Wednesday, November 05, 2008

भाग्य अप्पन अप्पन- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एक बेर देशमे के की–की कऽकऽ जीवन यापन कऽरहल अछि ताहि बातक पत्ता लगाबऽलेल राजासाहेब अप्पन राजकुमारके देशमे सर्बेक्षण करऽलेल पठौलनि । देशमे के केहन प्रकारक रोजगार कऽकऽ अप्पन जीवनयापन करैत अछि, से विषयक सर्वेक्षणमे राजकुमार सबहक आङन जा–जाकऽ प्रजासबहक रोजगारक बारेमे सर्वेक्षणक श्रीगणेश कएलनि ।
सर्वेक्षणक क्रममे जखन ओ एकटा आङन पहुँचलनि त देखलखिन दू भाइमे झगडा होइतछल । जाहिमेसँ एकटा भाइ जे जेठ छल ओ रहैथ केश कटौने जेना किनको स्वर्गबास भऽगेल छलैन । आ, दोसर भाइ जे छोट छलैथ ओ लाल धोती पहिरने छलाह जे देखिकऽ लगै नव बियौहती बर । राजकुमार ई देखिकऽ हरान भऽगलैथ जे एकहि आङनमे एना किए छै ? आङनमे ओ दूनु राजकुमारके देखियोकऽ चुप नहि भेल । हँ, स्वभाविक छै, कहाँदोन पित्तमे लोक आन्हर भऽजाइछ । राजकुमार लगलैथ दूनुमे भऽरहल बातचित सुनऽ । बड़का भाइ बेर–बेर कहै —‘रे तोरा लेल हम नौह–केश करालेली..हमरालेल तो मरिगेले ।’ एहन किसीमके बात सुनिकऽ हुनको बरदास नहि भेलनि माय ओ जोरसँ कहलैथ–‘अहाँसब चुप होएब कि जेल अखने पठादिअ ।’बास्तवमे लोक कहैछै –‘माइरके डरसँ भुत पराए’, ठिक ओहने भेलै । दूनु भाइ चुप भगेल तखन राजकुमार छोटका भाइसँ पुछलखिन –‘अहाँ कहु अहाँ एहन कोन गलती कएलहुँ जे घरमे एहन कल्लह भऽरहल अछि ? कि अहाँके एते बुझल नहि अछि जे कलहके कारणसँ घरक सब किछु कमजोर भऽजाइछ ?’ राजकुमारक प्रश्न सुनिकऽ बड़ विनम्र भऽओ जवाब देलनि –‘हम आठ बर्ष पहिनेसँ जाँहि लड़कीसँ प्रेम करैछलहूँ ओकरेसँ हम बियाह कएलहूँ अछि । ताहिलेल ओ हमरा पर खिसियाएल छथि ।...हुनका तिलकके माध्यमसँ आबऽवाला आम्दनी नहि भेटलनि ते ओ बिभिन्न बहन्ना बनाकऽ हमरासँ झगडा कऽरहल छथि ।’
भाइके मुँहसँ एहन बात सूनिकऽ ओ पिताकऽ कहलैथ –‘बियाहमे सबसँ पहिने देखलजाइछ लड़कीक खन्दान, जाति आदि ।’ जातिके नाम सुनिते छोटका भाइ कहलकै –‘हम जातिके बाह्मण होइतो जँ चौकपर जाकऽ जुत्ता सियब त लोक हमरा चमार कहत, अर्थात मतलव साफ छै आदमी अप्पन कर्मसँ नमहर आ छोट होइछ ,... किनको माथपर नहि लिखल रहैछनि कि ओ कोन जाति छथि ।....रैहगेल खन्दानक बात त थाल आ कमलके फूलवाला कहाबत अहाँ पक्का सुनने हाएब ठिक तहिना जँ हम बाहरमे कतौ फेकल पथ्थरपर भगवानक मूर्ति गढ़िक मन्दिरमे राखि दिऐ त लोक ई नहि पुछ अएतै जे ई पथ्थर कतऽके छै ओ सिधा पूजा करतै ......लोक डुबैत सूरजके एकहि दिन प्रनाम करैछैक मुदा उगैत सूरजके सब दिन ।’ एते बातक बादो जेठ भाई फेर कहलखिन –‘रे, कमसे कम ओकर संस्कृती पर त बिचार करऽके चाही ।’ संस्कृतीक नाम सुनिते छोटका भाइ हसिकऽ बाजल –‘महाभारतमे भिम सेहो एकटा राक्षसनीसँ बियाह कएलकै जेकर पुत्र घटोत्कच छलैक ।....आप करे त रास लिला आ हम करे त कैरेक्टर ढिला, नहि ।’ फेर ओ शान्त भऽकऽ कहलखिन–‘देखु भैया, बियाह आदमीक सोचला आ कएलासँ नहि होइछ ...ई त भाग्यक खेल थिक ।’
दूनु भाइमे भऽरहल बातचित सुनिकऽ राजकुमारके सेहो किछु नहि फुराति छलैन । उदाहरण एकहुटा काटऽवाला नहि रहैक । ते ओ बिचमे किछु बाजऽ सेहो नहि चाहलखिन । ते ओ हुनकासभसँ बिनाकिछु पुछने –‘अहाँसभ झगड़ा नहि करु’ कैहकऽ बिदा भऽगेलैथ ।
राजकुमार ओतऽसँ कनिके आगु बढ़लैथ त देखलखिन एकटा बोर्डपर लिखल रहै “भविश्यवाणी” । बहूतो लोकसभक ओतऽ भिड़ लागल रहै । लोक सबहक भिड़भाड़ देखिकऽ ओ आश्र्यमे परिगेलैथ । केओ अनाज, केओ किछु– केओ किछु केओ रुपैया दऽकऽ भविश्यवाणी सुनऽ आएल रहे । राजकुमार पण्डितजी लग जाकऽ पहिने ओ अप्पन सर्वेक्षणक सम्बन्धमे आय–ब्यय सभ किछु पुछिलेलाक बाद ओ भविश्यवाणीक सम्बन्धमे सेहो किछु पुछलखिन किए त हुनका दिमाग पर नचैत छलैन एकहिटा बात जे ओतऽ छोटका भाइ बाजल छल –‘ बियाह आदमीक सोचला आ कएलासँ नहि होइछ ...ई त भाग्यक खेल थिक ।’
राजकुमार अप्पन बिवाहक सम्बन्धमे पण्डितजीसँ पुछलखिन कहु –‘हमर बियाह केकरासँ कोन जातिमे होएत ?’ पण्डितजी हुनक माथक रेखा देखिकऽ पहिनही बुझिगेल छलैथ कि ओ एहि देशक भावी राजा छथि । मुदा बियाहक सम्बन्धमे ओ देखलथिन त हुनका भेटलनि कि हुनक बियाह ओही गाँमक चमनिके संग । पण्डितजी राजकुमारसँ कहलखिन–‘अहाँक बियाह एहि गाँमक चमनिसङ होएत ।’ ई बात सुनिते राजकुमार पितागेलैथ आ पुछलखिन –‘जँ नहि भेलै त ?’ राजकुमारक प्रश्नके ओ हसैत उत्तर देलैथ–‘जँ नहि भेल त अहाँ हमरा जे कहब मानिजाएब ।’ राजकुमार सर्वेक्षणक काज छोड़िकऽ दरवार फिर्ता भऽ चिन्तीत भऽ अप्पन कक्षमे जाकऽ सुतिरहलैथ ।
