Thursday, July 17, 2008

पेटार ९

ज्योत्स्ना चन्द्रम

पुल
सुन्न-हेराएल
थाकल हारल
रिक्त भेल आँखिमे
सपनाक एक सुन्दर संसार जेना उतरल
आइ मने
एक गाछ अमलतास तन-मनमे पनुगल

तखने जेना
साँस-साँस गमगमा उठल
ठहरल-ठिठुरल-ठेहिआएल दिन जेना बीतल
लागल मने
इच्छाक आम-गाछ मजरल
रुद्ध-अवरुद्ध समय
दीर्घ अन्तराल बाद सम्हरल

सूर्य देलक तखने भरि देह ऊष्मा
नदी
भरि इच्छा प्रवाह
तखने मने
चिड़ै जेना बिलहि गेल अपन उन्मुक्तता
चान ल’ क’ ठाढ़ भेल मुँहथरि पर अपन शीतलता
आ माटि अपन सुगन्धि पसारलक...
पानि जखन ओकरा लागल गुदगुदाब’
बसात तखन
सम्पूर्ण परिसर-परिवेशकें लागल डोलाब’... झुमाब’...
तखने जेना लागल,
सभ ऋतु हमर अंग अंग छू’लक... बतिआएल...
आ काटल समय पर
लागल जेना पुल बनि आएल

वैदेहीक नाम
विदेह पुत्राी अहाँ
सर्वगुणसम्पन्ना... राजदुलारी...
ठनलनि जनक ऋषि धनुष यज्ञ आ
विशाल नर-समुद्र मन्थनक बाद हेरलनि अमृत--
पौरुष-निकष पर सफल
मर्यादा पुरुषोत्तम राम!

जानकी!
बड़ भागमन्त भेलहुँ
राम-सन पति
दशरथ सन ससुर
कौशिल्या सन सासु, ओ
लक्ष्मण सन देओर पौलहँु
आ अनवरत तखनहिसँ
मधुर चासनीमे बोरल चिरैता
घांेटैत रहलहुँ सभ दिन, आ
सहधर्मिणी बनि छाहरि जकाँ चलैत रहलहुँ

उर्विजे!
तैयो देब’ पड़ल अग्नि-परीक्षा
भोग’ पड़ल बनवास
अक्षुण्ण रखैत अपन स्वाभिमान आ
रक्षा करैत अपन अस्मिताकें
अंततः शरणागत भेलहुँ धरणी-माँक कोरामे

मैथिली !
अन्तर नहि अएलैक अछि
एखनो धरि स्त्राीक नियतिमे
अहीं जकाँ एखनो देब’ पडै़ छै परीक्षा
सती सुलक्षणा होइतहुँ भोग’ पड़ै छै मनस्ताप
पीड़िता परित्यक्ता बनि
मुक्ति तकैत अछि मृत्युक बाटमे एखनो धरि...

वैदेही !
प्रश्न पुछैत छी अहींसँ एकटा,
जे अहाँक जीवन देखलो पर
किऐ ने टुटैत छनि भक्क जनक ओ सुनयनाक?
अगहनमे सीता बियाहलि गेलीह
दुखे भोगलनि सभ दिन
तें ‘धीया नइं बियाही अगहनमे’ कहनिहार माइ बाप
दोष तँ ताकि लेलनि मासमे मुदा
किऐ ने तकलनि दोष राममे?
किऐ एखनो धरि सभ जनक, सभ सुनयना
तकै छथि राम-सन जमाय आ
सभ धीया चाहै छथि सिया-सन भाग्य?
किऐ? किऐ बहिन वैदेही ??

अक्षर-पुरुषक दुहिता
टटका फुलाएल कनैल जकाँ
रौद हँस’ लागल अछि
बसातमे मोहक मात्सर्य छै पसरल
चिन्नी जकाँ छिड़िआइत झीसीकें
एकर पाश्र्व-धमक नचब’ लगलै अछि

ठीके, बहुत दिनुक बाद
आइ पानि बरिसत
टपकैत बुन्नमे
अप्रतिम गमककें आइ पानि सानत

भिजबा लेल आतुर/सुखाएल धरती
आँंचर पसारने
रोम-रोमसँ पीबाक इच्छा नेने
अस्त-व्यस्त अछि...
हरियरीक चुनरी लहरा क’
कली आ आँकुर सभसँ फुसफुसा क’
व्यक्त क’ रहल अछि अपन आभार

अखाढ़क पहिले अछारमे उमकी जेना बढ़ि गेल छै
बरदक पैर घोड़ा टाप-सन कसमसाइ छै
बिराड़ेमे बीया उल्लास-गीत गुनगनाइ छै
बाबा
आइ भिनसरेसँ पगलाएल छथिन
मैयाँक तरहत्थी पर
ज’न बरिजनाक रोटी कखनसँ ने खेलाइ छै...

अनायासे
हम अपन मैयाँसँ
क’ उठैत छी विकल प्रश्न --
मैयाँ गै
गृहस्थक पौत्राी हम
कोना क’ भ’ गेलहुँ अक्षर पुरुक्षक दुहिता?


छठि
एकटा समय छल
जखन आसिन अबिते
जोड़ाए लगै छल
आँगुर पर दिन
भरि पितर-पक्ष
होइत छलनि
पितर लोकनिक आवाहन/तर्पण
फेर, विजया-दशमीक उल्लास
पूजन-अर्चन, मेलाक उछाह
कोजागराक फोका मखान
मुंगबा-खाजा, नारिकेर आ पान

दीयाबातीक पूर्वेसँ
बनबै छलहुँ गाहीक गाही दीप
नीपल छछारल घर आँंगनक संगहि
उमंग भरल आकृति पर
झलकि अबैत छल पाबनिक रंग
गबै छलहुँ सखी बहिनपाक संग --
सुख-सुखराती दीयाबाती
तकरे छबे छठि...

छठिक अर्थमे जेना
समटि अबैत छल सम्पूर्ण समर्पण
सूप पर जरैत दीप सन
निष्कम्प निष्ठा भक्ति आ
ठकुआक मिठाससँ
बिलहाए लगै छल जेना आशीष

एकटा समय अछि
जखन आसिन अबिते
साकांक्ष भ’ उठैत अछि मोन --

पाबनि... पाबनि... फेर पाबनि...

मुदा सुखाएल नहि आस्तिकताक नदी
भक्ति आ भावमे
नहि आएल मिसियो भरि अन्तर

मुदा केचुआ छोड़ल ई अभावक साँप!
हेरा गेल जेना पाबनिक अर्थ मलिन भेल प्रकाश...
गुम भेलि ठकुआएलि हम
ताकि रहलि छी अपन चारू भर
शान्त-स्थिर नदीक दुनू कछेर
कछेरसँ बान्ह धरि करमान लागल लोक
कोदारिक चाँछल घाट
घाटक काते-कात गाड़ल केराक थम्ह
पतियानी लागल सूप, कूरा, सरबा, ढाकन...
सभमे साँठल
ठकुआ, भुसबा, केरा, नारिकेर...
सभ अध्र्यमे
अँकुरी, आरतक पात, बद्धी आ जरैत दीप...

लगैत अछि जेना
पाबनिक स्वरूप त’ आर सुन्नरे भेल छै
लाल-पीयर वस्त्राक चमकसँ
होइत अछि--ठीके, ठीके कहै छै लोक
जे देश अपन
आर्थिक उन्नति क’ रहल अछि...

तखने ठुनकैत अबैत अछि उत्सव
तोड़ि दैत अछि ओकर नूपुरक ध्वनि ध्यान --
‘हमहूँ लेब फुकना, बाजा, फटक्का...
बम, राकेट, साँप...’
हम तकै छी अपन आँचरक खँूट
कहाँ अछि किछु !
उदास-उदास सन गिरह
मुँह दुसैत हमरा वत्र्तमान पर...

मोन पड़ि जाइत अछि--
बन्न वेतन
बनियाँक उधारी
दूध ओ मकान मालिकक तगेदा
अप्पू-गप्पूक फीस
जीट-जाट/फीट-फाट...
... फेर, समस्त आवश्यकतामे कतरब्योंत...
... आ हम
देशक आर्थिक उन्नतिक संग
जोख’ लगै छी अपनाकें
अपन मोनकें
अपन मनोरथकें...

सेहन्ता औनाए लगैत अछि--
नहि,
छठिक एहि घाट पर
कोनो टा मीन-मेख नहि
एत’ मात्रा
ई नदी, ई घाट, ई अध्र्य
क’ल जोेड़ने ठाढ़ व्रती
आ हवाक संग सिरसिराइत/फहराइत
वन्दनाक लहरि
भावनाक हिलकोर...
हम हेराए चाहै छी
हम इति भ’ जाए चाहै छी
डूबि जाए चाहै छी एहि आलोकमे

उठि रहल छनि दीनानाथक गीत--
‘उग’ हो दीनानाथ’
भेल अरघ’क बेर...’
मुदा, बहरा नहि पबैत अछि
ओ टाँस/ओ टोप-टहंकार...

वाह रे हमर परम्परा !
जुग-जुग जीबू हमर परिवेश
धर्म शास्त्रासँ गछारल
अर्थशास्त्रासँ
पछड़ि रहल अछि समाजशास्त्रा
तैयो हम गबैत छी गीत
फटैत नहि अछि लौकिकताक कोेंढ़

लगैत अछि जेना
कोकनल मेहसँ बान्हल
मेहिया बरद जकाँ घूमि रहल छी
नहि लगैत अछि घुर्मा
नहि लगैत अछि चान्ह
नहि उठैत अछि तर्जनी
ई हम केहन मनुक्ख छी
जाहि समयमे जीबै छी
ताहि समयकें नहि पढै़ छी
ई हम केहन मनुक्ख छी !


