Sunday, October 26, 2008

मैथिली भाषा विदेह ई पत्रिका maithili mithila maithil मैथिल मिथिला



मानुषिमिह संस्कृताम्
अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भऽ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर २० टा अंक http://www.videha.co.in/
पर ई-प्रकाशित भऽ चुकल अछि। "वि दे ह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका मासक १ आऽ १५ तिथिकेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि। एकरा एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ २५ अक्टूबर २००८ धरि) ६२ देशसँ ९९,४१३ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)। विदेहक सालाना २५ म अंक (०१ जनवरी २००९) प्रिंट फॉर्ममे सेहो आएत। २.अहाँसँ सेहो "विदेह" लेल रचना आमन्त्रित अछि। यदि अहाँ पाक्षिक रूपेँ विदेहक हेतु अपन रचना पठा सकी, तँ हमर सभक मनोबल बढ़त।
३.कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।

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टिप्पणी: विदेहक लोगोक संग देल " मानुषिमिह संस्कृताम् " केर सम्बन्धमे। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। जखन हनुमान रामक संदेश लऽ सीता लग लंकाक अशोक वाटिका गेलाह तँ सोचलन्हि जे रावण संस्कृत बजैत अछि। यदि हम रामक संदेश संस्कृतमे सीताकेँ देबन्हि तँ ओऽ हमरा रावणक छद्म रूप बुझि संदेह करतीह। हमरा मानुषी आऽ संस्कृत (मानुषीमिह संस्कृताम्) दुनू अबैत अछि, से ओऽ सीताक भाषा मानुषीमे रामक संदेश देलन्हि। वाल्मीकि रामायणक सुन्दर काण्डक ई मानुषी भाषा आजुक मैथिलीक प्राचीनतम लिखित प्रमाण अछि।


मैथिलीक मानक लेखन-शैली


१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।

१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.
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विदेह ०१ अक्टूबर २००८ वर्ष १ मास १० अंक १९- part-II

विदेह ०१ अक्टूबर २००८ वर्ष १ मास १० अंक १९- part-II

चित्रकार: ज्योति झा चौधरी
ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति












1.डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ 2.नूतन झा
डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (१९३८- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। पिता स्व. वीरेन्द्र नारायण सिँह, माता स्व. रामकली देवी। जन्मतिथि- २० जनवरी १९३८. एम.ए., डिप.एड., विद्या-वारिधि(डि.लिट)। सेवाक्रम: नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। १.म.मो.कॉलेज, विराटनगर, नेपाल, १९६३-७३ ई.। २. प्रधानाचार्य, रा.प्र. सिंह कॉलेज, महनार (वैशाली), १९७३-९१ ई.। ३. महाविद्यालय निरीक्षक, बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, १९९१-९८.
मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली अंग्रेजी आऽ हिन्दीक ज्ञाता।
मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)।
प्रकाशनाधीन: “विदापत” (लोकधर्मी नाट्य) एवं “मिथिलाक लोकसंस्कृति”।
भूमिका लेखन: १. नेपालक शिलोत्कीर्ण मैथिली गीत (डॉ रामदेव झा), २.धर्मराज युधिष्ठिर (महाकाव्य प्रो. लक्ष्मण शास्त्री), ३.अनंग कुसुमा (महाकाव्य डॉ मणिपद्म), ४.जट-जटिन/ सामा-चकेबा/ अनिल पतंग), ५.जट-जटिन (रामभरोस कापड़ि भ्रमर)।
अकादमिक अवदान: परामर्शी, साहित्य अकादमी, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय नृत्य कला मन्दिर, पटना। सदस्य, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुरधाम, नेपाल।
सम्मान: मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि।
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता- इम्फाल (मणिपुर), गोहाटी (असम), कोलकाता (प. बंगाल), भोपाल (मध्यप्रदेश), आगरा (उ.प्र.), भागलपुर, हजारीबाग, (झारखण्ड), सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, काठमाण्डू (नेपाल), जनकपुर (नेपाल)।
मीडिया: भारत एवं नेपालक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे सहस्राधिक रचना प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रायः साठ-सत्तर वार्तादि प्रसारित।
अप्रकाशित कृति सभ: १. मिथिलाक लोकसंस्कृति, २. बिहरैत बनजारा मन (रिपोर्ताज), ३.मैथिलीक गाथा-नायक, ४.कथा-लघु-कथा, ५.शोध-बोध (अनुसन्धान परक आलेख)।
व्यक्तित्व-कृतित्व मूल्यांकन: प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन: साधना और साहित्य, सम्पादक डॉ.रामप्रवेश सिंह, डॉ. शेखर शंकर (मुजफ्फरपुर, १९९८ई.)।
चर्चित हिन्दी पुस्तक सभ: थारू लोकगीत (१९६८ ई.), सुनसरी (रिपोर्ताज, १९७७), बिहार के बौद्ध संदर्भ (१९९२), हमारे लोक देवी-देवता (१९९९ ई.), बिहार की जैन संस्कृति (२००४ ई.), मेरे रेडियो नाटक (१९९१ ई.), सम्पादित- बुद्ध, विदेह और मिथिला (१९८५), बुद्ध और विहार (१९८४ ई.), बुद्ध और अम्बपाली (१९८७ ई.), राजा सलहेस: साहित्य और संस्कृति (२००२ ई.), मिथिला की लोक संस्कृति (२००६ ई.)।
वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि।

मिथिलांचलक गाणपत्य क्षेत्र-
डॉ.प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन
धार्मिक ओ सांस्कारिक अनुष्ठानसँ पूर्व गणेशक पूजनक विधान अछि कियेक तँ ओ विघ्नांतक छथि, विद्या-बुद्धिक देवता छथि, सिद्धि दाता छथि एवं पंचदेवोपासनामे परिगणित छथि। गणेशक स्वरूपक परिकल्पना देवत्व संपोषित मानव देहधारी किन्तु मस्तक एकदंत गजक अछि। मनुष्य देहधारी किन्तु पशु-पक्षी मुखी मस्तकधारी देवता सभमे वराह विष्णु, नरसिंह अवतार, अश्वमुखी अश्विनीकुमार, पक्षीमुखी गरुड़, कपिमुखी हनुमान आदि स्वयंमे एकटा अद्भुत परिकल्पना अछि। बौद्धकलामे गज, अश्व ओ सिंह धर्मक प्रतीक मानल गेल अछि, जे अशोक स्तंभ (धर्मध्वज)क रूपेँ मूर्त भेल अछि। मिथिलांचलमे हाथी (हस्तिमुख) शुभप्रद मानल जाइछ। एहि ठामक सांस्कारिक अनुष्ठान (विवाह संस्कार)मे गौड़ी पूजन ओ कोहबड़ भित्तिचित्रमे हाथीक अंकन एवं छठि ओ विवाह मण्डपपर हस्तिकलश पूजनक विधान विहित अछि। देवराज इन्द्रक वाहन ऐरावत हाथी छनि। अतः गजमुखी गणपति गणेशक स्वरूपगत परिकल्पनामे मनुष्य ओ पशुक शक्ति-सामर्थ्य विशेषक समाहारसँ एकटा नवकल्पक स्थापना भेल। वराहक (विष्णु) कर्म माँटि कोरब एवं (नर) सिंहक स्वरूप हंता (संहारक)क अछि। अतः देवस्वरूपक संरचना उद्देश्य विशेषक कारणेँ होइछ आर सभक विशद व्याख्या पुराण साहित्यमे कथाक माध्यमे भेल अछि।
गणपति गणेशक मुख्य लक्षण अछि- लम्बोदर, एकदन्त, सूढ़, स्थूलकाय, भुट्ट नाटखुट एवं हाथमे परशु, पाश, अंकुश ओ कमल। मुदा ओ मोदक प्रिय छथि। वाहन मूषक छनि। गणेशकेँ चारि, आठ अथवा दस-बारह भुजी मूर्त्ति सभ भेटाइत अछि। हिनक हाथमे राखल आयुध एवं प्रतीकित वस्तु सभक आधारपर ओ भिन्न नामसँ अभिज्ञात होइत छथि- लक्ष्मी गणपति, वक्रतुण्ड गणेश, शक्ति गणेश, हेरम्ब, महागणपति आदि। मुदा मिथिलांचलक विभिन्न ऐतिहासिक स्थल सभसँ प्राप्त गणेशक स्वरूप एहि रूपेँ मूर्त भेल अछि। कोर्थक (दरभंगा) अष्टभुजी नृत्य गणेश (आकार २४”*१०”) कमलासनपर नृत्य भंगिमामे भक्त सभक वरदायी बनल छथि। व्क्रतुण्ड गणेशक हाथ सभमे अक्षमाल, अंकुश सहित परशु, पाश, मोदक पात्र आदि धारित अछि। भोजपरौल (मधुबनी)क चतुर्भुजी गणेश कमलासनपर ललितासन मुद्रामे प्रतिष्ठित छथि। पादपीठमे मूषक वाहनक रूपेँ उत्कीर्ण अछि। साहोपररी (दरभंगा)क अष्टभुजी नृत्यगणेशक भव्य प्रस्तर मूर्ति पूजित अछि। दुनू पार्श्वमे संभवतः ऋद्धि-सिद्धि विनीत भावेँ बनल छथि। पादपीठमे भक्तजन निवेदित छथि। अहिना गणेशक मध्यकालीन प्रस्तर मूर्ति सभ हावीडीह, नेहरा, बहेड़ा, देकुली, लहेरियासराय, हिरणी, रतनपुर (दरभंगा), विष्णु बरुआर, भच्छी, भीठभगवानपुर, भगवतीपुर (मधुबनी), महादेवाडीह (दरभंगा), करियन (समस्तीपुर), वीरपुर (बेगुसराय), तिरौता (शिवहर) आदि धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल सभसँ उपलभ्य एवं पूजित छथि। एकर अलावा मिथिलांचलक बेगुसराय, दरभंगा, मुजफ्फरपुर आदि संग्रहालय सभमे ओ संरक्षित अछि। सामान्य गणेश ललितासनमे वरमुद्राक संगे निर्मित अछि।
मध्यकालीन राजकीय संरक्षणमे बनल मंदिरक पाथरक कलात्मक चौखटक सोहावटीक मध्यमे गणेश अथवा गजलक्ष्मी बनयबाक चलन छल। गणेश ओ लक्ष्मी शुभसूचक देव छथि। अन्दामा (दरभंगा)क महादेवस्थानमे राखल मंदिर स्थापत्यक प्राचीन पाथरक सोहावटीमे पद्मासीन गणेशक मूर्ति एवं कोर्थ (दरभंगा)क मंदिर सोहावटीमे गजलक्ष्मी उत्कीर्ण अछि। प्रवेश द्वारक सोहावटीमे उत्कीर्ण गणेश वा गजलक्ष्मीसँ ध्वस्त मंदिरक गर्भगृहमे स्थापित मूल देव प्रतिमाक सूचक होइत अछि ओ शिवमंदिर वा विष्णुमंदिर संभावित अछि।
गणेश शिव ओ पार्वतीक पुत्र छथि, शिवगणक अधिपति गणपति छथि एवं पार्वतीक गोदमे वात्सल्यपूरित बाल गणेश छथि। पाली (दरभंगा) मे पद्मासनमे बैसल पार्वतीक गोदमे बालगणेशक एकटा गुप्तकालीन पाथरक मूर्ति मंदिरमे पूजित अछि। एहि तरहक एकटा दोसर प्राचीन कांस्य मूर्ति हाजीपुर (वैशाली)क मठसँ प्राप्त भेल अछि, जाहिमे शिव ओ पार्वती स्थानुक मुद्रामे ठाढ़ छथि। द्विभुजी शिव ओ पार्वतीक दहिन हाथ वर मुद्रामे एवं पार्वती वाम हाथे बालगणेशकँै गोदमे समेटने छथि। एहि क्रममे सिंहपर ललितासनमे बैसल चतुर्भुजी पार्वतीक वाम गोदमे बैसल बाल कार्तिकेयक एकटा पाथरक प्राचीन मूर्तिक उल्लेख आवश्यक बुझना जाइछ (भारतीय कला को बिहार की देन, पटना, १९५८ ई. चित्र सं.१००)। एहि मूर्ति सभमे भगवतीक वात्सल्य भावक सुन्दर अभिव्यक्ति भेल अछि।
भारतीय मूर्तिकलाक परम्परामे मिथिलांचलसँ प्राप्त गिरिजाक प्राचीन पाथरक मूर्ति सभमे भगवतीक वात्सल्य भावसँ स्नात गणेश ओ कार्तिकेय पार्श्व देवपुत्रक रूपेँ उत्कीर्ण छथि। भगवती गिरिजा (मिरजापुर, दरभंगा) कुर्सोनदियामी (दरभंगा) एवं फुलहरक गिरिजास्थानक दहिन पार्श्वमे गणेश ओ वाम पार्श्वमे कार्तिकेय ठाढ़ छथि। गणेशक हाथमे मोदक एवं कार्तिकेयक हाथमे मूसल शोभित छनि। ओ द्विभुजी छथि।
गणेश ओ कार्तिकेयक स्वतंत्र मूर्ति सेहो परिकल्पित एवं मूर्त भेल अछि। ओ प्रायः शिवमंदिरमे स्थापित एवं पूजित छथि। मयूरपर आरूढ़ कार्तिकेय युद्धक देवता छथि। पुण्ड्रवर्धन (पूर्णिया क्षेत्र)मे हिनक एकटा मंदिरक उल्लेख प्राप्त अछि। मुदा वैशालीक हरि कटोरा मन्दिरमे मयूरागढ़ कार्तिकेय स्थापित एवं पूजित छथि। एहि तरहक एकटा पालकालीन पाथरक कार्तिकेयक मूर्ति बसुआरा (मधुबनी)क मठमे सेहो संरक्षित अछि। कार्तिकेयक हाथमे बरछी छनि। आइ काल्हि नवरात्रक अवसरपर भगवती दुर्गाक पार्श्वमे सामान्यतः गणेश ओ कार्तिकेयक शिल्पांकन कयल जाइछ। तहिना दीपावलीक मांगलिक बेलामे गणेशक संग लक्ष्मीक सामंजस्य (लक्ष्मी-गणेश) श्री समृद्धि ओ सुख सौभाग्यक सूचक मानल जाइछ। मिथिलांचलमे गणेश चौठ (भाद्र शुक्ल चतुर्थी) एवं महाराष्ट्रमे गणेशोत्सव व्यापक रूपेँ मनाओल जाइछ।
डॉ. जनार्दन मिश्र (भारतीय प्रतीक विद्या, पटना, १९५९ ई.) मातृरूपमे ब्रह्म विनायकक मनोरम मूर्ति सभक (चित्र सं.९ च एवं छ) उल्लेख कयने छथि ओ गणेशक शक्ति छथि। भारतीय परिप्रेक्ष्यमे प्रत्येक देवताक लेल हुनक शक्तिक परिकल्पना कयल गेल- शिव-पार्वती (उमा-माहेश्वर), विष्णु-लक्ष्मी (लक्ष्मी-नारायण), इन्द्र-इन्द्राणी आदि। सप्तमातृकाक परिकल्पना एकटा उदाहरण अछि। एहि ब्रह्म विनायककेँ शक्तिगणेश सेहो कहल जा सकैछ। एहि तरहक प्राचीन मूर्ति सभ भारतक अलावा जापान (जापान का मूर्ति तात्विक अध्ययन, बक्शी) मे सेहो पाओल जाइछ। ओना प्राचीन भारतीय साहित्यमे ऋद्धि एवं सिद्धिकेँ हुनक पत्नी कहल गेल छनि। ओ दुनू गणेशक मूल मूर्तिक संगे उत्कीर्णो भेल छथि, पार्श्वदेवीक रूपमे।
गणेशक स्वतंत्र पूजोपासना कहियासँ आरम्भ भेल, तकर निश्चित जनतबक अभाव अछि, तथापि पंचदेवोपासनाक क्रममे हिनक पूजन प्रबल भेल। गणेशक स्वतंत्र मूर्तिक दूटा रूप मिथिलांचलमे सर्वाधिक लोकप्रिय अछि- (क) पद्नासीन गणेश एवं (ख) नृत्य गणेश। भोजपरौल (मधुबनी)क पद्मासनपर ललितासनमे बैसल चतुर्भुजी वक्रतुण्ड गणेशक पादपीठमे वाहन मूषक बनल अछि। कमलासन विशाल उदर ब्रह्माण्डक सृष्टिबोधक, मूषक विघ्नक द्योतक, हाथक मोदक सृष्टिक संकेत बिन्दु, पाश-अंकुश शक्ति बोधक, वाम स्कंधसँ लटकैत यज्ञोपवीत यज्ञसूत्रधारी गणेश पूर्णब्रह्मक प्रतीक बनि गेल छथि। दहिन हाथ अभय मुद्रामे बनल अछि।
नृत्य गणेश अथवा नटेश गणेशक मूर्तरूप अपेक्षाकृत अधिक लोकग्राह्य भेल। मूर्तिकारकेँ सेहो विन्यासक नीक अवसर भेटलनि। नटराज शिवक उत्तराधिकार पुत्र गणेशकेँ प्राप्त होयब स्वभाविके। एहि दृष्टिसँ कोर्थक अष्टभुजी नृत्यगणेशक मूर्तिकेँ आदर्श मानल जा सकैछ। जकर साक्षात दर्शन कऽ मनक मयूर स्वतः नाचि उठैत अछि। ब्रह्मक निरन्तर गति ओ स्पंदनक नाम थिक नृत्य आर ब्रह्मक नृत्य भेल लीला। नृत्य गणेश त्रिभंगी मुद्रामे बनल छथि। हिनक पैरक नुपूरक ललित छन्द ओ नृत्यभंगिमायुक्त हाथ सभमे पाश, मोदक पात्र, परशुयुक्त अंकुश एवं अक्षमाला प्रमुख अछि। दहिन हाथ वरमुद्रामे बनल छनि। ठेहुन धरि अधोवस्त्र, डाँरमे कटि भूषण, कान्हसँ लटकैत यज्ञसूत्र, गरामे कष्ठाभूषण, माथपर गजमुक्ताक झालरिक संग शिखराकार मुकुट एवं हाथ सभमे कंगन सुशोभित छनि। नृत्यरत गणेश एकदंत छथि। ब्रह्मस्वरूप प्रायः देवी-देवता सभक नृत्यमयी मूर्ति निर्मित होइत छल। सप्त मातृकाक नृत्यरतमूर्ति सभक संग शिव परिवारक नृत्य गणेश अथवा नृत्य वटुक भैरवक रूपांकन सेहो भेल अछि।
करियन (रोसड़ा, समस्तीपुर)क भगवती मंदिरमे स्थापित एवं पूजित पार्वतीक अगल-बगलमे द्विभुजी गणेश एवं कार्तिकेयक पाथरक मूर्तिसभ पालकालीन थिक (करियन एक्सकेवेशन- डॉ.सीताराम राय, पटना)। गणेशक आठ इंच बलुआही पाथरक बनल मूर्तिक दुनू हाथमे मोदक छनि। लम्बोदर नृत्य गणेशक हाथ ओ पैर सभमे आभूषण एवं देहपर यज्ञोपवीत शोभित छनि। करियनकेँ वैदिक धर्मक न्यायविद् आचार्य उदयनक जन्मभूमि एवं ब्राह्मण देवी-देवता सभक सिद्ध भूमि मानल जाइछ।
सत्येन्द्र नारायण झा (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ, मिथिला संस्कृति एवं परम्परा पृ.२५८) क सर्वेक्षणक अनुसार भगवतीपुर (मधुबनीसँ) गणेशक दूटा पाथरक मूर्तिक अलावा भगवानपुरसँ नृत्य गणेश, महदेवाडीह (गोरहट्टा, दरभंगा) एवं तिरौता (शिवहर)सँ गणेशक पालकालीन मूर्ति प्राप्त भेल अछि, जे ब्राह्मण धर्मक पुनरुत्थान एवं पंच देवोपासनाक लोकप्रियताक कारणे पालकला शैलीक विकास ओ विस्तारक क्रम बनल रहल। शिल्पक दृष्टिसँ किछु महत्वपूर्ण प्रयोग रेखांकन योग्य अछि।
सत्यनारायण झा सत्यार्थी मिथिलांचलक एकटा विलक्षण गणेशमूर्तिक सचित्र सूचना देने छथि। तदनुसार एकहि प्रस्तर खण्डमे गणेशक तीन टा मूर्ति ऊपर-नीचाक क्रममे उत्कीर्ण अछि। प्रत्येकक भंगिमा भिन्न अछि।
सत्येन्द्र कुमार झा (मिथिला की लोक संस्कृति विशेषांक, दरभंगा, २००६ ई. पृ. २४९) क्षेत्रीय सर्वेक्षणक क्रममे करियन (समस्तीपुर), बरेपुरा (बेगुसराय), मुक्तेश्वर स्थान, देवहर, मधुबनी), भगवतीपुर नाहर, विष्णु बरुआर, भोजपरौल (मधुबनी)क अतिरिक्त चन्द्रधारी संग्रहालय, दरभंगाक नृत्यगणेशक प्रतिमाकेँ विशेष महत्वपूर्ण मानलनि अछि। एहिमे करियन, मुक्तेश्वर ओ हिरौताक गणेशमूर्तिकेँ ओ प्रारम्भिक पालसेन कालीन कहने छथि। सत्यनारायण झा सत्यार्थीक सर्वेक्षणक (मिथिलाक पुरातात्विक सम्पदा, दरभंगा, २००३ ई.) सूचनानुसार कोर्थ, हाबीडीह, भीठ भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, बहेड़ा, भच्छी, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थल सभपर विघ्नांतक गणेशक ऐतिहासिक मूर्ति सभ उपलभ्य एवं पूजित अछि। हिरणी-बड़गाँव (कुशेश्वर क्षेत्र)मे सेहो गणेशक भव्य मूर्तिक जनतब अछि। भगवतीपुरमे गणेशक दू टा प्राचीन मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। विजयकान्त मिश्र (मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर, इलाहाबाद, १९७८ ई., प्लेट xii/ २१-२२) भगवानपुरक नृत्यगणेशक मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। एकर अतिरिक्त तिरौताक (शिवहर) गणेश विशिष्ट अछि, अत्यल्प अलंकरण ओ पादपीठक बनावटक आधारपर गुप्तोत्तर कालक संभावित लगैत अछि। हम सकरा (मुजफ्फरपुर)मे बलुआ पाथरक एकटा गुप्तकालीन गणेशमूर्ति देखने छलहुँ।
शैलीगत विशिष्टताक आधारपर मौर्यकालमे सिर्फ मूर्ति बनैत छल। गुप्त कालमे मूर्तिक संग प्रभावली जोड़ल गेल। मुदा ग्यारहवी-बारहवी सदीमे मूर्तिकार मुख्य मूर्तिक अपेक्षा प्रभावली, सिंहासन, वस्त्राभूषण आदिक सौन्दर्याभिव्यक्तिमे विशेष कौशल देखौलनि। मिथिलांचलसँ प्राप्त पाल-सेन ओ कर्णाटकालीन गणेशमूर्ति सभ अलंकृत पाल शैलीक परम्परामे निर्मित अछि। गणेश पूजन विशेष लोकप्रिय छल, पालकालमे। एक दिस नालंदा, ओदंतपुरी ओ विक्रमशिला बौद्ध विहारक ध्वंसाविशेषसँ ब्राह्मण ओ बौद्धधर्मी मूर्तिसभ प्राप्त भेल अछि। गणेश दुनू संदर्भमे एक समान विघ्नांतक ओ सिद्धिदाता देवताक रूपमे मान्य छथि; मुदा किछु बौद्ध मूर्तिमे बौद्ध प्रभुत्वक क्रमे बौद्धदेवी अपराजिता (देवी) द्वारा गणेशकेँ मर्दित देखाओल गेल अछि। क्रद्धा देवीक वाम पैर गणेशक दहिन पैरकेँ मर्दित कयने अछि। त्रैलोक्य विजयक मूर्तिमे शिव ओ पार्वतीकेँ मर्दित देखाओल गेल अछि। मुदा ओदंतपुरी (बिहारशरीफ, नालंदा) सँ प्राप्त एकटा ऐतिहासिक शिवलिंग (चतुर्मुखी)मे एक दिस गणेश एवं दोसर दिस विष्णु मूर्तित छथि अर्थात् पंचदेवोपासनाक माध्यमसँ विभिन्न सम्प्रदायकेँ एक छत्रक (शिव) अन्तर्गत आनल गेल एकटा समन्वयात्मक चेष्टा छल। मुदा आश्चर्य, मंगरौनीक त्रैलोक्य विजयक मूर्तिमे बौद्धदेवी अपराजिताक पैरतर गणेश नहि छथि। बौद्ध लोकनि मिथिलाक ब्राह्मणत्वसँ आतंकित छल।
मिथिलांचलक लोकजीवनमे कोनो शुभ ओ सांस्कारिक अनुष्ठानमे गणेश पूजनक विधान अछि। गाथारम्भ, नाट्यारम्भ, कीर्तनारम्भ आदिमे गणेशक वन्दना प्रथमे कयल जाइत अछि- “आदित्यं गणनाथं च देवी रुद्रं च केशवम्। पञ्चदैवत्य मित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत”।– मत्स्यपुराण। मिथिलाक चौथचन, गौड़ी-गणेश, लक्ष्मी गणेश आदि प्रकारान्तरसँ गणेश-पूजन थिक”।
शिवमंदिरमे पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नन्दी ओ प्रायः भैरवक मूर्तिक स्थापन ओ पूजनक विधान अछि। मुदा कौटिल्यक अर्थशास्त्र (३५० ई.पू.) कालमे दुर्गक अन्दर दुर्गा, विष्णु, कार्तिकेय (जयन्त), इन्द्र (वैजयन्त), कुबेर (वैश्रवण) आदिक स्वतंत्र मंदिरक प्रावधान अछि, “राजतरंगिणी”क अंतः साक्ष्यक अनुसार पुण्ड्रवर्धन (पूर्णिया)मे कार्तिकेयक मंदिरक उल्लेख प्राप्त होइछ। रजौनाक एकटा गुप्तकालीन स्तंभावशेषमे गंगाधर शिवक एवं गणेश कार्तिकेयक मूर्ति उत्कीर्ण अछि (सम्प्रति कलकत्ता संग्रहालयमे)। गरुड़ पुराण एवं करतोया माहात्म्यमे कार्तिकेयक पवित्र मंदिरक साक्ष्य स्रोत उपलब्ध अछि। गणेश पुराणक क्रीड़ा खण्ड (श्लोक १३८-१४८)क श्री गणेशगीतामे गणेश राजा वरेण्यकेँ योगसाधनाक शिक्षा देने छथि। देकुलीक (दरभंगा)क मंदिरालयमे गणेशक मूर्ति ऐतिहासिक ओ पूजनीय अछि। डॉ. वी.पी.सिन्हा (भारतीय कला को बिहार की देन, पटना) मे शाहावाद जिलासँ प्राप्त एकटा कार्तिकेयक प्राचीन मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। एकटा हाथमे बरछी ओ दोसर वरमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। ओ विवाह नहि कयलनि, तँ कुमार कहबैत छथि। मुदा हुनक शक्ति देवसेनाक परिकल्पना कयल गेल अछि जे सप्तमातृकामे कौमारीक रूपमे प्रतिष्ठित छथि। एहि शक्तिक चित्र (सं.१०१) आलोच्य पोथीमे प्रकाशित अछि। तदनुसार द्विभुजी कार्तिकेयक शक्ति स्थानक मुद्रामे ठाढ़ छथि। वरमुद्रामे एवं पार्श्वमे मयूरी विनीत भावमे ठाढ़ अछि। डॉ कंचन सिन्हाक एहि सम्बन्धमे शोध ग्रंथ प्रकाशित अछि- कार्तिकेय इन इण्डियन आर्ट एण्ड लिटरेचर (दिल्ली १९७९ ई.)। तहिना मिथिलांचलक किछु गणेश मूर्तिक अनुशीलन डॉ चितरंजन प्र. सिन्हा (मिथिला भारती, अंक-१, भाग-२) प्रकाशित अछि।
पाली (दरभंगा)क गुप्तकालीन पार्वतीक गोदमे गणेश मातृस्नेहक सुख पावि रहल छथि, तहिना भागलपुर जनपदसँ प्राप्त एकटा ऐतिहासिक, प्रस्तरमूर्तिमे चतुर्भुजी पार्वतीक गोदमे कार्तिकेय शोभित छथि (सम्प्रति पटना संग्रहालयमे संरक्षित)। मुदा लालगंज (वैशाली)क शिवपरिवारक एकटा विशाल मूर्तिमे बसहाक पीठपर शिव-पार्वती ओ गणेश-कार्तिकेय सभ केओ संगे अभिशिल्पित छथि। मिथिलांचलमे कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रतिमा गणेशक अपेक्षा कम भेटाएल अछि मुदा बसाढ़ (वैशाली) ओ बसुआरा (मधुबनी)क कार्तिकेयक पालकालीन प्रस्तर मोर्ति ऐतिहासिक एवं दुर्लभ कलाकृति थिक। दक्षिण भारतमे हिनक पूजा-अर्चना विशेष होइछ। आजुक सांस्कृतिक परिवेशमे नवरात्रक अवसरपर प्रतिवर्ष निर्मित दुर्गाक मूर्तिक पार्श्वमे गणेश-लक्ष्मी ओ कार्तिकेय-सरस्वतीक मूर्तिक लोकप्रियता विशेष अछि।
एक दिस गणपति गणेश नटराज शिवक परम्परामे नृत्यनाथक रूपेँ मल्लकालीन मैथिली नाटकसभ (नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास, प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”, विराटनगर, नेपाल, १९७२ ई.)मे संपूजित छथि तँ दोसर दिस ओ मैथिली लोकगाथा गायनसँ पूर्व हिनक भक्तिपूर्ण स्मरण कयल जाइछ। एवं प्रकारेँ मिथिलांचलक प्रायः समस्त जनजीवनमे कोनो न कोनो रूपेँ ओ लोकक श्रद्धापूर्वक निवेदित अछि।
नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, एन.आइ.एफ.डी., जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।”
शरत्पूर्णिमा / कोजगरा
मिथिलांचलमे शरत्पूर्णिमा कऽ अपन कुलदेवी-देवता (गोसाउन) सहित भगवती लक्ष्मीक पूजन कैल जाइत छैन।अहि पूजाके पूर्णिमा तिथिक प्रदोश काल अर्थात्‌ संध्याकाल कैल जाइत अछि। अहिमे पूजाक समय पूर्णिमा भेनाई आवश्यक छै।ओहि दिनक सुर्योदयक समय पूर्णिमा होई नहि होई तकर महत्व नहि रहै छै।पान, मखान, दही, केरा, नारिकेर संग विभिन्न पकवानक नैवेद्य चढ़ायल जाइत अछि।
नवविवाहित के लेल ई पाबनि विशेष रूपसऽ महत्वपूर्ण होइत अछि।विवाहक पहिल वर्षमे पड़ैवला शरत्पूर्णिमाके कोजगराक रूपमे मनाओल जाइत अछि। अड़िपन क बड़के चुमाओन होइत अछि।ई पाबनि बड़क घर पर होइत अछि आ कनिया पक्ष सऽ बड़क कपड़ा, छत्ता, तथा मखान सहित पूरी पकवान आबैत अछि। तकर बाद पान मखान सहित पकवान बॉंटल जाइत अछि।
अहि वर्ष कोजगरा १४अक्टूबर, २००८, मंगलदिन कऽ अछि।



