Thursday, July 17, 2008

पेटार ५

कांचीनाथ झा ‘किरण’
अन्हरिया
की रविकर प्रहार पीड़ित धराक
निवास धूम भरि रहल व्योम?
की रविपतिक अस्त
लखि, भयें त्रास्त
ल’ तिमिर चीर
झाँपल शरीर
अवनी अनाथिनी
की रवि दूर गेल
शशि अन्ध भेल
बुझि, अन्धकार
पटकेर ओहार
लगा, व्योम संग विहार
करैत अछि वसुधा भ’ एकाकार?
की कारी कोसी अछि उत्फाल भेल
तकरे जलसँ करैछ
भू-नभकें एकाकार?
की निसि रमैत अछि कलिक संग
तें भेल एकर अछि कृष्ण रंग?
झड़ैत खुदिया खद्योत भास
उड़ैत चमकी उडुगण प्रकास?
मानव समाजमे वर्ण भेद
सुरुहेसँ अनलक अहंकार
करैत आएल अछि अनाचार अत्याचार
तेंॅ तकरा मेटबै लेल
दलित उपेक्षित मानव जातिक हृदय-वह्नि गिरिसँ
समुभूत तामस तमोपुंज
बढ़ि रहल भरैत अम्बर दिगदिगन्त?
की कांग्रेसी शासनगत अनाचार
अन्धकार बनि अछि व्यक्त भेल?
की अणुबमक पहाड़
देखि मानव जातिक भविष्य
साकार थिक ई अन्धकार?

ताजमहल
भारतवर्षक महाराज
विश्वविख्यात बल-बिक्रम धन-धर्म
पाण्डव लोकनिक इन्द्रप्रस्थसँ पूर्ब
जै कृष्णक ज्ञान कीर्तिकें देखि
अइ देशक विशाल जनसमुदाय
हुनका मानि लेलक
योगिराज, परमेश्वरक पूर्णावतार
तनिकर मथरहुसँ आगू बढ़ि
आर्यावर्तक हियप्रदेशमे,
जै जमुनाक तीरकेॅं देखितहिॅं
मन पड़ि अबैत छै
भगवत गीता केर प्रणयिता कृष्णक बाल विलास
गोप-गोपिका केर संगमे निश्छल खेल विलास
तही जमुना तीरक करेज पर ठाढ़
रे ताजमहल तोॅं की थिकेॅं

जकर कोखि
हँटा हिन्दू ललना योधाबाइक शोषित केर प्रभाव
जनमौलक बाप भाइ केर घातक
अगणित मन्दिर-मूर्ति विध्वंसक
भारतभूमिक औरस पुत्रा हिन्दू जातिक द्वेषी
औरंगजेबकेॅं
तै मुमताजक गोरिक ऊपर ठाढ़
माथ उठौने सीना तनने खलखल हँसैत
रे ताजमहल तोॅं की थिकेॅं?

दूधक समान उज्जर दप-दप
एत्तेक रास शंखमरमर पाथर
ताकि ताकि अनबामे
कते ने नरनारी
बौआइत अपसियाँत होइत
भूख-पियासेॅं व्याकुल तनमन
मरि गेल हएत सोनित बोकरि
कत्ते ने मोती डाहल गेल हएत!
देसक धन-जन मेहनति केर मेघसँ
बनल कलेवर
रे ताजमहल तोॅं की थिकेॅं?

की मुमताजक प्रबल प्रेमवस
साहजहाँ
बताह छल भ’ गेल?
नहि नहि
प्रेम बना दैत अछि मानव मनकेॅं
कोमल मधुमय
तैं ने, अनको नेनाकेर
हँसैत मुँहमे दनुफ फूल सन दुद्धा दाँत
देखि, फलकि उठै छै सन्ततिबानक हिरदय?
बताह थिक ओ, जे कहैत अछि तोरा
साहजहाँ केर मुमताजक प्रति दिव्य प्रेम साकार
जँ साहजहाँके मुमताजक
अतिसय पे्रम छलैक
तँ कोना क’ सहलक ओकर मरण आघात?
की देखैक निमित्त बूढ़ रहितहुँ
काराघरमे बन्द
बेटा सबहक मरण देखैत-सुनैत
रहल ओ जीबैत?

निश्चय ओकर हृदयक भीतर
नुकाएल, कोनो अभिलाषा
छल पूर्ण होइत औरंगजेब केर हाथेॅं।
तोहर छलसँ साहजहाँ
अपन जातिकें देने छल उपदेश जे
हिन्दू सभकेॅं नहि छै पौरुख ओ अभिमान
राजनीति केर ज्ञान

दै अछि बेटी-बहिन बिआहि मुसलमान केर संग।
किन्तु अपने हिन्दूए अछि बनल रहैत
मोगल समराटक सार ससुर बनि
निसकंटक निश्चिन्त मने अछि राज कैत।
हमर पितामह अकबर छला परम बुधिआर
तहिया हिन्दू केर सहयोग बिना
टिकि न सकै छल साम्राज्य हुनक
तेॅं हिन्दूक बेटीक संग कएल विवाह
मुदा तेॅं छोड़ल की अप्पन मुसलिम धर्म?
हिन्दू मुसलिम केर एकता
हुनकर जँ रहितए लक्ष्य हृदयसँ
तँ स्वयं हिन्दूए बनि जैतथि!
अथवा
भारत भू पर के छल एहन मुसलमान सरगना
जे करितनि विद्रोह?
विद्रोह केनहि की होइतैक?
किऐ न रखलनि नाम
अप्पन बेटा केर
विश्वनाथ?
जगदीश?
हिन्दूकेॅं परतारैक लेल
चलौलनि-दीनइलाही नामक
अभिनव धर्म।
पहिरैत छला हिन्दू केर पोशाक
हुनक नीति केर
आब न रहल प्रयोजन।
तैं जोधाबाइक सन्तति रहितहुँ
हम बिआहल मुमताजहिकेॅं।
तीर्थों सभसँ बढ़ि तीर्थ
कृष्णक प्रिय जमुना तट पर
क’ तोहर निर्माण
साहजहाँ अपन पुत्राकेॅं देलक
मन्दिर पर मसजिद बनबैक इसारा
मानव-हृदयक परिचय
ओकर बेटाक काजसँ पाबैक थिक
ई अनुभव अछि बहुत पुरान
औरंगजेबक छल साहजहाँ केर
मनोभाव साकार।

के कहि सकैत अछि
कोन देशमे कहिया
जनमि सकै अछि लोक केहन?
भारत भूमिक मूल निवासी केर सन्ततिमे
आबि सकै छै पौरुख ओ अभिमान
अप्पन पुरुखा केर पराभव झाँपै खातिर
तोड़ि सकै अछि विजेताक स्मारक गढ़, भवन, महल
तैं रे ताजमहल
तोरा बनौलक एत्ते सुन्दर
सम्भव थिक जे तोहर सुनरता देखि
वीर केर हाथ ढील भ’ जाइक
देखि तोहर रूप
भ’ उठए मुग्ध।
मनमे आबि जाइक कलाकार केर हस्त-चातुरी
साहजहाँ केर मुमताजक प्रति प्रेम
मुमताजक सुन्दर सुकुमार शरीर
तँ हाथक तरुआरि
चल जाएत अपनहि मियानमे।
सुन्दरतामे लुबुधुल मानब होइत अछि मौगियाह
तैं रे ताजमहल
तों थिकेॅं
मुगल विदेशी बादसाह साहजहाँ केर
प्रभुता-वैभव-नीति निपुणता
हिन्दू जातिक पौरुख ओ अभिमानहीनता
नीतिशून्यता, बुद्धि विकलता
परिभवमय इतिहासपूर्णता केर साक्षी साकार।

तन्त्रानाथ झा

काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’
लतिका
लतिके, लति के देल एहन, अनके पर अनुपल जीबी
निज निन्दा-नद-नीर-निमज्ज्ति, ग्लानि गरल की पीबी
पर-शिर-भार अभार दियाबए
नव-युग युग-कर मलि दुख पाबए
चेतन होइतो चेत न क’ ओलरैत एना की लीबी?
पातक बाढ़ि कएल पातर जनु
तदपि तरुनि, ते जी न तरुक तनु
जे लग, लगले लटकि ततहि नव-प्रीतिक सुजनी सीबी
थीक उचित चित थिर क’ वल्लरि
गही स्वावलम्बन जीवन भरि
आनक चाट-उचाट-विवश हो, शिथिल न संस्कृति-नीवी
लतिके, लति के देल एहन, अनके पर अनुपल जीबी

माइलक पाथर
बिगड़ल कर्म गड़ल पथ पर
पाथर हम थर-थर काँपी
देखत के कम्पन, न अपन क्यो
स्वारथ-रथ, युग पापी।।
चलि-चलि विचलित-चित पथिकक हित
कोश न, तदपि कोस चिर अंकित
देखा आसकति छीनि, आस कति
द’ हुनि द्रुत-गति नापी।।
ल’ग अबैत जन लखि लगले हम
पद-रज-सम्पद-हित न मुदित कम
मुदा उदासी मात्रा हाथ, सभ
की रघुनाथ प्रतापी ??
टक-टक बाटक गत-आगत-क्रम
देखितहुँ मुक्तिक हेतुक अक्षम
तेहन ‘मइल’ अंकन, न हृदय दुख
की द’ टोइया-टापी।।
सुरेन्द्र झा ‘सुमन’
वैद्यनाथ मिश्र यात्राी

आरसी प्रसाद सिंह
मेघ लगै छै
मेघ लगै छै, बून्द झड़ै छै, नचइत छै मन मोर रे
कोन प्रिया केर कजराएल दृग, आइ भरल छै नोर रे
कारी-कारी घटा उठै छै पाकल जामुन रंग के
चमकै छै बिजुरी बिजुवनमे, सुधि ने रहै छै अंग के
छने इजोत, अन्हार छनेमे बुझि ने साँझ की भोर रे

कुसुमलता अवनता पिबै छै बिहुँसि-बिहुँसि रस-धार रे
अपनहि करसँ जनु पहिराबै छै प्रिय मुक्ताहार रे
आबि रहल छै की ककरो मन-राखन माखन-चोर रे

डोलि रहल छै झिहिर-झिहिर मधु-मातल सरस बसात रे
काँपि रहल छै सिहिर-सिहिर हरिआएल आमक पात रे
ककर कन्त भेल चान, कनै छै ककर हियाक चकोर रे

माँग
माँगि रहल छी प्रथम आइ, हम अपन मातृ-जन-वाणी
माँगि रहल छी हम विदेह-भू-भाषा चिर कल्याणी।
माँगि रहल छी हम कवि-विद्यापतिक साधना-वैभव
माँगि रहल छी हम हिमवानक अमृत स्रोत चिर अभिनव।
जहाँ बहै कोशी ओ कमला, गंडकीक जलधारा
ओ धरती ने आब रहत हे, किन्नहु मानव-कारा।
शस्य श्यामला झूमि कतए, हा! कतए रूप-रस-निर्झर
सदा बसन्त-बहार कतए ओ, गेल कतए कोकिल-स्वर।
भरल काश-कुशसँ अकाय वन, धीपल वायु उड़ै अछि
मरघट भेल स्वर्ग, वन नढ़िया, गिद्ध कुकुर कुचरै अछि।
लेब अपन अधिकार आब हम, अपन महालक पानी
माँगि रहल छी प्रथम आइ, हम अपन मातृ-जन-वाणी।

ब्रजकिशोर वार्मा ‘मणिपद्म’
श्री गोविन्द झा
रामकृष्ण झा ‘किसुन’
आक्रामक स्वर

खण्ड सत्य। विस्थापित
भावनात्मक एकताक
फोंक-फूसि नारा।
सार्वभौम क्रमबद्धताकें तोड़ि।
हमरा ने शुक्लक डर अछि
ने कृष्णक
हम अहाँ जकाँ तटस्थ द्रष्टा
नहि, भोक्ता छी।
गाछ पर सँ उतरल एकटा
लुक्खी (नारी)
अहाँक मस्तिष्क पर
अनेक वर्ष धरि पड़ैत रहल अछि
काव्य-शास्त्राक हथौड़ा।
ततेक पिटा गेल अछि
जे शुद्ध बोध पिचा गेल अछि
पचकि गेल अछि
ओ पुराना प्रेत अहाँक घेंट दबौने अछि।
अथवा घोल फचक्का-
सँ अहाँ अप्रतिभ
भ’ गेल छी ¯ककत्र्तव्यविमूढ़।
शब्दक बोरामे अर्थक
अल्हुआ भरबाक
प्रक्रियासँ अहाँ
मोहाविष्ट छी।

ओम्हर पीपरक गाछ
एकटा ब्रह्मराक्षस
भाष्कारक टीकाकें
चरि रहल छै बकरी
तखन अजा-भक्षित
भ’ जाएत अहाँक काव्य
यथास्थितिकें बनौने
रखबाक आग्रही
दैत्य सभकें नमस्कार
लिअ’ जागि गेल अछि
शेष नागक
शय्यासँ क्रोधोत्थित
मधुसूदन।
हमर स्वर केवल
हमरे नहि थिक
ई थिक समस्त
विक्षुब्ध विश्वक
आक्रामक स्वर।


आवृत्ति...आवृत्ति

एतेक रास फालतू शब्द
जकरा सभक अर्थ
कोनो घसल-टूटल शिलालेख जकाँ अस्पष्ट अछि
हमरा ओ शब्दकोश नहि दिअ’
एहि पूँजी पर केवल धोखाक दोकान चलि सकैछ
की हेतै अभिव्यक्ति-वंचना ल’ क’
वायुमण्डल वितानक कारणें
समस्त सौर-विकीरणक शतांशो पृथ्वीकें प्राप्त होइछ

ई फूसि शब्द-जाल
कथ्यक उर्जाकंे निष्प्रभ क’ दैछ
हारि क’ लोक अनागतक कूपमे
अपना मुँहक प्रतिबिम्ब ताक’ लगैछ
विवश आत्म-सन्तुष्टिक प्रतीक्षामे तल्लीन
वत्र्तमान एकटा सड़ल घाव थिक
रहि-रहि क’ नष्ट पीज टीस मारैत अछि
अतीत कोनो झमटगर गाछक छाहरि नहि
हम अपन समस्त समय सर्वस्व
शून्यक अनन्तताकें समर्पित क’ देेेने छी।

नहि देखैत छी हम अपना गामक भग्नावशेषो
नहि पबैत छी अपना घर धरि पहुँचबाक बाट
की करब हम ओ शब्दकोश ल’ क’
जाहिमे केवल अर्थहीन शब्द सभक संग्रह अछि।
जकरा बल पर हम कतहु नहि जा सकैत छी
ओकरा ओझराहटिमे शुरूसँ एखन धरि
होइत रहलैक अछि केवल
आवृत्ति...
आवृत्ति...
आवृत्ति...!

