Friday, August 01, 2008

'विदेह' १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ )कथा सुभाषचन्द्र यादवसाहेबरामदास-डॉ.पालन झामैथिलीपुत्र प्रदीप-दैनिकी ज्योति

गद्य
अ.१.कथा सुभाषचन्द्र यादव २.प्रबन्ध (साहेबरामदास-डॉ.पालन झा)



आ.१. मैथिलीपुत्र प्रदीप- आध्यात्मिक निबन्ध २.दैनिकी ज्योति
इ. सहस्रबाढ़नि

ई. शोध लेख संगहि मायानन्द मिश्रजीसँ डॉ शिवप्रसाद यादव जीक लेल गेल साक्षात्कारक पहिल भाग

१. कथा- श्री सुभाषचन्द्र यादव २. प्रबन्ध डॉ. पालन झा (साहेब रामदास)
१.श्री सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालयसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। सम्प्रति अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। छह टा पोथी प्रकाशित। मैथिलीमे लगभग सत्तरिटा कथा प्रकाशित। मिथिली, बंगला तथा अंग्रेजीमे परस्पर अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी मैथिली परामर्श-मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकार सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।


कथा कनियाँ-पुतरा

जेना टांग छानै छञि, तहिना ऊ लड़की हमर पएर पाँजमे धऽ लेलक आ बादुर जकाँ लटकि गेल। ओकर हालत देख ममता लागल। ट्रेनक ओइ डिब्बामे ठाढ़ भेल-भेल लड़की थाकि कऽ चूर भऽ गेल रहय। कनियें काल पहिने नीचेमे कहुना बैठल आऽ बैठलो नञि गेलए तऽ लटकि गेल।

डिब्बामे पएर रोपएके जगह नञि छञि। लोग रेड़ कऽ चढ़ए-ए, रेड़ कऽ उतरए-ए। धीया-पूता हवा लय औनाइ छै, पाइन लय कानए छै। सबहक जी व्याकुल छञि। लोग छटपटा रहल-ए।

हम अपनो घंटो दू घंटा सऽ ठाढ़ रही। ठाढ़ भेल-भेल पएरमे दरद हुअय लागल। मन करय लुद सिन बैठ जाइ। तखैनियें दू टा सीट खाली भेलै, जइ पर तीन गोटय बैठल। तेसर हम रही जे बैठब की, बस कनेटा पोन रोपलौं। ऊ लड़की ससरि कऽ हमरा लग चलि आयल। पहिने ठाढ़ रहल, फेर बैठ गेल। फेर बैठले-बैठल हमर टांगमे लटकि गेल। जखनि ऊ ठाढ़ रहय तऽ बापक बाँहिमे लटकल रहय। ओकरा हम बड़ी काल लटकल देखने रहिऐ। ओकर बाप अखैनियों ठाढ़े छञि। छोट बहीन आ भाय ओकरे बगलमे नीचेमे बैठल औंधा रहल छञि।

ऊ जे टांग छानने अछि, से हमरा बिदागरी जकाँ लागि रहल-ए। जाइ काल बेटी जेना बापक टांग छानि लञि छञि, तेहने सन। ने ऊ, कानञि-ए, ने हम कानञि छी। लेकिन ओकर कष्ट, ओकर असहाय अवस्था उदास कऽ रहल-ए। हम निश्चल-निस्पंद बैठल छी। होइए हमर सुगबुगी सऽ ओकर बिसबास, ओकर असरा कतौ छिना नञि जाइ। हाथ ससरि जाइ छञि तऽ ऊ फेर टांग पकड़ि लञि-ए।

लड़की दुबड़-पातर आऽ पोरगर छञि। हाथमे घड़ी। प्लास्टिकक झोरामे राखल मोबाइल। लागै छञि नौ-दस सालक रहय। मगर कहलक जे बारह सालके अछि। सतमामे पढ़ै-ए आऽ ममिऔत भाइक बियाहमे जा रहल-ए।

बेर-बेर जे हाथ ससरि जाइत रहए से आब ऊ हमर ठेंहुन पर मूड़ी राखि देलक-ए। जेना हम ओकर माय होइअइ। ओकर माय संगमे नञि छञि। कतय छञि ओकर माय? जकर कनहा पर, पीठ पर, जाँघ पर कतओ ऊ मूड़ी राखि सकैत रहय। हम ओकर माथपर हाथ देलिऐ। ऊ अओर निचेन भऽ गेल जेना।

