Saturday, November 01, 2008

कारी पौलनि करिखा- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

कारी पौलनि करिखा

भोगेन्द्रजी अपन गामक आंगुर पर गनाए बला धनीक मे सँ छथि । ओना त भोगेन्द्रजी बेशी पढला–लिखला नहि मुदा अपन दुनु पुत्र सुबोध आ विनोदकेँ एम. ए. तक पहुचैलनि । भोगेन्द्रजीक पुत्री आशा जखन आइ.ए. पास कऽ लेलनि तकर बाद हुनका लेल बर तकाय लगलनि। वर भेटलनि । गामक धनिक आ बि.ए. अनर्स कैल बरक माँग भेलनि तीन लाख पचहत्तर हजार भा.रु. । बड धुमधाम सँ विवाह भेलैक आ साते दिनपर विदागरी सेहो ।
आशाक स्वभाव आ विचारकेँ बारेमे जते वर्णन कैल जाए कमे रहत । आशाक स्वभाव सँ सब गोटे बड खुसी रहथि । समय वितैत गेल । आशाक गर्भ सँ एकटा पुत्रीक जन्म भेलैक । आशाक बर (बलराम) के कनिको अपनेसँ किछु अर्जन करय के चिन्ते नइ । पाईके जौं जरुरी बुझाय तँ गहना त छलैहे । भोर आ साँझ बिना दारुके नहि रहऽ वाला बलरामकेँ आशा कते सम्झा वुझाकऽ किछ अर्जन करबाक हेतु धनवाद पठौली । करिब डेढ महिनाक वाद बलराम गाम अएलाह । अगहन मास रहैक । दौनी, कटनी सब सेहो करबा के छलैक । मुदा एको सप्ताह नहि वितलै । बलराम तैयार भेलाह फेरु जएवाक लेल । आ आशाके सेहो चलए लेल कहलनि । बलरामकेँ बाबुजी घरक काजक बारेमे कते समझौलनि मुदा बलराम किछु मानऽ लेल तैयार नइं भेलाह । अन्ततः आशाके जाएबाक लेल तैयार होबहे परलनि ।

तीने दिन बितल रहैक बलरामकेँ गेला । चारिटा पुलिस सबसँ पुछैत रहैक बलरामक घरक बारेमे । ओमहर सँ अपन गम्छा मे तरकारी बन्हने बलरामक बाबुजी अवैत रहथि । एकटा पुलिश हुनकें सँ बलरामक घरक बारेमे पुछलकनि । बलरामक बाबुजी अपन परिचय देलथि । तखन जा कए ओ पुलिस सब कामेश्वर (बलरामक बाबुजी) के सब बात कहलनि आ ई सब सुनिते ओ लगला छाती–कपार पिटक कानऽ । कनिते–कनिते आँगन अएलाह आ कामेश्वर बाबुकेँ कनैत देखिकऽ घरक सब गोटा लग आबिकऽ सेहो कानय लगलाह । आ कनिते–कनिते बलरामक माय पुछलनि-

“आहाँ किया .......कनै छी ..........?”

कामेश्वर बाबु जवाब देलनि-

“कनियाँ त......... ट्रेनमे पिचा गेलीह ।”

किछ पत्ता लगावक क्रममे ओहि पुलिस सबमे सँ किछु आशाक नैहर गेल । भोगेन्द्र जी सँ भेंटक पूरा घटना बतौलक । ई तँ सुनिते भोगेन्द्रजीक देहमे झुनझुनी भरि गेलनि आ गारा भुकुर सेहो लागि गेलनि । पुलिस भोगेन्द्रजी सँ पुछलक–

“..........आहाकेँ किछ कहवाक अछि ?....... बलराम त थानामे अछि ।”

त भोगेन्द्रजी जवाब देलनि–

“जी .......नहि हमर बेटिए बदमाश छल ।”

आशाकऽ नैहर पहुँचल पुलिस सब आशाक सासुर पहुँचल आ ओ कामेश्वर बाबुकेँ हथकड़ी लगाकऽ गामसँ लऽ गेलनि । गामसँ आगु एकटा बजार छलैक ओत स एकवेर कामेश्वर बाबु फोन कैलनि तँ ओहि पुलिस सबके एकटा आदेश भेटलैक जे ओ हथकड़ी खोलिकऽ इज्जतक संग लऽ जाइथ । पुलिस सब कामेश्वर बाबुकेँ इज्जत सँ थाना लऽ गेलनि ।

थानामे कामेश्वर बाबुक नजरि अपन पोती पर पड़लनि। ओ एक–एकटा कऽ मुरही पात परसँ विछ–विछक खाइत रहैक । कामेश्वर बाबु तुरते दुध मंगवौलनि आ वाद मे वेटालेल सेहो बहुत पाई खर्च कैलनि तखन जा कए हुनक वेटा थाना सँ छुटलनि । कामेश्वर बाबु अपन वेटा, आ पोती दुनुके लऽ कऽ गाम जाइत रहथि । वाटमे एक ठाम जखन ट्रेन रुकलैक तँ कामेश्वर बाबु अपन भेटासँ पुछलनि-

“तोहर .....सर–समान कि भेलौं ?”