रचनाकाल: 3 मई 1969
एकटा कसबानुमा गाम

नीक लगैछ हमरा अप्पन ई गाम
अदहा-छिदहा शहरक देहातक ई फेंट
कसबानुमा गाम
हमर चिक्कन चुनमुन गाम

जत’ विदेशी आयात आ देशी निर्यात
होइत अछि संगहि संग दुहू केर बात
जत’ सिम्मरि आ पलासक टटका फल
मुनिगा आ कचनारक सौरभ
पीपर आ शिरीसक छाहरि
मनोप्लाण्ट कैक्टसक छवि संग भेटैत अछि

जत’ चैक पर यातायात नियन्त्राणक पुलिस
आ प्रत्येक चैक पर मन्दिर
मन्दिर सभमे हनुमानजी
वा शिवलिंग कि राम-जानकीक प्रतिमा
सिनेमाक तर्ज पर झमटगर भजन
लाउडस्पीकर पर होइत रहैछ
जत’ अष्टयाम
नीक लगैछ हमरा ई कसबानुमा गाम
जत’ डीहवारक थान पर ‘भाओ’
आ होइत अछि
धात्राी केर गाछ तर भोज
ग्राम्य-संस्कृति आ नगर-बोधक
होइछ जत’ खोज
दरबज्जा पर सत्यनारायणक कथा
आँगनमे सामा-चकेवा
बेड रूममे जाजक लय पर
ट्विस्टक सिसकारी
एक्के ठाम फडै़त अछि
तिलकोड़, खम्हारु आ महकारी


जत’ सिनेमाक पोस्टरक उत्तेजक अश्लीलता
ड्रेन पाइप पैंट पहिरने ‘हीरो’ सभक दल
करैत अछि नित नवीन पेरिसक नकल
जत’ सेफटिक शौचालय
आ बसबाड़िक अ’ढ़मे
शौचमुक्त होइछ लोक जंगलमे, ख’ढ़मे
टेलीफोन, बिजली आ पीचरोडक संग-संग
गरदा भरल सड़कक जत’ दुहू कात
सड़ैत रहैछ मलमूत्राक दूषित बसात

जत’ अल्ट्रामार्डन ड्रेसवाली
अनेको धी-पुतोहु
पीपरमे पानि ढ़ारि सेकेन्ड शो सिनेमा जाइछ
रिक्शा, बस जीप, कार
मोटरसाइकिलक कोलाहलमे
योगासन-प्राणायाम
ध्यान-धारणाक क्लास होइछ
रामनामा चादरि ओढ़ने साहुजीक
बेटा चलबैछ विलायती शराबक दोकान
दोसर कात अहिंसक मधु बिकाइछ
जत’ काॅफीक टेबुल पर होइछ
परम्पराक विद्रोह
नैतिक मानक अनास्था
निराशा, कुण्ठा, अवसाद, सन्त्रास पर
साहित्यिक, राजनीतिक चर्चा
जत’ राजकमल चैधरी, यात्राी
आ सुमन अमर राघवाचार्यक
समान सम्मान होइत अछि
जत’ ‘जय जवान जय किसान’
आ खण्डित समन्वय दुहू लिखल जाइछ
जत’ पाउडर मिश्रित फोंकलाहा
गहूमक सरकारी दोकान पर
दोकानदारक मुँह चटैछ राजनीतिक कार्यकत्र्ता
पाँच सय ग्राम चीनी
आ साढ़े तीन गोट टाका लेल
जे एकटा पायजामा सिया क’
एक कप चाह आ दू खिल्ली पान खा क’
इन्दिरा, अयूबसँ ल’ क’
माओत्सेतुंग, निक्सन धरिक
चीर-फाड़ करबामे माहिर अछि

जत’ अन्हारक आतंक
बैसल-बैसल मोंछ पिजबैछ
आ इजोतक पातर-छितर
पियराएल किरण सभ
सोडर लगौल, भखरलहा घरक
चिनुआर पर
चुपचाप लडै़त अछि देशक भविष्यसँ
अर्द्ध-गौर, अर्द्ध-श्याम, हम्मर ई गाम
नीक लगैछ हमरा ई कसबानुमा गाम।

रचनाकाल: 31 मार्च 1969/सोनामाटि: 1970

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
राजकमल चैधरी

विद्यापतिक प्रति, जनिक काव्य लखिमा रानीक शयनकक्षसँ
उड़ीसा, बंगाल, असामक जन-मजूरक झोपड़ि धरि पसरल

राधा तोहर बेचि रहलि छथि देह
भाषाके अंजलिमे भरि कए श्रद्धा के रविफूल
आएल छी हे कवि-कोकिल हम तोहर स्मृति कूल

गीत तोहर जाग्रत करइ’ए एखनउँ सूतल प्रान
तैं सभ काल करइ छी सभ मिलि तोहर चरचा-ध्यान
सभ उत्सव सभ पर्व गबइ छी अभिनव जयदेवक गान
भाषा-काननके छह तों विद्यापति, अमृत-पुष्प अम्लान

आबह मिथिलामे पुनि आबह जनजीवन सूय्र्य
महाराज शिवसिंहके हे सेनापति, जगबह क्रान्तिक तूय्र्य

रतिविपरीत आ रतिअभिसााक लिखने छह कत गीत
आब न शृंगारक जुग छइ, ने छइ कतउ सिनेह पिरीत
युद्ध, अकाल, बाढ़ि, रौदीसँ अछि जनसमाज भयभीत
कतउ ने भेटए शान्ति छनो भरि, किओ ने भेटए मीत

संस्कृति-सभ्यताक हिमालय भ’ गेल चूर्ण-विचूर्ण
भाषा-साहित्य नायिकाक नयन अछि रक्त-अश्रुसँ पूर्ण

देश जरइए लोक मरइए, वस्त्रा भेटए नइं मुठियो भरि अन्न
साधारण दुखदुविधा अभावसँ सभक हृदय अछि छन्न
प्रगतिविकास सुखसाधन के सभ रस्ता भेलइ सभतरि बन्न
राधा तोहर बेचि रहल छथि देह, कृष्ण तोहर अवसन्न

शक्ति उपासक हे विद्यापति, हे जनकवि राखह देसक लाज
आबह कंसक राज हटा कए लाबह कृष्णक समता राज

जतए ने नारिक लाज बिकाबए माइ-बहिन नइँ बेचए देह
जतए ने प्यासें कानए धरती, बरिसए नइं आगिक मेह
जतए ने बाढ़िक प्रलयधारमे बहि जाए गाम आ गेह
जतए ने पापी पेटक कारण, मरए देशसँ लोकक स्नेह

इएह हमर श्रद्धांजलि थिक आ इएह हमर आह्वान
तोरे स्वरमे गबइत छी मिथिला जन-जीवन के गान
तोहर स्मृति जलसँ भरैत छी सूखल सरिता प्रान


महात्मा
देशक माटि जकर परिधान बनल सदिखन
देशक पानि जकर मधुपान बनल सदिखन
थिक ओएह महात्मा

जे सभ पीड़ा आत्मवेदना चुप्पे रहि वरण करए
जे हँसि क’, मुस्का क’ दुख-झंझा हरण करए
आक्रोशें हाहाकारें नइं प्रलय मचाबए कहिओ
नियतिक पाथर-पथ पर आन्हर बनि चरण धरए
आस्था-शन्तिक सम्मान बनल सदिखन
थिक ओएह महात्मा

जे चलए त नइं पाछू-पाछू भागए जन-समाज
जे नइं चिकरए--बदलब हम अन्यायक कुराज
पत्नीक नेह, परिवारक शरीरसँ बान्हल-छेकल
चलए ने कखनऊँ क्रान्तिमार्ग ल’ देशोद्धार काज
जीबए गृह-आँगनक प्रान बनल सदिखन
थिक ओएह महात्मा

जे ने जाए मन्दिर धरि पूजासँ निर्माण करए परलोक
जे बनि जाए खेतक आरि-धूरसँ सटल, मृत जोंक
नइं ताकए आकाश दिस, धरती पर ओंघराएल रहए
समयक बरखा जकर हर्ष, दाही रौदी जकर शोक
बिहुँसए खेतक खरिहानक अभिमान बनल सदिखन
थिक ओएह महात्मा

शयनकक्षक नारीसँ
हे मेनका,
अहाँक इन्द्रधनु आँचर पर अंकित करए वासना-चित्रा
प्रस्तुत छथि नइं आइ केओ विश्वामित्रा
ने कोनो महाराज दुष्यन्त
क’ सकताह अहाँंक शकुन्तलाक असहायताक अन्त
खेत तमबामे, बान्ह बन्हबामे लागल अछि लोक
चारू कात पसरल अछि हृदयक नइं, पेटक बहु शोक

हे उव्र्वशी,
के देखत आब आदिमुद्राक चकित मुदित अलस नाच
अभाव-चूल्हि जरै’ए, लोक लगबै’ए प्राण-जारनि आँच
सम्राट विक्रम-पुरुरवादि भ’ गेलाह दरिद्र
सामन्ती-जीवन केथरीमे भेल अछि लक्ष लक्ष छिद्र
आ, हम सभ अर्जुन, महाभारत जितबामे लागल छी
मरल नइं, सूतल नइं, जागल छी

हे रम्भा,
जरल नन्दन, अपने वज्रसँ इन्द्र आत्महत्या कएलनि
अहूँ स्वर्ग छोड़ि भागू, देवगण धरतीमार्ग धएलनि
विलास-नृत्य तेआगि दिअ’, परतीमे रोपू धान
तखनइं बाँचत जीवन, तखनइं ऐ कल्यान


मायानन्द मिश्र

मानवता
मुँहमे एखनहुँ पड़ल छै अधचिबाओल
हरित, कोमल आस्था केर शस्य,
कानमे एखनहुँ गुँजै छै तानसेनक गीत
किन्तु
दुष्यन्तक देखि भीषण रथ
धनुष आ तीर
भयाकुल अछि हरिन-दल
संत्रास्त
द’ रहल चकभाउर ठामहि ठाम।

एसगर
डुबैत जा रहल अछि हमर ‘आवाज’
एहि माथाहीन भीड़क असम्बद्ध कोलाहलमे
हमर ‘आवाज’ डूबल चल जा रहल अछि
असहाय
विवश
ओकर लहराइत हाथ एखनहुँ देखबामे आबि रहल अछि
सब ताकि रहल अछि
मूक, असमंजसमे।
कहियो जागत पौरुष(?)
ता कतेको डूबि गेल रहत।


सोमदेव
एकटा अदना सिपाही

अपन सकेत कोठलीमे बैसल
जम्बूद्वीपक एकटा अदना सिपाही
सकेतमे अपन टाँगो नहि पसारि पबै-ए
मुदा खुशफैलमे गोली खूब चलबै-ए
मुइलकें मारैत। मारलकें मालक चाम जकाँ
घीचैत। चामकें
भान पर लदैत...। अपन सकेत कोठलीमे अपन माथ
उतारि क’ राखि आएल बेचारा एकटा अदना सिपाही
चिन्ताक मुरेठा कहुना खलिया पर लपेटने। बेचारा
एकटा अदना सिपाही
हृदय आ हाथ। यन्त्राक दू गोट असम्बद्ध पुर्जा
राजनीति शतरंजक प्यादा। चैबटियाक पेंचसँ कसल
विशेषणहीन। पाइ ओसूलैत। बहादुर। रिक्शा पर।
डण्टा बजारैत। बेचारा सिपाही
अपन सकेत सौंस कोठली बाहु पर उठौने
अशोक वनमे सीता दिस अँखियबैत

अइँठ-कूठि-निंगहेस पेटमे कोंचैत। त्रिजटाकें पछुअबैत
बाल-बच्चाकें लतिअबैत
दुनू मोंछ दुनू तरहत्थी पर रखने। विस्मित। बेचारा
जम्बूद्वीपक एकटा अदना सिपाही
बहीर साँप सभक सुखनीनक वास्ते
सकेत कोठलीवाला गलीक कण्ठ पर पदचाप दैत
‘टेप’ बजा रहल अछि। राति पर बारूदी
लेप सजा रहल अछि।

बम्बइ: समुद्र तटक एकटा साँझ
पहिने होइत छल कदली सन जाँघ। शंख सन कण्ठ। खंजन नयन, सिंहक डाँड़
आ एखुनका नायिका। शंखखोपावाली। खंजनजिह्ना। हे कदलीवदनी!
हमरा आगाँ एना एक-एकटा डपोर नहि नोचने जाउ
अपन सिंह सनक आँखिकें पिपनीक पिंजड़ामे बन्न क’ लिअ’
बकसि दिअ’ हमरा मुदा, हे बेंतवती!
हम एकटा साधारण यात्राी छी। समुद्रक कात। बम्बइक चैपाटी
अर्द्धचन्द्रकार तट आ कालक गालमे जीवनक अनन्त समुद्र। अशान्त
घोर अन्हार। घोर दिशाहीनता
-- ने जानी कत’ जाएब?
अहाँ हमर डोंगीकें एना समुद्र दिस नहि ठेलू। हे सुन्दरी!
रसे रसे नीचाँ ससरैत। पश्चिम अरबसागरमे डुबैत मधुर आगिक गोला। देखैत
बालु पर ओहिना आंेघड़ा रहलि। हे गोर कारी गोहि!... आ अहाँक पेट परसँ
ससरैत नीचाँ दिस झिल्लर भ्ेाल जाइत वासनाक नील लिफाफ...
उहुँक। नहि, नहि। हम खतक मजमून नहि बनए चाहै छी। हे सुन्दरी
हमर जेबी खाली भ’ गेल अछि। छुच्छ अछि डाँड़। हमरा एखनहि
विदा भ’ जेबाक अछि रातुक गाड़ीसँ। हे सुन्दरी!
हमरा डर भ’ रहल अछि। एहेन एहेन भव्य बन्दीगृहक रोब दाब देखि
हमरा लाभ भ’ रहल अछि। अपन चारू कातक परिवेशसँ
इन्होरमे हेलैत नग्न मोटर-लंच। सड़क पर भागैत बिना आत्माक राकेट। आ अन्तमे
टेलीविजन पर पति संग मन्दिरक फेरा दैत मिसेज सावित्राी! हे सुन्दरी!
हम थाकि गेल छी। पेट्रोलक टंकीमे खसि पड़ल झिुंगर जकाँ
आ तीति गेल अछि हमर सितार। लकबा मारि देने अछि हमर अनामिकाकें।
हे सुन्दरी!
सरिपहुँ हम भटरंग एकटा जाली नोट भ’ गेल छी। आ
उधिआइत उड़ियाइत। चैपाटीसँ जुहू आबि गेल छी हम एकटा साधारण यात्राी
हे कदलीबदनी। शंखखोपावाली खंजनजिह्ना।
नारिकेकरक वनमे। ताड़क छाँही तर। युकिलिप्टसक गन्ध संग। ‘सी-व्यू’ क्लबमे
एलीफेन्टा वा कन्हेरीक गुफामे। अथवा बारसोवाक बदनाम मछुआगलीमे
अहाँ कत’ चलि गेलहुँ? हे सुन्दरी!
चारू कात मात्रा अन्हारे अन्हार बाँचल अछि। चारू कात मात्रा डपोरे डपोर...
भेलपूरी चाट आ शीतल पेयक कोन कठघरामे नुकाएल अछि
ओ गिरगिट सन गोहि। कोन अन्हारक गाछ पर पवन समुद्र-गीतक संग सुर मिला क’
क’ रहल अछि अहाँक रोमावलिक स्पर्श
के ओइ खोमचावाला लग बैसल। सिंगदाना तोड़ि रहल अछि। आ गिटार बजा रहल अछि
‘ओ माइ लव!’
के भ’ गेल अछि बताह प्रेमक पाछाँ!
क्यो भ’ जा सकैछ द्रवित आ मुद्राहीन! कोनो अकिंचन भ’ जा सकैछ प्रेम-पिपासु
आ बताह!
मात्रा रोमाण्टिक नहि भ’ सकैछ तबाह। मुद्रासँ मातल मिस स्वीटी आ मिस्टर स्काॅच
उर्फ सेठ बाँके बिहारी लाल
आ सेठ पुत्राक संग घूमैत द्वितीयाक चान
हे सुन्दरी!

हम एकटा साधारण यात्राी छी।
जुहूसँ विदा होब’वला अन्तिम बस लागि गेल अछि
पैर लग घोंघा-सितुआक उपहार चढ़ा रहल अछि समुद्र
बेली आ मोतियाक संग हम ककर खोपामे सजाबी ई रजत-हीरक सीपीक
आदिम शृंगार-गन्ध?
अहाँ कत’ चलि गेलहुँ? चारू कात अन्हारे अन्हार अछि। पसरल
डपोरे-डपोर। घड़ी नहि। टिकट नहि। रोटी नहि। मात्रा
नोनकाषाय रिक्ताक अशेष संगीत!
हे सुन्दरी! अशेष आ अशेष अछि, अशेष अछि हमर यात्रा!