देशक प्रधान सेनापत्ति राजकुमारक एकटा बहुत निक मित सेहो छलखिन । राजकुमारके चिन्तीत मुद्रामे देखि ओ हुनकाँसँ पुछलखिन –‘मित, अहाँके कि भेल, अहाँ एना चिन्तीत किए छी ?’ राजकुमार सेनापत्तिलग अप्पन मनक बात पूर्ण रुपसँ निकजकाँ सम्पूर्ण घटना सुनौलखिन । ओहि गाममे एकहि घर चमनि होबऽके कारणसँ सेनापत्तिके ओकरा सबहक बारेमे सेहो निकजकाँ बुझलरहे । सेनापत्ति अप्पन बिचार प्रस्तुत कएलानि –‘चमनिके एकहिटा जे बेटी छैक ओकरा मारिकऽ नदिमे फेक देल जाए ।
राजकुमारक आज्ञा अनुसार सेनापत्ति अप्पन किछु सेनासहित जाकऽ ओइ लड़कीके जंगल दिश लगेल । बिच जंगलमे जे एकटा नदि परै ओतै ओकरा लऽजाकऽ एकटा सेना ओकरा पाछुसँ एक तलवार मारिदेलकै । ओ लड़की ओतै बेहोस भऽगलै । मरलसन देखिकऽ ओकरासभके भेलै जे ओ लड़की मरिगेल ते ओकरा नदिमे फेककऽ सेनासभ अप्पन देश फिर्ता चलिआएल ।
ओ लड़की दहाकऽ एकटा दोसर राज्यमे पहुचगेल । नदिक किनारके ओहि देशक राजा रहैथ स्नान करैत तखने हुनका ओ बेहोस लड़कीपर नजड़ि पड़लनि । राजा अपनेसँ जाकऽ ओ लड़कीके कोरामे उठाकऽ लैलथि । श्वास त ओकर चलिते रहै ते राजा अप्पन दरवार लऽजाकऽ ओकर ईलाज राजबैद्यसँ करौलनि । राजाके अप्पन कोनो सन्तान नहि होबऽके कारण राजा ओइ लड़कीके अप्पन राजकुमारी घोषणा कएलनि । किछु समयक बाद राजकुमारीके बियाहक प्रशंगमे राजा एकटा सभाक आयोजना कएलनि । आ, आहि सभामे बिभिन्न राज्यक राजा तथा राजकुमारसभके आमन्त्रित सेहो ।
शभामे उपस्थित राजा–महाराजा लग घोषणा कएलगेल –‘राजकुमारीके जे लड़िका पसन्द एतै, ओ ओहि लड़काके वरमाला पहिरादेत आ ओहि लड़कासँ राजकुमारीक बियाह सेहो कएलजाएत । घोषणा पश्चात राजकुमारी शभामे वरमाला लऽकऽ उपस्थित भेली । राजकुमारी कोनो स्वर्ग परीसँ कमजोर नहि बुझाई । राजकुमारीके देखिकऽ सबहक मोनमे रहे –‘हम राजकुमारीसँ बियाह करितहुँ ।’ ओ चारु दिश घुमिकऽ ओही राजकुमारक गरदनिमे माला पहिरादेली । राजकुमार सेहो बड़ खुस भेल किए त हुनका भविश्यवाणी कैनिहार पण्डितके जबाव देबऽके छलनि ।
बियाह भेलनि । राजकुमार राजकुमारीके लऽकऽ अप्पन राज्य अएलनि । बियाहक सब बिध समाप्त भेलाक बाद ओ अप्पन सेनापत्तिके बजाकऽ ओ भविश्यवाणी कैनिहार पण्डितसँ भेटवाक इच्छा प्रगट कएलनि । मित तथा राजकुमारक इच्छा अनुसार ओइ पण्डितके राजकक्षमे उपस्थित कराओल गेल । राजकुमार आदेश देलनि –‘ई पण्डित दोसरके मात्र ठकैय । भविश्यवाणीक नाम पर सभके धोखा दैय ते एकरा सजाय मृत्यु देल जाए ।...... जँ हिनका अप्पन सफाइके लेल किछु कहऽके छनि त कैह सकैछथि ।’ राजकुमारक बात सुनिकऽ ओ कहलखिन–‘राजा साहेब आइ तक किनको हम नहि ठकलीयनि । रहल बात अपनेके त अपने जाकऽ ई देखलजाए कि अपनेक रानीक गरदनिके पाछु कातसँ अपनेक सेनापत्ति द्वारा मारलगेल तलबारक निसान अछि कि नहि ।’ ई बात सुनिक राजकक्षमे रानीके सेहो उपस्थित कराओलगेल आ ओतै सभक सामनेमे जखन ओ माथ परसँ नुवा हटाकऽ पाछुतकलखिन त बास्तवके तलबारक निसानी रहबे करै । सभगोटेके छक्क पड़ैत देखिकऽ पण्डितजी कहलनि–‘होइहे वही जो राम रचि राखा ....।’

दाग- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

अरुण भोरमे घरसँ निकलऽ बेरमे ताला लगाकऽ निकलल छलाह । मुदा साँझखन जखन ओ घर पहुचलाह त केवार मात्रे सटाएल रहै । तालाके त अत्ते–पत्ते नहि । बुझऽमे अएलनि जे घरमे पक्का चोरी भऽगेल । ओ धरफऽराति बौल बारलनि । आ, ईजोत होइते घरमे रानीके देखिकऽ ओ अकबका गेलाह । सोफालग निच्चामे ओ बैसल छलिह । आ अबाक होबऽके त बाते रहै जे कनिए दिन पहिने रानी दोसरासंग भागिगेल छलिह । मुदा, ओ पहिनेके तुलनामे बहुत बदलल बुझाइत छलिह । एते लटल छलिह जे लगै मात्र देहमे हडडी । अरुणके बाजके मोन त नहि रहै किए त बियाह कएला दूइयो बर्ष नहि भेल रहै आ दोसर संगे ...... । ओ अरुणके देखते किछु बजली मुदा हुनका बुझऽमे नहि अएलनि । ओ नजदिक जाकऽ बैसिगेलाह आ पुछलखिन –‘कि भेल अहाँके ?’
