Tuesday, July 22, 2008

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 6.संस्कृतशिक्षा(आगाँ)

6.संस्कृतशिक्षा(आगाँ)


II.
इति भवंतः सर्वे पूर्वतन् पाठेव ज्ञातवंतः।संस्कृतेन प्रथम परिचयः प्राप्तव्यः। अद्य अन्येनक्रमेण अपि परिचयस्य अन्येषाम् अपि अभ्यासं वयं कुर्मः।

अहं गजेन्द्रः। भवान् कः। अहं शिक्षकः। भवती का। अहम् अभिनेत्री। अहं छात्रा। अहं वैद्या।
अहं गृहिणी। अहं कृषकः। अहं शिक्षिकाः। अहं पाचकः। अहं तंत्रज्ञः। अहं तंत्रज्ञा।
एतद् वाक्यद्वयं योजयित्वा वयं परिचयं वदामः। एतैव सुखेन परिचयं वदामः।मम नाम गजेन्द्रः। अहं शिक्षकः। एतेन क्रमेण भवंतः वदंतु। भवान वदतु। मम नाम इंदुशेखरः।अहं तंत्रज्ञः।
मम नाम राजलक्ष्मीः। अहं अभिनेत्री। सः उदयनः। सः छात्रः। सः छात्रः वा। आम्। सः छात्रः।
तत्र कृष्णफलकम वा?
आम्। तत्र कृष्णफलकम्। न। सः वैद्यः न। एतत् फेनकम वा। आम्। तत उपनेत्रम्/कङ्कतम्। प्रशांतः सज्जनः वा।
संस्कृतं सरलं वा।
संस्कृतं मधुरं वा।
आम्। सत्यम्।

इदानीम अहं वदामि। भवंतः अपि अभिनयं कुर्वंतु।

उत्तिष्ठतु। तस्य नाम उदयनः। तस्य नाम किम्। कस्य नाम इंदुशेखरः। तस्याः नाम चन्द्रिका। तस्याः नाम किम्। कस्याः नाम चन्द्रिका।
एतस्य नाम इन्दुशेखरः। तस्य नाम किम्।
साधुः। तस्याः नाम श्रीलक्ष्मीः। कस्याः नाम श्रीलक्ष्मीः। तस्य नाम इंदुशेखरः। एतस्य नाम सुधीरः। तस्याः नाम शांतला। एतस्याः नाम राजलक्ष्मीः।
घटी। सुधीरस्य घटी।
कस्य मुखम्। सुधीरस्य उपनेत्रम्। नाशिका। कर्णः। गीतायाः घटी। गीतायाः घटी। गीतायाः स्यूतः। कस्याः करवस्त्रम। ददातु। कस्याः कुञ्चिका। सीतायाः। लतायाः। सा देवी। देव्याः नाम किम्। देव्याः नाम सरस्वती। कस्याः आभूषणम्। नर्तक्याः आभूषणम्। कस्याः कण्ठाहारः। गृहण्याः क्ण्ठाहारः। पार्वती। पार्वत्याः। पुस्तकस्य नाम श्रीमदभागवदगीता। काव्यस्य नाम अभिज्ञानशाकुंतलम्। अस्माकं देशस्य नाम भारतम्। शिक्षकस्य नाम विश्वासः। गीतायाः। प्रियायाः। राजेश्वरयाः। श्रीलक्ष्म्याः। रामः अस्ति। सर्वे रामस्य वदंति। कृष्णस्य। प्रमोदस्य। बाबूलालस्य। रमानन्दस्य। रामशरणस्य।
राधेश्यामस्य। शिक्षकस्य। लेखकस्य। छात्रस्य।
फलस्य। पुष्पस्य। मन्दिरस्य। नगरस्य। सीतायाः। राधायः। अनितायाः। मालविकायाः। कवितायाः। सुशीलायाः। गङ्गायाः। शारदायाः। भारत्याः। नद्याः। लेखन्याः। राख्याः। अङ्कन्याः। रामस्य। रामः दशरथस्य पुत्रः।
कृष्णः कस्य पुत्रः। कृष्णः वसुदेवस्य पुत्रः। रामः कस्याः पतिः। रामः सीताय़ाः पतिः। लक्ष्मणः उर्मिलायाः पतिः।
कृष्णः रुकमण्याःपतिः।
दिल्ली भारतस्य राजधानी। बेङ्गलुरु कर्णाटकस्य राजधानी। बाल्मीकिः रामायणस्य लेखकः। व्यासः महाभारतस्य लेखकः।
वयम् इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः। अहम् एकं कोष्ठकं दर्शयामि। सर्वे अभ्यासः कुर्मः।
दशरथस्य पुत्रः रामः। शिवस्य पुत्रः गणेशः। रावणस्य पुत्रः मेघनादः। अर्जुनस्य पुत्रः अभिमन्युः। रघुवंशस्य लेखकः कालिदासः। रामायणस्य लेखकः बाल्मीकिः। सीतायाः पतिः रामः। उर्मिलायाः पतिः लक्ष्मणः।
सत्यभामायाः पतिः कृष्णः।
पार्वत्याः पतिः ।
देवक्याः
मन्दोदरयाः दमयनत्याः गान्धी महाभागस्य महोदयस्य रेणु महोदयायाः मेरी महाभागायाः

सुभाषितम्

वयम् इदानीम् अद्यापि एकस्य सुभाषितस्य अभ्यासः कुर्मः। भवंतः इदानीं सुभाषितम् श्रुणवंतु।
अयं निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
इदानीं यत् सुभाषितम् श्रुण्वंतः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। लोके द्विविधाः जनाः भवति। केचन् लघु मनस्काः।ते चिंतयंति, एषः मम जनः। एषः मम जनः न। इति चिंतयंति। अन्ये केचन् संति, महात्मानामः। उदार च्रिताः। ते चिन्तयन्ति-जगत एव मम कुटुम्बः। लघु कुटुम्बः। तेषां दृष्टयासमग्रः प्रपञ्चःएव मम कुटुम्बः। सज्जनाः एवं चिंतनं कुर्वंति। धन्यवाद:।
कथा
अहं इदानीम् एकं लघुकथां वदामि।
काशीः नगरे एकः महान् पण्डितः आसीत्। सः बहुषु शास्त्रेषु पारंगतः आसीत्। तस्य समीपे बहुछात्राः अध्ययनं कुर्वंति स्म। तस्य ख्यातिः सर्वत्र प्रसारिता आसीत्। अतः दूर-दूरतः छात्राः आगच्छंति स्म।
एकदा कश्चन् शिष्यः तस्य समीपम् आगतवान्। सः गुरोः नमस्कारं कृत्वा पृष्ठवान्- भोः। अहं भवतः समीपे अध्ययनं कर्त्तुम इच्छामि। अतः माम शिष्यत्वेन स्वीकरोतु। इति सः उक्तवान्। किंतुः सर्वेषाम छात्राणां बुद्धि परीक्षां कृत्वा एव तान स्वीकरोति स्म। अतः एतस्य अपि बुद्धि परीक्षां कर्त्तुम सः एकं प्रश्नं पृष्ठवान। भोः वत्सः। देवः कुत्र अस्ति। इति पृष्ठवान। तदा शिष्यः उक्तवान। भगवन्। देवः कुत्र नास्ति। सः सर्वोव्यापी अस्ति। इति। प्रस्नरूपेण एव गुरुः पृष्ठवान। एतस्य उत्तरम् श्रुत्वागुरुः अत्यन्तं संतुष्टः जातः। सः हर्षेण तम् आलिङ्गितवान। तम उक्तवान अपि। भोः वत्सः। भवान् बुद्धिमान् बालकः अस्ति। भवंतम् अहं शिष्यत्वेन निश्चयेन स्वीकरोमि। सत्यं देवः सर्वव्यापि अस्ति। इति तम उक्तवान, शिष्यत्वेन अंगीकृतवान। एवं सः शिष्यः तत्रैव विद्याभ्यासं कृतवान,गुरोः आशीर्वादं प्राप्तवान। भवन्तः कथाम् अर्थः ज्ञातवंतः किल।