फराक-फराक नहि सोचब
नापि रहल छै ओकर साँस
अहाँक उड़ानक उँचाइ
नापि रहल छै ओकर चेतना
अहाँक पाँखिक शक्ति

ओ सूतल नहि अछि
श्लथ सेहो नहि भेल अछि
आ ने निस्पन्द भेल छै ओकर इच्छा
ओ त’ अन्तरिक्षकें देखि रहल अछि
आ लीन अछि अपन अन्तसमे
समेटने सम्पूर्ण ऊर्जा-पुँजकें
रचबा लेल अपन आ
अपन चारू दिस मंगलमय सृष्टि
ओकर करजनी-सन आँखिमे
पसरल छै निखिल विश्व
आ, जे संजोगि रहल अछि
अहाँकें देबाक लेल
पाँज भरि रौद
भरि मुँह हंँसी, आ
सूप भरि प्रेरणा ओ साहस --
कि जत’ अहाँ चूकी
समेटि लिअए अपन आँजुरक परिधिमे
अहाँक Ðास
अहाँक टूट, आ
अहाँक घुटन

अहाँ भ्रममे नहि रहब
ओ एसगरि नहि अछि
आ ने अहाँसँ दूरे अछि
ओ लाजवन्ती सेहो नहि अछि
ओ त’ आधार शक्ति अछि जे
अहाँक संग
सदिखन
डेग-डेग पर गतिशील अछि

ओकरो अन्दर
जाड़क दुलरुआ रौद छै
बसातक वासन्ती लय छै
ठोर पर गीत छै
सकल विश्व मीते-मीत छै ओकरो

अहाँ देखब
फराक-फराक नहि सोचब
सम्भावनासँ फराक
नहि छै ओकर हाथ
सीढ़ी लगाएब जनैत अछि ओहो आकाशमे
आ नापबाक आकांक्ष करैत अछि ग्लोबकें
ओकर करजनी सन आँखिमे
रक्ताभ किरिण छिटकि रहल छै

देखब
अहाँ देखब
फराक-फराक नहि सोचब



सुस्मिता पाठक

कखन होएत भोर
आइ काल्हिक राति
बहुत नमहर होब’ लागल अछि
दिनक अपन रातिमे पूछैत अछि
परिचय

हवा आतंकित
अन्धकार स्तब्ध
चुप्पीकें चीरैत
सर्द घामसँ जागल चेहराकें
भिजा दैत अछि
हल्लुक सन आहटि
आ कोनो छोटो सन ठक-ठक
एक क्षणक मृत्युक अनुभव
आँचरमे सटि जाइत अछि

घड़ी भ’ गेल अछि बन्न
अथवा ई राति बितबे नहि करत
नहि जानि कखन चिड़ै अनघोल करत
कखन बाजत घण्टी
भोर कखन होएत
कखन होएत भोर

जे कखन फूल फुलएबाक
बचा लेबाक लेल लहलहाइत फसिल
कखन, कोन राति क्यो गढ़त हथियार
सर्द चुप भेल मृत राति
आ सन्देहास्पद आहटि
ठक-ठक केर विरुद्ध
कि भोर कखन होएत
कखन होएत भोर

हमर कविता
रूसि क’ चल गेल
जिद्दी नेना जकाँ
थूड़ि सबटा तार्किकता
बताह भेल
शब्दक ढेरी त’र नुका गेल कविता

ओकरा चाही छल
अन्हारक विरुद्ध
एकटा छोट सन दीप
प्रत्येक मौसमक
ठीक-ठाक चेहरा
छल-छर्किं समीकरणसँ च्युत
मानवीयता

हम
एहि सभ उपकरणकें
ताकि रहल छी
जे पाँति-पाँतिमे
आबि क’
फेरसँ बैसि सकए
हमर कविता

हमर निस्तब्धताकें थपकी दैत अछि चान
खोलि क’ अपन खिड़की
हम प्रतिदिन
स्वागत करै छी
भोरका ठरल बसातक
आँगनमे जमि जाइत अछि
रातिए भरिमे कजरी
जबकल पानि पर डोलैत अछि सेमार
कोनो एकान्त खधारिमे
ओकरा खोखरि क’
हम फेकि अबै छी प्रतिदिन
आँगन सेहो उपकृत भ’ उठैत होएत

हम गाछ केर पातक
सरसराहटिक तालमे
रहै छी दिन भरि गतिमान
ई चिन्ता हमरा लेल
नहि आएल अस्तित्वमे
जे ऊबि जाइत होएत माटि
हमर पदचापसँ

प्रत्येक राति
हमर निस्तब्धताकें
थपकी द’ जाइत अछि चान
तरेगन
हमरा पहुँचसँ बहुत दूर अछि
दिन चढ़िते
सूर्ज
हमर छातीमे होइत अछि।

हथियार
किछु काल सोचि लै छी
तँ कने हँंसि लै छी
कने लिखि लेलहुँ
तँ जीवि जाइत छी
चारि दिन आओरो

हँसबाक
आ जीबाक लेल
सोचब

लिखब

बड्ड जरूरी अछि
अपन-अपन युद्ध लेल
अपन-अपन
हथियार।


कत’सँ शुरू करू
कत’सँ शुरू करू गनती
धर्मक ठेकेदार सभ
ओछौने अछि अधर्मक सीढ़ी पर जे
लाहासक असंख्य पाँति
मलबाक चित्रा भीड़मे
एकसर एकटा
चटकैत शहतीर
अबोध आ जीवनक लिप्सामे
छटपटाइत बच्चाक
सुखाएल खूनक डिडीर
आगिक तापसँ
दहकैत जमीन आ
स्त्राीक जरैत केशक चिराइन गन्ध
कत’सँ देखब शुरू करू!
की कहब शुरू करू एकरा!!
धर्मयुद्ध
क्रान्ति-युद्ध
वा सत्ताक कुत्सित पीड़क प्रवंचना...
जनिक सौजन्यसँ सजल बरात
टैªक्टर, लारी आ ट्राम पर
भरल बन्दूक, गोला-हथगोला आ तोप
सुनियोजित षड्यन्त्रा
पूर्वनियोजित तिथि
एक्के बेर पाटि गेल
पूरा शहर
मरि गेल हुनक आत्मा
सूति गेल सम्वेदना
जागल मात्रा
हिंसा आ प्रतिहिंसाक लपलपाइत कामना

जरैत मानव देहसँ
लगा क’ लुआठीमे आगि
दोहराओल गेल प्रतिज्ञा
कोना सोचब शुरू करू।

कत’ अछि अन्त
ओहि शान्तिक
मृत्युक बाद ओछाओल गेल अछि जे
फाटल जमीन पर
चेथड़ीमे लेपटाएल किछु...।

भोरक खोजमे
निन्नक बेसोह यात्रा केर सहचर स्वप्न
खुरदुराएल हाथसँ घिचैत
ऊपर-नीचाँ पथराएल बाट पर
बालुक गत्र्तमे धँसबैत
निच्छोह हाँकैत अछि हमरा

बदहवास भेल देखैत रहि जाइ छी हम
अन्हारमे
अन्हारक देबालमे सहमल
भगजोगनीक पिपनी केर झपकीमे पंक्तिबद्ध आतंक
अपाहिजक अनन्त पंक्ति
दुर्गन्ध आ गिजगिजाहटि
घृणा आ आवेगसँ संचालित होइत हम
बदलि जाइ छी अकस्मात
एकटा चीत्कार, एकटा धड़कन, एकटा निस्तेज मुरूतमे

क्यो घिचैत अछि हमर हाथ
दोहाइ दैत अछि गलि गेल हाथ केर
क्यो हमर आँखि फोड़ि देब’ चाहैत अछि
जे हुनकर अधःपतनकें नहि देखि सकी हम
क्यो हमर जीह काटि लेब’ चाहैत अछि
जे हुनकर पाप रहि जाए अचर्चित

हम चाहब
जे क’ लिअए हमर इन्द्रिय केर अपहरण
ओ अपाहिज
हाथ-पैर-आँखि-जीह अवश्ये काटि लिअए
एकटा सम्पूर्ण काया क’ तँ लिअए प्राप्त
ओ अपाहिज

हमर फड़फड़ाइत साँस
काएम रहत
स्वप्नक धृष्टताकें बेधैत
स्वस्थ-सृजनोन्मुख भोरक खोजमे



शिवेन्द्र दास

पाइ
चबूतरा पर अतरबला; टाटक नीचाँ
पसरैत धुआँक बीच भुटकुन केर उदास आस
जे बरसि गेल मेघ भोरका बिक्री पर
सतसाला बेटी पजारैत अछि चूल्हि
माँजैत अछि करिखा
बनबैत अछि चाह
ओसुलैत अछि पाइ
चीत्कारमे बदलि गेल छै
ओकर नटखट रागक जलतरंग
ओ नेना अछि, युवती अछि, बूढ़ि अछि
आखिर कोन शब्द सम्भव भ’ सकैछ ओकरा लेल
थाल-कीचक एहि मौसममे
जखन कि चुप आ उदास अछि ओ
ककरासँ झगड़ा-दन करत
जखन कि ग्राहके नहि अछि।

ओ बेचैत अछि चाह
ओकरा किछुओ बाजबाक लेल
जरूरी छै जे ओकर चाह बिकय
एकटा सूर्य छै ओकर आँखिमे
जे कसाइन धूआँक पनिआएल छाँहमे तोपल अछि

अतरबला
पीबि चुकल अछि चाह
ओ सराबोर क’ देब’ चाहैत अछि सुगन्धसँ
एहि सतसाला बेटीकें
मुदा ओ लड़ि जाइत अछि
सुगन्धक विरुद्ध
आ चिचिया क’ मँगैत अछि
अपन चाहक पाइ!

