Wednesday, June 04, 2008

भालसरिक गाछ: bhalsarik gachhhttp://www.videha.co.in/

भालसरिक गाछ: bhalsarik gachh

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट

मीत भाइक खिस्सा की कहब। गामसँ निकललथि आऽ काका लग दिल्ली पहुँचलाह नोकरी करबाक हेतु, मुदा यावत लाल काका-काकी लग रहलाह, तावत कनैत-कनैत हुनका लोकनिकेँ अकच्छ कऽ देलखिन्ह।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि, तँ भरि दिन उकठपन करैत रहथि। से कथाक बीचमे हमरा जेना-जेना मोन पड़ैत जायत, तेना-तेना हम हुनकर उकठपनक खोरिष कहैत रहब। जौँ मीत भाइक खिस्सा सुनबाक होए तँ यावत ई-सभ अहाँकेँ बुझल नहि रहत तावत धरि नहिये खिस्सा नीक लागत आऽ नहिये बुझबामे आएत।

तँ उकट्ठी छलाह से सिद्ध भेल। आहि रे बा। उकठपनक एकोटा खिस्सा सुनबे नहि कएलहुँ आऽ मानि लेलहुँ जे सिद्ध भए गेल तँ सुनू।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि उकठपनी करैत रहैत छलाह। एक बेर पसीधक काँटक रस पोखड़िमे दऽ कए पोखरिक सभटा माँछ मारि देने रहथि। मुदा ई तँ पसीधक रससँ जुड़ल हुनकर एकटा छोट अपराध छल। पसीधक काँटासँ जुड़ल हुनकर एकटा पैघ अपराधक चर्च आगाँ आब होएत जाहिसँ सौँसे गाम दहसि गेल छल।

एक बेर पुबाड़ि टोलक कोनो बच्चाक मोन खराप भेलैक, तँ हिनका सँ अएलन्हि पुछबाक हेतु जे कोन दबाइ दियैक। मीत भाइ पसीधक काँटक रस पियाबय कहलखिन्ह। अऽ ई कहि मीत भाइ महीँस चरेबाक हेतु डीह दिशि चलि गेलाह।

एक गोट दोसर मँहीसबार गाम परसँ अबैत देखाऽ पड़लन्हि मीत भाइकेँ तँ पुछलखिन्ह-जे

"हौ बाउ, पुबाड़ि टोल दिशि सँ कोनो कन्नारोहटो सुनि पड़ल छल अबैत काल"?

बुझू। मीत भाइ एक तँ गलत कारण बतओने छलाह आऽ फेर ओकर दुष्परिणामक सेहो अहलदिलीसँ बाट जोहि रहल छलाह। एहि घटनासँ बड़ थू-थू भेलन्हि गाममे मीत भाइक। ओऽ तँ धन रहल जे मरीजक बाप जखन कलमसँ पसीधक काँटा नेने घुरि रहल छलाह तँ रस्तामे क्यो भेँटि गेलन्हि आऽ पूछि देलकन्हि। नहि तँ ओऽ अपन बच्चासँ हाथ धोबय जाऽ रहल छलाह।

मीत भाइ एहि घटनाक बाद कंठी लऽ लेलन्हि। माने आब माँछ-मौस नहि खायब, ई प्रण कएलन्हि। मुदा घरमे सभ क्यो माँछ खूब खाइत छलन्हि। एक बेर भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आऽ छिट्टा लए बिदा भेलाह मीत भाइ। बुन्ना-बान्नी होइत छल, मुदा आड़िकेँ तड़पैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए कोदारि चला देलन्हि। आऽ रोहु दू कुट्टी भऽ गेल। दुनू ट्कड़ीकेँ माथ पर उठा कए विदा भेलाह मीत भाइ गाम दिशि। तकरा देखि गोनर भाय गाम पर जाइत काल बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह। आब फेर मोसकिल। पहिने बाबा दोगहीक अर्थ बुझि लिअ। नहि तँ कथा फेर बुझबामे नहि आएत।

‘बाबा दोगही’ मीत भाइक टोलकेँ गौँआ सभ ताहि हेतु कहैत छल,कारण जे क्यो बच्चो ओहि टोलमे जनमैत छ्ल से संबंधमे गौँआ सभक बाबा होइत छल।