एक बेर गाड़ीक धक्का सऽ ऊ ससरि गेल; सोझ भेल आऽ आँखि खोललक। एक गोटय कललकए- “दादा कय कसि कय पकड़ने रह”।
अंतिम टीशन आबि रहल छञि। सब उतरै लय सुरफुरा लागल-ए। अपन-अपन जुत्ता-चप्पल, कच्चा-बच्चा आऽ सामान कय लोग ओजियाबय लागल-ए। राति बहुत भऽ गेल छञि। सब कय अपन-अपन जगहपर जाइके चिन्ता छञि। बहुत गोटे ठाड़ भऽ गेल अछि। ऊ लड़कियो। हमहूँ ठाढ़ भऽ कऽ अपन झोरा ऊपर सऽ उतारै छी। तखैनियें नेबो सन कोनो कड़गर चीज बाँहि सऽ टकरायल। बुझा गेल ई लड़कीक छाती छिऐ। हमर बाँहि कने काल ओइ लड़कीक छाती सऽ सटल रहल। ओइ स्पर्श सऽ लड़की निर्विकार छल; जेना ऊ ककरो आन संगे नञि, बाप-दादा या भाय-बहीन सऽ सटल हो।
ओकर जोबन फूइट रहल छञि। ओकरा दिस ताकैत हम कल्पना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै? सीता बनत की द्रौपदी? ओकरा के बेचतै? हमरा राबन आ दुर्जोधनक आशंका घेरने जा रहल अछि।

टीशन आबि गेलै। गाड़ी ठमकि रहल छञि। लड़की हमरा देख बिहुँसै—ए; जेना रुखसत माँगि रहल हो। ई केहन रोकसदी अछि। ने ऊ कानञि छञि, ने हम कानञि छी। ऊ हँसञि-ए, हमहूँ हँसञि छी। लेकिन हमर हेँसीमे उदासी अय।

२.डॉ पालन झा , ग्राम-हरौली, कुशेश्वरस्थान।
एम. ए. ( मैथिली ), सन्त साहेब रामदास पर डॉ दुर्गानाथ झा ’श्रीश’ केर निर्देशनमे पी.एच.डी.। संप्रति बी. डी. जे. कॉलेज, गढ़बनैलीमे मैथिली विभागाध्यक्ष।

सन्त साहेब रामदास

साम्प्रदायिक अर्थें मैथिली साहित्यमे सन्त कविक रूपमे साहेब रामदासक प्रमुख स्थान अछि। पचाढ़ी स्थानक महंथ बंशीदासजीक सानिध्यमे कवीश्वर चन्दा झा हिनक पदावलीक संकलन कए १९०१ ई. मे प्रकाशित कएने छथि। एहि पदावलीमे परिचयक क्रममे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि:

“शिवलोचन मुख शिव सन जखन, साहेब रामदास तिथि तखन।
प्रबल नरेन्द्र सिंह मिथिलेश, शासित छल भल तिर्हुत देश॥“

अर्थात् ११५३ साल (१७४६ ई.) मध्य महाराज नरेन्द्र सिंहक राज्यकालमे ई रहथि।

छादनसँ न्याय-तत्त्व-चिन्तामणि कर्ता गंगेश उपाध्याय वंश कुलोद्भव साहेब रामदास “कुसुमौल” ग्रामक ( जरैल परगना, जिला- मधुबनी ) एक मैथिल ब्राह्मण छलाह।हिनक छोट भाइक नाम कुनाराम ओऽ एकमात्र प्राणसमप्रिय पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। हिनक पूरानाम साहेब राम झा छलनि, मुदा अन्य सन्त कवि जकाँ ईहो अपन नामक आगाँ भक्ति-भावनासँ ’दास’ शब्द जोड़ि लेलनि। साहेब रामदासक पदावलीमे लगभग ४७८ टा पद संकलित अछि। एहि कविता मध्य ई अपन नाम साहेबराम, साहेबदास, साहेब, साहेबजन सेहो रखने छथि।

साहेब रामदास आरम्भहिसँ भक्ति-प्रवण विचारक लोक छलाह। ई सदिखन ईश्वरहिक ध्यान-चिन्तनमे लीन रहैत छलाह। सन्यास ई बादमे ग्रहण कएलनि। एहि पाछाँ एकटा दुखद घटना घटित भेल- हिनका एकमात्र पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। ओऽ अधिक समय दुखित रहए लगलाह। उवावस्था छलनि। एकबेर प्रीतम अधिक दुखित भए गेल छलाह। हिनक जीवनक अन्तिम कालक भान भए जएबाक कारणेँ साहेबरामदासविकल भए कानए लगलाह। मरण शय्या पर रहितहुँ प्रीतमकेँ एहन दुःखद दृश्य देखि नहि रहल गेलनि आऽ ओऽ अपन पितासँ पुछैत छथिन, “बाबूजी! अपने एतेक विकल किएक भए रहल छी? पिता उत्तर दैत छथिन “पुत्रक आवश्यकता एहि चतुर्थ अवस्थामे होइत छैक, से तँ अपने हमरा पहिने छोड़ि कए जाए रहल छी, तैँ ई सोचि-सोचि खिन्न चित्त भए व्याकुल भए रहल छी”। पुत्र प्रीतम प्रत्युत्तर दैत कहैत छथिन, “ई संसार असार थिक, क्षणभंगुर थिक, एहिमे स्त्री-पुत्र-पुत्री केओ अपन नहि थिक, ई सभटा अनित्य थिक, माया-मोह थिक। सभटा स्वार्थमूलक थिक तेँ एहि सभसँ माया-मोह रखनाइ अनुचित थिक। हम तँ अपनेक भगवन्-भजनमे विघ्न मात्र छलहुँ, आब अपने निर्विघ्नपूर्वक भगवन्-भजनमे लागि जाऊ”। एतेक बात कहैत देरी प्रीतमक प्राण-पखेरू उड़ि गेलनि। साहेब रामदास विकल भए कानि-कानि कए गाबए लगलाह-