अरुणक प्रश्नके बिना कोनो जबाब देने ओ कहलीह –‘हम भागिकऽ अएलीए ।’
तैयो अरुण किछु नहि बुझल जकाँ ओ ओकर आओर लग घुसकिकऽ ओकरे दिश ताकय लागल । रानीके लगमे बसिते ओकरा पुरान बातसभ मोन परऽलगलै; रानी, जे पहिलबेर कैम्पसक पहिल सांस्कृतीक कार्यक्रममे भेटल छलीह । निक कलाकार होबऽके कारणसँ रानी अरुणसँ परिचय करऽगेलीह । परिचय भेलै । आ, साथमे आओर किछु बात सभ । आ एतहि दूनुके एक–दोसरसँ मुक प्रेम भऽगेलनि । ताहिके बाद दूनु कहियो कतौ त कहियो कतौ भेटऽके सिलसीला जारी राखऽलागल । एहिके बारेमे किनको किछु बुझल नहि छलनि । एहि क्रममे अरुण रानीसँ बियाहक प्रस्ताव आगु बढ़ौलनि । आ, रानीक सहमति पाबि ओसभ भागिकऽ बियाह कएलाह । एहि बियाहके ओना रानीक जातिके लोक बिरोध आ अरुणक जातिक लोक स्वागत कएने रहै । आ, दूइए बर्षक बाद ई .......... दोसर संगे ।
जेकरासंगे ओ चलिगेलछली अरुणके बुझल नहि छलनि जे ओ के छैक । किए त अरुण एकटा कुशल कलाकार होबऽके कारणसँ बहुतो लोकके हुनका आंगनसँ आबाजाही लागल रहैछलनि । ओना त ओ रानीके गेलाक बाद ओ बहुत दिन धरि गुमसुम रहय लगलाह । मुदा एखनि ओ अप्पन मोनके बुझालेने छलाह । गाम आ टोलक लोकसभ कहैछलै –
‘केहन छै , लाजो नहि । बहुभागिगेलै ...... ।’
मुदा समाजमे एहन घटना घटब त आम बात भऽगेल छैक । एकटा अकल्पनीय घटनाके प्रश्नवाचक दृष्टीसँ देखते रहैथ ताबते ओ बजलीह–
‘हम अहाँसँ मात्र भेट करऽ आएलछी ......... एगारहे बजे अएली मुदा अहुँ नोकरी करऽलगलीए से मालुम भेल । ...... एखनो धरि अहाँ हमरालेल चिन्ता लैतरहैछी से बात सिरसियावाली काकी कहैछलखिन । .......कि आब अहूँ बियाह कऽलेब त नहि होएत .......... आ नोकरीवालाके बियाह होनाइ सेहो कठिन नहि ।’
मुदा अरुण हुनक प्रश्नक कोनो जवाफ बिना देने पुछलखिन –
‘अहाँ एतऽ कि करऽ अएली ?’
अरुणक एहि प्रश्नक जवाफमे ओ कहली –
‘हम बिमार भऽगेली ...... दिनानुदिन कमजोर भऽरहलछी ....... जखन–तखन माथ दुखाइत रहैय .... घुरमी लागल जकाँ बुझाइतरहैय । ......... हम ओ छठठूकसंग जाकऽ बड नमहर पाप कएली आ पापक परिणाम कतहूँ निक नहि होइछैक । हमरा ओ ठगिलेलक, अरुण ?’
एते सुनलाक बाद अरुण पुछलखिन– ‘किए ? आब कि भेल ?’
बड गम्भिर भऽकऽ रानी जबाब देली– ‘हमरा ओ कहने रहे घरमे असगरे छी, एकटा माय मात्र छथि, नमहर घर अछि .. अन्न किनऽनहि परैए । मुदा सब झूठ छै । ....... एक्कहूटा बात साँच नहि ।’
एते बजलाके बाद ओकरा आखिमेसँ नोर खसऽलगलै आ आवाज सेहो थरथराए लगलै । ओकर बातक बिना कोनो प्रतिक्रिया देनहि ओ पुछलाह –‘आब कि समस्या अछि ?’
ओ फेर कहली – ‘ओ कहैए हमरो होटलमे गीत गाबऽपरत .......... नहि त ओना पालऽ नहि सकत । नमहर शहरमे एसगर कमाकऽ पेट नहि भरैछैक कहाँदोन । .....हम कि करु ?’
एते बजला बाद ओ भोकासी पारिकऽ कानऽ लगलीह । अरुण बिना कोनो प्रतिकृयाके पुछैछथि– ‘ओ अपने कि करैए ?’
‘ओ अपने होटलमे डान्स करैए ।’
आँखिसँ खसल नोरके आँचरसँ पोछैत ओ अरुण दिश ताकऽ लागलीह मुदा हुनका सहजहि किछुनहि फुरैलनि तथापि ओ रानीके धैर्यता धारण करबाक अश्वासन दैत कहलनि –‘जे भेलै भऽ गेलै मुदा अहाँके बिना सोंच बिचार कएने ओना भागऽके नहि चाही । आब अहाँ कि चाहैछी, कहू ।’
‘हमर जीनगी बरवाद भऽगेल, ..... हम कतऽ जाउ, ..... फाँसी लगाकऽ मरियो नहि सकैछी ।’ हुनक नोरक गंगा बहिरहल छलनि कनिक देर चुप भऽ ओ फेर बजलीह– हम बहुते पैघ गलती कऽलेली, आब हम जीबियोकऽ कि करब । आ हमरासन रोगीके केओ नोकरनीमे सेहो नहि रखतै ....... हम कि करु ..... ?’ एते कहिकऽ ओ भोकासी पारिकऽ कान लगलीह ।
अरुणलग कोनो प्रकारक जबाब नहि छलनि तैयो ओ रानी दिश तकैत बजलाह –‘किछु नहि भेलैए, ..... अहाँ किछु दिन अप्पन माय–बाबुजीलग जाक रहु । आ, बितल समयके बिसरऽके कोशिस करु । आ, ओही लफंगासँ नहि डेराउ ।’
‘केना जाउ नैहर, माय–बाबुजीके कोन मूहँ देखबियनि ...... हमरा सहास नहि अछि ....... ओतहूसँ सेहो हम भागिएकऽ आएल रही । ....... आ अहाँसंगे भागऽसं पहिनहि ई सोचिलेने रही जे मरिजाएब मुदा माय–बाबुजी लग हारिकऽ नहि जाएब । ..... सच त ई छैक जे हमरा अहाँसँ सेहो क्षमा मागऽके छल .... किए त हमरा बड़ निक जकाँ बुझल अछि जे हमरा चलते अहाँके प्रतिष्ठापर पड़ल । ....... तैयो हम अहाँक समक्ष आबऽके सहास कैली । ...... माय बाबूजी त हमरासँ तहिए हाथ धो लेलखिन जहिया हम अहाँसंगे बियाह कएली । .... सहेलीसभ कहैत रहे जे जहिना सुनलखिन हमर बियाहक बात तखने केश कटालेलखिन आ कहलखिन– जो बेटीके नामके नौहकेश करालेली । ....... अहाँ सेहो हमरासँ मन मारिलेने होएब ।’ एते कहऽ धरि रानी मात्र हिचैक रहल छली सायद नोर सुखागेल छलैक ।
अरुण उदास भऽ कह लगलखिन– ‘हम कि करी... हमरा त अहाँके देखिकऽ आओर दुख लागि रहल अछि । बल्कि जा धरि अहाँके नहि देखने रही ता धरि मन शान्त छल, बिसरऽके प्रयास करैत छलीए ।’ किछु देर चुप्प भऽ ओ फेर कहलखिन – ‘अहाँके कि भेल अछि ? .... अहाँ हमरासँ कि चाहैछी ?.... अहाँके मुँह देखिकऽ हमरा डर लागिरहल अछि । दबाईबिरो सेहो नहिए करौने होएब ? ...... मुदा अहाँक एहन हालत देखिकऽ ओ कि कहैए..................’