बलराम बड सान सँ जबाब देलकै-

“बेचलिया । आ........ गहना नहि दिया तो ट्रेनमे धकेल दिया ।”

कामेश्वर बाबुके ई सुनिक बड दुःख लगलनि आ ओ कहलनि-

“जो ! रे कुपात्र । ......... तु जे मैरते त हम नौहकेश नहि करैबति ।”

गाममे सगरो ई बातक चर्चा भेलै आ अहि बेटाक कारण गामक लोक हिनका–सबकेँ बारि देलनि । लोकसब घृणा करऽ लगलनि ।

एक राति करिब बारह बजे बलराम चिचियाति घर सँ भागल । आ दलानपर अबैत–अबैत ओ बेहोस भऽ खसि पड़ल । हल्ला सुनि कय बलरामक बाबु आ माँ दुनु बाहर निकललनि । अन्हारक कारण सँ किछ सुझबो नहि करै । तावते मे एकटा महिला हाथमे लालटेन लेने, धोघ तनने अवैत रहै छै । इजोत पर बुढा–बुढी अप्पन बेटाकेँ देखलनि आ बेटाक दिस दौड़लनि । बेटा लग पहुँचते अन्हार फेर भ गेलैक । ई देखि कए बलरामक बाबुजी परोसी धामीके बजाब गेलाह । मानवताकेँ प्रथम स्थानपर रखैत ओ धामी अपन कर्तब्य पुरा करऽ अबए छैक । बलरामकेँ देखक धामी भुतक आशंका व्यक्त करैत छैक । तावतेमे फेरु बलराम होसमेँ अवैत छैक आ खुब जोर जोर स हल्ला आ बदमाशी कर लगैछै । हल्ला सुनिकऽपरोसक दु–तिन आदमी आरो अवैत छैक आ बलरामके बान्हिक राखि दैत छैक ।

दु–तीन आदमी सँ बलरामके जचाँबऽ लेल राँची ल जाइत छैक । डाक्टर के कहलापर पागलखानामे बलरामके भर्ना कर परैछनि ।

सुभद्रा- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

सुभद्रा


सुरजक बाबुजीक मरलाक बाद ओकर माँ पागल भऽ गेलैक । बाटपर किछु-किछु बरबड़ाति रहैत छैक । सुरजक बहिन सुभद्रा सँ ओकर भौजी घरक सवटा काज करबऽबैत छैक । घरमे कपडा धोअ सँ लऽकऽ भोजन बनाबऽ तक आ बाहर खेत सँ खरिहान तकके काजकरऽ मे ओ एकोवेर नहि, नहि कहैत छैक । सुरजकेँ व्यपार पेशासँ सम्बन्धित होब केँ कारण सँ फुरसत तँ रहै नहि छनि मुदा जखन ओ घरपर अबैत छथि तँ सुरजक कनिया सुभद्राक बारेमे शिकायत करै छलीह जे उपराग लोक सुनबैयऽ आ से सब कहैत रहैत छलीह ।

एक दिन सुभद्राक सहेलीक दुरागमन रहैत छैक । सुभद्रा सबेरे घरक काज ओरियाकऽ अपनो तैयार होइयऽ । जखन सुभुद्रा दुरागमनमे जाएवाक लेल अपन भौजी सँ कहैय-

“भौजी !.... आजु मंजुक दुरागमन छैक । हम देख जाइत छी।”

भौजी मुँह ऐठकऽ जवाब दैछ-

“कोनो जरुरी नहि......... घरक काजसब करऽकेँ छै ।”

“नहि भौजी,........... हम त जाएब आ,...... घरक काज सब ओरिया लेने छिऐ ।”

“घरक काज जौ भऽ गेल छै त जाकऽ बारीमे पानी पटा दिअ ।”

"मंजुक दुरागमन फेर नहि होयतै । ताहि सँ हम जाइ छी ।”

एते कहिकऽ सुभद्रा आँगन सँ चलि दैअ ।

सुभद्रा त चलि जाइए । मुदा पाछासँ सुभद्राक भौजी कहिते रहि जाइछै–

“नइ छै जाएकेँ, ........सोइचलिअ !!!”