“प्रीतम प्रीति तेजि भेल परदेसिआ हो”
साहेब रामदासकेँ प्रीतमक देहावसानसँ बड़ आघात लगलनि, प्रीतमक उपदेशकेँ धारण कए परिवार-समाजकेँ तिलाञ्जलि दए सन्यास ग्रहण कए लेलनि।

१. मैथिलीपुत्र प्रदीप- आध्यात्मिक निबन्ध २. ज्योति झा चौधरी-दैनिकी
१. श्री मैथिली पुत्र प्रदीप (१९३६- )। ग्राम- कथवार, दरभंगा। प्रशिक्षित एम.ए., साहित्य रत्न, नवीन शास्त्री, पंचाग्नि साधक। हिनकर रचित "जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर’ आऽ ’सभक सुधि अहाँ लए छी हे अम्बे हमरा किए बिसरै छी यै" मिथिलामे लेजेंड भए गेल अछि।

ॐ (मा)

एकटा प्रश्न उठि सकैछ, जे मोक्ष कामीक लेल वैदिक कर्मक प्रयोजन? एकर उत्तर ई भऽ सकैछ जे यज्ञ यागादि कर्मक फलश्रुतिमे स्वर्ग प्राप्त करबाक बात कहल गेल अछि। मुदा जे व्यक्ति स्वर्ग नहि चाहैत होथि, मोक्षेटा चाहैत होथि, हुनका लेल वैदिक कर्मक आवश्यकता, ई वृहदारण्यकोपनिषद केर वचनसँ पुष्ट होइत अछि। यथा- “ तमेतं वेदानु वचनेनं ब्राह्मणाः विविदिषन्ति यज्ञेन, दानेन तपसा नाशकेन”।

अर्थात्- ब्राह्मणगण वेदाध्ययनसँ कामनारहित यज्ञ, दान एवं तपसँ ओहि ब्रह्मकेँ चिन्हबाक इच्छा करैत छथि। एहि वचनमे अनाशकेन अर्थात् कामनारहित “यज्ञ, दान, तप” विशेष महत्त्व रखैत अछि।

तात्पर्य जे वेदोक्त यज्ञादि कर्म जखन आशक्तिक संग कएल जाइत अछि, तखन ओहिसँ मात्र स्वर्गक भोग प्राप्त होइत अछि। परन्तु जखन बिना आशक्ति रखने निःस्वार्थ भावसँ कयल जाइत अछि, तखन काम-क्रोधसँ मुक्त भऽ कऽ कार्य केनिहारक चित्त शुद्ध भऽ जाइत अछि। ओऽ मोक्षक अधिकारी भऽ जाइत छथि।

श्रीमद्भगवदगीतामे भगवान् श्रीकृष्णक उक्ति अछि- अध्याय १८ (५-६)

यज्ञदान तपः कर्म न साज्यं कार्यमेव तत।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
एतान्यापित कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च।
कार्व्यानीति मे पार्थं निश्चितं मतमुत्तमम॥

अर्थात्- यज्ञ, दान, तप आदि कर्मक त्याग नहि करबाक चाही। मुदा ई समस्त कर्म निष्काम भावसँ करबाक चाही। अतएव उपनिषदक ’अनाशकेन’ एहि पदकेँ एहिठाम गीताक संगं त्यक्त्वा फलानि च पुष्ट करैत अछि।

अतएव जे मनुष्य अपन आन्तरिक कल्याण चाहैत छथि अर्थात् जन्म-मृत्युक बन्धनसँ मुक्त हेबाक इच्छा करैत छथि, हुनका वैदिक कर्मकाण्डक फलस्वरूप स्वर्गक भोग केर इच्छा नहि राखि कऽ निष्काम भावसँ भगवानक प्रसन्नताक लेल मात्र कार्य करबाक चाही। ई बात मुण्डकोपनिषदमे सेहो आयल अछि। १,२,७.

मनुष्यक चित्त अनेक प्रकारक कुकर्मसँ मलिन भऽ गेल रहैत अछि। एहि सभ मैलकेँ हटेबाक लेल सत् कर्म करब आवश्यक अछि। एहि सत्कर्मकेँ करबाक उद्देश्य होइत अछि वैदिक कर्म काण्ड। वेदोक्त कर्म कएलासँ चित्त शुद्ध होइत अछि। जकर बाद ब्रह्म विद्या अथवा ज्ञानक बात सुनलासँ सुफल भेटैत छैक।

