Saturday, November 01, 2008

सुभद्रा- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

सुभद्रा


सुरजक बाबुजीक मरलाक बाद ओकर माँ पागल भऽ गेलैक । बाटपर किछु-किछु बरबड़ाति रहैत छैक । सुरजक बहिन सुभद्रा सँ ओकर भौजी घरक सवटा काज करबऽबैत छैक । घरमे कपडा धोअ सँ लऽकऽ भोजन बनाबऽ तक आ बाहर खेत सँ खरिहान तकके काजकरऽ मे ओ एकोवेर नहि, नहि कहैत छैक । सुरजकेँ व्यपार पेशासँ सम्बन्धित होब केँ कारण सँ फुरसत तँ रहै नहि छनि मुदा जखन ओ घरपर अबैत छथि तँ सुरजक कनिया सुभद्राक बारेमे शिकायत करै छलीह जे उपराग लोक सुनबैयऽ आ से सब कहैत रहैत छलीह ।

एक दिन सुभद्राक सहेलीक दुरागमन रहैत छैक । सुभद्रा सबेरे घरक काज ओरियाकऽ अपनो तैयार होइयऽ । जखन सुभुद्रा दुरागमनमे जाएवाक लेल अपन भौजी सँ कहैय-

“भौजी !.... आजु मंजुक दुरागमन छैक । हम देख जाइत छी।”

भौजी मुँह ऐठकऽ जवाब दैछ-

“कोनो जरुरी नहि......... घरक काजसब करऽकेँ छै ।”

“नहि भौजी,........... हम त जाएब आ,...... घरक काज सब ओरिया लेने छिऐ ।”

“घरक काज जौ भऽ गेल छै त जाकऽ बारीमे पानी पटा दिअ ।”

"मंजुक दुरागमन फेर नहि होयतै । ताहि सँ हम जाइ छी ।”

एते कहिकऽ सुभद्रा आँगन सँ चलि दैअ ।

सुभद्रा त चलि जाइए । मुदा पाछासँ सुभद्राक भौजी कहिते रहि जाइछै–

“नइ छै जाएकेँ, ........सोइचलिअ !!!”

रातिमे जखन सुरज आँगन अबैयऽ त अविते नजरि चुल्हि पर पंरै छनि । ओतय चुल्हि फुटल आ बरतन सब ओङ्गघरायल रहैत छैक । ई देखि कय सुरज अपन कनियाकेँ बजबैत छथि-

“......गामबाली !! गामवाली !!”

सुरजक आवाज सुनिकऽ गामवाली घर सँ कुहरैत निकलैछै । गामवाली के देखि कए सुरज गामवाली सँ पुछैत अछि-

“ई........सब कि छै ? ....हँ.....।”

कुहरैत गामवाली जबाव दैछ “आहाके त किछ बुझले नहि रहययऽ,........ घरक वेटी विगैर गेल आ, आहा चिन्ते नहि करैछी।”

सुरज ई सुनिक फेर पुछैयऽ-

“.............ई अहाँ कि बजैछी ?”

“हँ हँ ईहे कहब कि, सुभद्रा दिनमे चारि-पाँच बेर खेत दिस जाइए । आ आब....... हमरा एना बुझाइए कि सुभद्रा क पेटमे केकरो.......”

ई सुनिक सुरज अपनाके रोक नइ सकैयऽ आ अपन गामवालीकेँ एक थापड़ मारि दैअ ।

फेर गामवाली कानिक कहैयऽ-

“आ.......... ई हे वात पुछली त .......हमरा पर हाथ उठौलक आ चूल्हि फोड़ि देलक ।”

सुरजकेँ अपन प्रतिष्ठाक चिन्ता लागि जाइत छैक । सुरज घरमे जाकए ओछायन पर बैसिकए लगैयऽ अपन प्रतिष्ठाकेँ बारेमे सोचय । कनिके वेर बाद सुभद्रा सेहो अबैयऽ । कोनो बेशी अबेर नइ भेल रहैछ । सुभद्रा डिवियाक तिलमिलाति इजोतमे भैयाकेँ देखिकय भैया लग जा कय पुछैयऽ–

“कि भेल भैया ?”