रातिमे जखन सुरज आँगन अबैयऽ त अविते नजरि चुल्हि पर पंरै छनि । ओतय चुल्हि फुटल आ बरतन सब ओङ्गघरायल रहैत छैक । ई देखि कय सुरज अपन कनियाकेँ बजबैत छथि-

“......गामबाली !! गामवाली !!”

सुरजक आवाज सुनिकऽ गामवाली घर सँ कुहरैत निकलैछै । गामवाली के देखि कए सुरज गामवाली सँ पुछैत अछि-

“ई........सब कि छै ? ....हँ.....।”

कुहरैत गामवाली जबाव दैछ “आहाके त किछ बुझले नहि रहययऽ,........ घरक वेटी विगैर गेल आ, आहा चिन्ते नहि करैछी।”

सुरज ई सुनिक फेर पुछैयऽ-

“.............ई अहाँ कि बजैछी ?”

“हँ हँ ईहे कहब कि, सुभद्रा दिनमे चारि-पाँच बेर खेत दिस जाइए । आ आब....... हमरा एना बुझाइए कि सुभद्रा क पेटमे केकरो.......”

ई सुनिक सुरज अपनाके रोक नइ सकैयऽ आ अपन गामवालीकेँ एक थापड़ मारि दैअ ।

फेर गामवाली कानिक कहैयऽ-

“आ.......... ई हे वात पुछली त .......हमरा पर हाथ उठौलक आ चूल्हि फोड़ि देलक ।”

सुरजकेँ अपन प्रतिष्ठाक चिन्ता लागि जाइत छैक । सुरज घरमे जाकए ओछायन पर बैसिकए लगैयऽ अपन प्रतिष्ठाकेँ बारेमे सोचय । कनिके वेर बाद सुभद्रा सेहो अबैयऽ । कोनो बेशी अबेर नइ भेल रहैछ । सुभद्रा डिवियाक तिलमिलाति इजोतमे भैयाकेँ देखिकय भैया लग जा कय पुछैयऽ–

“कि भेल भैया ?”

सुरज सुभद्राके एक थप्पर मारिकऽ घरमे पठा दैछ । सुरजके अपन प्रतिष्ठाक चिन्ता लगैछ हरान करऽ कनिक देरक बाद सुरज बाहर चलि जाइय । करिब बारह बजे रातिके बाद सुभद्राक कोठरीक केवार ढकढक होइछै । ई सुनिकऽ सुभद्राक मनमे ई होइछ जे भोजन करऽ लेल भैया जगाबय आएलनि । जखन सुभद्रा केबार खोलैछै कि एकटा मर्द ओकर मुह आ हाथ पकड़ि लै छै । आ फेर दुटा मर्द दुटा लाठी लऽकऽ घेउटके उपर निचा धकऽ दावि दैछै । सुभद्राकऽ घेघीयाति आवाज ओकर मा केँ कानमे परैतछै । । त बुढिया बाहर निकलिक हल्ला करऽ लगैछै-

“बाबु सब हो बाबु सब................हमर बेटीके मारैय हो....बाबु सब ।”

मुदा पागल बुढियाके बात केओ नहि सुनैय । आ, सुभद्राक लाश के सबगोटा नदि किनार लऽकऽ जराबऽ जाइछै ।

नदिपर पहुँचि कए ओहिमे सँ एक आदमी कहैत छैक-

“एकर पेट चिरि कऽ देख । कही...... सुरजा झुठ तँ नहि कहलकौ ।”

सुभद्राके मरला बादो ई सब सुख नहि दै छैक । पेट चिरकऽ देखैछैक । मुदा ओकरा पेटमे खएला खाना छोड़ि कय किछ नई भेटैछै । ओ फेर कहैय-

“साह्,....... वौह के वातपर होतै मरबौने होतै ।”

दोसर कहैय-

“हो........अपनासबके कथी लगैछौ ।”

पहिले वाला आदमी कहैय-

“एकर हाथपैर काटि नदैछी नहि त.....भुत भ हरान करतै ।”