उपनयन संस्कारक बाद वेदोक्त कर्म करबाक लोक अधिकारी होइत छथि। वेदक अन्तिम लक्ष्य मोक्षे प्राप्त करब थीक। ईश्वरक उपासना योगक अभ्यास, धर्मक अनुष्ठान, विद्या प्राप्ति, ब्रह्मचर्य व्रतक पालन तथा सत्संग आदि मुक्तिक साधन गानल गेल अछि। कर्मफलक प्राप्तिक हेतु पुनर्जन्मक प्रतिपादन आत्मोन्नत्तिक लेल संस्कारक निरूपण, समुचित जीवन-यापन हेतु वर्णाश्रमक व्यवस्था एवं जीवनक पवित्रता हेतु भक्ष्या-भक्ष्यक निर्णय करब वेदक मुख्य विशेषता थीक। कर्मकाण्ड, उपासना-काण्ड तथा ज्ञान-काण्ड एहि तीनूक वर्णन मुख्यतया वेदमे भेटैत अछि। यज्ञान्तर्गत देवताक पूजा, ऋषि-महर्षिक सत्संग तथा दान ई तीनू क्रिया एक संग होइत अछि। तहिना ब्रह्मचर्य पालनसँ ऋषि-ऋण, यज्ञ द्वारा देव-ऋण तथा संतानोत्पत्तिसँ पितृऋण मुक्त हेबाक आदर्श वाक्य वेदेमे प्राप्त होइत अछि।
(अनुवर्तते)

२. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
शिक्षा मानवसभ्यताक मूलमंत्र होइत अछि। मुदा प्रतियोगिताक समयमे पढ़ाईक नामपर मोट-मोट पोथीक भारसॅं विद्यार्थी सबहक जीवन कारावासमे पराधीन जीवन काटैत कैदी सनक भऽ जाइत अछि। अहि बातक ध्यान राखि हमरा सभकेँ शैक्षणिक यात्रामे पठायल जाइत छल। एहि यात्रामे हमरा सभकेँ दैनिकी सभ दिन लिखऽ पडै़त छल आऽ कतबो थाकल रहैत छलहुँ हमरा सभकेँ ओहिये दिन संगे जायवला शिक्षक - शिक्षिका सॅं हस्ताक्षर करबाबऽ पड़ैत छल। टिस्कोक दस विद्यालयमे कक्षा छह, सात, आठ आऽ नौमे प्रथम स्थान पाबवला एवम्‌ प्रत्येक विद्यालयसॅं एकटा बहुमुखी प्रतिभाशाली छात्र-छात्राकेँ ई सुअवसर प्राप्त होइत छल। हमरा ई सौभाग्य चारू कक्षामे भेटल। चारिम बेर सुअवसर तऽ भेटल किन्तु ६ दिसम्बर १९९२ क राजनैतिक हलचलक कारण हमर सबहक कार्यक्रम रद्द- भऽ गेल। पहिल बेर जून १९८९ मे उत्तर भारतक महत्वपूर्ण स्थान गेलहुँ लेकिन दैनिकी हेरा गेल। दोसर बेर दिसम्बर १९९० मे कोलकाता आऽ आसपासक जगह घूमलहुँ। जाहिमे निम्नलिखित स्थानक दर्शन भेल
१. मेट्रो रेल
२ अलीपुर जू़
३ विक्टोरिया हाउस
४ बिरला प्लानेटोरियम
५ बिरला टेकनिकल एण्ड इण्डस्ट्रियल म्यूज़ियम
६ नेहरू चिलड्रेन्स म्यूजियम
७ दक्षिणेश्वर मन्दिर
८ बॉटेनिकल गार्डेन
९ इण्डियन म्यूज़ियम
१० तारकेश्वर
११ शान्ति निकेतन
१२ तारापीठ
१३ बकरेश्वर
१४ दिग्घा

पहिल दिन :
२५ दिसम्बर १९९० मंगलवार :
आइ ठीक आठ बजे भोरे हमर सबहक यात्रा एक बसमे प्रारंभ भेल। सबहक अभिभावक आयल रहथि आऽ बड चिन्तित बुझाइत छलथि। हमसभ अपन खुशी नहि नुका पाबि रहल छलहुँ लेकिन खुलि कऽ तहन हॅंसलहुँ जहन बस शहर पार कऽ पहाड़ी आ जंगलाह रस्ता पकड़लक। रस्ता भरि एक दोसराक परिचय एवम्‌ अपन-अपन स्कूलक टॉप स्कोरक तुलना करैत रहलहुँ। दुनु तरहे –एग्रीगेट(पूर्णांक)आऽ अलग-अलग विषयमे। फेर गाना बजाना अंतराक्षरीक अंतर्गत सेहो भेलै। करीब 1 बजे दुपहरियामे खड़गपुर पार केलहुँ। अढ़ाई बजे कोलाघाट पर ठहरि भोजन केलहुँ। विशाल हावड़ा ब्रीजकेँ पार करैत जहन बस कोलकाता शहरमे प्रविष्ट केलक हम सभ खिड़कीपर भीड़ लगेने छलहुँ, ओहि शहरक मकान सभकेँ देखऽ लेल। मकान सभ ब्रिटिश स्टाइलक बेसी देखायल। सड़कक भीड़ तऽ अतिशय छल। हम सभ ६ बजे सॉंझमे अग्रसेन स्मृति भवन नामक लॉजमे अपन घर जमेलहुँ। ओकर पॉंचम महलापर सभ लेल पॉंचटा कक्ष अनुबंधित छल। बालिका सभ लेल दू टा कक्ष देल गेल। ओतऽ अपन समान पाती व्यवस्थित कऽ अगिला दिनक इंतजाम कऽ हमसभ रातिक साढ़े आठ बजे भोजन लेल होटल दिस विदा भेलहुँ। एतेक बड़का टोलीकेँ देखि सभ चौकि जाइत छल। भोजनोपरान्त दैनिकी लिखि शिक्षकसँ हस्ताक्षर करा सुइत गेलहुँ।
दोसर दिन :
२६ दिसम्बर १९९० बुद्धवार :

