाह करव कैहक प्रतिक्षा करऽ लगली । बिश वर्ष त बितगेलै मुदा बिभा अखनो अमरके संग होबऽबाला बिबाहक प्रतिक्षा करैय ।

धोबीकेँ गदहा - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

धोबीकेँ गदहा

सुबोधकेँ बच्चे सँ माँ आ बाबुजीक निक स्नेह भेटलनि । सुवोध हसिते, खेल्ने मेट्रिक पास भेलाह । गामसँ लगे पर वाला कौलेज मे आ.ए. पढैत रहैथ ।एकदिन हुनक बाबुजी हनका बजाक कहलनि "अपना खेत कते छौक से त बुझले छौक......... आब हम तोरा खर्च नहि द सकैछि आब तो अपने किछ आर्जन कर केँ कोषीश कर.....।"ई बात सुनिक सुवोधकें मनमे दुःख लगलनि आ ओ अपना बाबुजीके कहलनि "हम एते पाइ कमासकैत छि जे अाँहा पुते कहियो खर्च ककऽ खतम नहि कएल पार लागत ।"आ, ई वात कहिक ओ बाहर जाएकें लेल तयारी करऽ लगैय । ताबतें किछ दिन बाद सुवोधके वास्ते अगुवा एलनि आ हुनक बाबुजी तिलक लक सुवोध केँ विवाह क देलनि । विधी विद्यान सँ सुवोधक विवाह सु–सम्पन्न भेलनि । तिकममेका जे पाई बैचगेलरहनि ताहिसँ ओ छोटमोट व्यापार क'र केँ सोचलनि । ओ पटनासँ दवाई आ अन्य किछ लाविक वेचैछलैथ । एक दिन जखन ओ पटनाक गोविन्द मित्रा रोड पहुँचैछथ लखने हुनका ३ आदमी घेरक चाकु देखाक –"जते पाइ छौ निकाल नहि त मारिक नालीमे फेक देवौ ।"ई धमकी द सुवोधसँ सवटा पाई छिन लैछनि । सुवोधक जेवीमे एकटा फूटलो कौडी नई होब के कारण स ओ वड कष्ट कक अपन घर पहुँचैछथि । तिन दिन वाद भुखले सुवोध अपना घरपर पहुँचैय । मुदा ई घटनाक वात किनको नहि सुनवैछथि । मुदा ई वात ओ अपना मनमे से हो नहि दवाब सकैय । आ ई कारण ओ एकदिन आधा रातिएमे उठिकऽ घर घेरिक चैलजाइछैक । आगा पहुचक जइ वस पर चढ लनि ताही वसक स्टाफसँ पुछलनि "ई बसमे ......यात्री विमा अछि कि नहि ?"एहन वात सुनिकऽ लोक कहैक "ई छौरा त ....पागल लगैछैक ।"मुदा सुवोधकें मनमे ई छलैक जे हम मरियोजाएब त विमा वाला पाइ हमर बाबुकेँ भेटऽ जाइतै जै सँऽ किछ निमहि जएतै । मुदा ओकरा अपन घरवालीके चिन्ता कनिको छैहे नहि । सुवोध मुम्बई पहुँचैय । मुम्बईमे सुवोध करिब २० दिन पाथरि फोडवाला काज करैय आ पुनः ओ दोसर काज करकेँ तैयारीमे लगैय । काज ताकँऽके क्रममे एकदिन सुवोध देखैय एक आदमी आगु–आगु भागिरहल आ चारिगोटें ओकरा खेहारैत । हाथमे तलवार लऽकऽ खेहारैवाला सब बड क्रुर लगैत रहैत छैक । भागऽ वाला आदमी सुवोध ठाह् भेल वाला गल्लीमे नुकारहैछैक । बाँकी खेहारवाला सब चारुतर्फ ताकिक ओ फिर्ता चैल जाइए । तखन ओ नुकायल अदमीलग जाकऽ अपन परिचय दैछैक आ काजक तलाशमे छि से हो कहैय । ओ आदमी सुवोधकें अपन मालिक लग लऽजाइतछै । खाँन पोशाक पहिरने दाह् िवाला आदमी सुवोधके एकटा काज सोपैछै"ई वेग लऽकऽ समुद्र किनारमे पहुचादही तोरा ओतै हमर अदमी भेटतौ आ तोहर परिश्रमिक ओतै दऽ देतै ।"सुवोध बेगलक समुद्रकात पहुचैय ओत ओकरा कहल अनुसारकेँ आदमी भेट जाइछैक । ओ वेग सुवोध ओकरा द'क अपन परिश्रमिक पच्चिस हजार रुपैया पबैय । हातमे पाई परिते ओ सबसँ पहिने जीवनविमा करबैय आ पुनः अपन काजमे लागि जाइय । एक दिन जखन सुवोध वेग लऽकऽ समुद्रकात जातिरहैय त पुलिश पाछा आब लगैछैक । सुवोध अपन मोटर–साइकल छोरिक लगैय गलिदने भाग । सुवोध आगा आ पुलिशपाछा । ई क्रम चलैत चलैत पुलिश सुवोधपर गोली–चलवैछैक । सुवोधके पिठपर गोली लागिजाइछैक । सुवोध लगैय छटपटाय । हाथसँ वेग खैस परैछै । गोलीके आवाज सुनिक लोक लगैछै भागऽ । पुलिश वेग खोलिक देखैय त ओकरा वेगमे मात्र उजरा पाउडर रहैछैक । पुलिश पुनः दोसर गोली ओकरा माथपर मारिदैछैक । सुवोधकेँ प्राण ओतै छुटिजाइछैक । पुलिश ओकरा लाशके समुद्रकात मे लजाक फेकदैछै । मुदा सुवोधके माथ–बाबु आ कनियाके अखनो प्रतिक्षा छै सुवोधके ।

