Saturday, November 29, 2008

1. दही चूडा चीनी- हरिमोहन झा 2. बाजि गेल रनडंक-श्री आरसी प्रसाद सिंह 3.तारानंद वियोगी-नन्दीग्रामपर पंचक

1. दही चूडा चीनी
हरिमोहन झा
दही चूड़ा चीनी
खट्टर कका दलान पर बैसल भाङ घाटैत छलाह । हमरा अबैत देखि बजलाह— हाँ...हाँ....ओम्हर मरचाइ रोपल छैक, घूमि कऽ आबह ।
हम कहलिऐन्ह।— खट्टर कका, आइ जयवारी भोज छैक, सैह सूचित करय आयल छी ।
खट्टर कका पुलकित होइत बजलाह...बाह बाह ! तखन सोझे चलि आबह । दु एकटा धङ्घेबे करतैक त की हैतैक ? ...हँ, भोजमे हैतैक की सभ ?
हम—दही चूडा चीनी ।
खट्टर कका— बस, बस, बस । सृष्टिगमे सभ सँ उत्कृ ष्टू पदार्थ यैह थीक । गोरसमे सभ सँ माँगलिक वस्तु— दही, अन्न मे सभक चूडामणि—चूडा, मधुरमे सभक मूल—चीनी । एहि तीनूक सँयोग बूझह तै त्रिवेणी—सँगम थीक । हमरा त त्रिलोकक आनन्दभ एहिमे बूझि पडैत अछि । चूडा...भूलोक, दही...भुवर्लोक, आ चीनी...स्वकर्लोक ।
हम देखल जे खट्टर कका एखन तरंगमे छथि । सभटा अद्भुते बजताह । अतएव काज अछैतो गप्पज सुनबाक लोभें बैसि गेलहुँ ।
खट्टर कका बजलाह— हम त बु झै छी जे एही भोजन सँ साँख्यक दर्शनक उत्पत्ति भेल अछि ।
हम चकित होइत पुछलिऐन्हु—ऐं ! दही चूडा चीनीसँ साँख्य दर्शन ! से कोना ?
खट्टर कका बजलाह...एखन कोनो हडबडी त ने छौह ? तखन बैसि जाह । हमर विश्वास अछि कपिल मुनि दही चूडा चीनीक अनुभव पर तीनू गुणक वर्णन कऽ गेल छथि । दही...सत्वकगुण, चूडा...तमोगुण, चीनी...रजोगुण ।
हम कहलियन्हि—खट्टर कका, अहाँक त सभटा कथा अद्भुते होइत अछि । ई हम कतह नहि सुनने छलहुँ ।
खट्टर कका बजलाह— हमर कोन बात एहन होइ अछि ने तों आनठाम सुनि सकबह ?
हम— खट्टर कका, त्रिगुणक अर्थ दही चूडा चीनी, से कोना बहार कैलियैक ?
खट्टर कका—देखह, असल तत्व दहिएमे रहैत छैक, तैं एकर नाम सत्व । चीनी गर्दा होइछ, तैं रज । चूडा रुक्षतम होइछ, तैं तम । देखै छह नहि, अपना देशमे एखन धरि “तमहा” चूडा शब्द प्रचलित अछि ।
हम—आश्चर्य ! एहि दिस हमर ध्यान नहि गेल छल ।
खट्टर कका व्याख्या करैत बजलाह—देखह, तमक अर्थ छैक अन्धकार । तैं छुच्छ चूडा पात पर रहने आँखिक आगाँ अन्हार भऽ जाइ छैक । जखन उज्जर दही ओहि पर पडि जाइ छैक तखन प्रकाशक उदय होइ छैक । तैं सत्व गुण कें प्रकाशक कहल गेलैक अछि । “सत्वं लघु प्रकाशकमिष्टम्” । तैं दही लघुपाकी तथा सभ कैं इष्टओ (प्रियगर) होइत अछि । चूडा कोष्ठघ कैं बान्हि् दैत छैक । तैं तम कैं अवरोधक कहल गेल छैक । और बिना रजोगुणे त क्रियाक प्रवर्तन हो नहि । तैं चीनीक योग बेत्रेक खाली चूडा दही नहि घोंटा सकैत छैक । आब बुझलहक ?
हम कहलिऐन्ह — धन्य छी खट्टर कका । अहाँ जे ने सिद्ध कऽ दी !
खट्टर कका बजलाह—देखह, साँख्यक मतसँ प्रथम विकार होइ छैक महत् वा बुद्धि । दहि चूडा चीनी खैला उत्तर पेटमे फूलि कय पसरैत छैक । यैह महत् अवस्था थिकैक । एहि अवस्थामे गप्प खूब फुरैत छैक । तैं महत् कहू वा बुद्धि...बात एक्के थिकैक । परन्तु एकरा हेतु सत्व गुणक आधिक्य होमक चाही अर्थात दही बेशी होमक चाही ।
हम—अहा ! साँख्य दर्शनक एहन तत्व् दोसर के कहि सकैत अछि ।
खट्टर कका बजलाह—यदि एहिना निमन्त्रण दैत रहह त क्रमशः सभ दर्शनक तत्व वुझा देवौह । त्रिगुणत्मिवका प्रकृति द्रष्टी पुरुष कैं रिझबैत छथि । एकर अर्थ जे ई त्रिगुणत्मवक भोजन भोक्ता पुरुष कैं नचवैत तथि । तैं—नृत्यकन्तिभोजनैर्विप्राः ।