हाथ पैर काटिकऽ ओकरा जरादैत छै । आ, भोर होइत–होइत सुभद्रा नामक इतिहास बनि जाइत अछि । आब ई वात गाम मे एक कान सँ दोसर कान आ दोसर सँ मैदान भ जाइछ । गाममे पुलिस अबैय । सहरजमिनमे ई प्रमाणित सेहो भऽ जाइछ जे सुरज अपन बहिनके मरबौलक। सुरज के अदालत २० वर्षक जेल सजाय दैत अछि ।
सुरजकें जेल गेलाक बाद गामवालीके मनमोजी भऽ जाईछ । जे मनमे अबैछ से करैय ।

सुरजके स्वभाव के कारण सँ १५ वर्षमे बाँकी सजाय माफ भ जाइछ । सुरज अपन गाम पहुँचैत छैक ।ओना समय त बड बदलि गेल रहैछ । गामक ईनार भसि गेल रहैछ । बहुतो गाछ सुखि गेल रहैछ । आ लोक सबहक आदत सेहो ।

अपन आँगनमे पहुचते देखैयऽ घरमे सँऽ एकटा मर्द हसिते निकलैय आ वैके पाछा ओकर गामवाली सेहो । सुरजके देखिते ओ मर्द त टाटके दोग दने भागि जाइयऽ । सुरजके बितल बात अखनो यादे रहैछै जे गामबालीके कहला पर गंगा सन पबित्र बहिनके मारि दैछ । ई सब ध्यानमे अबित सुरज आगनमे धएल हासुल लऽ कऽ अपन गामवाली केँ गरदनि काटिकऽ फेर थाना जा कए हाजिर भऽजाइछै ।

एक कथा स्नेहकें- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एक कथा स्नेहकें

नरेशक काका आइ खूब सेन्ट छिटकऽ अपन संगीक बहिनक बियाहमे जाए लेल तैयार भेलाह । ताबते नरेश सेहो ओतऽ पहुँचलाह । काकाकेँ नव कपड़ा आ सेन्टमे देखि कऽ कहलखिन्ह “कि यौ काका आई तऽ बड़ा..........।“

काका पहिने जतऽ कतौ जाइ छलथि नरेशकेँ संगे लऽ कऽ । ताहिसँ ओ नरेशकेँ कहलनि “चलबे तँ.....तहूँ चल,...जो जल्दीसँ तैयार भऽ कऽ चलि आऽ ।

“नरेश बच्चा नहि वरन ओऽ आई.ए. दोसर बर्षमे अध्ययनरत अठारह बर्षक जबान छथि । ओ जल्दीसँ तैयार भऽ कऽ आबि गेलाह, तखन जाऽ कऽ दुनु काका आ भातिज ओतऽ सँ बिदा भेलाह ।

जखन काका भातिज दुनू ओतऽ पहुँचलाह तँ घरबैयाक मोनमे बड आश अएलनि । दुनु गोटाकेँ बिभिन्न काज देबाक क्रममे नरेशकेँ टेन्ट सबहक काजक जिम्मेबारी भेटलनि । नरेश एकटा असल अतिथीक भूमिका निर्वाह करैत टेन्टक सरसमान लाबऽ लेल तैयार भेलाह । ओहि ठाम एकटा पुरान स्र्कोट मोटरसाईकल राखल छलैक । नरेश काकासँ ओहि मोटरसाइकलक लेल कहिते रहथि तावते एकटा हाफ सर्ट आ जीन्स पैन्ट पहिरने ब्यक्ति अएलाह आ कहलनि-

“एह.....धीया-पुता कि मोटरसाईकल चलेतय.....। “

फेर ओ ओहि ठाम राखल पुरना साईकल देखबैत कहलनि-

“वैह....लऽ कऽ चलि जाउ । “

एहन बात सुनि कऽ हुनका मोनमे बड दुःख लगलनि आ ओऽ अपन घर जाकऽ बाबुजीसँ मोटरसाईकल लेबाक काजमे लागि गेलाह ।

बैशाखक महिना, चण्डाल सनक रौदमे टेन्टक सभ काज समाप्त कऽ नरेश आँगन बाला नारियल गाछ लग बनाएल टेन्ट पर कुर्सी पर बैसकऽ किछ सोचैत रहथि । तावते बेबी- जिनकर बिवाह रहनि- ओ हुनकासँ पुछलखिन्ह-

“नरेश.....भोजन केलहुँ कि करब"।


नरेश किछ जबाब नहि देलनि । तखने अचानक हुनक नजरि एकटा कत्थी रंगक कुर्ती–सलबारपर, पैरमे पायल आ खुजल केशबाली लड़की पर पड़लनि । ओ लड़की नरेशकेँ एतेक नीक लगैत छैक जे ओ हुनका सँ बाजऽ लेल ब्याकुल होब लगैत छथि । हुनका मोनमे ईहो भऽ जाइत छनि-

