Friday, August 01, 2008

'विदेह' १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ )६. पद्यस्व. श्री रामजी चौधरीगंगेश गुंजन ज्योति झा चौधरी

६. पद्य
1.
अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952)आ.गजेन्द्र ठाकुर
इ. श्री गंगेश गुंजन ई.ज्योति झा चौधरी
2. महाकाव्य- महाभारत
१.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२)
२. गजेन्द्र ठाकुर

१. विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य ।
जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि:
1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि।
मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि।
प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:-
22.
भजन विहाग

विपति मोरा काटू औ भगवान॥
एक एक रिपु से भासित जन,
तुम राखो रघुवीर,
हमरो अनेक शत्रु लतबै अछि,
आय करू मेरो त्राण॥
जल बिच जाय गजेन्द्र बचायो,
गरुड़ छड़ि मैदान,
दौपति चीर बढ़ाय सभामे,
ढेर कयल असमान॥
केवट वानर मित्र बनाओल,
गिद्ध देल निज धाम,
विभीषणके शरणमे राखल
राज कल्प भरि दान॥
आरो अधम अनेक अहाँ तारल
सवरी ब्याध निधान,
रामजी शरण आयल छथि,
दुखी परम निदान॥

23.

महेशवानी

हम त’ झाड़ीखण्डी झाड़ीखण्डी हरदम कहबनि औ॥
कर-त्रिशूल शिर गंग विराजे,
भसम अंग सोहाई,
डामरु-धारी डामरुधारी हरदम कहबनि औ॥
चन्द्रभाल धारी हम कहबनि,
विषधरधारी विषधरधारी हरदम कहबनि औ॥
बड़े दयालु दिगम्बर कहबनि,गौरी-शंकर कहबनि औ,
रामजीकेँ विपत्ति हटाउ,
अशरणधारी कहबनि औ॥

24.

चैत नारदी जनानी

बितल चैत ऋतुराज चित भेल चञ्चल हो,
मदल कपल निदान सुमन सर मारल हो॥
फूलल बेलि गुलाब रसाल कत मोजरल हो,
भंमर गुंज चहुओर चैन कोना पायब हो॥
युग सम बीतल रैन भवन नहि भावे ओ,
सुनि-सुनि कलरव सोर नोर कत झहरत हो॥
रामजी तेजब अब प्राण अवधि कत बीतल हो,
मधुपुर गेल भगवान, पलटि नहि आयल हो॥

25.
भजन लक्ष्मीनारायण

लक्ष्मीनारायण हमरा ओर नहि तकय छी ओः॥
दीन दयाल नाम अहाँक सब कहैये यौ
हमर दुखः देखि विकट अहूँ हरै छी योः॥
ब्याध गणिका गृध अजामिल गजके उबाड़ल यो
कोल किरात भीलनि अधमके ऊबारल यो
कतेक पैतके तारल अहाँ गनि के सकत यो
रुद्रपुरके भोल्मनाथ अहाँ धाम गेलायोः॥
जौँ नञ हमरा पर कृपा करब हम की करब यौ
रामजी अनाथ एक दास राखू योः॥
(अनुवर्तते)

(अनुवर्तते)
१. श्री गंगेश गुंजन २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी
१.. गंगेश गुंजन श्री गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।
आयुर्दा '
ई बात नहि जे पकड़वाक प्रयास मे बात-बसात,
छूटल के छुटले रहि जाइत अछि-
अतीत जेबी-झोरा वा किताब-कॉपी पर
दकचल झगड़ाक साक्षी।
आब इहो नहि जकरा देब' पड़य मजूरी
मामिला-मोकदमाक पक्ष आ विपक्ष मे गवाही देवाक दाम।

दाम ल'क' ठाढ़ भइयो क' कहां भेटत बजारक आंखि,
दोकानक आकृति, दोकानदारक आगत-भागत,
पहिले पहिल बुझाइत छैक सब कें
थिक सबटा बेकार।
सबकिछु छोड़ि क' चलि गेल सुखाएल बालु पर
पुरीक समुद्र। द' मुदा गेल केहन सुनिश्चित भरोस
बूझल अछि मन अहांकें कनिके काल मे ओकर
उद्दाम उत्ताल लहरिक घुरि क' फेर छू लेबाक
धोखाड़ि क' छोड़ि जयवाक स्नेह।

सबकिछु छुटलाहा, सभकिछु छुटिये नहि जाइत छैक
जेना सब किछु बांचल सबटा बांचले मे नहि,
भीतरे भीतर खिया गेल, चनकि गेल आ कए बेर
रिक्त भ' गेल सरबा सं झांॅपल सुखाएल घैल जकांॅ
भरि दुपहरिया बांचल खुचल-जएह जतवे से साफ देखार
घैलची पर धएल रहैए।

मन ! अहां की छी आब ?
घैल, घैलची , कि दुपहर ? सांॅझ ?
पुरीक समुद्र कि भुवनेश्वरक बजार ?
कोणार्कक भग्न प्रस्तर पहियाक अवसादग्रस्त सूर्य,
एकान्त मे बैसल गर्भगृहक पार्श्व मे लैंड स्केप बनबैत पटनाक युवक,
बा सागरक बालु सं तट पर बना रहल बालुक शृंगार सौंदर्य दीप्त
तरहत्थी पर गाल, आ केहुनी बले करोट पड़लि वज्रस्तनी मांसल स्त्री,
गढ़ि रहल ओड़िया बालु-मूर्त्तिकार सुदर्शन पटनायक ?
कनिको नहि उदास
सूर्योदय मात्र धरिक आयुर्दाक अपन दिव्य कलाक
अकाल काल कवलनक प्रसंग!