हम कहलियन्हि—परन्तु् खट्टर कका ! पछिमाहा सभ त दही चूडा चीनी पर हँसैत छथि ।
खट्टर कका अङपोछा सँ भाँग छनैत बजलाह—हौ, सातु लिट्टी खैनिहार दधि—चिपटान्न क सौरभ की बुझताह ! पच्छिमक जेहन माटि बज्जर, तेहने अन्न बजरा, तेहने लोको बज्र सन । अपना देहक भूमि सरस, भोजन सरस, लोको सरस । चूडा पृथ्वी तत्वे...दही जल तत्व...चीनी अग्नि तत्व । तैं कफ पित्त वायु—तीनू दोष कैं शमन करबाक सामर्थ्य एहिमे छैक । देखह, अनादि काल सँ दही चूडा चीनीक सेवन करैत—करैत हमरा लोकनिक शोणित ठण्ढा भऽ गेल अछि । तैं मैथिल जाति कैं आइ धरि कहियो युद्ध करैत देखलहक अछि ?
हम— खट्टर कका, कहाँ सँ कहाँ शह चला देलहुँ । बीच—बीचमे तेहन मार्मिक व्यंग्य कऽ दैत छिऐक जे...
खट्टर कका—व्यंग्य नहि, यथार्थे कहैत छिऔह । देखह, भोजने सँ प्रकृति बनैत छैक । चाली माटि खा कऽ माटि भेल रहैत अछि । साँप बसात पीवि कऽ फनकैत अछि । साहेब सभ डवल रोटी खा कऽ फूलल रहैत अछि । मुर्गा खैनिहार मुर्गा जकाँ लडैत अछि । और हम सभ साग—भाँटा खा कऽ साग—भाँटा भेल छी । हमरा लोकनि भक्त (भात)क प्रेमी थिकहुँ, तैं एक दोसरा सँ विभक्त रहैत छी । ताहु पर की त द्विदल (दालि)क योग भेले ताकय ! तखन एक दल भऽ कऽ कोना रहि सकैत छी ?
हम—अहा ! की अलंकारक छटा !
खट्टर कका—केवल अलँकारे नहि, विज्ञानो छैक । कोनो जातिक स्विभाव बुझबाक हो त देखी जे ओकर सभ सँ प्रिय भोजन की थिकैक ? देखह, बँगाली ओ पच्छाँ हीक स्वभावमे की अन्तर छैक ?...जैह भेद रसगुल्ला ओ लड्डुमे छैक । रसगुल्ला‍ सरस ओ कोमल होइछ, लड्डू शुष्क। ओ कठोर । रसगुल्लाल पूर्वक प्रतीक थीक, लड्डू पश्चिामक । तैं हम कहैत छिऔह जे ककरो जातीय चरित्र बुझवाक हो त ओकर प्रधान मधुर देखी ।
हम— खट्टर कका, अपना सभक प्रधान मधुर की थीक ?
खट्टर कका—अपना सभक प्रधान मधुर थीक खाजा । देहातमे मिठाइ कहने ओकरे बोध होइछ । खाजा ने रसगुल्ला जकाँ स्निग्ध होइछ, ने लड्डू जकाँ ठोस । तैं हमरा लोकनिमे ने बँगालीवला स्नेह अछि, ने पंजाबीवला दृढता ...तखन खाजामे प्रत्येक परत फराक—फराक रहैत छैक, से अपनो सभमे रहितहि अछि ।
हम—वाह ! ई त चमत्कािरक गप्प कहल ! मौलिक !
खट्टर कका—ऐंठ वा बासि बात हम बजितहिं ने छी ।
हम—वास्तवमे खट्टर कका ! अहाँ ठीक कहै छी । गाम—गाममे गोलैसी, घर—घरमे पट्टीदारी झगडा । कचहरीमे पागे पाग देखाइत अछि । से किऐक ?
खट्टर कका—एकर कारण जे हमरा लोकनि आमिल मरचाइ बेसी खाइत छी । तीख चोख भेले ताकय । तीतोमे कम रुचि नहि । नीम—भाँटा, करैल, पटुआक झोर... हौ, जैह गुण कारणमे हतैक सैह ने कार्यमे प्रकट हैतैक ! कटुता, अम्लता ओ तिक्ताता हमरा लोकनिक अंग बनि गेल अछि । स्वाइत हम सभ अपनामे एतेक कटाउझ करैत छी !
हम—परन्तु बंगाली सभमे एतेक प्रेम किऐक ?
खट्टर कका भाँगमे एक आँजुर चीनी मिलबैत बजलाह—ओ सभ प्रत्येक वस्तु मे मधुरक योग दैत छथि । दालिओ मीठ, तरकारिओ मीठ, माछो मीठ, चटनिओ मीठ ! तखन कोना ने माधुर्य रहतन्हि ? अपनो जातिमे एहिना मीठक व्युवहार होमऽ लागय तखन ने ! तैं हम कहैत छिऔह जे अपना जातिमे जौं सँगठन करबाक हो त मधुरक बेसी प्रचार करह । केवल सभा कैने की हैतौह ? —“भोज ने भात ने, हरहर गीत !“गाम सँ दुगोला दूर करबाक हो त “दही चूडा चीनी लवण कदली लड्डू बरफी”क भोज करह ।
ई कहि खट्टर कका भाङ्गक लोटा उठौलन्हि और दू—चारि बुँद शिवजीक नाम पर छीटि घट्टघट्ट कय सभटा पीबि गेलाह ।