“एकरा संग हम जीवन बिताऽ सकैत छी ।“

तखने लिली अपन भाइक संगे नरेश लग अएलीह आ हुनकर माँ आ बाबुजीके बारेमे पुछय लगलीह । ओ बात तँ लिली संगे करैत रहथि मुदा ध्यान केमहरो दोसर ठाम रहनि । कनिए देरक बाद वैह लड़की एकटा थारीमे चूड़ा, दही, चीनी, आमक अचार, आर मिठाई सब लाबिकऽ नरेशकेँ नास्ता करय लेल दैत छथि ।

नरेश दुनु हाथसँ थारी पकड़ैत कहलनि-

“आहाँ नास्ता....कऽ लेलहुँ ?”

जेना कतेक दिनसँ परिचित रहथि तहिना ओ कहलनि-

“जी नहि ........आब जाइत छी हमहुँ ।”

ओ पुनः जाकऽ तीनटा थारीमे नास्ता लऽ कऽ अएलीह । लिलि, बिक्किकेँ दैत अपनो एतहि खाए लगलीह । नरेश मात्र हुनके पर तकैत रहथि । एकबेर जखन नरेश हुनका पर तकैत रहथि तखने ओ सेहो नरेश पर तकलन्हि हुनका रहल नहि गेलनि आ ओ पुछलनि-

“आहाँक नाम...कि थिक" ?

निसंकोच ओ जबाब देलन्हि-

“हमर नाम.......रुबी अछि ।“

काज सब ओरिया गेल छलैक ताहिसँ ओ बैसल छलाह । लिलि आ नरेशक पहिनहिसँ घरसँ आनजान रहन्हि । लिलि नरेशके कहलनि-

“नरेश........चल सबगोटा हमरा आँगन..........सब गोटा लुडो खेलब ।“

ओत कोनो प्रकारक काज नहि होबऽ कें कारणसँ नरेश, लिलि, बिक्कि आ रुबी चारु गोटे लुडो खेल चललाह । सबगोटे ओतऽ "व्यापारी" खेलऽ लागल, जाहिमे नरेश बैंक बनल । भाग्यसँ कही वा संयोगसँ नरेशक कातमे रुबी बैसल । नरेशकेँ जतऽ पचास देबऽ के रहनि ओतऽ रुबीके पाँच हजार दऽ दैथ आ एकटा टिकटक बदलामे दुटा टिकट । आ एहि खेलऽके समयमे ओ रुबीसँ हुनका बारेमे सब किछ पुछऽ लगलाह । रुबीक एस.एल. सी.क सिम्बल नं. सँ घरक फोन नं. तक । एक बेर खेल समाप्त भेल । दोसर बेरक खेलमे बैंक रुबी बनलीह । रुबी एक के सट्टामे दु कऽकऽ बिक्किके देबऽ लगलीह । रुबीक गलतीकेँ बिक्कि सबकेँ खोलिकऽ देखाऽ दैक । जखन रुबीक काज नरेश पाँच–छ बेर देखलन्हि तँ कहलनि-

“ई तँ एहन दुनिया छैक जेकरा मदति करबय सैह भाला भोकत ।“

अहिके बाद रुबी नरेशकेँ एकटा टिकटक बदला तीनटा आ............। एक बेर त नरेश फेकि देलन्हि मुदा जखन रूबी नरेश पर तकलकै तँ नरेश रुबी कि कहऽ चाहैत अछि से बुझि गेलाह । आ नरेश सभ किछु स्वीकार करय लगलाह।

साँझक करीब छ बजे नरेश अपन घर जाय लेल जुत्ता पहिरैत रहथि, तावते एकटा महिला रुबीकेँ घर जाए लेल कहलन्हि । नरेश आ रुबी संगहि विदा भेलाह ।

बाटमे नरेश पुछलनि-

“.....आहाँक घर.... कोन ठाम अछि”।

बडा सिनेहसँ ओ जबाब देलन्ह “महादेब मन्दिर बाला गल्लीमे”।

किछ आगू बढैत नरेश कहलनि-

“....हम तँ ...अहाँसँ सब किछु पुछलहूँ मुदा ..अहाँ हमरा बारेमे .........”।

बात कटैत ओ कहलन्हि-

“हमरा लिली सभ किछु कहि देलन्हि।”

एते बतियाइतो नरेश रुबीसँ अखनो बाजऽ लेल छटपट करैत छलाह ताबते ओ पुछलन्हि-

“अं.....आहाँके कोनो लड़की साथी अछि ?”