धीरेन्द्र

परम भक्त
हे हमर मित्रा!
तोरा सन मैथिलीक होएत के भक्त?
छपल रहह तोहर फोटो अहि ग्रूप मध्य,
नाम छै जकर ‘मैथिली-उत्थान-समिति’।
सात गोट सिंघारा आ
तेरह कप चाह मात्रा
पीबि तों रहि गेलाह सँझुका जलपानक बेर
आ देलह गरमागरम भाषण
ई होअए!ओ होअए!!ऐना होअए!!!
(ओना तों किनैत छह फिल्म-फेयर, रंगभूमि
चलचित्रा मात्रा)
मुदा क’ देलह कमाल मुट्ठी बान्हि कहि क’ जे--
किनैत छह दर्जनों मैथिली-पत्रा तों।
(ओना एतबा पत्रा प्रकाशितो नहि होइछ।)
मुदा ताहिसँ की?
भाषण तँ भाषण थिक, जरूरी छै सत्य होअए??
हे हमर मित्रा!
तोरा सन मैथिलीक होएत के भक्त??
पढ़लह नहि कहियो मैथिली-साहित्य,
मुदा कमेण्ट देत के तोरासँ नीक?
‘रबिश’क छै ढेर तत्त्व कतहु छै नहि’
(तत्त्व तँ नुकाएल अछि कक्कूक उभारमे!)
हे हमर मित्रा!
तोरा सन मैथिलीक होएत के भक्त?
पाटी जुटए तँ सर्वप्रथम तों
फोटो खिचाइ तँ सर्वप्रथम तों
(काजक बेरमे ससरि बरु जाह।)
हे हमर मित्रा!
तोरा सन मैथिलीक होएत के भक्त?
तें लैह धन्यवाद छिट्टाक छिट्टा,
मुदा सुनि लैह...
भाषा बढै़त अछि बताह द्वारा,
एहन लोक द्वारा जे....
अधा पेट खाए बरु,
फाटल पहिरए बरु,
मुदा कीनि पढ़ैत अछि अप्पन साहित्य,
सुनैत अछि अप्पन समाजक स्पन्दन,
गुनैत अछि जननी-कण्ठ केर क्रन्दन,
दैत अछि रक्त अपन, समय जखन अबैत छै।
फोटो नहि छपए ओकर, भाषण नहि देअए ओ;
(मुदा बौक रहि ओ कत्र्तव्य क’ लैत अछि।)
किन्तु--थिक ओ बताह, अगबे बताह
(आवारा, बुड़िबक, जपाल समाजक।)
(कमेंट ई तोहर थिकह।)
हे हमर मित्रा!
तोरा सन मैथिलीक के होएत भक्त??

गामक पत्रा
उज्जर दप-दप इनवेलपमे,
मोड़ल-मारल सन कागत पर,
आबि गेल अछि
गाम परक ई पत्रा!
उत्सुकतावश खोलि पढ़ै छी -- कारी-कारी आखर....!
-- चिरंजीव!... सकुशल होएब, पहुँचल परसू सय गोट रुपैया;
सभ कुशल अछि।...
एक पंक्ति ने बेसी... एक पंक्ति ने थोड़।
जानि नै किऐ अछि उमड़ि रहल ई चंचल-चंचल नोर!!
फेर पढै़’ छी...फेर पढै़’ छी... फेर पढै़’ छी...!
एक पंक्ति ने बेसी, एक पंक्ति ने थोड़-- आबि गेल अछि
गाम परक ई पत्रा!

नव वर्षक चिट्ठी: स्वकीयाकें
प्रिये वर्ष बीतल
हृदय भेल शीतल
कि बीतल बहुत किछु
असमय जन्तु हम छी।
सहलहुँ बहुत किछु
आ कहलहुँ बहुत किछु,
रहलहुँ मुदा प्रिये
एक केर हम दोसर।
नोरक टघारेसँ जिनगी जँ निर्मित
भरोसक कमल अछि हृदय केर दहमे।
कठिन युद्ध अछि तँ लड़िये रहल छी।
हारब ने कहियो, हमर जीत निश्चित।

हसंराज
रामदेव झा

गंगेश गुंजन
विचारे रहत नायक
जनमल विचार अनमन एक टा नेना जकाँ रहए
टूटल फाटल फटेहाल गृहस्थीमे
माटि-धूरा थाल-कीचमे लेढ़ाइत
डराडोरि आ मैल चिक्कट धरिया सम्हारैत
बस्ता सम्हारैत, बेसीकाल अँइठे हाथ
दौड़-दौड़ क’ जाइत समय पर स्कूल
अधपेटे बेरहट गीड़ैत,
ललका मटिया तेलक डिबियामे अगिला पाठ घोंखैत
थकनी आ दुर्बलतासँ ओंघा क’ ठामहि ओंघरा जाइत
बाढ़ि सीदित कमला कातक खढ़घराक एक टा गाममे,
छोटछिन पक्काक कोठली जकाँ ठाढ़ भेल विचार।
एकदम अपना घर-परिवार, टोल-समाज आ बात-व्यवहार
सबसँ अनमुहाँ-अनचिन्हार नेना, एक बाढ़ि-ध्वस्त
डीह-डाबर पर बाँस-बत्ती कोड़ो-खढ़क घरक दरकल करेज पर
पक्काक छोटछिन एक टा कोठली जकाँ जनमल विचार--
अनचिन्हार, विश्वासो नहि करबा योग्य
ईष्र्या करबा योग्य आ नेना तूरक आँखि-मोनमे टटका
टटका गुलाबछड़ी देखलाक बादक स्वादिष्ट हुलास आ इच्छा जकाँ,
नेना-- जकरा हृदयमे नहि भेल छलै ईष्र्या-द्वेषक जन्म,
मात्रा छलै बालसुलभ ई पवित्रा इच्छा।
तकरा आगाँ पहिले पहिल पक्का कोठली बनि क’ ठाढ़े भ्ेाल विचार
तकरा बाद पहिल बेर जीविका आ रोजीक नाम पर
छूटि गेलखिन पिता, तखन हुनके दुखक सहानुभूतिमे
छूटए लगलै सर-सम्बन्धी, टोल समाज, दोस्त महीम पर्यन्त कैक टा।
बहुत दिन धरि गामक चैबटिया पर रहि गेल असकर ठाढ़ विचार
तकैत चारू कातक अपन संसार। एही ढ’ब पर तुरन्ंत समर्थ भेल विचार।
माटि गाम-घर सर-सम्बन्धी संगी-समाज
सबटा छोड़ि क’ आएल रहए एतए धरि विचार
एकटा जन्मदाता माए टा नहि छोड़लकै ओकरा
सभसँ निरसि देलाक दुःख आ निराशामे--
जिनगीक सबसँ पैघ गलती जकाँ छोड़ि द’ आएल छल अपने विचार।
विचार बिना माइक विचारो रहि जाइत अछि टुग्गर।
तथापि से टुग्गर विचार आइ समर्थ नायक अछि।
विचारक नायककें गुण्डा सभक गिरोह जालमे बझा क’ ओकरा पर
पिहकारी द’ रहल’ए। जालमे ओझराएल विचार माटि पर
हाथ-पैर मारि-मारि क’ अपस्याँत भ’ रहल’ए
जेना कोनो नाटकमे नायककें खलनायक समूह घेरि क’ हत्या करै’ए
तहिना नहि मरैवला विचार
हत्या लेल कएल जा रहल-ए तैयार
सौंसे ग्लोब परहक समस्त नक्शा पर एकहि रंग पसारल अछि महाजाल
आ नायक जकाँ बझाओल अछि विचार
पूरा ग्लोब जे कखनो अमरीका बनि जाइत अछि
कखनो यूरोप, अत्याधुनिक शस्त्रास्त्रा सभसँ लैस
पल-पल क रहल अछि बेरा-बेरी जालमे बझा नायकक हत्या।
एहनामे एकहि टा आशा देखाइ’ए कदाच ओ पुरना चिड़ै बला खिस्सा
फेर घटित होअए... जाहिमे अपन संगी चिड़ै जाहि खिस्सामे भेल रहै जे--
चिड़मार द्वारा जालमे बझा लेल गेल अपन संगी चिड़ैकें बचेबा लेल
सभ चिड़ै मिलि क’ सौंसे जाल समेत ल’ क’ लोलमे दबा उड़ि गेल
आकाशमे। बहुत दूर सुरक्षित स्थान पर ताकए कोनो मित्रा
जे जालकें काटि क’ संगी चिडै़कें करा सकै मुक्त, स्वाधीन।

तेरह दिसम्बर शोकगीत
बेदखल जीवनमे हस्तक्षेप नहि चाहए करए क्यो लोक
सबटा सब किछु पड़ल परती जकाँ
मन-बाधक खेत
सबटा बड़ दिब, बड़ बेश
परती खेत, फसादोसँ लाभ की एहि पर?
सुन्न सबटा गाम फेरो दलानो असकरे आ एकान्त
न’व तूरक स्वप्न-वयसक असमयेक ढलान
पथिया त’रमे झाँपल सकुन्ती माइक
कनिएँ टाक छागर सन अरक्षित सुरक्षा सन,
घोर वातावरणमे नुकाएल प्राण!
बेस, बड़ दिब, बेस, भने परती खेत
बड़ दिब गाम, गाम-समाज
गाछ, लत्ती, सुखाएल अड़हूल, गेनाक गाछ
जाति जातिक मचलहा घमसान
बेस, बड़ दिब बेस
रूसलि कमला कातक थान
अपना अपनी घरक डौढ़ी टाटमे
सबटा उपजा, जल बसात ल’ धरबाक रोगी ज्ञान।
एहि सबहक बीच मनुक्खक जिनगी
बेदखल आतंकवादीक पाँच टा शव थिक
स्वयं अपनहुँ देशकें अस्वीकार, अपनहि देशमे अनचिन्हार।
बेस बड़ दिब बेस, कौखन अपन कौखन
भने आन-आन देश
बेदखल मनुख सबहक अधिकार
जीवन-स्वप्न देखबाक गीत-नादक
नेनाकें कोरा खेलएबाक, मानवीय सम्मान, माटिक खेत
सब किछु बेदखल परती
बहुत कम अछि, बहुत कम अछि ह’र,
करितहुँ फेरसँ आबाद परती
उपजितए भरि पोख मनुखक मोकर्ररी
एहि गाँव-ओहि गाँव, देश दुनिया सब ठाँव।
मुदा ई कविता कही वा गीत वा नवगीत आकि व्यक्ति प्रलाप,
वा किछुओ टा नहि
कोनो टटका बाँचि गेल ध्वंस घटनाक
नहि थिक ई शोक-गान
संसदक परिसरक हत मनुष्यक अभागक।
हँ, मुदा चिन्ताक बीया थिक अवस्से
नव बीराड़क एक आर प्रयास
एहि सदी एहि काल केर उस्सर बज्र धरती पर कोना उपजा रहल
मनुष्यक रक्तक ई फसिल एतेक रास, व्यापक भूमि पर
के एकर मालिक अछि
रखने अछि केहन इन्तजाम
तकरे हो अभिज्ञान
तकर हो सन्धान...


जहाज आ मनुक्ख
भयावह बाढ़िसँ बताहि कैक कोस चैड़ा पाटक गंगा,
तकरा नित्य चलि क’ पार करैत जहाज
ओकरा भय नहि होइ छै
सैकड़ो गृहस्थीक हजारो वस्तु-जात समेत
ल’ क’ अपना कोड़ामे सैकड़ाक सैकड़ा पुरुष, स्त्राी बच्चा, बूढ़
एहि पारसँ ओहि पार, ओहि पारसँ एहि पार
ऊघि क’ द’ अएबाक घमण्ड नहि होइ छै ओकरा।
अविवेकी अगुताइमे, धक्कम धुक्कीमे---
अथाह जलप्रवाहमे कोनो जरूरी वस्तु वा ताहूसँ बेशी
कोनो अबोध नेना, खसि पड़ला पर पर्यन्त
नहि होइत छै ओकरा करुणा, नहि अबै छै मात्सर्य।
मधुबनी-जयनगरक कोनो एकढ़ गामसँ इलाज करएबाक वास्ते
पटनाक बड़ा अस्पताल जाइत कोनो असाध्य रोगीक
बीच गंगामे छूटि जाइ छै प्राण, जहाजकें तकरो नहि होइ छै शोक।
खुशी सेहो नहि होइ छै जखन कोनो सद्यःप्रसवा
अड़हूलक कोंढ़ी सन-सन हाथ पैर वला अपन नेना ल’ क’
पहिल बेर करैछ गाम जएबा लेल पटनासँ गंगा पार
अपन मस्तूलसँ बहुत ऊँच ऊपर आकाशमे स्वच्छन्द उड़ैत पक्षीसँ
नहि होइ छै ओकरा ईष्र्या-द्वेष वा शक्ति-सामथ्र्यक परस्पर उपरौंझ।
बड़-बड़ बाधा दैत, डेगे डेग संकट ठाढ़ करैत,
एहि उमड़ैत बताह गंगाधारक प्रति तामस वा घृणा नहि होइ छै।
एहि सबटासँ ओ मुक्त अछि, स्वाधीन।
खाली कत्र्तव्य भावें चलि लै’ए एहि पारसँ ओहि पार गंगामे जहाज।
मनुक्ख जेना समुद्रे समुद्र सात समुद्र पार चलि जाइत अछि
कौखन सीमित कौखन विस्तृत दिशा लक्ष्यक रहै छै ज्ञान
तें क’ जाइत अछि जहाज एते एते मनुष्योचित काज। जे हो।
तथापि जहाज मनुक्ख नहि होइत अछि, जहाज पर सवार गंगा पार करैत
एकटा बुद्धिजीवी मनुक्ख सोचलक। आ तखन सर्वप्रथम भेलै ओकरा
अपन मनुक्ख होएबाक अहंकार
तखन आरम्भ भेलै मनुक्खमे जहाजक प्रति अपन निर्भरता
अपन असहायताक बोध पर क्रोध, तखन जहाजक क्षमता श्रेष्ठतासँ घृणा
जहाजक निस्पृह सन गतिमान अस्तित्व पर दया, करुणा।
ओकर समस्त कार्यकलापक विषयमे विचारि क’ केलक एक रत्ती कल्पना--
--जँ जहाज मनुष्य भ’ जाइत?
मनुष्ये जवाब देलकै -- तखन दुइए टा बात भ’ जेतै।
पहिल तँ ई जे ओ घमण्डी भे जाएत, अपन ओहन भ’ गेला पर इतराए लागत, आ
दोसर ई जे जोड़’ बैसि जाएत--
यात्राी समाजकें एहि पारसँ ओहि पार पहुँचएबाक
उपयोगिता आ लाभालाभक हिसाब। ताही संगे ओकरा होअ’ लगतै
अथाह उत्पाती जलराशिसँ भय, नेना-रोगी बूढ़ आ समस्त वस्तुजात
ऊघि क’ पार ल’ जएबामे आशंका आ चिन्ता, तकरहि पाछाँ-पाछाँ मनमे तर्क-द्वन्द्व। ओ बैसि जाएत ऊँच-नीच, नीक-बेजाए, उचित-अनुचित
मीमांसामे व्यस्त आ भ’ जाएत मग्न। एक रत्तीक तुच्छ काज पर
होअ’ लागत कृतार्थ प्रसन्न। अपनहिमे केन्द्रित स्वयंमे सन्तुष्ट।
--परन्तु यदि मनुष्ये भ’ जाए जहाज जकाँ निस्पृह-निर्भीक?
पार गेनिहार ओकरे भरोसे क’ जाए अपन यात्रा निफिकिर
तथापित मनुष्यकें नहि होइक एक रत्ती अपना पर घमण्ड,
वा लोकक उपकार करबाक अहंकार? बुद्धि कहलकै।
मुदा सुनैत छी बन्द छै कैक वर्षसँ महेन्दू्र-पहलेजा घाट यात्राी गंगा जहाज।
आब गंगा पर देल गेलै’ए बड़ विशाल मजगूत महात्मा गाँधी सेतु।
--पुलहि कोन बेजाए? मनुक्ख सोचैत अछि--
एकरोमे छै जहाजे जकाँ सब टा गुण?
आब मनुष्य भिड़ल अछि तर्कमे।


दिल्लीमे लाल कनैल: एक
कनैल कोनो नीक फूल नहि।
भोला बाबाकें प्रिय नहि रहितनि
तखन तें आर नहि।
एकर फ’र तँ सजहि आत्महत्ये टा करबामे मदतिगार

खून नीक लगै छै तथापि लाल कनैल
पहिने कहाँ रहै एते देखनुक
काते-काते आ सड़कक बीचो डिवाइडर कियारीमे
नीक लगै लाल कनैल।
अपना दुनू कातक गाछ सभक बीचमे ठाढ़
एक टा असकर खूब झमटगर लाल कनैलक
ग’हे-ग’हे फुलाएल गाछ।
बीच-बीचमे भेटि जाएत एक गाछ उज्जर कनैल सेहो
हरियर पीयर अपन परिवेशमे पुरना मनुक्ख-देह परक दाग जकाँ
खराब भावें घीचत अपना दिस ध्यान
जेना उज्जर दपदप खाधी धोती-टोपी आब आकर्षित नहि
विरक्त करैत अछि आ सावधान।
पीयर तथापि एखनहुँ विशेष, तें प्रिय
छठिहारिक आ दुरगमनियाँ रंग।

अस्तित्वमे पीतकर्महु नहि रहल आब निषिद्ध
पीत पत्राकारितहि धरि नहि, कर्मक आनो आन कतोक क्षेत्रा
अछि परिव्याप्त जेना पीत-शिक्षा
पीत-राजनीति, प्रीत-प्रबन्धन।
पीयर शुभ-मंगल रंग नहि, प्राणरक्षक विकल्प
बुझैए मनुक्ख एकरा।
लाल दिन दिन कम भेटए लागल अछि
स्त्राी-माथक सिन्दूरी आलता ठोपसँ ल’ क’
अरिपन आ फुलबाड़ीक फूलसँ पर्यन्त
बेदखल भ’ रहल’ए लाल।
आब तें आँखि लाल नहि भेटत भरि गाम ककरो
अनुरागसँ डबडब।
पीयर-उज्जर रंग लालकें क’ रहल बेहाल।
प्रेमसँ ल’ क’ क्रोध ध्ािरमे अनुपस्थित अछि-लाल रंग
बच्चा पर्यन्त नहि जन्मै’ए टुहटुह भीजल लाल आइ।
आब कहाँ धरै’ए क्यो बेटीक नाम माधुरी!
एहनामे हमरा, भेटि गेल लाल कनैलक झमटगर फुलाएल
एक टा आओर गाछ।

यार,
ई अपन गाम होइत!