२.शोध लेख
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
१. पहिने साक्षात्कारक पहिल भाग
साहित्य मनीषी मायानन्द मिश्रसँ साक्षात्कार
-डॉ शिव प्रसाद यादव द्वारा।डॉ. श्री शिवप्रसाद यादव, मारवाड़ी महाविद्यालय भागलपुरमे मैथिली विभागाध्यक्ष छथि।

भागलपुरक नामी-गामी विशाल सरोवर ’भैरवा तालाब’। जे परोपट्टामे रोहु माछक लेल प्रसिद्ध अछि। कारण एहि पोख्रिक माँछ बड़ स्वादिष्ट। किएक ने! चौगामाक गाय-महींसक एक मात्र चारागाह आर स्नानागार भैरबा पोखड़िक महाड़। दक्षिणबड़िया महाड़ पर मारवाड़ी महाविद्यालय छात्रावास। छात्रावासक प्रांगणमे हमर (अधीक्षक) निवास। आवासक प्रवेश द्वार पर लुक-खुक करैत साँझमे बुलारोक धाप। हॉर्नक ध्वनि सुनि दौड़ि कए घरसँ बहार भेलहुँ। दर्शन देलनि मिथिलाक त्रिपूर्ति, महान विभूति- दिव्य रूप। सौम्य ललाट। ताहि पर चाननक ठोप, भव्य परिधान। ताहि पर मिथिलाक पाग देखितहि मोन भेल बाग-बाग। नहुँ-नहुँ उतरलनि- साहित्य मनीषी मायानन्द, महेन्द्र ओऽ धीरेन्द्र। गुरुवर लोकनिक शुभागमनसँ घर-आँगन सोहावन भए गेल। हृदय उमंग आऽ उल्लाससँ भरि गेल। मोन प्रसन्न ओऽ प्रमुदित भए उठल। गुरुवर आसन ग्रहण कएलनि, यथा साध्य स्वागत भेलनि। तदुपरान्त भेंटवार्ताक क्रम आरम्भ भए गेल। प्रस्तुत अछि हुनक समस्त साहित्य-संसारमे समाहित भेंटवार्ताक ई अंश:-