सम्भावना
करौछुक खनक-ताल पर
आकुलता भरि पेट भोजनक
भरि पोख निन्नक

कतेक श्रमसाध्य थिक
पाबि लेब, पकड़ि लेब एहन कोनो क्षण
कस्बासँ ग्लोब धरिक बाजारमे!

कि भरि मोन पीबि ली इजोरिया
भरि छाँक होइ
आँगन-घर सुहास आलोड़ित
रस!
गाबि ली स्मृतिमे जोगाओल
छेड़छाड़क कोनो फिल्मी गीत!

करौछु चलब’वालीक गजरा पर
टीपि दी एकटा फकरा
आइ फेर/दाम्पत्यक एहि बीसम सालमे
पूनोक ई राति/कते जटिल छै!
जखन एकटा पूरा पीढ़ीकें
नैपकिन पहिरबाक/तहजीब सिखाओल जा रहल अछि
घोघ उठएबाक गप
कोना कएल जा सकैत अछि?

समय
जटिलतासँ व्यस्त अछि
काॅलगेटी चुम्बनमे/नमी सोख’मे
आ कि तबलासँ क्रूज मिसाइल धरि बनल
बजारक चकचोन्ही पर मुग्ध, त्रास्त, आन्दोलित।

उमगैत अछि मन
समेटि ली चानक पसरल चादरि
ओढ़ा दी हुनका पूनोक एहि राति
आ कही कि अहींक करौछुक ताल-छन्द पर
नृत्य थिक पृथ्वी पर सम्भावना आइयो!

कि नुकाइए-चोरा क’/ताकि तँ ली
बजारक चकचोन्हीक विरुद्ध
रचि तँ ली कोनो/षड्यन्त्रा
आँखिए-आँखि!
थाकल-हारल देहमे/प्राणमे
उतरि जाइ
चान-लोरी गबैत

कते खतरनाक थिक सोचब एहन किछु
जखन कि समय बाजार थिक--
स्त्राीक विरुद्ध: बच्चाक विरुद्ध
क्रूज मिसाइल थिक
--चानक विरुद्ध!!


विरोधक कविता
प्रत्येक नामक संग सम्बोधन हेरैत लोकक
हेंजसँ फराक भ’ हम
चिन्हबाक चेष्टा करै छी
प्रत्येक सम्बोधनमे कोनो नाम
कोनो चेहरा स्नेहसिक्त जीवन्त
सम्बन्ध आ सम्बोधनक पाकड़िक नीचाँ
ककरा-कहिया लागि सकलैक अछि प्रच्छन्न रौद
आ के भीजि सकल अछि आपादमस्तक?
‘वाद’क अन्तरराष्ट्रीय नारासँ ल’ क’
घरक देहरि धरिक चिन्हासकें तकैत कोनो अपन चेहरा
अनाम किन्तु उष्ण...
हम विरोधी भ’ गेल छी
स्वर्ग-सुख लेल आतुर हुनक
जे भिखारि सभ लेल कोनो दिन
आ कि सभ दिन धूत्र्त चेहरा नेने
भोजन करबैत अछि...

हम विरोध करै छी
ओहि भगवानक जे छीनि लेलनि अछि
मनुक्खसँ ओकर ऊँचाइ पापक नाम पर
ओकर धवल चमकैत चादरि पर
दाग हेबाक शंका फुलाइत रहल
जानल बात अछि शंकाक इलाज
हकीम लुकमान धरि बिसरि गेल छलाह
हँ, हम करै छी विरोध
प्रत्येक तेज गति स्वचालित सीढ़ीक
जाहि पर परेशान मनुक्ख ऊपर जएबा लेल
करैत अछि बहुविध नाटक-विधान
बिना तय कएने नीचाँक कोनो मंजिल
ऊपरे-ऊपर भगैत अछि
हम विरोध करै छी

हमरा नहि चाही कोनो चेहरा दयनीय
कोनो चेहरा उपेक्षित
कोनो अपेक्षित सम्बन्ध
हमरा चाही एकटा घर अपन
एकटा देश अपन
एकटा पघिलैत लोहाक संग
एकटा तप्त चेहरा-समूह
चमकैत जकरा आँखिमे एकटा करुणा
एकटा चैतन्य करुणा।


विद्यानन्द झा

गामसँ पत्रा

माँ हमरा लिखै छथि पत्रा
टेढ़-मेढ़ आखरें
एकटा कार्ड आ कि अन्तरदेसी
छोट भाइ वा पितियौत
(वत्र्तमानसँ खौंझाएल
तैयो भविष्यक प्रति आशावान)
खसबै छथि ओकरा
बेचन ककाक दलान पर टाँगल
लाल डाकबला बक्सामे
जे कैक सालसँ
धान आ कि गहूमक बोझक बीच ठाढ़ रहला उत्तरो
बिसरल नहि अछि अपन साहेबी
आ दैत रहैत अछि हरदम
एकटा नागरीय मुस्की

शिबू भाइ लगबै छथि
मोहर ओहि पत्रा पर
(सियाही कने सुखाएल जकाँ छै तैयो)
चिन्तनमे लीन
ख’ढ़क जोगारमे
अबैत बरखा कोना काटब राति
बिचारैत शिबू भााइ
लगबै छथि मोहर हल्लुकेसँ
जानकी एक्सप्रेस आ कि पैसंेजरमे चढ़ि
प्रारम्भ करैत अछि
एकटा सुदीर्घ यात्रा
पत्रा
कैक टा नव-पुरान पोस्टमैन
कैक टा चिन्ता आ आशाक वाहक
आ भण्डार पोस्टमैनक हाथें
कैक टा नगर-गाम
बाध-बोन
धार आ पहाड़ टपैत
पहुँचैत अछि हमरा लग अंततः
ई पत्रा
आ हमरा शंका होब’ लगैछ जे
माँ पठौलनि अछि
पत्रा नहि
कोनो पार्सल।

किऐ गमकैछ
नव धान जकाँ
ई पत्रा?

हम आ अहाँ

अहाँक ठोर परहक
कोनो गीत छी हम
जतबा अहाँ गाएब
ततबा हम हएब

हमर कोनो भास नहि
पूर्वनिर्धारित
शास्त्राीय

कखनहुँ
भनसामे अपस्याँत
आटा सानल हाथंे
उनटे हाथें
पसेना पोछै काल
नहुँए नहुँए दै छी
अहाँ हमरा आकार
टुकड़ी-टुकड़ी

कखनहुँ
मोन पाडै़त
अपन गाम
गामक पोखरि
आ भगवती स्थान
दू क्षणक पलखतिमे
ओलरल ओछान पर
पसरल दुपहरियामे
विलम्बित सन भासमे
गबैत छी हमरा अहाँ
समदाउन जकाँ

कखनहुँ
नहाइत काल
अपन नितान्त एकान्तमे
मजैत अपन पैर
कोनो झिटुकासँ
मोन पाडै़त
हमर अहाँक संग
सुख दुःख
राग विराग
झगड़ा झंझटि
उचिती मिनती
गबै छी हमरा अहाँ
बटगमनी जकाँ

कखनहुँ
रात्रि शेषमे
चिड़ै सबहक चहचहाएब सुनैत
अपन अनिद्रा संग
एकटा असहज समझौता करैत
ठेलैत मोनक तहखानामे
हुलकी मारैत अपन
नितान्त निजू
इच्छा आ आकांक्षा
स्वप्न आ निराशाकें
तैयार करैत छी अहाँ अपनाकें
आब’बला दिन लेल
गबैत हमरा
पराती जकाँ

सत्ते
अहाँक ठोर परहक
कोनो गीत छी हम
जतबे अहाँ गाएब
ततबे हम हएब।

अहांँक गएबासँ फराक
कोनो टा
अस्तित्व नहि हमर

कोनो टा नहि



एहना समयमे
एहना समय
अएलहुँ अहाँ
जखन
अहाँक माइकें
लगै छलनि गन्ध
बसातक सिहकीमे
मालभोग धानक शीष फुटबा कालक
आ अपस्याँत छलहुँ हम
जे हमरा समयक
अपशेषक गन्ध
मिज्झर नहि भ’ जाए
माल-भोग गन्धमे

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन इजाद क’ रहल छल नुस्खा
बहुराष्ट्रीय निगम सभ
हमरा सभक वस्त्राकें
साफसँ साफ
झक झक साफ करबाक

मैलसँ मैल
आर मैल
चिक्कट मैल
भेल जा रहल छल
हमरा सभक नूआ-बिस्तर

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन दूध पी रहल छल
मूत्र्ति सभ
अवाक पीबि रहल छल लोक
एहि दृश्यकें
कोनो मसीहाक प्रतीक्षामे
आ खून पीबि रहल छला
धर्मक ठेकेदार सभ
नुकाएल भाँति-भाँति रंगक चोंगामे

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन
दन्तहीन निरीह आकृति
गाँधीक अहिंसाक
देखैत रहै छल
परमाणु अस्त्रा सभकें
गणतन्त्रा दिवसक परेडमे
मुँह बओने

धानक हरियर कचोर खेत सभ
बदलि रहल छल
चाँदमारी मैदानमे

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन
स्थविर गिद्ध सभ
सुख भोग करै छल
ययाति जकाँ
आ लहठी फोड़ैत
हिचुकैत रहै छली
पुरुक विधवा सभ

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन
देशोन्मादक बूटी
घसि-घसि पिऔने जाइ छल
टीवीक परदा सभ
आ देसक भीतर बलि चढै़ छला
सरल देशभक्त
बेरोजगार लोकनि

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन
लक्ष्य तँ देखार छल
हमरा सभक
मुदा रस्ता नुकाएल छल धोन्हिमे
संशयक एकटा पैघ रातिमे

तैयो
नेने अएलहुँ अहाँ
एकटा छोट सन
उत्सवक मौसम
आ भविष्य पर विश्वास
(खाहे ओ अतार्किक किऐ ने हो)