नरेश ब्यंग करिते जबाब देलन्हि-

“हँ ..बहुते ।”

नरेशक जबाब सुनिते रुबी गम्भीर भऽ गेलीह आ पुनः पुछलन्हि-

“हम जे.....बुझि रहलछी .....से हो ?”

ठोही मुस्की आ आखिसँ गम्भीर भऽ नरेश कहलनि-

“हँ......अखन धरि त नहि मुदा आब भऽ जएतै ।”

रुबी अपनामे खुशी भऽ फेर पुछलन्हि-

“कतऽ के छै”।

नरेश जबाब देबऽ मे धुकचुक भऽ कहलन्हि-

“काठमाण्डूक”।

ओ कनिक देर चुप भऽ चलऽ लगलीह, तखन फेर नरेश पुछलनि-

“.......रुबी अहाँकेँ कोनो लड़का साथी अछि ?”

जहिना नरेश कहने रहथि तहिना ओहो कहलन्हि-

“हँ ..बहुते ।”

फेर नरेश सेहो पुछलनि-

“हम जे.....बुझिरहलछी..से हे ?”

“हँ......अखन धरि तँ नहि मुदा आब भऽ जएतै ।”

“कतऽ के छै”

“दिल्लीक”।

दिल्लीके नाम सुनिते नरेशकेँ बुझा गेलनि जे ओ हुनके बात पर ब्यंग करैत छलीह । फेर ओ सब कनिक देर चुपचाप चलल आ फेर नरेश कहलनि-

“ रुबी....जँ हम कोनो लड़कीकेँ कहबै जे हम ओकरा सँ प्रेम करैत छी .....तँ....कि ओ स्वीकार करतीह”।

रुबी मुस्कैत गम्भीरतासँ कहलन्हि-

“हँ ...किया नहि । एकटा लड़कीकेँ अपन वरक लेल जे किछु गुण चाही- सुन्दर, निक स्वभाव–विचार, आदी-इत्यादी सब किछु तँ अछि अहाँमे”।

आब एते बातचीत भेलाक बाद नरेश आब फेर हिम्मत जुटाकऽ एकटा प्रश्न करैत अछि-

“........अहाँ असगरे कोनो लड़काक संग साथ सिनेमा देखने छी?”

बडा गम्भीर भऽ ओ कहलन्हि-

“नहि”।

“.....आ जँ केओ कहत तँ जएबै कि नहि ?"

अहि प्रश्नक जबाब देबऽ लेल रुबीकेँ बड. कठिन पड़लनि आ ओ कहलन्हि-

“ जाएब आ नहि जाएब से तँ संगे चलऽ बाला आदमी पर परै छै“।

एते सुनिकऽ नरेशक छाती कापऽ लगलैक आ ठोढ़ सेहो कापऽ लगलैक मुदा तैयो नरेश कहैछै -

“.........काल्हि ३ बजे वाला शोमे........ नीलम हॉलमे अहाँक प्रतीक्षा करब । हमरा विश्वास अछि जे अहाँ आएब ।”
मूड़ी डोलबैत रुबी कहलन्हि-

“ठीक छै”।

एते बात भेलैक, रुबी अपन घर तक पहुँच गेलीह । दुनु गोटे आपसमे बिदा लैत अपन अपन घर दिस लागल । अखन तँ साँझक सात मात्र बजलैयऽ मुदा नरेशकेँ प्रतिक्षा छैक तँ काल्हुक ३ बजेक । धिरे–धिरे हुनक मोन बेचैन होबऽ लगलनि । ओ कखनो टि.भि.लग आ कखनो कतौ... । बैसले–बैसल नरेशकेँ उचाट जकाँ लगय आ सोंचऽ लगथि जे एतऽ किया बैसल छी । एवं प्रकारे नरेशकेँ खाए, पिबऽ, उठऽ, बैसऽ सभ किछुमे उचाट लागऽ लगलनि।

दोसर दिन नरेश करीब दूइए बजे सिनेमा हॉल पहुँचल । टिकट बिक्री तँ अढाई बजे खुलैत छैक । तखुनका एक–एक मिनट हुनका बझाइन जे एक बर्ष बित रहल अछि आ मनमे एकटा इहो छटपट्टी रहनि जे ओ अएतीह कि नहि । जखन सवा
तीन बाजि गेलैक, मुसराधार पानि सेहो परऽ लगलै तखनो नरेश बाहर जा–जाक देखऽ लगलाह । तीन बाजि गेलैक, मुसराधार पानि सेहो परऽ लगलै, तखनो नरेश बाहर जा–जाकऽ देखऽ लगलाह । घण्टी जहिना बजै, नरेशक छाती आओर तेज धरकय लगैक । जखन तीन-पैतिस भऽ गेलैक, तखन नरेश देखलक जे रुबी पानिमे भीजैत माथ पर ओढनी धएने आबि रहल छथि । ओ जल्दी सँ कूदि कऽ रुबी लग जाइत अछि आ हाथ पकरि कऽ भीतर लऽ जाइयऽ । आ ई दूनु गोटे सिनेमा कम आ एक दोसराकेँ बेशी तकैत रहैअ ।