शीतं स्नानम्


उदेति सूर्यः कुक्कुटः गायति। कृषकः उत्थति पुष्पं विकसति। चटका विचरति,आकाश मध्ये,
शीतकाले जलं शीत भवति, बालः उत्थति स्नानं लब्धे,
स्नानं कृत्वा सा स्फुरति।


(अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 5.पद्य आगाँ

5.पद्य आगाँ


59.ऑफिसमे भरि राति बन्द

साँझ परल सभ उठल,
गेल अप्पन-अप्पन घर।
बाबूजी रहथि फाइलमे ,
करैत अपनाकेँ व्यस्त।
चौकिदार नहि देलक ध्यान,
केलक बन्द ओहि राति।
हमरा सभ चिंतित भेलहुँ,
कएलहुँ चिंतित कछ्मछ धरि प्राति।
भोरमे जखन दरबान खोलि,
देखलक हुनका ऑफिसमे,
माफी माँगि औँघायल,
पहुँचेलक घर जल्दीसँ।
एक बूढ़ी हमर पड़ोसी,
कहलन्हि कोना रहल भेल,
हमरा सभतँ नहि तकितहुँ बाट,
राति भरिमे भय जयतहुँ अपस्याँत।
बेटा सभ लजकोटर, मुँहचूरू,
छन्हि हिनक हे दाइ (हमर माइ)।
हॉलीक्रॉस स्कूल दरभंगामे,
भेल छल घटित एक बात,
गर्मी तातिलमे बच्चाकेँ,
बन्द कएल दरबान।
महिना भरि खोजबीन भेल,
नहि चलल पता कथूक,
स्कूल खूजल देखल बच्चाक,
लहाश सभ हुजूम।
बाप ओकर मुँहचुरू छल,
स्कूलसँ जौँ बच्चा नहि आयल,
सुतले छोटि गएल तखन,
गेल रहय पछ्तायल।
बच्चा देबाल पर लिखने रहय,
अपन कष्टक बखान,
पानि भोजन बिना,
भेलय ओकर प्राणांत।

60. नानीक पत्र
पत्र आयल मोन ठीक नहि,
लक्ष्मी अहाँ देखि जाउ,
एहि बेर नहि बाँचब नहि,
ई गप भुझु बाउ।
पेटक अलसर अछि खयने,
चटकार सँ खाओल जेन मसल्ला।
अंतिम क्षण देखबाक बड्ड अछि मोन,
चिट्ठी लिखबाले अयलाह तेहल्ला।
क्यो नहि पहुँचेलकन्हि लक्ष्मीकेँ,
कहल चिट्ठीमे अछि भारभीस कएल,
एक आर चिट्ठी आएल जे,
माय गेलीह देह छोड़ि।
लक्ष्मीक बेटा बोकारि पारि कानय,
कहलक छी हम सभ असहाय।

नहि अयतीह हमर लक्ष्मी,
मायक मुँह देखय अंतिम बेर,
नाम रटैत अहाँक ई बूढ़ि,
गुजरि गेलि जग छोड़ि।
अपन घरक हाल की कहू,
भगवाने छथि सहाय,
घरघुस्सू सभ घरमे अछि,
दैव कृपा हे दाय।

61. केवाड़ बन्द

बाहरसँ आबयमे भेल लेट,
छोट भाय कएल केवाड़ बन्द,
किछु कालक बाद जखन खुजल,

भैय्या कहल हे अनुज,
दुःखी छी हम पाड़ि ई मोन,
अहिना जखन छलहुँ हम सभ बच्चा,
पिता कएलन्हि घर बन्द।
कनेक देरी होयबाक कारण,
पुछलन्हि नहि ओ’ तुरंत।
तुरंत काका सेहो बुझाओल,
बाल विज्ञानक द्वंद,
जे भेल से बिसरि शुरू,
करू नव जीवन स्वाच्छंद।

62. जेठांश
छोट भायकेँ देल परती,
आ’ राखल सेहो जेठांश,
मरल जखन कनियाँ तखन,
भोजक कएल वृत्तांत।
कहल नमहर भोज करू,
पाइ नहि तकर न बहन्ना।
जकरे कहबय से दय देत,
चीनी चाउर सलहाना।
खेत बेचि कय हम कएलहुँ,
श्राद्ध पिताक ओहि बेर।
अपना बेरमे नहि चलत बहन्ना,
फेर बुझू एक बेर।

63. सादा आकि रंगीन
ब्लैक एण्ड ह्वाइटक गेल जमाना,
सादा कि रंगीन।
दरिभंगा काली मंदिर लगक,
लस्सी बलाक ई मेख-मीन।
जखन बूझि नहि सकलहुँ,
तखन कहल एकगोट मीत,
सादा भेल सादा आ’
भांगक संग भेल रंगीन।

64. गंगा ब्रिज
यादि अबैत अछि मजूर सभक मृत्यु,
चक्करि खाति खसैत नीचाँ पानिमे,
पचास टा मृत्युमे सँ दस टाक भेल रिपोर्ट,
चालीस गोटेक कमपेनसेसन गेल खाय,
नेता ठीकेदार आ’ अफसर।
एहि खुनीमा ब्रिजक हम इंजीनियर,
कहैत छी हमरा ईमानदार,
घूस कोना लेल होइत छैक ककरो,
देखैत गुनैत ई सभ यौ सरकार।

65. दरिद्र
आठ सय बीघा खेत,
कतेक पोखरि चास-बास।
मुदा कालक गति बेचि बिकनि,
झंझारपुरसँ धोती कीनि,
घुरैत काल देखल माँच।
धोती घुरा कय आनल,
आ’ कीनल माँछ,पूछल,
हौ माछ ई काल्हि कतय भेटत,
धोतीतँ जखने पाइ होयत,
जायब कीनि लायब तुरत।
दरिद्रताक कारण हम आब बूझि गेल छी,
एक दिनुका गप नहि ,
सभ दिनुका चरित्र छी।

66.रौह नहि नैन

हँ यौ नैन अछि ई,
मुदा शहरक लोक की बुझय,
सभ ताकैत अछि रौह,
नैन कहबय तँ क्यो नहि कीनय।
छागर खस्सी आ’ बकरीक,
अंतर जौँ जायब फरिछाबय,
बिकायत किछु नहि बिनु टाका,
एहि नगरमे किछु नहि आबय।