मृत पितासँ वात्र्तालाप
आइ काल्हि
गामसँ हजारन कोस दूर
कैक राति
हम निन्नेमे उठै छी
आ नपैत चलि जाइत छी
भसियाइत डेगें
कोसक कोस

अहाँकें मन अछि बाबू
जाहि साल
मणिकर्णिकामे
थरथराइत हाथें
देने रही अहाँकें मुखाग्नि
ताही साल
अहाँक परम मित्रा
मित्तन बाबू जकाँ
(जे फेरि नेने रहथि मुँह
देखि क’ हमरा)
अपरिचित भ’ गेल छलीह
कमला
आ हहाइत फुफुआइत
गीड़ि गेल छलीह
ब्रह्मोत्तरमे रोपल
करिया कामोदक कोली

ताही साल
ओरा गेल छल
पुबरिया घरक
छोटकी कोठीमे राखल
करिया कामोदक बीया

उतरीधारी
गृहस्वामीक भूमिकामे हम
निन्नेमे उठै छी
आ नपैत चलि जाइत छी
भसियाइत डेगें
कोसक कोस
सेर आध सेर
करिया कामोदक बीयाक खोजमे
कैक राति
आइ काल्हि

खिचकाहनिमे चलैत
पसरल चारू कात
पाँक हमरा सभक
बासि स्वप्नक
कादो हमरा सभक
अपूरल स’खक
थाल हमरा सभक
अकर्मण्यातक
कीच हमरा सभक
दुर्भाग्यक

चलैत चल जाइत छी
हमरा सब
थाहैत थाहैत
समधानल डेगें
खिचकाहनिमे

नहि सुझाइ छै
बेसी दूर
खिचकहानिमे
डेग दू डेग मात्रा
रुक्ख एकटा जगह
आ कि
पजेबा एकटा अर्धभग्न
ओतबे टा देखाइ छै

कातक नाला --
भरल अपशेषसँ
आकि घर-घरसँ बहराइत
उच्छिष्टक टघार
उपभोगक अवशेष,
आब’ जाइ बलाक मुँह
किछुओ तँ नहि देखाइ छै--
मात्रा डेग दू डेग

चिन्ता रहैत छै
मात्रा अप्पन देह
अप्पन पैरक
अप्पन नूआ
अप्पन बिस्तरक
अनकर तँ किन्नहु नहि

खिचकाहनिमे चलैत
बचबैत देह कहुना
चलैत चल जाइत छी
हमरा लोकनि
प्रतीक्षा करैत
सुखेबाक रस्ता सभक
वा ब्योंत लगबैत
पड़ा जएबाक खिचकाहनिसँ
वा स्वप्न देखैत
पाँकमे कमल
फुलेबाक

बहतरा भ’ जाइत अछि लोक
मरबासँ पहिने
बहतरा भ’ जाइत अछि
कतेक लोक
मतिसुन्न भ’ जाइत अछि
मरबासँ पहिने

भरि जनम
बितौलनि जे
घाड़ खसौने
खसल आँखिए
पतिबरता भ’
चलबैत घर आँगन
करैत बरसाइत आ
आन व्रत उपास
पतिक मंगलकामनामे
से बुरही,
मरबासँ पहिने,
सैह बुरही,
उठै छथि अहल भोरे
आ पराती जकाँ
उठबै छथि
राग-भासमे गारि
करै छथि उद्धार
बुरहा आ
हुनकर सात पुरखाक

उठैत सुरुजक संग
उठैत अछि बुरहीक राग
शान्त होइत अछि
साँझ भेला पर
थाकि गेला पर

सत्ते
मरबासँ पहिने
बहतरा भ’ जाइत अछि
कतेक लोक,
कतेको लोक
मतिसुन्न भ’ जाइत अछि
मरबासँ पहिने


टीवी
ने माइ-बाप,
ने मास्टर-मास्टरनी
ने बाबा-बाबी
ने नाना-नानी
सभसँ पैघ
सभसँ काबिल
शिक्षक अछि
टीवी
हमरा बेटी लेल

टाॅम आ जेरीक
कार्टूनी हिंसा
दौड़ा-दौड़ी
चपटा क’ देब
मारि मारि क’ बना देब एक दोसरकें
तीन विमाक जीबैत जागैत
मनमे भरल
इच्छा आ आशा
सम्वेदना आ निराशासँ भरल लोककें
मात्रा एकविमीय निर्जीव
कार्ड बोर्डक बनल आकृतिमे
सिखबैत अछि
कार्टूनी हिंसा हमरा बेटीकंे
बौआएब
एकसर,
भकोभन्न मतिसुन्न एहि बियाबानमे
जत’
जीवित अछि मात्रा ओएह टा
आ मृत छै, एकविमीय आन सब।

सासु पुतहु
बेटी जमाइ
कुटिलतासँ भरल
चालि आ कुचालि
सिखबैत छै ओकरा
नहि विश्वास करी ककरो
कखनहुँ
एकसर,
मात्रा एकसर छी हमरा लोकनि
एहि सुन्न मसान
भकोभन्न बियाबानमे

हँसैत
माॅडल सभ, अभिनेत्राी सभ
अभिनेता सभ, कौखन नेता सभ,
हाथ बढ़बैत हँसि-हँसि
फेकैत डोरि
एहि उत्पाद
ओहि अनुभवक
पार कर’क लेल
एहि इहलोक वैतरणी

सिखैत अछि
बेटी हमर --
हम छी
कारण जे हम
उपभोग करैत छी



कृष्णमोहन झा


अहाँ बिसरि जाएब हमरा
हमर चारू कातक चीज रहत यथावत्--
फूल-पातक रंग ओतबे टुहटुह
मौसमक मिजाज जतबा सम्हारि सकतैक ओकरा
जिम्मरिक ठाढ़ि पर बैसल घनछोहाक डेन
रहत ओतबे बेकल
जतबा कोंढ़क धाह ओकरा बनेतैक
हमर मोनक देह आ ओसारक पीठ रहत ओतबे सरबल
एहि धरतीक नाभि पर बैसलि एकटा स्त्राीक उसझब
एहि चिनुआर-ओसार
आ घर-दुआरकें जतबा भिजेतैक...

सभ किछु रहत यथावत्
खाली पनबट्टीमे राखल एकटा सरौताकें छूब’ बला
आँखिक इजोत
पिपरमिन्टक पैखना लगा क’ हवामे बिला जाएत
नेरूक पीठ पर चतरल हमर हाथक स्पर्श
गोहालक गोंत आ अन्हारमे कतहु
हाफक बटन जकाँ हेरा जाएत
कोरमे दुबकल बगरोक बोलीकें पढ़बाक सेहन्ता
हमर देहक भाउरिमे घूमि-घूमि क’ सेरा जाएत...
एक दिन एकादसीक पारनक बाद
तौनीमे मुँह झपने जखन नीनक आवाहनमे रहब व्यस्त
या जिनगीक कोनो नीक-अघलाह काजमे ओझराएल-सोझराएल रहब
चक्रवातक पीठ पर दुलकी दैत एकटा गाड़ी आएत
आ हमरा केओ
ओहि पर चढ़ा क’ पड़ा जाएत।

सभसँ पहिने तखन
कुर्सीक पौआकें कुतरैत घूनक समुदाय करत शोक-प्रस्ताव
फेर डेढ़ी पर ठाढ़ कटहरक गाछ
पीयर गात खसा क’ व्यक्त करत अपन गिलगर मनोभाव
तकर बाद
लोक-बेदक कानब-उसझबमे घर-दुआर दहा जाएत

हमर कपड़ा-बस्तरकें
बहुत दरेगसँ फरकी पर बान्हि-छान्हि
चारि कनहा पर एक गोटाक स्मृति लदने आ राम-राम जपने
डबडबाइत आँखिएँ
जखन आरा दिस अहाँ सभ विदा होएब
तँ लगातार अकानैत आ बेर-बेर ऊपर तकैत झबरा कुकूरक अतिरिक्त
आर केओ हमर बोली-बचन नहि सूनि पाएब

पा भरि चानन आध सेर घी
आ एक ढेरी लकड़ीकें जरा-तरा क’
अहाँ सभ हमरा
निरन्तर मिझाइत खिस्साक एकटा कोन्टीमे स्थापित क’ बिसरि जाएब
मुदा टुग्गर चिलका जकाँ अहाँ सभक मुँह तकैत
असंख्य नक्षत्राक ओलतीमे ठाढ़ भेल भिजैत
हम एकटा अनन्त प्रबासकें बिताएब




नर्क-निबारन-चतुर्दसी
एहि ठामसँ दिन भरि यात्रा कएलाक बाद
गोहाटी अबैत अछि
गोहाटीसँ भरि राति आ भरि दिनक बाद
अबैत अछि--कटिहार
कटिहारसँ चारि-पाँच घण्टा निरन्तर
ढचर-ढचर सुनलाक बाद मधेपुरा देखार दैत अछि
आ मधेपुरासँ लटकल-फटकल पहुँचै छी--सिंहेसरथान
फेर सिंहेसरथानसँ--
चल बुढ़िया डेगाडेगी...
सुपौल मे कीन देबौ हबागड़ी...
मुदा हमर हवागड़ी सुपौलमे नहि
उतरबरिया घरक मोखाक गन्ध त’रमे राखल अछि
जत’ पहुँचि क’---एक जोड़ा फाटल पैरकें छुबिते हम
पच्चीस बर्खक यात्रा एक क्षणमे पूरा करै छी
आ देखैत छी जे---एक टा नर्कविहीन दुधमुँहा जीवनक
हरियर-कचोर दृश्यमे---नर्क-निवारण-चतुर्दशी
तुलबुलिया झिंगनीक पीयर टुहटुह फूल जकाँ खोंसल अछि
आ ओकर कातमे बिजलता सन चमकैछ
डाभि आ गौखलासँ भरल आरि
जे भोर आ दुपहर आ साँझकें मटियाबैत
अन्ततः दैत अछि ओही बर’क गाछ तक अदारि
ओहि गाछक डाँड़ पर एक टा धोधरि अछि
आ गाछक कन्हासँ फूटल अछि अनेको ठाढ़ि
ओकर एक टा ठाढ़ि पर अछि---पहड़िया मैनाक एक टा खोंता
आ सभसँ ऊपर लटकल हरिअर-पीयर मंूँगाक झालरि...
नर्कविहीन जीवनक ओ झालरि आ निष्कपटताक ओ अज्ञात पुण्य
दूधिया दाँत जकाँ टूटि क’ कतहु भ’ गेल विलीन
आ जीवनक एहि नर्कमे छटपटाइत
ई टुग्गर मोन---भ’ गेल अछि एतेक तिक्त आ श्रीहीन
कि एकरा
ने कोनो एकादशी ने द्वादशी ने त्रायोदशी आ ने चतुर्दशी
क’ सकैत अछि श्रापमुक्त ज्वरविहीन