आब कथा आगाँ बढ़ाबी। गोनर भाइ मोनमे ई सोचैत रहथि, जे वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। आऽ ओऽ ई सोचि बजलाह।

“यौ मीत भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भऽ कए माछ उघैत छी”।

”यौ माछ खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने”। मीत भाइ बजलाह।

अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह।

एहिना एक दिन गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छलाह, तँ हुनका देखि मीत भाइ पुछलखिन्ह-

“की देखि रहल छी”।

गोनर झा कहलखिन्ह- जे

“टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी”।

“ आ’ जौँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन”।

“ ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय”।

”से तँ ठीक मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी, पुछला पर जौँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि जेलमे नहि धए देत”।

”से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी क’ कए फेंकि दैत छियैक”।

आ’ से कहि गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ पाड़-फूड़ि कए फेंकि देलखिन्ह।

एक दिन मीत भाए भोरे-भोर पोखड़ि दिशि जाइत रहथि तँ जगन्नाथ भेटलखिन्ह, गोबड़ काढ़ि रहल छलाह। कहलखिन्ह,

” यौ मीत भाइ, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबड़ काढ़य पड़ैत अछि ?”

मीत भाइ देखलन्हि जे हुनकर कनियो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ एकान्त पाबि जगन्नाथकेँ पुछलखिन्ह-,

“भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होयत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल”।

”हँ से तँ पाइ लागले छल”।

”मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आऽ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि अछि”।

एक बेर बच्चा बाबूक ओहिठाम गेलाह मीत भाइ। ओऽ पैघ लोक आऽ तेँ बड्ड कँजूस। पहिने तँ सर्दमे गुरसँ होएबला लाभक चर्च कएलन्हि, जे ई ठेही हँटबैत अछि आऽ फेर गूरक चाह पीबाक आग्रह।

मुदा मीत भाए कहि देलखिन्ह जे गुरक चाह तँ हुनको बड्ड नीक लगैत छन्हि। मुदा परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलाह, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छलन्हि से कुसियार छोड़ि देलन्ह। आऽ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। ओहि समयमे चुकन्दरक पातर रसियन चीनी अबैत छल, से बच्चा बाबूकेँ तकर चाह पिआबय पड़लन्हि।

किछु दिन पहिने बच्चा बाबू एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओऽ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आऽ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। एकर मीत भाइ खूब नीक जबाब देलन्हि एहि बेर। अधिक फलम् डूबाडूबी।

अपने लोकनि मीत भाइक बुधियारी किंवा कबिलपनीक चरचा सुनलहुँ। मुदा मीत भाइक ई सरल जीवन बियाहक बाद, वा कहू बेटाक पैघ भेलाक बाद कनेक कालक लेल हिलकोर लेलकन्हि। भेल ई जे मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि।

मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि, आऽ ई क्यो पुछन्हि तँ पुछला पर मीत भाइखा कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि।

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

दिल्लीक रस्तामे मीत भाइक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आऽ बजनहार उत्साहित मुदा सुननहार ठाकल बुझि पड़ैत छथि।
मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलन्हि तँ कहए लगलीह
“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।
तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह,
“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।
आ’ बूढ़ी फेर सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।
मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आ’ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ लोकि लेलकन्हि।
”ई की छी”।
”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।
”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।
” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।
”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।
”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”
” ल’ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।
मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।
दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगा’ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा ल’ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।
मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचा जाइत छलन्हि आ’ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि मीत भाइ जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भ’ गेलाह।

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मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइ आऽ लालकिलाक भारत रत्न सभ

अपन मित्रकेँ लाल काकीक घरक सीढ़ीसँ नीचाँ उतरैत हुनकर चमचम करैत जुत्ताकेँ देखि ओकर निर्माता कंपनी,ब्राण्ड आऽ मूल्यक संबंधमे जिज्ञासा कएलहुँ। आब अहाँ कहब जे मित्रक नाम किएक नहि कहि रहल छी, तँ सुनू हमर एकेटा मित्र छथि। आऽ से छथि जे अपन तरहक एकेटा छथि, आऽ से छथि मीत भाइ।

