Tuesday, November 04, 2008

जखन कनिञा भेलखिन बिमार - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

जखन कनिञा भेलखिन बिमार

हँ मैथिलके मात्र कि कहू, एतऽ सब ऐरे–गैरेक बियाह होइते छैक । चाहे ओकर मुँह थुराएल अल्हुवा सन होइक चाहें शिताएल नढ़ियासन । खैर, बियाह त भऽ जाइ छनि मुदा किछु बातक लेल जिनगि भरि सेहन्ता लागले रहि जाइ छनि । मोनमे बेर–बेर होइत रहै छनि –

‘हमरो एहन होइत....’

मुदा कि ? भाग्य अप्पन–अप्पन । ठिक ओहिना, हमरो बियाहक एते बर्ष बित गेल । मुदा .......। संगीसभ भेट हुए त सब अप्पन–अप्पन कनिञाक बिमार होबऽ बला खबरि बैसख्खा घेरा जकाँ मूँह बनाकऽ सुनाबऽ लागै । हमहुँ सेहो बैसख्खा सजिमन सन थुथुर बनिकऽ सुनऽ लागी । कतबो धाहसँ सिद्ध होबऽ के बाते नहि । किए त हमर कनिञा कहियो बिमार पड़बे नहि करथिन्ह । ओ त अपने पहलवान, पुलिसमे असइ रहथिन्ह । संगीसबहक बात सुनिकऽ एकहि बातक सेहन्ता लागए आ मने मने एकहि बात कही-

"रुक ! भगवान एक दिन हमरो दिन सुदिन करथिन्ह , हमरो कनिञा बिमार परथिन्ह ।"

आ, एक दिन भगवान हमर मनक बात सुनि लेलखिन । जखन हम अफिससँ घर अएलहुँ त जुत्ता खोलिते समय मे मधुर–मधुर आवाज आएल –

"माइ गे माइ ....... बाबुहो बाबु’

के मधुर अवाज सुनिकऽ हमर मोन गदगद भऽगेल आ, हम खुसी भऽ जल्दीसँ घरमे पैसलहुँ । आ, हुनकासँ पुछलियनि –

"कि मोन खराब भऽगेल ।"

कुहरैत उठली आ कहली-

"मोन खराब होए दुसमनके, हमरा त पिठमे कि नहि कि भऽ गेल से दुखाइए, यौ ।"

ई बात सुनिते हमरा लागल जेना हमरा लौटरी परि गेल । मन त खुसीसँ गदगद भऽगेल। हमहूँ कलाकार, कला प्रस्तुत कऽ कऽ ई जरुर अनुभव करा देलियनि जे हम दुःखी भऽ गेली । आ, दुःखी मुद्रामे कहलियनि –

"कोनो निक डाक्टरसँ जचाँ लेव त......?"

ओ कुहरैत हमरा मुहँ पर ताकि बजलिह –

"डाक्टरके घरेमे बजा लेब त नहि होएत ?"

घरमे त डाक्टरके बजालेब ..... ठिके छैक, एकटा डाक्टरके नंम्बर त डायरीमे अछि हुनके बजा लै छियनि । फोन डाएल कएल मुदा फोनक लाइन त कटल छलैक । एकटा डाक्टरक लाइन कटल देखकऽ किछु नहि फुराएल । हम चुप्पेचाप किछु देर धरि ओतै बैसल रहि गेलहुँ ओ हमरा बैसल देखकऽ कने झसकिकऽ कहली–

"सुनै नै छी, जल्दी जाउ न, ............नहि त हम मरि जाएब ।"

ई सुनिकऽ हम आओर हर्षित भऽ गेलहुँ, मुदा कि करु ओहन शुभ दिन अप्पन भागमे कहाँ लिखल छैक ? हम त खुसी भऽकऽ सोचऽ लगलहुँ जे बात किछु आओर रोचक भऽ जएतै जखन हम अप्पन संगी सभके ई खुसीक खबरि सुनएबै । ताबते जेना केओ अनचेकेमे लुत्ती सटा देए तेहने आवाज आएल –

"कथि मुँह तकै छी......जलदीसँ जाउने आ सप्तरीवाला डा. रोबिन मिश्रके टिचिङ्गसँ बजौने आउ ।"

हम कहलियनि –

"हँ, हँ हम तुरत्त गेली आ अएली ।" कहऽ लेल त एते कहि देलियनि ।

बाबूजी कहै छलखिन–

"बचने किए दरिद्रता ।"

मुदा मोन तऽ गदगदाकऽ फटकार लगौलक–

"डाक्टर त बादमे पहिने संगी सबके खुसीक खबरि त सुना दिऐ ।"

आंगनसँ जखन बाट पर अएलहूँ त सोंचऽ लगलहुँ –

"केम्हर जाउ ... एम्हर कि ओम्हर ....."