दिल्लीमे लाल कनैल: दू
किऐ लाग’ लागल’ए नीक एना?
ललका कनैल... सोचैत छिऐक, की छै एहन
दिल्ली बाटक दू बगली वन-झाँकुर फूलमे
घीचैत रहै’ए पकड़ि पकड़ि कुर्ताक खूट अपना दिश
ई तँ गेना गुलाब माधुरी किछु नहि अछि
ने बेली-जूही-चमेली-कटहरी-चम्पा
एत’ धरि जे हल्लुक गुलाबी करबीर पर्यन्त नहि ई
जाहिमे सँ बड़ मेेंही-मेंही सुगन्धि पसरैत रहै छै
भरि टोल।
तखन छैक की?
थिक की ई नीक लागब, नीक लगबाक अनेरक मनोविज्ञान?

दिल्लीक सड़क पर पैरे गुनि-धुनि,
बस, तिनपहिया वा दुपहियासँ चलैत
होइत रहै’ए देखब, देखैत जाएब प्रिय।

कनीक काल पहिने एक टा छौंड़ाकें देखल--
लाल कनैल तर लट्टू नचबैत मग्न, संसारसँ निफिकिर
माटि पर नचैत लट्टूकें डोरीमे बसा अपन तरहत्थी पर
धरैत-प्रसन्न होइत नचैत।

अकस्मात पड़ल मोन...कनैल सभक गाछक झोंझमे
बालसुलभ क्रोधसँ उग्र एक टा नग-धड़ंग छौंड़ा।
वर्ष नौ-दसेक
कमाचीसँ बनल अपन तीर धनुषसँ खेल क’ रहल छल।
साधि रहल छल निशान कठोरतासँ एकाग्र
ललका कनैल तरसँ उजरा कनैल पर सन्धानि रहल छल तीर।
लाल तरसँ उजरा पर चलैत ई तीर देखि,
कात महक पीयर कनैल जेना डेरा गेल
थरथराए लागल...

शब्द: एना किऐ
शब्द पहिने जेना लगैत रहए,
आब नहि लगै’ए।
कोना फेकि दैत रहए जाल
आ बझा लिअए सर्वांग हमरा
कते-कते काल धरि ओझराएल
रहि जाइत रही मस्त मुग्ध

आब नहि रहल शब्द सहज
हमरा पर पसरि क’ बनि जाइवला जाल
ने हम बाझि क’ रहि जाइवला मुग्ध-मस्त जीव

शब्द हमरा आब बेमतलब लगैत अछि
जहाँ धरि ओ मात्रा, शब्द भ’ क’ अबैत अछि
आब तँ बुझाइ’ए छुच्छ शब्द
खाली शब्दकें जोड़ैवाली माया
यदि ताहिमे सन्तान, हमर मित्रा
स्त्राी आ आत्मीय कोनो सामाजिक सम्बोधन नहि
वा कोनो टटका समाद, तँ
हमरा नहि द’ जाइछ शब्द किछुओ टा।
शब्द शब्दक बीचक सूक्ष्म मायाक कारणहि अछि
हमर भाषा जाहिमे ई कहि रहल छी।
शब्द यावत धरि नहि बनैत अछि भाषाक माया-मर्म
ताबत धरि फेरसँ शब्दक ओएह अर्थ भ’ पाएब
आइ हमरा वास्ते असम्भव अछि।
अस्वीकार सेहो।

आ शब्द आब,
रुकबा, देखबा वा कहबा काल
कम कहि पाबि सकि रहल अछि।
की करिऐ?


सोच
सोचि लेल जाओ--
की सभ सोचबै
जखन ध्रि से सभ सोचि चुकबै
बाकी किछु नहि रहत तखन धरि।
या फेरसँ कोनो नव सिरा खुजि जाएत।
सम्भव छै एखन से सोचब
असम्भव लागए परन्तु
असम्भव कोन ठामसँ भ’ जाएत सम्भव
तकरो सोचब, बड़ जरूरी अछि सोचब।
भोरक, दुपहरिया दुपहरक साँझ आ राति हैब
एकहि गति-प्रगतिक ठेकान सभ तँ छै
मुदा कोनो दिमागक वशमे नहि छै।
स्वाधीन आ स्वगतिक छै

एहन किछु चालू शब्द सभकें सोचि जाएब
बिल्कुले सुभीतगर नहि अछि
सुभीता छीन लै वला थिक

मुदा सोचबाक इएह तँ स्वाभाविक आ
अनिवार्य परिणति अछि जे सोचनाइ
विरागक एक टा बेचैन बाट थिक
सोचैत-सोचैत कखनो समाप्त नहि होइत अछि
चलैत-चलैत पहुँचि क’ जखन खत्म भ’ जाइत अछि
तखन प्रारम्भ होइत अछि सोचब।
एहि सोचबाक विषयमे सोचियो-सोचि क’
कोनो निष्कर्ष नहि पाओल जा सकै’ए
किछु-किछु सोचल जरूर जा सकै’ए।

मायाक ममता
ओ बड़का पौत्रा थिक
अपन रोगियाह दादा-दादी लेल
गुम्हरैत मनेमन दुनूूक मरबाक उत्कण्ठित प्रतीक्षा
क’ रहल’ए
खौंझा रहल’ए।

माँझिल पोता
माँगला पर दादा-दादीकें गिलास भरि पानि धरा
भ’ जाइत अछि तटस्थ, देखए लगै’ए अखबार
रोजगारक काॅलम। चुपचाप।

घरक छोट पोती,
एखन स्कूल नहि जाइत अछि।
बिजली कटि गेला पर
घामे भीजल दादा-दादीक सिरमामे बैसि,
नान्हि टा हाथमे धेने ताड़क पंखा
लगै’ए दादा-दादीकें हौंक’
प्रारम्भ करैत सम्वाद बड़ यत्नसँ
‘दादा, गलमी लगै’ए ने अहाँकें’
फेर छूबैत दादाक झुरकुट्ट कपार
हुनकर चिन्ता समाप्त करैत कहैत छथि
‘आब तँ नहि अछि बोखाल।’
‘लोती खाएब दादी? दादीकें पूछै’ए आ
दुखिताहि बूढ़ीक कोरामे
बैसि जाइ’ए निफिकिर।

बेदखल स्वप्नक विषयमे
अंकुरसँ एखन पँचपत्तीए टा भेल रही,
कि भ’ गेल रही स्वप्नच्युत आँखि सन उदास
नान्हि टा हमर पँचपत्ती चिन्ताक
हमरे ताक’ पडै़ छल उत्तर।

बीज विकासमे पितावृक्षक
कहाँ बूझि पाबी हुनक एहन होएबाक भाषा
ओएह कहाँ बूझि पाबथि
हमर अधबोलिया सपना
एहिनामे कोनो क्षण, बड़ी कालसँ चुप ठोर पर
बिहुँसिक रेह समान, हुनकर सुखाएल देह पर
कत’सँ पनगि जाइनि एक टा ललौंह हरियर पात।

पँचपत्ती हम, पसरल प्रचण्ड रौदमे
स्वप्न तानि क’ बैसि जाइ
आब जे स्वप्न अछि-- एक टा गाछ अछि
समयसँ बहुत बेसी पहिर लेल गेल वस्त्रा अछि
एते रास रफू कएल, शोणितक अभाव
श्वासकें वायु छै मुदा घरघराइत।

ऊध्र्वश्वाससँ ऐन पूर्वक दृश्य अछि--
डूबिए चलल सन शरीर शास्त्रा।

पितृवृक्षमे रूपान्तरित भ’ चुकल स्वप्नक संग
सुखाएल देह निपात डारिवला गाछ -- हम स्वयं
अन्हर बिहाड़िसँ भेंट होइतहि रहैछ बेसी काल।
जड़ि धरि सिहरि जाइत छी।
समयक शिक्षा मन नहि पड़ए तँ धराशायी भ’ जाइ तत्क्षण
खाली क’ देब’ पड़ए जमीन,
अपना अगिला, समयक निमित्त।

कात करोटमे देखि अन्हारक अनुभव
किंचित हताश होइत, पूराक पूरा अस्वीकार करै छी।
विकास लेल राति होइत अछि उपयुक्त--
निश्चिन्त आ नजरि लगबाक अन्देशासँ मुक्त
स्वप्नहु लेल निर्विघ्न
खाली घबराइ छी जखन देहसँ फल नहि
खसा पबै छी भूमि पर।
फरबे कहाँ करैत छी आब?
भेटबे कएल कतबा जवानीमे खाद-पानि
भने पितासँ एक रत्ती किछु बेसी!

न्याय
शब्द रहबाक अछि तँ
देब’ पड़त अर्थ।
अर्थकें संगति प्रतीतिक
होअहि पड़तै तखन उत्तरदायी।
धरती होइ आ रहि जाइ बाँझ उस्सर
कोना हो से?
उगल’ पड़ैत रहतै अन्न,
ओकरे थिकै जवाबदेही।

पृथ्वी अछि तँ एकरा
वायु, जल,प्रकाश आ मार्ग देब’ पड़तै।

होअए पहाड़ तँ
देब’ पड़तै पोसि-पालिक क’ सघन वन-महावन
अंग अंगकें फोडि ़क’ प्रवाहित कर’ पड़तै मधुर-झरना
ऊँचाइ आ चुनौती।
समुद्र भेला पर नापबा लेल अनन्त पसार आ
अथाह प्रचण्ड जलराशि।

गाछ छी तँ डारिसँ
उतार’ पड़त फूल, फल, पात
बनब’ देब’ पड़त चिडै़ चुनमुन्नीकें खोंता
माथ पर सहैत कर्कश क्रूर रौद,
पसार’ पड़त
सुस्तएबा लेल त’रमे ठहरल लोक पर छाहरि।
इनारकें बनल रहबा लेल इनार
देब’ पड़तै बिना हिसाब
अपन करेजसँ घैल-घैल जल।

मनुष्य हएब तँ बूझ’ पड़त
ई सम्पूर्ण सिलसिला, कर’ पड़त रक्षा।
प्रेमसँ पटएबाक कौशल
चलाब’ पड़त प्राण देबाक कला।

आखिर जीवाक अछि तँ जीयब आएब, आब’ पड़त
मनुक्ख छी तँ।

वीरेन्द्र मल्लिक
साँझ
झील-जलमे आगिसँ
लीखि गेल हो क्यो नाम -- सूरज,
पुनर्मिलनक चिर प्रतीक्षामे -- जेना हो
छोड़ि गेल क्यो पत्रा
लेटर बाॅक्समे ई साँझ!


मैथिल ललना
आँखिमे काजर, माथमे सेनुर
ठोर रंगल जनु पुष्पित ओरहुल,
पढ़िया ललका छीट पहिरने
बिनु चप्पल के घूमि रहल छथि--
चैरंगीमे मैथिल ललना।

साँप
जनविहीन दिवस
ने कतहु शोर, नहि संग्राम
लोक भेल उदरस्थ अछि निज
गेह-कारागारमे भ’ त्रास्त -- चुप आ
शान्त, जेना हो फोलि नेने ग्राम्य बाला
हाथसँ कुंचित सघन घनराशि कुन्तल
मुइल साँप पड़ल जेना हो बाट पर
अनमन लगै’ए सड़क
तहिना आइ!

मास्टर साहेब
मुुँहमे पान, हाथमे घड़ी
खन इंगलिश, खन बाजथि हिन्दी
कौखन कुत्र्ता साँची धोती,
कौखन बुश्शर्ट-पैंट पहिरने
घ’रे-घ’रे घूमि रहल छथि--
कुकूर जकाँ मास्टर साहेब!