प्र. ’मिथि-मालिनी’ केँ अपने आद्योपान्त पढ़ल। एकर समृद्धिक लेल किछु सुझाव?
उ. ’मिथि मालिनी’ स्वयं सुविचारित रूपें चलि रहल अछि। स्थानीय पत्रिका-प्रसंग हमर सभ दिनसँ विचार रहल अछि जे एहिमे स्थापित लेखकक संगहि स्थानीय लेखक-मंडलकेँ सेहो अधिकाधिक प्रोत्साहन भेटक चाही। एहिमे स्थानीय उपभाषाक रचनाक सेहो प्रकाशन होमक चाही। एहिसँ पारस्परिक संगठनात्मक भावनाक विकास होयत।
प्र. ’मिथिला परिषद’ द्वारा आयोजित विद्यापति स्मृति पर्व समारोहमे अपनेकेँ सम्मानित कएल गेल। प्रतिक्रिया?
उ. हम तँ सभ दिनसँ मैथिलीक सिपाही रहलहुँ अछि। सम्मान तँ सेनापतिक होइत छैक, तथापि हमरा सन सामान्यक प्रति अपने लोकनिक स्नेह-भाव हमरा लेल गौरवक वस्तु भेल आऽ मिथिला परिषदक महानताक सूचक। हमरा प्रसन्न्ता अछि।
प्र. अपने साहित्य सृजन दिशि कहियासँ उन्मुख भेलहुँ?
उ. तत्कालीन भागलपुर जिलाक सुपौलमे सन् ४४-४५ मे अक्षर पुरुष पं रामकृष्ण झा ’किसुन’ द्वारा मिथिला पुस्तकालयक स्थापना भेल छल तकर हम सातम-आठम वर्गसँ मैट्रिक धरि अर्थात् ४६-४७ ई सँ ४९-५० ई.धरि नियमित पाठक रही। एहि अध्ययनसँ लेखनक प्रेरणा भेटल तथा सन् ४९ ई. सँ मैथिलीमे लेख लिखऽ लगलहुँ जे कालान्तरमे भाङक लोटाक नामे प्रकाशितो भेल सन् ५१ ई. मे। हम तकर बादे मंच सभपर कविता पढ़ऽ लगलहुँ।
प्र. अपने हिन्दी एवं मैथिली दुनू विषयसँ एम.ए. कएल। पहिल एम.ए. कोन विषयमे भेल?
उ. मैट्रिकमे मैथिली छल किन्तु सन् ५० ई. मे सी.एम. कॉलेज दरभंगामे नाम लिखेबा काल कहल गेल जे मैथिलीक प्रावधान नहि अछि। तैँ हिन्दी रखलहुँ। तैँ रेडियो, पटनामे काज करैत, सन् ६० ई. मे पहिने हिन्दीमे, तखन सन् ६१ ई. मे मैथिलीमे एम. ए. कएलहुँ।
प्र. हिन्दी साहित्यमे प्रथम रचना की थीक आऽ कहिया प्रकाशित भेल।
उ. हिन्दीक हमर पहिल रचना थिक, ’माटी के लोक: सोने की नया’ जे कोसीक विभीषिका पर आधारित उपन्यास थिक आऽ जे सन् ६७ ई. मे राजकमल प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल।
प्र.अपनेक हिन्दी साहित्यमे १. प्रथम शैल पुत्री च २. मंत्रपुत्र ३. पुरोहित ४. स्त्रीधन ५. माटी के लोक सोने की नैया, पाँच गोट उपन्यास प्रकाशित अछि। एहिमे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यास कोन अछि आओर किएक?
उ. अपन रचनाक प्रसंग स्वयं लेखक की मंतव्य दऽ सकैत अछि? ई काज तँ थिक पाठक आऽ समीक्षक लोकनिक। एना, हिन्दी जगतमे हमर सभ ऐतिहासिक उपन्यास चर्चित रहल अछि। अधिक हिन्दी समीक्षक प्रशंसे कएने छथि। गत वर्षसँ हिन्दीक सम्राट प्रो. नामवर सिंह जी हिन्दीक श्रेष्ठ उपन्यास पर एकटा विशिष्ट कार्य कऽ रहल छथि, जाहिमे हमर प्रथम शैल-पुत्री नामक प्रगैतिहासिक कालीन उपन्यास सेहो संकलित भऽ रहल अछि। एहि उपन्यास पर विस्तृत समीक्षा लिखने छथि जयपुर युनिवर्सिटीक डॉ शंभु गुप्त तथा हम स्वयं लिखने छी एहि उपन्यासक प्रसंग अपन मंतव्य। ई पुस्तक राजकमल प्रकाशनसँ छपि रहल अछि। असलमे प्रथम शैलपुत्री’ मे अछि भारतीय आदिम मानव सभ्यताक विकासक कथाक्रम- जे कालान्तरमे हड़प्पा अथवा सैंधव सभ्यताक निर्माण करैत अछि जकर क्रमशः अंत होइत अछि। हम स्वयं एकरा अपन सफल रचना मानैत छी, समीक्षको मानि रहलाह अछि। एना, पुरोहित अपना नीक लगैत अछि। ’स्त्रीधन’ मिथिलाक इतिहास पर अछि।
(अनुवर्तते)
२. आब धारावाहिक शोधलेखक आगूक भाग।
मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
स्त्रीधन

ई ग्रन्थ मायानन्द बाबूक इतिहास बोधक अन्तिम कड़ी (अखन धरिक) अछि। प्रागैतिहासिक “प्रथम शैलपुत्री च”, ऋगवेदिक कालीन “मंत्रपुत्र”, उत्तरवैदिककालीन “पुरोहित” केर बाद ई पुस्तक सूत्र-स्मृतिकालीन अछि, ई ग्रंथ हिन्दीमे अछि। आऽ ई उपन्यास सूत्र स्मृतिकालीन मिथिला पर आधारित अछि। ई पोथी प्रारम्भ होइत अछि मायानन्दजीक प्रस्तावनासँ जकर नाम एहि खण्डमे “पॄष्ठभूमि” अछि। एतए मायानन्दजी रामायण-महाभारत केर काल गणनाक बाद इतिहासकार लोकनिक एकमात्र साक्ष्य शतपथ ब्राह्मणक चर्च करैत छथि।
मिथिलाक प्राचीनतम नाम विदेह छल, जकर प्रथम वर्णन शतपथ ब्राह्मणमे आयल अछि। सार्थ-गमनक प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन एहि ग्रन्थमे अछि, से मायानन्द जी कहैत छथि।

ई ग्रन्थ प्रथम आऽ द्वितीय दू अध्यायमे अछि आऽ अन्तमे उपसंहार अछि। प्रथम अध्यायमे प्रथमसँ नवम नौ टा सत्र अछि। द्वितीय अध्यायमे प्रथमसँ अष्टम ई आठ टा सर्ग अछि।

प्रथम अध्याय

प्रथम सत्र
एहिमे सृंजय द्वारा कएल जाऽ रहल धर्म-पश्चात्तापस्वरूप भिक्षाटनक, पत्नी-त्यागी होएबाक कारण छह मास धरि निरन्तर एकटा महाव्रत केर पालन करबाक चरचा अछि।

“द्वितीय वर” केर सेहो चरचा अछि।

द्वितीय सत्र

राजा बहुलाश्व जनकक ज्येष्ठ पुत्र कराल जनककेँ राजवंशक कौलिक परम्पराक अनुसार सिंहासन भेटलन्हि, तकर वर्णन अछि।