67. जूताक आविष्कार
जखन गड़ल एक काँट,
राजा कहलक ओछाउ,
बना माटिक हमर ई,
राजधानी निष्कंटक बनाऊ।

जखन सभटा चर्म आनि कय,
नहि कए सकल ओछाओन,
एक चर्मकार आओल आ’,
राजाकेँ फरिछाय बुझाओल।
पैर बान्हि ली चर्मसँ आकि,
पृथ्वीकेँ झाँपी ओहिसँ,
निष्कंटक धरती नहियोतँ,
मार्ग निष्कंटक होयत।

68. जोंकही पोखरिमे भरि राति
सुनैत छलहुँ जे बड़बड़ियाबाबू साहेबक,
लगान देलामे जौँ होइत छल लेट।
भरि राति ठाढ़ कएल जोंकही पोखरिमे,
बीतल युग अयलाह फेर जखन हाथी पर,
लेबाक हेतु लगान-लहना जहिना,
गारि-गूरि दैत हाथी पर,छूटल,
टोलक-टोल, मुँह दुसना,
जमीनदारी खतम भेलो पर सोचल,
किछु ली असूलि,
मुदा लोक सभ बुधियारी कएल,
नहि अएलाह ओ’ घूरि।

69. गैस सिलिण्डरक चोरि
गेलहुँ रपट लिखाबय,
भेल छल सिलिण्डरक चोरि।
मोंछ बला थानेदार बजलाह,
बूरि बुझैत छी हमरा सभकेँ,
डबल सिलिनडर चाही,
एफ. आइ. आर. सस्ता नहि,
अछि एतेक हे भाइ।
हम कहल डबल सिलेण्डर,
तँ अछिये हमरा,
अच्छा तँ
तेसर सिलेण्डर लेबाक अछि देरी।
तकल कतय चोरकेँ अहाँ,
अहाँक तकनाइ अछि जेना,
चैत अछि कोल्हूक बरद।
भरि दिन घुमैछ नहि बढ़ैछ,
एको डेग,अहँ नहि करू सैह,
प्रगतिक नाम पर एहि बेर।
स्कूटरक चोरिक बेर कहलक,
इंस्योरेंसक पाइ चाही,
कहू अहाँसँ कोर्टमे भ’ पायत,
देल अहाँसँ गबाही।
फेरी पड़ि जायत अहाँकेँ,
पुनः कोर्टमे जायब,
उलटा निर्णयो भ’ जायत,
बूझि फेर से आयब।
संग गेल ड्राइवर कहलक नोकरी,
छैक एकरे ठीक,
पाइयो अछि कमाइत करि,
रंगदारी,फेकैत पानक पीक।

70. फैक्स
फैक्टरी पहुँचि कहल,
करू सर्च वारंट पर साइन,
मालिक कहल रुकू किछु काल धरि,
फोन करय छी आइ।
ट्रांसफरक ऑर्डर आयल,
रिलीविङगक संगहि,
अफसर निकलल ओतयसँ,
वारंट बिना एक्सीक्यूट केनहि।

71.बूढ़ वर
कतय छी आयल आइ,
ताकि रहल छी वर,
20-20 वरखक दूटा,
अछि कतहु अभड़ल।
रंग सिलेबी सिंघ मुठिया,
अद्ंत तकैत छी अहाँ,
से भेटत कहिया।
की चाही एकटा पैघ,
20-2- केर दू गोटक बदला,
40 केर जौँ एकटा,
लय ली तँ छी हम तैयारे,
काज खतम करू सभटा।

72.नौकर
फोन करि कय घरमे पूछल,
छथि फलना घरमे आकि,
आगू पुछितथि ओ’ ब्अजलाह,
दय कय एक धुतकारी।
एहि फोनक हम बिल भरैत छी,
नहि करू अहाँ पुनः बात,
मैसेज अहाँक देब हम पुत्रकेँ,
से छी के अहाँ लाट?
नौकर नहि अहाँक ने छी,
से हम अपन पुत्रक,
कनिया कहि टा छी हम नौकर,
बुझू ई यौ अफसर।


73.क्लासमे अबाज
दुनू दिशक बेंचकेँ उठाकय पुछलन्हि,
आयल कोन कातसँ अबाज।
पकड़ल एक कातकेँ छोड़ल,
फेर कएल दू फारि।
आधक-आध करैत पहुँचलाह,
फेर जखन लग लक्ष्य,
दुइ गोट मध्य जानि नहि सकलाह,
अबाज केलक कोन वत्स।
रैगिंगमे सेहो अहिना कए,
सभकेँ कहल उठि जाऊ,
जखन क्यो नहि उठल कहल,
अहाँ अहाँ अहाँ एकाएकी उठैत जाउ।

(अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 4.कथा 2.भारत रत्न

4.कथा 2.भारत रत्न

3. भारत रत्न
अपन मित्रकेँ हॉस्टलक सीढ़ीसँ नीचाँ उतरैत हुनकर चमचम करैत जुत्ताकेँ देखि ओकर निर्माता कंपनी,ब्राण्ड आऽ मूल्यक संबंधमे जिज्ञासा कएलहुँ। मुदा हमर जिज्ञासा शांत करबाक बदला ओऽ भाव-विह्वल भय गेलाह आऽ एकर क्रयक विस्तृत विवरण कहि सुनओलन्हि।


भेल ई जे दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत अछि, ताहिमे हमर मित्र अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचलाह। सभक मुँहसँ एहि बजारक इमपोर्टेड वस्तु सभक कम दाम पर भेटबाक गप्प सुनैत रहैत छलाह आऽ हीन भावनासँ ग्रस्त होइत छलाह, जे हुनका एहि बजारसँ सस्त आऽ नीक चीज किनबाक लूरि नहि छन्हि। हुनकर ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे हुनकर आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आऽ देखिते-देखिते निपत्ता भय गेल। मित्र महानुभावक मोन ओम्हर गेलन्हि आऽ ओऽ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि आऽ बड्ड मुश्किलसँ ओकरा ताकि लेलन्हि। जिज्ञासा कएल जे ओऽ की नुका रहल अछि।

“ ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि ”। चोर बजारक चोर महाराज बजलाह। “अहाँ कहूतँ ठीक जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि”। झाड़ि-पोछि कय विक्रेता महाराज एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि, मुदा ईहो संगहि कहि गेलाह, जे ओऽ कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे अछि, जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होयत आऽ सही दाम देत।
हमर मित्र बड्ड घिंघियेलथि तँ ओऽ चारिसय टाका दाम कहलकन्हि।
हमर मित्रक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छलन्हि, आऽ दोकानदारक बेर-बेर बुत्ताक बाहर होयबाक बात सत्त भय रहल छल। विक्रेता महाराज ई धरि पता लगा लेलन्हि, जे क्रेता महाराजक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छन्हि आऽ दस टाका तँ ई सरकारी डी.टी.सी. बसक किरायाक हेतु रखबे करताह। से मुँह लटकओने स्टुडेंटक मजबूरीकेँ ध्यानमे रखैत ओऽ तीन सय पचास टाकामे, जे हुनकर मुताबिक मूरे-मूर छल, अपन कलेजासँ हटा कय हमर मित्रक करेज धरि पहुँचा देलन्हि।
आब आगाँ हमर मित्रक बखान सुनू।
“से जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलियैक। कतओ पानि देखीतँ पैरके सरा देल आऽ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ भेल रहय, एक दिन सीढ़ीसँ उतरैत रही, पूरा सोल करेज जेकाँ, बाहर आँखिक सोझाँ आबि गेल। मित्र की कहू? क्यो जे एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ उपर कय रहल छी। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आऽ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ, तँ आब तँ एतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभतँ कतेको महोमहापाध्यायकेँ बुद्धिमे गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी भारत-रत्न बँटैत छी, आऽ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभतँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे।
फेर बजैत रहल्लाह- “ आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम एहि घटनाक मोनतँ अहाँ नहि पारू यौ भजार”।