हमरा याद अछि - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

हमरा याद अछि

हम आठमे पढैतछलहु बात त तहिएके थिक । दोसर–दोसर स्कूलसँआयल नयाँ–नयाँ विद्यार्थी तिनटा साथी स परिचय भेल । आ, ई, तिनु सँ परिचय भेलाक बाद हमहु पहिल–दोसर ब्रिन्चि पर बैसनाइ छोरिक अन्तिम ब्रिन्चि पर ओकरा सब साथे बैस लगलहुँ । अन्तिममे वैसकऽ अनेक प्रकारक गप होइछलै । ताहिक्रममे लैरकी सबकेँ बात बेशी होइक । ई सब हमरो सुनऽ मे बड निक लागे । एक दिन हमरा सबकेँ क्लाशमे चौथी ब्रिन्चिपर बसैल भाटारंगकऽ कपडा पहिरने लैरकिकेँ वारेमे गप चलऽ लगलैक । शिक्षक चैलअएलनि सब चुप मुदा शिक्षककेँ गेलाक बाध फेरु ओकरे बारेमे गप । ओ रहवो करै एते सुन्दर जे लगै चन्द्रमा मेँ स टुटल टुक्रासँ ओकर मुह बनल होइक । क्लाशक प्रायः लैरका सब ओकरेपर तकै । आब ओकर नाम कि थिक ? पत्ता लगाब परलैक । मुदा हम अपन साथी सबके हम कहलहु "आहा सब ई काज...... हमरापर छोरिदिअ"सब नाम पत्ता लगाब बाला काज हमरापर छोरिदेलक जखन टिपिन भेलैक । सबगोटा बाहर चैलगेलैक त ओकर किताब–कापी उल्टाकऽ देखलहु । आ ई पत्ता लागलजे ओकर नाम मनोरमा छैक । आब बात रहल ओकर घर पत्ता लगाबकेँ । त आनदिन जैतहु त अबेर भजाइत । ताहि सँ हम आ हमर साथी जगत शुक्र दिनक ओकरा पाछा करैत गेलहँ । घर पत्ता लागिगेल । अहि सब किछ केँ बारेमे हम संजयके सुनैलहूँ । ई सब त हम करैछलहुँ हमर मित संजय ला मुदा मनोरमाकेँ धीरे–धीरे हमरा सँ लगाब होबऽ लगलैक । मनोरमा के हमरा सँऽ लगाब देखिकऽ संजय हमरा सँऽईर्शा करऽ लागल ।मनोरमाकें नजरिमे हमरा गीराबऽ लेल आ अपने निक बनऽलेल अर्धवार्षिक परिक्षाक अन्तिम दिन हमरा पर हात उठेलक अपना साथीमे सबसँ कमजोर हमही रही ताही सँ हमरा माइर खाए परल आ कपार से हो फूटिगेल । बाबुजीक डर सँ घर नहि जाकऽ हम मन्दिरपर वैसल छलि । करिब १५–२० मिनटकेँ बाद मनोरमा ओत पहुचली आ हमरा कहलगली "एना डरपोक भऽ कऽ नहि चलत,.......... आहाँ कँराटे सिखु आ....... किछ करु ।"