अरुणक बात बिचेमे कटैत ओ सिसकैत बजलीह– ‘आब हमरा ईलाज कराबऽके नहि अछि । अहाँसँ भेटलाक बाद माय–बाबुजीसँ भेटवाक चाहना पुरा भऽगेल ।’ एते कहि ओ उठिकऽ केवार दिश आगु बढ़लीह ।
केवारलग पहुचते काल अरुण उठैत बैसऽलेल कहलखिन – ‘रानी, बैसु ने ।’ मुदा एते कहवासँ पहिने बिना किछु बजने ओ केवारसँ बाहर भऽगेल छलीह ।
बाहर अन्हार रहै । ‘आब ई नौ बजे कतऽ जाएब ? रुकु । .... हमहु अबैछी ... रुकु ।’ एते कहिते ओ जुत्ता पहिरऽलागल । आ जखन बाहर निकलल त रानी केम्हरो नजरि नहि परलनि । अन्हार सड़क पर ओ पूर्ब गेली वा पच्छिम देखऽमे नहि अबनि । ओ किछु आगु पाछु देखलखिन आ जखन भेट नहि भेलनि त फेर घरमे फिर्ता आबिगेलाह ।
किछु दिन बाद केओ कहलकनि जे रानी आत्महत्या कऽलेलीह । ई सुनिकऽ अरुणक पैरतरसँ जमिन निकलिगेलनि । शायद मुत्युसँ दाग धुवागेल होए मुदा किछु कऽसकैछलीह ।

डाक्टर- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एक्कहिटा गाममे सभ दिन कोनो नहि कोनो बिमारीक प्रभावसँ ग्रामबासी मरिरहल खबरि नियमित रुपमे निकालिरहल पत्रिकाक माध्यमसँ सरकार तक पहूँचैछैक । माय स्वास्थ बिभागद्वारा एकटा नव डाक्टर जे एक महिना पहिने स्वर्ण पदक प्राप्तकऽ कऽ आएल छथि, हुनके निरिक्षण आ जाँचके लेल ओहि गाममे पठाओल गेलनि ।
ठाँम–ठाँमके पुल टुटल । सड़क काटल । आ, गाछसभ काटिकऽ सड़केपर राखल होयवाक कारणसँ कोनो सवारी साधनक सुबिधा नहि रहैक । माय, करिब पन्द्र घन्टा पैदले चलिकऽ ओ ओहि गाम तक पहुँचलैथ । सभसँ पहिने त ओ रहऽके ब्यवस्था मिलौलैथ । एकटा कोठरीक ब्यवस्था भेलैक, सायद घरबला पुरे परिवार किछुए दिन पहिने मरिगेल छलैक । घरो एहन जाहिके भितरसँ दिनमे आकास आ रातिमे तारा निकसँ देखाजाइक ।
ओना त डाक्टर साहेब अपना हाथे कहियो भानस बनौने नहि रहथि माय हुनका एकटा भानस बनौनिहारक आवश्यक्ता रहैन । अशोरा पर बैसिकऽ किछु सोंचिते रहैथ कि एकटा भलादमी ओतऽदने जाइत नजड़ि परलैन । ओ, हुनका बजाकऽ पुछलखिन–“भाइ साहेब एतऽ एकटा आदमीके ब्यवस्था नहि भऽसकैय ? जे भानस बनादे आ बरतनि साफ कऽलेअ ।” अनचिन्हार आदमीके देखिकऽ ओ पुछलखिन “पहिने अहाँ ई कहुँ जे कहाँसँ अएलहुँ आ अहाँ के छी ?” हुनको पुछब उचित छलनि किया त ओ घटना अखन पुरान नहि भेल अछि । डाक्टर साहेब अपन पुरा परिचय कहलखिन तखन जाकऽ ओ सेहो अपन परिचय दैत कहलखिन–“हमर नाम रतन अछि, आ अहाँ एतऽ जे हमरा सभकलेल अएलहुँ ताहिकेलेल धन्यवाद । रहि गेल बात अहाँक लेल आदमी त हम देखैछी । ” एते कहिकऽ ओ ओतऽसँ बिदा भऽगेलथि ।
करिब एक घण्टाक बाद ओ एकटा बाह्–तेह् बर्षक बचियाके लेनेअएलखिन । आ डाक्टर साहेबके बचियाके देखाकऽ कहलखिन–“हे ई टुगर छै, ईहे करिब एक महिना पहिने एकर माय आ बाप दूनु एकहि दिनक आगा–पाछा मरिगेलै ।” बचियाके देखिकऽ ओ सेहो चिन्तित भऽगेलखिन आ, ओकरा अपना लग राखिलेलखिन । काज सेहो बेशी करऽके नहि रहै जे कनिको दिक्कत होइतै ।
दोसर दिन डाक्टर साहेब अपन औजार लऽकऽ गाममे रोगक परिक्षण करऽलेल बिदा भेलैथ । हुनक नजड़ि जेमहर पड़ैन, एकहिटा चिज सगरो देखऽमे अबैन – गामक सभक कपड़ा मैल, अधिक्तर बच्चा सभक मुहँसँ एकहिटा बात–“गे माय भुख लागल अछि । ” कतौ सुनऽमे अबै–“दादा हो दादा मरिगेली । ” आदि ।
डाक्टर साहेब बिमारीके जाँचऽगेल रहथि भुख सन पैघ बिमारीक ईलाज हुनकालग नहि रहैन –जे गामक प्रमुख समस्या रहै । जतऽ डाक्टरसाहेब ठाह् भऽजाथिन त लगै जेना कौआ सभक बिचमे बकुला । गाम भरिमे एकहिटा हुनके कपड़ा साफ छलनि, मुदा कते दिन ? एकटा बात त निश्चित छलै जे ई गामक एहन दशा गरिबीक कारणे भेल छल । ताँहूमे किछुलोक ओकर गरिबीक नाजाएज फाएदा लेबऽचाहै ।
गाममे घर–घर जाकऽ ईलाज करऽके क्रममे एकबेर जखन ओ बाटपर चलैत रहैथ त अबाज अएलै–“माय गे मरिगेली .....। ” बड जोरसँ ओ अबाज जे अएले सें सोचियोकऽ डर लागिसकैय । डाक्टर अबाज आएल दिश दौड़ला । घरमे पैसिकऽ देखलखिन त एकटा बाह्–तेह् कर्षक बच्चा पेट पकरिकऽ कनैत रहै । ओ एमहर–ओमहर सगरो तकलखिन मुदा शियान ओतऽ केओ नहि रहै । ताबते मधिम–मधिम खोकीके अबाज सुनाय पड़लै । ई सुनिकऽ ओ अबाज लगौलखिन “घरमे के छी ?” केश बगराके खोता सन रखने एकटा बुढ़िया अएलै त डाक्टर साहेब एकटा गिलासमे पानि लाबिदेबऽलेल कहलखिन । बुढ़िया पानि लाबिकऽ देलकै । एकटा गोटी ओहि बच्चाके ओहि पानि संगे खुवेलखिन । पाँच–सात मिनटके बाद ओ ठिक भऽगेलै । फेर ओतऽसँ ओ बिदा भेला । साँझमे ओ जखन अपन घर पहुँचलखिन त ओ टुगरी बड़ सुनरि भानस बनाकऽ धएने रहै । ओ हाथ–पएर धोकऽ भोजन करऽ लेल बैसिगेलखिन । ओ चिन्तिते अवस्थामे भोजन कऽकऽ आराम करऽ गेलखिन । हुनका निने नहि परैन । दिनमे जाँच कएल बिमारीसभ हुनक नजरिके सामने घुमैत रहैन । आ, एकहि दिनमे एकहि परिवारक चारि–चारिगोटेके मृत्यु । ओ एहि बिमारीसभक बारेके सोंचऽलगलखिन ।
