Saturday, October 18, 2008

बीस टका सुईद (व्याजक) संग - मदन कुमार ठाकुर

ई चुटकुला मुसाय बाबाक सन्दर्भसँ लेल गेल अछि ! ओना तs बाबाक समाजक प्रति अनेको उपकार छन्हि ताहिमे एक - दोसराक प्रति परोपकार सेहो बही - खातामे लिखल गेल छनि ! मुसाय बाबाक १ अगस्त २००३ कs देहवासन भs गेलन्हि मुदा हुनकर कृति एखनो धरी समाजमे व्याप्त अछि ! बाबाकेँ धन - सम्पति अपार छलनि ताहिसँ समाजमे मान-मर्जादा बहुत निक भेटैत छलनि ! दस बीस कोससँ लोक सभ मुसाय बाबासँ सुईद (व्याज) पर पाई लैक लेल आबैत छल ! कतेको ठिकेदार कतेको महाजन सभ हुनक दालानपर बैसल रहैत छलनि !



एक बेर मुसहरबा भाइ सेहो अपन विवाहक लेल मुसाय बाबासँ बीस (२०)गो टका लेने छल ! मुसहरबा भाइ बाबाक खास नोकर छलाह तs ओकरा मुसाय बाबा कहलखिन हे मुसहरबा भाइ हम जे तोरा २०गो टका देलियो से हमरा कहिया देबह? मुसहरबा भाइ बाबासँ कहलकनि जे मालिक हम तँ बीस गो टका सुईद (व्याजक) साथ दऽ देने छी ! अहि बातपर दुनू आदमीकेँ आपसमे बहस चलय लगलनि, बहुत हद तक झगड़ा आगू बढ़ि गेल !
ताबे मे किम्हरोसँ कारी बाबु एलथि. कहलखिन- " यौ। अहाँ दुनू आदमीक आपसमे किएक झगड़ा भs रहल अछि "!

मुसाय बाबा सभ बात कारी बाबुकेँ कहलखिन आर मुसहरबा भाइ सेहो सभ बात कारी बाबुकेँ सुनेलखिन्ह ! तखन कारी बाबु कहलखिन- " हे मुसहरबा भाइ । अहाँ हिनका कखन - कखन आर कोना पाइ देलियनि से हमरा कहू ........




मुसहरबा भाइ बजलाह - " सुनू कारी बाबु, आ मुसाय बाबू अहूँ ध्यान राखब हमर कतय गलती अछि ?



हमरा लग अपनेक टका छल बीस (२०)

आहाँ आँखी गुरारीकेँ तकलहुँ हमरा दिस

एक टका तखने देलहुँ .........



टका बचल उनैस (१९)

अहाँ कहलहुँ अही ठाम बैस

एक टका तखने देलहुँ ......



टका बचल अठारह (१८)

आहाँ लागलहुँ हमरा जोर सँ धखारह

एक टका तखने देलहुँ ......



टका बचल सतरह (१७)

आहाँ लागलहुँ हमरा जखन तखन तंग करह

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल सोलह (१६)

आहाँ लागलहुँ हमर पोल खोलह

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल पंद्रह (१५)

आहाँ लागलहुँ हमरा टांग गरैरकऽ पकरह

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल चौदह (१४)

आहाँ लागलहुँ हमरा घर पर पहुँचह

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल तेरह (१३)

आहाँ लागलहुँ हमर रस्ता घेरह

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल बारह (१२)

आहाँ लागलहुँ हमरा लाठीसँ मारह

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल एगारह (११)

आहाँ लागलो हमर कुर्ता फारह

एक टका तखने देलहुँ ......



टका बचल दस (१०)

अहाँ कहलहुँ हमरा जमीन पर बस

एक टका तखने देलहुँ ......



टका बचल नौउह (९)

आहाँ कहलहुँ हमरा ओहिठाम नोकर बनिरह

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल आठ (८)

आहाँ घोरैत छलहुँ खाट

एक टका तखने देलहुँ ....



टका बचल सात (७)

आहाँ खाइत छलहुँ नून भात

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल छः (६)

आहाँ उपारैत छलहुँ जौ

एक टका तखने देलहुँ ....



टका बचल पॉँच (५)

आहाँ देखैत छलहुँ चौकी तोर नाच

एक टका तखने देलहुँ......



टका बचल चारि (४)

आहाँक सभ भाई मे बाझल मारि

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल तीन (३)

आहाँ सभ भाई भेलहुँ भीन

एक टका तखने देलहुँ .....



टका बचल दू (२)

आहाँ कहलहुँ महादेवक पिड़ी छू

एक टका तखने देलहुँ ......



टका बचल एक (१)

आहाँ के बाबूजीक बरखी मे दक्षिणा देल

एक टका तखने देलहुँ ......