जितमोहन झा घरक नाम "जितू" जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि।
नारीक प्रति दोहरा दृष्टिकोण कियेक ....?
नारी अपन संस्कारसँ परिवार, समाज आर राष्ट्र कए एक नव दिशा प्रदान करैत छलीह ! अपन मिथिला आर भारतीय संस्कृतिमे नारीकेँ देवीक स्वरुप मानल गेल छलनि ! मुदा दोसर तरफसँ ओइ देवीक संग पशुवत व्यवहार कएल जाइत छनि! हुनका खाली जिम्मेदारी आऽ उत्तरादायित्व ढोबए बला साधन मानल जाइत छनि! वर्तमान समयमे नारीकेँ दोहरी भूमिकाक निर्वाह करए पड़ैत छनि!
यदि आइ कोनो महिला उच्च पदपर आसीन छलीह तँ हमर पुरुष प्रधान समाज हुनकासँ ईहो अपेक्षा राखैत छल की ओ रुढिवादी, नियम परंपराक पालन करैत.....अहीँ कहू ई कोना संभव अछि ? घर होए वा बाहर सभ ठाम नारी (औरत) क शोषण देखल गेल अछि, चाहे ओ मानसिक रूप सँ होए वा शारीरिक रूपसँ ! विकट परिस्थितिसँ गुजरबाक कारण वर्तमान समाजमे नारीक जीवन जटिलसँ जटिलतम भs रहल छनि!
आजुक भागदौड़ भरल जिंदगीमे उच्च पदपर आसीन नारी कs जते काजक दबाब निरंतर बनल रहए छनि ओतहि दोसर तरफ हुनका परिवारक जिम्मेदारी बखूबी एहि तरहेँ निभाबए पड़ए छनि, की कतहु कोनो कमी नञि रहनि, हुनकर एहि तरहक जिंदगी हुनका खाली मशीनक एक कलपुर्जा बना कs राखि देने छनि!
परिवार आर अपन कर्मक्षेत्रमे सामंजस्य बैसाबएमे नारी स्वयंकेँ असमंजसमे पबैत छलीह ! ई सब उत्तरादायित्वकेँ निभावैतो यदि हुनकामे कोनो कमी रहि जाय छनि तँ हम सब हुनका अपराधीक भांति समाज व परिवार कट्घारामे ठाढ़ कऽ दैत छी ! अइ सभक बिच ओ अपन स्वयंक इच्छा, कल्पना आर ख़ुशीकेँ अपन मनेमे दफन कऽ दैत छथि !
एतेक सभ जिम्मेदारीक निर्वाह करब बादो हुनका नञि तँ घरमे नञि कार्यक्षेत्रमे काजक प्रति संतोषजनक स्थिति प्राप्त होइत छनि!! दोसर तरफ जे नारी नौकरी नञि करैत छथि हुनकर स्थिति तँ कोल्हूक बरदक समान छनि ! परिवारक सभ सदस्य अपन इच्छाकेँ हुनकापर थोपि दए छनि, तकर बावजूदो हुनका सभकेँ ताना सुनए पड़ए छनि ! एक आज्ञाकारी वधु, पत्नी, माँ बनि अपन पूरा जीवन समर्पित कऽ देब हुनकर अभीष्ट छनि !
एहि तरहक दावा कएल जाइत अछि की नारीकेँ लऽ कऽ समाजक दृष्टिकोणमे बदलाव आयल अछि, मुदा रुढिवादी परंपरावादी वर्जना तँ आइयो विद्यमान अछि ! हमसब जते दुई कदम आधुनिक समाजक दिस बढेने छी ओतबे दस कदम पीछाँ लौटल छी, तँ आखिर हम सब कतए छी ? संघर्ष आर सामंजस्यक पाटमे नारीक जीवन पूर्ण रूपेँ पिसि गेल अछि ! बाहरी आवरणमे बदलाव जरुर भेल छल मुदा आंतरिक आवरण जहिनाक तहिना अछि !
समाज आर परिवारक कठोर व्यवहारक कारण नारीक संवेदना भीतरे-भीतर दफन नञि होइन, ताहि हेतु हमरा सभकेँ चाही की समाज आऽ परिवारक नियम, अनुशासन केँ कड़ा बंधनमे नञि जकड़ि कऽ हुनका प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाबी .......
बालानां कृते
१.भाट-भाटिन -गजेन्द्र ठाकुर
२. देवीजी:-यातायात एवम्‌ अन्य सुरक्षा नियम ज्योति झा चौधरी
भाट-भाटिन
एकटा छल भाट आऽ एकटा छलि भाटिन।
भाटिन एकटा मणिधारी गहुमनसँ प्रेम करैत छलि। ओऽ साँप लेल नीक निकुत बनबैत छलि आऽ भाटकेँ बसिया-खोसिया दैत चलि। भाट दुबर-पातर होइत गेल। मुदा भाटिन ओकरा जिबए नहि दए चाहैत छलि से ओऽ साँपकेँ कहलक भाटकेँ डसि लए लेल।
आब साँप भाटकेँ काटए लेल ताकिमे रहए लागल। एक दिन जखन भाट धारमे पएर धोबए लेल पनही खोलि कए रखलक तखने साँप ओकर पनहीमे नुका गेल। भाट आएल आऽ पहिरबाक पहिने पनही झारलक तँ ओऽ साँप खसि पड़ल। भाट पनहीसँ मारि-मारि कए साँपक जान लऽ लेलक आऽ ओकरा मारि कए वरक गाछपर लटका देलक।

चित्र: ज्योति झा चौधरी
भाट जखन गामपर पहुँचल तखन ओऽ अपन कनियाँकेँ सभटा खिस्सा सुनेलक। आब भाटिनक तँ प्राण सुखा गेलैक। ओऽ भाटक संग वरक गाछ लग गेल आऽ अपन प्रेमी साँपकेँ मरल देखि कए बेहोश भऽ गेल। भाट ओकरा गामपर अनलक। भाटिन दुखी भऽ असगरे वरक गाछपरसँ साँप उतारि ओकरा नौ टुकड़ा कए घर आनि लेलक। भाटिन साँपक चारि टा टुकड़ी चारू खाटक पाइसक नीचाँ, एकटा मचियाक नीचाँ, एकटा तेलमे, एकटा नूनमे, एकटा डाँरमे आऽ एकटा खोपामे राखि लेलक। फेर भाटकेँ कहलक जे खाट, मचिया, नून-तेल, डाँर आऽ खोपामे की अछि से बता नहि तँ भकसी झोका कए मारबौक। भाट नहि बता सकल आऽ ओऽ कहलक जे मरबाऽ सँ पहिने ओऽ बहिनसँ भेँट करए चाहैत अछि आऽ ताहि लेल दू दिनुका मोहलत ओकरा चाही। भाट अपन बहिन लग गेल तँ ओऽ अपन भाइक औरदा जोद्इ रहल छलि। सभ गप जखन ओकरा पता चललैक तखन ओऽ कहलक जे ओहो संग चलत ओकर। रस्तामे एकटा धर्मशालामे रातिमे दुनू भाइ-बहिन रुकल, मुदा बहिन चिन्ते सुति नहि सकल। तखने धर्मशालाक सभटा दीआ एक ठाम आबि कए गप करए लागल। भाटक बहिनक कोठलीक दीआ कहलक जे भाटिन अपन वर भाटकेँ मारए चाहैत अछि आऽ ओऽ जे फुसियाहीक प्रहेलिका बनेने अछि, से ओकर प्रेमी मरल गहुमनकेँ ओऽ टुकड़ी कए ठाम-ठाम राखि देने अछि आऽ तकरे प्रहेलिका बना देने अछि। आब भोरमे जखन दुनू भाइ बहिन गामपर पहुँचलि तँ बहिन अपन भौजीकेँ कहलक जे ओऽ सेहो प्रहेलिका सुनए चाहैत अछि। भाटिन कहलक जे जौँ ओऽ प्रहेलिका नञि बुझि सकल तखन ओकरो भकसी झोँका कऽ ओऽ मारि देत। तखन ननदि कहलक जे यदि ओऽ प्रहेलिकाक उत्तर दए देत तखन भौजीकेँ भकसी झोका कए मारि देत। आब जखने भाटिन प्रहेलिका कहलक तखने बहिन सभटा टुकड़ी निकालि-निकालि कऽ सोझाँ राखि देलक आऽ भौजीकेँ भकसी झोका कऽ मारि देलक।

२. देवीजी: ज्योति झा चौधरी
देवीजी :
देवीजी यातायात एवम्‌ अन्य सुरक्षा नियम
एक दिन देवीजी विद्यालय दिस आबिये रहल छली कि कोनो गाड़ीके बहुत जोर सऽ ब्रेक लगाबऽ के आवाज सुनाई देलकैन।घुरिकय तकली तऽ एकटा कारके टेढ़ भऽ कऽ रूकल पौली।गाड़ीक ड्राइवर एकटा बच्चाके डॉंटि रहल छल।संजोग सऽ ओ बच्चा हुनके विद्यार्थी छलैन आ ककरो चोट नहिं लागल छल।लोक सभ सेहो जमा हुअ लागल ।लोक सब अपन गामक बच्चाके पक्षलऽ उल्टे कारचालक पर बाजि रहल छल।देवीजी ओतऽ पहुंचली।ओ कनिक हाल तऽ स्वयम्‌ देखने रहैथ।तैं हुनका कोनो शंका नहिं रहैन जे अहिमे बालकेके गलती अछि। तखनो ओ बालक आ लोकसबसऽ पुछली तऽ पता चललैन जे गाड़ी नजदीक रहै तैयो बच्चा दौड़कऽ सड़क पार केनाइ शुरू केलक। ओ गाड़ीवान सऽ माफी मॅंगली आ ओकरा गाड़ी समय पर रोकइ लेल धन्यबाद देली।

चित्र: ज्योति झा चौधरी
तकर बाद ओ ओहि बालक के संगे विद्यालय विदा भेली।रस्ता भरि ओकरा यातायातक सुरक्षा दऽ बुझाबैत रहली।कहलखिन जे सड़कपर चलै काल कोनो बातक हड़बड़ी नहिं करैके चाही। दुर्घटना ककरो गलती सऽ भऽ सकैत छै चाहे ओ गाड़ी चलाबऽवला होई वा पैरे चलै वला लेकिन अपना दिस सॅं जरूर सावधान रहैके चाही।अपन सावधानी सॅ दुर्घटना रोकल जा सकैत छै।
फेर देवीजी विद्यालय पहुंचि सबके यातायातके सामान्य नियम जे पैरे चलनिहार के बुझल रहबाक चाही से बतेलखिन।कहलखिन जे शहरमे टै्रफिक लाइट होइत अछि। गाड़ीके निर्देशित करैवला बत्ती जखन लाल भऽ जाई आर पदयात्रीक निर्देशन वला बत्ती हरियर होइ तखन आगा बढ़बाक चाही। जॅं बत्तीक व्यवस्था नहि होई केवल जेब्रा क्रॉसिंग होई तऽ ओहि पर चलैके चाही।ओतऽ गाड़ीवानके गाड़ी आस्ते एवम्‌ आवश्यकता पड़ला पर रोकक नियम छै।तंद खाली सड़कके बदले जेब्रा लाइन पर सड़क पार करी। लेकिन दुर्भाग्य सऽ गामसबमे दुनुक व्यवस्था नहिये अछि आ सड़क तेहेन खराब अछि जे कियो गाड़ीवान बेसी तेज गाड़ी चलाबऽके हिम्मत नहिं करता तैयो बिना दुनु कात तकने आ बिना आश्वस्त केने जे गाड़ी दूर अछि आगा नहि बढी़ ।दौड़क सड़क पार करक परिस्थिति हुए तऽ कनि प्रतीक्षा कऽ ली। एम्बुलेंस़, अग्निशामक वाहन, पुलिसक वाहन आदि के हमेशा पहिने जाय देबाक चाही।अही प्रसंगमे देवीजी सबके मेलामे घुमैकालक सावधानी सेहो सिखेलखिन। सबके असगर बहराई सऽ, अंचिन्हार लोकसऽ बात करै सऽ आऽ अनेर-गनेर चिज खाई सऽ मना केलखिन। मानवजीवन अमूल्य छै अकर रक्षाकऽ संसारक कल्याणमे लगाबक चाही।
तकर बाद देशक राष्ट्रपिताक बात उठल।कारण दू अक्टूबर, जहिया महात्मा गॉंधीक तथा लाल बहादुर शास्त्रीजीक जन्मदिवस छलैन, आबि रहल छल।अहिंसाक अमोघ मंत्र दैबला महात्मा गॉंधीजीक सात्विक जीवनशैली पर सबहक ज्ञान बढ़ल।देवीजी अपन अध्यापन समाप्त करैकाल सबके जानकारी देलखिन जे गॉंधी-जयन्ती कऽ विद्यालय तऽ बन्द रहत किन्तु सॉंझमे महात्मा गॉंधीजीक श्रद्धांजली दैलेल कार्यक्रमक आयोजन रहत तैं सबके तैयारीक संग पहुंचक छल।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
मैथिलीक मानक लेखन-शैली

१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।

१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकँक कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू।
ग्राह्य/अग्राह्य

1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए
61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
67. मानक मैथिली_३
68. तका’ कए तकाय तकाए
69. पैरे (on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे’
81. से/ के से’/के’
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा’
94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग ल’ग
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (to test)चिखइत
126. करइयो(willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग ल’ग
141. खेलाइ (for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो
145. केश (hair)
146. केस (court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो ड’रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के’
169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
193. से से’
194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा’
201. देखाय देखा’
202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब


VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS

Marriage dates as per KSD Samskrit University Panchang- 2008-09
november 2008 19,20,23,24,27,28,30, december 2008 1,3 february 2009 26,27, march 2009 4,9,11,12 april 2009 16,17 19,20,22,23,27,29, may 2009 3,4,6,7,8,17,20,21,24,25,31, june 20091,3,4,5,7,8,12,17,21,26,28,29 july 2009 1,2

YEAR 2008-09 FESTIVALS OF MITHILAमिथिलाक पाबनि-तिहार
Year 2008
ashunyashayan vrat- 19 july अशून्यशयन व्रत mauna panchmi- 23 july मौना पंचमी

madhusravani vrat samapt 4 august मधुश्रावनी व्रत समाप्त nag panchmi 6 august नाग पंचमी
raksha bandhan/ sravani poornima 16 august रक्षा बन्धन श्रावनी पूर्णिमा kajli tritiya 19 august कजली त्रितीया

sri krishna janmashtami- 23 august श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

srikrishnashtami 24 august श्रीकृष्णाष्टमी


kushotpatan/ kushi amavasya 30 august कुशोत्पाटन / कुशी अमावस्या haritalika vrat 2 september हरितालिका व्रत

chauth chandra 3 september चौठ चन्द्र

Rishi panchmi 4 september ऋषि पंचमी


karma dharma ekadasi vrat 11 september कर्मा धर्मा एकादशी व्रत indrapooja arambh 12 september इन्द्रपूजा आरम्भ anant pooja 14 september अनंत पूजा

agastya ardhdanam 15 september अगस्त्य अर्धदानम
pitripaksh aarambh 16 september पितृपक्ष आरम्भ

vishvakarma pooja 17 september विश्वकर्मा पूजा indr visarjan 18 september इन्द्र विसर्जन

srijimootvahan vrat 22 september श्री जीमूतवाहन व्रत
matrinavmi 23 september मातृनवमी somaavatee amavasya 29 september सोमावती अमावस्या

kalashsthaapana 30 september कलशस्थापन

vilvabhimantra/ belnauti 5 october विल्वाभिमंत्र/ बेलनौति


patrika pravesh 6 october पत्रिका प्रवेश mahashtami 7 october महाष्टमी mahanavmi 8 october महानवमी vijayadasmi 9 october विजयादशमी
kojagra 14 october कोजगरा dhanteras 26 october धनतेरस

deepavali- diyabati-shyamapooj a 28 october दीयाबाती/ श्यामापूजा/ दीयाबाती annakuta-govardhan pooja 29 october अन्नकूट गोवर्धन पूजा


bratridvitiya/ chitragupt pooja 30 october भ्रातृद्वितीया

khashthi kharna 3 november षष्ठी खरना

chhathi sayankalika arghya 4 navamber छठि सायंकालिक अर्घ्य

samaa pooja arambh- chhathi vratak parana 5 november सामा पूजा आरम्भ/ छठि व्रतक पारना


akshaya navmi 7 november अक्षय नवमी

devotthan ekadasi 9 november देवोत्थान एकादशी vidyapati smriti parv11 november विद्यापति स्मृति पर्व कार्तिक धवल त्रयोदशी kaartik poornima 13 november कार्तिक पूर्णिमा
shanmasik ravi vratarambh 30 november षाणमासिक रवि व्रतारम्भ

navan parvan 4 dec. नवान पार्वन

vivah panchmi 2 december विवाह पंचमी



Year 2009
makar sankranti 14 january मकर संक्रांति

narak nivaran chaturdasi 24 january नरक निवारण चतुर्दशी

mauni amavasya 26 january मौनी अमावस्या

sarasvati pooja 31 january सरस्वती पूजा


achla saptmi- 2 february अचला सप्तमी

mahashivratri vrat 23 february महाशिवरात्रि व्रत janakpur parikrama 26 february जनकपुर परिक्रमा holika dahan 10 march होलिका दहन
holi/ saptadora11 march होली सप्ताडोरा varuni yog 24 march वारुणि योग vasant/ navratrarambh 27 march वसंत नवरात्रारम्भ basant sooryashashthi/ chhathi vrat 1 april बसंत सूर्यषष्ठी/ छठि व्रत


ramnavmi 3 april रामनवमी

mesh sankranti 14 april मेष संक्रांति jurisital 15 april जूड़िशीतल

akshya tritiya 27 april अक्षय तृतिया
shanmasik ravivrat samapt 3 may षणमासिक रविव्रत समाप्त

janki navmi 3 may vatsavitri 24 may जानकी नवमी

gangadashhara 2 june गंगादशहरा
somavati amavasya 22 june सोमवती अमावस्या
jagannath rath yatra 24 june जगन्नाथ रथयात्रा saurath sabha arambh 24 june सौराठ सभा आरम्भ


saurath sabha samapti 2 july सौराठ सभा समाप्ति harishayan ekadashi 3 july हरिशयन एकादशी
aashadhi guru poornima 7 july आषाढ़ी गुरु पूर्णिमा



















Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). She had been honorary teacher at National Association For Blind, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

SahasraBarhani:The Comet

Having own surroundings and experiences of ups and downs of life the nightmares father’s job problems – among all of these my study was going on. I remember that one day my father just kicked the bag presented by a contractor. The bag fell far away by dispersing all notes all over the ground. My cousin brother had collected all money, put them back in the bag and handed that bag over to the contractor. He also instructed him to run away otherwise my father would call the police. My mother had hidden me inside the house. I was too young to know all those things but I understood that my father was offered a bride to favour that contractor. Father kept on murmuring for a long time after that. Some times lack of appropriate salt in food was giving him enough reason to be angry and through the plate. The sound of plate hitting the wall was very terrifying. After a few minutes of silence all kids were called and pampered a lot. I used to be first in my class. On the day of getting result my aunt used to give me home made sweet balls made up of flour and jiggery. I can not forget the taste of that sweet yet. That aunt had one insane brother-in-law, younger brother of her husband. Once I was crossing the Ganges by steamer with him and he suddenly started trying to throw his brother into the river. That aunt had a daughter called Rajani. I don’t know what kind of disease she was suffering from but allopathic medicines laid her on bed. We often used to visit her house to know her wellness. I was a little shy in going anywhere alone but used to visit her house every now and then with some one. We used to call her did. She was too elder to us. She died after some time. My confusion about my aunt’s behaviour was increased after that death. She sent her sons to school in the next day of her daughter’s death. Her cruel behaviour had been criticised by the neighbours for a long time. A brother of that aunt was lecturer in the Mujaffarpur Institute of Technology from which my father had completed his engineering degree. He visited our house in Ganga Bridge Colony and scolded his brother-in-law for such negligence. He was of the opinion that due to lack of money my uncle couldn’t avail right treatment to his daughter. I was also of the same opinion that with help of good doctors in Patna death can be conquered. But when my brother informed me that there were a numbers of atom bombs was present in the world a single one of which can destroy the entire world then my logic was failed.
It was a good experience for me after which I was daring enough to take small accidents easily. I started living a relaxed life. Any kind of fear of death and life could not threaten me and I was not running after a particular aim. I used to like such sports where individual talents were recognised. I started avoiding team works. I didn’t like to blame other people for own failure.
I was hardly getting any time for playing after school and studies. The loss of interest towards my aim was not present that time. At that time I was dreaming of winning the world. Second position had no value for me. Second position meant failure for me. I loved to be first in all fields- either sports, or studies or fight.
We used to visit village very frequently. In village my uncle used to tell the teacher of the school at the side of Mahadev pond and I was getting opportunity to visit school in holidays too. The children of town could never know the names of such games like kabaddi, satgarhiya, laal chadi etc. So the pattern of study was very different from cities. I was tired of writing a diary with ink pen made up of bamboo stick.

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VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR

ENGLISH SAMSKRIT MAITHILI
Journey प्रयाणम् यात्रा
Is there any bus available from here to go to Vikaspuri? इतः विकासपुरीं गन्तुं लोकयानं लभ्यते किम्? एतएसँ विकासपुरी जएबाक लेल कोनो बस अछि की?
Yes, it is available. आम्, लभ्यते। हँ, अछि।
Which bus goes to Janakpuri? जनकपुरी लोकयानस्य का संख्या? कए नम्बरक बस जनकपुरी जाइ-ए?
Bus number 277 and 65 both go to Janakpuri. २७७, ६५ लोकयानद्वयमपि जनकपुरीं गच्छति। २७७ आऽ ६५ दुनू बस जनकपुरी जाइ-ए।
There is quiet a crowd in that bus. तस्मिन् लोकयाने महान् सम्मर्दः अस्ति। ओहि बसमे बड्ड भीड़ अछि।
There is no numberplate or nameplate on that bus. तस्मिन् लोकयाने संख्याफलकं वा नामफलकं वा किमपि नास्ति। ओइ बसपर कोनो नम्बरप्लेट आकि नेमप्लेट नहि लिखल अछि।
A superfast bus just went. इदानीम् एव एकं तीव्र-गति-लोकयानं गतम्। एखने एकटा सुपरफास्ट बस गेल अछि।
Come fast, the bus has started. शीघ्रम् आगच्छतु, लोकयानं प्रस्थितम्। जल्दी आऊ, बस खुजि रहल अछि।
There is a vacant place near the window. वातायनसमीपे रिक्तं स्थलम् अस्ति। खिड़की लग एकटा जगह खाली अछि।
When will this bus leave? कदा वा निर्गच्छति एतत् लोकयानम्? कखन ई बस खुजत?
6.10 is the departure time. निर्गमनसमयः दशाधिक-षडवादनम् अस्ति। ६ बाजि कए १० मिनटपर खुजबाक समय छैक।
Go forward. अग्रे गच्छतु। आगू जाऊ।
Give change, please. परीवर्तं ददातु। खुदरा दिअ।
Do we get off at the next stop? अग्रिम-स्थानके अवतरणीयं किम्? हमरा सभ अगिला स्टॉपपर उतरब की?
I am buying the ticket. अहं यात्रापत्रं क्रीणामि। हम टिकट कीनि रहल छी।
Give two tickets for Girinagar. गिरिनगरार्थं यात्रापत्रद्वयं ददातु। गिरिनगर लेल दू टा टिकट दिअ।
Get down quickly. शीघ्रम् अवतरतु। जल्दी उतरू।
Is it very far? बहु दूरे अस्ति किम्? ई बड्ड दूर अछि की?
It is just ten minutes distance. इतः केवलं दशनिमेषाणां मार्गः। मात्र दस मिनटक दूरी अछि।
TRAIN रेलयानम् ट्रेन
Where should I buy a ticket? यात्रापत्रं कुत्र क्रेतव्यम्? कतएसँ हम ट्कट कीनी?
See, the ticket selling counter is there. यात्रापत्रस्य क्रयण-स्थानं तत्र अस्ति पश्यतु। देखू, टिकट बेचबाक काउन्टर ओतए अछि।
A very long queue is there. तत्र बहु दीर्घा अनुपङ्क्तिः अस्ति। ओतए बड़ पैघ पंक्ति अछि।
Where is the reservation form available? आरक्षणस्य प्रार्थनापत्रं कुत्र लभ्यते? आरक्षणक आवेदनपत्र कतएसँ भेटत?
Let us ask at the enquiry counter. पृच्छाविभागे पृच्छामः। चलि कए पूछताछ काउन्टरसँ पुछैत छी।
Reservation was not available for the tenth. दशमदिनाङ्कस्य कृते आरक्षणं न लब्धम् एव भोः। १० तारेखकेँ आरक्षण उपलब्ध नहि छलए।
Give five platform-tickets please. पञ्च स्थानकप्रवेशकानि ददातु। पाँच टा प्लेटफॉर्म टिकट दिअ।
Has the reservation been confirmed? आरक्षणं निश्चितम् अभवत् किम्? की अरक्षण निश्चित भऽ गेल?
No, it is still in the waiting list. न, इतोऽपि प्रतीक्षा-सूच्यताम् अस्ति। नहि, ई एखनो प्रतीक्षासूचीमे अछि।
What is your coach number? भवत्याः यान-कक्षस्य कः क्रमाङ्कः? अहाँ कोच नम्बर कतेक अछि?
What is your seat number? भवतः आसनक्रमाङ्कः कः? अहाँक सीट क्रमांक की अछि/
My seat number is 29. मम असनक्रमाङ्कः नवविंशतिः अस्ति। हमर सीट संख्या उनतिस अछि।
G.T.Express is late by three hours. जी.टी. यानस्य घण्टात्रयस्य विलम्बः। जी.टी.एक्सप्रेस तीन घण्टा लेट अछि।
How many suit-cases do you have? भवतां कति यानपेटिकाः सन्ति? अहाँ लगमे कैऽ टा सूटकेश अछि?
The luggage is too much. बहु अधिकवस्तूनि सन्ति। बड्ड बेशी समान अछि।
A porter is very necessary. भारवाहकः आवश्यकः एव। एकटा कुली आवश्यक अछि।
Be careful about money. धनविषये जागरूपः भवतु। धनक प्रति जागरूप रहू।
You have taken every thing, haven’t you? सर्वं स्वीकृतवान् किल? अहाँ सभ छी लऽ लेलहुँ ने?
You won’t get the train if you don’t go quickly. भवान् शीघ्रं न गच्छति चेत् यानं न लभ्यते। यदि अहाँ तेजीसँ नहि जाएब तखन ट्रेन नहि पकड़ाएत।
How much does the ticket cost? यात्रापत्रस्य किं मूल्यम्? यात्रा-टिकटक कतेक दाम छैक?
Let us request the ticket-checker. यात्रापत्रनिरीक्षकं निवेदयामः। हमरासभ टिकट निरीक्षकसँ निवेदन करी।
How long does the train stop here? यानम् अत्र कियत्-कालं तिष्ठति? ट्रेन एतए कतेक काल ठाढ़ होइ-ए?
Only for three minutes. निमेष-त्रयं केवलम्। मात्र तीन मिनट।
At what time does the train reach Delhi? यानं देहलीं कस्मिन् समये प्राप्नोति? ट्रेन दिल्ली कखन पहुँचए छैक?
It reaches at 10 o’clock. दशवादने प्राप्नोति। दस बजे पहुँचए छैक।
There are still two hours. इतोऽपि घण्टाद्वयम् अस्ति। एखनो दू घण्टा बाँकी अछि।
Let us adjust a little. किञ्चित् समञ्जनं कुर्मः। कनी ससरि के जगह बनाऊ।
Please, take the hold-all. कृपया सर्वबन्धकं स्वीकरोतु। कृपया ई खुट्टी पकड़ू।
This fan doesn’t work. एतत् व्यजनं न चलति। ई पंखा नहि चलए-ए।
Will you open the window? वातायनम् उद्धाटयति किम्? अहाँ कनी खिड़की खोलब की?
Sure अवश्यम्। निश्चित।

पूर्वतन् पाठे वयम् यदा तदा इत्यस्मिन् विषये अभ्यासम् कृतवन्तः। इदानीम पुनः किंचित् अभ्यासम् कुर्मः।

यदा सूर्योदयः भवति तदा कमलम् विकसति। जखने सूर्योदय होइत अछि तखन कमल फुलाइत अछि।
यदा अहम् अमेरिका देशं गतवती तदा न्याग्राजलपातं दृष्टवती। जखन हम अमेरिका गेल रही(स्त्री.) तखन न्याग्रा जलप्रपात देखने रही।
यद्य अहं छात्रा आसम् तदा संस्कृतम पठितवती। जखन हम छात्रा रही तखन संस्कृत पढ़ने रही।
अहं वाक्यं वदामि, भवन्तः यदा तदा इति योजयित्वा वदन्तु।
यदा मेघाः भवन्ति तदा मयूरा नृत्यं कुर्वन्ति। जखन मेघ अबैत अछि तखन मोर नछैत अछि।
यदा कोलाहलाः भवति तदा आरक्षकाः आगच्छन्ति। जखन कोलाहल होइत अछि तखन प्रहरी अबैत छथि।
यदा आरक्षकः आगच्छन्ति तदा चोरः धावति। जखने प्रहरी अबैत छथि तँ चोर भागि जाइ-ए।
यदा वसंतकालः भवति तदा कोकिलः गायति। जखन वसंत ऋतु अबै-ए तखन कोइली गबै-ए।
यदा सूर्योदयः भवति तदा अंधकारः नश्यति। जहिना सूर्योदय होइ-ए तहिना अंधकारक नाश भऽ जाइ-ए।
यदा परीक्षा भवति तदा छात्रः मन्दिरं गच्छति। जखन परीक्षा अबै-ए तखन छात्र मन्दिर जाइ छथि।
यदा जन्मदिनम् अस्ति तदा नूतनवस्त्रं धरति। जहिया जन्मदिन होइ-ए तहिया नव वस्त्र पहिरै-ए।
यदा विद्युत गच्छति तदा तैलदीपं ज्वालयति। जहिना बिजली जाइ-ए तहिना लालटेन जरै-ए।
यदा अतिथिः आगच्छति तदा मधुरं करोति। जखन अतिथि आबय छथि तखने मधुर आबय-ए।
यदा शुनकः भषति तदा चोरः धावति। जहिना कुकुर भूकय-ए तहिना चोर भागय-ए।
यदा प्रातः कालः भवति तदा अहं पूजां करोमि। जखने भोर होइ-ए तखन हम पूजा करैत छी।

एषा अद्यतन पत्रिका, अद्यतन पत्रिकां पठितवती वा। ई आइ-के पत्रिका, अजुका पत्रिका पढलहुँ(स्त्री.) की?
अद्यतन पत्रिकायाम् कः विशेषः अस्ति। आजुक पत्रिकामे की विशेष अछि।

प्रधानमंत्री विदेशं गतवान्। प्रधानमंत्री विदेश गेलाह।
अद्यतन गृहपाठं लिखितवान् वा। आजुका गृहपाठ बनेलहुँ की।
श्वस्तन कार्यम् अद्य एव चिन्तयतु।काल्हुका काज आइये सोचू।
श्वस्तन गृहपाठम् अद्य एव लिखतु। काल्हिका गृहपाठ आइये लिखू।
ह्यस्तन पत्रिकायां संस्कृतं कथा आसीत्। क्आल्हिका पत्रिकामे संस्कृत कथा छल।
अद्यतन बालकाः श्वस्त पौराः। आजुक बालक काल्हुका युवा।
ह्यस्तन पत्रिकां पठितवान् वा। काल्हुका पत्रिका पढ़लहुँ की?
ह्यस्तन गृहपाठं लिखितवती वा। काल्हुका पाठ लिखलहुँ की(स्त्री.)।

इदानीम ह्यस्तन, श्वस्तन, अद्यतन इति उपयुज्य वाक्यानि वदन्ति वा।

विवेकानन्दस्य पूर्वतन नाम नरेन्द्रः। विवेकानन्दक पुरान नाम नरेन्द्र।
भारतदेशस्य पूर्वतन् नाम आर्यावर्तः। भारदेशक पुरान नाम आर्यावर्त।
लालबहादुर शास्त्री भारतस्य पूर्वतन प्रधानमंत्री। लाल बहादुर शास्त्री भारतक पूर्व प्रधानमंत्री।

इदानीन्तं बालाः बहु चतुराः भवन्ति। आइ-काल्हि बचियासभ बड़ चतुर होइ-ए।
इदानीन्तं युवकाः परिश्रमं न कुर्वन्ति। आइ-काल्हिक युवक परिश्रम नहि करैत छथि।
पूर्वतन् महिलाः सर्वक्षेत्रेषु कार्यं कुर्वन्ति। पहिने महिला सभ क्षेत्रमे कार्य करैत छलीह।
पूर्वतन् इदानीन्तन्

अद्य अहम् अत्र अस्मि। एकन हम एतए छी।
गत दिने अहं मैसूर नगरम् आसम्। पहिने हम मैसूरमे छलहुँ।
गत वर्षे मम सहोदरः विदेशं गतवान्। पछिला वर्ष हमर सहोदर विदेश गेलाह।
गत मासे मम सख्याः विवाहः आसीत्। पछिला मास हमर सखीक विवाह छल।
गत सप्ताहे मम् परीक्षा आसीत्। पछिला सप्ताह हमर परीक्षा छल।
गत दिने अहं चलचित्रं दृष्टवान्। पछिला दिन हम सिनेमा देखलहुँ।
गत सप्ताहे मम गृहे पूजा आसीत्। पछिला सप्ताह हमर घरमे पूजा छल।
गत वर्षे वर्ल्डकप आसीत्। पछिला वर्ष वर्ल्डकप छल।

आगामीमासे दीपावली भविष्यति। अगिला मास दीपावली अछि।
आगामी वर्षे/ सप्ताहे नागेशः चन्द्रलोकं गमिष्यति। अगिला साल नागेश चन्द्रलोक जएताह।

अहं शब्दद्वयं वदामि, योजयित्वा वाक्यं वदतु।

आगामी मासे परीक्षा भविष्यति। अगिला मास परीक्षा होएत।
आगामी वर्षे निर्वाचनं भविष्यति। अगिला वर्ष निर्वाचन होएत।
आगामी सप्ताहे महती वृष्टिः भविष्यति। अगिला सप्ताह खूब बरखा हेबाक चाही।
के के वदन्ति। सर्वे सिद्धाः।

आगामी मासे मम जन्मदिनं भविष्यति। अगिला मास हमर जन्मदिन अछि।

अद्य अहं मन्दिरं गतवती। तत्र पूजा प्रचलति स्म। अनन्तरम् उद्यानं गतवती। तत्र बालकाः क्रीडन्ति स्म। बालिका गायन्ति स्म। ज्येष्ठाः संभाषणं कुर्वन्ति स्म। एकः युवकः लिखति स्म। केचन् पठति स्म। अहम् अद्य पठामि स्म तदा विद्युत गता। अहं मार्गे गच्छामि स्म। एकः सर्पं दृष्टवती।

गच्छति इति वर्तमान कालस्य क्रियापदम् अस्ति। अत्र “स्म” इति शब्दस्य योजनेन भूतकालस्य अर्थः भवति।
पालयति स्म।
रामः राज्यं सम्यक् पालयति स्म। राम राज्य नीक जेकाँ करैत छलाह।
नागेशः बाले बहु रोदति स्म। नागेश नेनपनमे बड्ड कनैत छलाह।
तानसेनः सम्यक् गायति स्म। तानसेन बड्ड नीक गबैत छलाह।

स्म इति योजयित्वा पुनः तद् वाक्यं वदन्तु।

भोजः धारानगरं पालयति स्म।
ब्रिटिश जनाः भारते शासनं कुर्वन्ति स्म।
हरिश्चन्द्रः सर्वदा सत्यं वदति स्म।
माता उपदेशं करोति स्म।
पिता पूजां करोति स्म।
वयं क्रीडामः स्म।
सैनिकाः युद्धं कुर्वन्ति स्म।
वयं सर्वदा क्रीडामः स्म।
वयं सर्वदा निद्रां कुर्मः स्म।

सुभाषितम्
दानेन पाणिः न तु कङ्कणेन
स्नानेन शुद्धिः न तु चन्दनेन।
मानेन तृप्तिः न तु भोजनेन
ज्ञानेन मुक्तिः न तु मुण्डनेन॥

अस्माभिः श्रुतस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति।

पाणिः (हस्तः) दानेन शोभते, कङ्कणेन न। केवलं कङ्कणेन पाणिं न शोभते दानेन शोभते। शरीरस्य शुद्धिः केवल चन्दनलेपनेन् न भवति, अपितु स्नानेन भवति। केवल भोजनं करणें तृप्तिः न भवति, मानेन अभिमानेन तृप्तिः भवति। मुण्डनेन मुक्तिः न प्राप्यते, केवलं मुण्डनेन मुक्तिः न प्राप्यते ज्ञानेनैव मुक्तिः प्राप्यते।


(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

विदेह ०१ अक्टूबर २००८ वर्ष १ मास १० अंक १९- part-I

विदेह ०१ अक्टूबर २००८ वर्ष १ मास १० अंक १९



'विदेह' ०१ अक्टूबर २००८ ( वर्ष १ मास १० अंक १९ ) एहि अंकमे अछि:-
१.संपादकीय २.संदेश
३.मैथिली रिपोर्ताज- (लंदनसँ सुभाष साह)
४. गद्य
४.१.कथा सुभाषचन्द्र यादव(बनैत बिगड़ैत) कुमार मनोज कश्यप(भावना)
४.२.निबन्ध शक्ति शेखर(जोगार) ओमप्रकाश मीडिया कतअ ल जा रहल अछि?
४.३.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन-डॉ प्रेमशंकर सिंह
४.४.शोध लेख-स्व. राजकमल चौधरी पर (देवशंकर नवीन द्वारा)
४.५.यायावरी- कैलाश कुमार मिश्र (लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार)
४.६.दैनिकी-ज्योति /
उपन्यास-उनटा आँचर- गजेन्द्र ठाकुर
५.पद्य
५.१.श्यामल सुमनक-आत्म-दर्शन
५.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (चारिम खेप) ज्योतिक- असल राज
५.३.महाकाव्य- बुद्ध चरित
५.४.डॉ पंकज पराशरक कविता
५.५.विनीत उत्पलक ३ गोट कविता
५.६. महेश मिश्र "विभूतिक" कविता"
६. मिथिला कला-संगीत(आगाँ)
७.पाबनि-संस्कार-तीर्थ -मिथिलांचलक गाणपत्य क्षेत्र- प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन/
नूतन झा-कोजगरा
८. महिला-स्तंभ- - जितमोहन झा
९. बालानां कृते-१.भाट-भाटिन २. देवीजी
१०. भाषापाक रचना लेखन (आगाँ)
11. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani
12. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.)