ई वात सुनिकऽ , हम बड सोचलँहु । कि, ओ ठिक कहलीअ कि बेजाय । ओहि दिन साँझ सँऽ हमहुँ कराँटे खेलगेलहँु । आ, ३ महिना पहुचैत– पहुँचैत हम अपना क्लबके एकटा निक खेलाडी बैनगेलहु । दशमी आएल । स्कुलमें सबसाथी एकआपसमे शुभकामना आदन–प्रदान केओ मुह सँऽ आ केओ पोष्टकार्ड आ ग्रिटीङ्ग कार्ड सँ । हमरो एकटा ग्रिटीङ्ग कार्ड मनोरमाके तर्फ सँ भेटल । जे कार्ड सायत संजय के कहलापर अरुण चोरालेलक । मुदा, फेर छुट्टी कालमे संजय अपनाके हिरो बनाबऽकेँ लेल हमरा पर हाथ उठौलक मुदा हम ओते आब आशान नइ रैहगेलरही । हमरा दुनुके बराबर माइर चलल आ, पुनः हमरा कपार फुटिगेल । तावते स्कुलकें एकटा शिक्षिका आबिक झगडा छोरादलनि । आ ओ ई हो कहलनि जे एहन जँ आदत रहतौ तऽ जीवनमे कहियो आगु बढल पार नहि लगतौ । ई आठ –दश वर्गक विधार्थी कही एहन भेल । फेर, विद्यालय खुजल । सबगोटाके तँऽ बुझले छलैक हमर आ मनोरमाक प्रेमके बारेमेँ ई चर्चा कने बेशिए भऽ गेलैक । एक दिन मनोरमा हमरा स्कुल छोरिकऽ सिनेमा देखला कहलनि । हम आ मनोरमा आशा हलमे अमानत फिल्म देख गेलहु । वै के वाद ई क्रम चलैत रहलै । समय वितते गेलैक । हम सब एस.एल.सी. दैत रही त हमरा मालुम भेल कि मनोरमाके विवाह फागुनमेँ छैक । ई सुनिक हमरा शारीरक रक्त सञ्चार बन्द भऽगेल । हमर सोचन शक्ति हेरागेल । आ एकटा एहन अवस्था चैलआयल जतऽ नहि त हम कानि सकतछी नहि हम हसिसकैत छि । मुदा एतऽ कि करु हम बुझऽ नहि सकलहुँ । ई सुनिकऽ हमरा हृदयके से हो कने चोट पहुँचल किछ दिन बाध ओकर सहेली संकटमोचन लग भेटलनि आ कहलनि "कल्हि खन ३ बजे आँहा राम मन्दिर अवियौ ।"हमरा किछ अवेर भऽगेल करिब पौने चारि बजे ओत पहुँचलहु । ओ सब तिनो बजेसँ पहिले आएल रहैक । हमरापर ओ खुब जोइ सँ खिसएली । मुदा हम किछ जबाब नहि देलियनि । अन्ततः ओ एतवे कहलनि जे हम सब किछ लऽकऽ चैल आएल छि आ अपने सब भागु । हिम्मत काज नहि केलक जे दुनु अदमी भागी जाई । हम नहि छोरिक आइ किछ जबाब नहि देबऽ सकलहुँ । ओना तखन तऽ हम पुरा होशमें छलहुँ । भागीकऽ विवाह करऽ बालाकऽ तिन पुस्ता बखाद भऽ जाइतैछक । ताही सँ ई मनक बातमे हम दिमागक प्रवेश कऽ कऽ हम अन्तोतक नहि मात्र जबाब देलीयनि । एतेक बात मात्र भेलैक मुदा साँझके सात कोना बाजिगेल बुझ नहि सकलहु । जाए कालमे ओ कहली "अमर ............... हम आहाके श्राप त नहि दऽ सकैतछि मुदा एकटा शिख जरुर देब जे.................. एहन काज कहियो नहि करब जै सँ केकरो मनमे दुःख लगै ।"आ ई बात हमरा अखनो याद अछि ।