बिमारी किछु नव किशिमक भेटल रहैक । किछु जल्दिसँ करऽके अवस्था नहि रहैक किया त ओहि गामसँ शहर धरि पहुँचऽलेल कमसँ कम पन्द्र घण्टा चलऽपरै । ओतऽ नहि त प्याथोलोजिक समानरहै जे किछु जाँच कएल जएतै । बिमारीसभक बारेमे सोचैत–सोचैत, ओतै बोरा पर सुतल ओहि बचियासँ पुछलखिन–“बौआ, नाम कि छो तोहर ? ” ओकरो निन त नहिए पड़ैत रहै, ते ओ उठिकऽ बैसिगेली आ जबाब देली –“जी हमर नाम सेहन्ता अछि । ” ओ फेर पुछलखिन–“ तोहर माय–बाबुके कि होइत छलौ ? ” सेहन्ता हुनका पएरलग जाकऽ बैसिगेली आ गम्भिर भऽ कहऽलगली–“ किछो नहि ......, करिब डेढ़ दू महिना पहिने बहुते लोक सभ बन्दुक लऽकऽ अएलै आ सभके घरे–घर लोकसभके कहै काज करऽ जाएला ।.....जे नइ जाइ ओकरा धमकी दै जे नहि जएतै ओ घिसरी काटिकऽ मरतै । .......बहुतो लोक त ओकरा सभसंगे चलिगेलै मुदा किछु लोक जाएके लेल तैयार नहि भेलै । सभगोटेके चलिगेलाक बाद एकटा आदमी एकटा बम फेकलकै जाहिके आबाजसँ बहुते घर टुटिगेलै आ छ–सात दिन धरि अन्हारे रहै । एतऽके लोक सभके श्वासलेबऽमे सेहो दिक्कत होइ । एतऽ एकहिटा ईनार छै जतऽके पानि सभ पिबैछै ओहूमे किछु खसादेलकै । .........एतऽ पानिके लेल आओर ब्यवस्था नहि छैक । ” एते बात कहिकऽ ओ बच्चा लगलै डाक्टर बाबुके पएर जाँतऽ ।
पएर जाँतब देखकऽ ओ सेहो उठिकऽ बैसिगेलाह आ कहलखिन “ जो तहूँ सुतऽ । ” ओ बच्चा फेर ओहि बोरापर सुतऽ चलिगेली । भोरमे सबेरे उठिकऽ एकटा आदमीके चिठ्ठी दऽकऽ स्वास्थ मन्त्रालय पठौलखिन । आ संगहि किछु दबाई आ गैससभ सेहो पठादेबऽलेल ओहि चिठ्ठीमे लिखलनि । ओकरा बिदा कएला बाद हुनका जे किछु टोल छुटिगेल छलनि ओमहर बिदा भेला ।
साँझमे जखन ओ सूचि उल्टाकऽ देखलनि त किछु बच्चा मात्र एहन छलै जेकरा कोनो प्रकारक रोग नहि लागल छलैक । आ, एकटा बात निश्चित रहै
जे रोगीसभ मरबेटा करतै आओर कोनो उपाय नहि रहै । रोगीक श्वाससँ फैलऽवाला रोगक नियंत्रन बड़ कठिन माय ओकरा सभके मरनाइए उचित बुझि ओ अपन झोरासँ बिषक सूइ निकाललैथ । आ, पहिने तैयार कएल सूचिके देखिकऽ फेर एकटा नव सूचि तैयार कएलनि जे केकरा –केकरा बिषक सुई देबाक अछि ।
प्रातः फेर ओ आओर दिन जकाँ बिमारीक देखभाल करऽ बिदाभेलखिन । मुदा ओइ दिन हुनका छटपटाति मुर्दाके मुक्ति देबऽके छलनि । आ, साँझ धरि ओ करिब अस्सिगोटेके मुक्ति दऽदेलखिन ।
साँझखन जखन ओ निबासस्थान फिर्ता अएलथि त सेहन्ता भोजन बनाकऽ हुनके बाट तकैत छली । ओ झटसँ झोरा धऽकऽ हाथ पएर धोकऽ भोजन करऽलेल बैसिगेलखिन । सेहन्ता भोजन लाबिकऽ देलकै मुदा भोजन करऽसँ पहिने हुनका उल्टी होबऽलगलनि । पेट–माथ सभमे दर्द सेहो होबऽलगलनि । ओना हुनको ओहे बिमारीक लक्षण छलनि मुदा ओ अपनेसँ बिषक सूइ त नहि न लऽसकैछलथि ।
राति भरि दर्दसँ छटपटाति, बोकरैत । मात्र तिन पहरके राति कतेको बर्ष जका अनुभव होइ । भोरमे करिब नौ बजे बहुते डाक्टर, नर्स आ पुलिससभ सेहो अएलै । डाक्टर आ नर्ससभ पहिने डाक्टर मुरली प्रसाद शर्माके देखभाल कएलखिन । हुनका निशाक सूइ दऽकऽ मात्र आराम भेटलनि ।
दोसर दिश पुलिससभके गाममे ई समाचार भेटलनि जे डाक्टरसाहेब काल्हिखन जिनका–जिनका सूइ देलखिन ओ सभ मरिगेलै । माय पुलिससभ हुनकासँ पुछऽअएलै कि एते लोक एकहिबेरमे केना मरिगेलै । ओ निसंकोच अपन समस्या कहिकऽ कहलखिन–“............माय हम काल्हिखन अस्सिगोटेके बिषक सूइ दऽदेलीऐ । ”
एमहर सेहन्ता डाक्टरबाबुके रातिभरि सेवामे लागलछली । आ, भोरमे जखन ओ पुरा ओछायनपरके बोकरल साफ कऽकऽ बैसली तखने एकटा पुलिस डाक्टरबाबुके कहलकनि–“हम अहाँके हपन हुकुमतमे लैछी । ” ई बात सुनिकऽ ओ जबाब देलखिन–“जँ अहाँके उचित लगैय त हम तैयारछी । ओ फेर कहलखिन – “अपन आवलोकन सभगोटेके समझादैछी आ एकटा बात आओर किछु बच्चा छै जेकरा कोनो रोग नहिछैक ते ओकरा सभके सेहो लऽचलऽके ब्यवस्था सेहो करु । ” सूचिअनुसार रोग नहि लागल बच्चासभके लेबऽ किछु पुलिससभ गेल । आ एमहर डाक्टर बाबु लगलखिन सभके अपन आबलोकन सम्झाबऽ । ओमहरसँ जखन ओसभ निरोग बच्चासभके लऽकऽ आबिगेलखिन तखन धरि हिनको काज समाप्त भऽगेल छलनि । तखन ओ कहलखिन –“आब चलि सकैछी । ”