2. बाजि गेल रनडँक
श्री आरसी प्रसाद सिंह
बाजि गेल रनडँक, डँक ललकारि रहल अछि
गरजि—गरजि कै जन जन केँ परचारि रहल अछि
तरुण स्विदेशक की आबहुँ रहबें तों बैसल
आँखि फोल, दुर्मंद दानव कोनटा लग पैसल
कोशी—कमला उमडि रहल, कल्लोोल करै अछि
के रोकत ई बाढि, ककर सामर्थ्यल अडै अछि
स्वीर्ग देवता क्षुब्धँ, राज—सिंहासन गेलै
मत्त भेल गजराज, पीठ लागल अछि म�ोलै
चलि नहि सकतै आब सवारी हौदा कसि कै
ई अरदराक मेघ ने मानत, रहत बरसि कै
एक बेरि बस देल जखन कटिबद्ध “चुनौती”
फेर आब के घूरि तकै अछि साँठक पौती ?
आबहुँ की रहतीह मैथिली बनल—बन्दिगनी ?
तरुक छाह मे बनि उदासिनी जनक—नन्दिुनी
डँक बाजि गेल, आगि लँक मे लागि रहल अछि
अभिनव विद्यापतिक भवानि जागि रहल अछि

3
तारानंद वियोगी

नंदीग्राम पर पंचक
एक

जनता जागल भूमि लए
बाजि रहल दू टूक
जनवादी के हाथ मे
एम्हदर छैन्ह बंदूक

एम्हदर छैन्ह बंदूक
दनादन गोली मारथि
टाटा बिड़ला के खड्ढा मे
जन के गाड़थि

जे छल जनता केर पहरुआ
सैह अधक्की भेल
सोभथि श्री बुशराज मुकुटमणि
देश भांड़ मे गेल

दू

जे जनता के गठित क'
बनल छलाह बदशाह
सएह कहै छथ‍ि कुपित भ'
जनता बड तमसाह

जनता बड तमसाह
सुनए नहि एको बतिया
बुश केर की छैन्हय दोख
एतुक लोके झंझटिया

छलहा मार्क्सझ के प्रबल प्रबंधक
आब बजाबथि झालि
आबह राजा तंत्र संभारह
गां मे रान्ह्' दालि

तीन

गां मे लोकक खेत अछि
खेते थिक अवलंब
सएह कहै छथि बादशाह
छोड़ै जन अविलंब

छोड़ै जन अविलंब
कंपनीक बैरक आबै
अपन मजूरी पाबि
देस के मान बढाबै

एहन देस ओ बनत
जतक जनता होअए नि:स्वोत्व
संसद बौक बनल अछि देखू
राजनीति के तत्वि

चारि

लोक छलिए चुप आइ धरि
देखि रहल छल खेल
जनता के जे रहए आप्तआ जन
सएह गिरह कट भेल

सएह गिरहकट भेल
आब ओ मैल छोड़ाओत
छोड़त ने क्योा खेत
भने सब प्राण गमाओत

टाटा बिड़ला के बस्तीय मे
जनता ने क्योक हएत
जे बसतै से कुली कबाड़ी
देस बेच क' खएत

पांच

सएह कहै छी
सुनह वियोगी
बूझह की थिक 'सेज'
तों छह ककरा पक्ष मे
गांधी कि अंगरेज

गांधी आ अंगरेज दुनू मे
बाझल झगड़ा
निर्दय नइ झट हएत
बुझाइ-ए जोड़ा तगड़ा

बचत कोना क' लोक
भूमि, से सएह झकै छी
गांधी आ अंगरेज एतहु छथ‍ि
साफ देखय छी।

4 comments:

  1. बड्ड नीक, हरिमोहन झा आ आरसी प्रसाद सिंह जीक रचना एके संगे पढ़लहुं।

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  2. nik prastuti lagal,
    ee ardarak megh ne manat rahat barasi ke, bah aarsi babu

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  3. प्रस्तुतिक कतबो प्रशंसा कएल जाए कम

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...