आब आगाँ बढ़ी। मीत भाइ हमर जिज्ञासा शांत करबाक बदला भाव-विह्वल भय गेलाह आऽ एकर क्रयक विस्तृत विवरण कहि सुनओलन्हि।


भेल ई जे दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत अछि, ताहिमे मीत भाइ अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचलाह। सभक मुँहसँ एहि बजारक इमपोर्टेड वस्तु सभक कम दाम पर भेटबाक गप्प सुनैत रहैत छलाह आऽ हीन भावनासँ ग्रस्त होइत छलाह। मीत भाइकेँ एहि बजारसँ, सस्त आऽ नीक चीज, किनबाक लूरि नहि छन्हि से हम कहैत छलियन्हि।

ओहि परीक्षणक दिन, मीत भाइक ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे मीत भाइक आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आऽ देखिते-देखिते ओतएसँ निपत्ता भय गेल। मीत भाइक मोन ओम्हर गेलन्हि आऽ ओऽ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि। बड्ड मुश्किलसँ मीत भाइ ओकरा ताकि लेलन्हि। जिज्ञासा कएलन्हि जे ओऽ की नुका रहल अछि।

“ ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि ”। चोर बजारक चोर महाराज बजलाह।

“अहाँ कहूतँ ठीक, जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि”।

तखन झाड़ि-पोछि कय विक्रेता महाराज एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि, मुदा ईहो संगहि कहि गेलाह, जे ओऽ कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे अछि, जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होयत आऽ सही दाम देत।

हमर मित्र बड्ड घिंघियेलथि तँ ओऽ चारिसय टाका दाम कहलकन्हि।

हमर मीत भाइक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छलन्हि, आऽ दोकानदारक बेर-बेर बुत्ताक बाहर होयबाक बात सत्त भय रहल छल।

विक्रेता महाराज ई धरि पता लगा लेलन्हि, जे क्रेता महाराजक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छन्हि आऽ दस टाका तँ ई सरकारी डी.टी.सी. बसक किरायाक हेतु रखबे करताह। से मुँह लटकओने मीत भाइक मजबूरीकेँ ध्यानमे रखैत ओऽ तीन सय पचास टाकामे, जे हुनकर (चोर बजारक चोर विक्रेता महाराज) मुताबिक मूरे-मूर छल,जुत्ता देनाइ गछलखिन्ह। विक्रेता महाराज जुत्ताकेँ अपन कलेजासँ हटा कय हमर मित्रक करेज धरि पहुँचा देलन्हि।

आब आगाँ हमर मित्रक बखान सुनू।

“से जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलियैक। कतओ पानि देखी तँ पैरके सरा दैत रही आऽ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ भेल रहय, एक दिन लाल काकीक घरक एहि सीढ़ीसँ उतरैत रही, तखने जुत्ताक पूरा सोल, करेज जेकाँ, अपन एहि आँखिक सोझाँ जुत्तसँ बाहर आबि गेल।

"मित्र की कहू? क्यो जे एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ ऊप्पर कय रहल छी। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आऽ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ, तँ आब तँ एतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभतँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी, भारत-रत्न बँटैत छी, आऽ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभ तँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे"।

फेर बजैत रहलाह-

“आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम यौ भजार, अहाँ तँ एहि घटनाक मोन नहि पारू ”।

आब हमरा तँ होय जे हँसी की नहि हँसी। फेर दिन बीतल मीत भाइ गाम चलि गेलाह। आऽ हम प्रोग्रामे बनबैत रहि गेलहुँ जे नहि तँ अगिला रविकेँ चोर बजारक आकि मीना बजारक दर्शन करब। मुदा पता लागल अछि, जे पुलिस एहि बजारकेँ बन्द कए देलक।