पच्चीस-छब्बीस बर्खक पहाड़क ओहि पारक जीवन
अछि एतेक निष्पाप
आब लगैत अछि एतेक दुर्गम---कि कहियो-कहियो ओ
पूर्वजन्मक कोनो स्फटिक क्षण बुझाइत अछि
मुदा कखनहुँ-कखनहुँ ओ लगैत अछि एतेक लगीच
एहेन अन्यतम---कि कुड़ियाब’ लगैत अछि हमर पीठ
टहक’ लगैत अछि हमर प्राण



स्त्राीक आँखिएँ
नहि
एक्को टा शब्द नहि
उच्चारणक एक टा हल्लुको आघात
जलरंगक एहि लिपिकें थरथरा सकैत अछि
तें एना करू
कि एहि भाषाकें अपन उद्गममे घूरि जाइ दिऔ
आ प्रस्तुत अछि जे
ओकरा एक टा स्त्राीक आँखिएँ देखिऔ--

गाछ-पातसँ झाँपल रहलाक अछइतो
एहि जल-प्रवाहमे जँ
झिलमिला रहल अछि सूर्य
तें ओकरा सूर्यास्त कहि क’
एक टा सम्भावनाकें अपना हृदयमे नष्ट नहि करिऔ

भ’ सकैत अछि
एहि निर्जल समयक पीड़सँ बेकल ई नदी
पुनः हो गर्भवती
आ अपन मातृत्वक कान्तिमय वेदनामे
कुन्तीए जकाँ सिहरि-सिहरि क’ चमकि रहल हो!

एक दिन
आइ नहि तँ काल्हि
काल्हि नहि तँ परसू
परसू नहि तँ तरसू
एक दिन अहांँ घूरि क’ आएब अही चैकठि पर
आ बेर-बेर अपनहिसँ कहब अपना--
धन्यवाद! धन्यवाद!!


ओहि स्त्राीक कानब
घरक सभ गोटाकें खुआ-पिआ क’
अपनहु खा क’ आ भनसा घरक फट्टक लगा क’
पैर धुआ क’ एकटा स्त्राी अहाँ लग अबैत अछि
आ अहाँक पाँजरमे दुबैक रहैत अछि।
मसहरीसँ हाथ निकालि अहाँ लालटेम मिझबै छी
आ जीवनक अज्ञात उछाहमे
डबडब करैत
स्त्राीक अन्हारमे अपन सुख तकै छी।
फेर माछ-भात
फेर धनियाँ-मूरक चटनी आ फेर नेबोक स्वाद
फेर जाफरानी पत्ती आ फेर स्त्राीक अन्हार...
फेर अहाँ अपन उज्जर-सफेद जिनगीक कारीगरकें
मोने-मोन सुमरै छी
आ सन्देहसँ सोचैत छी बुद्धक दुख-दर्शन।
सुनू
खाली सपता-विपतासँ बान्हलि नहि
सात हजार विपैतसँ गछारलि अहाँक स्त्राी
नूनक कोही लग तेलचिट्टा जकाँ भटकि रहलि अछि
तेसर सालक तम्मा जकाँ
अछि कोठीक दोगमे दुबकलि
बरदक नाँगैड़क कपचल केस जकाँ
टाटक बत्तीमे खोंसलि अछि
सोमबारीक ताग जकाँ पीपरक गाछसँ लटकलि...
आ अहाँ
वाइलक बदला छपुआ साड़ी द’ क’ करैत छी
अगाध प्रेमक प्रदर्शन।
जहिना बहुत रास लड़ाइ आ बहुत रास प्रेम
बहुत रास लौलसा बहुत रास याचना
बहुत रास कानब बहुत रास भागब
खसि पडै़ छै समयक सभसँ पैघ डबरामे
अहूँक स्त्राी खसि जाइत अछि।
अपन माथ मुड़ा क’ आ श्राद्ध करा क’
विगलित मोनें गुमसुम बेटीकें देखै छी
त’ अहाँकें ओहि स्त्राीक कानब सुनाइ पड़ै अछि
जे अहाँक बेटीक देह आ आत्मामे
रसे-रसे पसरि रहल अछि।

रमण कुमार सिंह

उलटबाँसी
कृषि प्रधान एहि देशमे
किसान निरन्तर क’ रहल अछि आत्महत्या
जनकल्याणकारी राज्यक संसदमे
रोज बनैत अछि कानून मुदा
बनिया आ विदेशी सौदागरक लेल
स्कूल-काॅलेजमे आब चरित्रा
निर्माणक नहि
दोसराक जेबी सँ अपना जेबीमे पाइ
झटकबाक देल जाइत अछि शिक्षा
न्यायालयमे अभियुक्तक हैसियत
देखि क’ होइ छै फैसला
आ पमरियाक तेसर जकाँ
लोकतन्त्राक तथाकथित चारिम खाम्ह
अपन अस्तित्व लेल करैत
अछि नित्तह दिन संघर्ष
बाबा कबीर!
उलटबाँसी अहींक समयमे नहि
हमरो समयमे अछि
मुदा कतएसँ लाउ हम
अहाँ सन भाषा आ
अहाँ सन अपन शब्दमे असर
ईहो एक टा उलबाँसीए अछि, माफ करब कबीर!

फेरसँ हरियर
एक टा वयसक एकाकीपनसँ त्रास्त
हम आ अहाँ भेल छलहुँ संग
दुःख, उमेद आ उत्सवक ओहि राति

एक दोसरासँ अपन-अपन दुःख बाँटैत
पता नहि कहिया क’ नेने छलहुँ निर्णय
जे जहिया कनियों टा सुख क’ लेब अर्जित
दुनू गोटए मिलि क’ भोगब
साँचे कहै छी मीता
अहाँक आँखिमे चमकैत आकांक्षा देखि
मौसम अनेरो लाग’ लागल छल सोहाओन
हमर साँसमे व्यग्रता और
शब्दमे उत्साहक होमए लागल संचार
अहर्निश अहींक संगीत गूँजै छल
हमरा हृदयमे
अपन सपनाक एकान्तमे रचने छलहुँ एक टा
सुख-संसार
मुदा यातना आ प्रेमक एहि कथाक
अन्त भेल संशय आ नाउमेदीक कुहेसमे
सब किछु सूगा-मैनाक कथा जकाँ
व्यर्थ भेल मीता
कोनो कथाक एहन अन्त
कतेक दारुण होइ छै से बूझल अछि मीता?
तकर बाद किछु बाकी नहि रहै छै
निपट रिक्तता आ बेमतलब जीवन
अपने मोन समझाबै छै अपना मोनकें
दैत रहै छै भरोस
मित्रा-परिजन सब बुझबैत रहैत अछि
जीवनकें फेरसँ सुखमय बनेबाक व्योंत
नाउमेदीक एहि दौरमे कतहुसँ
उमेदक एक टा टुस्सी फुटैत अछि
आ जिनगी होमए लगैत अछि
फेरसँ हरियर।

किछु अंतरंग मित्राक प्रति
करीब तीनेक साल संग-संग रहैत
कहियो बुझाएल नहि छल जे
हम सभ छी फराक-फराक
केओ दुखित होइ छल तँ दुःखी
भ’ जाइ छलौं सभ गोटए
एकर कोनो मतलब नहि छल
जे के पाइ कमबैत अछि आ
के खरचैत अछि
के खाइत अछि पान आ के
ओकर पाइ चुकबैत अछि
धुआँ-गरदासँ रोगियाह एहि
महानगरमे बाँचल छल हमरा
सभक ठोर पर मुस्की
अखबारक कोनो हेडलाइनसँ नहि
कोनो ने कोनो कविताक पाँतिसँ
होइ छल हमरा सभक भोर
आ खिस्सा-पिहानीक संग होइ छल राति
मुदा आइ ई सब बीतल युगक कथा भ’ गेल
अपन-अपन परिवार बसएबाक क्रममे
उजड़ि गेल हमरा सभक ओ
निश्चिन्त आ उन्मुक्त जीवन
ई तँ हम नहि मानि सकै छी जे
हमरा सभक पत्नी आ बच्चाक कारणें
छोट भ’ गेल हमरा सभक दुनियाँ
हालाँकि दुनियाँ बदलबाक
हौसला नहि रखने छलहुँ हम सभ
मुदा परिवर्तनकामी विचार तँ
रखिते छलहुँ
फेर ई की भेल जे एक्के शहरमे
रहितो ने हम अहाँसँ क’ पबै छी भेंट
आ ने अहाँ सभकें रहैत अछि हमर खबरि
निश्चये दोष अहीं सभ टा केर नइं अछि भाइ
कतहु ने कतहु हमहूँ दोषी छीहे
मुदा एना तँ नहि होएबाक छल भाइ
ई तँ सोचनहुँ नहि छलौं कहियो
जे रोजी-रोटीक भागम-भागमे
बिसरि जाएब हम सभ अपनाकें
ई किऐ भेल भाइ?
जँ अहाँ सभकें एहि प्रश्नक कोनो
उतारा भेटए तँ हमरो कहब
भेंट नहि होअए तँ की हेतै
एसएमएम तँ क’ सकै छी!