विदेह (दिनांक १ अक्टूबर २००८)
१.संपादकीय (वर्ष: १ मास:१० अंक:१९)
मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक १९, दिनांक १ अक्टूबर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
एहि अंकमे:
श्री गगेयश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो। सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा, कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा, महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर- विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह, मौनजी, जितमोहन, ओमप्रकाश, शक्ति-शेखर, नूतन झा जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि।
श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी।
ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि।

शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि।
अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in
२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- "विदेह" ई जर्नल देखल। सूचना प्रौद्योगिकी केर उपयोग मैथिलीक हेतु कएल ई स्तुत्य प्रयास अछि। देवनागरीमे टाइप करबामे एहि ६५ वर्षक उमरिमे कष्ट होइत अछि, देवनागरी टाइप करबामे मदति देनाइ सम्पादक, "विदेह" केर सेहो दायित्व।
३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- "विदेह"क निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।
महत्वपूर्ण सूचना (५): १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि।
मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि।
रिपोर्ताज-

सुभाष साह, गाम-अरनाहा, जिला सरलाही, नेपाल। वर्तमानमे लंदन मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालयसँ बी.बी.ए.कए रहल छथि। सामाजिक कार्य, मैथिलक जुटान, सांस्क्र्तिक कार्यक्रम संचालनमे विशेष रुचि। यू.के. केर मधेसीक संगठनANMUK केर सक्रिय सदस्य आ सम्प्रति सचिव। नेतृत्व क्षमताक गुण संगहि प्रखर वक्ता।
लन्दनमे नेपाल मेला २००८
(लन्दनसँ श्री सुभाष शाहक रिपोर्ट)

लन्दन शहरमे पिकाडिली सर्कस नामक स्थान पर नेपाल एमबैशीक सहायता सऽ २१ आऽ २२ सितम्बर २००८ कऽ अहि मेलाक आयोजन कैल गेल छल जाहिमे नेपाल के पर्यटन मंत्री आदरणीया सुश्री हिशिला यामी नेपालक राजदूत श्री मुरारी राज शर्मा खैतान ग्रुपके चेयरमैन एवम्‌ मैनेजिंग प्रेसिडेंट श्री राजेन्द्र खैतान आदि सहित अन्य दिग्गज सब उपस्थित छलैथ।अतऽ इहो घोषणा कैल गेल जे साल २०११ के पर्यटन वर्षक रूपमे मनाओल जायत। सुश्री यामी सऽ हम सब अहू बात पर विचारविमर्श केलहुं जे 'लुम्बिनी' के पर्यटक सबलेल बेसी आकर्षक बनाबऽ लेल की कैल जा सकैत अछि।यामीजी अहि बात लेल प्रतिबद्ध भेली जे ओ सीता मैया एवम्‌ बुद्धदेवक इतिहास सऽ सम्बन्धित स्थानके विकासमे यथाशक्ति योगदान देती।
श्री नवीन कुमार एवम्‌ सुश्री सुनीता शाह द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक परिधानक फैशन शो अत्यन्त सफल रहल।हमरा सब अन्मुक (ANMUK- Association of Nepali Madheshis in UK) के सदस्य सबलेल अहि आयोजनक सफलता बहुत पैघ

प्रोत्साहन अछि।
(आभार - अन्मुक के वेबसाएट जाहि सऽ फोटो प्राप्त भेल )
४. गद्य
४.१.कथा सुभाषचन्द्र यादव(बनैत बिगड़ैत) कुमार मनोज कश्यप(भावना)
४.२.निबन्ध शक्ति शेखर(जोगार) ओमप्रकाश मीडिया कतअ ल जा रहल अछि?
४.३.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन-डॉ प्रेमशंकर सिंह
४.४.शोध लेख-स्व. राजकमल चौधरी पर (देवशंकर नवीन द्वारा)
४.५.यायावरी- कैलाश कुमार मिश्र (लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार)
४.६.दैनिकी-ज्योति /
उपन्यास-
उनटा आँचर- गजेन्द्र ठाकुर

१. सुभाषचन्द्र यादव २. कुमार मनोज कश्यप

चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।
बनैत बिगड़ैत

“हाह। हाह”।
टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा केँ सरापय लागै छै – “बज्जर खसौ, भागबो ने करै छै”।
कौवा कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलै! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै।
“हे भगवान, तूहीं रच्छा करिहक। हाह। हाह”।– माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै।
“धू, छोड़ू ने। कथी मे लागल छी। ओ अपन बेगरतेँ कर्रैत छै। अहाँक की लइए’- सत्तो बुझबै छै।
लेकिन मालाक मन नै मानै छै। अनिष्टक आशंका सँ डरायल ओ और जोर-जोर सँ होहकारा दै छै आ थपड़ी पाड़ै छै।
माला सब बेर एहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक, बात भीतर जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नै छै। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाइ काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तैं सत्तो नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा? ई सब तऽ मालाक खून मे मिल गेल छै। संस्कार बनि गेल छै।
सत्तो केँ छगुन्ता होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा-पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय। रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।
सत्तो सोचै अय अइ मे मालाक गलती नै छै। माला केँ सख लागले रैह गेलै जे नेहाय कऽ आयल छी तऽ पुतौह परैस कऽ खाइ ले देत आकि कहियो केशे झाड़ि देत या गोड़े हाथ दाबि देत। पोती केँ टांगैत-टांगैत तऽ छातीक हाड़ दुखाइत रहै। अपन कोखिक जनमल बेटो कहियो ई नै पुछलकै- माय केना छै?
कौवा उड़बै ले माला कखनो हाथ चमकाबैत अछि, कखनो मुँह चमकाबैत अछि। मगर ओकर धमकी-चमकी के कौवा पर कोनो असर नै भेलै। ओ ओहिना काँव-काँव करिते छै।
कौवाक टाहि सँ सत्तोक जी सेहो धक रहि जाइ छै। मन मे तरह-तरह के शंका आ डर पैस जाइ छै। लेकिन ओ कहुना अपना केँ बुझा लैत अछि। सत्तो संगे ई सब बेर होइ छै। कोनो अपसुगुन भेला पर आशंकित भऽ जाइत अछि। आशंका केँ बुधि आ तर्क सँ ठेल कऽ बाहर करैक कोशिश करैत अछि। कखनो संस्कारक फान मे लटपटाइत अछि। कखनो सम्हरैत अछि। फेर फँसैत अछि। फेर छुटैत अछि। ई सब बड़ी काल चलैत रहै छै।
कार कौवा तेना एकपरतार टाहि लगेने जा रहल छै जे कान में झड़ पड़य लागलै।
“देखियौ, ई कौवा तऽ केना-केना ने करै छै। नीक नै लागैए”।– माला व्याकुल भऽ जाइ छै।
“ई अहाँक मनक भरम छी”।– सत्तो कहै छै आ एकटा रोड़ी जुमा कऽ कौवा दिस फेकै छै।
कौवा उड़ि गेलै। उड़ल जाइत कौवा केँ सुना कऽ माला कहै छै- “हम ककरो कुइछ नै बिगाड़लिऐ अय। जा, चैल जा”।
कौवा आगू वला छत पर बैठ रहै छै आ फेर कर्रय लागै छै।
सत्तो केँ मोन पड़ै छै एक दिन बड़ी राति केँ माला ओकरा जगेलकै- “सुनै छिऐ? कुत्ता बड़ी काल सँ कानै छै। हमर जी छन-छन करैत अछि”।
सत्तो अकानलक। ठीके ढेरी कुत्ता कानैत रहै। आशंका सँ ओकरो मन सिहरि गेलै।
लेकिन ओ बाजल- “अरे, भूख सँ कानैत हेतै। देखै नै छिऐ आइ काल्हि कोय एक्को कर दै छै।
“भूख सँ एगो दूगो ने कानितिऐ, आकि सब कानितिऐ”?- सत्तोक तर्क मानै ले माला तैयार नै रहै।
“और सब केँ देखाउँस लागल हेतै”।– सत्तो दोसर तर्क देलकै।
माला केँ सतोक तर्क नै सोहेलै। ओकरा झुझुआयल सन चुप बैठल देख सत्तो फेर बुझेलकै- “देखै नै छिऐ विदाइ बेर मे की होइ छै। जहाँ एगो मौगी कानल कि सभक आँखि मे नोर आबि गेल”।
माला कने काल चुप रहल। फेर मूल बात पकड़ैत बाजल- “पहिने तऽ सब करे कर दैत रहै तबो किए कानैत रहै”?
“कोनो कुत्ते मैर गेल हेतै, तकरे सोग मे कानैत हैत”। - सत्तोक बात सँ माला संतुष्ट तऽ नै भेल, मगर कुत्तो सब कते कनितय। एगो चुप भेल। दूगो चुप भेल। आस्ते-आस्ते कानब घटैत गेलै। फेर गोटेक आध कुत्ताक कानब कखनो कऽ सुनाइ। बाद मे ओहो बन्न भऽ गेलै। माला आ सत्तो सेहो कखनो निन्न पड़ि गेल।
माला केँ कौवाक गुनधुन मे पड़ल देख सत्तो पुछै छै- “अहाँ कौवाक बोली बुझै छिऐ”?
माला कने काल बात केँ ताड़ैत रहल। बातक मरम बूझि खुखुवा उठल- “दुनियांक काबिल अहीं टा तऽ छी। अहाँ सन बुझक्कड़ और कोय छै”!
मालाक कटाह बोल सँ सत्तो केँ चोट लागलै। ओ चुप आ उदास भऽ गेल। ओकरा लागलै जे चीज पसिन नै पड़ै छै, तकरा प्रति लोग निष्ठुर आ अन्यायी भऽ जाइत अछि। कारी रंग आ टाँस आवाजक चलते कौवा केँ अशुभ बना देलक।
सत्तो केँ अपन नौ मासक पोती मोन पड़ै छै- मुनियां। कौवा देख मुनियां चहैक उठै। आह-आह कहि ओकरा बोलाबै। मुनियां कानय लागै तऽ सत्तो कौवे केँ हाक दै- “कोने गेलही रे कौवा ऽ ऽ? मुनियाक कौवा ऽ ऽ ? कोने गेलही ई ई “? ई सुनिते मुनियां चुप भऽ जाइ आ मूड़ी घुमा-घुमा कौवा केँ ताकय लागै।
कौवा बिलाइत जाइ छै। कुइछ दिनक बाद तऽ साफे अलोपित भऽ जेतै। अखैन ई बात ने माला जानै छै, ने मुनियां। कौवा मुनियांक जिनगी मे समा गेल छै। मुनियां केँ बेर-बेर कौवा मोन पड़ैत रहतै, दादा मोन पड़ैत रहतै। ने ओ कौवा केँ बिसैर सकैत अछि, ने दादा केँ। मुनियां कौवा केँ ताकैत रहत, दादा केँ ताकैत रहत। कहियो ने कौवा रहतै, ने दादा रहतै।
२. कुमार मनोज कश्यप

कुमार मनोज कश्यप
जन्म: १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आऽ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आऽ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

भावना

जेठ महिना मे तऽ सूरज जेना भोरे सँ आगि उगलऽ लगैत छैक। दुपहरिया तक तऽ वातावरण ओहिना जेना लोहा गलाबऽ बला भट्ठी। छुट्टी के दिन रह्ने भोर मे देरिये सँ उठलंहु; साईत तहु द्वारे कनिया भानस करबा मे अलसा रहल छलीह। अंततोगत्वा निर्णय भेल - भोजन बाहरे कैल जाय।

घर सँ बाहर निकललंहु। बाहर एकदम सुनसान - एक्का दुक्का लोक चलैत - सेहो साईत मजबूरीये मे। कियैक निकलत केयो घर सँ एहन समय मे? एहन रौद मे निकलनाई कोनो सजा सँ कम थोड़बे छैक। बड़ मसकत्ति के बाद एक टा रिक्सावला तैयार भेल लऽ जेबाक हेतु। रिक्सावला कि - अधबेसु, कृशकाय, हँपैᆬत़।रेस्टोरेंट पहुंचि भाड़ा पुछलियै। कहलक दस रुपैया। कनिया लड़ि पड़ली ओकरा सँ -''पांच रुपैया के दस रुपैया मंगैत छैंह! हमरा सभ कें बाहरी बुझैत छैं कि? ठक्क नहिंतन! एना जबर्दस्ती सँ बढिया होयतौक जे पौकेट सँ पाई निकालि ले। बजबियौ पुलिस के?'' बेचारा रिक्सावला घबड़ा गेल। पसेना सँ मैल-चिक्कट भेल गमछा सँ अपन मुंह पोछैत, बिना किछु बजने पांचक सिक्का लऽ कऽ चलि गेल बिना किछु बजने़ निरीह।

रेस्टोरेंट मे भोजनोपरांत हमरा दस रुपैया टीप के रुप मे छोड़ैत देखि कनिया बजलिह - '' अपना स्टेटस के तऽ कम-सँ-कम ध्यान राखू। की दसे रुपैया दैत छियई - पाछाँ सँ गरियाओत'' एतबा कहि झट सँ पचासक नोट बिल-फोल्डर मे छोड़ैत हमरा चलबाक ईसारा केलनि। आकस्मात हमरा आंखिक आगाँ रिक्सावलाक चेहरा मूर्तिमान भऽ उठल। तुलना करऽ लगलंहु - रेस्टोरेंटक वेटर आ रिक्सावला मे - एकटा वातनुवूᆬलित कक्ष मे भोजन परसैत आ दोसर रौद मे कोंढ तोरैत। भवनाक अंतर सँ सिहरि उठलंहु हम।

शक्ति शेखर, पिता-श्री शुभनाथ झा, गाम- मोहनपुर, भाया-हरलाखी, जिला-मधुबनी। जोगार
'हम आपको दिखा रहे हैं कि कैसे फ़ला आदमी किसी मामले को दबाने के लिए दुसरे को पैसा दे रहे है। यह हमारे चैनल के स्टिंग आपरेशन का नतिजा है जो सिर्फ़ दिखा रही है।' जी,इ पंक्ती अछि आजुक समय के सब घटना स अपना सब के देखा रहल इलेक्ट्रोनिक चैनल के। अपना के सब स ऊपर पहुंचाबय के लेल ओ सब हथकंडा अपना लैत अछि। विडंबना इहो देखु जे सब चैनल वला अपना के राजा हरिश्चंद्र के सत्य निती पर आधारीत बताबैत अछि। बहुतो चैनल वला सब कोनो काज के तह तक पहुचबाक लेल हमेशा एकटा हथकंडा अपनाबैत अछि जाहि के अहि युग मे स्टिंग आपरेशन कहल जायत अछि। माने इ जे हम इ हम देखा रहल छी जे बस अहाक लेल अछि आ सत्य अछि। मुदा कहल जाय त एकटा सत्य मीडिया खास क इलेक्ट्रोनिक मीडिया मे अहि शब्दक बोलबाला अछि। जी,हम बात क रहल छी 'जोगार' के। आजुक युग मे बहुतो युवा के रुझान पत्रकारीता दिस झुकि रहल छैन। लाखो रुपया ओ सब अहि पत्रकारिता के पढाई पर खर्च क दैत अछि। शायद किछ उम्मीद के संग जे ओहो सब एक दिन अहि क्षेत्र मे अपन नाम रौशन करताह। मुदा कि होइया अतेक पढाई लिखाई केलाह स? पढाई के संग संग कतेको लोकनि के पत्रकारीता मे काज करबाक लेल जोगार सेहो लगाबअ पड़ै छैन। एक तरह स कहु त डीग्री डिप्लोमा स पहिले कोनो चैनल मे पहुंचबाक लेल हुनका सब के सब स पहिले त जोगार लगाबहे पड़ै छैन। अनुचित नहि हैत जौं कहि त जे पत्रकारीता क्षेत्र मे घुसबाक लेल सब स जरुरी जोगार होयत अछि। आब त कतेको चैनल सब आ अखबार एजेंसी सब अपन-अपन संस्थान सेहो खोलि लेने अछि,इ कहि क जे पढाई समाप्ती के बाद हुनका सब के ओहि चैनल आ अखबार एजेंसी मे काज देल जायत। साधारण वर्ग सब पत्रकारीता के पढाई करलाक बादो ओ सब अहि संस्थान मे नामांकन नहि ल सकैत छथि। चैनल वला सब के अहि कदम स साधारण तबका वला युबासब के अहि चैनल मे काज खोजनाय पहाड़ खोदनाय एहन भ रहल अछि। सोचल जाय जे ओ चैनल वा अखबार एजेंसी वला सब अपन संस्थानक विद्यार्थी के छोड़ि क दोसर गाटे के कियाक काज देत। बड पैघ पैघ गप्प करैत छथि इ चैनल वा अखबार वला सब जे भारत मे बेरोजगारी अहि हद तक बढि रहल अछि आ दोसर दिस अपने जोगारक मंत्र पर काज दैत अछि। ध्यान दि जे अखन समाचार चैनल वा अखबार एजेंसी मे काज क रहल छथि,ओहि मे स एहन कतेक व्यक्ती छथि जिनकर कोनो नहि कोनो संबंध अहि क्षेत्रक माफ़िया सब स नहि छैन। प्रतिशत मे देखल जाय त जोगार वला सबहक प्रतिशत शायद 80 तक पहुंच जायत। एक तरह स कहि त जे अहि पत्रकारीता क्षेत्र मे ज्यादा स ज्यादा दिन तक टिकबाक लेल जिगार रहनाय आवश्यक अछि। ओना त सब क्षेत्र मे जोगार अपन एक अलग स्थान राखैत अछि मुदा पत्रकारीता क्षेत्र के लेल एकर महत्व विशेष मे भ जायत अछि। पत्रकारीता के देशक चारिम स्तंभ मानल जायत अछि आ इ स्तंभ जोगार पर टिकल अछि। कि जिनका लक जोगार नहि अछि,ओ पत्रकारीता क्षेत्र मे काज नहि क सकैत छथि? फ़ैसला ओहि सब लोकनि के लेबअ पड़तैन जे अहि मे संलिप्त रहै छथि,जिनकर नाम ल क जोगार लगाबअ पड़ैत अछि,ओहि सब युवासब के लेल के काइल के भविष्य छथि।

ओमप्रकाश झा, गाम, विजइ, जिला-मधुबनी।
मीडिया कतअ ल जा रहल अछि?
गप आरुषि कांड के करी वा मिथिलांचल मे आयल कोसी के कहरक या हाल मे दिल्ली मे भेल सिरीयल बम ब्लाष्टक। यदि अहां सब पछिला किछु दिनका मीडिया के इतिहास पर नजरि डालि तअ देखु जे ओ कि परोसि रहल अछि आ विडंबना देखु,दर्शक/पाठक के जे ओ ओकरा यथावत ग्रहण करबाक लेल बाध्य छथि। मीडिया के भूमिका के लेल अपना अहि ठाम एकटा कहावत 'खशी के जान जाय,आ खाय वला के स्वादे नहि' वला सहत प्रतिशत ठीक बैस रहल अछि। हमरा बुझा रहल अछि जे अहां सब सनक पाठक लेल मीडियाक छवि के आओर उजागर केनाय उचित नहि हैत।
अहि स छोड़ि यदि मीडिया के आंतरिक संरचना पर ध्यान दी त जतेक निम्न काटि वा अहु स खराब जैं कुनु शब्द होय त संबोधनक स्वरुप ल सकैत छी। यदि टीवी पर देखाय वला सुन्दर चेहरा वा अखबार/मैगजिन मे लिखै वला पुरोधा सब के निजी जीवन मे झांकि क देखब त ओहि मे स अधिकतर व्यक्ती के व्यक्तित्वक समीक्षा केलाक बाद मोन घृणित भ जायत। मुदा विडंबना देखु जे सब गोटे सब बात बुझैत बेबस छी। जे मीडिया दोसरक स्टिंग आपरेशन करैया कि ओकरा लेल सेहो स्टिंग आपरेशन नहि होयबाक चाहि? मुदा इ के करत? हम सब त बगनखा पहिरने छी।
बहुतो मैथिल पुरोधा सब मीडिया के शिर्ष पद सब के सुशोभित क रहल छथि,मुदा कि मजाल जे ओ कखनो सत्य बाजि दैथ। हमहु ओहि भीड़ मे कतौह के कतौ शामिल छी,इ कहैत कोनो लाज नहि भ रहल अछि। कहियो तिलक जेकां पत्रकार होयत छलाह। मुदा आजुक पत्रकार सब समाज के धनाढय वर्ग मे स आबैत छथि।
पाठकगण अहां सब मे स जे कियो मीडियाकर्मी होयब त हमरा माफ़ क देब,मुदा कि हम सब इ दोहरा चरित्र जीवन जिबअ स मुक्त नहि भ सकै छी? अपन पूर्वज के रुप मे मंडण,अयाची,जनक आ विद्यापति के संतान हम सब कतह जा रहल छी? अहां सब मे स जे कियो मीडिया के नजदिक स नहि देखने होय त कोनो निकट परिचत जे अहि क्षेत्र मे काज क रहल हेताह,हुनका स पुछि लेबन्हि। जैं सत्य बाजअ चाहताह त सच्चाई स अवगत भ जायब।

प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह

डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (आगाँ)
ई श्रेय युगपुरुष जीवन झाकेँ छनि जे अपन नाटकक माध्यमे एकर साक्षात विरोध करबाक साहस कयलनि। “नर्मदा सागर सट्टक”क सुन्दर मिश्र तकर ज्वलन्त प्रमाण छथि। मोदन मिश्र सुन्दर मिश्रकेँ नीक जाति-पाँजिक वर त्रिविक्रम ठाकुरक संग नर्मदाक विवाह करयबाक विचार दैत अपन मतक समर्थनमे कहैत छथि:
कुलहीन जमाय- अधीन कुलीन सुता अनुताप सदा सहती।
बसि नीच मनुष्यक बीच यथोचित नीच कथा कहती सुनती।।
पठियार अगार अचार-विचार विचारि विचारि व्यथा सहती।
परिवार समान जहाँ न तहाँ भरिजन्म कोना सुख सैँ रहती॥
(कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-१०७)
उपर्युक्त पंक्तिमे कन्याक पिताक मानसिक व्यथाक कथा सामाजिक व्यवस्था, ओकर परिवेश आऽ परिस्थितिक रेखांकन नाटककार अत्यन्त सूक्ष्मताक संग कऽ कए समाजकेँ दिशा-निर्देश करबाक उपक्रम कयलनि। एहिपर सुन्दर मिश्रक कथन छनि:
उत्तम जाति जमाय असङ्गत कष्ट सुता सभ काल जनाउति।
सासु दयादिन आदि अनादक वाद कथेँ कुल छोट मनाउति।।
जीउति जौ सहि गारि कदाचित् मातु-पिता हित बन्धु कनाउति।
ई असमञ्जस हैत निरर्थक ऊँचक सङ्ग जे नीच वनाउति॥
(कविवर जीवन झा रचनावली पृष्ठ-१०७)

