Saturday, October 11, 2008

कान्तिपुर, नेपालक तुलजाभवानी मंदिरक शिलालेख पर अंकित प्रतापमल्लक मैथिली गीत





कवीन्द्र प्रतापमल्ल(१६४१-७४)- नरसिंहमल्लक पश्चात् कान्तिपुरक राजसिंहासनपर बैसलाह। हिनकर भक्तपुर, पाटन आऽ मधेसपर धाक छलन्हि। हिनकर वैवाहिक सम्बन्ध कूचबिहारक राजा वीरनाराय़णक पुत्री रूपमती, कर्णाट-कन्या राजमती, महोत्तरी राज्याधिप कीर्तिनारायणक पुत्री लालमीत ओ अनन्तप्रिया, प्रभावतीक सग छलन्हि। संस्कृत, नेवारी, मैथिली आऽ नेपालीक संग आन भाषा सभक विद्वान् छलाह आऽ तिरहुता समेत पन्द्रह तरहक लिपिक सूचना हुनकर शिलालेखमे प्राप्त होइत अछि।

हेरह हरषि दूष हरह भवानि।
तुअ पद सरण कएल मने जानि।।

मोय अतुइ दीन हीन मति देषि।
कर करुणा देवि सकल उपेषि॥

कुतनय करय सहस अपराध।
तैअओ जननि कर वेदन बाध॥

परतापमल्ल कहए कर जोरि।
आपद दूर कर करनाट किशोरि॥

जनकपुरक सनेस ३ कवि हिमांशु चौधरी/ रेवतीरमण लाल/ वृषेश चन्द्र लाल/ निमिष झा/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि/ रूपा धीरू कविता-प्रस्तुति जितेन्द्र झा जनकपुर


हिमांशु चौधरी


विष-वृक्ष

धरतीमे आबि
आकाश दिश ताकऽ बला
स्थितिसँ
काँपि रहल छी
हसोन्मुख प्राप्तिकँ लऽ कऽ
दुःखक अन्तिम परीक्षा भऽ रहल अछि
देवता रहितौ
देवता मरि गेलाक कारणें
आस्था
मन्दिरमे सूतल अछि
सुषुप्त आस्थाकेँ
जगओनाइ कठिन भऽ रहल अछि
दिनानुदिन आ उपचारहीन
युगक अवैध घाओक
पीजमे पिछड़ि कऽ
हरेक अंगकेँ
क्यान्सर कहि
नियतिमे दिन बिताबऽ पड़ि रहल अछि
घाओक टनकनाइसँ बेसी
घाओक परिकल्पनासँ
अवरुद्ध अछि- कण्ठ आ छाती
आड़ि-आड़िमे
शरीरक अंग भेटऽ लागल अछि
हर जोतबाक
सहास नहि भऽ रहल अछि
मानचित्रसँ
हिमालक छाह भागल जा रहल अछि
पहाड़ आ मधेशमे
अन्हार बढ़ल जा रहल अछि
पीयर गजुरक नीचाँ
हवाक वेगसँ
बुर्जाक घण्टीमे
सेहो घृणा चिचिया रहल अछि
उड़ैत परबाक पाँखिमे
सेहो बारुद बान्हल अछि
फरिच्छेमे
मृत्युदण्डक क्रम बढ़ैत गेलासँ
मृत्युक खातामे
मूल्यवान छाती
छाउर भेल जा रहल अछि
भोर आ राति
गर्भाधान कएनाइ
छोड़ने जा रहल अछि
छीः छीः
एहनेमे विष वृक्ष रोपनाइ नहि
बन्द भऽ रहले अछि।

डा. रेवतीरमण लाल

मधुश्रावनी

मधुश्रावनी आएल
मन-मन हर्षए
चहुँदिस साओन
सुन्दर घन वर्षए
काँख फुलडालि
मुस्कथि कामिनी
मलय पवन
सुगन्धित शीतल
दमकए दामिनी
नभ मंडलमे घनघोर
मानू जल नहि वर्षए
ई विरही यक्षक नोर
झिंगुर बेंङ्ग गुञ्जए
जल थल अछि चहुँओर।


वृषेश चन्द्र लाल


नजरि अहाँक चितकेर जूड़ा दैत अछि।
घुराकए एक क्षण जिनगी देखा दैत अछि।
धँसल डीहपर लोकाकए फेर स्वप्न महल
पाङल ठाढ़िमे कनोजरि छोड़ा दैत अछि॥