हम त बड़ मुसकिलमे पड़ि गेलहुँ जे आखिर केम्हर जाउ ? खैर, एक बेर ओकरो बकैस दै छी .... पहिने डाक्टरेके बजा दै छी । बिभिन्न बात सभ कल्पना करैत जखन डाक्टरक घरपर पहुचलहुँ त ओ घरे पर रहथि । ओ हमरा देखिते पुछलैथ –

"कि होइए कहू ?"

हुनका जखन सभ किछु कहलियनि त हुनको जेना लौटरी परि गेलन्हि तहिना ओ अप्पन झोड़ा लऽकऽ हमरोसँ आगु–आगु दौरय लगलैथ किए त काज त भेटबे नहि करै छनि । कारण ई कि डाक्टर सबहक पेटपर लात मारनिहार बाबा रामदेब जे जिबते छथि । हम हुनकर सर्ट पकड़िकऽ तनैत कहलियनि –

"हे भाइसाहेब, बिमारी कोनो खासे सिरियस नहि छैक ....... कने आरामसँ चलु ।"

हमहुँ मोट आदमी,ओते जल्दी चलब आ कहुँ हम अपने बिमार पड़ि गेली त कि होएत ? ..... मोनक ललसा कहियो पुरा नहि होएत । डाक्टर संगे जखन घर पहुँचलहुँ त देखै छी पड़ोसी सभमे केओ भरि–भरि गिलास चाहे लऽ कऽ बैसल त केओ भन्सा घरसँ अबैत । हाल–चाल पुछनिहारके आदर–भाव देखकऽ किछु नहि फुराए । किनका रोकियनि आ किए रोकियनि ? भगवान बहुत दिन बाद ई मौका देखऽ देलनि अछि । एकटा कहबी छैक–

"खुसी बटलासँ बढ़ै छै ।"

डाक्टर साहेब रोगीके खुब निक जकाँ तकलनि मुदा रोगी त भेटऽके बाते नहि, किए त रोगी आह–उह, गे माय गे माय, उहुहु’ करैत चाह बनाबऽपर लागल रहथिन । ओना सच्च जौ कहऽ पड़े त एते परोशी सभ हमरा बियाहमे सेहो नहि आएल रहथिन । नहि जानि ई किए ? माय त हमर नंगटीनी नहि छथि ............. मुदा कनिञा सूनरि जरुर छथि । ताबते एकटा परोशी बाजल –

"कि रे घनचक्कर दास ! आइ सबेरे चलि आएल छे ?"

मोनेमन सोचलहुँ सबेरे नहि आएल रहितहुँ त तोरा सन चोट्टासँ केना भेटघाट होइत । सरबा रहे हमरे कनिञा लग सटिकऽ बैसल । माय हमर मुँह दुसैत कहलनि–

" हँ, आई एहि घनचक्कर दासके तकदीरमे चक्कर लगाबऽके लिखल छैक त कि करौक ?"

एते दुःखीक अभिनय करैत बाजल आवाज सुनिकऽ ओ बाजल –

"मुदा , अहाँ एना किए बजैछी ?"

चोट्टा, सायद ई बुझि गेल जे हमर शुभश्री मुँहसँ ओकरे लेल आर्शीवाद निकलैए । खैर, हमरा त अप्पन कनिञाके जनाबऽके छल, ते हम अप्पन खुसीके मगरकच्छके नोरमे भिजाकऽ कहलीए–

"किए नहि बाजु, आइ हमर प्राण प्रिय बिमार भऽगेली ।"

चाहक घुट लऽकऽ लोल चटपटऽबैत फेर पुछलक–

"ई केना भेलै ? कहियासँ ? किया भऽगेलै ?"