दशगोटे पुलिस, बच्चासभ आ डाक्टरसाहेब ओतऽसँ बिदा भेलथि । थाकल बच्चासभके पुलिससभसेहो कोरामे उठाकऽ शहर तक पहुचौलैथ । रातिके दश बाजिगेल छलै माय बच्चासभ संगे डाक्टरबाबुके सेहो थानामे राखऽके ब्यब्स्था कएलगेलै । डाक्टरबाबु त गल्ति बड नमहर कएनेछलाह किया त जियाबऽ लेल पठाओलगेल छलनि मुदा ओ ..........., माय हुनका भोरमे अदालत मे उपस्थित कराओल गेलनि ।
अदालतमे हुनकासँ पुछलगेलनि –“डा. मुरली प्रसाद शर्मा, अहाँ एना किए कैलीऐ ? ” ओे किछु देर चुप भेलखिन तखन फेर जबाब दैत कहलखिन–“आइ तक हमर एस.एल.सी.के रेकर्ड केओ नहि तोरऽसकल अछि । तइयो बाबुजीके बड मेहनति करऽ परलनि हमर रुशमे एम.बि.बि.एसके लेल । आइ.एससी सँ एम.डी धरि टौप कऽकऽ पि.एचडी.मे स्वर्णपदकसँ विश्वबिद्यालय सम्मान कएने रहे । बहुतो अस्पतालसँ प्रस्ताव सेहो आएल मुदा हमर सोंच ई छल जे हमरा सनके डाक्टरके हमरा देशमे आवश्यक्ता अछि । सायद माय हमरा अबिते ओतऽ पठादेलगेल जतऽ पन्द्र घण्टा चलिकऽ पहुचऽपरैछैक । ......हम ओतऽ गेलहुँ ईलाज करऽ, ठिक छै , ईलाज कऽदेबै, मुदा जतऽ खाएके लेल रोटीयो नहि छैक ओतऽ दबाइ कतऽसँ अएतै । ......सरकारके सुरक्षामे खर्च करऽसँ फुरसते नहिछै आ, दबाइ त दूर जाउक ......... ओकरासभके एहन रोग छै जे एकटासँ दोसरके आ दोसरसँ तेसरके होइतजएतै । आ, धिरे–धिरे ओइ श्म्सानमे के बाँकि रहत......? ”
एते सुनिलेलाक बाद, न्यायधिस डाक्टरके प्रमाण–पत्र रद्द कऽदेबऽके फैसला सुनौलखिन । न्यायधिसक फैसला सुनिते हुनका मुँहसँ गाउज निकलऽलगलनि । ओ बेहोस भऽ खसिपरला । जाबे लोक दौड़े– दौड़े ताबे ओ ई देश नहि दुनियासँ बिदा भऽगेलाह ।

सिपाही- सन्तोष मिश्र,काठमाण्डू

“लोक कि कहैत हायत, जे बेटीके दुरागमन भेला एक वर्ष भऽगेलै मुदा नैहर सँ केओ नहि गेलै ................. एकटा बेटा अछियो त देशक भक्त ।...... बेटियो कि सोचैत हायत ।” ई बात सन्तोषक माय सोचिते रहैक की ताबते सन्तोष हाथसँ झोड़ा निचा रखैत पैर छुकऽप्रणाम कएलकै । सन्तोषक माय ओकरा मुँहपर ताकिकऽ कहैछ “बौआ रे ........... तोरे बारेमे सोचैछलहु ।”
ई सुनिकऽ सन्तोष हसऽ लगलै आ कहलकै “एह, माय तहुँ कि नहि .......।”
एते बजीते जखन सन्तोष अपन मायके मूहँपर तकलकै त आँखिमे नोर नजड़ि परलै ताहि बातपर ध्यान बिना देनहि कहलकै– “अच्छा, माय ..... चल हमरा बड जोरसँ भुख लागिगेल अछि ।”
माय भितर जाकऽ जाबे नास्ता लबैक ताबे सन्तोष कलपर जाकऽ हाथपएर धोकऽ बैस गेल रहै । माय चुरा आ दही लऽकऽ सन्तोषके देलखिन आ ओ खायलगलै । माय सेहो सन्तोषक कातमे बैसिकऽ कहलीह “हो, तहुँ निके समयपर अएलेह..... काल्हिखन सुकराति छै...........तो एतऽ सँ परसु भोजन कैलाक वाद बहिन गाम जाकऽ नौत लेबऽ चलिजो ।” बहिनगाम जएबाक नामपर सन्तोष खुस होइय आ सोचऽ लगैय अपन ओझाक पिसियौत बहिनके बारेमे जे दुरागमनमे भेटल रहैक । ओना दुनुके टोका चाली त भेल नहिए रहैक मुदा ताकाताकी खुब भेल रहैक । ओ रहबो करै एते सून्दर जे किनका नहि एकबेर नजड़ि पड़िजाई त बेर–बेर देखऽ चाहितै ।
सुकराति बड़ निकजका मनौलनि । आ प्रातः भोजन कऽकऽ सन्तोष बहिनगाम जएवाकलेल तैयार भेला । माय एकटा चंगेरीमे किछु खजुरिया, किछु पिरुकिया, आर कि दोन कहाँ दोन धकऽ एक चंगेरी पुरा देलनि । चंगेरी उठाबके चलते सन्तोष कहैछ “एहँ माय, कि धऽ देलही.........हम ओम्हरे मिठाई ललितिऐ ।”
ई छिछ कटनाई देखिक माय कहलीह– “हमरा ई सोचिकऽ दुःख लागल ........जे सबहे सिपाहि छिछकट किया भऽजाइछ ।”
सिपाहिक बारेमे एहन वात सुनिते सन्तोष जल्दिसँ हाथमे चंगेरी उठबैत चलिदैछथि । बाटमे सैनिक बसके चेक (तलाश) करैतरहै छैक । ताही तलाशक क्रममे सन्तोषक जेबसँ एकटा बन्दुकक गोलीके खोका भेटैछनि । सन्तोषके बसमेसँ उतारिक सैनिक सब पुछताछ करऽ लेल लजाइछनि । ओमहर बसक खलासी हुनक समान निचा उतारिकऽ चलिजाइ छैक । जखन सन्तोषसँ काजक बारेमे पुछलजाइ छनि तखन हुनका अपना बारेमे कहवाक मौका भेटैछनि आ कहैछथि “हम एहि देशक सिपाहिमे असई छि........आ ई खोका त हालेमे आतंकवादीसभसँ द्वन्द भेलछल ताही वेरके छै ।” एते वात कहीकऽ ओ अपन परिचय–पत्र देखबैछथि । परिचय–पत्र देखला बाद सैनिक सब हुनका छोडैछनि । बसक समय सेहो समाप्त भऽगेल छलैक । ताहीसँ हुनका चंगेरी माथपर धऽकऽ करिब तिन कोष पएरे चलिक जाए परैछनि । अन्हरिया राति, कच्ची सडक भऽसन्तोष रातिकेँ करिब दश बजे वहिनगाम पहुँचैछथि ।