भोलनाथ ‘धूमकेतु’
कीर्तिनारायण मिश्र
जीवकान्त
रमानन्द रेणु
रामानुग्रह झा
मार्कण्डेय प्रवासी

मन्त्रोश्वर झा
एकला चलो रे
क्यो भेटबो करत संगी तैयो
हम एकसरे चलब
हम फुट्टे जीयब,
एहि लेल नहि जे हमरा जीबाक अछि
हमरो त’ मरबेक अछि,
मुदा हम फुट्टे जीयब।
जीवन हमरामे अपना मोने
नहि जीयत,
जीवन तँ जीविते अछि
जीबे करत
ओकर जीयब की?
जीयब तँ हमर अहाँक आ’
हुनकर -- जकरा मरबाक अछि
तें हम फुट्टे जीयब
अपन पूब पश्चिम फुट्टे बनाएब
आन्हर जकाँ ककरो
हाथ पकड़ि क’ टापन-टोइया
नहि देब।
गीरि लेत समुद्र तँ समुद्र
मन्थन करब
युग-युगक पापकें
गीरैत-गीरैत जे भ’
गेल अछि नोनगर
तकर अभिनन्दन करब।
पहाड़सँ ठेकब त’
पहाड़ बनि जाएब।
पहाड़ शालिग्राम थिक,
स्पर्शमणि थिक,
मुदा नकली पहाड़कें काटि देब,
चाटि लेब।
आ’ जीबैत रहब,
तें हम फुट्टे जीयब।
संग-संग जीबामे
कोनो जीवन नहि,
कोनो यौवन नहि
कोनो किच्छु नहि
तें हम फुट्टे जीयब।
हमरा अनकर धर्म
भयावह नहि लगैत अछि,
हमरा अपने धर्म आ’
जकर तकर द्वारा नियत कर्मक बन्धन
कण्ठ मोकैत अछि,
जे से हमरा पर धर्म
धरबैत अछि,
जेना धर्म कोनो कटाह कुकूर हो।
जे से हमरा हमरे धर्मसँ डरबैत अछि
जेना धर्म कोनो डराउन राक्षस हो।
हम समाजक कटाउझ नहि सुनब,
फुट्टे चिकरब।
अम्मत तीत अपनहिसँ चीखब
आँखि गुराड़ि अपनहिसँ चीन्हब
हम फुट्टे जीयब।
कनहा कुकूर
जरओ अहाँक पेट
मरओ अहाँक इच्छा
भ’ जाओ अहाँक इच्छा पानि पानि
आक्सीजन अथवा
प्राण वायुसँ धधका लिअ’
अपन पेट।
पीबि लिअ’
बरु भरि पेट भाँग
रहू निसाँमे बताह।
बोकिअबैत रहू
अज्ञातकें
आजीवन अथवा आमरण।

मुदा ज्ञातसँ
रहू अलग बलग,
अगल बगल खाउ
पतलोइआ लग ने जाउ
चुल्ही पाछू बैसि
क’ पढै़त रहू गारि।
आबए दिऔ चैड़चन
आबए दिऔ
बहुरुपिया सभकें
आ’
धर्मक पितामह लोकनिकें
बेचि लेब अपन
मँगनीक माथ
काटि लेब अपन अनेरुआ हाथ
जाहि ठाढ़ि पर
बैसबाक अछि
ओएह गाछ।
करथु क्यो राज
कनहा कुकूर भ’ जाइछ
माँड़हि तृप्त।


कुलानन्द मिश्र

छज्जासँ उतरैत
छज्जा पर बैसि
मुक्त आकासक नीलिमा संग खेलाएब
हमरा नीक लगैत अछि
जे अछियो अप्रतिम
मुदा से हमरा लेल अपराध अछि
अज्ञानताजन्य
से हम आब बुझैत छी
जखन हमर पैर
माटि पर माटि भेल मनुक्खक असर्द्ध पैरसँ
कोनो निकटता नहि पाबि
एकटा एहन बिन्दु पर ठमकि गेल अछि
जत’ अग्रसर होएबासँ पहिने
हमर अपन परिचय
अपना लेल आवश्यक भ’ गेल अछि
छज्जासँ जमीन पर अबिते
हमर हाथ उठि जाइछ--
जे कोर्निस बजबैत-बजबैत
बिसरि गेल छल जे ओ हाथ अछि
आ कील ठोक’बलाकें सलामी बजाएब नहि
जाँत पिसनिहार लेल
कील बनाएब ओकर काज छै
हमर हाथ उठि जाइछ
अनास्थाक तर्जनी संग
हम मुँह फिरौने
आस्थाक नव आधार पर
अपना पैरक जमैत छाप
फरीछ देखए चाहै छी
फूलक आसन
ओ तूरक तोशक
हमरा देहक संग
हमरा पैरकें काहिल बना देलक अछि
हम अपन पैर राख’ चाहै छी
पानि बनि चहुतरफा बहैत इस्पात पर
गर्म-गर्म बहैत इस्पात पर
जे बन्दूक बनबैत अछि
जे बन्दूकक संग ढाल सेहो गढै़त अछि
हम इस्पातक धधरामे
अपन अगराएल तरबाक अगरैनी
छोड़ा देब’ चाहै छी
आ चाहै छी पाबि लेब’
बन्धु-विरोधक क्रूरतम दण्ड
हमरा सभ तरहक अनास्था बीच
सुविधा जकाँ पसरल तटस्थ दृष्टि
देखि क’ कचोट होइछ
हाथ आ पैरक अछैत
तटस्थ रहब
अतिरिक्त चतुराइ थीक
जे अपनो नजरिमे
अपनो प्रकृतिमे
रह-रहाँ आत्मघाती थीक
हम देखि रहल छी
हमर निद्रा ऐतिहासिक छल
हम गलतीकें सम्पूर्ण आस्था संग
सही सकारैत आएल छी
आ अपना गराक ढोल
अनकासँ पिटबा क’
अपन क्षमताकें बाँझ बना क’
अपन फराक होएबाक अहम्मन्यताकें
अनेरे शिरोधार्य करैत
एक दुरभिसन्धिक बाद
दोसर दुरभिसन्धिक ओझरामे
अनायासे घेराइत आएल छी
हम अपना क्षेत्राक अपस्याँत हरीतिमा
आ ओहि प्रदेशक उजरा पसारक बीच
एकटा कुलबुलाइत
मटमैल आ लिधुराह
नदी बहैत देखैत छी
पसेना आ रक्तक
सड़ैत गन्धसँ आकुल
हम एत’ एकटा सम्बन्ध जोड़’ चाहै छी
ओहि सम्बन्धकें एकटा नाम देब’ चाहै छी
रस्ता निश्चिते बीहड़ थीक
तखन हमरा लगैछ
शान्तिक लेल तूफाने टा
निश्चित संकेत होइत अछि
हमर प्रवासी मोन
आब घ’र घुरि आएल अछि
हम खोन्हमा आ गोनमा बीच व्याप्त
परिवेशक परिभाषा तकै छी
हमरा सब शब्दक नव परिभाषा चाही एखन
पुरनका सब आखर मेटा देब’क आकांक्षा संग
हम जीवनक कोरा पोथीमे
चाहै छी
फेरसँ लिखी ‘क’
फेरसँ लिखी ‘ख’
आ फेरसँ क’ दी
एकटा वर्णमाला तैयार
हम किछुकें छोड़ि क’
सभक संग यात्रा पर विदा होएब
हुनक उपराग छनि
हम विकाससँ अवनति दिस अधोन्मुख छी
हुनका की बुझल छनि
मुल्की रास लोकक बीच
परिवेशक ऊष्मा होइछ कतेक मधुर
आ संगे कतेक लवणाह !
ओ नकली दुःखसँ दशरथ बनै छथि
किछु टूटब हुनका लेल
सदिखन मर्मान्तक होइछ
आ किछु गढ़बाक
किछु करबाक खुशीकंे
ओ खुशी मानथि
ककहरा फेरसँ पढ़ब जरूरी छनि
हम सोनक कलम अखन फेकि देल अछि
हम काड़ाक कलमसँ आब
स्वर्णाक्षर कोना अंकित करब
स्वर्णाक्षरमे अंकित विद्यापतिक रूपवाद
‘दुर्गन्धा स्वरगन्धा’मे राजकमलक आर्तनाद
हमरा लेल दुहू अरुचिकर थीक
मात्रा-विचार कोना हो
एहि दुनू जड़िआइत काव्य-चेतनाक!
आब हमर कविताक उत्स पर
एकटा चैंचक आ जिज्ञासु जन’क पहरा रहत
आ हमर कविता
गीत गाओत
रंग-रंगक बाना धारण कएने
कमाउ पूतक

समशीतोष्ण
आइ-काल्हि जे सुरुज उगै छै
पहिनेसँ बेसी लालटेस देखाइ छै
आ अपन धुरीसँ डेढ़ इंच ऊपर नाचैत बुझा पडै़छ
आइ-काल्हि जे चन्द्रमा डुबै छै
पहिनेसँ कम ललौन
आ बेसी हरदिआइन लगै छै
लागत जेना कोनो ग्लानिक
दिन के अएला पर रातिक बिलाएब स्वाभाविके थिक
मुदा दिनक आगमनक संगहि
रातिक उतरबाक आशंकासँ
कोना कात-करौट भेल जा सकैछ
सभ कल्हुका लेल तैयार भ’ रहल अछि
आइए काल्हि सँझुका वास्ते
किमरिखी परिधान छाँटल जा रहल अछि
कोकेन आ जाली नोटक आढ़तिमे
भ’ गेलै अछि अकल्पित साझेदारी
एहि देश
आ ओहि देशक दुश्मन नागरिकक बीच
पहाड़ी नदीक तट पर जाउ
ओकरा पानिमे पैसू आ बुझू
जे माटिकंे
पाथरकें
घांेटि क’ आगाँ बढ़ि जएबाक
व्यवस्थित कागद
आ कागद-सोखक नाम योजना थिक
रेडियोमे कविता आ चुनावक मौजूदा हाल
साँगोपाँग प्रसारित भ’ रहल अछि
निर्वाचन-फलसँ बड़का ओझरा
हमर आत्मा थिक
जे सफल उमेदवारक सूचीमे
ताकि रहल अछि हेंजक हेंज नाम
जिनका कृपाक भरोसें
कतोक छोट-मोट लड़ाइ
लोक अहुना लड़ि लैत अछि
किछु जंग छुटलै फराक
आ मनोरंजक उपलब्धि त’ भिन्ने राखी
मुदा ओ ताकि रहल अछि
अपन युव-जनतन्त्राक
उड़िआइत-पुड़िआइत
सताइस बरखक मनोरम खिस्सा
लोभ करबा जोगर सपनाक उपलब्धि
एहि देशमे एहिना होइत अएलै अछि
गलती
गलती
आ गलतीक एकटा पैघ फिहरिस्त
माफी
माफी
आ माफीक ई मन्वन्तरकालीन परम्परा
प्राचीन पुरुखाक गौरवमय इतिहास
तखन जे किछु करबामे लागल छल
तखने जे किछु करबाक सोचमे पड़ल छल
तखन जे किछु करबाक ममोड़सँ व्याकुल छल
की ई प्रश्न करबाक समय आबि गेलैक अछि
जे आब आगाँ
जाएब त’ कत’
आ नहि जाएब कतौ
से फराके कठिन समस्या थिक
हमरा सभकें एकटा तापमान-सूचक
यन्त्राक अपेक्षा अछि
आ दोहरा तोशक देल पलंगक गुदगुदी
हम गुदगुदीसँ यन्त्रा
आ यन्त्रा आ गुदगुदीक बीच
कोनो ने कोनो संगति आवश्यक बुझै छी
निरर्थकता सभ बेर हतप्रभ नहियो करैछ
मुदा ओहि हुलासक खोजक अन्त कोना हैत
जखन मुनक्खक श्रद्धा प्राप्त करबाक दुरभि सन्धिसँ
हेम खचित सिंहासनमे
पाथरक टुकड़ा अभियोजन ताकए
ओ एकटा दियासलाइ ल’ क’
जंगल दिस चल जाइत अछि
काठी नेसैत अछि
भुसूक
एहन बुधियार मनोवृत्तिक संग अजगरी मुद्रा
अपन पहिल प्रेमिका द्वारा प्रेषित पत्रा
खोलबाक आब हमरामे
साहस भरि रहल अछि
हम फेर एक बेर सत्य आ असत्य
नैतिक आ अनैतिककें
सलीब पर टाँगि
ईसा मसीह बनि जाइत छी।

भोर होएबामे प्रायः एखनो किछु विलम्ब छैक
1
अन्हारमे बैसल लोक
किरण-माला लेल बितैत अछि
राजकमल कहाँ छथि
यात्राीजी समयक कोन गंजनमे लागल छथि
समय
जे राजकमलक हेतु
दहन-यज्ञक समिधा रहनि
समय
जकरा संग चलैत लोकधर्मी व्यथा संग
चहुतरफा औनाइत रहलाह अछि
काल-चारण यात्राीजी
समय जे निदाघक निदाघ होइछ
पावसक पावस होइछ
अनिश्चित आ अप्रत्याशित होइतो
एकटा यथार्थ-बोध होइछ
एकटा मारुक प्रतिशोध होइछ

2
किछु गोटेक कहब छनि
अन्हार किछु घटलै’ए
कहबाक मतलब जे समय किछु बदललै’ए
लोकक बीच चर्चा छै
पिलखवाड़ आ पिण्डारुछमे
बरौनी आ बोकरोमे
बेगार खटैत चेहरा सभमे
कोन तात्विक अन्तर होइछ
लोक आकुलता संग बिचारैत अछि--
बढ़ल जाइत चिमनीक संग
घटल जाइत कनटिरबाक रोटी
आ उघाड़ होइत मुनियाक देहक बीच
कोन सात्विक अन्तर होइछ।
मानल जे बुधियारी किछु बढ़लै’ए
मुदा आन गोलक सतर्कताक सम्बन्धमे
अहाँक की राय थीक
ओना कहैत छथि हमर मित्रा--
रामकें सीताक खबरि जखन लागि गेलनि अछि
सीताक उद्वारक कथा
सहज आ स्वाभाविक थीक

3
तखन त’ यथार्थे जे
ककरो आँगनमे टाँगल
मँगनीक आकासदीपसँ
कतबा की प्रयोजन सधतै
भिक्षाटनसँ आजीविका
चलौनिहार सभक मनोग्रन्थि
ककरो लेल सहजहि सम्वेद्य थिक
सभ तरहक काजमे बाझल हाथक लेल
एकटा काज अखनो सम्भव नहि होइछ
प्रश्न करैत चेहरा सभ
उत्तरक प्रतीक्षामे निरन्तर झमान होइछ
आन कोनो प्रासंगिक जिज्ञासा
मोटा-मोटी खतरनाक बात थीक

4
किछु अजगुत सन ऊपरसँ
सभ किछु लागत पहिने
रहस्यक बात ओना
हरही सुरहीकें आब बुझाइ छै
चमत्कार ई नहि थीक जे
नव-नव देवता सभ
कत’सँ देवत्व पाबि
अपन-अपन प्रतापक दीप
दुनियामे जरबैत छथि
भेदक बात सरिपहुँ
कमाइत हाथ
आ खाइत मुँहक सम्बन्धो नहि होइछ
विचारबाक बात तैयो
किछु ने किछु अवस्से छै
अन्हार कोनो अगुरबान जकाँ
रहि-रहि क’ हुलकी किऐ मारैछ
प्रकाश कोनो नवकनियाँ जकाँ
बारल पैर किऐ चलैछ अखनो धरि
राजकमल कहाँ गेलाह!
कहबा लेल एहनामे
ओ ओना कहबो की करितथि
यात्राीजी जखन-तखन पीड़ा संग बजै छथि
काजक गप्प किछु उचिती बना सुनबै छथि
लगनीमे बात ओना
आर अधिक फरीछ होएतानि

5
मानल जे रजनी-बधू
भाभट अपन समेटबा लेल उद्यत छथि
प्रश्न अखनो टाँगल अछि सोझाँमे--
पुरबरिया खिड़की कोना फोलल जाएत अन्ततः
भोर होएबामे प्रायः एखनो किछु विलम्ब छै

उदयचन्द्र झा ‘विनोद’


जन प्रतिनिधि
आजीवन जनसेवी अपने,
तैं ने सगर इलाकाकें छी
असगर झँपने
रहबे करथि पिता कहबैका
जोड़ि तँ सकला चारि ईंट
जीवन भरि खटला
पूर्व जन्मक पुण्य पूत
अपने सन पौलनि
तें ने मरितो-मरितो
एत बड़ पैर पुजौलनि।

बड़का गामबला ओझा जी
भेल फिरै छथि जे डायरेक्टर
ककर प्रतापें
केहन रहथि बकलेल सार
अपनेक छोटका
आइ कोना द’ रहला अछि
पटनाकें पटका
कएने छथि दलमलित
आइ दिल्लीकें
अपनेक साढू बड़का
ककरा बल पर
अपनेक सरहोजि वसन्ती
के ने जनै छनि दड़िभंगामे
धन्न अपने
अपने सन अपने
तैं ने इलाकाकें छी
असगर झँपने।
कोन शहर नइं ठौर
कहू सगरे भारतमे
जे सभ कएलनि बैर
गेला सरबे गारतमे
पित्ती चन्द्रकान्त नहि बुझलनि
फुसिए के आदर्श
टानि छाती पर
रने-रने बौअएला
फूसि नहि बाजब
चोरि करब नहि
लेब नहि ठीका
बूथ नहि छापब
तैं ने लगलनि
एहन भातिज रहितो
कारी-चूनक टीका।

ककर केलिऐ नीक
कपार कहाँसँ दितिऐ
ओ जे अपनेक भागिन
कविजी माने चैकक
मामाकें गहने रहितथि
तँ भेटितनि की नहि
से नहि तैं ने
काहि कटै छथि
बनता चन्दा
सीतारामक पाटि धरै छथि
खएबा केर ठेकान भेलनि नहि
करथि उखाहिल ताकि-ताकि क’
अपने घरकें।

कटिहारक जे दोस्त रहए ओ
मण्टू कहिऐ
जाति भिन्न आचरण भिन्न
से मौज करै’ए
ककर नाम पर,
बैसल जे पाबथि दरमाहा
देबू बाबू
ककर नाम पर
पढ़लनि नहि भेला प्रोफेसर
पवन चैधरी
ककर नाम पर
बड़का-बड़का केस मामिला
रफा-दफा हो
ककर नाम पर