बजाकए बेर-बेर सोझे घुराओल छी हम
हँसाकए सदिखन हँसीमे उड़ाओल छी हम
बैसाकए पाँतिमे पजियाकए लगमे अपन
लतारि ईखसँ उठाकए खेहारल छी हम
सङ्केत एखनो एक प्रेमक बजा लैत अछि
जरए लेले राही जड़िसँ खरा दैत अछि
उठाकए उपर नीच्चा खसाओल छी हम
जड़ाकए ज्योति अनेरे मिझाओल छी हम
लगाकए आगि सिनेहक हमर रग-रगमे
बिना कसूर निसोहर बनाओल छी हम
झोंक एक आशकेर फेरो नचा दैत अछि
उमंगक रंगसँ पलकेँ सजा दैत अछि


निमिष झा

हाइकू

चाँदनी राति
नीमक गाछ तर
जरैछ आगि।

गरम साँस
छिला गेलैक ठोर
प्रथम स्पर्श।

परिचित छी
जीवनक अन्तसँ
मुदा जीयब।

बहैछ पछबरिया
जरै उम्मिदक दीया
उदास मोन।

पीयाक पत्र
किलकिञ्चत् भेल
उद्दीप्त मोन

श्रम ठाढ़ छै
श्रमिक पड़ल छै
मसिनि युग।

मृत्युक नोत
जीबाक लेल सिखु
देब बधाइ।

धीरेन्द्र प्रेमर्षि

चहकऽ लागल चिड़िया-चुनमुन
पसर खोललकै चरबाहासुन
नव उत्साहक सनेस परसैत
करै कोइलिया सोर
उठह जनकपुर भेलै भोर
दादीक सूनि परातीक तान
तोड़ल निन्न सुरुज भगवान
सूतलसभकेँ जगबऽ लए पुनि
गूँजि उठल महजिदमे अजान
कहैए घण्टी मन्दिरक
मनमे उठबैत हिलोर
उठह जनकपुर भेलै भोर

हम्मर-तोहर इएह धुकधुक्की
फैक्ट्रीक साइरन, ट्रेनक पुक्की
खालि कर्मक जतऽ भरोसा
दुख-सुख जिनगीक चोरानुक्की
घरसँ बहरैहऽ पाछाँ जा
ता मन करह इजोर
उठह जनकपुर भेलै भोर

अन्यायक संग लड़बालए तोँ
प्रगतिक पथपर बढ़बालए तोँ
मिथिलाकेर अम्बरपर बिहुँसैत
चानक मुरती गढ़बालए तोँ
गौरवगाथा सुमिरैत अप्पन
हिम्मत करह सङोर
उठह जनकपुर भेलै भोर


रूपा धीरू


अङ्गेजल काँट


नहि जानि बहिना किएक
आइ तोँ बड़ मोन पड़ि रहल छह
आ ताहूसँ बेसी तोहर ओ
छहोछित्त कऽ देबवला
मर्मभेदी वाण।

बहिना तोँ कहने रहऽ हमरा
ऐँ हइ बहिना!
एहन काँट भरल गुलाबकेँ
अपन आँचरमे एना जे सहेजने छह
तोरा गड़ैत नहि छह?
तोँ उत्तर पएबाक लेल उत्सुक छलह
मुदा हम मौन भऽ गेल रही
आ तोँ मोनेमोन गजिरहल छलह।
हँ बहिना, ठीके
हमरो तोरेजकाँ
अपन जिनगीमे फूलेफूल सहेजबाक
सपना रहए
आ अगरएबाक लालसा रहए तोरेजकाँ
अपन जिनगीपर
मुदा की करबहक...!
मोन पाड़ह ने
छोटमे जखन अपनासभ
ती-ती आ पँचगोटिया खेलाइ
बेसी काल हमहीँ जीतैत रही
मुदा जिनगी जीबाक खेलमे
हम हारि गेल छी बहिना।
काँट काँटे होइ छै बहिना
गड़ै कतहु नहि
मुदा हम काँटेकेँ अङेजि लेने छी
मालिन जँ काँटकेँ
नइ अङेजतै बहिना तँ फेर गुलाब महमहएतै कोना?