तखन धरि घरक सब लोक भोजन कऽकऽ आराममे चलि गेलरहै । मात्र ओकर बहिन आंगनमे बरतन मजैत रहै तखने ओ केवार ढकढऽकौलनि ई सुनिकऽ ओ केवार खोलऽ गेलिह । सन्तोषके देखिकऽ बहिन बड खुसी भेलीह किए त हुनको सुनऽ पड़ल रहैछनि “एक साल होबऽ लगलै आ नैहर सँ केओ नहि अएलै । “ओ पुनः भोजन बनाबऽके सुरसार जँ करऽ लगलीह त ओ बहिनके हरान कराबऽ नहि चाहलकै आ कहलकै –‘भोजन कऽ लेने छी मात्र सुतऽके ब्यवस्था कऽदे ।’ हुनका आरामक ब्यवस्था भेलनि ओ आराम करऽ गेलाह ।
भोरमे सन्तोष प्रातः काल उठिक नित्य क्रियामे चलिगेल । नित्य क्रियाक वाद जखन सन्तोष स्नान करऽलेल बाल्टीन लऽकऽ दलानबाला कलपर पहुँचैछथि त नजड़ि पड़लनि हुनक ओझाक पिसियौत बहिनपर जे कल पर कपडा खिचैत छलिह । झुलि–झुलिकऽ कपडा खिचऽके क्रममे हुनक ओढनी निचा खसिपड़ल छलनि जाहिके कारणसँ हुनक गोर आ शिकार करला तानल बन्दुक सनक स्तनपर सन्तोषक नजड़ि पड़िगेलै । ओकर नजरि ओही सुन्दर स्तनपरसँ हटिते नहि रहैक । आ ओ कन्या विना केम्हरो तकैत मात्र अपन कपडा खिचऽ पर ध्यान देनेछलिह । कपडा धोब केँ क्रममे जखन ओ कन्या दोसर कपडा बाल्टीनमेसँ निकालऽलगलीह त सन्तोष पर नजड़ि पड़लनि । हुनका देखिते ओ जल्दीसँ अपन ओढनी सरियबैत कहलिह–“पाहुन, .....नहाय अएलीए ?” प्रश्न सुनिते सन्तोष कन्याक मुहपर तकैत घबराएल जका कहैछथि “....एह, हँ, हँ ।”
“ठिक छै पहिने अहाँ नहालिअ तखन हम कपडा खिचब ।” एते कहिक ओ आँगनदिश चलिगेलीह । सन्तोष नहेलाक वाद जखन आँगन पहुचैय त ओ कन्या सन्तोषक बहिन लग बैसल रहै । सन्तोषकेँ ओतऽ देखिकऽ ओ कन्या पुनः कपडा धोब चलिगेलीह । कन्याक गेलाबाद सन्तोष अपन बहिनसँ पुछलकै “ आँइ गे बहिन ..........ई के छथिन ?” बहिन हँसिकऽ जबाब दैछ “ ई तोरे ओझाक पिसियौत बहिन....... कञ्चन ।” नाम सुनिक सन्तोष बजैछथि “बाह ! एकर मुहसँ सुन्दर त .....एकर नाम छैक ।”
बहिन हसऽ लगैय । सन्तोष पुनः अपना बहिनके आगंनमे देखाक कहैए “जा, अखन धरि आगंनमे अरिपन सेहो नहि देलही ।” बहिन कने खेखैनकऽ कहलिह “कनिके देर रुकिजोनऽ .........कि ?”
“हेतै !” कहिकऽ सन्तोष अशोरापर धएल कुर्शीपर बैसिजाइछथि ।
कनिए समयक वाद कञ्चन पुनः आगंनमे अबैछथि हाथमे भिजल कपडा सँ भरल बाल्टीन आ दोसर हाथमे साबुन रहैछनि । सन्तोष पुनः कञ्चनपर ताकऽ लागैछथि । मुदा कञ्चन के अपन काजसँ मतलब रहैछैक । ओ असगनि पर कपडा पसारिरहल छथि । सन्तोष विचारैत रहैछथि जे कखन कञ्जनसँ परिचय करि । ताबते एकटा बुढिया कञ्चन के अढादैछनि आगंनमे अरिपन धरऽलेल । ओ अरिपन धर लगलीह । ओना त कञ्चन सेहो सन्तोष पर तकित रहैए मुदा एहि किसिमसँ जे केओ बुझ नहि सकै ।
रातिमे भोजन करऽला कञ्चन सन्तोषके बजाबऽ दलानपर पहुचैछथि । सन्तोष दलानपर लालटेमक टिमटिमाइत इजोतमे उपन्यास पढैतरहे मुदा पएरकें पायलक आवाज सुनिते सन्तोष उपन्यास छोड़िक बाहर ताकऽलागल । आ,
कञ्चनके देखिते ओ पूनः मुरी गोतिकऽ पढऽलागल । कञ्चन नजदिक आविक कहैछथि “पाहुन............. चलु भोजन करऽ लेल ।”
उपन्यासपर तकिते सन्तोष कहैय “कनिए देर रुकुने......., कनिके बाँकी छै ।”
कञ्चन ई सुनिकऽ सन्तोषक दहिनाकात बैसजाइय । कञ्चनके वैसैत देखिकऽ ओ मोनेमोन बड खुशी होइय आ सोचैय कि आबो जरुरे बात करबाक मौका भेटत ।
कञ्चन पुनः पुछैय “अच्छा, पाहुन ........कोन उपन्यास अछि ?”
“ई सुस्मीता उपन्यास कें मैथिली अनुवाद छै ।”
ओ पुनः पुछैछथि “आहाँक नाम कि अछि,.... पाहुन ?”
“हमर नाम आहाँके बुझल होएत ।”
“नहि, कहुने ।”
“हमर नाम सन्तोष कुमार झा अछि ।”
“आ शिक्षा ?”
“छोरु, शिक्षा बड कम अछि ।”
“कहुने”
“हम स्नातक प्रथम वर्षमें नामांकन कराक छोड़िदेलहु ।”
कञ्चन फटाफट प्रश्न पुछनेजारहल अछि मुदा सन्तोष प्रश्न करऽबाक हिम्मत जुटाक व्यंग करैत पुछैछथि “ओना .........आहाँक नाम कि अछि, कञ्चनजी ?”
“हमर नाम............।” एतबे कहिते कञ्चन चुप भऽ जाइछ ।
आ दुनुगोटे हँसऽ लगैय । तखन हँसिते दूनु गोटे आंगन दिश प्रस्थान
करैत अछि । सन्तोष भोजन करऽ ला बैसैय । ओत, कञ्चन, ओकर माय आ सन्तोषक दिदी सेहो बैसल रहैछथि । कञ्चनकेँ माय बजैछथि “कि करबै पाहुन, ...............बहिनोइ नोकरी परसँ आयल रहितनि त संगे बैसतनि मुदा...।”
सन्तोष कोनो प्रकारक प्रतिक्रिया नहि व्यक्त करैछथि आ ओ चुप चाप मुरी निहुराकऽ भोजन करैतरहै छै । ताबते बुढ़ी पुनः पुछैछनि “पाहुन, आहाँक विवाह त.......अखन नहि भेल होएत ?”