पिताक श्राद्धमे भोज कएल जे
के कएने छल
बारहो वर्णक लोक ढेकरि
गधकिच्चनि कएलक
दान देल जे शोर भेल से
ओ सभ आगन्तुककें
हम सभ देखितहुँ कहिया
नहि बुझाएल जे के महत्तम
आछि आ के बहिया
कुल-खनदानक तेज
ग्रामक गौरव अपने
तैं ने सगर इलाकाकें छी
असगर झँपने।


ओहि दीपमालिकाक नाम
ई गीत हुनका लेल नहि छनि
जनिकर धोती एखनो
गगन-सुन्दरीए सुखबै छनि
एक ह’र स्वर्गमे बहै छनि
ई गीत हमर समर्पित छनि
ओहि बौक-बहीरक नाम
जहाजमे फँसल
ओहि लोक-वेदक नाम
जकरा नहि बुझल छै जे जहाज
डूबि रहल छै।

ई गीत ओहि माउगिकें
कथमपि नहि देल जा सकैछ
जे कोनो राति
प्रियतमक ओछाओन काटि
परदेशीक संग पड़ा सकैछ
ई गीत हमर सनेस अछि
ओहि जिज्ञासु नजरिक नाम
जे जंगला पर ओंघाइत अछि
विलम्बक प्रत्येक पल पर
आर अधिक औनाइत अछि।
ई गीत हम मन्दिर, महजिद अथवा
गिरिजाघरक नाम सेहो नहि करब
भावना तते बेसी धार्मिक भ’ गेल अछि
जे मोन आब शुद्ध नहि रहि पबैछ
आब नहि होइछ क्यो बुद्ध
महजिदक अजान लगैछ
पिटाएल लोकक रिड़िआएब
मन्दिरक घड़ी-घण्टी लगैछ
चुचुआ क’ पड़रूकें सोर पाड़ब
अजीव व्यापकता अछि
धार्मिक क्षेत्रामे
विशुद्ध अराजकता अछि।

आश्रममे जनमल ई गीत
मुनि-कन्येक संग नहि
वनराज सिंहोक संग खेलाएत
आइ धरि बनैत रहल
हिन्दूक परिश्रम आ मुसलमानक शराफत
नहि क’ सकल कोनो ‘फायरिंग’
एहि राग-रागिनीकें बन्द
ओना
स्थिति ततेक पकठोस भ’ गेल अछि
जे राजनीति पर गप कर’क लेल
किछु शेषे नहि रहि गेल अछि।

एहि गीत पर हुनकर कोनो हक नहि
जे व्यक्तिगत आग्रहक
एकपेड़िया पर चलैत अछि
सत्ते, की अन्तर पड़ैत छै
से जानि क’
जे के कोन रस्ते गेल
जखन सभ गोटे
पोखरिमे खहरिए गेल।

कदापि नहि देल जा सकैछ
हुनका ई गीत
जे एक ठाम गोली चलबै छथि
दोसर ठाम
गोली चलएबा पर कनै छथि
नितान्त अलोकतान्त्रिाक ढंगसँं
लोकतन्त्रा चलबै छथि
स्थितिक संग बलात्कार क’
स्वतन्त्राताक दाम बुझबै छथि

ई गीत हम नहि करब
ओहि लबरा सभक नाम
जे व्यवस्थाकंे
दिनघट्टूक पहिरना जकाँ
घीचि क’ चलबैत अछि
अनुशासनक सकारात्मक परिभाषा
तकैत अछि
दिनचर्या भंगठा क’
दिनचर्याक महत्त बुझाएब
अनर्गल होइछ
ओना एकर कोन उपाए
जे बेइमान बापक कपार
प्रबल होइछ
ई गीत हमर समर्पित अछि
ओहि पूज्य पिताक नाम
जे पूसक रौद सन दुलरौलनि अछि
सर्द-सँ-सर्द मौसममे
एक गोट ऊष्मा-बोध करौलनि अछि।

अहाँ चिन्ता नहि करब
जेना कि कहल
अब नहि होइछ क्यो बुद्ध
नहि भेटतीह माँझ आँगन ठाढ़ि
खीरक थार लेने कोनो सुजाता
ई गीत कोनो उगैत वा डुबैत
सूर्य लेल नहि अछि
ओ लोकनि स्वयं मीलि क’ राजनीति छथि
एखने गद्य
एखने गीति छथि।

ई गीत हमर समर्पित अछि
ओहि दीपमालिकाक नाम
जे राति लेल जरैत अछि
ओहि आदिम जातिक चिन्ता
फजूल थिक
जे बरोबरि हाथ मलैत अछि।

बाजू मालिक
बाजू धरम-इमान से मालिक
हमरा आउरक की केलिअइ
कोन कलम तसफीआ केलिअइ
केकरा केकरा की देलिअइ?

कए गो अहाँ इनार भरेलिअइ
पोखरि सभ कतना लेलिअइ
सबहक नजरि बचा क’ असगर
सभटा कोना खा गेलिअइ ?

बनलै छहर-नहर मन्दिर-पुल
सभमे कोना समा गेलिअइ
बाजू मालिक सभटा ठीका
अहीं कोना क’ पा गेलिअइ ?

अइ जँगसँ रजधानी तोरिक
सीढ़ी कोना बना लेलिअइ
सभ दिन सबहक निमने केलिअइ
सभकें कोना कना देलिअइ ?

चढ़ल नजरि पर जखन जे
से कोन जुगुत मँगबा लेलिअइ
पू-पश्चिम केन्हरो नहि गेलिअइ
एतना कोना बना लेलिअइ?

अजगुत
बजै छथिन नहि, कुकूर जकाँ भुकैत छथिन।
दैत छथिन नहि, डाकू जकाँ लुटैत छथिन।
ईहो भैया बड़-बड़ ढंग जनैत छथिन।
देखहिन हँसि-हँसि सत्ते कोना कनैत छथिन।।

भिखमंगोसँ बाढ़ि कते खेखनैत छथिन।
अपन पापमे सभकें कोना सनैत छथिन।
अजगुत लागत बतहा जकाँ करैत छथिन।
सिंगरहार के फूल जकाँ झहरैत छथिन।।

अवसर पर बनगदहा जकाँ मकैत छथिन।
जैह करनि भल तकरे पुनि रपटैत छथिन।
चोरी करथिन अपने, जाँच करैत छथिन।
बलजोरी झूठोकें साँच करैत छथिन।।

बाप-बाप क’ अपनाँ लए समटैत छथिन।
जनताकें उचिते उपनैत बुझैत छथि।
एते दशा पर धनसन कोना रहैत छथिन।
मुनख छथिन से सत्ते कहाँ लगैत छथिन।।

परिवर्तन
पहरा परक कुकूर
आब नहि भुकैत अछि
आब ओ चोरकें चटैत अछि
अजब परिवर्तन अछि
कुकूर मनुक्ख जकाँ करए व्यवहार
आ मनुक्ख बनल जा रहल अछि
कुकूर लगातार

उपेन्द्र दोषी
आत्माभिव्यक्ति
बहुत दिनसँ गिड़ त’ अएलहुँ--गप्प, पिबैत रहलहुँ काल,
किन्तु अपना स्वयंमे बनल रहलहुँ एकटा किम्वदन्ती
एकटा अगमकूप, अन्हरजाली लागल कोनो बुद्धि
कि कोनो कोनमे घाव-मवाद-पीजसँ भरल कोनो कुकूर
भरिसक हम आ कि हमर ‘अहं’ ‘को हम्? को हम्?’ करैत रहल।
हमरा ‘हम’मे -- हमरा अन्तरमे
एक अवैध शिुश--एक अदृश्य पिण्ड
हमर मोन हमर साँस भरिसक ‘सोहंसोहम्’ करैत रहल,
तोषैत रहल गर्भस्थ शिशुकें--अदृश्य पिण्डकें।
हमरा मोनक अविवाहिता माइ मरियम, मने हमर निसाँस,
बहुत दिन धरि तकैत रहलहुँ एकटा मरियम,
जे फेर दितए कतहुसँ एकटा अनेरुआ मसीह
बहुत दिन धरि तकैत रहलहुँ एकटा अशोक
जे अपन निनानबे भाइकें मारि क’ ध’ दितए हमरामे,
आ’ करितए खुल्लमखुल्ला राज (कारण हम अगमकूप छी)
बहुत दिन धरि तकैत रहलहुँ कोनो एक राजपुत्राी प्रज्ञा
कि कलिंग, कि कोनो एकटा नव मसीह,
विश्वशान्तिक निमित्त बहुत दिन धरि बनल रहलहुँ
अगम, अपरिमेय, असूर्यम्पश्या-सदृश।
किन्तु आब होम’ चाहै अछि पर्दाफाश
काल दुश्शासन कर’ चाहैछ वातावरण-कैकेईकें निवस्त्रा,
तें आब मात्रा अपन गुप्तांगे टा पर नहि,
सम्पूर्ण स्वयं पर ध’ देब’ चाहै छी
इतिहासक एकटा मोहक अपारदर्शक परदा
--विश्व-शान्तिक निमित्त।

एकटा निवेदन
हे मिथिला-मैथिलीक उन्नायक-कर्मसाँढ़!
अछि एकटा निवेदन--
राजकमलक स्वरगन्धा आ
अन्य-अन्य कुकीर्तिक छै पसरल दुर्गन्धि,
वातावरण भेल छै विषाक्त आ सड़ाइन,
भ’ ने जाए अहूँंक साँस कतौ दूषित,
तें उनटा क’ खुटिया धोतीक खूट
क’ लिअ’ प्राणायामक कुम्भक
छोड़ि दिअ’ साँस लेब, एहि दूषित--सड़ाइन वायुमण्डलमे।
गरदनियाँ द’ निकालि दिऔ
ओहि दूषित प्राणवायुकें
जे किंचित जान वा अनजानमे
खिंचा गेल अछि साँसमे।
मानि लिअ’ हमर निवेदन आ’ ई सद्यः प्रार्थना--
मुक्ति प्रसंगक यौनाक्रान्त कुण्ठाक
अन्हर-बिहाड़िमे
उड़िया ने जाए अहाँक पाग कतौ
तें धेने रहू कसि क’
(भ’ सकए तँ काँख तर दाबि लिअ’)
मटर भरि गीड़ि लिअ’ बालु-गोबर
करेज पर बामा हाथ द’
मोकि दिऔ कण्ठ अपन साँसक--धुकधुक्कीक,
जे अनुखन करैत अछि--
धक्-धक्-धक्, धक्-धक्-धक्-
राजकमल ! राजकमल !!

मोह केर ‘स्केच’ थिक संसार
जीवनक पाँचम दशकमे ब्याह बुद्धिक भेल
कोबरे बीतल पहर दू राति,
जागि ताकल प्रेयसी केर बाट
मुदा ओ तँ भेली नहि प्रत्यक्ष।
मूनि लेलहुँ आँखि-मुँह आ नाक,
रोकि लेलहुँ साँस--जे अनित्य,
सुनल हुनकर नूपुरक झंकार--
देखि नहि सकलहुँ नयनसँ रूप।
मुँह लटकौने प्रपंची लोक सन
घूरि एलहुँ पुनः प्राते गाम,
द्विरागमन करब हम एही पक्षहि मध्य, सएह निश्चित भेल।
‘सत्य’ केर पाथेय
धरब हम ‘शिवम’ मोटरी माथ
‘सुन्दरम’ बरियात संगमे साजि
करब ई दस द्वारि कहुना पार।
मुदा लाएब प्रेयसिक उर जीति
दूर-बहुतो दूर, क्षिति केर छोर पर
जत’ नहि अछि भेद अग्नि-पवन-पानि-पावक केर
मुक्त मन्दिरमे करब आवास, आलिंगन करब भरि पोख,
हँसत धरती मेघ आ आकाश,
उषा हेती तखन किछु अरुणाभ
आ उठत मधुयामिनी केर घोघ
कर्म केर कुहेसमे भ’ जाएब एकाकार,
ओ हमर छथि मुग्धिका आ’
मोह केर ‘स्केच’ थिक संसार।

एकटा निवेदन
आदरणीय श्रीमान...
जँ अन्तरक लोहियामे
आशीर्वादक किछु डाढ़ी हो
त’ आदेश दिअ’--
प्रणामक खुरचनसँ
हम तकरा खखोड़ि ली।
अपना लेल नहि;
हमर विश्वास अछि--
अपनेक नपुंसक आशीर्वाद
हमरा अल्पायु, दीर्घायु, चिरायु किछु नहि करत।
कनमा भरि मड़ुओ नहि देत।
तें अपना लेल नहि
अहींक डेढ़ियासँ बैलाओल
अविश्वस्त, दुतकारल
छाल्ही ओलनिहार
नाँगरि डोलौनिहार धन-सन
किछु सामाजिक जीव
प्रजातान्त्रिाक पमरियाक तेसर
हमरहु चतुर्दिक सोहराइत छथि।

दिनचर्या
राति कपूर भेल नेना गढ़ैत,
दिन हेराएल तकरे आहार जुटबैत,
खाँटी आर्ष-सन्तान हम
रत्नाकरक रत्नाकरे रहि गेलहुँ
वाल्मीकि नहि भ’ पौलहुँ
समय-संकेत, नारदीय उपदेश
कुसंस्कारक गाछमे गछाड़ल
अद्यावधि कुहरैत अछि
हे हमर बीज पुरुष!
हमरा देखि क’ घृणाक देबाल,
थूकक नदी नहि रचाउ
उस्सरमे घृणित खाद पटा
सद्गति उपजाउ
‘महाजनो येन गतः स पंथाः’
अँगेजब हमर अभीष्ट नहि
अन्हारक मोनिमे चकभाउर लैत
इजोतक एकटा धार
दौड़ाएब अवश्य।

अल्टीमेटम
हमर कुकूर
जे पछिला कातिकक कटाउझ
एलेक्शनमे अँखिफोड़ा
भ’ गेल कनाह
गद्दीनसीन
बाजल--
साबिकक कहबी
‘कनहा कुकूर माँडे़ तिरपित’
आब बिसरि जाउ
सोर कर’क हो ते अत्तूः नहि
आवाहन-स्तुति गाउ
कौरा की?
चिकेन बिरिआनी
नहि सोहाइत अछि
बदामक हलुआ नहि सूँघब
अनका पर हुलकाएब
त’ अहींक मुँह दूसब
नहि त’ टाँग उठा क’
ठाढ़े-ठाढ़ तुलसी चैरा पर...
बेसी भेस बदलब त’
अहीं पर भूकब
सुनसानमे काटियो लेब
नहि चूकब
तखन अपन करनी पर
अपने थूकब
आ हमरे जकाँ गाहे-बगाहे
अछाहे भूकब।


रामलोचन ठाकुर

भगवान तथागत

वन विहार लेल
रथ सबार भेल
बहराएल कपिलवस्तुक राजकुमार
सिद्धार्थक सोझाँ पड़ि गेल छल
कोनो एक वृद्ध बोनिहार
अभावें नइं
वयभाारसँ झुकल डाँड़
एनमेन धनुषाकार
लाठी पर टेकने देहक भार
ठुक-ठुक करैत चल जाइत...