नाटककार सामाजिक वातावरणमे परिव्याप्त वैवाहिक प्रथाक प्रसंगमे अपन विचार व्यक्त करैत ओकर मात्र आलोचने नहि कयलनि, प्रत्युत एहन वैवाहिक सम्बन्धक प्रसंगपर तीक्ष्ण व्यंग्य सेहो कयलनि तथा समाजकेँ सुधरबाक संकेत देलनि।
सामवती पुनर्जन्ममे बन्धुजीवक विकौआ मनोवृत्ति आ पुनर्विवाह करबाक चेष्टाक प्रति सारस्वत ओ वेदमित्रक तिरस्कार भावसँ नाटककारक व्यक्तिगत विचार धाराक परिचय भेटैत अछि। एहि प्रसंगमे बन्धुजीवक कथन छनि:
जे हमरा ठुनकाबथि से लय पहिरथु राङ।
हम पुनि कतहु विकायब पोसब अपन समाङ।
(सामवती पुनर्जन्म, पृ.३९)
उपर्युक्त कथनमे विकौआ प्रथाक निन्दाक स्पष्ट झलक भेटैत अछि। सामवती पुनर्जन्ममे घटक द्वारा सारस्वतकेँ वर पक्षसँ टाका गनयबाक प्रस्तावपर सरस्वतक उत्तरक अवलोकन करू, “छी छी टाकाक चर्चा कोन हमरा तेहन मैत्री अछि आ ओ ततेटा व्यक्ति छथि जे एहन कथा सुन टाका तँ गनि देताह। परन्तु असन्तोष हततैन्हि। ई कथा पुनि जनि बाजी”। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-४६)।
नर्मदा सागर सट्टकमे त्रिविक्रम ठाकुर दिससँ नर्मदाक प्रति टाका गनयबाक घटकक प्रस्तावपर सुन्दर मिश्रक विपरीत प्रतिक्रियाक संग देल गेल उत्तर:
पिता आनि वर कन्या का वसन-विभूषण-युक्त।
सादर अर्पण मन्त्रवत से विवाह विधि युक्त॥
(कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-१०९)
मिथिलांचलक समाजमे प्रचलित नियमानुकूल वैवाहिक सम्पर्क स्थापत्यर्थ घटक-पजिआरक नियोजन एक आवश्यक उपादान थिक। युगपुरुष जीवन झाक चाहे सामाजिक नाटक हो वा पौराणिक ओ अपन प्रत्येक नाटकमे एकर नियोजन कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे सेहो घटक पजिआड़क नियोजन कयल गेल अछि। जखन सारस्वत आ वेद मित्रक बीच अपन सन्तानक विवाहार्थ स्वीकृति भेटैछ तखन वेदमित्रक कथन छनि, “यद्यपि ब्राह्मणक विवाहमे अपद व्यय कोना ने हैइ छैक तथापि घटक-पजिआड़ जे कहताह ततबा टाका त अवश्य ओरिआ लेबै पड़त”।
(सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-४)
अक्षर पुरुष जीवन झा मिथिलांचलक सामाजिक जीवनसँ निरपेक्ष नहि भऽ सकलाह तेँ हिनक नाटकादिमे सबठाम सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भक संगहि संग सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवनक अति यथार्थ प्रतिनिधित्व करैछ। हिनक समस्त नाटक जनसामान्यक निकषपर अक्षरसः सत्यताक आवरणसँ आच्छादित अछि जाहिमे आशा-आकांक्षा, आचार-विचार, आमोद-प्रमोद, स्त्री-पुरुषक सुख-दुःख, रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, भाव-भाषा, राजनीति आदिक यथार्थ परिचय भेटैत अछि। ओ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक प्रबल समर्थक रहथि जकर प्रतिरूप हिनक नाटकादिमे स्थल-स्थलपर उपलब्ध होइछ। मैथिल संस्कृतिक अनुरूप विवाह पूर्व घटक-पजिआड़क नियोजन हमर सांस्कृतिक परम्पराक अनुरूप समाजमे प्रचलित नियमानुकूल वैवाहिक सम्पर्कक स्थापत्यर्थ घटक-पजिआड़क नियोजन आवश्यक अछि। सामवती पुनर्जन्म एवं नर्मदा सागर सट्टकमे जे घटक-पजिआड़क चर्चा भेल अछि ओ सर्वथा मैथिल संस्कृतिक अनुकूलहि अछि।
जतेक दूर धरि वेशभूषाक प्रश्न अछि हिनक नाटकान्तर्गत विशुद्ध रूपेँ मैथिल संस्कृतिक अनुरूपहि पात्रक वेशभूषाक संग साक्षात्कार होइछ। नर्मदा सागर सट्टकक घटकराजक स्वरूपक तँ अवलोकन करू:
जैखन देखल लटपर पाग।
धोती तौनी नोसिक दाग॥
कयलक लोक गाम घर त्याग।
हमरा हृदय भेल अनुराग॥
(कविवर जीवन झा रचनावली पृष्ठ-१७)
हाथमे फराठी छनि, अवस्था विशेषक कारणेँ हुनक डाँर पर्यन्त झुकि गेल छनि, पाग लटपर छनि। एहन वेश-भूषाकेँ देखि लोककेँ घटककेँ चिन्हब कनेको भाङठ नहि होइत छनि:
ओ जेना छल केहन उकाठी।
उचकि पड़ायल हमर फराठी॥
बीतल वयस वर्ष थिक साठी।
पैरन सोझ पड़य बिनु लाठी॥
जौँ जनितहुँ एहि गामक ढाठी।
तौँ न आबि भसिअइतहुँ भाठी॥
(कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-९५)
एहिमे नाटककार मिथिलामे वैवाहिक अवसरपर घटकक कर्तव्यपरायणता तथा ओकर वेश-भूषाक यथार्थ स्थितिक चित्रण अत्यन्त मार्मिकताक संग कयलनि अछि।
सांस्कृतिक परिदृश्यमे मिथिलामे पर्दा प्रथाक पालन सामाजिक रीति-नीतिक अनुकूलहि हिनक नाटकादिमे वर्णित अछि। एहि प्रथाक अनुसारेँ ससुर-भंसुर वा परिवारक श्रेष्ठ व्यक्तिक समक्ष वा अपरिचित व्यक्तिक समक्ष मिथिलांचलक महिला नहि जाइत छथि। एहि प्रथाक अनुरूपहि कादम्बरी एवं अभिरानी एहि रहस्यसँ अवगत रहितहुँ जे सुन्दर निश्चित रूपेँ सरलाक पति थिकथिन तथापि ओ सभ आत्मीयता नहि प्रदर्शित करैत छथि। सुन्दरकेँ सेहो अनुभव होमय लगैत छनि जे सरला हुनक पत्नी छथिन, किन्तु मर्यादाक पालनार्थ ओ अपन वास्तविक परिचय नहि उद्घाटित करैत छथि।
सांस्कृतिक परिवेशक नियोजनक दृष्टिएँ जखन हिनक नाट्य साहित्यक विश्लेषण करैत छी तँ स्पष्ट प्रतिभाषित होइछ, जे युगपुरुष जीवन झा मिथिलाक संस्कृतिक अनुरूपहि फगुआक हुड़दंगक चित्रण सामवती पुनर्जन्ममे कयलनि अछि। विदर्भराज सपरिवार बैसल छथि आ मृदंग वाद्य सहित हुनक राज्य वेश्या कलावती नचैत अछि आ गीत गबैत अछि:
(अगिला अंकमे)
(अगिला अंकमे)
स्व. राजकमल चौधरी पर डॉ. देवशंकर नवीन

डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
कहल जा चुकल अछि ÷आदिकथा'क समय धरि सेहो मैथिलीक पाठक समाजक बोध-शीर्ष आ विचार-फलक उर्ध्वमुखी नहि भेल छलनि, एकदम सपाट भूमि पर जर्जर परम्पराक खुट्टीसँ बन्हाएल घूमि रहल छलनि। पूर्ववर्ती रचनाकार सेहो कम प्रयास नहि केलनि। कविताक क्षेत्रामे कतोक गोटए अपन योगदान देलनि। कथा आ उपन्यासक क्षेत्रामे कांचीनाथ झा ÷किरण' आ हरिमोहन झा स्त्राी आ विवाहसँ सम्बन्धित मिथिलाक जड़ियाएल समस्या पर नजरि द' चुकल छलाह। वैद्यनाथ मिश्र ÷यात्राी', ÷पारो' आ ÷नवतुरिया'मे एहि गन्हाएल वैवाहिक पद्धति पर समधानि क' चोट क' चुकल छलाह। तथापि समाज व्यवस्थाक पाखण्ड आ अयथार्थ आदर्शक चाँगुर एहि समाजकें जकड़ने छल, स्वाधीनता प्राप्तिक दशक भरि बादहु मिथिलाक लोक एहि वैवाहिक पद्धतिक प्रति घृणा आ विरोधक भाव नहि अवधारलनि। चुतुर्थिएक राति ÷पारो' सन बालिकाक संग पति स्थानीय वृद्ध राक्षस द्वारा बलात्कार अथवा ÷सुशीला' सन उद्दाम यौवनसँ भरल सुकामिनीक यौन-प्रताड़णाक प्रति किनकहु मोन खिन्न नहि भेलनि। पंजी प्रथाक विकृतिक रूपमे भेल एहेन बेमेल विवाह, बाल-वृद्ध विवाह आ बहु-विवाहक कारणें वृद्ध अथवा स्वर्गवासी जमीन्दारक कठमस्त जवान स्त्राीक संग रमणेच्छा सबकें रहै छलनि, गाछमे पाकल लताम देखि कौआ जकाँ दू लेल मारि अएबाक लालसा सबकें होइ छलनि, मुदा ओहि युवतीक मोन आ सम्वेदनासँ किनकहु कोनो मतलब नहि छलनि। छद्म आ अतिशयोक्तिसँ भरल मिथिलाक जीवन-पद्धतिक इएह विडम्बना छल। विवाहेतर सम्बन्ध रखबासँ परहेज नहि छलनि, भेद खुजि जएबाक डरें आतंकित रहै छलाह। एहेन समाजमे सुशीला आ देवकान्त अपन मोनक समर्थन कोना करितथि -- उपन्यासकारक सोझाँ ई पैघ समस्या छल। आदर्श आ मर्यादाक जर्जरतासँ आच्छन्न अइ प्रवृत्तिक कारणें उपन्यासकार ÷आदिकथा'कें सुखान्त नहि बना सकलाह। सम्भवतः इएह कारण थिक जे बाबा यात्राी ÷पारो'क दुर्दशासँ व्यथित भेलाह, उग्र नहि। रचनाकारक व्यथासँ पाठककें सामान्यतया उग्र हेबाक चाही, मुदा यात्राी देखलनि जे समाज एखनहुँ उग्र नहि भेल। आठ बर्खक बाद फेरसँ यात्राी ÷नवतुरिया'कें ठाढ़ केलनि।
मिथिला क्षेत्राक एहेन जड़ मन स्थितिक समाजमे कोनो प्रगति चेतनासँ सम्पन्न रचनाधर्मी लोकक मानसिक उद्वेलनक कल्पना कएल जा सकैत अछि। निर्दयी सासु, सुमति, मनुष्यक मोल, पुनर्विवाह, चन्द्रग्रहण, कन्यादान आदि पूर्ववर्ती उपन्यासमे मिथिलाक स्त्राीक दुर्दशाक चित्राण भेल, मुदा चित्राणक स्वरूपसँ स्त्राी-चेतना आ स्त्राीक दुर्दशाक प्रति पुरुषक वैचारिक उद्वेलनक कोनो उद्यम एहि जनपदमे नहि देखल गेल। स्पष्टतः ई दोष रचनाकारक नहि, रूढ़िग्रस्त मैथिल समाजक धर्मान्धताक छल। ÷पारो'आ ÷आदिकथा'मे सेहो स्पष्ट विरोध अइ कुरीतिक प्रति नहि देखाइत अछि, मुदा ÷पारो'क यौन उत्पीड़न और ÷सुशीलाक यौन प्रताड़णसँ पाठकक मोन खिन्न होइत अछि। संख्यामे थोड़े सही, मुदा ÷बिरजू'क क्रोध आ ÷देवकान्त'क व्यथाक सहयात्राी अवस्से बनैत अछि। ई समय समाजक बदलैत मनस्थितिक छल। उपन्यासकार अपन मोनक नहि क' सकलाह, मुदा संकेत देलनि -- समाजक बदलइत धार्मिक नैतिक मान्यतादिक एहि संक्रमित कालमे (आदिकथा)÷कॉमेडी' नइं बनि सकल, मात्रा एक अपूर्ण ÷टे्रजेडी' रहि गेल। इएह समकालिक यथार्थ थिक। लोक प्रेम करइए, प्रेमपात्राक लेल बेकल रहइए, मुदा, संस्कारक ससरफानी तोड़ि नइं पबइए। इएह आदि-आदिसँ चल अबइत कथा थिक, आदिकथा थिक।...

मिथिला क्षेत्रा भारतक एकटा एहेन भूखण्ड थिक जतए परस्पर विरोधी आचरण आ व्यवस्था निःशंक भ' कए विकसित भ' रहल अछि, होइत रहल अछि। पर्याप्त संख्यामे उद्दाम प्रवाहक नदी अछि, बाढ़िक कारण ओकर प्रवाहमे उद्दाम गत्यात्मकता अबैत अछि, प्रति वर्ष कोसीक बाढ़ि, गंगाक बाढ़ि, बागमती, कमला आदि नदी सभक बाढ़िक कारण तीव्रतासँ नदी-नालाक दिशा, स्थान परिवर्तित होइत रहल, जमीनक तल परिवर्तन होइत रहल... मुदा एहि प्रबल प्रभावकारी प्राकृतिक परिदृश्यक प्रतिकूल एतएक जीवन-यापन आ आचरण शिथिल, सुस्त, आ आरामपसन्द बनल रहल। गत्यामकतासँ निर्लिप्त, यथास्थिति पर अतीव आग्रह।... विद्वताक लेल मिथिला क्षेत्रा पुरातन कालहिसँ नामी-गिरामी रहल अछि। विद्वता आ प्रगतिशीलता आपसमे सहयात्राी होइत अछि, अर्थ-धर्म-काम-मोक्षक परिभाषा बुझितहि मनुष्यमे उदारताक प'ट खुजैत अछि, आ कलुष मेटाइत अछि। मुदा, मिथिलामे सब कथूक अछैतो एहि समस्त सद्वृत्तिक लोपे लोप रहल, उनटे रूढि, पाखण्ड, धर्मान्धता, अस्पृश्यता आदि भावना जड़िआएल रहल। जीवन विरोधी जर्जर व्यवस्थाक अनुपालनमे
अपन इच्छा आ नैतिकताकें मारैत रहल, फोंक मर्यादाक प्रदर्शन हेतु छद्म जीवन प्रक्रिया चलैत रहल। अइ छद्मक प्रति जड़िआएल आग्रह एतेक बढ़ल छल, जे छद्मे वास्तविकता लगैत रहल। छद्मक आँचर हटएबाक अर्थ मर्यादाक अतिक्रमण बूझल जाए लागल। राजकमल चौधरीक समस्त रचना संसार अइ छद्मेक अनावरणमे लागल रहल। आदिकथा उपन्यास सेहो, तकरे प्रमाण थिक। समाज ओहिसँ पहिने कनेको प्रगति-बोधसँ युक्त भेल रहितए, तँ सम्भव छल जे सुशीला आ देवकान्तक आदिकथा दुखान्त नहि भ' कए सुखान्त भ' जइतए।
÷आदिकथा' उपन्यासक अप्रतिम प्रभावोत्पादकताक मुख्य कारण ओहिमे प्रयुक्त गद्य सेहो थिक। राजकमल चौधरीक गद्य रचनामे एकटा खास बात रहैत अछि, जे ओ अपन मन्तव्य राख' लेल घटनावलीक कोनो श्रृंखला नहि तकै छथि; छोट सन कोनो प्रसंगक चारू भर एकटा परिवार, समाज अथवा मण्डली ठाढ़ करै छथि; ओकर आचरणकें ओकर मानसिक व्यापारसँ जोड़ैत जाइ छथि; अन्ततः अइ तरहक चरित्रा-चित्राणे हुनकर मन्तव्यकें आकार, रचनाकें पूर्णता, अभिप्रायकें सफलता, आ प्रभावकें उत्कर्ष दैत अछि। आदिकथा उपन्यासमे मोटा मोटी घटना तँ एतबे अछि जे कोनो विपत्ति-यात्राामे सुशीला आ देवकान्तक भेंट होइ छनि, बीचमे सब तरहक राग अनुराग चलैत अछि, आ अन्ततः ओ भेंट, ओ अनुरक्ति एकटा अयथार्थ आदर्शक रक्षामे पानि पर लिखल आखर जकाँ मेटा जाइत अछि। मुदा ई सम्पूर्ण ताना-बाना किछु खास-खास तरहक चरित्रासँ बुनल गेल अछि, ओहि चरित्रोक माध्यमसँ राजकमल चौधरी अइ उपन्यासकें अपन समयक एकटा महत्वपूर्ण उपन्यासक रूप देलनि अछि। आदिकथा, एकटा दुखान्त प्रेमकथाक प्रमाण होइतहु समकालीन समाजक मार्मिक आ बेधक दृश्यक कोलाज थिक, जाहिमे पंजी प्रथा, सामन्ती संस्कार आ सामाजिक पाखण्ड पर चोट अछि; जमीन्दारिएक जड़िसँ निकलि कए जमीन्दारी प्रथाक विरोध परिवर्त्तन-चक्रक सार्थकता साबित केलक अछि। समस्त पद-प्रतिष्ठा-सम्पन्नताक अछैत मिथिलामे स्त्राी लेल कोन तरहक सोच-पद्धति अपनाओल जाइत रहल अछि, तकर स्पष्ट चित्रा बनि सकल अछि।
आदिकथाक मुख्य पुरुष चरित्रा छथि -- अनिरुद्ध बाबू, कुलानन्द, महानन्द, ज्योतिषी लघुकान्त, आ देवकान्त। किछु गौण पात्रा सेहो छथि -- डाक्टर वैद्यनाथ, धर्मशालाक मैनेजर, खबास इत्यादि। मुदा हिनका लोकनिक कोनो चारित्रिाक विकास उपन्यासक कथाभूमिमे नहि भेल अछि। लघुकान्त ज्योतिषीक अवतारणा सेहो सामाजिक धर्मान्धता, पाखण्ड, भीरुता, छद्म आ निर्लज्जता देखएबा लेल भेल अछि। धरमपुरवाली, अर्थात्‌ सुशीला, अर्थात्‌ देवकान्तक सोनामामी, अर्थात कुलानन्द, महानन्दक सबसँ छोट सतमाइ कामोत्तेजनामे, अथवा कोनो मादक पदार्थक सेवनसँ बेहोश छथि। प्रयोजन छलै हुनकर सेवा-परिचर्या अथवा चिकित्साक, मुदा ज्योतिषी जी एकटा जवान स्त्राीक कामोत्तेजक बाँहि-पाँजरक स्पर्श पएबा लेल, कुत्सित लिप्सा तृप्त करबा लेल, अपन फोंक अस्मिता समाजमे ऊँच करबा लेल, आ लोक पर अपन पाखण्डक मनोवैज्ञानिक दबाब बढ़एबा लेल घोषित करै छथि, जे सुशीला पर ओएह प्रेतनी सवार छनि, जे तीन बर्ख पहिने हुनका हरिद्वारमे भेटल रहनि -- ई बात, ज्योतिषीकें भगवती कहि देने छनि...। मुदा उपन्यास मध्य राजकमल चौधरी एहेन एकहु छद्म चरित्राकें क्षमादान नहि देलनि अछि।... जे प्रेतनी छलहे नहि, तकरासँ मान-मनुहार ज्योतिषी करैत रहलाह, श्वसुर स्थानीय होइतहुँ, नजरिए आ स्पर्शे टासँ सही, सुशीला सन रसवन्तीक रसपान करैत रहलाह, एही बीच हुनकर पोल खुजि गेल, ओ नाँगरि सुटका क' पड़एलाह।
अइ चरित्राक प्रवेश उपन्यासक कथाभूमिमे अचानक भेल अछि। हिनकर अवतारणा नहियों होइतए तँ मूल कथा पर एकर कोनो असरि नहि होइतए। मुदा जें कि उपन्यासक गति एकरैखिक नहि होइत अछि, बहुत रास साँगह-पाती संग नेने चलैत अछि, कही तँ उपन्यास कम्प्यूटरक नॉर्टन एण्टी वायरस होइत अछि, अथवा मलाहक महजाल होइत अछि, जे सौंसे समाज व्याधि, अथवा सौंसे पोखरिक माछ, काछु, साँप, सनगोहि, सोंसि, नकार समेटने चलैत अछि। अही प्रक्रियामे राजकमल चौधरी ÷आदिकथा'मे कथा तँ कहलनि अछि मामि-भागिनक अनुक्तिक; मुदा बीच-बीचमे समस्त सामाजिक व्याधिक इलाज करैत गेलाह अछि। ज्योतिषी लघुकान्तक पाखण्ड उजागर करब आ समाजकें अन्धविश्वाससँ मुक्त करब आवश्यक छल, तें लघुकान्तक अवतरण भेल। एहि अवतारणा लेल कोनो संयोग-कथा नहि गढ़ल गेल, सहजतासँ ओ मूलकथाक अंश बनि गेल अछि -- से उपन्यासकारक विशिष्ट कौशल थिक।
महानन्द सामन्ती खानदानक नव उम्रक युवक छथि। अनिरुद्ध बाबूक छोट बेटा, सुशीला सन सुकामाक सतौत बेटा, कुलाकानन्दक सहोदर आ देवकान्तक ममियौत। छूआ-छूत, वर्ग संघर्ष समाजसँ मेटा देबाक आग्रही आ सामाजिक कुरीतिक उन्मूलनक श्रेय लेब' लेल तत्पर अपरिपक्व विद्रोही। हिनकर परिचय लेल उपन्यासकारक पंक्तिक उपयोग करी तँ -- ÷महानन्दक शरीरमे एखन समाज-सुधारक रक्त-प्रवाह दौड़ि रहल छइन। उर्दू-भाषामे एकटा कड़बी छइ -- नब मुसलमान सतरह बेर नामज पढ़इए -- से महानन्द सतरह बेर नामज पढ़ए चाहइ छथि। चाहइ छथि जे
युग-युगान्तरक धार्म्मिक संस्कारकें विद्रोहक एक्के धक्कासँ तोड़ि दी।' -- महानन्द जमीन्दारी संस्कारसँ उबिया तँ गेलाह अछि अवस्से, परिवर्त्तन चाहै छथि, ताहि लेल उद्यमो करए चाहै छथि, मुदा चेतना जाग्रत नहि छनि। महानन्द समकालीन मिथिलाक प्रतिक्रियावादी नौजवानक प्रतिनिधि जकाँ एहि उपन्यासमे ठाढ़ छथि, जे लक्ष्य निर्धारण आ संधान-समायोजन कएनहि बिना व्यवस्था विरोधमे लागि जाइ छथि। परिवर्तनक एतब टा बाट बूझल छनि जे आँगनमे तथाकथित निम्नजातीय लोक पात ओछा कए खा लिअए।... नितान्त अपरिपक्व आ क्षणोन्मादी लोक छथि महानन्द। अवज्ञा आ चिन्तनविहीन विरोधक संग परिवारसँ भिन्न भ' जएबाक बात सोचै छथि। महानन्दक आचरणक चित्रा एक दिश मिथिलाक युवा वृन्दक वास्तविक मानस लोकक परिचय दैत अछि, तँ दोसर दिश ओहि वर्गकें सुचिन्तित विरोधक प्रेरणा आ ललकार सेहो।
अनिरुद्ध बाबू रामपुर गामक सामन्ती संस्कारक उच्च कुल-वंश, जाति-पाँजिक विशिष्ट लोक छथि। चारिम पनमे प्रगल्भा, कामातुरा स्त्राीक पति भेलाह। एक पुत्रावती पत्नीक स्वर्गवास, आ दोसर पत्नीसँ एक पुत्रा तथा एक पुत्राीक प्राप्तिक पश्चातहु तेसर विवाहक लोभ सम्वरण नहि क' सकलाह, अधेर होएबा धरि ओहि पत्नीकें पुष्पवती नहि क' सकलाह। स्वयं साठि पार क' कए मामिला मोकदमामे तल्लीन रहै छथि। खाएब-पीब, रास-विहार, ज'र-जमीन, म'र-मोकदमाक बाद समय बचै छनि तँ सर-कुटुमक आदर आ नवोढ़ा पत्नीक आज्ञा-पालनमे लगबै छथि। अपन कौलिक संस्कार आ पूर्वजक अकबालक गर्वसँ फूलल रहै छथि। एहिसँ बेसी हुनकर कोनहुँ आचरणकें उपन्यासकार महत्व नहि देलनि अछि। जमीन्दारी सन रुग्ण व्यवस्थाक एक वृद्ध या रुग्ण व्यक्तिकें एही तरहें कोनो नव चेतनाक कथामे उपेक्षा कएल जेबाक चाही छल। ÷गहरी मार कबीर की, दिल से दिया निकाल।' अतीत-व्यतीतक फेण्टेसीमे भोतिआइत आत्महीन लोककें वस्तुतः एहिसँ बेसी महत्व नहि देल जेबाक चाही। अन्ततः उपन्यासक पाठककें अनुमान तँ होउ, जे मानवेच्छाक प्रति अनुदार आ सम्वेदनहीन लोकक इएह दुर्गति होइत अछि। भौतिक सुखमे मुग्ध रहताह, मुदा पहाड़ी नदीक जीवन्त धारकें, कामेच्छाक ज्वालामुखीकें बान्हि क' रखताह। धिक्कार ...
कुलानन्द अनिरुद्ध बाबूक पहिल स्वर्गीया पत्नीक एकमात्रा पुत्रा छथि। वयस करीब-करीब अपन छोटकी सतमाइक बराबर छनि। मूल कथाक विस्तारमे हिनकर उपस्थिति थोड़ेक सहायक भेल अछि। अपना समयक मेधाहीन छात्रा आ नाटक-नौटंकी कम्पनीक कलाकार-कलारिनीक संग बौआ कए ऊर्जस्वित जीवन समाप्त केलनि, आब गाममे पैतृक सम्पति कूटि कए भाँग आ विलासमे जीवन बितबै छथि। कायर, क्रोधी, आ अय्याशी प्रवृत्तिक पात्रा छथि। द्रौपदी सन सुशील स्त्राीक देवता छथि। स्त्राी जातिकें पुरुषक आश्रित आ गुलाम बुझै छथि। पत्नी तवाह रहै छनि। खून-खुनामय धरिक स्थितिमे पहुँचि जाइवला तामसी छथि। क्रोधमे किछु क' लेताह। नाच-नटुआमे लिप्त रहताह। देवकान्तक प्रति अपन सतमाइक अनुरक्ति नीक नइं लगै छनि। समाजक लोक तँ इहो कहबामे संकोच नहि करै छनि जे कुलानन्द अपन स्त्राीकें नैहर पठा क' सतमाइ संग रहै छथि। पिताक मृत्युक तत्काल बाद ओ सुशीलाकें अपन आश्रित बूझए लगलाह, हुनकर गहना जेबर बेचि कए अय्याशी करब हुनकर स्वभाव भ' गेलनि, मुदा सतमाइक उचितो खर्च पर आँकुश लगएबाक प्रवृत्ति आओर उग्र भ' गेलनि। लम्पट एहेन जे सुशीला संग तीर्थ कर' गेलाह तँ हुनकर आचरण देखि धर्मशालाक मैनेजर धरि सुशीलाकें कुलानन्दक लम्पटपनीक कथा कह' अएलनि।
एकटा सामन्ती संस्कारक व्यक्तिक कुलमे आओर केहेन सन्तान होइतए! सम्पत्ति छलनि तँ पिता सामाजिक स्वीकृतिक संग लम्पटपनी केलकनि, समय बदलल तँ कुलानन्द ओकरा आओर विकृति धरि पहुँचौलनि।
अइ उपन्यासमे राजकमल चौधरी जमीन्दार परिवारक सदस्य लोकनिकें ज्यामितीय आकृति पर ठाढ़ क' कए सामन्ती संस्कार, पंजी-प्रथा आ मिथिलाक स्थगित चिन्तन प्रणालीक धज्जी उड़ा रहल छथि। एहेन विकृत, वीभत्स रूप भरिसके कतहु भेटए। महानन्द, कुलानन्द, सुशीला--तीनू त्रिाभुजक तीन कोण पर ठाढ़ छथि। केन्द्रमे बैसल छथि स्वयं अनिरुद्ध बाबू, बेबस, लाचार, खानदानी पराक्रम आ कौलिक मर्यादाक गोबर गीजैत। आ बाहरमे ठाढ़ छथि देवकान्त। त्रिाभुज आ त्रिाकोण--दुनूसँ सम्वेदना, एक कोन पर अनुरक्ति, मुदा प्रवेश वर्जित, अमर्यादित...। विचित्रा हाल छल मिथिलाक! अशक्य अनिरुद्ध बाबू केन्द्रमे रहितहु, कतहु नहि रहलाह। अनिरुद्ध बाबूक देहावसान होइतहि जमीन्दारी पालो थमै लेल कुलानन्द केन्द्र दिश लपकै छथि। त्रिाभुज टूटि जाइत अछि, मुदा देवकान्त तथापि बहरइए रहि जाइ छथि। एकटा क्रोधी, नशेरी आ लम्पट पतिक पत्नी द्रौपदी कतहु नहि छथि, किछु नहि छथि। ई मिथिलाक आदर्श आ मर्यादा छल, जकरा, राजकमल चौधरी जीवन लेल अयथार्थ मर्यादा साबित केलनि।
(अगिला अंकमे)