आस्थाक गीत
सूर्य अपन लालिमा छोड़ि डूबि रहल
अछि पश्चिममे
सूर्य आइ डूबि रहल अछि
फेर काल्हि भोरे पूरबमे
उगबा लेल
सूर्य काल्हि फेर आओत
बिलहत अपन प्रकाश आ अपन तेज
एक दिन आओर भेटत जिनगी
सूर्य काल्हि फेर आओत
बिलहत वनस्पतिमे रंग
सूर्य अपन उगबाकें व्यर्थ नहि
होअए देत
फेर काल्हि किसान सूर्यक संगें
विदा होएत खेत दिस
नवका फसिल उगबाक तैयारी लेल
फेर काल्हि चिड़ै अपन पाँखि
सम्हारत नव उड़ान लेल
फेर काल्हि हमहँू जीयब एक टा
नव जिनगी
आइ सूर्य डूबि रहल अछि
फेर काल्हि बिलहत जिनगी।




सड़क बनौनिहार
दुर्गमसँ दुर्गम जगह पर आकि
व्यस्त महानगरक कोनो ठाम जएबा काल
सड़क परसँ सर्र द’क’ निकलैत
की कहियो उठल अछि अहाँक मोनमे ई प्रश्न
जे एहि सड़क सभकें बनौनिहार लोक सभ
पहुँचलाह कोनो ठाम आकि नहि?
एक टा सड़क जाइत अछि
देशक बहुत पैघ स्कूल दिस
एक टा सड़क राजधानी दिस
एक टा सड़क उद्योग नगरी जाइत अछि
एक टा सड़क जाइत अछि रंगशाला
मुदा कहियो अहाँ सड़क बनौहिार लोक सभकें
नहि देखने होएब स्कूल, राजधानी,
औद्योगिक प्रतिष्ठान आकि रंगशालामे

एना किऐ होइत अछि जे
जिनगी भरि हमरा अहाँ लेल
नव-नव बाट बनौनिहार लोक
रहि जाइत अछि बाटहिमे
कोनो मंजिल धरि नहि
पहुँचि पबैछ कहियो...?

अहीं सभ लेल
(दफ्तरी लोकक अत्मविलाप)
अहीं सभ लेल तँ हम बौआइ छी रने-बने
करैत रहै छी छल-छर्
िंअहीं सभ लेल रहै छी भरि दिन फिरीशान
मालिकक मुँहलगुआ सुग्गा बनल
डोलबैत रहै छी अपन नाँगरि

नहि निकालि पबै छी अहाँ लेल समय
धीया-पुताक संग नहि खेला पबै छी एको क्षण
मित्रा परिवार सम्बन्ध-बन्ध सभ छूटल
घ’रो पर आफिसेक काजमे रहै छी बाझल
घरसँ आफिस आ आफिससँ घरक तिरपेछन करैत
सोचैत रहै छी जे ई सभ क’ रहल छी अहीं सभ लेल

ई तीन टा शब्द--‘अहीं सभ लेल’
दैत अछि हमरा सन्तोष
ई तीन टा शब्द बनल अछि
हमर रक्षा कवच
अहाँ सोचियो नहि पबै छी जे
घरसँ निकललाक बाद घर घुरै धरि
दिन भरि हम की-की करै छी
आ कत’-कत’ जाइत छी
ई तीन टा शब्द झाँपि लैत अछि
हमर सभ टा अपराध!



अविनाश
सभ दिन रातिमे
सभ दिन रातिमे चारि टा लोक घरक देबाल
सभ दिन रातिमे ताशक कोटपीस
की कतहु किछु भ’ रहल छै गड़बड़
से के कहत?
सभ दिन रातिमे सजमनि सोहारी
सभ दिन रातिमे निन्नक खुमारी

विविध भारतीक छायागीतमे डूबल अछि लोक
ओ समय नहि जे
लोकमे डूबल अछि लोक
जीवनक पुरबा-पछबामे सदाबहार रेडियो
आ नेनपनक झिझिरकोना

बुचनूक घरमे क्यो नइं खेलकइ आइ
हम की क’ सकै छी भाइ?
क्यो की क’ सकैछ?
जखन देशक दुर्भाग्य
गाम-गाम
आत्मा बनि भटकि रहल हो
हम अपन सुखमे कते क’ सकैत छी बाँट-बखरा
हम अपन दुखकें कतेक पोसि सकै छी एकसर

हम एकसर पड़ल दुखी नागरिक
भयक बहन्ना छी बनौने
साँझमे बन्न क’ दै छी देशक दुर्दशाक विरुद्ध युद्ध
जेना युद्ध हो कोनो आॅफिसियल काज

सभ दिन रातिमे चकल्लस
सभ दिन रातिमे रंग-रभस

की हम सभ कोनो भोरक प्रतीक्षा क’ रहल छी?

की हम पछुआएल छी
आह, भरि दुपहरियामे औना रहल अछि मेघक नेह
फूजल खिड़कीसँ बरखा-बुन्नी देखि रहल अछि लोक
लोक, जे कम्प्यूटर पर दुनियाँ देखि रहल अछि
कते प्रसन्न अछि जे बरखाक एकटा बुन्नी
खिड़की नाँघि
आँखिक पपनीक ऊपरका चमड़ी पर
टप्पसँ खसल
कते हिलोर!
कते उत्साह!

बोल्ड ब्रिटनीक दिव्य दर्शन उपलब्ध अछि हमरा
आ कोनो दोसर देसक बरखा-बसात सेहो
हमरा मोन अछि
कतेको भण्डाफोड़मे दर्शक दुनियाँ सम्भव भेल सरहद
पार, समुद्दर पार
हम एकटा कोन धेने उत्साहित नहि
जे कोनो कोन हमरासँ विलग नहि

तखन, अपन देसक बरखाक मात्रा एकटा बुन्न
हमरा किऐ क’ रहल अछि विभोर
पुलकित पोर-पोर

की हम पछुआएल छी?
जखन अपसियाँत आधुनिकतामे
बिला गेल हो दिन-राति
हमरासँ प्रतिस्पर्धामे अछि भोर
भोरे-भोर
की हम पछुआएल छी?

कहबाक कला होइ छै

हिसाब-बाड़ी कहियो नइं भेल
आँगुरक बीचमे भूर अछि
जे अरजल सभटा राइ-छित्ती भेल
छिपलीमे बाँचल कनखूर अछि

हमर गाममे छल एकटा चैंसठ
कहैत छल,
अरजबाक कला होइ छै

जेना बिदापत मंच सँ कहै छथिन कमलाकान्त
कहबाक कला होइ छै

कलाजीवी झाजी आ कलाजीवी कर्णजी!
कलाजीवी हुकुमदेव आ कलाजीवी फातमी!

बाढ़िमे दहा गेलनि जिनकर गाम
सुन्न छनि जिनकर कपार
गुम्म छनि मुँहमे बकार

नचारीमे नइं ल’ पओता आनन्द

केओ उद्घाटन बाती जरओता
केओ देता अध्यक्षीय भाखन
जाड़-बसातमे चमक चाँदनी देखि
दुखित जन पीयर पुरान कागत पर लिखबे टा करत,
मुँहकें सी’बाक कला होइ छै

कतबो कहथु कमलाकान्त
सुनबाक कला होइ छै
हल्ला-गुल्ला जुनि मचाउ बाउ
छी संस्कारी लोक

कहबाक कला होइ छै!


सन्दिग्ध विलाप
गाममे आब सगरो ठाढ़ अछि कोठाबला घर
दूमंजिला सेहो
लोहाबला दरबज्जा लागि गेलनि बहुतोकें
दलनाक परिपाटी आब रहिए नइं गेल
सभ नुकाएल छथि घर’क दोगमे

दुपहरियामे रिक्शा पर टघरैत-टघरैत
हम हुलक’ चाहै छी दीयाद-बादक घर-आँगन
मुदा मन्हुआएल देबाल
बन्न खिड़की-दरबज्जा कहि दैत अछि
जे आब लोककें तकलासँ नहि भेटत लोक

नद्दी कातक सभटा खेत बहि गेल
गाछी अगोरने अनका गामक लोक

एतेक दिनक बाद अएलहुँ गाम
अबिते हम घूर’ चाहैत छी
परसौनी बाली काकी मुदा दुखित भ’ गेलीह सुनि कए

कत’ जाएब नूनू
भरि मुँह अखनि देखबो नइं केलहुँ अहाँकें
रौद खसला पर कचहरीसँ कक्का एता
त’ दौड़ेबनि हुनके
ल’ अनता माछ

हमरा बूझल अछि--
स्वाद ओएह पुरान हमरा भेटत
मुदा गाम हमरा नहि भेटल ओएह!

मोनक चैबटिया पर ठाढ़ भ’
स्मृतिक एहन हेराफेरी देखि हम विलाप क’ रहल छी
अनचिन्हार लोककें हमर विलाप लगैत अछि हृदय विदारक
ओ समवेत कहैत अछि-- वाह!

मुदा अहीं कहू
जे गाम छोड़ि क’ उन्नति केलहुँ हम सभ
गामक पुरान सन अवगतिमे किऐ घूर’ चाहै छी?