राजकुमारकें आश्चर्य लगलनि
लोक एना किएक झुकि जाइत अछि
मनमे प्रश्न उठलनि
राजमहलसँ बाहरक जगतमे
ई हुनक प्रथम पदार्पण छलनि

आ फेर दोसर दिन
देखलनि ककरो अरथी चल जाइत
फेर प्रश्न--
लोक किएक मरैत अछि

प्रश्न आ प्रश्न
कोनो ने निदान
आकुल मन कोमल तन
राजकुमार गौतम एहने स्थितिमे
एक राति
चुप्पे बहरा गेलाह
राज-पाट
माइ-बाप
स्त्राी सुत त्यागि
सत्यक सन्धानमे
जरा मृत्युक निदानमे
राजकुमार घुमला देश-विदेश
आ अन्तमे
कोनो गाछ तर
आँखि मूनि ध्यानस्थ भ’ गेला
बिनु सत्यक सन्धान
भंग होएत नइं ध्यान
खूजत नइं आँखि
खएता नइं अन्न
पीता नइं पानि
एहने सन प्रण क’ क’

एहिना बीतल दिन कते
कत राति
अनाहारेसँ राजकुमारक
भेल कण्ठगत प्राण
केहन संयोग ! सुजाता
कोनो अन्धविश्वासक बात
भरि थार परसने खीर पहुँचलि
खेलनि गौतम पीलनि पानि
पलटलनि प्राण
भेटलनि ज्ञान
राजकुमार गौतम
आब भ’ गेला भगवान

भगवानक दर्शनार्थीक भीड़ जूमए लागल
शिष्यक संख्या बढ़ए लागल
सारिपुत
मौदगलायन...
कतेको राजा महाराजा
सेठ साहुकार भेल धन्य
पाबि आशीष
उल्लेखनीय छथि
मगधक राजा बिम्बिसार

भगवानक वाणी पसरए लागल
देश देशान्तर
सुनने हेतीह गोपा
पिया विरहमे आकुल व्याकुल प्राण
आँखिसँ बहैत अविरल नोर
‘सखि हे हमर दुखक नहि ओर’

सुनने होएत अबोध राहुल
बापक कोरा कन्हाक कल्पना तेजि
बाजल होएत--
बुद्धम् शरणम् गच्छामि !

सुनने छली महारानी गौतमी
पुत्रा वियोगें व्याकुल जनिकर प्राण
हेरैत बाट आँखि पाथर सन भेल
राज-पाट तजि
पदब्रजे जुमलीह संघाराम
(कोनो मोदिआइनक अर्थसँ
जकर भेल छल निर्माण)
संघारामक
नारी प्रवेश निषेध नियम भेल भंग
संघारामक प्रथम बौद्धभिक्षुणी बनलीह
गौतमक माता
महारानी गौतमी
भगवान तथागतक
नाम यश पसरैत गेल
वृद्ध भेलाह
आ एक दिन मृत्युकें प्राप्त भेलाह
ओना
भगवानक मृत्यु हो नहि
तें एकटा नव शब्द गढ़ल गेल
--निर्वाण
अवतारक शृंखलामे
एकटा न’व कड़ी जोड़ल गेल
--(तथागत भगवान)

कविता, कविता आ अकविता

भाइ!
एना होइ छैक
कहियो काल

भदबारिक सतहिया
माघक शीतलहरी
कोनो नव बात नहि
जखन दिन पर दिन सूर्यक अस्तित्व
रहैछ अगोचर
त’ मानि लेब सूर्यक लोपीकरण
आलोक पर अन्धकारक वर्चस्व
कहाँक बुद्धिमानी थिक

सामयिक सत्य होइतहु
शाश्वत नहि होइछ अन्धकार

आ आइ
जखन पूंजीवादी विस्तार लिप्साक
जारज सन्तान वैश्वीकरण
वृहत विश्वकें बाजार बना देबा लेल
अछि उद्यत अपसियाँत त’
आवश्यके नहि अनिवार्य भ’ जाइछ
प्रतिकार शब्द-साधक लेल
बिचारब बतिआएब कविताक मादे

बिचारब बतिआएब कविताक मादे
भ’ जाइछ अनिवार्य शब्द-संस्कृतिक रक्षार्थ
जे सभसँ पहिने होइछ आक्रान्त
बाजार संस्कृति द्वारा

बाजार संस्कृति
भाँट-भरुआक बल पर
लतरैत चतरैत विकृत आ धिक्कारयुक्त
बाजार संस्कृति
मनुष्यसँ मनुष्यता आ
शब्दसँ सम्वेदना धरिकें
वस्तुमे बदलि देबा लेल रचि रहल षड्यन्त्रा
शब्दक अपहरण
शब्दार्थक संग बलात्कार
तखन एक मात्रा कविते टा रहैछ ठाढ़
अपन सम्पूर्ण ऊष्मा ओ आक्रामकताक संग
बनल अभेद्य ढाल, अचूक तलवार
एकमात्रा कविता

एकमात्रा कविता
हँ भाइ
हम कविताक बात करै छी
शब्द समाहारक नइं
शब्द जादूगर द्वारा संयोजित सृजित शब्दजाल
साहित्यक अन्यान्य विधाओ
अनुगमन करैछ कविताक
मुदा आगू त कविते रहैछ
वैह करैछ नेतृत्व
मुक्तिक नाम पर
पददलित होइत कोनो देश, कोनो जाति
जनतन्त्राक नाम पर दलाल तन्त्रा प्रतिष्ठाक प्रयास
सुरक्षाक मुखौटा तर लुण्ठित होइत सम्प्रति सम्मान
सभ्यताक धरोहर
संस्कृतिक पुरहर
काबुलसँ करबला धरि रक्तरंजित
जाति धर्म पंूजीक त्रिशूल ताण्डव नृत्य
तखन कविता आ एकमात्रा कविते टा
उठौने मशाल
विध्वंसक विरुद्ध सृष्टिक
दानकवताक विरुद्ध मानवताक
शोषणक विरुद्ध मुक्तिक
आशा विश्वासक प्रतीक बनि
अपन सम्पूर्ण अर्थवत्ता उपयोगिताक संग
जातीयताक मध्य अन्तर्जातीयताक
व्यष्टि मध्य समष्टिगत चिन्तन चेतनाक संग
दीपित रहैछ कविता

हमर कविता
अहाँक कविता
आशाक कविता
भाषाक कविता
कविता, कविता आ कविता


भीमनाथ झा
जे राम से राम
एह, की करबै ले’?
चालि-प्रकृति-बेमाए
तीनू संगहि जाए
एहनो कतौ भेलै’ए?
कने जँ मोन डोलिए गेल’ए
सोनितक स्वाद फेर चिखबा ले’
तँ लागि जाएत एहन कोन पर्तबाय?
एहनो कतौ भेलै’ए?

की कहलहुँ--फोसरीसँ भोकन्नर भ’ जाएत?

अरे हएत तँ हएत
की करबै ले’?
तै पर जँ कने मोन डोलिए गेल’ए...

की कहलहुँ--पराभवमे पड़ि जाएब?

जाउ-जाउ
पराभव-तराभवक डर नहि देखाउ!
जीहकें कोना लिअ’ सैंति?
बेसी ता थोड़े
दुइयो-चारि लोकक हएत काफी...
की कहलहुँ-- घोरत ई विष?
धुः!
विष-तिषक फिकिर कतहु गहुमनकें भेलै’ए?
कहैत रहू जे कहबाक हो
भूकैत रहू अहाँ
चालि-प्रकृति-बेमाए
तीनू संगहि जाए...
करैत रहू मना
मुदा हम मानब आइ थोड़े?
जे राम से राम...


समाधान
समवेत श्रोतागण !
बंगलाक मनोरम काव्यश्रवणक बाद
आब सादर आमन्त्रिात करैत छिअनि
मधुरतम मैथिली गीतक राजकुमार ...कें
साहित्य-संगमक एहि मंच पर ।
हृदयकें सराबोर करैत जाउ
मैथिलीक मधुरिम रस-पान क’...

मंचस्थ भेलाह राजकुमार
समवेत श्रोतागण मैथिली गीतक स्वागत-सत्कार लेल
हृदयक केबाड़ खोलि प्रतीक्षा करए लगलाह...

ता बजला राजकुमार--
मैथिलीक तँ जे छी से छीहे हम
चिन्हिते छी अहाँ लोकनि
सुना देब दोसर दिन जतबा कहब ततबा
मुदा आइ थिक विशिष्ट पर्व
राष्ट्रीय उत्सव, गणतन्त्रा दिवसक शुभ अवसर
तें हम अपन राष्ट्रीय भावनाकें राष्ट्रभाषामे व्यक्त करी
सएह होएत समुचित आ श्रेयस्कर...

मैथिली गीतक राजकुमार
राष्ट्रीयताक भावनासँ सर्वांग ओतप्रोत भेल
राष्ट्रभाषाक संगमर्मरी मन्दिरमे
गुम्बजक जोड़ैया कर’ लगलाह...
एम्हर--
मातृभाषाक अन्धभक्त कूपमण्डूक
क्षुद्रबुद्धि मन्द श्रोता समूहकें होअ’ लगलनि आत्मबोध...

सरिपहुँ तंँ
राष्ट्रभारतीक सम्मान तथा
राष्ट्रीयताक गुणगान भला
मैथिलीमे भ’ए कोना सकैत अछि?
मैथिली तँ जे अछि से अछिए
मुदा ई थिक राष्ट्रीय पर्व
गणतन्त्रा दिवसक शुभ अवसर
राष्ट्रीयताक पताकाकें मैथिलीमे फहरौलो कोना जाए, कहू?
भावात्मक एकताक राहड़िकें
मैथिलीक जाँतमे दरड़लासँ
दालि होएत कोन कर्मक!
एहनो-एहनो अवसर पर
मैथिलीए टाक नाँगड़ि धएने रहलासँ
की बूझत हिन्दीवला, बंगलावला
भोजपुरी-मगहीवला
नगपुरिया-उड़ियावला...
की बूझत भला!

भावात्मक एकताक समस्याक
‘भाषाई’ समाधान
भ’ए की सकैत अछि एहिसँ सटीक भला !
उपड़ि जाओ टीक
तथा कटि जाओ बरु साफ गला !

हम कृतार्थ एतबेमे
आइ-काल्हि
रहरहाँ
जनसंकुल बाट पर
दरबर मारैत
कटैत भीड़कें
सोहमे आगाँ बढ़ैत जखन रहै छी
कि कोलाहलक बीच दने
समधानि क’ तानल
लक्ष्यबेधी प्रत्यंचासँ
छुटि क’ अबैत एक तीख-चोख तीर
कानकें बेधैत निकलि जाइत अछि--‘प्रणाम सर!’
आहत भेल
चैंकि
मुदा भ’ क’ सतर्क हम
सन्धान’ लगै छी शिकारीकें...
तावत ओही छोर पर
सुदूर, सड़कक ओहि भागमे
सोझाँक दोकानक भीड़मे कतहु
कोमलतर वस्तु पर
केन्द्रीकृत कएने दुनू आँखिकें
विजेता छात्राक
मुस्की देखबामे अबैत अछि...
कि लगले
हठात् हाथ दुनू उठि जाइछ हमरो
(मने आत्मसमर्पण होइ क’ रहल)
कुहरि उठै छी-- ‘प्रणाम...’
(‘सर’ मुदा मुँहेमे लटपटा क’ रहि जाइत अछि)
भाग्यवश
फेरि लैत अछि हमरासँ आँखि ओ छात्रा हमर
उदासीनताक
(आ कि तिरस्कारेक-- जे होउक)
प्रतिदान दैत हमरा...
हम कृतार्थ एतबेमे
अपनाकें बरी बूझि
आश्वस्तिक नम्हर साँंस
छोड़’ लगै छी...


हाथ ओ थिक
हे प्रवासी !
रहू कतहु अहाँ, खाउ कतहुक अन्न
पिबू कतहुक पानि
लिअ’ साँस बसात कतहुक
भनहि कतहुक धुआँ चिमनीक
कुटकुटाबए अहाँक दूनू आँखि
अहँक दूनू हाथसँ बरु कोनो ठामक माटि उगिलए सोन
अपन कौशलसँ करू
बरु कोनो धरणिकें अहाँ धन्य
वातावरण नगरीय हो वा वन्य...

के अछि अन्य?
कोनो राष्ट्रक कला वा साहित्य
तकनीक वा विज्ञान
अध्यात्म किम्वा स्वास्थ्य
कोनो क्षेत्राक रीढ़कें मजगूत करबा लेल
रहए जे चुबबैत अविरल अपन देहक घाम
सुखबए रक्त जे अविराम
अहाँकें तजि एहन के अछि अन्य?
हे अपन, छी धन्य!

रहू पतालहु
किन्तु हे आत्मीय!
अहाँक माथ पर कोनो अदृश्य शक्तिक हाथ
जे ने कखनहुँ कतहु कहियो झुक’ दैत अछि अहाँक उन्नत माथ
(विवेकानन्दक ऊपर जनि रामकृष्णक हाथ)
हाथ ओ थिक--
अपन माइक,
अहाँक अप्पन बन्धु-भाइक!
हाथ ओ थिक--
अपन माटिक तीन कोटिक हीत-मीतक
हाथ ओ थिक--
मैथिली माँक आशीषक!
एक पल ले’
पढू आखर ओकर आँखिक कोर दिसक...
किऐ छै हिचकी, उकासी?
हे प्रवासी !

नचिकेता
पुरातन प्रेम
हमर बहुत पुरातन प्रेम आइ
आबि क’ ठाढ़ भेल अछि हमरहि आगाँ
माँगि रहल अछि हमरहिसँ गीतक दाम
जे किछु बिनु मँगनहि क’ देने छलिऐ
ओकरहि नाम

कए बरखक नमहर सड़कक पाछाँसँ
हमर पुरनका प्रेम
हमरहिसँ क’ रहल अछि सवाल जवाब मुदा
हमरा कहाँ किछु अबै छल कखनहुँ
सवाल-जवाब प्रकृतिक पाठशालामे किछुओ!
एक नहि सुनत हमर पुरातन प्रेम,
छल प्रतिदिन दण्ड देबै ले’ तैयार
पुरातन प्रेम आइ जनैत अछि
गबियहु क’ बजबाक शक्ति आब
नहि रहल अछि बाँहिमे हमर;
पाठ्य-पुस्तकसँ इतिहासक पाठक अभ्यास धरि
सीमित हमर पुरातन प्रेम आइ
पूछि रहल अछि हमरहिसँ
कठिनसँ कठिन सभ प्रश्न--

कहैछ,
पुरनका शब्द-सभ टा वाक्यमे प्रयोग करू!
कहैछ,
भंगठल अछि विन्यास
तकरा जोड़ू, तोड़ू, फेर सजाउ!
कहैछ,
देखू सभ टा वाक्य सत्य अछि वा फूसि!
कहैछ भावार्थ बुझा क’ कहबा ले’ हमरे--
हमर पुरातन प्रेम!
मुदा हम बड्ड चालाक बनि गेल छी आब;
दृष्टि पहिलुका जकाँ आब नहि अस्पष्ट;
ओझराएल कदम नहि खाएत ठोकर
बढ़ा दैत अछि हाथ ओकरहि दिस;
पढ़ि सकैत अछि आब ई आँखि हमर
मन्दाक्रान्ता छन्दक व्यथा
नापि सकैत अछि कान हमर ई
शुद्ध धैवत केर पातिव्रत्य
जीवन-गणितक नियमित बर्बरताकें
चिन्हलक अछि हमर ई शोणित ठीके!

बहुत चालाक बनि गेल छी हम आब;
धाख हमर चलैत अछि दूर दूर धरि
आब हम बजै कम छी,
बजबो करै छी तँ भूतकाल द’ नहि
अनाहत अनागत प्रेतकालक दिस
बढ़ाएल कदम हमर;
हम सोचै कम छी;
सोचबो करै छी तँ तथ्य तर्क द’
अकथित अनूदित अनुभूति दिस
बढैत दर्शन हमर;
बाँकी सब किछु
धुँधला देलक अछि,
सब किछु--
नदी किनार, केतारी खेतक अ’ढ़
भुतिआएल माल-जाल
आ पुरनका प्रेम!