आब हमरातँ होय जे हँसी की नहि हँसी। फेर दिन बीतल आऽ प्रोग्रामे बनबैत रहि गेलहुँ अगिला रविकेँ चोर बजार आकि मीना बजारक दर्शन करब। मुदा पता लागल जे पुलिस एहि बजारकेँ बन्द कए देलक।

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विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 3.महाकाव्य 1.महाभारत(आगाँ)

3.महाकाव्य 1.महाभारत(आगाँ)

समय बीतल प्रदर्शन-शस्त्रक छल आयल।

भीष्म पूछल द्रोणसँ की-की सिखाओल,
युद्ध-कौशल,व्यूह रचना आ’ शस्त्रकौशल।
प्रदर्शनक व्यवस्था भेल जनक बीचहि,
एकाएकी सभ भेलाह परीक्षित संगहि।
भेल भीम-दुर्योधनक गदा-युद्धक प्रदर्शन।
भीष्म-धृतराष्ट्रक हृदय-बिच वातसल्यक,
जखन छल द्वंदकबीच अर्जुक बेर आयल।
एकानेक बाण-विद्यासँ रंगस्थली गुंजित,
घोष अर्जुनक भेल बीचहि कर्ण आयल।
परशुराम शिष्य कर्ण कएलक विनय,
कए छी सकैत हम प्रदर्शन सभक जे,
विद्या जनैत छथि अर्जुन सकल सभ,
पाबि सह दुर्योधनक ललकारा देलक,
अर्जुन द्वंद हमरासँ लड़ू से प्रथमतः।

कृपाचार्य कहल सारथीपुत्र छी अहाँ,
राजकुमारसँ द्वंदक अधिकारी कहाँ।
द्वंदता नहि अहाँसँ फेर बात द्वंदक,
द्वंद-युद्धक गप आयल ओना-कोना।
ई सुनि दुर्योधन केलक ई घोषणा,
बात ई अछि तँ सभ सुनैत जाऊ,
अंग-देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी,
योद्धाक परीक्षण करैत अछि बाहु,
अंग देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी।
कहि ई अभिषेक कएल सभागारेमे,
अंकमे लेल कर्ण भेल कृतज्ञ ओकर।
उठि अर्जुन तखन ई बात बाजल,
हे कर्ण अहाँ जे क्यो छी, सुनू ई,
हम द्रोण शिष्य अर्जुन ई कहय छी,
बुझू नहि जे ई वीरताक वरदानटा,
नहि भेटल अछि से अहीँक सभटा।
गुरु नहि सिखओलन्हि हारि मानब,
प्रतिद्वंदीसँ द्वंद करब जखन चाहब।

करतल ध्वनिसँ सभागार भेल फेर गुंजित,
भीष्म उठि कएल संध्याक आगमन सूचित।

अर्जुनक गर्वोक्ति सुनि कर्णक हृदय छल,
मोन मसोसि नृप अंगक गामपर पहुँचल।
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शिष्टताक हेतु पाण्डव भेलाह प्रशंशित।
भेल एहिसँ दुर्योधनक मोन शंकित।
शकुनि दुःशासन छल ओकर भक्त,
कर्णसँ भेँट उत्तर ओ’ भेल आश्वस्त,
धृतराष्ट्रकेँ सभक कनफुसकीसँ त्रस्त।
पिता छलहुँ अहाँ सिंहासनक अधिकारी,
जन्म-अंधताक रोकल राजसँ अहाँकेँ ,
हमरा तँ नहि अछि एहन लाचारी।
युधिष्ठिरकेँ सभ मानय लागल,
सिंहासनक अधिकारी किएक,
अहँक सेहंता की भए पाएल,
फलाभूत कोना अहुना ईएह।
युधिष्ठिर ज्येष्ठ हमरासँ अछि,
परंतु अछि अनुज पुत्र सएह।
कएल आग्रह जएबाक मेला,
वारणावतक पाण्डवसँक करू।
ता’ सुधारब व्यवस्था सभ,
कल्याणकारी कार्य सभसँ,
बिसरि जायत पुत्र कुंतीक,
जन सकल हस्तिनापुरक।

धृतराष्ट्र मानल सभटा बात,
आदेश देल वारणावत जाथु,
कुंति देखि मेला-ठेला आउ।
विदुर भेल साकंक्ष भेद ई की,
सचर रहब युधिष्ठिर कहल ई।
विदुरक नीति कएल साकंक्ष,
दुर्योधनक काटल सदि प्रपंच।
मंत्री पुरोचनसँ मिलि दुर्योधन,
लाखक महल बनबओने छल,
विदुर लगेलन्हि एकर पता,
संवाद सेहो पठओने छल।
वाहक संदेशक छल कारीगर,
निर्माण सुरँगक कएने छल।
लाखक महलक भीतर छल,
निर्माण से क्षणहिमे कएल।
पाण्डवकेँ निर्देश भेल छल,
खोह सुरँगहिमे सूतइ जाउ,
आगिक पूर्ण शंका से छल,
लगिते भीतरसँ बाहर आउ।
कृष्ण चतुर्दशीक छल ओ’
दिन, पुरोचन भेल से अतिशय चंचल,
आगि लगायत आइ ओ’ सँ छल,
युधिष्ठिर छल ई सभ बूझि रहल।
कए सचेत अपन माता-भ्राताकेँ,
यज्ञ कएलन्हि ओहि दिन से,
भात-भोज देलन्हि नगरवासीकेँ,
पंचपुत्र छलि भीलनी सेहो एक।
कालक सोझाँ ककर चलल जे,
सूतलि राति ओतहि सभ तेँ।
पुरोचन सेहो सुतल ओतहि,
बाहर दिश छल कोठली एक,
आगि लगाओल भीम तखन,
बीच रातिमे मौका केँ देखि।
लाक्षागृह छल बन से ओतय,
अग्नि देवता अहि केर लेल।
घरक सुड्डाह होइमे लागल,
कोनो क्षण नहि से जतय।
नहि बिलमि माता- भ्राता,
प्रणाम अग्निदेवकेँ कए।
निकलि कुंति कालक गालसँ ,
बचलि दुर्योधनक कुचालिसँ।

पुरोचन अग्नि मध्य से उचिते भेल,
संग परंतु भीलनीक नीक नहि भेल।
जरलि बेचारी पुत्र सहित से सूतल,
ककरो बुझना छल नहि गेल छल।