तृतीय सत्र
एतए पुरान आऽ नवक संघर्ष देखबामे अबैत अछि। वारुणी एक ठाम कहैत छथि जे जखन पूज्य तात हुनकर विधिवत उपनयन करबओलन्हि, ब्रह्मचर्य आश्रममे विधिवत प्राचीन कालक अनुसार श्रुतिक शिक्षा देलन्हि, तँ आब हमहूँ भद्रा कन्या बनि अपन वरपात्रक निर्वाचन स्वयं कए विवाह करए चाहैत छी।

चतुर्थ सत्र

एतए कराल जनकक विरुद्ध विद्रोहक सुगबुगाहटिक चरचा अछि। कृति जनक आऽ बहुलाश्व जनकक कालमे भेल न्यायपूर्ण आऽ प्रजाहितकारी कल्याणकारी कार्यक चरचा भेल अछि, तँ सँगहि सीरध्वज जनकक समयसँ भेल मिथिलाक राज्य-विस्तारक चरचा सेहो अछि। बहुलाश्व मरैत काल अपन पुत्र करालकेँ आचार्य वरेण्य अग्रामात्य खण्डक उपेक्षा-अवहेलना नहि करबाक लेल कहने छलखिन्ह, मुदा कालान्तरमे वैह कराल जनक अग्रामात्यक उपेक्षा-अवहेलना करए लगलाह। आचार्य वरेण्य-खण्ड मिथिलासँ पलायन कए गेलाह।

पंचम सत्र
प्रणिपात, आशीर्वचन आऽ कुशल-क्षेमक औपचारिकताक वर्णन अछि आऽ स्त्रीधनक चरचा सेहो गप-शपक क्रममे आयल अछि। ईहो वर्णन आयल अछि, जे वैशाली किछु दिन कौशलक अधीन छल, आऽ भारत-युद्धमे ओऽ मिथिलाक अधीन छल। वन्य भूमिकेँ कृषि-योग्य बनेबाक उपरान्त पाँच बसन्त तक कर-मुक्त करबाक परम्पराकेँ राजा कराल जनक द्वारा तोड़ि देबाक चरचा अछि।

षष्ठ सत्र

पांचाल-जन द्वारा अंधक वृष्णिक नायक वासुदेव कृष्णकेँ जय-काव्यक नायक मानल जएबाक चरचा अछि। जय-काव्य आऽ भारत-काव्यक पश्चिमक उच्छिष्ट भोज मायानन्दजीक मोनसँ नहि हटलन्हि, आऽ जय-काव्यमे मुनि वैशम्पायन व्यास द्वारा बहुत रास श्लोक जोड़ि वृहतकायभारत काव्य बनाओल जएबाक मिथ्या तथ्यक फेरसँ चरचा अछि। जयकाव्यक लेखक कृष्ण द्वैपायन व्यासकेँ बताओल गेल अछि। आऽ एकर बेर-बेर चरचा कएल गेल अछि, जेना कोनो विशेष तथ्य होए।
फेर देवत्वक विकासपर सेहो चरचा अछि। सरस्वती धारक अकस्मात् सूखि जएबाक सेहो चरचा अछि।
सरस्वतीक मूर्तिपूजनक प्रारम्भक आऽ मातृदेवीक सेहो चरचा भेल अछि।

सप्तम् सत्र

सरस्वतीकेँ मातृदेवी बनाकए काल्पनिक सरस्वती प्रतिमा-पूजनक चरचा अछि। मिथिलामे पतिक नाम नहि लेबाक परम्पराक सेहो चरचा भेल अछि।
अष्टम् सत्र
राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि। अपूर्वा द्वारा विवशतापूर्वक गार्हस्थ्य त्याग आऽ स्त्रीधन सेहो छोड़बाक चरचा भेल अछि।
नवम् सत्र

सएसँ बेशी ग्राम-प्रमुख द्वारा सम्मेलन-उपवेशनक चरचा अछि।
पाँच वसन्त धरि कर-मुक्ति आऽ ताहिसँवन्यजन आऽशूद्रजनक सम्भावित पलायनक चरचा अछि।सीरध्वज जनकक पश्चात् धेनु-हरण राज्याभिषेकक बाद मात्र एकटा परम्परा रहि गेल, तकर चरचा अछि। मुदा करल द्वारा अपन सगोत्रीय शोणभद्रक धेनु नहि घुमेबाक चरचा अछि। कराल द्वारा बीचमे प्रधान पुरहितकेँ हटेबाक चरचा अछि।चिकित्साशास्त्र नवोदित चिकित्सक बटुक कृतार्थकेँ राजकुमारीक चिकित्साक लेल बजाओल जाइत अछि संगमे राजकुमारीक सखी आचार्य कृतक पुत्री वारुणीकेँ सेहो बजाओल जाइत अछि, ओऽ अपन अनुज बटुकक संग जाइत छथि आऽ कराल बलात् अपन कक्ष बन्द कए हुनकासँ गांधर्व-विवाह कए लैत छथि। प्रजा विद्रोह आऽ राजाक घोड़ा पर चढ़ि कए पलायनक संग प्रथम अध्यायक नवम आऽ अन्तिम सत्र खतम भए जाइत अछि।
द्वितीय अध्याय