डॉ कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद।
डॉ कैलाश कुमार मिश्र, इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे कार्यरत छथि। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलाश जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल यायावरीक प्रस्तुत अछि ई तेसर खेप।
यायावरी
लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार

क्षेत्रफलक दृष्टिकोणसँ अरुणाचल प्रदेश सम्पूर्ण उत्तर-पूर्व भारतमे सबसँ पैघ राज्य थीक। हालाँकि जनसंख्याक घनत्व एतए सबसँ कम छैक। समस्त राज्य हरियर जंगल, पहाड़सँ भरल; रम्य आ आकर्षक। एहि राज्यमे २६ मूल जनजाति अनेक उपजातिक संग रहि रहल अछि। अरुणाचलक अधिकांश क्षेत्रमे पहुँचनाई आइयो बहुत कठिन कार्य छैक। एक ठाम पहुँचबाक हेतु कतेको बेर नदी पार केनाइ, कतहु पक्का सड़कक नहि भेनाइ, कतहुँ जमीन धसि जेबाक कारणेँ रस्ता अवरुद्ध भऽ गेनाइ इत्यादि सामान्य बात छैक। एहि कठिन परिस्थितिक कारण एतय केर जनजाति सब एखनो धरि अपन मूल परम्परा, खान-पान, आभूषण, वस्त्र-विन्यास, रीति-रिवाजकेँ सहेजने छथि। अनेक दिस चीन एवं आन अन्तर्राष्ट्रीय सीमासँ सटल भारतक ई नैसर्गिक प्रदेश सौन्दर्यक दृष्टिसँ भारतवर्षक श्रृंगार थीक। एकर प्राकृतिक स्वरूपक जतेक प्रशंसा कएल जाय से कमे होयत। अरुणाचलक नाम लैते मात्र तवांग, ईटानगर (प्रदेशक राजधानी), बोमडिला, बन्दरदेवा, रोईंग, जीरो, तिराप, सुबंसरी, नामसाई आ अनेक रम्य स्थान हमरा मानस पटलमे घुमय लगैत अछि।, आ घुमय लगैत अछि रंग-विरंगक परम्परागत परिधानसँ सजल अरुणाचल प्रदेशक जनजाति- सेड्रोपेन, खामती, आदी, इदू-मिसमी, दिगारु-मिसमी, मिजो-मिसमी, आपातानी इत्यादिक झुण्डक-झुण्ड अपन सहजतामे हँसैत आ आबय बला प्रत्येक अतिथिकेँ अपन स्वभाविक आ स्वीकारात्मक मुस्कानसँ स्वागत करैत। बिना कहने सब किछु कहैत।
ताहिँ यायावरीक एहि अंकमे हम अपन लोअर दिवांग घाटी जिलाक यात्रा वृत्तान्तक चरचा कऽ रहल छी। प्रदेशक दिवांग घाटी दू भाग- अपर दिवांग घाटी आ लोअर दिवांग घाटीमे बाँटल छैक। हम अपन यात्रा अपन संस्थाक एक सहयोगी डॉ. ऋचा नेगीक संग दिसम्बर २००७मे केने रही। लोअर दिवांग घाटी तँ ठीक रहैक परन्तु अपर दिवांग घाटी जनपदमे अति बर्फ खसलाक कारणेँ बिल्कुल अवरुद्ध छलैक। ताहिँ हमरा लोकनि ई निर्णय लेलहुँ जे अपना आपकेँ सिर्फ लोअर दिवांग घाटी जनपद तक सीमित राखब आ ओतय केर इदु-मिसमी जनजातिपर कार्य करब। कार्यक मतलब ई जे इदु-मिसमीक जीवन-चक्र, गृह-निर्माण, पावनि-तिहार, वस्त्र-विन्यास, श्रृंगार-प्रसाधन, गहना, विवाह, कृषि-कार्य, स्त्री-पुरुषक सम्बन्ध, परम्परागत क्रीड़ा आदिक विस्तारसँ प्रलेखन आ डाक्युमेन्टेशन केनाइ। इदु-मिसमीक भाषा, संस्कृतिसँ अपना-आपकेँ अवगत करेनाइ।
डॉ. ऋचा नेगी एक प्रतिष्ठित आ वरिष्ठ मानवशास्त्री प्रोफेसर रघुनाथ सिंह नेगीक पुत्री छथि। ओना तँ हिनकर शिक्षा अंग्रेजीमे एम.ए. एवं अंग्रेजीयेमे लोक नाट्यपर छन्हि, परन्तु भ्रमणमे खूब मोन लगैत छन्हि। ई अलग बात छैक जे ओ एको आखर लिखयसँ सदरिकाल बचबाक बहाना बनबयमे माहिर छथि। ऋचाजीकेँ समस्त अऋणाचल प्रदेशसँ अथाह प्रेम छन्हि। हमरासँ ज्यादे ओ अरुणाचल प्रदेशमे रहैत छथि। जखन-कखनहु हमरा लोकनि उत्तर-पूर्व भारतक यात्रा करैत छी तँ गोवाहाटी जाइते मात्र ऋचाजी कोनो-ने-कोनो बहाना बनाय अरुणाचलक हेतु प्रस्थान कऽ जाइत छथि। पुनः दिल्ली वापस अयबाक नियत तिथिसँ एक-दू दिन पहिने गोवाहाटी आबि जाइत छथि। कद-काठी, उजरी गोराइ एहेन छन्हि जे सहजतासँ अरुणाचलमे खइप जाइत छथि। लम्बाई पाँच फुटसँ ज्यादे नहि हेतन्हि। एहि सब कारणेँ अरुणाचलमे लोक ऋचाजीकेँ स्थानीय बुझैत छन्हि। एहि बातपर ओ बड्ड प्रसन्न रहैत छथि।
बात लोअर दिबांग घाटी जनपद केर यात्राक सम्बन्धमे करैत रही। ई हमर प्रथम यात्रा छल, परन्तु ऋचाजी एकबेर पहिने आबि एहि जनपद केर डिस्ट्रिक्ट रिसर्च ऑफिसर, भाषा अधिकारी, जिला कला आओर संस्कृति अधिकारी एवं किछु स्थानीय लोक सभसँ बातचीत कय कार्यक्रम केर रूपरेखा बना कऽ गेल छलीह। ताहि परियोजनाक कार्यान्वयनमे हमरा लोकनिकेँ कोनो तरहक दिक्कत नहि भेल।
लोअर दिबांग घाटी जनपद केर मुख्यालय केर नाम रोईंग छैक। रोईंग ओना तँ जनपद केर मुख्यालय थीक परन्तु जनसंख्या आदिक दृष्टिएँ एना लागत जेना कोनो प्रखण्ड-स्तर केर कस्बा हो। ताइमे रोईंग पहुँचनाइ बहुत दुश्कर। हमरा लोकनि दिल्लीसँ हवाई जहाजसँ असम राज्य डिब्रूगढ़ अयलहुँ। डिब्रूगढ़सँ दू टाटा सूमो टेक्सी लेल। एक टेक्सीमे हम आ डॉ. ऋचा नेगी आ दोसर टेक्सीमे हमरा लोकनिक विडियो कैमराक सदस्य लोकनि अपन असला-खसला लय सवार भऽ गेलाह। डिब्रूगढ़ हवाई अड्डासँ हमरा लोकनि तीनसुकिया अयलहुँ। ओतय जरूरीक किछु समान जेना कि टॉर्च, रेनकोट, छत्ता, खयबाक हेतु नमकीन आदि कीन रोईंग लेल प्रस्थान कएल। तीनसुकियासँ रोईंग कोनो बड्ड दूर नहि छैक। लगभग ७५-८० किलोमीटर हेतैक मुदा पहुँचनाइ दुष्कर। सर्वप्रथम हमरा लोकनि सदियाघाट नामक स्थान जे कि ब्रह्मपुत्र नदीक कछेरपर छैक, पर पहुँचलहुँ। ओतयसँ एक प्राइवेट फेरीवलासँ बात कय अपन दुनू टेक्सीक संग ब्रह्मपुत्र पार करबाक हेतु मोटरबला नावमे सवार भेलहुँ। सवार होमाक प्रक्रिया मात्रमे लगभग सवा घन्टा लागि गेल।
आब हमरा लोकनिक नाव ब्रह्मपुत्रक दोसर कछेरक यात्राक हेतु प्रस्थान कऽ चुकल। नावकेँ चलिते एना बुझायल जेना कोनो समुद्रक बीच आबि गेलहुँ। चारू दिस जलमग्न। ऊपरसँ साँझ से भऽ गेल रहैक। ब्रह्मपुत्रक शान्त स्वभाव आ नावक मोटरक पानि काटक प्रक्रियाक कारणेँ एक अलग किस्म केर बनैत पानिक स्वरूप, वर्षाक कारणेँ मटियाएल पानि, हमरा नीक लगैत छल। नाव बला सभ कहलक जे सदियाघाटसँ दोसर दीयरा दिस जायमे लगभग सवा घंटा लागत। लगभग १० मिनट पानिमे चललाक बाद नावक मलाह अपन खोलीसँ एक छोट छिन्ह बोतल निकाललक। बोतल पौआ देशी दारुक रहैक। आधा भरल। दू आरमी बिना पानि मिलेने आधा-आधा घटकि लेलक आ जय कमला मइया कहैत खाली बोतलकेँ ब्रह्मपुत्रमे फेंकि देलकैक। पुनः ओ सब आपसमे मैथिलीमे वार्तालाप प्रारम्भ केलक।
हम पुछलियैक: “अहाँ लोकनि कतय केर छी”?
हम सब बिहारक छी”। ओ सब उत्तर देलक।
हम पुनः पुछलियैक:”बिहारक छी से तँ हम बुझि गेलहुँ, बिहारक कोन जिलामे अहाँ लोकनिक घर थीक?”
ताहिपर ओ जवाब देलक- “हमरा लोकनि पूर्णियाँ जिलासँ छी”।
एहिपर हम कहलियैक- “हम मधुबनीसँ छी”।
एकर बाद हमरा लोकनि अपन वार्तालाप मैथिलीमे शुरु कऽ देल।
मलाह हमर दिस इंगित भय कहलक- “सरकार अहाँ लोकनि कतयसँ आयल छी”।
एहिपर हम कहलियैक, “हम मधुबनीसँ छी”।
एकर बाद हमरा लोकनि अपन वार्तालाप मैथिलीमे शुरू कऽ देल।
मलाह हमरा दिस इंगित भय कहलक: “सरकार अहाँ लोकनि कतयसँ आयल छी”?
हम जवाब देलियैक: “दिल्लीसँ। हमरा लोकनि भारत सरकारक अधीनस्थ कर्मचारी छथि। लोअर दिबांग घाटी जिलामे ओतय केर लोकक विशेषतः इदु-मिसमी जनजातिक संस्कृतिकेँ बुझबाक हेतु एवं ओहि संस्कृतिपर कार्य करबाक हेतु आयल छी”।
हमर जवाब सुनि मलहबा भैया पुछलक: “सरकार, अहाँ सब कहियासँ कहिया धरि लोअर दिबांग घाटीमे रहब? लोअर दिबांग घाटीक मुख्यालय रोईंग छैक। रोईंगमे कतय रहब”?
हम कहलियैक: “भाई, हम सब दिन भरि तँ भिन्न-भिन्न गाम सबमे कार्य करब आऽ रातुक विश्राम रोईंग केर कोनो होटलमे करब। रोईंगक ई हमर प्रथम यात्रा थीक ताहिँ होटल आदिक नाम हमरा बुझल नहि अछि। हँ ओतय केर जिला शोध अधिकारी श्री श्रुतिकर हमर पूर्व परिचित लोक छथि। हमर जे महिला सखी छथि (डॉ. ऋचा नेगी) सेहो रोईंग एवं आस-पास केर इलाकासँ पूर्व परिचित छथि। श्री श्रुतिकर एवं डॉ. ऋचा नेगी दुनू गोटे मिलि सम्भवतः नीक जगहमे हमरा लोकनिक रात्रि-विश्रामक व्यवस्था करतीह ई विश्वास अछि। जहाँ तक कार्य करबाक बात छैक तँ हमरा लोकनि २४ फरबरीसँ १ फरबरी २००८ धरि सम्पूर्ण लोअर दिबांग घाटीमे कार्य करबाक योजना बना कऽ आयल छी। आगाँ भगवानक मर्जी”।
हमरा लोकनि बात करिते रही, ओहि बीच एकाएक बरखाक एक-आध बुन्द खसय लगलैक। हम डरि गेलहुँ। भेल कहीं बीच ब्रह्मपुत्र धारमे नहि फँसि जाइ। डरैत पुछलियैक : “कहीं जोरसँ बरखा तँ नहि हेतैक? आ भेलैक तऽ हमरा लोकनि केर की गति हैत”?
हमर अकुलायल प्रश्नसँ परेशान होइत मलहबा भाइ हँसैत एवं निर्भीक स्वरमे बाजल- “सरकार, अनेरे किएक परेशान भऽ रहल छी? ई बरखा ओना तँ हैत नहि आ किनसाइत भइयो गेल तँ चिन्ताक कोनो बात नहि। हमसब जलकर केर सन्तान छी। महाराज कोइलाबीरक पुजारी छी। कोशी माइ केर कोरामे बढ़ल छी। कहू मालिक! कोसीसँ खतरनाक भला कोनो धार दुनियाँमे भला भऽ सकैत अछि? कमलेसरी मैयाक कृपा हमरा सब पर छन्हि। लगभग १५ बरखसँ नाव चला रहल छी, आइ तक कोनो दुर्घटना नहि घटित भेल। बिना कमलेसरी आ कोइलाबीरक सुमिरन केने घरसँ नहि निकलैत छी”।
मलहबा भाइ केर ढ़ाढ़ससँ मोन कनि चैन भेल। वार्तालापक कड़ी टूटल नहि। हम पुछलियैक: “अहाँ सब हमरा ई कहू जे पुरनियाँसँ सरिमाघाट कोना अयलहुँ।
मलहबा भैया कहलक : “सरकार, पेट अनलक। गाममे बड्ड गरीबी छल। एकटा बाभनसँ हमर बाबू तीन सय टाका हमर बहिनक बियाह लेल सूदिपर लेलकैक। एहि आशामे जे धान-पानि नीक जकाँ हैत तँ धान बेचि एवं मखानक खेतीक पाइसँ कर्जा सधा देबैक। दुर्भाग्यसँ लगातार तीन बरख कोसीमे बाढ़ि अबैत रहलैक आ बभनाक पाइ सधेनाइ तँ दूर हम सब अपन पेट भरक लेल धान आ अन्न सेहो डेढ़ापर लय लेलियैक। सब टा चीज बढ़ैत गेलैक। अन्ततः पाँच बरखक बाद डकूबा बभना सब टा जोरि-जारि चालिस हजार टका बना देलकैक। गाममे पंचैती बैसलैक। हमर बूढ़ बाबूकेँ बभनाक बेटा सभ बान्हि कऽ मारलकैक। हमरा सबहिक तीन बीघा जमीन बलजोरी लिखा लेलक”।
“मालिक! मरता क्या नहीं करता! एक दिन साँझ खन हमर बाबू हमरा दुनू भाइकेँ बजौलक आ कनैत कहलक। ’बौआ! हम तँ बीट-बीट धरतीकेँ बेचि देलियौ। आब तोँ सब धरतीहीन छैं। जो कलकत्ता-असम कतहुँ कमा आ पाइ भेज जाहिसँ गुजर चलौक ’। एकर बाद बाबू हमरा दुनू भाइकेँ पकड़ि जोर-जोरसँ कानय लागल”।
“बाबूक बात तँ सत्य छलैक। हमर दुनू भाइ गामसँ कनियाक गहना बन्हक राखि कलकत्ता आबि गेलहुँ। कलकत्तामे मोहियाबुर्ज नामक स्थानपर रिक्शा चलाबय लगलहुँ। शुरूमे तँ बड्ड थकान भेल परन्तु धीरे-धीरे मोन लागि गेल। बाबू आ बच्चा सबहक बड्ड ध्यान अबैत छल। एक दिन साँझमे टेलिग्राम आयल जे “बाबू मरि गेल”। देखियौ सरकार, हमर बाबूक दुर्भाग्य, मरऽ काल हम दुनू भाइ बाबू लग नहि रहियैक। हमर पितियौत आगि देलकैक”।
“बाबू श्राद्धमे गाम गेलहुँ तँ किछु लोक कुटमैतीक नोत पूरक हेतु अयलाह। ओ सब कहलनि असम चलू। हम सब असम आबि गेलहुँ। तहियेसँ सदिया घाटमे छी। बाबू तँ हमर जमीनक शोकमे मरि गेल, मुदा हम सब १५ बरखमे पाँच बीघासँ ऊपर जमीन लेलहुँ। माय एखनहु जीबैत अछि। माय हमेशा कहैत अछि। ’रे रामओतार! तोहर बाऊ तोरा स्वर्गसँ आशीर्वाद दैत छौह। बभनाकेँ देख, कुष्ट फुटि गेल छैक। बेटासभ लगो नहि अबैत छैक। घरबाली मरि गेलैक। अपने असगरे टाहिं-टाहिं करैत अछि’। सरकार हमरा सबकेँ होइत अछि जे स्वर्ग-नरक सब एहि धरतीमे छैक”।
हम रामओतारकेँ कहलियैक- “हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल जे तोँ सब एतय इमानदारीसँ मएहनति कय सम्पत्ति अर्जन करैत छह। नीक चीजक परिणाम नीके होइत छैक”।
संयोग नीक छल। कनीक बुन्दी-बान्दी भय आकाश स्वच्छ भऽ गेलैक। बरखा नहि भेलैक। मोन खरहर भऽ गेल। ओना जनवरी-फरवरी महिना प्रचण्ड जाड़, बरखा आ बर्फ खसबाक समय छैक लोअर दिबांग घाटीमे। अपर दिबांग घाटी तँ एहि मासमे आबाजाही साफे बन्द भऽ जाइत छैक। समस्त इलाका बर्फ आऽ पानिसँ भरल। रस्ता सबपर बर्फक परत दर परत जमल रहैत छैक। स्थानीय लोक सब दू तीन मास पहिने जरूरी समान जेना कि नोन, तेल, मसल्ला, दवाइ, वस्त्र, इन्धन, अन्न आदिक भण्डारण कऽ कए राखि लैत अछि।
खैर! थोरेक कालक बाद घाटक दोसर कछेरपर हमरा लोकनि पहुँचि गेलहुँ। आब राति भऽ गेल छल। पता चलल जे ओतयसँ रोईंग शहर लगभग ५५ किलोमीटर केर दूरीपर अवस्थित छैक। ५५ किलोमीटरमे लगभग १५ किलोमीटर दियारा अर्थात् बालु आ कादोसँ भरल कच्चा रस्ता। पहिने गेल गाड़ीक लीकपर चलैत रही। खूब सावधानीक संग। ड्राइवरक गति आ दिमाग दुनू चीजक आश्चर्यजनक सामंजस्यक संग चलबाक जरूरत। से नहि भेल तँ कतहुँ फँसि जाएब।
हमरा लोकनिक गाड़ी टाटा-सूमो छल। गाड़ीक ड्राइवर धर्मा बड़ा तेज आ बातूनी। ऋचा नेगीकेँ हाँ मे हाँ मिला कऽ बेबकूफ बनेबामे माहिर। ओना ड्राइवरीमे ओतेक निपुण नहि जतेक बात बनेबामे। हम सब अन्हरिया रातिमे ओहि सुन-सान दियारामे जाइत रही। एकाएक गाड़ीक पछिला चक्का थालमे फँसि गेलैक। हम सब कियो बाहर निकललहुँ। किछु कारणवश ऋचाजी सँ बाताबाती भऽ गेल रहए ताहिँ वार्तालाप नहि चलैत छल। ऋचाजी अपन शेखी बखारय लगलीह। तुरत अपन भायक दोस्त जे कि गोरखा रेजीमेन्टमे छलन्हि तकरा फोन करय लगलीह। एम्हर हमरा लोकनि डण्टा आऽ खन्तीसँ पछिलका चक्का आ मडगार्ड लग जमल माटिकेँ हटाबय लगलहुँ। लगभग आधा घण्टा धरि ऋचाजीकेँ फोनो नहि लगलन्हि। जखन लगलन्हि तँ गोरखा रेजीमेन्ट केर ऑफिसर सब कहलकन्हि जे आबयमे ओकरा सबकेँ थोरेक देर लगतैक कारण ओऽ सब कोनो दोसर ठाम फँसल गाड़ीकेँ निकालबाक हेतु पहिनेसँ कतहु गेल छैक।
खैर! हमरा लोकनि अपन प्रयासमे लागल रही। हमरा लोकनिक मणीपुरी कैमरामेन या विडियोग्राफर रोनेल हाओबाम आ जेम्स बड़ा उत्साही युवक छलाह। ओ सभ पूर्ण तन्मयताक संगे कादो निकालयमे लागल रहलाह। हुनका लोकनिक साहसकेँ देखैत हमहू सेतु बान्हक लुक्खी जकाँ कनी-कनी माँटि निकालैत रहलहुँ। हमरा सभ लग दुर्भाग्यसँ टॉर्च आदि सेहो नहि छल।
ओहि बीचमे धर्मा ड्राइवर बाजल जे एहि रस्तामे चलबाक हेतु जरूरी छैक जे गाड़ीमे एक कोदारि, एक खन्ती, एक टॉर्च आदि लऽ कऽ चलए”।
धर्मा पहिनहुँ ऋचाजीक संग लोअर दिबांग घाटीमे आबि चुकल छल। हम आब ओकरापर कनी तमसेलहुँ- “तोँ पहिने किएक नहि खन्ती, कोदारि, टॉर्च आदि नहि अनलैंह? जखन रस्ताक बारेमे बूझल छलौक तँ एना केयरलेस किएक”?