दाग लागल स्नेहमे - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

दाग लागल स्नेहमे

आई.ए. प्रथम वर्षमे अध्यनरत सुनिताकेँ एकटा बड निक विद्यार्थी दिपक सँ भेट होइछैक । बात–बिचार मिलऽ केँ क्रममे सुनिताकेँ । दिपकसँ प्रेम भऽ जाइछैक । सुनिताक घरसँ नजदिकेँ के घरमे भाडा लक रहबाला दिपक से हो सुनिता सँ प्रेम कर लगैछैक । आ, सुनिताक साथी रुबी सेहो जखन भेटभेल तखने दिपककेँ बारेमेँ पुछ लगैछैक । दिपक, रुबि आ सुनिताकेँ पढमे से हो बड मदत करैछैथि । समय–समय पर दिपकसंग सुनिता सिनेमा देखऽ सेहो जाय लगैय । दुनु एक आपसमे कहियो मन्दिर लग आ कहियो पार्कलग भेटघाट करके बात सुनिताक बाबुजीकेँ कान तक पहुँचजाइछैक । सुनिताक बाबुजी बड दुखी भऽ सुनिता लेल वर ताक लगैछथि । ई वात सोचिकऽ जे बेटी अपन प्रतिष्ठा सेहो बुरादेत । संचयकोष सँऽ पाई छोराक बेटीलेल गहना–गुरिया से हो वनाब लगैछथि । सुनिता ई सब बात अपन सहेली रुबिकेँ सुनबैय । ई सुनिकऽ रुबि दिपककें संग भागिक विवाह कर ला आ मिथिलाक दुर्दशा दहेज आ महिला अधिकारके बारेमे निक जका पाठ पढादैछैक । दोसर दिन सुनिता अपन साथी दिपककेँ भेट कऽकऽ भागिकऽ विवाह करऽला कहैछैक । सब किछ सुनलाक बाद दिपक भागऽके लेल समय सेहो निश्चितक सुनिताके कहैय । प्रातः काल सुनिता आपन माँके मंगलशुत्र, तिलहरी आ अनवारीमे राखल रुपैया लऽ दिपक संग भागिजाइय । आ दुनू सब मुम्बइ पहुँचैय । दिपक रहऽकेँ लेल अपन मितकेँ डेरामे व्यवस्था मिलबैय । आ, सुनिताकेँ डेरामे छोरिकऽ दिपक ओमहरे रैहजाइय, जाँहि कारण सँऽ सुनिता बड चिन्तित भजाइय । मुदा साँझमे दिपक केँ देखिते सुनिताके चन्द्रमा सनक मुहसँ इजोत निकलैछैक । आ, ओइ राति सुनिता दिपकपर पूर्ण रुपे समर््िर्पत भऽ जाइय । भोर मे जखन सुनिताक आँखि खुलैछै त दिपक ओतऽ नहि रहैछैक । दिपक नितक्रिया मे गेलहोयत सोचिक सुनिता जल्दि सँ उठिक अपन कपडालता पहिरक तैयार होइय । मुदा एमहर–ओमहर तकैत सुनिताक नजर चिठ्ठी पर परैछैक । ओ चिठ्ठी खोलिक देखैय, लिखल रहैछैक "हमरा माफ क दिअ सुनिता ।"
ई पढिक सुनिता अपन माथ कपार पिट लगैय आ सोच लगैय जे कि भगेल । सुनिताक छाती धर धर धर धर काप लगैछैक । तावते केवार खुलैछैक । आ, एकटा महिला पान खैने दुटा मर्दके लक पहुँचै छै । पहिने ओ महिला सुनिता सँ पुछैछैक "तम्हारा नाम.... सुनिता है ।""हाँ, हाँ, मगर क्यो ?" सुनिता डेराक जवाफ देछै । ओ महिला फेर कहैछै "चलो हमारे साथ ।""क्यो ?""हमने तुमको ....खरिदा है ।""