पंकज पराशर

बिहाड़िक बीच बाट तकैत

कोना हहाइत आएल काल-वैशाखी
जे अनसम्हार क’ देलक अछि ठाढ़ो रहब-
माझ बाधमे आड़ि बन्हैत कहलनि जामुन महतो

रंग-बिरंगक पतक्का सब जे उड़िया रहल अछि एहि बिहाड़िमे
देखार भ’ गेल जे किछु छल झाँपल-तोपल एते दिनसँ

केहेने-केहेन मोटगर गाछ नहि थम्हि सकल
गाछीक बीचोमे एहि रच्छछा बिहाड़िक जोर
मुदा एकसरुआ भेल गोटेक टा पीपर गाछ
आइयो अछि ओहिना ठाढ़ गामक सीमान्त पर
कैक बरखसँ

हओ बाबू!
गामक ठाम तँ छियह ओएह
मुदा लोक सब कतए जाइ गेलै हओ?

--चकोन्ना होइत कहै छथिन जामुन महतो
आ गाब’ लगै छथिन अकस्मात आइ-माइ जकाँ चिकरि-चिकरि क’
एक-पर-एक सोहर आ मूड़न-उपनयनक गीत
बेश टहंकारसँ

चकबिदोर भेल हम देखै छी हुनकर सबटा किरदानी
... आ कि ता हरो-हरो क’ आब’ लगै छथि कुहेसक धोन्हि फाड़ि क’
हेराएल-भुतियाएल हमरा गामक साकिन सब
लोक-कथासँ बहरा-बहरा क’ ओहिना करे-कमान

अन्हरिया रातिमे गोरिल्ला युद्धक ओरियाओनमे अपस्याँत
गामक युवक सब सकपंज भेल लोक दिस तकैत अछि
तेहेन नजरिसँ जेना फेर नहि घुरि सकत ओ
अपन गाम-ठाममे कहियो

जानि नहि कहिया होएत उग्रास हओ दिनकर-दीनानाथ!
कहिया शान्त होएत काल-वैशाखीक रच्छछा जोर-
पेटकुनिया देने हमर बाबी
लिबलाहा एकचारीमे गोहरबैत छथिन देवता-पितरकें

जानि नहि कतए-कतएसँ अबैत अछि ई काल-वैशाखी
कोन हवा केर दाब क्षेत्रामे साजैत अछि ई एहेन-एहेन मारुख साज-बाज
हम बहार होइ छी तकर उत्स केर खोजमे
मुदा भेटैत नहि अछि कोनहुना बाट।

राग मालकोश
दूपहर राति धरि लैपटाप पर अस्याँत ओ बिसरि चुकल अछि
अपन पत्नीक सेहन्ता
आ गर्भस्थ शिशुक आगमनक चिन्ता

योग्यताक समुद्र-मन्थनमे एखन एकाग्रचित ओ
अन्तरिक्षोसँ आगू जेबा पर अछि बिर्त

खेनाइ बनेबामे नितान्त अपटु ओकर रोबोट फोन क’ चुकल छै
फास्ट फूड केर दोकानकें
त्वरित होम डिलिवरीक निमित्त

उच्च तकनीकसँ सम्पन्न संचार व्यवस्थाक बीच
ओकरा मुट्ठीसँ बिलाइत रहै छै समय
समय-प्रबन्धनक उच्च डिग्रीक अछैतो

ओकर किन्नहु सक्क नहि चलै छै समय पर
ने दिन बिलमैत अछि नहि राति रुकैत अछि
कोनो अदृश्य लोक पर ओ अनेरो खौंझाइत रहैत अछि

थ्री-जी मोबाइल फोन पर अठबारे-अठबारे फोन केनिहारि
ओकर निरक्षर माइक आवाज
जेना कोनो नरहा इनारसँ अबैत अछि आध्ादित--
हाई लेवल मीटिंगक व्यंग्योत्राीक बीचमे

निराशाक सीमान्त धरि व्यथित माइक स्वर
पुत्रा केर एक्सक्यूज मीक खिसिआएल
द्रु्रत विलम्बित भासमे हेरा जाइत अछि

जकरा लेल चोरि केलहुँ सएह कहलक चोरा...
आ तकर तुरन्ते पंचम स्वर बाट धरैत अछि धैवत दिस...
हमर अभाग हुनक नहि दोष... हमर अभाग...



मारु(ख) विहाग

श्मशानसँ घुरि क’ लोह-पाथर छुबैत बारम्बार करै छी प्रयत्न
एहि असार संसारमे हृदयकें पाथर बनेबाक
मुदा चचरीमे बान्हल एकटा आओर लहास हमर कान्ह केर प्रतीक्षामे
पहिनहिसँ रहैत अछि अहर्निश रुदनांजलिसँ सिक्त भेल

कोना फड़फड़ाएल बमवर्षाक विहग सब महाशक्ति केर विरोधी आकाशमे-
तड़ित लयमे खसैत रहल कलस्टर बम सब निरीह जन अरण्यमे
आ हर्षित होइत रहलाह हाहाकारी स्वर-साधनामे निष्णात घरानाक गायकवृन्द!

मृत्यु-रागमे निष्णात नाटो देशक संगतिया सब अपन-अपन तानपूरा संग
मात्रा एकटा संकेतक प्रतीक्षा क’ रहल अछि पहिनहिसँ तैयार मंच पर बैसल
तबला मिलेबाक ठकठकीसँ दलमलित होइत रहैत अछि मानवताक आत्मा

थाटक बाट बिसरल अपन अश्मेधी टैंकसँ मीडियाकें जवाब दैत
सबटा कोमल स्वरकें बजेबाक भार दैत अछि ‘एंबेडेड जर्नलिज्म’ केर
नव-नव स्वरोत्सर्गी साधक लोकनिकें सम्पूर्ण विश्वक संगीत-पिता(ह)

कहरवा पर कुहरबाक साधनामे दीक्षित करौनिहार संगीताचार्य
नगर-नगरमे पहिनहि खोलि चुकल छथि हँसी मापक दोकान
धोधि लुप्तक मशीन सबसँ भरल अनेक तरहक अंगतराश
एमहर कैक बरखसँ खाली अफ्रीका आ एशियामे ताकि रहल छथि
विश्व-सुन्दरी आ ब्रह्माण्ड-सुन्दरी सितारक तार पर सुता क’ अखबारक पेज-थ्री पर

कोन-कोन राग बाबा हरिदास नहि सिखौलखिन तानसेनकें
मुदा अतृप्त अकबर आब ठोंठ पर चढ़ि क’ निकालि रहल छनि
सबटा राग पेंटेंटक अपन साफ्टवेयरमे संरक्षित करबा लेल

छोट-छोट तानसेन सब आँखि मुनने निमग्न भ’ क’ गाबि रहल अछि
मिनट-मिनट पर राग-मारु(ख) विहाग गुरुहन्त दिवसक पूर्व-सन्ध्या पर
विकासशील श्रोता समूह देशक नव-नव फरमाइशकें ध्यानमे रखैत

खयाल

श्मशानमे फुलाएल फूलक गन्ध मिज्झर होइत
रातरानी फूलक गन्धमे पसरैत अछि दहो-दिस
तीव्रगन्धी चिराइन गन्ध जकाँ

भैरवीक तान जकाँ तबला मिलबै काल क्यो हमरा
हाक द’ रहल अछि कैक युगसँ ओलतीमे ठाढ़ घोघ तनने

उतप्त श्वास केर परागकण सन्हियाइत अछि
मोनक कोनमे उठैत बोल खसैत अछि स्मृतिक तीव्र धारमे
आ भसियाइत चलि जाइत अछि हमर अधजरू लहास
सरगम केर तान जकाँ कपरजरूक विशेषण सुनैत-सुनैत

अहाँक एहि यमन-कालमे
हम नहि क’ सकलहुँ नीक जकाँ संगत से ठीके भेल बहुुत असंगत
कहरवा बजबैत ठोह पाड़ि क’ कनैत एहि मरुभूमिमे
मुखड़ा केर मृगतृष्णाक पाछाँ बौआइत रहि जाइत छी सन्तापित
संलापित कैक योजन धरि अवरोहणक प्रवाहमे


ध्रुपद

घरवलाक मारि वा सासुक तेखाएल बात पर खौंझा क’
बोनगामवाली भौजी काँख तर नुआ ल’ क’ विदा होइ छलीह नैहर लेल
आ गामक क्यो ने क्यो आइ-माइ घुरा अनैत रहनि हुनका
किरिया-सप्पत दैत, नेहोरा-मिनती करैत बौंसि क’ बीच बाटसँ

नैहरक बाट पर जखन जनमि गेलनि दूबि
तँ तामसें आन्हर भेल धी-पूतसँ भरल परिवारक बोनगामवाली भौजी
धारमे डुबबा लेल बहराइत रहथिन घरसँ दहो-बहो भेल
आ तकर बादो क्यो ने क्यो कहि-सुनि क’ हुनका घुरा अनै छलनि बीच बाटसँ

एकटा दीर्घ आलापक आरोह उठै छल नादक ओर धरि टहंकारसँ
जकर छोर पकड़ि क’ घुरा लै छलनि अवरोहक मान
स्त्राीत्वक आहत मोन पर सम्मानक लेपन करैत सुदीर्घ सरगमसँ

अन्तराक अन्तराल भसियाइत चल जाइत अछि दूर-दूर धरि
समन्धक रेगिस्तानमे पानिक दू बुन्न लेल ‘टप्पा’ दिस घीचैत
जीवन-रागक तान कोनहुना घुरैत अछि सम पर
एहि विषम युगक अजगुत थाटकें मोन पाडै़त

आइ मोतियाबिन्नसँ आन्हर भेल बोनगामवाली भौजी
थाहै छथिन स्वर-धार पर करबाक निमित्त साधन्स पानिमे
कोनो बिसरल तरानाक एको क्षणक आसरा
मुदा जीवन पंचमक थालमे लसकल बदलि रहल छनि
एक गोट अनन्त आकुल पुकारमे
विलम्बित केर बिसरल ताल कें मोन पाडै़त आब ओ
गनैत रहै छथिन मृत्युशय्या पर पड़ल-पड़ल
एक...दू...तीन...एक...दू...तीन...