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1.
भजन विनय
प्रभू बिनू कोन करत दुखः त्राणः॥ कतेक दुःखीके तारल जगमे भव सागर बिनू जल जान, कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल सोर ने सिनई छी कानः॥ अहाँ के त बैनि परल अछि पतित उधारन नाम ।नामक टेक राखू प्रभू अबहूँ हम छी अधम महानः॥ जौँ नञ कृपा करब एहि जन पर कोना खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहिँ सहारा दोसर के अछि आनः॥
2. भजन लक्ष्मी नारायण जीक विनय
लक्ष्मी नारायण अहाँ हमरा ओर नञ तकइ छी यौ। दीनदयाल नाम अहाँके सभ कहए अछि यौ। हमर दुःख देखि बिकट अहाँ डरए छी यौ। ब्याध गणिका गिध अजामिल गजके उबारल यौ। कौल किरात भिलनी अधमकेँ उबारल यौ। कतेक पतितके तारल अहाँ मानि के सकत यौ। रुद्रपुरके भोलानाथ अहाँ के धाम गेलायो। ज्यों न हमरा पर कृपा करब हम कि करब यौ। रामजी अनाथ एक दास राखु यौ। 3. भजन विनय भगवती
जय जय जनक नन्दिनी अम्बे, त्रिभुवन के तू ही अवलम्बेः। तुमही पालन कारनी जगतके, शेष गणेश सुरन केः। तेरो महिमा कहि न सकत कोउ, सकुचत सारभ सुरपति कोः। मैँ हूँ परमदुखी एहि जगमे, के नञ जनए अछि त्रिभुवनमेः॥ केवल आशा अहाँक चरणके, राखू दास अधम केः॥ कियो नहि राखि सकल शरणोंमे, देख दुखी दिनन केः॥ जौँ नहि कृपा करब जगजननी, बास जान निज मनमे। तौँ मेरो दुख कौन हटावत, दोसर छाड़ि अहाँकेः॥ कबहौँ अवसर पाबि विपति मेरो कहियो अवधपति को, रामजी को नहि आन सहारा छाड़ि चरण अहाँकेः॥
4. भजन विनय
प्रभु बिनु कौन करत दुःख त्राणः।। कतेक दुखीके तारल जगमे भवसागर बिनु जल जानः॥ कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल, स्वर नञ सुनए छी कानः।। अहाँके तौँ बानि पड़ल अछि,पतित उधारण नामः।
नामक टेक राखु अब प्रभुजी हम छी अधम जोना।
कृपा करब एहि जन पर कोन खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहि सहारा दोसर के अछि आनः॥

5. विहाग

भोला हेरू पलक एक बेरः॥ कतेक दुखीके तारल जगमे कतए गेलहुँ मेरो बेरः॥ भूतनाथ गौरीवरशंकर विपत्ति हरू एहि बेरः॥ जोना कृपा करब शिवशंकर कष्ट मिटत के औरः॥ बड़े दयालु जानि हम एलहुँ अहाँक शरण सुनि सोरः॥ रामजीके नहि आन सहारा दोसर केयो नहि औरः॥
6. भजन महेशवाणी
भोला कखन करब दुःख त्रान? त्रिविध ताप मोहि आय सतावे लेन चहन मेरो प्राण॥ निशिवासर मोहि युअ समवीने पलभर नहि विश्रामः॥ बहुत उपाय करिके हम हारल दिन-दिन दुःख बलबान, ज्यौँ नहि कृपा करब शिवशंकर कष्ट के मेटत आन॥ रामजीके सरण राखू प्रभु, अधम शिरोमणि जान॥भोला.॥
7.
विनय विहाग
राम बिनु कौन हरत दुःख आन कौशलपति कृपालु कोमल चित जाहि धरत मुनि ध्यान॥ पतित अनेक तारल एहि जगमे, जग-गणिका परधान।। केवट,गृद्ध अजामिल तारो, धोखहुषे लियो नाम, नहि दयालु तुअ सम काउ दोसर, कियो एक धनवान।। रामजी अशरण आय पुकारो, भव ले करू मेरो त्राण॥रामबिनु॥