नगरवासी बुझलन्हि जे जरलि,
कुंती पाँचो पुत्र सभहिक संगे।
नगर शोकसँ भेल शोकाकुल,
खबरि हस्तिनापुर जौँ गेलेँ।
दुर्योधन छल अति प्रसन्ना आ’,
धृतराष्ट्र प्रसन्न छल मोने-मोने।
परंतु विदुर सभसँ बेशी प्रसन्न,
किएकतँ सत्य बूझि छल गेले।

से ओ’ कहल भीष्मकेँ सभटा,
बात रहस्यक जा’कय ओतय,
भीष्मक चिंता दूर कएलन्हि ,
ई सभ गप जाय बुझा कय।
अकाबोन पहुँचैत गेलाह गय,
पाण्डव-जन कष्ट उठा कय।
नाविक नावक संग प्रतिक्षा,
करि छल रहय विकल भय।
कहलन्हि विदुर पठेलन्हि हमरा,
आज्ञा दी गंगतट सेवा करबाक।

गंगा पार भेलथि पाण्डव जन,
पाछू छूटल कतेक भभटपन।
धृत्राष्ट्रक,दुर्योधन आ’ शकुनीक,
आ’ दुःशासन कर्ण सभहीक।
संग मुदा लागल प्रतिशोध,
हस्तिनापुरल छल ई दुर्योग।
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नहि जानि जायत कतय पथ ई,
पथ न जतय छल ओहि वनमे,
डेग दक्षिण दिशा दिश दी,
गंतव्यक छल नहि ज्ञान कोनो।
दैत डेग बढ़ैत आगू,
भूखल-पियासल थाकल ठेहिआयल,
आह दुरदशा देखू ई।
कुंतीक ई दशा देखि,
भीमसँ नहि छल गेल रहल ,
वट-वृक्षक नीचाँ बैसा कय,
चढल देखल सजग भ’।
पक्षी किछु दूर छल ओतय,
भीम जाय पहुँचल जलाशय,
पानि पीब आनि पियाओल,
सुतल सभ कुम्हलाय ओतय।

भीमकेँ नहि गेल देखल,
करथि की हूसि मोन होअय,
पोखरिक गाछक ऊपर छल राक्षस
नाम हिडिंब जेकर।
हिडिंबा बहिनक संग छल,
ताकि रहल अपन भोजन।
मनुक्ख-गंध सूंघि कय,
चलल नर-मांस ताकिमे ओ’,
हिडिंबे जो मौस-मनुक्खक,
आन जल्दी ओतय जाकय।
देखि कुंती-पुत्र संग सूतल,
दुःखित हिडिंबा छल ताकैत,
भीमक हृष्ट-पुष्ट शरीर देखि,
ठाढ नेत्रे रहलि ताकय।
धरि धारण रूप सुन्दरीक,
कहल भीम जाऊ उठाऊ,
अपन माता बन्धुकेँ,
दूर सुरक्षित हिनका पहुँचायब।
मोहित छी हम अहाँ पर,
चाह हमरा अछि विवाहक,
मायासँ हम बचायब,
बलवान क्रूर हिडिम्बक मारिक।
भीम कहल हम किये उठायब,
बंधु केँ सुतल अपन,
बलवान अछि हिडिंब एहन,
बल देखय हमरो तखन।
हिडिम्ब पहुँचल ओतय,
हिडिम्बा छलि सुन्दरीक रूप बनओने,
भीमसँ करि रहलि छलि गप,
क्रोधसँ क्रोधित हिडिम्बकेँ कएने।
ओ’ दौड़ल हिडिम्बा पर मारक हेतु,
भीम पकड़ल बिच्चहिमे,
मल्लयुद्ध पसरल ओतय से,
विकट द्वंदक हुँकार छल गूँजैत।

वन्यप्राणी भागय लागल आ’
उठलि कुंती-पांडव ओतय,
पहुँचैत गेल दौड़ैत ओतय,
रणभूमि साजल छल जतय।
मारि देलक भीम तावत,
भेल हिडिम्ब शवरूप यावत।

भीमक वीरतासँ हिडिम्बा भेलि छलि
ओ’ आनंदित,
वाकचातुर्यसँ कएने छलि
कुंतिकेँ प्रसन्न किंचित्।
युधिष्ठिर सेहो देल स्वीकृति
माता कुंतीक विचार जानि,
विवाह करि कय रहय लागल,
भीम हिडिम्बाकेँ आनि।
घटोत्कच उत्पन्न भेल,
पिता तुल्य पराक्रम जकर छल।
दिन बीतल पाण्डव वन छोड़ि
कय आगाँ जाय लागल ,
जायब हिमालय दिशि पुत्रक
संग ई हिडिम्बा बाजलि।
घटोत्कच कहल पितु माताक
हम सदिकाल संगे रहब,
होयत कोनो कार्य अहाँक,
बजाबयमे नहि संकोच करब।