नही ए झुठ है ।" ओ महिला अपन साथमे आयल मर्दकेँ कहैछै "ए ! उठालो सालीको,...... बहोत बोलरलिए ।"दुनु मर्द सुनिताके उठाक लजाइय । सुनिताके देह व्यापार कर ला कहलजाइछ । मुदा अस्विकार कएला पर सुनितकेँ लगैछै पिटाइ आ दऽ देओल जाइछ निशा के सुई । निशाकेँ सुई दकऽ देह व्यापार कराबके कारण स ओ विमार भऽ जाइछ । ताहि सँऽ ओकरा जचाँबऽ लेल डाक्टरलग लगाइछ । ओ सौचालय जायकेँ बहाना सँऽ ओतऽ सँऽ भगैय । आ भागऽमे सफल सेहो भऽजाईछ । सामने अवैत रिक्सापर बैसकऽ ओ रेलवे–स्टेशनपर पहुँचैय । रिशसाबाला जखन पाई मगैछैक त सुनिताकेँ सबकिछ सुनाब परैछैन । किया त सुनिताक सबपाई ल क दिपक चैलगेल रहैय । सुनिताक दुःख भरल खिस्सा सुनिक रिक्सावाला सुनिताकेँ अपन डेरा लजाइय । आ दु–तिन दिनमेँ अपन गाम पहुँचादेवकेँ बचन से हो दैय । रिक्शावालाक वात सँऽ सुनिताकेँ विश्वास होइछ । सुनिताकेँ संग परिचयपात होबऽ के क्रममे रिक्शावालाकेँ घर सेहो परोशकें गाउँमे छैक से ओ वतवैय । दु–तीन दिन बाद सुनिताक संगे रिक्शावाला अपन गामकेँ लेल निकलैय । रेलबे स्टेशनपर सुनिता पुरा एमहर–ओहमर देखैत सावधानी सँऽ चलैय मुदा जहिना टे«न आगा बढैछै, सुनिताक घरकैत करेज स्थिर होब लगैछैक । सुनिता ताक लगैय रिक्शावालापर आ सोच लगैय ओ दुनुकेँ फरककेँ बारेमे ।रिक्शावाला सुनिताकें लकऽ जखन सुनिताकऽ घर पहुँचैय तऽ सुनिताक बाबुजी सुनिताके देखक कहैछथि "आब कि लेब अएले.................., ओतै सँ चैलजो नइ त हमहि सब बिख खा लेब ।"सुनिता विना किछ बाजिकऽ मुरी गोतने बाहर निकलैय । सुनिताकऽ हाथ रिक्शावाला पकरिलैछ आ ओ अपन घर चलऽ ला कहैछ । जखन ओ दुनु बाटमे परऽवाला दिपककेँ डेरा लग पहुचैय । कोठरी भितरसँ बन्द रहैछैक । सब दिन खिरकी दने वजाबकेँ आदत सुनिता खिरकी दने पुनः बजाबलेल तकैछ । मुदा सुनिता जखन खिरकि दने तकैछै त सुनिताक साथी रुबि दिपक के कोरामे बैशल प्रेमरसकेँ वात करैत रहैछ । ई देखक, सुनीताक पैर तर सँऽ जमीन जेना निकलिजाई तहिना भऽजाइछ । आ ओ अपना पर भेल अत्याचार दोशर पर नहि होउक से सोचिकऽ नजदिक कें थानामे जाक दिपक के बारेमे लिखवैय । सुनिताकेँ स्थीती परिस्थिति देखक आब ओ कत जएती सोचिक रिक्शावाला सुनिताकेँ कहैछ "एक बात कहु, .........पिताएब न नहि ?"उत्सुक्ता जनबैत सुनिता, कहैछ " ह ! कहु ..........!"तब रिक्शावाला कहैछ "आहा हमरा सँ ............विवाह करब ।"
ई सुनिक सुनिता हसऽ लगैछ ।

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...