Wednesday, August 13, 2008

छोटका भैया (रक्षाबंधनपर विशेष)

घरक छोट-मोट बातपर छिड़ल बहससँ हमर मूड ख़राब भऽ गेल छल ! ताहि उपरान्त छोटका भैयाक फ़ोन आयल ! हमर उदासीसँ हुनका अंदाज भेलनि, की किछु बात अछि ! ओऽ हमरासँ पुछलथि, हुनकर स्नेहभरल शब्द सुनि कऽ हमरा कननाञि आबि गेल। हम कानए लगलहुँ हुनका किछु नञि कहि सकलहुँ ! ओहो फ़ोन राखि देलथि, करीब एक घंटाक बाद फेरसँ फ़ोन केलन्हि। तावत तक हमहूँ चुप भऽ गेल छलहुँ ! ओऽ दोबारा पुछलथि-
"अपनेकेँ घरक लोक किछु कहलथि की ?"
हम हुनकर बातकेँ बीचेमे काटैत हुनका कहलहुँ-
"कुनू खास बात नञि छल भईया, घरमे ई छोट-मोट बात होइते रहैत अछि !"
एहिपर ओऽ भीजल आवाज़मे कहलथि-
"यदि छोट-मोट बात अछि, तँ हमरा उम्मीद छल जे अपने समझदार छी, सम्हारि लेब, मुदा अगर हमर जरुरत पड़ए तँ बिना चिन्ताक कहब जे हम आबि जाञि ? ई नञि जे अहाँ असगर छी। हम सर्वदा अपनेक संग छलहुँ।"
ई गप सुनैत हमर आँखि डबडबा उठल ! लागल जेना भाइक सांत्वना भरल स्पर्श हमर पीठ थपथपा रहल अछि! ओही भाइक, जिनकर स्थानपर हम सर्वदा बहिनक कामना करैत छलहुँ !

हम चारि भाइ-बहिनमे सभसँ छोट रही। माँ बतबैत छलीह, जखन हमर जन्म भेल छल तीनो भईया हमरा (बहिन) पाबिकेँ बहुत खुश भेलथि ! सत्य पुछू तँ हम तीनो भईयाक आँखिक तरेगण रही! मुदा समयक संग-संग बड़का वा मंझिला भइयासँ दूर छोटका भईयाक हम बहुत करीब आबि गेलहुँ !किएक ई तँ पता नञि, मुदा अपन बचपनक जतेक गप हमरा मोन अछि,ओहिमे बेसी छोटके भईया शामिल छथि ! कुमर काकाक कलममे ठीक्-ठीक दुफरियाकेँ छोटका भईया जखन खजूर,जोम बिछबाक लेल जाइत रहथि, तँ हमरो अपन कान्हपर बैसाऽ कए लऽ जाइत रहथि !कन्हापर बैसेबाक कारण ई रहनि, की हमर पएर नञि पाकए! ओहि समय हमरा ओतेक ज्ञान कतए, की सोचि सकितहुँ आखिर भइयोक पएर पाकैत होएतन्हि!ई सभ बचपनक बात भेल, आगाँ चलि कए कनेक पैघ भेलहुँ, तँ भईया फाटल मोजामे रद्दी-चिन्द्दी भरि कए, गेंद बना कए हमरा संग खेलाइत छलाह ! हुनकर अथाह प्रेम भेटलाक बादो हम सोची, भगवान् हुनकर स्थानपर यदि हमर बहिन होएतथि तँ हम हुनका संग कपड़ाक गुरियासँ खेलाइतहुँ। तीनो भईया हमरासँ बहुत प्रेम करैत छलथि, बेशी कऽ कए छोटका भईया हमरा सदिखन अपने संग राखैत रहथि! माँ-बाबूजी दुनु नोकरी करैत छलाह, एक तरहेँ हम हुनके (छोटका भईया) जिम्मेदारी रही। सत्य पुछू तँ घरक सभ काज करब हमरा छोटके भईया सिखेलथि! किशोरावस्था आबैते-आबैत हमरा अपन सहेली वा मौसी/काकीक बेटीक संग निक लागए लागल! ईएह स्थिति युवावस्था तक रहल। हम सदैव एक बहिनक कमी अनुभव करैत रहलहुँ, आर एक छोटका भईया रहथि जे सदिखन एहि बातसँ दूर-अनभिज्ञ हमर साथ दैत रहलाह! हम अपन पसंदसँ प्रेम-विवाह केलहुँ, हम अपन पसंद हुनके लग बतेलिनि। छोटके भईया सभ-परिजनकेँ विवाहक लेल मनेलखिन। विवाहक उपरांत ओऽ हमरा सँ कहैत छलाह-
"कखनो कुनू तरहक तकलीफ हएत तँ ई नञि सोचब की अपने अपन पसंदसँ विवाह केलहुँ तँ हमरा नझि कहि सकैत छी। .... हम सदा अपनेक संग छी।"

आर ओऽ ठीकेमे सर्वदा हमर साथ रहलथि। समय बीतल गेल, बादमे हम सासुर बसए लागलहुँ। सासुरमे देखलहुँ की हमर दुनू ननदि आर हुनकर भईयामे कखनो पटरी नञि खाइत छनि। अनायासहि हमरा अपन भईयाक मोन आबि गेल, हमर आँखि भरि उठल। आई जखन हमर आँखि खुजल तँ एक हम बताहि रही जे सर्वदा भईयाक प्रेमसँ अनभिज्ञ एक बहिनक लेल दुखी रहैत छलहुँ, आइ हम छोटका भईयाक स्नेहक महत्त्वकेँ बुझलहुँ! ओना तँ जीवनक सभ मोड़पर पतिदेव सदा हमर साथ दैत छथि, मुदा जरुरत परलापर छोटका भईया माँ-बाबूजी, भाई-बहिन, सभक जिम्मेदारी सभ-तरहेँ निभबैत छथि! आइ रक्षा बंधनक उपलक्ष्यमे हुनकर चर्चा करैत हमरा बड़ गर्वक अनुभूति भए रहल अछि !

एहि पावन अवसरपर हुनका जेहेन हर भैयाक प्यारी-प्यारी बहिनियाकेँ सलाम .....


'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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