गुरुजी बेर–बेर कहै छलखिन–

"प्राक्टीस मेक्स परफेक्ट द मैन ।"

एहि प्रश्नसँ हमरो पूर्णता आबि सकैय ते हम कला प्रस्तुत करैत जबाब देलीए–

"अरे, जखने हम अफिससँ अएलहुँ कि .....................।"

बात पूरा भेलो नहि रहे कि एकटा परोशी बिचेमे बाजल –

"लिअ सर हम जाइछी ।"

ओकरा जाइत देखिकऽ हमरो मोन अपनामे पूर्णता आबऽके अनुभव कैलक ताहि कारण ओ भाइ साहेब एतऽसँ बिदा भेलथि । सबहे दिन एकर सबहक बात सुनिकऽ हमहुँ थाकि गेल रहि । आब मुदा तराजुक दूनु पलरा बराबर भऽ गेलै । ताबे डाक्टरसाहेब जोरसँ कहलखिन –

"कहाँ गेली .... ई दबाई कने जल्दीसँ लाबिकऽ दिअ ......साँझ धरि सभ ठिक भऽ जएतै ।"

डाक्टरसाहेबक बात सुनिकऽ हमरा मुँहसँ निकलिगेल –

"कोनो जल्दी थोरहे छै ।"

ताबते चाहक चुस्की लैत परोशनी बाजलीह–

"देर करब उचित नहि ।"

हमहुँ ओकरे आबाज निकालिकऽ मुँह दुसैत कहलिऐ –

"हमर कहबाक मतलब छल जे दू मिनट आराम कऽ लै छी ।"

एते कहिते ओ कप टनटनऽबैत निचा राखिकऽ- "हुँह" कहलीह आ बिदा भऽगेलीह । कनिञा त पलंगपरसँ जेना हमरा घोटि जएती तेना परल परल देखऽ लगली । हम दबाइ लेबऽ बिदा भेलहुँ । हमरा ओम्हरसँ अबिते गामबाली दाइ पुछलखिन–

"कनिञा, मोन केहन बुझाइए ?"

हँ एहनेके छुछ दुलार कहै छै । नकारात्मक संकेत करैत ओ मुरी हिलऽएली । मतलब साफ रहै-

"ठिक नहि अछि ।"

कनिञाके कुहरैत छटपटाति देखिकऽ मजा लैत रही । ताबते हमर परम मित्र रंजित पहुँचि गेल । चारु दिश ताकिकऽ ओ पुछलक–

"कि भेलै भौजीके रे ? केओ जे ई प्रश्न पुछए त मोन त गदगद भऽ जाए । मुदा ओतै रही । आ, ओहुना पुलिस सभके मुँह आ हाथ दूनु छुटल रहै छै । माय हम सुखाएल भन्टासन मुह बनाकऽ कहलनि–

"बिमार भऽगेली रे हे"

आ जाबे किछु बाजे ताबे ओकर हाथ पकरि कऽ बाहर लऽ गेलीए । ओ हमर हाथ छोराकऽ पुछलक –

"डाक्टर कोन बिमारी कहलकै ?"

हमरा ओकरासँ कोनो बात करऽके मोन नहि करे माय। हम कहलीए–

"रे हमरा याद त नहि अछि कथि दोन संस्कृतमे कहने छलैए ।"

ओ पिताकऽ बाजल–

"केना नहि बिसरबे ............ तोरा त ध्यान रहै छौ रिसेप्सनिष्ट छौरीपर ।"

हम चारु दिश ताकि कऽ कहलीए –

"चुप..चुप ।"

कने देर चुप भेला बाद, मोनक बात निकलि गेल । ओहुना बहुत देरसँ मोनमे छटपट्टी रहे जे ई बात ककरा सुनाउ । ते ओकरा सुनाबऽ लगलीए–

"सच्च पुछैछे त रंजित भाइ, दबाइ किनलाक बादो मोन होइ छल जे फेकदी । कहुँ ओ चोट्टी ठिक नहि भऽ जाए ।"

एते बतियाति जहिना घरमे पैसलहुँ त ओकर बड़का भैया पलंगपर बैसिकऽ परौठा आ भुजीयाक प्लेट हाथमे लेने बकरी जकाँ पाउज करैत रहे । हम ई देखि कऽ थकमका गेलहुँ, आखिर ओ साहबनी गेली कतऽ ? ताबते पाछुसँ हमरा डाड़पर एक छोलनी लागल, छोलनी धिपल सेहो रहै । हम छिलमिलाइते बाहर भगलहुँ आ आब मात्र प्रतिक्षा करऽ लगलहुँ कि ओ अफिस कखन जएतीह ।

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...