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जाति काल ब्यास भेटलाह कुंती
कानलि हाक्रोस कय,
ब्यास कहल नहि कानू दिन
छोट पैघ होयबे करय। दुःख
कि सुखमे अपना पर नहि छोड़य
अछि नियंत्रण, धर्मपथ पर जे चलय ,
तकरे कहय छी मनुष्य तखन।
गर्वित सुखे नहि होय,
दुःख्मे धैर्यक न अवलंब छोड़य,
कुंती आ’ अहँक पुत्र छथि,
तेहन जेहन ई मनुष्य होमय।
पाण्डवजन पाबि ई संबल,
पहिरल मृगचर्म वल्कल,
ब्रह्मचारी केर भेष बनाओल,
एकचक्री नगर पहुँचल।
रहल बनि अतिथि ओतय,
आतिथ्य ब्राह्मणक पाओल,
भाइ सभ जाथि आनथि सभ
राखथि माताक समक्ष।
कंती देथि आध-भीमकेँ
आधमे शेष सभ मिलि खाथि,
भीमक तैयो भूख मिटैन्ह नहि
भुखले ओ’ रहि जाथि।
भुखले छलाह भीम एक दिन
गेलाह नहि भिक्षाटनमे,
सुनल घोर कन्नारोहट
घरमे पूछल कारण जानल से।
बकासुर राक्षस ओतय छल
नगर बाहर निवास जकर,
राजा असमर्थ छल
राक्षस करए अत्याचार बड़-बड़।
छल निकालल समाधानजे सभ
परिवारसँ प्रतिदिन एक,
कटही गाडी भरि अन्न मदिरा
मौस जाथि बहलमान।
बक खाइत छल सभटा
संग बहलमानहुकेँ से,
कन्नारोहट मचल छल
घर ब्राह्मण परिवारक मध्ये।
पार छल परिवारक आइ
सभ परिवार दुःखित छल,
कुंती कहल पाँच पुत्र अछि,
भीमक बल सुनायल।
भीमक बलक चर्च सुनि-सुनि
कय ब्राह्मण मानल,
कृतज्ञ भेल भीमकेँ ओ’
गाड़ीक संग खोह पठाओल।
खोह राक्षसक ताकि भीम
खेलक छल ओ’भुखाएल,
तृप्त स्वयं भीम छल देरी सँ
अतृप्त बकासुर आयल।
तामसे आक्रमण कएलक
किंतु लात-मुक्का मारि कय,
भीम प्राण लेलक ओकरा
खींचि नगर द्वार आनि कय।
भेल प्रसन्न सभ जन मनओलक
पूजा- पर्व ओतय,
कुंती चललीह आर किछु दिन
ओहि नगर रहि कय।
सुनल पांचालक स्वयंबरक,
कथा पांचालीक द्रुपदक,
एकचक्रा नगरीसँ ढेरक-ढेर
ब्राह्मण पहुँचैत ओतय।
पाण्डवजन लय रहल
आज्ञा मातृ कुंतीसँ रहथि,
ब्यास पहुँचि कहल जाउ
स्वयंबर ओतय देखय।
मार्गमे ऋषि धौम्य भेटलाह
छलाह पंडित ज्ञानी,
बढ़ल आगू तखन मिलि
संकल्पित भ’ सभप्राणी।
सुनि कथा प्रशंसा यज्ञसँ
निकललि याज्ञसेनीक,
मत्स्यभेद करताह जे
क्यो द्रौपदी वरण करतीह।
स्वयंबरक स्थानक रस्ता
तकलन्हि पांचालमे जा कय,
कुम्भकारक घर डेरा देलन्हि
विचार कुंतीक मानि कय।
कर्ण आयल छल दुःशासन,
दुर्योधनक संग सज्जित,
देश-देशक राजा आयल छल
रंगभूमि वीरसँ खचित।
तखन आयल द्रौपदी भाइ
धृष्टद्युम्नक संग सुसज्जित,
पुष्पमाल लेने आयलि केलनि
सभक नजरि आकृष्ट।
बीच स्वयंबरक भूमिक ऊपर
मत्स्य एकटा लटकल,
ओकर नीचाँ चक्र एकटा तीव्र
गतिये छल घूमि रहल।
नीचाँ पानिक छह देखि जे
चक्रमध्य पातर भुरकी तर,
दागि सकत मत्स्य आँखिकेँ
पुष्पमाल पड़त तकरे गर।
सभटा राजा हारि थाकि कय
भेल विखिन्न थाकल छल,
कर्ण देखि जन बाजि उठल सूत
पुत्र किए आयल छल।
द्रौपदी बाजलि भेदियो देत
जौँ कर्ण मत्स्य-लोचनकेँ,
नहि पहिरायब वरमाला नहि
करब वरण ओकराकेँ।
विवश कर्णकेँ बैसल देखि
ऋषिवेश अर्जुन आयल छल,
एकहि शर-संधानसँ बेधल मत्स्य
सुयश पाओल छल।
ब्राह्मण-मंडली कएने छल
भीषण जय-जयकार ओतय,
राजा सभ कएलक शंका
तैयार अर्जुन पुनि संधान कए।
बिद्ध मत्स्य भू खसल भूमि
बलराम कृष्न आगाँ आओल,
सभ राजाकेँ बुझाय सुझाय छल
सहटाय ओतय हटाओल।
कृष्ण एकांती कहल दाऊ सुनू ई,
सुनल छल एक उरन्ती,
वारणावत आगि बिच बचल पांडव,
बचल छलि कुंती दीदी।
भीम तखने उखाड़ि वृक्ष छल
भेल ठाढ़ सहटि अर्जुन कय,
कृष्ण कहल हे दाऊ कालचक्र
अनलक एतय भीम अर्जुनकेँ।
देखि पराक्रम हतोत्साहित भेल
राजा सभ प्रयाणकएने छल,
पांडव लय चललाह द्रौपदीकेँ
व्यग्र एहिसभसँ ओ’ भेलि छलि।
अर्जुन खोलि अपन रहस्य
खिस्सासँ द्रौपदीकेँ कएल विह्वल,
धृष्टद्युम्न चुपचाप सुनय छल
घुरि पिताकेँ ई कथा कहलक।
कुम्भकारक घर पहुँचि पांडव
कहल देखू की हमसभ आनल,
कुंती कहल आनल अछि जे
सभ तकरा बाँटू पाँचू पाण्डव।
कहल अर्जुन हे माता होयत
नहि व्यर्थ अहाँक ई बात,
संग द्रौपदीक होयत विवाह
पाँचू-पाण्डवक संग- साथ।
द्रुपद पठेलन्हि पुरहितकेँ
धृष्टद्युम्नक संग ओतय,
कुंतीकेँ नोतल आ’
सभकेँ लए गेल अपना संग।
द्रुपद सुनल जे पाँचू-पाण्डव
करताह विवाह द्रौपदीसँ,
तखनहि ब्यास आबि
सुनाओल ई अछि पूर्वजन्महिक।
भेटल चालन्हि वरदान शिवसँ
जे पाँच पति अहाँ पायब,
सुनि सभ द्रौपदी विवाह
द्रुपद रीति वैदिक सँ कराओल।
सभ किछु दिन रहल ओतय
कुशलसँ द्रुपद केर महलमे,
पसरल ई चर्चा सगरो धरि
गेल गप हस्तिनापुर महलमे।
लोकलाजसँ बाह्य प्रसन्नता
धृतराष्ट्र छल ओतय देखओने,
मानि भीष्म-द्रोणक विचार
पठाओल समाद अगुतओने।
आनी अनुज पत्नी पुतोहु ओ’
अनुज पुत्र सभकेँ आदरसँ,
दुर्योधनक कर्णक विरोध पर
कल विचार विदुरकेँ बजाकय,
शास्त्रानुसार विचार देलन्हि
आधा राज्य देबाक ओ’ जाकय।
विदुरहिकेँ पठाओल धृतराष्ट्र
आनय राजमहलम द्रुपदक,
सभकेँ लय आनल पहुँचल ओ’
जन ठाढ़ करए स्वागत।
धृतराष्ट्र कहल हे युधिष्ठिर
गृह कलहसँ ई नीक होयत,
जाय खाण्डवप्रस्थ बसाउ
नव नगर आध राज ल’ कय।
खाण्डवप्रस्थ अछि बोन एखन
पहिने छल राजाक नगरी,
मानि युधिष्ठिर गेल ओतय
बनाय नव घर द्वार सज्जित।
इन्द्रप्रस्थ छल पड़ल नाम,
आ’ तेरह वर्ष धरि केलन्हि राज,
यश छल सुशासनसँ आ’ छल
जन-जीवन अति संपन्न।
(अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 2. उपन्यास1.सहस्रबाढ़नि(आगाँ)

2. उपन्यास
1.सहस्रबाढ़नि(आगाँ)