जनकपुरक सनेस २ कवि राजेन्द्र विमल/ रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"/ रोशन जनकपुरी कविता- प्रस्तुति जितेन्द्र झा जनकपुर


डा. राजेन्द्र विमल (१९४९- )



नयनमे उगै छै जे सपनाकेर कोँढ़ी
फुलएबासँ पहिने सभ झरि जाइ छै
कलमक सिनूरदान पएबासँ पहिने
गीत काँचे कुमारेमे मरि जाइ छै
चान भादवक अन्हरिये
कटैत अहुरिया
नुका मेघक तुराइमे हिंचुकै छल जे
बिछा चानीक इजोरिया
कोजगरामे आइ
खेलए झिलहरि लहरिपर
ओलरि जाइ छै
हम किछेरेपर विमल ई बूझि गेलियै
नदी उफनाएल उफनाएल
कतबो रहौ
एक दिन बनि बालू पाथरक बिछान
पानि बाढ़िक हहाकऽ हहरि जाइ छै
के जानए कखन ई बदलतै हवा
सिकही पुरिवाकेर नैया डूबा जाइ छै
जे धधरा छल धधकैत धोंवा जाइ छै
सर्द छाउरकेर लुत्ती लहरि जाइ छै
रचि-रचिकऽ रूपक करै छी सिंगार
सेज चम्पा आऽ बेलीसँ सजबैत रहू
मुदा सोचू कने होइ छै एहिना प्रिय
सींथ रंगवासँ पहिने धोखरि जाइ छै

रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" (१९५१- )


गजल
करिछौंह मेघके फाटब, एखन बाँकी अछि
चम्कैत बिजलैँकाके सैंतब, एखन बाँकी अछि
उठैत अछि बुलबुल्ला फूटि जाइछ व्यथा बनि
पानिके अड़ाबे से सागर, एखन बाँकी अछि
बहैत पानिआओ किनार कतौ खोजत ने
अगम अथाह सन्धान, एखन बाँकी अछि
फाटत जे छाती सराबोर हएत दुनियाँ “भ्रमर”
ई झिसी आ बरखा प्रलय, एखन बाँकी अछि।

रोशन जनकपुरी


डर लगैए
नाचि रहल गिरगिटिया कोना, डर लगैए
साँच झूठमे झिझिरकोना, डर लगैए
कफन पहिरने लोक घुमए एम्हर ओमहर
शहर बनल मरघटके बिछौना, डर लगैए
हमरे बलपर पहुँचल अछि जे संसदमे
हमरे पढ़ाबे डोढ़ा-पौना, डर लगैए
आङनमे अछि गुम्हरि रहल कागजके बाघ
घर घरमे अछि रोहटि-कन्ना, डर लगैए
आँखि खोलि पढ़िसकी तऽ पढ़ियौ आजुक पोथी
घेँटकट्टीसँ भरल अछि पन्ना, डर लगैए
चलू मिलाबी डेग बढ़ैत आगूक डेगसँ
आब ने करियौ एहन बहन्ना, डर लगैए

दियाबातीक अवसरपर डा. राजेन्द्र विमल आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक पद्य- प्रस्तुति जितेन्द्र झा जनकपुर


डा. राजेन्द्र विमल (1949- )त्रिभुवन विश्वविद्यालयक जनकपुर कैम्पसमे नेपाली भाषा विभागक अध्यक्ष छथि।

दीयाबाती पर एक टा गजल- राजेन्द्र विमल


जगमग ई सृष्टि करए तखने दिवाली छी
प्रेम चेतना जागि पड़ए तखने दिवाली छी

जीर्ण आ पुरातनकेँ हुक्का-लोली बनाउ
पलपल नव दीप जरए तखने दिवाली छी

स्नेहकेर धार बहत बनत जग ज्योतिर्मय
हर्षक फुलझड़ी झरए तखने दिवाली छी

अनधन लछमी आबए दरिदरा बहार हो
रङ्गोली रङ्ग भरए तखने दिवाली छी

रामशक्ति आगूमे रावण ने टीकि सकत
रावण जखने डरए तखने दिवाली छी


धीरेन्द्र प्रेमर्षि (1967- ) हेलो मिथिला, काठमाण्डूक सुपरिचित मैथिली उद्घोषक छथि आ लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार छथि।