8. भजन विनय
लक्ष्मीनारायण हमर दुःख क्खन हरब औ॥ पतित उधारण नाम अहाँके सभ कए अछि औ, हमरा बेर परम कठोर कियाक होइ छी औ।। त्रिविध ताप सतत निशि दिन तनबै अछि औ॥ अहाँ बिना दोसर के त्राण करत औ॥ देव दनुज मनुज हम कतेक सेवल औ, कियो ने सहाय भेला विपति काल औ॥ कतेक कहब अहाँके जौँ ने कृपा कर औ, रामजीके चाड़ि अहाँक के शरण राखन औ॥
9. भजन विनय एक बेर ताकू औ भगवान, अहाँक बिना दोसर दुःख केहरनाअन॥ निशि दिन कखनौ कल न पड़ै अछि,
कियो ने तकैये आन केवल आशा अहाँक चरणके आय करू मेरे त्राण॥ कतेक अधमके तारल अहाँ गनि ने सकत कियो आन, हमर वान किछु नाहि सुनए छी, बहिर भेल कते कान॥ प्रबल प्रताप अहाँक अछि जगमे
के नहि जनए अछि आन, गणिका गिद्ध अजामिल गजके जलसे बचावल प्राण॥ जौँ नहि कृपा करब रघुनन्दन, विपति परल निदान, रामजीके अब नाहि सहारा, दोसर के नहि आन॥
10. महेशवानी
सुनू सुनू औ दयाल, अहाँ सन दोसर के छथि कृपाल॥ जे अहाँ के शरण अबए अछि सबके कयल निहाल, हमर दुःख कखन हरब अहाँ, कहूने झारी लाल॥ जटा बीच गंगा छथि शोभित चन्द्र विराजथि भाल, झारीमे निवास करए छी दुखियो पर अति खयाल॥ रामजीके शरणमे राखू, सुनू सुनू औ महाकाल, विपति हराऊ हमरो शिवजी करू आय प्रतिपाल॥

11. महेशवानी

काटू दुःख जंजाल,
कृपा करू चण्डेश्वर दानी काअटू दुःख जंजाल॥ जौँ नहि दया करब शिवशंकर, ककरा कहब हम आन, दिन-दिन विकल कतेक दुःख काटब
जौँ ने करब अहाँ खयाल॥ जटा बीच गंगा छथि होभित, चन्द्र उदय अछि भाल, मृगछाला डामरु बजबैछी, भाँग पीबि तिनकाल॥ लय त्रिशूलकाटू दुःख काटू, दुःख हमरो वेगि करू निहाल, रामजी के आशा केवल अहाँके, विपति हरू करि खयाल॥

12. महेशवानी
शिव करू ने प्रतिपाल, अहाँ सन के अछि दोसर दयाल॥ भस्म अंग शीश गंग तीलक चन्द्र भाल, भाँग पीब खुशी रही , रही दुखिया पर खयाल। बसहा पर घुमल फिरी, भूत गण साथ, डमरू बजाबी तीन
नयन अछि विशाल॥ झाड़ीमे निवास करी, लुटबथि हीरा लाल, रामजी के बेर शिव भेलाह कंगाल॥
13.
महेशवानी
शिवजी केहेन कैलौँ दीन हमर केहेन॥ निशिदिन चैन नहि
चिन्ता रहे भिन्न, ताहू पर त्रिविध ताप कर चाहे खिन्न॥ पुत्र दारा कहल किछु ने सुनै अछि काअ ताहू पर परिजन लै अछि हमर प्राण॥ अति दयाल जानि अहाँक शरण अयलहुँ कानि, रामजी के दुःख हरू अशरण जन जानि॥

14.
महेशवानी
विधि बड़ दुःख देल, गौरी दाइ के एहेन वर कियाक लिखि देल॥ जिनका जाति नहि कुल नहि परिजन, गिरिपर बसथि अकेल, डमरू बजाबथि नाचथि अपन कि भूत प्रेत से खेल॥ भस्म अंग शिर शोभित गंगा,
चन्द्र उदय छनि भाल
वस्त्र एकोटा नहि छनि तन पर
ऊपरमे छनि बघछाल,
विषधर कतेक अंगमे लटकल, कंठ शोभे मुंडमाल, रामजी कियाक झखैछी मैना गौरी सुख करती निहाल॥