अजित कुमार आजाद

मृतकक बयान
पहिने हमर नाम पूछल गेल
ओ नहि पतियाएल

फेर ओकर नजरि
हमर गरदनि दिस गेलै
ओ नहि परखि सकल जे ओतए
बद्धी छै कि ताबीज

तखन ओ हमरा नाँगट क’ देलक सरेआम
ओकरा तैयो विश्वास नहि भेलै

अन्ततः ओ हमरा मारि देलक
मुदा आश्चर्य
एकर बादो ओ निश्चिन्त कहाँ अछि?

लिंग भेद
अहाँ
मस्जिदकें
मन्दिरमे बदलि देलिऐ

अहाँ ओहिमे
राता-राती रोपि देलिऐ लिंग
टाँगि देलिऐ घण्टी
बजब’ लगलहुँ घड़ीघण्ट
गाब’ लगलहुँ आरती

हे नरेन्द्र
अजानक विरोधमे
खतना कएल हजारक हजार जान लेलाक बाद
की अहाँ कहि सकै छी
अहाँक देवताक लिंग खतल नहि छनि


बारूदक विरोधमे
शान्ति आ सम्मानक लेल युð कएनिहारि आंग सान सू चीक लेल
जखन कखनहुँ
कोइली कुहकैत अछि
दाबि देल जाइत अछि ओकर कण्ठ
कतरि लेल जाइत अछि ओकर पाँखि
लिखले छै पिंजड़ा
सुग्गाक भागमे सभ दिनहि...
परबोक घुटरब कहाँ सहाज छै ककरो

जखन कखनहुँ
कियो देखैत अछि स्वतन्त्राताक स्वप्न
तोड़ि देल जाइ छै ओकर निन्न
तंे कि लोक छोड़ि देलक अछि
सपना देखब...

हे भारतीक प्रतिरूप
अहाँक चाँछ लागल गाल पर
बरु लोक लगबैत रहल नोन-बुकनी
लोहाक माला आ डँरकस पहिर
अहाँ आरो सुन्नरिये भेलहुँ अछि

जुनि घबराउ हे सू ची दाइ
अहाँक डेन पर
जनम’ लागल अछि पाँखि
कोटि-कोटि कण्ठमे
आबए लागल अछि अहाँक स्वातन्त्रय-गीत
आब जखन कि
फूजि गेल अछि लोहाक फाटक
चलू, बारूदक विरोधमे
एक बेर फेर लड़ी लड़ाइ
हम सभ अहाँक संग छी

पिताएल छथि प्रभुगण
चान पर जाएत लोक
मंगल पर ओछाओत जीवन
वृहस्पति पर करत प्राणायाम
किन्तु पृथ्वी पर किन्नहुँ नहि रहत

एत्ते टाक सौंस पृथ्वी
किन्नहुँ कम नहि भ’ सकै छल
अपन सन्तानक लेल
तँ की सत्ते पृथ्वी पर कम भ’ गेलैक अछि जग्गह

प्रकृति गढ़लनि जोंक-झिुंगर-बाघ
ओ गढ़लनि सुग्गा-हाथी-मनुक्ख
मुदा, मुनक्खकें छोड़ि
आर कियो नहि जाएत चान पर, मंगल पर

मनुक्ख चानो पर बनाब’ चाहै’ए
चीन-जापान-अमेरिका
मंगलो पर कर’ चाहै’ए अमंगल
रोप’ चाहै’ए ओत्तहु
गया-नवादा-जहानाबादक बीहनि

बीत-बीतमे बँटल एहि सौंस पृथ्वीक प्रभुगण
एखनहुँ छथि पिताएल
पृथ्वीकें बाँटि लेब’ चाहै छथि दू-दू आँगुरमे
जड़ीब-कड़ीक संग आएल राष्ट्रसंघक अमीन
चिनबारेसँ शुरू करत नापी

चान-मंगलक चिन्तामे डूबलि पृथ्वीक देह
चँछाइत अछि कड़ीक रग्गड़सँ
छातीमे भेंसाइ छै कड़ीदारक गाड़ल खुट्टी
आत्र्तनाद करैत अछि पृथ्वी
आ ओम्हर गाछक जड़िमे बैसल
चान परहक ओ बुढ़िया
चरखा कटबामे निमग्न अछि

अघोषित युद्धक भूमिका
व्यस्त अछि लोक
एकटा
अघोषित
अपरिभाषित
युद्धक भूमिका लिखबामे

रंगमंच पर
रक्तबीजक सन्तान
भान करौने अछि अपन उपस्थितिक
सम्वादहीन दृश्यक परदा
एखन नहि खसतै भाइ

अछियाक हाथें बेचि देल गेल अछि चूल्हिक आगि
आयातित हँसी पर
जुनि भरमाउ संगी
संस्कृतिक रक्षार्थ
ढेकार लेब हमर विवशता थिक

हालाँकि बिझाएल नहि अछि ह’रक फार
कोदारिक बेंट नहि भेल अछि कमजोर
ढील नहि भेल अछि मुरेठा
आर-तँ-आर
लागि रहल अछि जेना
लगहिमे कतहु
पड़ि रहल होइक नगाड़ा पर चोट
आ हम
एहि संक्रमण-कालक परिधिसँ
बाहर अएबाक क्रममे
अपनाकें
रणभूमि मध्य ठाढ़ पबैत छी


कामिनी

अन्हारक सत्ता
घरमे पसरल अछि
बहुत रास अन्हार
आ बाहर टिप-टिप करैत
बरसि रहल अछि
घमाघट मेघ
सोझाँक उछाल खत्तामे
गाबि रहल अछि मल्हार
मदमस्त ढौसा बेंग
लोक कहैत अछि
एहि बेरुका बरसातमे
टूटि क’ रहतै बान्ह
महार पर जएबाक तैयारी
क’ नेने छै लोक
एक टा आतंक
पसरल अछि चारू कात
भय निराशा आ मोह
घेरने अछि चारू कातसँ
सलाइक काठीसँ
निकालै छै इजोत
आ क्षण भरिमे
अन्हार चाँपि लै छै ओकरा
अपनामे
अन्हारक सम्पूर्ण सत्ता
व्याप्त अछि हमरा चारू कात
आ विलीन क’ लेबए चाहैत अछि
अपनामे
एहि घरक सम्पूर्ण व्यवस्थाकें।

चारि पाँती
जहिया धसि जेतै दुनिया
जनसंख्याक भारसँ
आ पसरि जेतै चारू कात
पृथ्वीक एहि झंझर भेल शरीर पर
समुद्रक पानि
जहिया फुटि जेतै अपनहि
प्रयोगशालामे राखल
हजारक हजार बम
जहिया पसरि जेतै
एहि दुनियामे
मारक गैस
जहिया लागि जेतै
सम्पूर्ण जंगलमे
अपनहि आगि
गीत! कत’ बचा पाएब
चारि पाँती?

छौंड़ीक आँखिमे
एक टा छोट छीन छौंड़ीक आँखिमे
समाएल छै दुनियाँ
एक टा भरल-पुरल दुनियाँ
जै’मे कतौ नदी बहै छै
कतौ उतरैत अछि झरना
पहाड़ परसँ
हहाइ अछि कतौ
बाँसक पैघ-पैघ बोन
पुरबा पछबा बसातमे
कतौ उड़ान भरै अछि प्लेन
दूर धरिक यात्रा तय करबा लेल
लगाओल जाइत अछि कतौ
प्रदर्शनी
किछु बेचबा लेल
किछु कीनबा लेल
छौंड़ीक आँखिमे
हँसी अछि/एक बुन्न नोर अछि
पूरा दुनिया अछि
मुदा छौंड़ीक आँखिमे
छौंड़ी नइं अछि
कतौ नै अछि ओकर अस्तित्व
ओकर इच्छा/ओकर आकांक्षा
ओकरा तँ दौड़ाएल जा रहल छै
बेटीसँ पत्नी
पत्नीसँ माइ बनबा लेल।

मादा
मुनिगाक फुनगी पर बैसल मैना
ताकि रहल छै स्नेहसँ
मैनी दिस
ओ छूबि रहल छै
ओकर पाँखि आ ओकर ठोर
ओ करए चाहैत अछि
ओकरा आँखिमे
अपनाकें प्रतिष्ठित
ओहि समयमे
जखन कि पसरल छै निराशा
चारू कात
प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूपें
लड़ैत अछि सब
अपन-अपन युद्ध
सम्हारने अछि सब
अपन-अपन मोर्चा
अपना जगह पर
संशयात्मक दृष्टिएँ
देखि रहल अछि मैनी
मैना दिस
की एकैसम शताब्दीक अँगनामे खेलाइत
दुनियामे
बचल छै प्रेम सनक
किछु संजीवनी तत्व
जे उपहारमे ओकरा देल जा सकै
जकरा सम्पूर्ण रूपसँ
मात्रा मादा बुझल जाइ छै!

दुनिया बड़ छोट छै
ओकरा बेर-बेर मोन पडै़ छै
अपन माइ
जे ओकरा जीवनक कामना करैत
कहै छलै
दुनिया बड़ पैघ छै
जीतै तँ कतौ कमा क’ खेतै
मुदा कोनो पैघ बिल्डिंगक पाछूमे
कड़कट बीछैत
नाली साफ करैत
रेलवे पटरीक काते-कात कोयला बीछैत
इम्हर-ओम्हर फेकल
ऐंठ पात चटैत
ओकरा बेर-बेर बुझाइ छै
भूखक तुलना मे
दुनिया बड़ छोट छै।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...