शुभकामना दिआबातीक- धीरेन्द्र प्रेमर्षि

चमकैत दीपकेँ देखिकऽ
जेना झुण्ड कीड़ा-मकोड़ा
कऽ दैछ न्यौछावर अपन अस्तित्व
दुर्गुण वा खलतत्त्वरूपी कीड़ा-मकोड़ाकेँ
नष्ट करबाक लेल चाही ने आओर किछु
अपना भीतरक मानवीय इजोतक टेमी
कने आओर उसका ली
अपनाकेँ सभक मन-मनमे मुसका ली
इएह अछि शुभकामना दिआबातीक-
देहरि दीप जरए ने जरए
मनधरि सदति रहए झिलमिल
किएक तँ अपना मात्र इजोतमे रहने
मेटा नहि सकैछ संसारसँ अन्हार

जनकपुरक सनेस १ कवि दिगम्बर झा दिनमणिक तीन टा कविता- प्रस्तुति जितेन्द्र झा जनकपुर

दिगम्बर झा “दिनमणि”



चल रौ बौआ चलै देखऽले घुसहा सब पकड़ेलैए
घुसुर घुसुर जे घुस लैत छल,
से सब आइ धरैलैए

मालपोत, भन्सार, पुलिस कि, कर अदालत जेतौं
घूसखोरक संजाल पसारल छै बाँच नै पबितौं
अनुसन्धानक कारवाइमे
सवहक होस हेरेंलैए

विना घूसके कहियो ककरो, जे नै कानो काज करै
बैमानी सैतानी करबा, मे नै कनिको लाज करै
क्यो कानूनके चंगुलमे फँसने
परदेस पड़ेलैए



हम सुना रहल छी तीन धार
भारी सहैत अछि भार कहथि सभ खेती सहिते अछि उजाड़।
गिद्दड़ सन सुटकओने नाङरि आगू पाछ जे छल करैत।
जे भोर साँझ, दश लोक माझ, हमरे दिश छल रहि-रहि बढ़ैत।
हम आङुर पकड़ि जकरा पथपर अति शिघ्र चलाऽ देलौं
हमरे प्रगतिक पथकेँ आगाँ, से ठाढ़ भेल बनिकऽ पहाड़॥
हम सुना
ककरा कहबै के सुनत आब, पओ कतौ छैक छै कतौ घाव,
हम भेलौं आब हड्डी समान, कहियो हमहीं रुचिगर कवाव।
हम घास खाअकऽ पालि-पोसि, जकरा कएलौं दुधगरि लगहरि,
तकरा लगमे जँ जाइत छियै, तऽ हमरे मारैए लथार॥ हम सुना,
हम तोड़ि देबै झिक-झोड़ि देबै शाखा फल-फूल मचोड़ि देबै,
स्वार्थक छै जे जड़िआएल बृक्ष तकरा जड़िस हक कोड़ि देबै।
मनमे जे चिनगी सुनगि रहल, से कहियाधरि हम झाँपि सकब,
तें ई मन जहिया लहरि जेतै, तहिया खएतै धोविया पछाड़॥ हम सुना



चलैमन जगदम्बाक द्वारि चलैमन जगदम्बाक द्वारि।
सब दुःख हरती झोड़ी भरती, बिगड़ल देती सम्हारि॥
चलै मन...

मधु कैटभक डरे पड़एला जटिया स्वयं विधाता।
पूजन ध्यान बन्दना कएलनि कष्टहरु हे माता॥
बोधल हरि मारल मधु कैटभ बिधिकेँ कएल गोहारि।
चलै मन..
महिषासुरक त्राससँ धरती थर-थर काँपए लागल
छोड़ि अपन घर द्वारि देवता ऋषि मुनि जंगल भागल।
हुनका सबहक कष्ट हरि लेलनि महिषासुरकेँ मारि। चलै मन..

हुँ कारक उच्चरित शब्दसँ धुम्र गेल सुरधाम।
चण्ड-मुण्ड आ रक्तवीजकेँ मिटा देलनि माँ नाम।
शुम्भ-निशुम्भ मारि धरतीसँ दैत्य कएल निकटारि॥ चलै मन...

शशि कुज बुध गुरु शुक्र शनिश्रवर की दिनमणिक तारा।
सर, नर मुनि, गन्धर्व अप्सरा सबहक अहीँ सहारा।
हमरो नैया पार करु माँ, भबसँ दिय उबारि। चलै मन...

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...