Saturday, December 27, 2008

बहादुरगंजक लोककथा-तीन मूड़ी बला लोक- उमेश कुमार महतो "वियोगी"




बहादुरगंजक लोककथा-तीन मूड़ी बला लोक

एकटा राजा रहए। ओकरा एकटा बेटा रहए। ओकर राजपाट खूब शांति सँ चलैत रहए। राजा जखन बीमार भेलए तँ बेटाकेँ कहलकए।
१.फी कोरमे सीरा खाइले।
२.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले।
राजकुमार एकर अर्थ नहि बुझि पेलक। राजा मरि गेलैक।
राजकुमार राजा बनि गेल।
पिताजीक गपपर ओ अमल करए लागल।
१.फी कोरमे सीरा खेबाक मतलब ओ बुझलकै जे सभ दिन खस्सी कटबा कए सीरा खेनाइ आ बचला मासु नोकर सभ के देनाइ आ ओ सैह करए लागल।
२.द्वारपर ओ एकटा हाथी कीन कऽ रखबा देल आ चारि टा नोकर ओकर देखभाल ले राखि देलक।
३.ओ सभटा बैरक गाच्ह काटि कऽ हटा देलक।
४.ओ दू टा नोकर राखलक जे गाछ काटि कऽ जतऽ जतऽ राजा जाइत रहए ओतए-ओतए लऽ जाइत रहए।

एना किछु दिन ओ राजपाट चलेलक। एना करिते करिते राजपाट खतम भऽ रहल च्हलैक , कारण खर्चा बेसी भऽ गेलै आ आमदनी कम, सभ गाछ कटि गेलैक।
गामक एक बुजुर्ग सं ओ पुछलक जे हमर राजपाट किएक खतम भऽ रहल अछि। तं ओ बुजुर्ग ओकरा बुझेलक जे जाऊ आ तीन मूरी बला आदमी सं पुछू।
चारू तरफ राजा खोजलक मुदा तीन मूरी बला आदमी ओकरा नहि भेटलैक। फेर ओही आदमी सं पुछलक जझमरा तं तीन मूरी बला आदमी नहि भेटल।
बुजुर्ग कहलकै जे ७० बरख से ८० बरखक आदमी कें तीन मूरी बला कहल जाइत छैक कारण जे जखन ओ बैसै ये तं ओकर मूरी झुकि जाइ च्है आ घुटना ओपार उठि जाइ छैक आ से ओ तीन मूरी जकां भऽ जाइ छैक।
राजा एहेने एकटा मनुक्ख सं पुछलक।
“पिताजी मरए से पहिने की की बतेने रहथि”। ओ तीन मूरी बला मनुख पुछलक।
राजा कहलक।
“ओ बतेलथि-
१.फी कोरमे सीरा खाइले।
२.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले”।

“पहिलाक मतलब छी- एक पाव डेढ़का मांछ लऽ कऽ बनबा के खाउ ओकर सभ कौरमे सीरा भेटल।
दोसराक मतलब घूर लगा देबा लऽ जाहिसं द्वारपर हरदम १० गोटे बैसल रहत।
तेसर के मतलब झगड़ा-झांटि से दूर रहि दोस्ती मिलान सं रहए लेल।
चारिमक मतलब दू रुपैयाक छाता लऽ छाहमे चलब”। तीन मूरी बला मनुक्ख बतेलक।
एकरापर अमल केलापर ओकर राजपाट वापस आबए लगलैक।

9 comments:

  1. ई लोक कथा ठीके फील्डवर्कपर आधारित बुझना जाइत अछि से बेसी रमनगर।

    ब्लॉगक चतुर्दिक भविष्यक कामना।

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  2. उमेश कुमार महतो "वियोगी" जी मैथिल आर मिथिला (मैथिली ब्लॉग) पर अपनेक आगमनसँ बहुत ख़ुशी मिलल ! उम्मीद अछि अपनेक रचना निरंतर पाठकगन के बिच प्रस्तुत होइत रहत, संगे अपनेक बहादुरगंजक लोककथा बहुत निक लागल अहिना धुरझार लिखैत रहू !

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  3. bad nik lok katha, teen mooh bala aadamik varnan seho nik

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  4. thike bad nik, aa preeti ji thike kahlanhi ee field work par aadharit bujhna jait achhi

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  5. बुजुर्ग कहलकै जे ७० बरख से ८० बरखक आदमी कें तीन मूरी बला कहल जाइत छैक कारण जे जखन ओ बैसै ये तं ओकर मूरी झुकि जाइ च्है आ घुटना ओपार उठि जाइ छैक आ से ओ तीन मूरी जकां भऽ जाइ छैक।

    bah

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  6. khoob nik lagal, ehina likhait rahoo aa lok jivan ke bisray nahi diyauk

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  7. बड्ड नीक कथा लागल।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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