मजदूरक टोल आ’ साँझमे ठेलागाड़ी पर हुनका लोकनि द्वारा अपन कपड़ा सुखायब, एहि सभकेँ देखि कय हमारा विचलित भय जाइत छलहुँ। ई देखलाक बादो जे हुनका लोकनिक मुँह पर हँसी छन्हि, बिना घरक रलो उत्तर। छोट-छोट बच्चा सभक भीख मँगैत देखब, हमारा सभ जखन खेलाइत रहीतँ ओकरा सभक हमरा सभक दिशि कातर दृष्टियँ देखीअब। लोक सभक दुत्कार, कयो हमरो पर ई विपत्ति आबि जय तखन? फेर दोसर क्यो हुनका लोकनिक दिशि तकबो नहीं करन्हि, तँ की हमही टा आन बच्चासँ भिन्न ची आ’ सोचनी लागल रहैत अछि। हमारा ई सोचैत रही जे जखन हमारा कोनो स्थान पर नहीं रहैत छी तखनो तँ सभ कार्य गतिसँ चलैत अछि। किताबमे हमारा पढ़्ने रही जे किछु जीव जंतु मात्र दू डाइमेंसनमे देखैत छथि। हमरा सभ तीन डाइमेंसनमे जिबैत छे, तँ ई जे भूकंपक आ’ आन आन विपत्ति अबैत अछि से कोनो चारि डाइमेंसनमे कार्य करय बलातँ नहीं कय रहल अछि जे कल्पनातीत अछि। पाँच पाइमे लालछड़ी बलाकेँ देखा कय बाबूजी कहैत रहथि जे देखू ईहो लोकनि अपन परिएआरक गुजर पाँच-पाँच पाइक ई लालछड़ी बेचि कय कए रहल छथि।पाइक महत्त्व आ’ ओकर आवश्यकता जतेक बढ़ाऊ ततेक बढ़त।
अपन, अपन वातावरणक आ’ जीवनक बादक जीवनक,एहि सभक संग जीनाइ , रातिमे बड़बड़ेनाइ ई सभ गोट कार्यक संग पढ़ाइ आ’ पिताक नौकरीक परेशानी सभ चलैत रहल। हमरा यादि अबैत अछि जे एक दिन भोरे-भोर एक गोट ठीकेदारक सूटकेश पर हमर बाबूजी जोरसँ लात मारने छलाह। सूटकेश जाय दूर खसल आ’ ओहिमे राखल रुपैय्या सौँसे छिड़िया गेल। हमर एक गोट पितियौत भाइ छलाह, जे सभटा पाइकेँ उठा सूटकेशमे राखि वापस ठीकेदारकेँ दय वापस कए देलखिन्ह आ’ ईहो कहलखिन्ह जे जल्दीसँ भागि जाऊ नहितँ पुलिसकेँ पकड़बा देताह। माँ हमरा भीतरका कोठली लय गेलीह। हमारा बच्चा छलहुँ मुदा हमरा बुझबामे आबि गेल छल जे ई पाइ हमरा बाबूजीकेँ गंगा-ब्रिजक ठीकेदारक दिशिसँ अपन एंजीनियरिंग छोड़ि कय बिना कोनो भाङ्ठक कार्य होमय देबा लय देल जयबाक प्रयास छल। बाबूजी बहुत काल धरि बड़बड़ाइत रहलाह। कख्नो काल दालिमे नून कम रहला उत्तर आकि आन कोनो कारणसँ बर्त्तनकेँ फेंकबाक स्वरसँ देह सिहरि जाइत छल।फेर किछु क्षणक चुप्पीक बाद सभ बच्चाकेँ बजाओल जाइत छल आ’ दुलार मलार होइत छल। हम वर्गमे प्रथम अबैत छलहुँ आ’ परिणाम निकलबाक दिन एकटा चाची सभ बेर लट्ठा खोआबैत छलथि। गुर आ’ प्रायः आटसँ बनल एहि लट्ठाक स्वाद ह बिसरि नहि सकल छी। ओहि चाचीक एकटा अर्द्ध-पागल दियर छलन्हि जे सितार बजबैत रहैत छल। एक बेर गंगामे स्टीमरसँ हमरा सभ ओहि पार जाय रहल छलहुँ तँ ओ’ ओहि स्टीमर परसँ अपन भायकेँ फेंकबा लेल उद्यत भय गेल छल। ओहि चाचीकेँ एकटा बेटी रहन्हि रजनी। पता नहि कोन बिमारी भेलैक, बेचारी एलोपैथिक दवाइक फेरमे ओछाओन धय लेलक। हम सभ कताक बेर हुनका देखबा लेल जाइत रही। हमरा दोसराक अहिठाम जायमे धख होइत रहय मुदा ओतय ककरो संगे पहुँचि जाइत रही। हुनका सभ क्यो दीदी कहैत रहियन्हि। हमर सभसँ बड्ड पैघ रहथि। मुदा किछु दिनक बाद हुनकर मृत्यु भय गेलन्हि। मृत्युसँ हमर मानसिक द्वंद आब लग आबि गेल। हुनकर मृत्युक बादो ओ’ चाची अपन बेटा सभकेँ अगिला दिन स्कूलक हेतु तैयार कए पठेलन्हि जे कॉलोनीक एकगोट दोसर दबंग चाचीकेँ पसिना नहि पड़लन्हि, आ’ एकर चर्चा बहुत दिन धरि कॉलोनीमे होइत रहल। चाचीक भाइ मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजीमे व्याख्याता रहथि, एहि कॉलेजसँ हमर बाबूजी सेहो इंजीनियरिंग पास कएने रहथि। ओ’ हाजीपुरमे गंगा-ब्रिज कॉलोनी स्थित हमर सभक घर पर आयल रहथि आ’ अपन बहनोइकेँ बड्ड फझ्झति कएने रहथि।पटना जा’ कय नीक इलाज करेबामे अस्फल रहबाक कारण पाइकेँ बतेने रहथिन्ह। हमरा मोनमे ई विचार आयल रहय जे पट्नामे पैघ डॉक्टर रहैत अछि जे मृत्युकेँ जीति सकैत अछि। मुदा एक दिन हमरा सभक संग रहयबला गामक पितियौत भाय जखन परमाणु युद्धक चर्चा कए रहल छलाह आ’ ईहो जे ओहि समय पृथ्वी पर एतेक परमाणु शस्त्र विद्यमान रहय जाहिसँ पृथ्वीकेँ कताकबेर नष्ट कएल जा सकैत अछि, तखन हमर ईहो रक्षा कवच टूटि गेल छल।

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 1. शोध लेख. 3.मायानन्द मिश्रक इतिहास-बोध

1. शोध लेख.
3.मायानन्द मिश्रक इतिहास-बोध


श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।

प्रस्तुत प्रबंधमे मायानान्द जीक 1.प्रथमं शैल पुत्री च 2.मंत्रपुत्र 3.पुरोहित आ’ 4. स्त्री-धन एहि चारि ऐतिहासिक उपन्यास सभक आधार पर लेखक द्वारा लगभग दू दशकमे पूर्ण कएल गेल इतिहास यात्राक समीक्षा कएल गेल अछि। एहिमे प्रयुक्त पुस्तकमे मंत्रपुत्र मैथिलीमे अछि आ’ शेष तीनू उपन्यास हिन्दीमे ,तथापि यात्रा पूर्णताक दृष्ट्वा आ’ श्रृंखलाक तारतम्य आ’ समीक्षाक पूर्णताक हेतु चारू किताबक प्रयोग अनिवार्य छल।