किछ कालक बाद एकटा गीत शुरु होइछ, नरेश रुबीक हाथ पकरिकऽ कहैछ-

“....रुबी ....हमरा दिश ताकु ने ।”

रुबी हुनका दिश तकैछ तँ ओ कहैत छथि-

“हमरा अहाँसँ प्रेम भऽ गेल“।

ई सुनिकऽ रुबी फेर पर्दा दिश ताकऽ लगैछ । नरेश फेर कहैछ-

"अहाँ हमरा जबाब नहि देब" ।

बडा गम्भीर भऽ रुबी कहैछ-

“हमरा कनीक..........सोचबाक मौका नहि देब.........?”

किछ समय बाद रुबी रुबी नरेशक हाथ पकरिकऽ कहलनि-

“....नरेश हमरा अहाँसँ प्रेम भऽ गेल, हम अहाँ बिन रहि नहि सकैत छी । “

बातो तँ ओतबे हेबाक रहैक । कनिक कालक बाद ओऽ दूनु गोटे सिनेमा हॉलसँ निकललाह आ साँझमे भेट करबाक बात करैत अपन–अपन घर दिस बिदा भेलाह । करीब छ बजे साँझमे नरेश मोटरसाईकल लऽकऽ रुबीसँ भेट कऽ आएल आ तखने जल्दिसँ अपन गाम डेबडीहा चलि देलक। गाम पहुँचैत साँझक साढे-सात बाजि गेल रहैक । ओ अपन माँ लग जाऽ कऽ गम्भीरता पूर्वक बैसि गेल । नरेशकेँ एहन उदास देखि कऽ माँ पुछलन्हि-

“कि बात बेटा, अबेर आबिकऽ, उदास" ?

नरेश माँकें अपन प्रेमक विषयमे कहए गेल रहथि । बड हिम्मत जुटएलाक बाद नरेश कहलनि-

“माँ ...........हमरा प्रेम भऽगेल ऽ”।

माँके कोनो भाँज नहि लगलनि आ पहिने ओ लड़कीक विषयमे पुछलन्हि । आ नरेश सभ किछ कहि गेलाह । तखन माँ कहलन्हि-

“ठीके छैक । मुदा बाबुजीक प्रतिष्ठा बचाकऽ ।”

तकर बाद दूनु गोटाक भेँटघाट आ फोनपर गपशप चलैत रहल । बिवाहक चतुर्थीक रातिमे निमंत्रण परल रहनि । बिना काकाक संग कतहु नहि जाएबाला नरेश निमंत्रणमे असगरे चलि गेलाह । मोनमे ई रहनि जे ओतऽ रुबीसँ गप होयत । एवं प्रकारे नरेश आ रुबी बड लग भऽ जाइ गेलाह । दिन भरिमे बड़ कम तँ १२–१४ बेर फोन पर बात होइन ।

एक बेर अहिना रुबीक माँ नरेशकें रुबी आ सोनीकेँ अंग्रेजी पढाबय लेल कहलन्हि । नरेश पढाबए लगलाह । मुदा दूनु गोटे बिच जे बात होइ ताहि पर सोनीकेँ शंका रहैक । एक महिनाक बाद रुबीक बाबुजी सुर्खेतसँ अएलाह। हुनका रुबीक बारेमे मालुम भेलनि, ओ रुबीक झोराकेँ तलाश कैलनि । हुनका नरेशक लिखल किछु चिठ्ठि भेटलनि । साँझमे रुबी अपन भाईक हाथसँ नरेशक लेल चिट्ठी पठौलन्हि। नरेश ओ पढिकऽ तुरन्ते रुबीक घरपर फोन करैत अछि । फोन रुबीक माँ उठबैतछथि । नरेश रुबीसँ बात करऽके इच्छा व्यक्त करैयऽ मुदा फोन रुबीक हाथ नहि परैत छनि । आ ओऽ नरेशकेँ इहो कहैत छथि जे अहाँ एतय आबि कऽ रुबीक बाबुजीसँ बात कऽ लिअ । ई बात सुनिकऽ नरेश अपन माँके सुनबैयऽ आ रुबीक बाबुजी सँ बात करऽ लेल सेहो जिद्द करैयऽ । करीब १ बजे दिनमे नरेश आ हुनक माँ रुबीक घर जाइत छथि । नरेशक माँके देख कऽ रुबीक बाबुजी कटाक्ष बोली बजैत कहैयऽ-