15.
विहाग
वृन्दावन देखि लिअ चहुओर॥
काली दह वंशीवट देखू, कुंज गली सभ ठौर, सेवा कुंजमे ठाकुर दर्शन, नाचि लिअ एक बेर॥ जमुना तटमे घाट मनोहर, पथिक रहे कत ठौर, कदम गाछके झुकल देखू, चीर धरे बहु ठौर॥ रामजी वैकुण्ठ वृन्दावन घूमि देखु सभ ठौर, रासमण्ड ल’ के शोभा देखू, रहू दिवस किछु और।। 16. विहाग
मथुरा देखि लिअ सन ठौर॥ पत्थल के जे घाट बनल अछि, बहुत दूर तक शोर, जमुना जीके तीरमे, सन्न रहथि कते ठौर॥ अस्ट धातुके खम्भा देखू, बिजली बरे सभ ठौर, सहर बीच्मे सुन्दर देखू, बालु भेटत बहु ढ़ेर॥ दुनू बगलमे नाला शोभे, पत्थल के है जोर कंशराजके कीला देखू देवकी वो वसुदेव॥ चाणूर मुष्टिक योद्धा देखू कुबजा के घर और, राधा कृष्णके मन्दिर देखू, दाउ मन्दिर शोर॥ छोड़ विभाग
रामजी मधुबन, घूमि लिअ अब, कृष्ण बसथि जेहि ठौर॥ गोकुल नन्द यशोदा देखू कृष्ण झुलाउ एक बेर॥
17. महेशवानी
भोला केहेन भेलौँ कठोर, एक बेर ताकू हमरहुँ ओर॥ भस्म अंग शिर गंग विराजे, चन्द्रभाल छवि जोर।।
वाहन बसहा रुद्रमाल गर, भूत-प्रेतसँ खेल॥ त्रिभुवन पति गौरी-पति मेरो जौँ ने हेरब एक बेर, तौँ मेरो दुःख कओन हरखत सहि न सकत जीव मोर॥ बड़े दयालु जानि हम अयलहुँ, अहाँक शरण सूनि शोर, राम-जी अश्रण आय पुकारो, दिजए दरस एक बेर॥
18. भजन विनय
सुनू-सुनू औ भगवान, अहाँक बिना जाइ अछि
आब अधम मोरा प्राण॥
कतेक शुरके मनाबल निशिदिन कियो न सुनलनि कान, अति दयालु सूनि अहाँक शरण अयलहुँ जानि॥ बन्धु वर्ग कुटुम्ब सभ छथि बहुत धनवान, हमर दुःख देखि-देखि हुनकौ होइ छनि हानि।। रामजी निरास एक अहाँक आशा जानि, कृपा करी हेरु नाथ, अशरण जन जानि॥
19. महेशवाणी
देखु देखु ऐ मैना, गौरी दाइक वर आयल छथि, परिछब हम कोना। अंगमे भसम छनि,भाल चन्द्रमा
विषधर सभ अंगमे, हम निकट जायब कोना॥ बाघ छाल ऊपर शोभनि,मुण्डमाल गहना, भूत प्रेत संग अयलनि,बरियाती कोना॥ कर त्रिशूल डामरु बघछाला नीन नयना हाथी घोड़ा छड़ि पालकी वाहन बरद बौना॥ कहथि रामजी सुनु ऐ मनाइन, इहो छथि परम प्रवीणा, तीन लोकके मालिक थीका, करु जमाय अपना॥

20.
महेशवानी
एहेन वर करब हम गौरी दाइके कोना॥ सगर देह साँप छनि, बाघ छाल ओढ़ना, भस्म छनि देहमे,विकट लगनि कोना॥
जटामे गंगाजी हुहुआइ छथि जेना, कण्ठमे मुण्डमाल शोभए छनि कोना॥ माथे पर चन्द्रमा विराजथि तिलक जेकाँ, हाथि घोड़ा छाड़ि पालकी,बड़द चढ़ल बौना॥ भनथि रामजी सुनु ऐ मैना, गौरी दाइ बड़े भागे, पौलनि कैलाशपति ऐना॥

21.
भजन विहाग
राम बिनु विपति हरे को मोर॥ अति दयालु कोशल पै प्रभुजी, जानत सभ निचोर, मो सम अधम कुटिल कायर खल, भेटत नहि क्यो ओर॥ ता’ नञ शरण आइ हरिके हेरू प्लक एक बेर, गणिका गिद्ध अजामिल तारो पतित अनेको ढेर॥ दुःख सागरमे हम पड़ल छी, जौँ न करब प्रभु खोज, नौँ मेरो दुःख कौन हारावन, छड़ि अहाँ के और॥ विपति निदान पड़ल अछि निशि दिन नाहि सहायक और, रामजी अशरण शरण राखु प्रभु, कृपा दृष्टि अब हेरि॥ 22. भजन विहाग
विपति मोरा काटू औ भगवान॥
एक एक रिपु से भासित जन, तुम राखो रघुवीर, हमरो अनेक शत्रु लतबै अछि, आय करू मेरो त्राण॥ जल बिच जाय गजेन्द्र बचायो, गरुड़ छड़ि मैदान, दौपति चीर बढ़ाय सभामे, ढेर कयल असमान॥ केवट वानर मित्र बनाओल, गिद्ध देल निज धाम, विभीषणके शरणमे राखल राज कल्प भरि दान॥ आरो अधम अनेक अहाँ तारल सवरी ब्याध निधान, रामजी शरण आयल छथि, दुखी परम निदान॥

