Saturday, October 25, 2008

एकटा ब्यथा पत्रमे - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एकटा ब्यथा पत्रमे

आदरणीय गुरुवरप्रणाम । अहाँक आर्शीवाद छैक हम शारीरिक रुपसँ स्वस्थ छी । आइ जीवनमे पहिलबेर अहाँक लेल एकटा पत्र लिखबाक मोन करैए । जखन कि हमरा बड़ निक जकाँ बुझल अछि जे अहाँ हमरासँ एते दूर छी जे ई पत्र पहूँचऽ के बाते नहि । मुदा हम अप्पन मोनके बुझाबऽ के प्रयास कऽ रहल छी । एखन निश्बद्ध राति छै । सब गोटे सुति रहल छैक । आ हमरा निन्न नहि आबि रहल अछि माय। हम कोठरीसँ बाहर निकलल छलहुँ । अकाशक तारा आपसमे आँखि झिमकौअल खेल रहल छैक । आ, चन्द्रमा त अप्पन रुपक बजार पसारने छैहे । बाहर कुकुर सेहो आन दिनक अपेक्षा बेसी भुकि रहल छैक । आ कुकुर नढ़ियाक आवाज सुनिकऽ हमरा एते डर लागल जे हम फेर घरेमे आबि कऽ बैसि गेलहुँ ...... आ समय किछु कटा जाए से सोचिकऽ ई पत्र अपनेके नाम लिखऽ के प्रयास कऽ रहल छी । नहि जानि आइ किए नहि किए हमरा निन्न नहि परि रहल अछि । दिन भरिके सोंच एकटा घुटन बनि गेल अछि । ...... नहि जानि एखन कि–कहाँक बात हमरा मोनमे आबि रहल अछि । आ, फेर बेर–बेर हमरा एकहि बात मोन परैए– जहिया हम गाम आएल रही त मोने मन सोंचने छलौ जे आबऽ के खबर सुनि काका–काकी आ, पड़ोशी सभ भेटत । समय सभ ठामक बदलि गेलाक बाबजुदो ओहे पुरान यादके ताजा कऽकऽ सुख–दुःख बाँटव, गाँममे खुशियाली होएतै । मुदा जखन हम केवार ढकढकएने रही— त माय खोललखिन । बाबूजीके खोकीके आवाज मद्धिम–मद्धिम अबैत रहै । आंगन आ असोरा खढ़–पतार आ गर्दासँ भरल रहैक । सन्दुक, अनवारी आ पेटी संगहि सब सरसमान अस्त–ब्यस्त परल रहैक । आ, देवालक स्थिति देखकऽ अनुभव भेल छल जेना कोनो भूत बंगला ।
बाबूजीक देह त एहि बेर पहिलेके तुलनामे आधा भऽ गेल छलनि । बुझाए जेना मात्र हड्डी । हम जखन पएर छुकऽ प्रणाम कैलियनि त हकहकाति कहलैथ –

"के ? ........ बौआ, खुश रहा । "