“...आ....आएलजाए – आएलजाए”। माँ आ सभ गोटे बैसय बाला घरमे जाईत छथि आ नरेश रुबीबाला घरमे । ओतऽ सोनी सेहो पढैत रहैछ । घरमे जाइते नरेशक नजरि रुबीक हाथपर परैत छै । बाहिमे काटल– काटल देखिकऽ नरेश पुछैत छैक-

“ई कि.......हमरा पर भरोसा नहि “ओतऽ बैसल नोकरकेँ बजाकऽ नरेश पत्ती लाबऽलेल कहैछ । रुबी ओकरा मना करैछ । नेकोन एयरक १२ बजे बाला प्लेन सँ भागऽ के बात सेहो रुबी सँ कहलनि। हाथमे पत्ती अपने सँ आनि नरेश अपनो हाथमे खचाखच ६–७ बेर मारैयऽ ताबते नरेशक माँ हुनका बजबैत छथि । नरेश कलपर जाकऽ हाथ धोकऽ अपन माँ लग पहुँचैत छथि। माँ सभ सँ माफी मांग लेल कहैत छथि, नरेश माफी मंगैय मुदा एतेके बादो रुबीक बाबुजी एकैहटा बात कहैत छथि-

“ आब जे सभसँ पहिने लगन अएतै ताहिमे बिबाह करब तँ ठिक छैक, नहि तँ नहि हेतै । “

"ठिक छै हम एकर बाबुजी सँ बात करैछी “। एते कहि नरेश आ हुनक माँ दुनु ओतऽ सँ बिदा भेलाह ।

ओही रातिमे दू–तिन आदमी आबिकऽ नरेशक बाबुजीकेँ कहैछ-

“आहाँ बेटाकेँ सम्हारि लिअ नहि तँ ठीक नहि होएत“ ।

नरेशक बाबुजीकें एहन सुनिकऽ बरदास नहि भेलनि आ ओ कहलनि-

“हे जाउ ! ........हुनको एकहिटा बेटा छनि से याद करा देबै । .....आब आहाँ सभ जा सकैतछी ।”

एते कहिकऽ ओ केवार बन्द कऽलेलन्हि । एवं प्रकारे रुबीसँ नरेशकेँ कोनो प्रकारक बातचित करीब आठ महिना तक नहि होइत छनि ।

फेर नरेशक काठमाण्डू रहबाक बात होइत छैक । मुदा नरेश १०–१५ दिन पर जनकपुर जाइत अबैत रहैयऽ ।


एक दिन नरेश रुबीसँ जेना होइ बाजऽ के छैक, सोचिक निकलैयऽ । भोरमे रुबी गणित बिषयक ट्यूसन पढ. लेल के. झा लग अपन साथी भावना संग जाइत रहैय । अचानक नरेशक घरपर रुबीक फोन अबैत छैक आ रुबी कहैछ-

“बारह बिग्घामे बेरियामे भेट करऽ आउ । “

जखन नरेश ओत पहुचैय त रुबी सम्पूर्ण घटनाक चित्रण करैत कहैत छथि-

“....आब आहाँ जँ हमरा सँ भेट करब त हमर बाबुजी आहाँके जानसँ मरबादेता....से....कृप्या.........।”

मुदा नरेश जनकपुर १०–१५ दिन पर आन जान नहि छोरैय । आ रुबी सँ भेटबाक बात कहीयो दशमीमे, कहियो सुकरातिमे करैत –करैत नरेशके रुबी धोखा दऽ दैत छैक ।
ओना नरेशके मनकें बड चोट पहुचैत छैक, तैयो ओ एकहिटा बात कहैछैक-

“बाहिमे रहू न रहू मोनमे रहलकरु ।”

वाह नरेश !

मैथिली भाषा विदेह ई पत्रिका २१म अं‍क maithili mithila maithil मैथिल मिथिला

अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भऽ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर २१ टा अंक http://www.videha.co.in/
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मैथिलीक मानक लेखन-शैली


नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली। मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन:-

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई/प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर/सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।/पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)/योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन/भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...