बाँकी के बचल सुईद आर व्याज ओहिमे देलहुँ ढाई मोन प्याज ॥"

जय मैथिली, जय मिथिला

मदन कुमार ठाकुर, कोठिया पट्टीटोला, झंझारपुर (मधुबनी) बिहार - ८४७४०४, मोबाईल +919312460150 , ईमेल - madanjagdamba@rediffmail.com

13 comments:

  1. बहुत दिनपर अएलहुँ मदनजी मुदा अपन धुरझार लेखनीसँ झुमा देलहुँ।

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  2. madanji, etek din par elahu, muda etek nik rachna la kay se sabh ta deri maph achi, pichla ber je ek gote sajjan poorvagrahgrast bhay tippani kayne rahathi taahi dvare te ee vilamb nahi bhel, muda jitu bhaiyak javabak bad ehi blog par tippani nahi karabak bat kahi gelah. se nik rahal muda sajjan aadati se lachar chhathi, se nam badali kay ebe ta kartah aa rachna dekhi tarhatti par angor rakhbak ehsas se pajrait rahtah,
    muda ahan jaldi-jaldi post karait rahu nahi te shadyantrakari sabh apan uddeshya me saphal bha jetah.

    diyabatik shubhkamna, samast mithilaaurmaithil parivar ke.

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  3. हमरा लग अपनेक टका छल बीस (२०)
    आहाँ आँखी गुरारीकेँ तकलहुँ हमरा दिस
    एक टका तखने देलहुँ .........

    टका बचल उनैस (१९)
    अहाँ कहलहुँ अही ठाम बैस
    एक टका तखने देलहुँ ......

    टका बचल अठारह (१८)
    आहाँ लागलहुँ हमरा जोर सँ धखारह
    एक टका तखने देलहुँ ......

    टका बचल सतरह (१७)
    आहाँ लागलहुँ हमरा जखन तखन तंग करह
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल सोलह (१६)
    आहाँ लागलहुँ हमर पोल खोलह
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल पंद्रह (१५)
    आहाँ लागलहुँ हमरा टांग गरैरकऽ पकरह
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल चौदह (१४)
    आहाँ लागलहुँ हमरा घर पर पहुँचह
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल तेरह (१३)
    आहाँ लागलहुँ हमर रस्ता घेरह
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल बारह (१२)
    आहाँ लागलहुँ हमरा लाठीसँ मारह
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल एगारह (११)
    आहाँ लागलो हमर कुर्ता फारह
    एक टका तखने देलहुँ ......

    टका बचल दस (१०)
    अहाँ कहलहुँ हमरा जमीन पर बस
    एक टका तखने देलहुँ ......

    टका बचल नौउह (९)
    आहाँ कहलहुँ हमरा ओहिठाम नोकर बनिरह
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल आठ (८)
    आहाँ घोरैत छलहुँ खाट
    एक टका तखने देलहुँ ....

    टका बचल सात (७)
    आहाँ खाइत छलहुँ नून भात
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल छः (६)
    आहाँ उपारैत छलहुँ जौ
    एक टका तखने देलहुँ ....

    टका बचल पॉँच (५)
    आहाँ देखैत छलहुँ चौकी तोर नाच
    एक टका तखने देलहुँ......

    टका बचल चारि (४)
    आहाँक सभ भाई मे बाझल मारि
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल तीन (३)
    आहाँ सभ भाई भेलहुँ भीन
    एक टका तखने देलहुँ .....

    टका बचल दू (२)
    आहाँ कहलहुँ महादेवक पिड़ी छू
    एक टका तखने देलहुँ ......

    टका बचल एक (१)
    आहाँ के बाबूजीक बरखी मे दक्षिणा देल
    एक टका तखने देलहुँ ......
    bad nik

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  4. katay nukayal chhalah etek nik rachna lay ke madanji, jaldi-jaldi aar rachna post karoo.

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  5. मदनजी अपनेक रचनाक सभ मिथिला बंधूगन कs बेसब्री सँ इंतजार रहैत छैन संग - संग हमरो, उम्मीद अछि अपनेक अगला रचना हमरा जल्दिये प्राप्त हेत ........

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  6. Madan babu aha ke kavita padhi ke atek gudgudi lagal jakra sabd me barnan kenay sambhabh nahi. dhanyabad

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  7. अहाँ लग ते लोक कथा/ गीतक भंडार बुझना जाइत अछि, मोन पारि कए जे एहिना हमरा लोकनिक लेल अनैत रहब ते बड्ड उपकार होयत मदन जी।
    ई रचना अपन माटि-पानिसँ जुड़ल एकटा उत्कृष्ट रचना अछि।

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  8. pet phula delahu ahan madan ji, hasi rukite nahi achhi.

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  9. ee blog samanya aa gambhir dunu tarahak pathakak lel achhi, maithilik bahut paigh seva ahan lokani kay rahal chhi, takar jatek charchaa hoy se kam achhi.

    dr palan jha

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  10. अपने लोकनिक कोटि कोटि धन्यवाद अहिना लेखकगन केs प्रोत्साहित करेत रहब ......

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  11. मदन जी बहुत निक चुटकुला अछी अहिना लिखैत रहु और मिथिला के पाठक गन के खुशि केने रहु आ अपन नाम रोशन करैत रहु
    जय मैथिल जय मिथिला

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  12. बहुत - बहुत धन्यवाद पाठक गन के जे ओ अपन किमती व्क्त हमर रचना में देलैन , हम अपनेक सबक के अभारी छी -----
    जय मैथिल जय मिथिला

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  13. Anonymous6:34 PM

    मदन जी ई चुटकुला हम गाम में आहा के मुख से कईक बेर स्टेज पर शुनने छि , आय बहुत ख़ुशी भेल जे आहा के रचना मैथिल और मिथिला में सेहो प्रकाशित अछि -----
    हरेक्रष्ण झा (पट्टीटोल ) झंझारपुर

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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