एते सुनिते सन्तोषके वाजसँ पहिनही हुनक बहिन कहैछथि “नहि त ...... मुदा आब त कर परतै ....... गाँमपर माय असगर भ जाइछथि ।”
सन्तोष भोजन कऽकऽ आराम कर दलानपर चलिजाइछथि । रातिमे सन्तोषक बारेमे कञ्चनक माय सब किछु पुछैछथी मुदा ओ ई त पुछबेनहि करैछथि कि सन्तोष कोन काज करैछथि । सब किछु पुछलाक वाद बड गम्भीरता पूर्वक ओ सन्तोषक बहीनसँ कहैछथि “ए कनिया.......जौ अाँहा पाहुन सँ कञ्चनियाकेँ विवाह करबा दितहु त बड गुन होएत । जे जेना तिलक गनऽ परतैक हम त गनबेकरबैक ।” एमहर कञ्चन अपन विवाहक बारेमे सुनिकऽ खुशी होइय आ रातिमे सन्तोषके बारेमे सपना से हो देखलीह ।
भोरमे सन्तोष अपन गाम जाएलेल तैयार होइए मुदा हुनक बहिन एकदिन रहऽला आदर करैछनि ।” गामपर छठि सेहो अछि ।” कहिकऽ वातकेँ टारैत सन्तोष अपन झोड़ा लऽकऽ निकलैय । कञ्चन हुनका अरियातऽ लेल हातसँ झोड़ा लऽकऽ आगुबढैय । दलान सँ कनिक आगु गेलाक वाद कञ्चन गम्भिरता पूर्वक सन्तोषके कहैय –“आब अपना दुनुकेँ कहिया भेट होएत से ठेकान नहि अछि मुदा माय कहै छलीह जे छठिके परात त भदवा रहैछैक आ तकर बाद बाबुजी अहाँक गाम पहुँचता से ध्यान देबै ?”ऐते कहलाक बाद जे ओकरा अाँखि जे कहैत रहैछै से ओकर मुह कहि नहि पबै ।
माय, ई सुनिक सन्तोष कहैय “देखु ! भगवान की कराबऽ चाहैय । तैयो ठिके छै हम प्रतिक्षा करबनि ।”
कनि आगु चलिक कञ्चन रुकलीह आ कहलीह– “आब आँहा जाउ, .............हम एतै सँ विदा होइछि ।” सन्तोष कनेक मुसैक कञ्चनके हातसँ झोरा लकऽ गम्भीर भऽ जाइछैक आ दुनु एक आपसमे आगु बढैत पाछु तकैत अपन–अपन दिशातर्फ चलिदैछ ।
कञ्चनकेँ माय जखन ओकर बाबुजीलग वियाहक चर्चा करैछथि त बाबुजी सेहो सहमति जनबै छथि । ओना हुनको इच्छा रहैछनि जे बेटीक वियाह नेपालमे करी । ओ पुरा तैयारी भऽ असगरे नेपालक सर्लाही जिल्लाक खैरवा गाम पहुँचैछथि ।
बाटमे एक आदमी माथपर धानक बोझा लऽकऽ अवैत रहैछथि । ओ आदमी आर केओ नहि सन्तोष अपने रहैए ओ सन्तोषके रोकिकऽ पुछैछथि “हे यौ भाइसाहेब .....सन्तोष झाके घर कोन थिकै ?”
सन्तोष झा हुनकापर ताकिक कहैछथि “चललजाए हमरे संग,......कनिके आगा छैक ।” दुनु गोटा चुप्पेचापे कनिक आगुतक चलैय आ पुनः कञ्चनके बाबुजी पुछैछथि “अच्छा, एकटा चिज कहल जाए .......हुनका कतेक जमिन–जत्था हैतनि ?”
“इहे करिब ३ विग्घा जते छैक ।”
कने सोचल जका करैत कहैत छथि “ऐ ... आ सन्तोष कोन काज करैय ।”
“ओ नेपालक पुलिसमें असइ छथि ।”
ओना त ओ असइके अर्थ नहि बुझलनि मुदा पुलिसक अर्थ बुझिगेलाह । आ पुलिसक नाम सुनिते ओ रुकिक कहलनि “भाई साहेब, अपने चललजाय ........हम अबैत छी ।”
माथपर धानक बोझा धएने सन्तोष इहो नहि कहऽ सकल कि सन्तोष ओहे छथि । कञ्चनके बाबूजी ओतै सँ अपन घर फिर्ता भऽ जाइछथि । गाम पहुचिकऽ निराश भ बैसिजाइछथि । कञ्चन बाबुजीके देखिक काकाक अगनासँ माय के बजाबऽ गेलीह । माय जल्दिसँ अबिकऽ कञ्चनके बाबुजी सँ पुछैछथि “कि भेल वात पटल कि नहि ।”
ई सुनिते कञ्चनके बाबुजी आवेशमे आबिजाइछथि आ कहैछथि “जखन भोरे–भोर रेडियो खोलैछि त समाचार मे नेपालके वारेमे सब दिन एक्कहिटा वात सुनैछि फल्ना ठाम माओवादी सिपाहिके द्वन्द भेलैक । फल्ना ठाम एते सिपाहि मरिगेलैक । फल्ना ठामक चौकीमे बम फेक देलकै । मतलब अखनकेँ समयमे सिपाहिके माय कखन निपुत्र भऽ जाएत सिपाहिक कनिया कखन विधवा भजाएत कोनो ठेकान नहि ।”
ओ पित्त सँ थुक घोट लगलनि, आँखिमे नोर भरि जाइछनि आ मन्द स्वरमे पुनः कहलनि –“ए, कञ्चनके माय ! एतेक सम्पत्ति अछि, एते सुन्दर बेटी, कोनो हम अपन बेटी सँ स्नेह नहि करैछी हम बेटी के निक ठाम वियाह करब मुदा नेपालक सिपाहि सँ नहि करब ।”
बाबुजीक एहन बात सुनिकऽ कञ्चन दू–तिन दिन तक खान–पिअन त्यागिक बैसिगेलीह । माय ई वात हुनक बाबुजीकेँ सुनौलीह त ओ बेटीके कतबो सम्झझौलनि मुदा बेटी त वात बुझ्बेनहि करै । ओ मात्र एते कहैछथि “प्रित त किछ नहि देखैछैक ।” ओ बड जीद करऽ लगलीह त हुनक बाबूजी पुनः सन्तोषक घर जाएवाक लेल तैयार होइछथि । ओ पुनः सन्तोषक गाम पहुँचलनि । ओ जखन सन्तोषक दलान पर पहचैछथि त सन्तोष खह् लऽकऽ वैललग जाइत रहथि । कञ्चनके बाबुजी हुनका कहलनि– “सुनलजाय ।”
सन्तोष हाथमे पोआर लेनहि रुकिकऽ हुनकापर ताकिकऽ कहैछथि “जी कहलजाय, ...हम कि सेवा कऽ सकैछि ?”
“अपने सन्तोषजी, छिए कि ?”
“जी ! मुदा अपने ?”
“हमर घर हाटी, हम कञ्चनके.......बाबुजी ।”
सन्तोष खह् आतै छोड़िकऽ हुनक नजदिक अबैछथि आ जल्दी सँ पैर छुकऽ प्रणाम करैत हात पकरिकऽ भितर बैसाबऽ लजाइछथि । सन्तोष आँगन जाकऽ पाहुनके बारेमे अपन माय के कहैय । माय जलपान आदी बनाबमे लागिजाइछथि । माय पाहुनके लेल जखन जलपान लऽकऽ अबैछथि त जलपान खाइत ओ सन्तोषक मायके सुनाकऽ कहैछथि– “हम त सन्तोषक घटक बनिकऽ अएलहु ।”
ई वात सुनिते सन्तोषक मुरी निचा निहुरि जाइछनि आ ओ भितरे भितर एते खुस भऽ जाइछथि जैके केओ नापि नहि सकैय आ नहि त ओइके केओ लेखक लिखऽ सकैय ओ पुनः कहलाह –
“अपने सब जे किछ कहब हम दऽ देव मुदा एकटा आग्रह जे सन्तोषजी के सिपाहि क नोकरी छोड़ऽ पड़तनि बरु ओ गाममे बैसिक व्यापार आदि करौथ जे जेना करऽपरतै हम कऽ देबनि ।”
नोकरी छोड़ऽ के नाम सुनिते सन्तोष सोच लागल– “वाप रे ! जौ एहने सब व्यक्ति भऽ जाइ त देशके कि हालत हेतैक.................. कि हालत हेतै ?”

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...