प्रथम सर्ग
सित धारक चरचा अछि। वारुणिकेँ वरुण सार्थवाह सभक संग अंग जनपद चलबाक लेल कहैत छन्हि
। आऽ संगे वरुण ईहो कहैत छथि जे अंग जनपदक आर्यीकरणक कार्य अखनो अपूर्ण अछि।

द्वितीय सर्ग
सार्थक संग धनुर्धर लोकनि चलैत छलाह, अपन श्वानक संग। सार्थक संग सामान्य जन सेहो जाइत छलाह।वरुण आऽ वारुणी हिनका सभक संग अंग दिहि बिदा भेलाह, एहि जनपदक राजधानी चम्पा कहल गेल अछि, आऽ एकरा गंगाक उत्तरमे स्थित कहल गेल अछि।

तृतीय सर्ग
अंग क्षेत्रमे धानसँ सोझे अरबा नहि बनाओल जएबाक चरचा अछि, ओतए उसीन सुखा कए ढेकीसँ बनाओल अरबाकेँ चाउर कहल जएबाक आऽ ब्रीहिकेँ धान कहबाक वर्णन भेल अछि। पूर्वकालक श्रेष्ठी द्विज वैश्य आऽ अद्विज नवीन वैश्यक चरचा भेल अछि।
चतुर्थ सर्ग
आर्यीकरणक बेर-बेर चरचा पाश्चात्य विद्वानक मायानन्दजी पर प्रभाव देखबैत अछि। आर्य आऽ द्रविड़ शब्द दुनू पाश्चात्य लोकनि भारतमे अपन निहित स्वार्थक लेल अनने छलाह। कोशल आऽ विदेहक प्रसारक, देवत्वक विकासक सम्पूर्ण इतिहास एतए देल गेल अछि।मिथिलाक दही-चूड़ाक सेहो चर्च आएल अछि।

पञ्चम सर्ग

दिनमे एकभुक्त आऽ रातिमे दुग्धपान मिथिला आऽ पांचाल दुनू ठाम छल। तथाकथित आर्य आऽ स्थानीय लोकनिक बीच छोट-मोट जीवनशैलीक अन्तर आऽ मायानन्दजी आर्यीकरण कहैत छथि ओकरा पाटब।

षष्ठ सर्ग

अंगक गृह आर्यग्राम जेकाँ सटि कए नञि वरन् हटि-हटि कए होएबाक वर्णन अछि। हुनकासभ द्वारा छोट-छोट वस्त्र आऽ पशुचर्म पहिरबाक सेहो वर्णन अछि। वन्यजनक बीचमे नरबलि देबाक परम्पराक संकेत आऽ निष्कासित वन्यजनसँ भाषाक आदान-प्रदान सेहो मायानन्दजी पाश्चात्य प्रभावसँ ग्रहण कए लेने छथि।
विक्रय-थान खोलबाक जाहिसँ भविष्यमे नगरक विकास संभव होएत,तकर चर्च अछि।

सप्तम सर्ग

उसना चाउरक अधिक सुपाच्य आऽ ताहि द्वारे ओकर पथ्य देबाक गप कएल गेल अछि।लौह-सीताक लेल लौहकार, हरक लेल काष्ठकार, बर्तन-पात्रक लेल कुम्भकार इत्यादि शिल्पीक आवश्यकता आऽ ताहि लेल आवास-भूमि आऽ भोजनक सुविधा देबाक गप आएल अछि।

अष्टम सर्ग
कृषि उत्पादनक पश्चात् लोक अन्नक बदला सामग्री बदलेन कए सकैत छथि, वृषभ-गाड़ीसँ सामग्रीक संचरण, एक मास धरि चलएबला यज्ञक व्यवस्था भूदेवगण द्वारा कएल जएबाक प्रसंग सेहो आयल अछि। भाषा-शिक्षण क्रममे ब्राह्मणगामक अपभ्रंश बाभनगाम आऽ वनग्रामक वनगाम भए गेल। भाषा सिखा कए घुरैत काल वारुणीपर तीरसँ आक्रमण भेल आऽ फेर वारुणिक मृत्यु भए गेल।

उपसंहार

दोसर वसन्त अबैत मिथिलामे गणतंत्रक स्वरूपक स्थापना स्थिर भए गेल।वैशाली आऽ मिथिलाक बीच परस्पर सम्वाद एक गणतांत्रिक सूत्रमे जुड़बाक लेल होमए लागल। सितग्राम स्थित राजधानीमे पूर्वमे मिथिलाक सीमा-विस्तारक चरचा भेल। राजधानी सितग्राम आऽ पूर्वी मिथिलाक जितग्रामक बीच एकटा महावन छल। एकरा ब्राह्मणग्राम आऽ त्रिग्राम द्वारा मिलिकए जड़ाकए हटाओल गेल।

(अनुवर्तते)

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