23.
महेशवानी
हम त’ झाड़ीखण्डी झाड़ीखण्डी हरदम कहबनि औ॥ कर-त्रिशूल शिर गंग विराजे, भसम अंग सोहाई, डामरु-धारी डामरुधारी हरदम कहबनि औ॥ चन्द्रभाल धारी हम कहबनि, विषधरधारी विषधरधारी हरदम कहबनि औ॥ बड़े दयालु दिगम्बर कहबनि,गौरी-शंकर कहबनि औ, रामजीकेँ विपत्ति हटाउ, अशरणधारी कहबनि औ॥
24.

चैत नारदी जनानी
बितल चैत ऋतुराज चित भेल चञ्चल हो, मदल कपल निदान सुमन सर मारल हो॥ फूलल बेलि गुलाब रसाल कत मोजरल हो, भंमर गुंज चहुओर चैन कोना पायब हो॥ युग सम बीतल रैन भवन नहि भावे ओ, सुनि-सुनि कलरव सोर नोर कत झहरत हो॥ रामजी तेजब अब प्राण अवधि कत बीतल हो, मधुपुर गेल भगवान, पलटि नहि आयल हो॥
25. भजन लक्ष्मीनारायण
लक्ष्मीनारायण हमरा ओर नहि तकय छी ओः॥ दीन दयाल नाम अहाँक सब कहैये यौ हमर दुखः देखि विकट अहूँ हरै छी योः॥ ब्याध गणिका गृध अजामिल गजके उबाड़ल यो कोल किरात भीलनि अधमके ऊबारल यो कतेक पैतके तारल अहाँ गनि के सकत यो रुद्रपुरके भोल्मनाथ अहाँ धाम गेलायोः॥ जौँ नञ हमरा पर कृपा करब हम की करब यौ रामजी अनाथ एक दास राखू योः॥
26. महेशवानी
शिव हे हेरु पलक एक बेर हम छी पड़ल दुखसागरमे
खेबि उतारु एहि बेर॥ जौँ नञ कृपा करब शिवशंकर हम ने जियब यहि और॥ तिविध ताप मोहि आय सतायो
लेन चह्त जीव मोर॥ रामजीकेँ नहि और सहारा, अशरण शरणमे तोर॥

27.
समदाउन
गौनाके दिन हमर लगचाएल सखि हे मिलि लिअ सकल समाजः॥ बहुरिनि हम फेर आयब एहि जग दूरदेश सासुरके राजः॥ निसे दिन भूलि रहलौँ सखिके संग नहि कएल अपन किछु काजः। अवचित चित्त चंचल भेल बुझि
मोरा कोना करब हम काजः। कहि संग जाए संदेश संबल किछु दूर देश अछि बाटः॥ ऋण पैंच एको नहि भेटत
मारञमे कुश काँटः॥ हमरा पर अब कृपा करब सभ क्षमब शेष अपराध रामजी की पछताए करब अब
हम दूर देश कोना जाएबः॥

28.
महेशवाणी
कतेक कठिन तप कएलहुँ गौरी
एहि वर ले कोना॥
साँप सभ अंगमे सह सह करनि कोना, बाघ छाल ऊपरमे देखल, मुण्डमाल गहना॥ संगमे जे बाघ छनि,बरद चढ़ना,
भूत प्रेत संगमे नाचए छनि कोना॥ गंगाजी जटामे हुहुआइ छथि कोना, चन्द्रमा कपार पर शोभए छथि कोना। भनथि रामजी सुनुए मैना, शुभ शुभ के गौरी विवाह हठ छोड़ू अपना॥

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...