Saturday, February 23, 2008

आइबे रहल ऐच्छ फगुआ याऊ


गेल जाड़ मांस के कंपकंपी,
कूदू फान्दू बउवा येऊ,
मादक हवा कही रहल ऐच्छ,
आइबे रहल आइछ फगुवा यौ ॥

रंग-अबीर सं चमकत अंगना,
बल्जोरी के जोर चालत,
दू गिलास भांग के बाद,
बीस ता मल्पूआ यौ॥

नाक-भों जे कियो चढायब,
या की रंग पैइन सं घब्रायब,
जे करतेई बेसी लतपत,
रंग सं भ जीते थौवा यौ..

गोर्की भौजी, छोटका बउवा,
पहिरू पूर्ण अंगा, पुरना नुवा,
रंग-अबीर पोलिस सं,
सब गोते लागब कौवा यौ॥

बड नीक ई पाबैइन आइछ,
सबके मोंन के भाबैईत ऐच्छ,
एके रंग मैं सब रंगेतय ,
के धनीक, के बिल्तौवा यौ॥

फगुवा के यह मज़ा त छाई ,
तैयारी के ने आवश्यकता छाई,
रंग पैइन दुनु छाई सस्ता,
नई खर्चा हित दहौउअया यौ॥
फगुवा के तैयारी करू...

सुख - कोना सुखी रही ?



कोना सुखी रही ? मानव सभ्यता के आरंभ स इ प्रश्न मनुष्य क परेशान केना छई ! दार्शनिक, कवी, लेखक, विचारक, वैज्ञानिक आर नेता इ सब लोकेन अपन - अपन तरीका स अई प्रश्न के उत्तर के खोज आर व्याख्या केलखिन यए ! मुदा आइयो मनुष्य इ प्रश्न अनुत्तरिय अछि ! वर्तमान समय म आई जखन हमरा पास नया युग के आधुनिक चिंतन अछि, नई पीढ़ी के दार्शनिक, मैनेजमेंट मसीहा, आर सब समस्या के तुरंत निदान करै वाला विशेशग्य अछि ! आध्यात्मिक स्वर्ग के सुख दै वाला गुरु आर अई संसार त्वरित मोक्ष के अनुभूति दिलाबे बाला स्वामी सब छैथ ! मुदा सुखी केना रही इ प्रश्न ज्यों के त्यों अछि ! किछ दिन पहिने हम अई प्रश्न के बहुत रोचक आर सुखद आर दुःख पर प्रकाश डाले वाला उत्तर स रु ब रु भेलो जकरा हम अपने सब के बिच बांटे के इक्षुक छलो ! श्री श्री रवि शंकर जी द् आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के संस्थापक कहैत छथिन की " अई ठाम दु टा कारण अछि दुःख के ! अतीत के पछतावा आर भविष्य के चिंता ! कतेक पैघ गप कहाल्खिंन ओ ? हम सब अक्शर सोचेत छलो की काश हमर विवाह किनको और स हेतिया ! हम ओ दोसर बाला नोकरी किये न स्वीकार केलो ? आदि आदि ! हमर सब के मस्तिष्क हमेशा अतीत आर भविष्य के बिच उलझल रहैत अछि ! या त हम सब बैह गेल दूध के लेल दुखी होइत छलो या ओई पुल क पार करै के प्रयाश म जाकर तक हम पहुचो नै सके छी ! अनावश्यक रूप स भेल घटना पर अपन माथा पेच्ची करै छी या जे होई बाला य ओकर चिंता मए वर्तमान क व्यर्थ करैत छलो ! बीत चुकल कैल के पश्याताप आर आबे बाला कैल के उत्सुकता मए हम आई के अनमोल पल के हरेनाए जय छी ! त अहि कहू हम सब सुख कोना प्राप्त करब ? श्री श्री रवि शंकर जी के कथन अनुसार हमरा सब कए इ स्वीकार करै परत की वर्तमाने सब किछ अछि ! हमरा वर्तमान के क्षण क पूरा तरह जिवाक चाही आर वर्तमान म हम जे के रहलो य ओई म अपन पूरा क्षमता लगे कए ओही मए अपन पूरा ध्यान केन्द्रित करी ! हमरा सब कए आई आर एखन म विश्वास करैये परत ! की भेल आर की हेत म भो सके य इ बात अपने कए असंभव प्रतीत हुए ! सचमुच म इ सिख लेब कठिन अछि ! जखन भी एक बच्चा एक कागज पर किछ चित्रित करैत छैथ, कागज के नाव पैन मए तैरैत या एक पंक्षी क उडैत देखैत छैथ ! ओई समय म ओ अपन पूरा ध्यान ओही काज मए लगबैत छैथ ! हुनका तनिको चिंता नै रहैत छैन की कियो हुनका देख रहलेंन य या कियो हुनका पर हैस रहलें या ! ओकरा इयो बात परेशान नै करे छई की ओ किछ देर पहिना की केला रहा आर किछ देर बाद की करता ! ओ त खाली अपन काज म मगन रहैत छैथ ! हम सब इ प्रकृति प्रदत्त बिना स्वचेतन भेल बच्चा के तरह वर्तमान के क्षण म जिवई के इ गुण क हरे चुकलो य ! जखन की सबसे बेहतर तरीका अछि जीवन म ख़ुशी ढूढाई के बजाय ओकरा कए हम पैकेज्ड मोक्ष आर ब्रांडेड निर्वाण के लेल भागी !

इ छोट-मोट बात क ध्यान म राखैत जीवन म सदा सुखी रैहसके छी

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...