सुरज सुभद्राके एक थप्पर मारिकऽ घरमे पठा दैछ । सुरजके अपन प्रतिष्ठाक चिन्ता लगैछ हरान करऽ कनिक देरक बाद सुरज बाहर चलि जाइय । करिब बारह बजे रातिके बाद सुभद्राक कोठरीक केवार ढकढक होइछै । ई सुनिकऽ सुभद्राक मनमे ई होइछ जे भोजन करऽ लेल भैया जगाबय आएलनि । जखन सुभद्रा केबार खोलैछै कि एकटा मर्द ओकर मुह आ हाथ पकड़ि लै छै । आ फेर दुटा मर्द दुटा लाठी लऽकऽ घेउटके उपर निचा धकऽ दावि दैछै । सुभद्राकऽ घेघीयाति आवाज ओकर मा केँ कानमे परैतछै । । त बुढिया बाहर निकलिक हल्ला करऽ लगैछै-

“बाबु सब हो बाबु सब................हमर बेटीके मारैय हो....बाबु सब ।”

मुदा पागल बुढियाके बात केओ नहि सुनैय । आ, सुभद्राक लाश के सबगोटा नदि किनार लऽकऽ जराबऽ जाइछै ।

नदिपर पहुँचि कए ओहिमे सँ एक आदमी कहैत छैक-

“एकर पेट चिरि कऽ देख । कही...... सुरजा झुठ तँ नहि कहलकौ ।”

सुभद्राके मरला बादो ई सब सुख नहि दै छैक । पेट चिरकऽ देखैछैक । मुदा ओकरा पेटमे खएला खाना छोड़ि कय किछ नई भेटैछै । ओ फेर कहैय-

“साह्,....... वौह के वातपर होतै मरबौने होतै ।”

दोसर कहैय-

“हो........अपनासबके कथी लगैछौ ।”

पहिले वाला आदमी कहैय-

“एकर हाथपैर काटि नदैछी नहि त.....भुत भ हरान करतै ।”

हाथ पैर काटिकऽ ओकरा जरादैत छै । आ, भोर होइत–होइत सुभद्रा नामक इतिहास बनि जाइत अछि । आब ई वात गाम मे एक कान सँ दोसर कान आ दोसर सँ मैदान भ जाइछ । गाममे पुलिस अबैय । सहरजमिनमे ई प्रमाणित सेहो भऽ जाइछ जे सुरज अपन बहिनके मरबौलक। सुरज के अदालत २० वर्षक जेल सजाय दैत अछि ।
सुरजकें जेल गेलाक बाद गामवालीके मनमोजी भऽ जाईछ । जे मनमे अबैछ से करैय ।

सुरजके स्वभाव के कारण सँ १५ वर्षमे बाँकी सजाय माफ भ जाइछ । सुरज अपन गाम पहुँचैत छैक ।ओना समय त बड बदलि गेल रहैछ । गामक ईनार भसि गेल रहैछ । बहुतो गाछ सुखि गेल रहैछ । आ लोक सबहक आदत सेहो ।

अपन आँगनमे पहुचते देखैयऽ घरमे सँऽ एकटा मर्द हसिते निकलैय आ वैके पाछा ओकर गामवाली सेहो । सुरजके देखिते ओ मर्द त टाटके दोग दने भागि जाइयऽ । सुरजके बितल बात अखनो यादे रहैछै जे गामबालीके कहला पर गंगा सन पबित्र बहिनके मारि दैछ । ई सब ध्यानमे अबित सुरज आगनमे धएल हासुल लऽ कऽ अपन गामवाली केँ गरदनि काटिकऽ फेर थाना जा कए हाजिर भऽजाइछै ।

7 comments:

  1. nik, muda katha me kanek philmi rang achhi je maithilik aan blog ker katha me seho dekhba me abait acchi, muda kanek prayas se nik prastuti bha sakai achhi.

    kahanik samapti kanek harabari me bhay gel,

    ona pratibha me kono kami nahi.

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  2. santosh ji, ahank pratibhak mutabik ee katha kanek halluk lagal,

    kanek regional touch ker begarta seho hamra bujhayal.

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  3. santosh ji pahine ahan kathmandu se chhi se ee blog me ahank rachna dekhi harshit bhel, rachna seho nik lagal.

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  4. nik, muda lagait achhi bina revision ke ek draft me likhal gel achhi, se kichhu tham tartamya garbara rahal achhi.

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  5. rachna me kaphi sudhar achhi, internet par maithili padhbak mauka bheti rahal achhi saih uplabdhi achhi.

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  6. santosh bhaiya, ahank ela se ee blog aar sundar bhe gel, jitu ji blog ke design seho sundar bana delani, rachnak te bharmar laga delani, dunu gote ke dhanyavad

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  7. इंटरनेटपर रंगबिरंगक रचना देखि मैथिलीमे लिखबा के सख हमरो भ गेल। बड्ड नीक संतोषजी, कथामे कसावट कनी चाही मुदा तैयो नीक।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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