आन बेर जकाँ एहि बेर हुनका चेहरा पर नहि त खुशीक रोशनी छलनि आ नहि त ममता । माय पिढ़ी लऽ कऽ बैसि गेलखिन । घरक सब बस्तु पर नजरि गड़ौलहुँ फेर माय आ बाबूजीक मुँहपर तकलहुँ । देखकऽ अनुभव भेल जेना ई अप्पन घरे नहि । ओहि घरक सुनापन देखिकऽ हमरो मोनमे डर लागल रहए । ओही घरक चारु दिशसँ मृत्युक कारी छाँही, श्मशानसँ बेशी चुप्पी आ बिधवाक आँखिक नोरक ब्यथा नुकाएल छलैक । घरमे मुर्दाक बसेरा बुझाए परइ । एतऽ जिनगी सभ दिनक लेल सुति रहल बुझाइ । एतऽ कखनो कुकुरके कानल आवाज त कखनो नढ़ियाक आवाज सुनाइ परै । एहन हमर घर त नहि रहे जेहन एखन लागि रहल अछि । जाहि घरमे हमर हंसीके अवाज गुन्जैत रहै छलैक आइ ओहि घरमे हम कानियों नहि सकै छी । घरक कण–कणमे जीवनक मुस्की रहै ..... मुदा ई ओ घर नहि अछि । माय–बाबूजी मात्र हमर मुँह तकैत रहथि । आ, आँखिमे सँ गंगाजी बहैत रहै । कनिक देर हमहुँ बाबूजीक कातमे बैसि गेली । किछु महक संड़ल जकाँ सेहो अनुभव होए । ई सभ देखिकऽ मोने मन होबऽ लागल जे ई मोटाएल देह ककरो नहि देखाबी । हम खाट परसँ उठि गेली । देवालपर जे घड़ी लटकाओल रहै ओकरो अवाज एनाक टकटक अबै जे सुनिकऽ आओर डर लगै । ओतऽ बैसले–बैसल आओर पुरान बात सभ हमरा दिमाग पर नाचऽ लागल । गामसँ शहर हम किछु आर्जन करऽ गेल रही । बेरोजगारीक समस्या त कतऽ नहि छैक मुदा ई किछु आतंककारी लोभी पार्टी सब देशके सत्यानास कऽ कऽ बैसल छैक । मुदा तैयो, जे काज जतबे दिन लेल भेटै ओ करी आ, संगी सभसं नुकाकऽ जतबे बचै ओ नुकाकऽ राखी । सभ दिन गाम मोन परए । आ, गामक मोन परिते माय–बाबूजी आँखिक सामने भऽ जाथिन । बाबूजीक धोती आ मायक नुआ जे मोन परे त अपनेसँ लाज लागि जाए । अप्पन जवानीमे ओ सभ कहियो दुःख नहि कटलनि । चाहे अठारह बिगहा बिका गेलनि त कि ? आब त रहऽ लेल मात्र घर । .... जा मुदा ओ कहाँ छै ? ओकरा त हम तकबो नहि कैलिए— जेकरा हाथसँ मेहदीक रंग मेटाएलो नहि रहै आ हम छोड़िकऽ चलि गेलिए । हमरा हमर प्राणप्रिय पर ध्यान जाइते हम छटपटा गेलहुँ । लगलहुँ आगु–पाछु, एमहर–ओमहर देखऽ । हम त अग्निक साक्षि मानि सात फेरा लगौने रही । लोह, पाथर, पानि आ आगि छुकऽ सप्पत लेने रही । ओ कहाँ छथि ? फेर, हमर नजरि हुनकापर पड़ल । ओ त ओहे नुआ पहिरने छथि जे दुरागमनमे पहिरने रहथि । हुनका देखिकऽ बुझाए परे जेना ओ आगु आबिकऽ पाछु चलि जाथि । हमरा एहने बुझाए जे ओ हमरा बजारहल छथि । स्वभाविक छैक । नव कनिञा, आ सासु–ससुर एतऽ बैसल । केना अएतै । लाजो लागऽके त स्वभाविके छैक । हम एकदमे स्थिरसँ हुनका दिश बढ़ऽलिऐ ।

मुदा, जखने ओहि घरमे पैसली त एकबेर बड़ जोरसँ इजोत बड़लै । आ, फेर अन्हार । हम अप्पन प्राणप्रिय जीवन संगीनिके ताकि रहल छी । हमरा पएरमे किछु गुजगुज जकाँ सटल । हमरा जेबमे लाइटर रहे । निकालिकऽ बारलहुँ .. ईजोत होइते देखलहुँ ... माय, ... बाबुजी, .... आ हमर ओ सेहो सभ एतऽ । निचा बैसिकऽ देखलहुँ ........... सबहे गोटा एकही ठाँम सुतल । जखन छुकऽ देखलहुँ त सबहे गोटा मरि गेल रहै । हमरा छुकऽ देखला बादो विश्वास नहि भेल आ हम जल्दीसँ बाहर निकललहुँ । बाहर त केओ नहि । त फेर ओ सभ के छलै ? फेर भितर आबिकऽ देखलिए त कनिञाक पेट चिरल आ अतरी बाहर निकलल, बाबुजीक आँगुर काटल, मायके हाथ–पएर डोरीसँ बान्हल । कि एहने होबऽचाही । सबहे लासमे किरा फरि गेल रहै । एत जिवन बड कठिन छैक । एतऽ जीवऽके लेल अपनेक आशीर्वादक आवश्यकता अछि । ई गाम हमरो छोड़िकऽ जाए परत या त फेर हमरो मारिदेत से धरि ठेकान नहि छैक । बिशेष कि लिखु ।

अहाँक शिष्य
सन्तोष

4 comments:

  1. patra shaili me nik rachna,

    ona kanek patra ke paigh kay pharichha kay kahal ja sakait chhalau,

    nik prastuti.

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  2. patra shailik nik prayog muda vaih eketa kami achhi, aa se achhi shailigat, pharichha kay likhu santosh ji sabhta thik bha jayat.

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  3. santosh ji pahine ahan kathmandu se chhi se ee blog me ahank rachna dekhi harshit bhel, rachna seho nik lagal.

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  4. इंटरनेटपर रंगबिरंगक रचना देखि मैथिलीमे लिखबा के सख हमरो भ गेल। बड्ड नीक संतोषजी, कथामे कसावट कनी चाही मुदा तैयो नीक।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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