कालक्रमक दृष्टिसँ प्रथमं शैल पुत्री च प्रथम अछि, एहिमे 1500 ई.पू.सँ पहिलुका इतिहासक आधार लेल गेल अछि। मंत्रपुत्रमे 1500 ई.पू. सँ 1200 ई.पू. धरिक इतिहास उपन्यासक आधार अछि। ई सभ आधार भारत युद्धक पहिलुका अछि। पुरोहितमे 1200 ई.पू.सँ 1000 ई.पू. धरिक इतिहास अछि- एकरा ब्राह्मण साहित्यक युगक इतिहास कहि सकैत छी। स्त्रीधनक आधार अछि सूत्र-स्मृतिकालीन मिथिला। मुदा रचना भेल मैथिली मंत्रपुत्रक पहिने - नवंबर 1986 मे। प्रथमं शैल पुत्री च एकर दूसालक बाद रचित भेल आ’ ताहिमे मायानन्द जी चारू किताबक रचनाक रूपरेखा देलन्हि, मुदा ई हिन्दीक संदर्भमे छल। एकर बाद सभटा किताब हिन्दी मे आएल। हिन्दी मंत्रपुत्र आयल जाहि कारण्सँ तेसर पुस्तक पुरोहित किछु देरीसँ 1999 मे प्रकाशित भेल। स्त्रीधन जे एहि श्रृंखलाक अंतिम पुस्तक अछि, पछिला साल 2007 ई. मे प्रकाशित भेल।प्रथमं शैल पुत्री च केर प्रस्तावनाक नाम कवच छल। मंत्रपुत्रक प्रस्तावनाक नाम ऋचालोक छल आ’ ई पुस्तकक अंतमे राखल गेल। कियेकतँ ई लेखकक प्रथम ऐतिहासिक रचना छल, प्रस्तावनाकेँ अंतमे राखि कय रहस्य आ’ रोमांचकेँ बनाओल राखल गेल । पुरोहितक प्रस्तावनाक नाम विनियोग छल आ’ एकरासँ पहिने दूर्वाक्षत मंत्र राखल गेल जे भारतक आ’ विश्वक प्रथम देश्भक्ति गीत अछि। मिथिलामे एकरा आशीर्वादक मंत्रक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि। स्त्रीधनक प्रस्तावनाक नाम लेखक पृष्ठभूमि रखने छथि जे उपन्यासक एतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करबाक कारण सर्वथा समीचीन अछि। मायानन्दक इतिहास-बोधक समीक्षा हम श्रुति, परम्परा, तर्क, श्रद्धा आ’ भाषा-विज्ञानक आधार पर कएने छी , पाश्चात्य विद्वान सभक उच्छिष्ट भोज सँ निर्मित भारतीय इतिहास-लेखन सँ बचि कय इतिहासक समीक्षा भेल अछि, आ’ मध्य एशिया आ’ यूरोपक कनियो प्रभाव समीक्षा पर नहीं पड़ल अछि।
1. प्रथमं शैल पुत्री च- कवच रूपी प्रस्तावनाक बाद ई पुस्तक 1. अग्ना 2. अग्न-शैला 3. शैला- कराली 4. कराली- महेष 5. महेष- पारवती 6. गणेष 7. हरकिसन 8. किसन 9. हरप्पा : मोअन गाँव 10. गणेष का श्रीगणेश 11. किश्न 12. महाजन 13. मंडल 14. किश्न मंडल 15. मंडल : मंडली 16. पतन: पुरंदर आ’ 17. उपसंहार : पलायन खंडमे विभक्त अछि।

1. अग्ना- 2000 हजार ई. पू. सँ आरम्भ होइत अछि ई उपन्यास। खोहमे रहय बला मनुष्यक विवरण शुरू होइत अछि- बा एकटा दलक सर्वाधिक बलिष्ठ मनुष्य अछि। पूर्वज बा सेहो बलिष्ठ छल। एतेक रास बच्चा सभक बा। एकटा छोट आ’ एकटा पैघ पाथरक आविष्कार कएने छलाह पूर्वज बा। अम् दलाग्राकेँ कहल जैत छल। बा भयंकर गंधवला पशुक नाम सेहो छल। हाथक महत्त्व बढ़ल आ’ बढ़ल वृक्षसँ दूरी। सर्पकेँ मारि कय खायल नहीं जाइत अछि, से गप पूर्वजसँ ज्ञात छल। प्राचीन देव वृक्ष, दोसर नाग देव आ’ तेसर नदी देव छलाह। अम् बासँ बा संतान उत्पन्न करैत आयल छलाह। नव कुठार आ’ नव काताक आविष्कार भेल। अः आः अग अग्ग केर देखि कय वन्य पशुकेँ भागैत देखि एकर जानकारी भेल। मानुषी हुनकर संख्या वृद्धि करैत छलि।प्रथम मानुषीक नाम पड़ल अग्ना। ओकर मानुष-मित्र छलाह अग्ग। अग्ना दलाग्रा बनि गेलीह आ’ हुनकर नेतृत्वमे दल उत्तर दिशि बढ़ल। फेर लेखक लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग 200 कर्प्ड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ’ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर 1,97,29,49,032 वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। यूरोपमे सत्रहम शाब्दी तक पृथ्वीक आयु 4000 वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान 1200 वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मनलैन्ह। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ हास्यास्पद अछि।


(अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008)

विदेह
वर्ष-1 मास-2 अंक-3

संपादकीय
(01.02.2008)
विदेहक एहि अंककेँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। ।एहि अंकसँ संगीत-शिक्षाक आरंभ कएल जा रहल अछि। एहि अंक मे अछि
1. शोध लेख.
3.मायानन्द मिश्रक इतिहास-बोध (पृ. 5सँ 9)
2. उपन्यास
1.सहस्रबाढ़नि(आगाँ) (पृ. 10 सँ12)

3.महाकाव्य 1.महाभारत(आगाँ) (पृ.13 सँ25)

4.कथा
2.भारत रत्न (पृ. 26 सँ 28)

5.पद्य आगाँ (पृ.29 सँ48)
6.संस्कृतशिक्षा(आगाँ) (पृ.49सँ57) 7.मिथिलाकला-चित्रकला(आगाँ) (पृ.58 सँ 59)
8.संगीत-शिक्षा (पृ.60 सँ 61)
9.बालानांकृते-2.महुवा घटवारिन (पृ.62 सँ 64)
10.पंजी-प्रबंध(आगाँ) (पृ. 65सँ 68)
11.मिथिला आऽ संस्कृत- दरिभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासंगिकता(आगाँ) (पृ.69सँ71)
12.भाषा आऽ प्रौद्योगिकी(कंप्युटर,छायांकन,कीबोर्ड/टंकणक तकनीक) (पृ.72सँ73)
13.रचना लिखबा सँ पहिने...आगाँ) (पृ. 74सँ75)
14.आऽ अंतमे प्रवासी मैथिलक हेतु अंग्रेजीमे
VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT(आगाँ)(पृ.76सँ83)

पछिला अंक जेकाँ अहू अंककेँ नीचाँ लिखल पाँच लिंक पर राखल गेल अछि।

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अपनेक प्रतिक्रिया आ’ रचनाक प्रतीक्षा अछि।


नई दिल्ली गजेन्द्र ठाकुर
01.02.2008
© सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक-गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक अधिकार एहि ई-पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अप्पन मौलिक आ, अप्रकाशित रचना सभ(जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखकगणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc,.docx, .txt किंवा .pdf फॉर्मेटमे पठाय सकैत छथि।रचनाक संग रचनाकार अप्पन संक्षिप्त परिचय(बायोडाटा) आ’ अप्पन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक संग ई घोषणा रहय-जे ई रचना मौलिक अछि आ’ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह(पाक्षिक)-ई-पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्रतासँ (सात दिनमे) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...