ऋचाजी धर्माकेँ बचेबाक मुद्रामे हमरा लग अयलीह। एहिसँ पहिने जे ओऽ किछु बजितथि, हम कहलियैन- “अहाँ लेल नीक हैत जे अहाँ एकौ शब्द नहि निकालू। हम एखन घोर तामसमे छी! अहाँ सभ पहिने की एतय पिकनिक मनेबाक हेतु आयल छी”?
ऋचाजी हमर तामससँ पूर्व परिचित छलीह। ओऽ चुपे रहबामे अपन कल्याण बुझलनि आ किछु बातक जवाब नहि देलीह। ओना रोनल आऽ जेम्स केर जतेक प्रशंसा करी से कम। दुनू बिना एकौ मिनट केर आरामक कादो हटबैत रहलाह। हमहूँ तमसाइत, चिचियाइत रहलहुँ मुदा कादो हटेबाक कार्यकेँ रुकय नहि देलियैक। अन्ततः हमरा लोकनि अपन उद्देश्यमे सफलता प्राप्त कएल। गाड़ी कादोसँ बाहर भेल। आब रातिमे बौआइत डेराइत हमरा लोकनि अपन गन्तव्य दिस बढ़य लगलहुँ। लगभग १५ किलोमीटर आगाँ बढ़लाक बाद गोरखा रेजीमेन्ट बला सब एक जीप आऽ एक ट्रकक संग हमरा लोकनि लग आयल। धर्मा ड्राइवर ओकरासभकेँ बता देलकैक जे हमरा लोकनिक टाटा सूमो स्वतः हमरा लोकनिक प्रयाससँ ठीक भऽ गेल।
मुदा ऋचाजी कतय मानयबाली। सेना जीपकेँ रोकबाक इशारा करैत स्वयं गाड़ीसँ बाहर अयलीह। हाथ मिलेलन्हि। मुद्रा एहेन बनेली जेना भारतक तीनू सेनाक सर्वोत्कृष्ट अधिकारी होथि। हम तामसे भेर रही।
खैर लगभग साढ़े दस बजे रातिमे हमरा लोकनि रोईंग आबि एक स्थानीय होटलमे अयलहुँ। आब पानि खूब जोरसँ होबय लगलैक। होटलक मैनेजर एक बंगाली भद्रलोक छलाह। कनीक फुचफुचाएल। लगभग ६२ वर्षक श्यामवर्ण। मोटुका चश्मा धारण केने। हम सभ जखन होटल अयलहुँ तँ पता चलल जे जिला शोध अधिकारी डॉ. पी.के.श्रुतिकर एवं जिला भाषाधिकारी श्री जेमि पुलू महोदय हमरा लोकनिक रहय केर व्यवस्था डॉ. ऋचा नेगीसँ दूरभाषसँ भेल बातचीतक आधारपर पूर्वहिँ एहि होटलमे केने छलाह। डॉ. श्रुतिकर स्वयं कतहु व्यस्त छलाह ताहिँ लोअर दिवांग घाटीक जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी श्री गोगोई लींगि एवं जिला भाषाधिकारी श्री जेमिपुलूकेँ हमरा लोकनिक स्वागत एवं दिशा निर्देशन हेतु होटलमे पठा देने रहथि। जार प्रचण्ड रहैक। थर-थर कँपैत आ ऊपरसँ पानिमे भिजैत कोनो तरहेँ हमरा लोकनि होटलक प्रांगणमे प्रवेश केलहुँ। होटलक स्वागत कक्षमे प्रवेश करिते मात्र बिजली गुम भऽ गेलैक। अन्हार गुप्प!!! होटल केर मैनेजर साहेब तुरत एकटा १३-१४ वर्षीय बच्चाकेँ बजौलाह। ओऽ बच्चा सेहो मोतीहारी जिलाक रहैक। बच्चाकेँ डटैत मोमबत्ती लयबाक निर्देश देलथिन्ह। हम कहलियन्हि- “एतय जेनेरेटर केर व्यवस्था नहि छैक की”? ताहिपर गोगोई लींगि महोदय कहलाह- “एतय ई सभ सुविधा कोना भेटत? एतय केर सभसँ नीक होटल यैह छैक। समय कोहुना बिताबय पड़त। एहिसँ नीक समस्त रोईंग शहरमे कोनो स्थान नहि छैक”।
कनीक कालक बाद ओ बच्चा (होटल केर नौकर) तीन टा मोमबत्ती लय हमरा लोकनि लग एक आरो नौकरक संग आयल। पता चलल जे हमरा लोकनिक व्यवस्था होटल केर तेसर तल्लापर अछि। जखन तेसर तल्लापर पहुँचलहुँ तँ घोर पश्चाताप भेल। तमाम कमरासभ दुर्गन्धसँ भरल। कोनो कमरामे लैट्रिन-बाथरूम संलग्न नहि, मूस सभ एम्हर-ओम्हर दौड़ैत; ओछाओन सभ मैल, मसुआएल आ दुर्गन्धसँ भरल। भेल, हे भगवान। कतय आबि गेलहुँ। अन्ततः एक कमरा कनीक नीक लागल। हम अपन लैपटॉप बला बैग लय ओहि कमरा दिस आगाँ बढ़ि कहलियैक जे- “हमर समान एतय राखू”।
बीचहिमे जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी श्री गोगोई लींगि महोदय झटाक दऽ बाजि उठलाह- “नहिँ, नहिँ। एहि कमरामे अहाँ नहि रहि सकैत छी। कोनो आन कमरा पसन्द कऽ लिअ। ई कमरा हमरा लोकनि डायरेक्टर महोदया लेल सुरक्षित रखने छी”।
ई कहि गोगोई लींगि ऋचाजीक बैग लय ओहि कमरामे आबि गेलाह। फेर होटलक नौकरकेँ निर्देश देलथिन्ह: “एहि कमराकेँ ठीकसँ साफ कय डॉ. ऋचा नेगी लेल तैयार करह”।
हम तामसे भेर भऽ गेलहुँ। तामससँ काँपैत कहलियैक: “कियोक डायरेक्टर नहि अछि एतय। जैह ऋचा नेगी छथि, सैह हमहुँ छी। दू तरहक कमराक निर्देश अहाँ लोकनिकेँ के देलक”?
तावत ऋचाजी ओतय आबि गेल छलीह। ओऽ तुरतहि अपन गलतीकेँ ठीक करऽ लगलीह। गोगोई लींगिसँ हमर परिचय करओलन्हि: “ई डॉ. कैलाश कुमार मिश्र छथि। हम सभ दुनू गोटे शोध अधिकारी छी। ई ज्यादे काल असम, मणीपुर, मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा आदिमे व्यस्त रहैत छथि। अरुणाचल मूलतः हमहीँ अबैत छी। हिनका यैह कमरा देल जाय”।
हम ऋचाजीकेँ किछु नहि कहलियन्हि। अपन समान ओही कमरामे राखि लेल। गोगोई लींगि महोदय एवं भाषाधिकारी जीमि पुलू महोदयसँ हाथ मिला अपन समान सभ ठीक करय लगलहुँ। ओऽ सभ ऋचाजी एवं हमर टीमक आन सदस्य सभ लेल कमराक व्यवस्थामे लागि गेलाह। आब बिजली सेहो आबि गेल छलैक। हम मुँह हाथ धोबय चाहैत रही। मुदा पानि सर्द एतेक जेना बर्फ हो। की करू? घंटी बजाय मैनेजर साहेबकेँ बजाओल आ निर्देश देलोयन्हि जे तुरत गरम पानिक व्यवस्था करओल जाय।
पन्द्रह मिनटक बाद एक लड़का एक बाल्टीन पानि लए प्रवेश कएलक। आब हम कपड़ा बदलि मुँह हाथ धोलहुँ। हाथमे थाल इत्यादि लागल छल। तकरा नीक जकाँ साफ कयल। कनीक कालक बाद रात्रिक भोजन केर व्यवस्था भेल, मोटका चाउरक भात, हरियर तरकारी, स्थानीय साग, मुर्गाक मांस, मसुरिक दालि, टमाटर, पियाज, मुरइ, हरियर मिरचाई इत्यादि केर सलाद। रोटीक कल्पना केनाई मूर्खता। ताहिँ भोजन करय लगलहुँ। मुदा भोजनमे कोनो स्वाद नहि। भूख हदसँ ज्यादा, मुदा स्वादहीन भोजन खाऊ तँ कोना! तावतमे कैमरामेन रोनल आ जेम्स हमरा लग आबि गेलाह। कहलन्हि- “सर, ई भोजन अहाँ नहि खाऽ सकैत छी। स्थानीय मसाला आऽ बिना तेलक बनल छैक। हमरा लोकनि बड्ड भुखायल छी। एतय एक सप्ताह रहबाक सेहो अछि। अहाँ दू पैग रमक लऽ लिअ। जाड़ सेहो ठीक भऽ जाएत। एक आज्ञाकारी शिष्य जकाँ हम बिना कोनो तर्क केने रोनल आ जेम्सक बात मानि लेलहुँ। जेम्स एक स्टील बला ग्लासमे एकै बेर दू पैग रम ढारि पानिसँ भरि हमरा लग अनलन्हि। हम धीरे-धीरे पी लेलहुँ। आ नीक जकाँ भोजन कय डायरी लीखय लगलहुँ। कनीक कालक बाद ऋचाजी अयलीह। कहलन्हि: “हम अहाँसँ किछु बात करय चाहैत छी”।
हम कहलियन्हि: “हम एखन बात करबाक मूडमे नहि छी। काफी थाकल छी। अपसेट सेहो छी। अहाँ हमरासँ भोरमे बात करू।
ऋचाजी फेर कहलन्हि- “हमरा बुझा रहल अछि जे गोगोई लींगिक बातसँ अहाँकेँ हमरा प्रति किछु गलतफहमी भऽ गेल अछि। हम ओकरा दूर करए चाहैत छी। हमरा मात्र ५-१० मिनट समय दिअ। हम फेर चलि जाएब”।
हम साफ मना कऽ देलियन्हि। “देखू ऋचाजी। हम एखन बहुत डिस्टर्ब आऽ थाकल छी। अहाँसँ हम कोनो तरहक वार्तालापक मूडमे नहि छी। जतेक गलतफहमी अछि तकरा भोरमे ठीक करब। एखन हम असगर रहए चाहैत छी। चिन्तन करए चाहैत छी। आऽ पुनः सुतए चाहैत छी। अहूँ थाकल छी, जाउ आऽ सुति रहू”।
ऋचाजी बुझि गेलीह जे हम नाराज छियन्हि, मुदा वार्तालाप सेहो सम्भव नहि। कनिक उदास भय नहुँ-नहुँ हमरा कमरासँ बाहर भऽ गेलीह। जाइत-जाइत शुभ-रात्रि कहलन्हि, मुदा हम कोनो उत्तर नहि देलियन्हि। कनिक काल तक हम तमाम परियोजनापर सोचैत रहलहुँ। रोईंगक एहि विकट होटलमे अपन पुत्र शशांकक याद बेर-बेर अबैत छल। सोचि रहल रही जे पूनम (हमर कनियाँ) बड्ड परेशान हेतीह। बात करय चाहैत रही। परन्तु नेटवर्क साफे इंगित नहि भऽ रहल छल। काफी कचोट भेल। अन्ततः सुति रहलहुँ।
(अगिला अंकमे)
२. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
छठम दिन :
३० दिसम्बर १९९०, रविवार :
आईके हमर दिनचर्या ६ बजे भोरे शुरु भेल। नित्यक्रियासऽ निवृत्त भऽ नास्ता कऽ पुनथ यात्रारम्भ भेल।शहर सऽ दूर जंगलाह रस्ता हरियर गाछ वृक्ष सऽ भरल वातावरण लक्ष्यके भूमिका बना रहल छल। हमसब भारतक प््राथम नोबेल पुरस्कार विजेता स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ टैगोरक कर्मभूमि शान्ति निकेतन पहुंचलहुं।अहि स्थानक गौरवपूर्ण इतिहासदऽ किछ कहनाइ सूर्यक सोंझामे दीप रखनाई अछि।हॅं अत राखल वस्तुक विवरण देल जा सकैत अछि।सबसऽ पहिने रवीन्द्रभवन नामक संग्रहालय देखलहुं जे प्रवेशद्वारे लग छल। अहिमे रवीन्द्रनाथजी द्वारा उपयोग कैल जूता, ओवरकोट, कपड़ा, होमर ब्रैण्डक कार, अतऽ तक की प्लेट - चम्मच सब सेहो राखल रहै।ओहि संग्रहालयमे नोबेल पुरस्कार सेहो राखल छल।अहि संग्रहालयक बगलमे रवीन्द्रनाथ टैगोरके पॉंचटा भवन सेहो छल जकर नाम छल -
1 उद्दयन : ई दू मंजिला आर उज्जर रंगक छल।
२ कोणार्क : ई साधारण प््राकारक घर छल।
३ श्यामली : ई माटिक बनल कुटिया छल जाहिमे गॉंधीजीक चरणकमल सेहो पड़ि चुकल अछि।
४ पुनश्च : अहि एकमंजिला मकानक खिड़कीमे कॉंचक केवाड़ छल।
५ उदीचि : अहि दूमंजिला मकानक बनावट मंदिर जकॉं छल।
अकर बाद हमसब ओतक बाग-बगिचा, कला शिक्षण केन्द्र, यूनिवर्सिटी आदिक भ्रमण केलहुं।ई वास्तवमे एक गुर्‌उकुल छै जत प्राचीन तरीका सॅ प्राकृतिक वातावरणमे आधुनिक शिक्षा देल जाइत छै। अतय २२ भाषाक अध्यापन होइत छै।अहि तरहे ई एतिहासिक स्थानक दर्शनोपरान्त हमसब भोजन करै लेल गेलहुं।भूख तऽ लागल छल मुदा मांछ खा-खा अघा गेल छलहुं आकि थाकल छलहुं ताहि कारणे भोजनक ईच्छा नहिं छल।लेकिन जखन एकटा शिक्षकके ई पता चललैन तऽ हमरा आर हमर एक संगीके लऽ कऽ मिठाई खुआबऽ लऽ गेला। नहिं खायक बात पर डॅंटला आर ताबे तक रंग-रंगक मिठाई खुआबैत रहला जाबे मोन अकसक नहिं भऽ गेल। लागल बंगालमे मैथिलक बरियाती आयल छी।हुनकर अहि तरहक आबेस आऽ एक-एक गोटैक ध्यान राखक स्वभावके हम कहियो नहिं बिसरब।
भोजन के बाद हमसब पुन: अपन मंजिल दिस बढ़लहुं।रस्ता भरि हल्ला-हुच्चर करैत रहलहुं। बुझेबो नहिं कैल कखन सुर्यास्त भेल कखन राति आबि गेल आ चारि घंटामे तारापीठ पहुंचि गेलहुं।अगिला दिन मंदिरक दर्शन करैके छल से पूर्वसूचित कैल गेल।
उपन्यास-
उनटा आँचर- गजेन्द्र ठाकुर
उनटा आँचर


“बौआ, कनेक ओहि कठौतकेँ खुट्टाक लग कए दिऔक। बड्ड पानि चूबि रहल छैक ओतए। ई बादरकाल सभ साल दुःख दैत अछि। सोचिते रहि गेलहुँ जे घर छड़ायब। मुदा नहि भए सकल। घरोक कनी मरोमति कराएब आवश्यक छल, मुदा सेहो नहि भए सकल। ठाम-ठाम सोंगर लागल अछि। फूसोक घर कोनो घर होइत छैक? ठाम-ठाम चुबि रहल अछि, ओतेक कठौतो नहि अछि घरमे। खेनाइ कोना बनत से नहि जानि। ओसारापरक चूल्हिपर तँ पानिक मोट टघार खसि रहल अछि। एकटा आर अखड़ा चूल्हि अछि, मुदा जे ओऽ टूटि जाएत, तखन तँ चूड़ा-गुड़ फाँकि कए काज चलबए पड़त। समय-साल एहेन छैक जे चूल्हि बनाएब तँ सुखेबे नहि करत। जाड़नि सेहो सभटा भीजि गेल अछि। भुस्सीपर खेनाइ बनाबए पड़त”।
पइढ़िया उजरा नुआक आँचर ओढ़ने, थरथराइत कनियाँ काकी दस बरखक अपन भातिजक सँग, कखनो सोंगरकेँ सोझ करथि तँ कखनो कठौतकेँ एतएसँ ओतए घुसकाबथि। जतए टघार कम लागन्हि ओतएसँ घुसकाकए, जतए बेशी लागन्हि ओतए दए दैत छलीह। सौँसे घर-पिच्छर भए गेल छल। कोनटा लग एक ठाम पानि नञि चूबि रहल छल। ततए जाए ठाढ़ भए गेलीह।
“खढ़, कतेक रास, चरमे अनेर पड़ल छल। पढ़ुआ काकाकेँ कहलियन्हि नहि। घर छड़बा लेने रहितहुँ”।
“यौ बाबू। घर छड़एबाक लेल पुआर तँ भेटनहार नहि। आऽ गरीब-मसोमातक घर खढ़सँ के छड़ाबए देत”।