की छी अहां मन ?
कहियो ने छोड़लहुं हमरा एकहु क्षण
ने भेलहुं जीवन कें एकहु पल
आइ अहां छी- हेरायल कि भेटल ?
२. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति

मिथिलाक विस्तार
हम सब ओहि समूहक लोक
इतिहास छानब जकर भाग
संस्कृति बड़ धनी
मुदा संरक्षणक अभाव
जहिया सभक नींद खुजत
तहिया करब पश्चाताप
ओहि सभ्यताकेँ ताकब
जे अखन लगैअ श्राप
उन्नतिक पथ पर चलऽ लेल
पहिरलहुँ आधुनिकताक पाग
जिनकासॅं ई सुरक्षित अछि
से गाबैत बेरोजगारीक राग
जे गरीबीक सीमा पार कएलाह
से व्यस्त प्रतियोगितामे दिन राति
एक संजीवनी बुटीक अभिलाषा
जे सभ्यताकेँ दिअए सुरक्षित आधार
विश्वस्तरीय संस्थाक निर्माण होए
एकर विशेषताक जे करए विस्तार
६.भीष्म-पर्व

भेल भोर रणभूमिमे कौरव-पाण्डव सेना सहित
आगाँ भीष्म कौरवक पाण्डवक अर्जुन-कृष्ण सहित।
भीष्मक रथक दुहुओर दुःशासन दुर्योधन छलाह,
पार्श्वमे अश्वत्थामा गुरु द्रोणक संग भाग्य आह।
युद्ध कए राज्य पाएब मारि भ्राता प्रियजनकेँ,
सोचि विह्वल भेल अर्जुन गांडीव खसत कृष्ण हमर।
कर्मयोग उपदेश देल कृष्ण दूर करू मोह-भ्रम,
स्वजन प्रति मोह करि क्षात्रधर्मसँ विमुख न होऊ।
अधर्मसँ कौरवक अछि नाश भेल देखू ई दृश्य।
विराटरूप देखि अर्जुन विशाल अग्नि ज्वालमे,
जीव-जन्तु आबि खसथि भस्म होथि क्षणहि,
कौरवगण सेहो भस्म भए रहल छलाह,
चेतना जागल अर्जुनक स्तुति कएल सद्यः।
फलक चिन्ता छोड़ि कर्म करबाक ज्ञानसँ,
आत्मा अमर अछि शोक एकर लेल करब नहि उचित।
युढिष्ठिर उतरि रथसँ भीष्मक रथक दिस गेलाह,
गुरुजनक आशीर्वाद लए धर्मपालन मोन राखल।
भीष्म द्रोण कृपाचार्य पुलकित विजयक आशीष देल,
धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्सु देखि रहल छल धर्मनीति
छोड़ि कौरव मिलल पाण्डव पक्षमे तत्काल,
युषिष्ठिर मिलाओल गर ओकरसँ भेल शंखनाद।
अर्जुन शंख देवदत्त फूकि कएल युद्धक घोषणा,
आक्रमण कौरवपर कए रथ हस्ति घोटक पैदल,
युद्धमे पहिल दिन मुइल उत्तर विराटक पुत्र छल।
भीष्म कएल भीषण क्षति साँझमे अर्जुनक शंख,
बाजि कएल युद्धक समाप्ति भीष्म सेहो बजाओल अपन।
पहिल दिनक युद्धसँ पाण्दव शोकित दुर्योधन हर्षित।
दोसर दिनक युद्ध जखन शुरू भीष्म आनल प्रलय।
कृष्ण एना भए हमर सेना मरत चलू भीष्म लग।
हँ धनञ्जय रथ लए जाइत छी भीष्मक समक्ष।
दुहुक बीच जे युद्ध भेल विकराल छल काँपि सकल।
भीम सेहो संहारक बनल भीष्म छोड़ि अर्जुनकेँ ओम्हर दुगल,
सात्यिकीक वाणसँ भीष्मक सहीसक अपघात भेल,
खसल भूमि तखन ओऽ भीष्मक घोड़ा भागल वेगमान भए।
साँझ भेल शंख बाजल युद्ध दू दिनक समाप्त भेल।

तेसर दिन सात्यिकी अभिमन्यु कौरवपर टूटल,
द्रोणपर सहदेव-नकुल युधिष्ठिर आक्रमण कएल,
दुर्योधनपर टूटल भीम वाण मारि अचेत कएल,
ओकर सहीस दुर्योधनकेँ लए चलल रणक्षेत्रसँ,
कौरव सेना बुझल भागल छल ओऽ युद्ध छोड़ि कए।
भागि रहल सेनापर भीम कएलन्हि आक्रमण,
साँझ बनि रक्षक आएल दुर्योधन कुपित भेल।
भीष्मकेँ रात्रिमे कहल अहाँक हृदय पक्षमे अछि पांडवक,
भीष्म कहल छथि ओऽ अजेय परञ्च युद्ध भरिसक करब।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...