नेनाकेँ खढ़सँ आऽ पुआरसँ घर छड़बयबामे होमयबला खरचाक अन्तर नहि बुझल छलन्हि।

“से तँ काकी, खढ़सँ छड़ाएल घरक शान तँ देखबा जोग होइत छैक। पढ़ुआ काकाक घर देखैत छियन्हि। देखएमे कतेक सुन्दर लगैत अछि आऽ केहनो बरखा होए, एको ठोप पानि नहि चुबैत अछि”।
“से तँ सभसँ नीक घर होइत अछि कोठाबला”।
“एह, की कहैत छी? गिलेबासँ आऽ सुरखीसँ ईँटा जोड़ेने कोठाक घर भए जाइत अछि। आऽ नेङराक घर तँ सीमेन्टसँ जोड़ल छैक, मुदा परुकाँ ततेक चुबैत छल से पूछू नहि”।
“से”।
“हँ यै काकी। सभ बरख जौँ छड़बा दी, तँ ओहिसँ नीक कोनो घर होइत छैक”।
“चारिम बरख जे छड़बेने छलहुँ तकर बादो पहिल बरखामे खूब चुअल छल”।
“पहिलुके बरखामे चुअल होएत, फेर सभ तह अपन जगह धऽ लेने होएत, तखन नहि चुअल होएत”।
“हँ, से तँ तकरा बाद तीन साल धरि नहि चुअल”।
तखने कनिआ काकी बजैत अएलीह-
“जनमि कए ठाढ़ भेल अछि आऽ की सभ काकीकेँ सिखा रहल अछि। कनेक उबेड़ जेकाँ भेलैक तँ सोचलहुँ जे बहिन-दाइक खोज पुछड़ि कए आबी”।
बुन्नी रुकि गेल छल। भातिज अपन घर दिस गेलाह आऽ दुनू दियादनीमे गप-शप शुरू भए गेल।
साँझ भेल। भदबरिया अन्हार। कनिआ काकी कहैत गेलखिन्ह-
“बहिन दाइ, आगिक जरूरी पड़य तँ हमर घरसँ लए जाएब”।
“नञि बहिनदाइ। सलाइमे दू-तीन टा काठी छैक। मुदा मसुआ गेल छैक। हे, ई डिब्बी दैत छियन्हि, कनेककाल अपन चुल्हा लग राखि देथिन्ह तँ काजक जोगर भए जाएत। बौआ दिआ पठा दिहथि”।
“देखिहथि। उपास नञि कऽ लिहथि से कहि दैत छियन्हि”।
कनियाँ काकी ओसारापर खुट्टापर पीठ सटा बैसि गेलीह।
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“खुट्टा पहलमान छथि ई”।
“से नहि कहू काका। जबरदस्तीक मारि-पीटि हम नहि करैत छी, ताहि द्वारे ने अहाँ ई गप कहि रहल छी”।
फूदन काका आऽ उदन भातिज। पित्ती-भातिजमे ओहिना गप होइत छलन्हि, जेना दोस्तियारीमे गप होइत छैक। अखराहामे जखन उदन सभकेँ बजाड़ि देथि तखन अन्तिममे फूदन हुनकासँ लड़य आबथि। काका कहियो हुनका नहि जीतए देलखिन्ह।
उदनक कनियाँ नव-नव घरमे आएल छलीह। एहि तरहक वातावरण घरमे देखलन्हि तँ मोन प्रसन्न भऽ गेलन्हि। घरक दुलारि छलीह आऽ सासुरो तेहने भेटि गेलन्हि। समय बीतए लगलन्हि। मुदा उदनक विधवा एतेक जल्दी कहाय लगतीह से नहि बुझल छलन्हि हुनका। आब तँ सभ प्रकारक विशेषणक अभ्यास भऽ गेल छन्हि। झगड़ा-झाँटि बीच क्यो ईहो कहि दैत छन्हि- वरखौकी, वरकेँ मारि डाइन सिखने छथि!
उदनक जिवैत जे सभक दुलारि छलीह तकर सभक आँखिक काँट भए गेलीह। फूदन कनियाँक पक्ष लए किछु बाजि देलखिन्ह एक बेर तँ कनियाँक सासु-ससुर कहए लगलखिन्ह जे हमर पुतोहुकेँ दूरि कए रहल छथि। अपना घरमे मुद्दीबासभक घटना हेतैक, तखन ने बुझए जाइत। लोक कहैत छैक जे सुखक दिन जल्दी बीति जाइत अछि, मुदा कनियाँक दुखक दिन जल्दी बीतैत गेलन्हि, सुखक दिन तँ एखनो एक-संझू उपासमे खुजल आँखिसँ कनियाँ काकी देखैत रहैत छथि, खतमे नहि होइत छन्हि। विधवा भेलाक अतिरिक्त आन घटनाक्रम अपन नियत समयसँ होइत रहल। हुनकर माता-पिताक मृत्यु भेलन्हि, सास-ससुरक सेहो। फेर पितिया ससुर फूदन कका सेहो गुजरि गेलाह। घरमे जखन बँटबारा होमय लागल तखन सम्पत्तिक- खेत-पथारक बँटवारा चारि भैयारीमे मात्र तीन ठाम होमय लागल। उदनक हिस्सा तीनू जिबैत भैयारी बाँटि लेलन्हि। कनियाँ किछु कहलखिन्ह जे हमर गुजर कोना होएत तँ उदनक मृत्युक दोष हुनका माथपर दए कनियाँक मुँह बन्न कए देल गेल। तीनू भाँयक मुँह उदनक समक्ष खुजैत नहि छलन्हि मुदा हुनका मृत्युक बाद हुनकर विधवाकेँ हिस्सा नहि देबऽ लेल तीनू भाँय सभ तरहक उपाय केलन्हि। कनियाँ नैहर जाऽ कए अपन भायकेँ बजा कए अनलन्हि। पंचैती भेल आऽ फेर अँगनाक कातमे एकटा खोपड़ी अलगसँ तीनू भाँय बान्हि देलखिन्ह कनियाँ काकी लेल। धान, फसिल सभ सेहो जीवन निर्वाहक लेल देबाक निर्णय भेल। कनियाँ काकी चरखा काटए लगलीह, से कपड़ा-लत्ता ओतएसँ तेना निकलि जान्हि।
“लिअ काकी सलाइ”।
“हँ बौआ”। भक टुटलन्हि कनियाँ काकीक। बच्चा सलाइ पकड़ाए चलि गेल।
एहि बेर बाढिक समाचार रहि रहि कए आबि रहल छैक। बाट घाट सभ जतए ततए डूमि रहल छलए, खेत सभ तँ पहिनहि डूमि गेल छलए। पढ़ुआ काकी पहिनहिये सुना देने छथिन्ह जे एहि बेर वार्षिक खर्चामे कटौती हेतन्हि।
“कनियाँ सभटा फसिल डूमि गेल, एहि बेर वार्षिक खरचामे कटौती हेतन्हि”।
“एँ यै काकी। जहिया फसिल नीक होइए तँ हमर खरचामे कहाँ कहियो बेशी धान देलहुँ”?
ई गप पढ़ुआ काका सुनि रहल छलाह। बजलाह- “राँड़ तँ साँढ़ भए गेल”। पढ़ुआ काकीक इशारा केलापर ओऽ ससरि कए दलान दिशि बहराऽ गेलाह। कनियाँ काकी नोर सोंखि गेलीह।
धुत्त दिनमे तँ खेनहिये छलहुँ, एहि अकल-बेरमे केना खेनाइ बनाएब। कनियाँ-मनियाँ छलीह तखने विधवा भऽ गेलीह आऽ अहू वयसमे तैँ सभ कनियाँ-काकी कहैत छन्हि। उदन कतेक मानैत छलखिन्ह अपन भायकेँ, अपन पेट काटि मुजफ्फरपुरमे राखि पढ़ओलन्हि छोटका भाइकेँ आऽ आब ओऽ पढ़ुआ बौआ एहेन गप कहैत छथि। सोचिते-सोचिते नोर भरि अएलन्हि आँखिमे। भातिजक संग एकबेर मास करए लेल गेल रहथि। अपन बड़की दियादिनीकेँ सुनबैत रहथि खिस्सा- बहिनदाइ, ततेक भीड़ छलए ट्रेनमे, गुमार ततबे। गाड़ीमे बेशी मसोमाते सभ छलीह। एक गोटे कहैत छलीह जे जतेक कष्ट आइ भेल ततेक तँ जहिया राँड़ भेल छलहुँ तहियो नञि भेल छलए। कनियाँ काकीक मुँहपर बारीक हहाइत पानि आऽ चारसँ टपटप चुबैत पानिक ठोपक आऽ घुप्प अन्हारक बीच कनेक मुस्की आबि गेलन्हि। सोचिते-सोचिते खाटपर टघरि गेलीह कनियाँ काकी, भोर होइत-होइत बारीक पानि बान्हपरसँ अँगना दिस आबि गेल। तीनू भैयारी अपन-अपन हिस्साक आंगन भरा लेने छलाह से सभटा पानि सहटि कऽ कनियाँ काकीक धसल आँगनसँ खोपड़ी दिस बढ़ि गेल। घरमे चारि आँगुर पानि भरि गेल। भोरमे किछु अबाज भेल आऽ जे उठैत छथि तँ खाटक नीचाँ पानि भरल छल, एक-कोठी दोसर कोठीपर अपन अन्न-पानिक संग टूटि कऽ खसल छल। आब की हो बड़की दियादनीक बेटा सभसँ पहिने आबि कऽ खोज पुछाड़ि केलकन्हि, अबाज दूर धरि गेल छलए। सभटा अन्न-पानि नाश भऽ गेलन्हि। अन्न पानि छलैन्हे कोन- दू-टा छोट-छोट कोठी, ओकरे खखरी-माटि मिलाऽ कऽ दढ़ करैत रहैत छलीह। मुदा भोर धरि ओऽ हहा कऽ खसल आऽ मसोमातक जे बरख भरिक बाँचल मासक खोरिस छल तकरा राइ-छित्ती कऽ देलक। कनियाँ काकी सूप लऽ कऽ अन्नकेँ समटए लेल बढ़लीह मुदा कमलाक बाढ़िक पानिक संग पाँकक एक तह आबि गेल छलन्हि हुनका घरमे।
सौँसे टोल हल्ला भऽ गेल जे देखिऔ केहन भैंसुर दिअर सभ छै, अपना-अपनीकेँ अपन-अपन अँगना भरि लए गेल अछि। मसोमातक अँगना तँ अदहासँ बेशी धकिआ लऽ गेल छलैहे, जे बेचारीक बचल अँगना अछि से खधाई बनि गेल अछि। बड़की दियादिनी सहटि कऽ अएलीह कारण दिआद टोलक लोक सभ आबए लागल रहथि। कनियाँ काकीक सोंगरपर ठाढ़ घरक दुर्दशा देखि सभ काना-फूसी करए लागल रहए। बड़की दिआदिनीक संग कनियाँ काकी बौक भेल पछोड़ धऽ हुनकर घरमे पहुँचि गेलीह। अँगनाक एक कोनसँ दोसर कोन, अपन घरसँ दोसराक घर!
पानि पैसबाक देरी रहैक आऽ आस्ते-आस्ते कनियाँ काकीक घरक एक कातक भीतक देबाल ढहि गेल। टोलबैया सभ हल्ला करए लागल जे कनियाँ काकी भितरे तँ नञि रहि गेलथि। बड़की दिआदिनी खसल घर देखि हदसि गेलीह, भगवान रक्ष रखलखिन्ह जे सुरता भेल आऽ कनियाँकेँ घर लए अनलियन्हि नहि तँ दियादी डाह नहि बुझल अछि। सभ कलंक लगबितए अखने।
दियाद सभ सभ गप बूझि अपन-अपन घर जाए गेलाह। मन्टुन भातिज कनियाँ काकी लग अएलाह। मार्क्सवादी विचारक रहथि, दरभंगामे पढ़ैत छलाह। विधवा-विवाह, जाति-प्रथा सभ बिन्दुपर पितासँ आऽ पढ़ुआ काकासँ भिन्न विचार रखैत छलाह। घरक नाम मन्टुन छलन्हि मुदा स्कूल कॉलेजक नाम मृत्युंजय छलन्हि। मुदा घरमे कोनो मोजर नहि छलन्हि, कहल जान्हि जे पहिने पढ़ि-लिखि कऽ किछु करू। काकीसँ कतेक गमछा-झोड़ा भेटैत छलन्हि, चरखाक सूतक कमाइक, जय गाँधी बाबा, विधवा लोकनि लेल ई काज धरि कऽ गेलाह। गाममे भोजमे खढ़िहानक पाँति आऽ बान्हपरक पाँति देखि विचलित होइत छलाह। जोन-बोनिहारकेँ बान्हपर बैसा कऽ खुआबैत देखैत छलाह आऽ बाबू-भैयाकेँ खढ़िहानमे। खढ़िहानमे बारिक लोकनि द्वारा खाजा-लड्डू कैक बेर आनल जाइत छल । बान्हपरक पाँतीमे
५.पद्य
५.१.श्यामल सुमनक-आत्म-दर्शन
५.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (चारिम खेप) ज्योतिक- असल राज
५.३.महाकाव्य- बुद्ध चरित
५.४.डॉ पंकज पराशरक कविता
५.५.विनीत उत्पलक ३ गोट कविता
५.६. महेश मिश्र "विभूतिक" कविता"
श्यामल किशोर झा, लेखकीय नाम श्यामल सुमन, जन्म १०।०१।१९६० चैनपुर जिला सहरसा बिहार, स्नातक । शिक्षा:अर्थशास्त्र राजनीति शास्त्र एवं अंग्रेजी, विद्युत अभियंत्रणमे डिपलोमा, प्रशासनिक पदाधिकारी,टाटा स्टील, जमशेदपुर,स्थानीय समाचार पत्र सहित देशक अनेक पत्रिकामे समसामयिक आलेख, कविता, गीत, गजल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित, स्थानीय टी वी चैनल एवं रेडियो स्टेशनमे गीत गजल प्रसारण, कैकटा कवि सम्मेलनमे सहभागिता ओ मंच संचालन।
आत्म-दर्शन
ठोकलहुँ अपन पीठ अपने सँ, बुझलहुँ हम होशियार!
लेकिन सच कि एखनहुँ हम छी, बेबस आउर लाचार!
यौ मैथिल जागू करू विचार ! यौ मैथिल सुनि लिय हमर पुकार!!

गाम, जिला के मोह नहि छूटल, नहि बनि सकलहुँ हम मैथिल!
मंडन के खंडन केलहुँ आउर, बिसरि गेल छी कवि कोकिल!
कानि रहल छथि नित्य अयाची, छूटल सब व्यवहार!
बेटीक बापक रस निकालू, छथि सुन्दर कुसियार!!
यौ मैथिल जागू करू विचार ! यौ मैथिल सुनि लिय हमर पुकार!!
मिथिलावासी बड़ तेजस्वी, इहो बात अछि जग जाहिर!
टाँग घीचै मे अपन लोक के, एखनहुँ हम छी बड़ माहिर!
छटपट मन करय किछु बाजी, सुनवा लय क्यो नहि तैयार!
मुखिया नहि मानथि समाज के, एक सँ एक बुधियार!!
यौ मैथिल जागू करू विचार ! यौ मैथिल सुनि लिय हमर पुकार!!
''संघे शक्ति कलियुगे'' के, कतेक बेर सुनलहुँ हम बात!
ढंगक संघ बनल नहि एखनो, हम छी बिल्कुल काते कात!
सुमन हाथलय बिहुँसल मुँह सँ, स्वागत वो सत्कार!
हृदय के भीतर राति अन्हरिया, चेहरा पर भिनसार!!
यौ मैथिल जागू करू विचार ! यौ मैथिल सुनि लिय हमर पुकार!!
१. श्री गंगेश गुंजन २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी
१. श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि। श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे गुञ्जनजीक "राधा"क पहिल खेप।-सम्पादक।
गुंजनजीक राधा
विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल।
अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक ।
आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल-
जगमगाएल अछि। सुस्वागतम!
लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी।



केने छथि बेश सनाथ सबकें,
स्नेही-संबंधी
सौंसे समाज कें ई जे छथि
बनल लोकक गीलमल हार,
यमुना कुंजक मायावी मुरलीक कलाकार
बेफिकिर निश्चिन्त बनल अकान अनठा बैसल
कतहु अपस्यांत अनमस्क चिबबैत अपन ठोढ़
गुलाबक कोंढ़ीक दुपत्ती सन मृदुल लाल टुहटुह
अपने मे ध्यानस्थ
सौंसे संसार कें अनुपस्थि क'
दूरस्थ धरतीक कोर परक
टुग्गर सन गाम बिसरि
बैसल मथुरा सं चलबै छथि सरकार,
धन्य छी अहूं कृष्ण, छी धरि अपरम्पार,
बिहुंसि रहल छी,
बड़ उतकीरना करैत छी
हमर एहन मनकथाक करैत छी ठठ्ठा,
बड़ दिव,
धन्य छी बाबू, धन्य छी
मुदा एहू गरीबिनीक दिन फिरतै कहियो,
तखने पूछब हमहूं अहांक मनक हालचाल,
एक युग सं बौक अहांक बंसुरीक बोलक
नित्य निर्मल कालिन्दीक छल-छल बहैत
अहंक हृदय-धार सुखा जयवाक समाचार,
एखन मुदा लाचारी अछि, तैयो
एतवा धरि कहि रहले हमर एहि प्राण मे बैसल
सौंसे ब्रज
बड़ उदास बड़ उदास,
मुरलीधर! अहां कोना छी ?कतय ?
एक युग सं
कियेक चुप अछि एना बंसुरी ?

ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
असल राज
लन्दन शहरमे भोरक भीड़सऽ
भागैत दिनचर्याके आढ़िसऽ
ठाढ़ भेलहुं कात भऽ॥१॥
लागल सबके प्रेत रेवारने छल
आकि कोनो लॉटरी फुजल
सबके तेना पड़ाहि लागल छल॥२॥
समय सॅ छलै सब पैबन्ध
विदा काज दिस एक बैगक संग
ओवरकोटमे बन्द॥३॥
मिथ्या अभिमान भेल विलीन
सब काजक सुरमे तल्लीन
स्वावलम्बी आऽ आत्माधीन ॥४॥
कानूनन ठीक अछि जे कोनो काज
तकरा करैमे जे नहि केलक लाज
सैह कऽ रहल अछि असल राज॥ ५॥

बुद्ध चरित-गजेन्द्र ठाकुर


माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक,
ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक,
भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ,
मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आस्वस्त दुनू गोटे पाबि कए।
महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म,
चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त,
वायु मार्गे अएलाह राज्य वन कपिलवस्तुक,
बैसाएल सिंहासन शुद्धोधन तुरत,
राजन् आएल छी देखए बुद्धत्व प्राप्त करत जे बालक।
बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पैरमे छल जकर,
देखि असित कहल हाऽ मृत्यु समीप अछि हमर,
बालकक शिक्षा प्राप्त करितहुँ मुदा वृद्ध हम अथबल,
उपदेश सुनए लेल शाक्य मुनिक जीवित कहाँ रहब।
वायुमार्गे घुरलाह असित कए दर्शन शाक्य मुनिक,
भागिनकेँ बुझाओल पैघ भए बौद्धक अनुसरण करथि।
दस दिन धरि कएलन्हि जात-संस्कार,
फेर ढ़ेर रास होम जाप,
करि गायक दान सिघ स्वर्णसँ छारि,
घुरि नगर प्रवेश कएल माया,

हाथी-दाँतक महफा चढ़ि।
धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य,
अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग,
सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ।
मुदा माया नहि सहि सकलीह प्रसन्नता,
मृत्यु आएल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा।
उपनयन संस्कार भेल बालकक शिक्षामे छल चतुर,
अंतःपुरमे कए ढेर रास व्यवस्था विलासक,
शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात बालक योगी बनबाक।
सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह,
समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म।

(अगिला अंकमे)

डॉ पंकज पराशर
श्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.।
पृथकावली

दिल्लीक शरणागत अहल भोरेसँ साँझ धरि
डेग-डेगपर अर्पित करैत छी अपन आत्म आओर अपन सम्मान
आ जिनगीमे अर्जित कयल सबटा ज्ञान

चारि कौर अन्न आ पाँच हाथ बस्तर लेल रने-बने बौआइत
बाकी चारू भाइ आ बहीन हमर देशक कोन-कोनमे
अभ्यर्थित आँखिसँ बेस उताहुल
बेर-बेर भरोस दियबैत अछि नियोक्ताकेँ अपन बुत्ता भरि

जे कहियो नहि धयलक हरक लागन जिनगीमे
से मोंछगर हमर भाइ सब आइ खूब हरखित मोनेँ
रोपैत छथि धान आ बेचैत छथि पान
देशक कोन-कोनमे बिहरल अहराक खोजमे

दूरभाषिक वार्तालापमे सबटा खेरहा सुनबैत
बिहरैत परिवारक गाथाक बीच बढ़ैत सदस्य सबहक
बिलहैत अछि सूचना मुक्त मोनेँ,
संचारी भाव केर स्थायी अर्थाभावक बिना कोनो चिन्ता कयनेँ-
गामक खिस्सा सबहक बीच-बीचमे

कइक सालसँ कलकत्तामे निपत्ता बड़का काकाकेँ ताकबाक
सबटा व्यर्थ भेल प्रयास केर खिस्सा हमरा सुनल अछि
काकीक एकादशी-हरिबासन आ गंगामे एकटंगा देबाक आख्यान सेहो

सबहक पता-ठेकान जनितो हमरा लोकनि आब
जोखैत रहैत छी भेंट-घाँटक आकुलताकेँ
मासूलक पाइसँ

नहि जानि आपात चिकित्सा कक्षमे हमरा
किएक मोन पड़ैत अछि रहैत अछि
बाबीक गाओल सोहर आ साँझक गीत
जखन कि बाबीकेँ मुइना आइ तीस-पैंतीस बरखसँ बेशी भऽ गेलनि
एक भाइ दिल्ली आ एक कलकत्ता
एक बहीन पंजाब आ दोसर राजस्थानक रेगिस्तानमे अभिशापित
नैहरमे सुनल फकड़ा दोहरबैत रहैत अछि मोने-मोन...
जाहि बाटे गेली बेटी दूबिया जनमि गेलइ...

पृथ्वीक कोने-कोन बौआइत हम देखैत छी
गरीबक अहरापर गहन पहरा दैत महाशक्तिकेँ करे-कमान

कतेक गाम नापब एखनो बाकी छनि वामनावतार प्रभुकेँ?

जरीब-कड़ीकेँ उघबाक लेल जनमल हमरा लोकनि
कोन-कोन नक्शाक लेल पृथ्वीपर घीचैत रहब डाँड़ि
आ लड़ैत रहब ओहि राष्ट्र केर गौरवक लेल
जकर झटहा कइक पुस्तसँ हमरा लोकनिकेँ खेहारि रहल अछि
जंगलसँ गाम आ गामसँ शहरक नहर-छहरपर बसल
जलहीन मलिन बस्तीक मल-जलक असह्य दुर्गंधक बीच

बाबाक अपार्थिव इच्छा हुनक पार्थिव शरीरक संगे चलि गेलनि
क्यो काका ईर घाट तँ क्यो काका बीर घाटमे बसल
दसकठबा डीहकेँ पियाजुक क्यारीमे बाँटिकेँ संतुष्ट आब
कोनो काज-परोजनक अवसरपर
गामक स्मृति-संपदाकेँ दूरभाषिक आ ई-मेली चँगेरामे बिलहैत छथिन

नहि जानि कहिया धरि अपने देशक अमेरिका आ इजराइलमे
कहुखन अफ्रीकी तँ कहुखन फिलिस्तीनी बनल
मतृभूमिसँ तिरस्कृत संज्ञाकेँ घृणा आओर घृणाकेँ जीवनक प्रसाद बुझि
बौआइत रहब अनौन-बिसौन भेल
जिनगीक फागुनेमे
साओन-भादब भेल...
थाल-कादो भेल...!



१.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .।
१. समर्पण

(कथक नृत्यांगना पुनीता शर्माक लेल)

जीवनक जीवंतता कि
मनुष्यक मनुष्यता कि
जेहन मोन, जेहन भाव
तहिने होइत समर्पण भाव

नर्तकी जखन राग मालकौस मे
स्टेज पर रोशनीक चकाचौंध मे
अपन संपूर्ण प्रतिभाक प्रदर्शन करैत छथि
देखू तखैन कि हैत छथि राग, कि हैत छथि भाव

लागत जना हुनकर देह मे
नर्तकीक आत्मा नहि
देवता बैस गेल
जे जेना नचाबि रहल छैल
तहिना नर्तकी नाचैत छथि

कि ततकार कि ठाठ
कि करि ओइ चक्करक वर्णन
शब्दो तं ओतेक नहि अछि
त कोना करि
समर्पण भावक वर्णन

अहां जकर बेटी होइब
अहां जकर बहिन होइब
मुदा, अहां जकरा सं
प्रेम करैत होइब
ई सब कतेक खुशनसीब होइत

जे नर्तकी
अपन संपूर्ण अस्तित्व
नृत्य मे झोंइक दैत छथि
हुनकर प्रेम वा पुरुष
वा समर्पन जरूर संपूर्ण होइत.
२. इतिहासक लिखल

कोनो इतिहासक पोथीक
पन्ना पलटि क देखि
शासक वा राजाक
इतिहास लिखल गेल छैक

एतेक त
रामायाण आ महाभारतो मे
शूरवीर आ विजेताक
गुणगान भरल छैक

भारतक स्वतंत्रताक पहिल
वा ओकर बादक इतिहास
एकरा सं
अछूत नहि छैक

माउंटबेटन सं ल कs
गांधी आ नेहरू
चंद्रशेखर आ अम्बेडकर तक
गुणगान सं भरल छैक

गांधीजी कहैत रहथि
देशक अन्तिम मनुखक
गप करू
ओकर नीक, तखन होइत देशक उत्थान

हम पूछैत छी
इतिहास तं कहियो
देशक अन्तिम मनुखक गप नहि लिखलक
तं, हम कोना करि.
३. आतंक

आतंक सं नहि
होइत आतंकवाद ख़त्म
ताहि लेल नहि
गोली वा बारूदक जरूरत

दू-चार गोटाक
पकडहि कs
गोली मारवाह सं
नहि सून-सपाट
आतंकवाद होइत

मार्क्स कs जेना रहै
मार्क्सवादक जरूरत
समाज कs रहै
समाजवादक जरूरत
आतंक कs नहि कोनो वादक जरूरत

खत्म करिय परत
आतंकक गाछ कs
ठारि कटला सं
नहि चलत काज
संपूर्ण तंत्रक करै परत ब्रेनवास

सं सुनू,
समाज मे प्रेम आ भाईचारा
भूख-प्यासक निदान
शिक्षा ओ सदभावक
अलख जगबै परत

तहि सं
सुनर परिवार
सुनर समाज
सुनर देश आ
सुनर दुनिया होइत.

महेश मिश्र “विभूति”
महेश मिश्र “विभूति” (१९४३- ),पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक।
पन्थीसँ
तनिक विलमिके सुनिली पन्थी,
अविलम पहुँचब गेहे।
तरुणाईमे कथिक अपेक्षा,
जतबा कहब, बुझब सब नेहे॥

अहाँ पन्थी! पथिक बनिके,
जा रहल छी बाटमे।
दृश्य अगणित देखब पन्थी,
भ्रमब नहि जग-हाटमे॥

आओत बाढ़ि जे स्नेह-सलिलके,
शपथ, सबल पग राखब।
दुर्बलता जँ व्यापत किञ्चित,
कहू! कोना जल थाहब॥

बिनु जल भवसागर की नदिया,
दहब-भसब नहिं बाबू।
दृढ़-सङ्कल्प पतवार पकड़िके,
राखब मन पर काबू॥

होयत हँसारति भरि जगमे,
जँ, बुड़ि जाओत नौका।
अस्तु, सोचब गृद्ध दृष्टि लऽ,
नहिं आओत फेर मौका॥

पुनः कतबा कहब बाबू?
शुभकामना अछि संगमे।
सफल होऊ , सुफल पाऊ,
शुभ रंग आनू रङ्गमे॥

अहाँ पायब सुयश जगमे,
पुलकि पुलकत गात मम्।
पूर्ण पूनम सम जँ देखब,
परम आनन्दित होयब हम॥

अछि निवेदन ईशसँ,
सद्बुद्धि दैथि सुजान के।
बड़ आश अछि पंथी अहाँसँ,
करंहु मुकलित प्राणके॥

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...