आजुक कवि, बड़ उच्छृंखल कवि
रहू ओहिना बान्हल आन्हल कवि
छन्द-निश्छन्दक डोरीमे
रहू फँसल फँसल घाइल आ घसल कवि
अलंकार केर व्यंजनमे
रहू दहू बहुत पकैत ढकैत कवि यौ
जूनि टपू पहाड़ दहाड़
नद पर्वत धैवत रहू गबैत
शुद्ध मीड़ गमक बस रहए बहए बरोबरि
तावत--

कतबो बदलल अछि संसार, सर सौ सरकार
अछि की दरकार जे
बदलि लेब स्वर एहि कवियारक
ड्योढ़ीमे बस
अपन पंक्ति भ’, जाइक पार!
रह’ दिअ’ यौ बह’ दिअ’ पुरातन स्तवनक
नाद-गीतकें
मीतकें करैत नित आनन्दित चित मनकें
तावत्
आबि रहल छथि कत कतारसँ
कविः कवी कवयः लोकनि
रसजीवि ल’ छवि अपार ल’
जय जीवन लय, भय-क्षय-भ्रान्ति आ’
जोश रोष हाक्रोश केर जय जय
लैत गबैत धुन आधुनिक ई ठीक जनिक

ने रहतनि मन अभिलाषा
नहि छनि आशा जनिका
जएता ल’ पुनि कविताकें ओ
छन्दित बन्धित वन्दित
सोचक ओहि आलोचक हेतु
बनबए रोचक अपन-अपन सब शब्दक जटिल
संयोजनकें सघन-सम्वेदन
रह’, देता बरु कविताकें ओ
आधा कविता अर्ध-अकविता
अर्धनारीश्वर अर्ध-पुरुष पर
किछु किछु पद्य आ गद्य कखन किछु
देता पटकि ओ शृंखल
बड़ उच्छृंखल छथि ई
आजुक कविवर हतनारीश्वर!


महाप्रकाश

छतरी
ओहि छतरीसँ
हम बहुत प्रभावित रही
जे छल छोट रंगीन
आ फूल-पत्ती उखाड़ल।

हम अपन बेटीकें द’ आएल रही
(जे स्वयं रचनाक संसार छलि)
जकरा गली होइत
विश्वविद्यालय धरि जेबाक रहै
एकटा सुन्दर संसारक उपादान
ताकि क’ अनबाक रहै।

ई छतरी पारम्परिक नहि छल
‘नीली छतरी’बलाक हमरा कोनो
ध्यानो नहि आएल जे ओ
कखनो कुटिल मुस्कियो दैत अछि।

ई ओ छतरी नहि छल
जे चेम्बरलिन ल’ क’ चलै छल
जकर फोटो हमर देशमे
एखनो धरि छपैत रहैत अछि
सामंजस्यक अथक राग अलापैत।

ई ओहो नहि छल जे
राजकपूर ओढ़ि लै छल
अपन इकाइक विस्तार आ सुरक्षा लेल
आन्तरिक संगीत रचैत।

हम नेहाल भ’ गेलहुँ
ओहि छतरी पर जे
बाँगक सूतसँ बनल नहि छल
अनचिन्हार सन ताग छल ओकर
हम जानि-नहि किऐ फिदा भ’ गेलहुँ ओहि पर
जे छोट छल
जकर विस्तार
ओढ़ै’वलासँ बेसी नहि छल कोनो तरहें।
आब
फूलपत्तीबला छतरीक संग
बेटी विश्वविद्यालयसँ बहुत
दूर जा चुकल अछि
शूल सन तनल समय अछि
भीतर-बाहर
आत्माकें आक्रान्त करैत बजार
बनल कालखण्डमे
अभरि रहल अछि आब
रंगक दाग
हमर पश्चाताप।

पन्द्रह अगस्त

अकाल कबलित होइत, हमर देह
हमर स्वतन्त्राता हमर अस्तित्व लेल ओ
कफन बनि जाए।

पन्द्रह अगस्त सन उनैस सय सैंतालीसकेॅं
लाल किला पर फहराओल गेल तिरंगा
झण्डाक ओ प्रगतिकामी चक्र राजपथ पर
जानि नहि कहिया टूटि गेल।

भारत-भूमि पर उगल हमर देह, हमर अस्तित्वकें
ओ अपन टूटल चैबीसो शलाकासँ बेधि
रहल अछि बरमहल। अर्द्धशताब्दी बीति गेल
हमर देह, हमर अस्तित्व ऐतिहासिक खण्डहर बनि गेल
समय-कुसमय भारतीय संग्रहालय सभमे
राति-विराति हम प्रेत जकाँ बौआइत
ओहि झण्डाकें हेरि रहल छी जे ओ अकाल कवलित होइत
हमर देह हमर स्वतन्त्राता हमर अस्तित्व लेल
कफन बनि जाए।

ई जे लोक अछि

ओ हमर गर्दनि पकड़लक
अपना धरि उठौलक।
आँखिमे तकलक
ओकाति पूछलक
आ अपनो बतौलक।
पहिने तँ हम सहमल रही
फेर डराएल
आँगुर सभक कसावटिक बीच
बेचैन छटपटेलहुँ
पहिचान तँ ओकरो सभक छल
हम तँ मात्रा एकटा अयना रही
काल्हि लोक तँ नइं बेजाय कहै
दया तँ ओकरा देखेबेक छलै।

विकट सन वर्तमानमे
भोगल अतीतकें
कतहु तँ क्षण भरि पावहिक छल
कि ओ अपन पकड़ ढील केलक
हम नीचाँ खसलहुँ
डाँड़ पकड़लहुँ जे दर्दकें सोहराएब
हारल योद्धा जकाँ
स्वयमेव बुदबुदेलहुँ
दूबि तँ दूबि थिक
तारक गाछसँ
कोन नियति छल मिलबौने
ई हमर निर्लज्जता थिक जे
दाब केर बादक हवा
जे हमरा बेर-बेर
हरियर घास जकाँ अछि
लहरौने...

शान्तिक स्वरूप
ओ अएलाह हमर घर
कहियो रेडियो कहियो टीवी पर
बेर-बेर कहलनि
भूमि ई जे स्वर्गसँ सुन्नर अछि
खतरासँ आइ बेढ़ल अछि
एकर रक्षा करू...
अपन हिस्साक भूमि ओ बाँटि लेलनि
कखनो लकीरसँ कखनो देबालसँ
सुरक्षित रखबा लेल
मुदा अकस्मात ओ
रेडियो टीवीसँ निकलि क’ सदेह
हमर गली हमर सड़क पर अएलाह
जेना कुबेरक सम्पत्ति हो घूमि रहल
सहस्र नागफाँससँ बेढ़ल
महिमामण्डित ओ बजलाह --
भूमि ई ... शान्ति एकर ...
खतरामे पड़ल अछि
भूमिक सर्जक हम...
आइ हमरा तँ देखू
खतरा ई बरमहल बढ़ल त’ जाइए...

देबाल जे बनल छल
लकीर जे पड़ल छल
ओ शान्तिक शील छल
किऐ टूटल जाइए...?

मुदा तरहत्थीक दरारि जे जमीन पर उगैत अछि
टघार कोनो लहूक जमीनकें पाटैत अछि
संस्कार कोनो शान्ति वा खतराक
एहिना गढ़ाइत अछि
आब हमरा ई बात
एहिना बुझाइत अछि।

हिज मास्टर्स भ्वाइस
प्रायः पचास सालसँ
जनैत छी हम
कुकूर पोसबाक हुनर आ ब्योंत
बदलैत समयक भाषामे
अपनहि सिखैत छी, सिखबैत छी।
झुण्डक झुण्ड अछि कुकूर
हमरा आगू-पाछू।
हमरहि नामक हमरहि रंगक पट्टी छै
बान्हल ओकरा सभक गरदनिमे।
हमर छड़ीक गतिमे नुकाओल अछि
ओकरा सभ लेल मारि, फटकार, दुलार...
आ हम खुअबैत छी तखन ओकरा
माँसुक बुट्टी सुस्वादु
एहि देशक सरजमीन पर
जहिया सँ लोक नागर बनबाक
अन्ध दुराग्रहमे उपजाबए लागल अछि
आदिम जंगल
भाँति-भाँतिक माँसुक उलब्धता
आसान अछि।

एखन हालेमे हम
कएने रही कुकूरक एक प्रदर्शनी
अहाँक शहरे बाटें तँ बहराएल छल
ओकर करामाती जुलूस
देखनहि हएब अहूँ
ओकर सभक आन-बान-शान
हमर ख्याति केर ऊँचाइ
हमर बाहुबलक असीम फैलाव
किछु तँ अन्दाज लागले हएत
कोना उनटल आबैत रहए लोक!
जेना बताह भ’ गेल हो बह्मपुत्रा।

आइ-काल्हि किन्तु
माँझहि ठाम एक विपत्ति अछि भीषण
अहूँ चीन्है छी ओकरा
निचैन केर दू रोटीक छाँहमे
हमर श्वास-प्रश्वासक ठीक बीचोबीच
दिनोदिन पसरैत बाजार अछि दुर्वह
बाजारसँ जे डेराइए
से आबि क’ जीबै’ए
हमर छाँह केर बन्हनमे।
बाजारक एक सूचकांक होइ छै
जे ऊपर चढ़ैत अछि
तँ ढनमनाइतो अछि कदाच नीचाँ दिस
ओना, ई समाचार तँ भ’ सकै’ए एकटा
मुदा मर्मभेदी कोनो बात नहि
कारण
बाजार बनि चुकल एहि सभ्यतामे
क्यो अनुवाद क’ दिअए हमर कुकूरक
आदमीमे
एहन कोनो ‘वाद’ नहि बचल।
के टोकत हमरा?
पकड़त ‘हेग’ केर न्यायालयमे
के ठोकत हमरा?
ई विवेक-बुद्धि हमर ई इत्मीनान
बरखो बरखक अजमाएल नुस्खा अछि
जे हरेक बेचैन नसकें सहलाबैत अछि
आफन तोड़ैत दिमागकें
नकलिये सही
आराम पहुँचाबैत अछि।


सुकान्त सोम

प्रतीक्षान्त
चारि गोट बुर्ज ठाढ़ कएलासँ किछु नहि होइ छै
सत्यक भ्रम किम्बा बेसाहल सपनासँ नहि चलै छै कोनो गाम
मीत हे, बड़ जरूरी छै किछु फूल
गन्धवह बसात आ
मौसमक शालीनता

गामक चारू टा बुर्ज आब ढनमना रहलै’ए आ
लाल होएबाक परम्परासँ फराक होइत
हमरा लोकनिक सीमाहीन सन्त्रासमे भसिया रहल छी, तैयो
शताब्दीक उत्तरार्द्धक एहि रौदमे
बर्फ खसिए रहल अछि
गंगा निर्विकार
सागरमुखी छथिए

बेरंग बुर्ज सभक दोहाइ दैत हमरा लोकनि
कखनो बोकारोक विस्फोटमे
कखनो चासनालाक बाढ़िमे
कखनो बंगोपसागरक चक्रवातमे
कखनो लद्दाख आ कच्छक रणमे
मारल जाइ छी
सभ दिन सभ ठाम
प्रतिवाद विहीन
मीत हे, हमरा लोकनि एखनो
एहि चैती बसातमे प्रतीक्षारत छी कि
क्यो त’ आबए आ
एहि खराएल काश वनक निरंग होइत अकाशमे
एकटा रंग पसारए
भ्रम आ सपनाकें फरिछाबए
क्यो त’ आबए।

एहि रात्रि शेषमे
सीमानक पीपरक छाहरि पार कएलाक बाद
विस्मृतिक गह्नरमे चलि गेल एकटा गाम आ हमरा
एकटा सीमाहीन बाट टनैत रहल। एही बाट पर
दोरस बसात सहैत बुढ़बा ब’र
महाकालक यात्राक निसंग साक्षी बनि ठाढ़ छल
एही बाट पर एकटा सुग्गा गरामे
मुक्तिक तगमा लटका क’ एकटा ऐतिहासिक
जलाशयक पहरामे बुढ़ा गेल छल

मोहना च’र टपलाक बाद
दरारि फाटल खेत वर्जनाक स्वर बनि चिकरैत रहल
छारनि भेल जीबछक पारसँ
अबैत रहलै हाक: ‘घुरि आउ।’ मुदा,
मीत हे, से नहि भेलै। यात्रा पथमे आब
मोन नहि पड़ै’ए भग्नावशेष होइत एकटा गाम
वक्षकें चीरैत भादब बनल दुपहरिया

सत्ते, भाग्यरेखा तरहत्थीसँ दूर होइत गेल
काल बैसाखीमे उड़ि गेलै चोरालुक्खी आ धूरा माटिक खेल
एकटा अतीत: हमर गाम
एकटा भविष्य: अनागत नगर
एकटा वर्तमान: अन्हार जंगल
आ एहि सभसँ संघर्षरत
महाकालक यात्राक साक्षी ब’रक गाछ
पवित्रा जलाशयक प्रहरी आ मुक्तिक दूत सुग्गा...

नहि, अहाँ नहि मोन पड़ै छी आब। मुदा, एखन त’
हमर टूटल खाटक नीचाँ
एहि रात्रि शेषमे पसरल अछि
थारी भरि इजोरिया।

सभ किछु ठीके-ठाक छै
वैदिक नदी आ परी कथाक पहाड़ी सभसँ बेढ़ल
तीस वर्षक विषम दूरीमे पसरल गाम हमर
कुमारि सपनासँ बेसी रहस्यपूर्ण आ
सागरक लहरिसँ बेसी लयपूर्ण
स्थिति आ वस्तुक सम्मिश्रणसँ गुर्जिर रहल अछि
भोर आ साँझक दरम्यानी दूरीकें नापि रहल अछि। आ एम्हर
व्यक्ति आ स्थितिक बीच तालमेल स्थापित करैत-करैत
हम किंकत्र्तव्यविमूढ़ भेल बैसल छी। अपन
आत्मीय कह’ जोगर सम्बोधनकें भिड़िया रहल छी।

अहाँ कोनो अन्यथा नहि बूझू
सभ किछु त’ ठीकेठाक छै।
एते पैघ आबादी बला चारि टोलमे बसल गामक
कोनो ने कोनो घ’रमे प्रत्येक राति भोज होइते छै आ
हमरा सन कदन्न भोजीकें पकवानक सुगन्धि भेटिते छै...
प्रार्थनाक पुस्तक आ मालिकक दरबाजाक बीचक
अन्योन्याश्रय सम्बन्धकें फरिछाइए देल गेल छै...
गामक सभ टा पैदार लोक प्रतिदिन
अथबलक विरुद्ध अपन संघर्षकें नव रणनीति दैते अछि...
गामक मुखिया लोककें निर्भय आ निर्मम
हेबाक उपदेश लगातार दइए रहलाह अछि...
जड़कालाक एहि मौसममे बोरसिमे
पकाओल जाइ’ए अतीत आ भविष्य अपन
बनौआ दाँत प्लास्टिक पिसैत प्लास्टिकक हाथ नचबैत
गामक लोककें बजरैत रहै’ए...
हमरा लोकनि अपन रचनात्मक मूल्यकें
बेसीसँ बेसी दाममे बेचबाक लालसामे
प्रतिदिन व्यापारी संघ सभसँ अपील कइए रहल छी। आ से
कोनो अनट नहि भेलै
युग सौदेबाजीक थिकै। मोल-तोलक थिकै। आ
हमर गाम आ गामक लोक
एखन सौदेबाजीमे मगन अछि। सत्ते, गाममे त’
सभ किछु ठीकेठाक छै। ओना
अहाँकें की बुझाइए?

हाथ
इएह हाथ त’ काज करैत अछि
इएह हाथ माटि कोड़ि फसिलक विकास करैत अछि
इएह हाथ जनैत अछि
कत्ते उर्वर होइ छै माटि,
घाम आ श्रमक सम्बन्ध
इएह हाथ काज करैत अछि

इएह हाथ काज करैत अछि
इएह हाथ जनैत अछि, की अन्तर छै ठाम-कुठामक पानिमे
समुद्रक नोनछराइन पानिमे आ
गंगाक शीतल पवित्रा जल
खेतक फसिलमे कत्ते लाभप्रद होइछ
इएह हाथ जनैत अछि

इएह हाथ काज करैत अछि
इएह हाथ गाछ कटैत सारिलसँ टकराइत अछि
इएह हाथ जनैत अछि
पाँखुरक ताकति आ कुरहरिक चोट
सारिलकें कत्ते ठाँ’सँ तोड़ै छै
इएह हाथ कुरहरि आ हाथक सम्बन्ध जनैत अछि
इएह हाथ काज करैत अछि!

एक टा जबदाह सपनासँ मुक्ति
भरि दिनुका थाकल वस्त्रा उतारि
तानल खाट पर ओंघराइते मुना गेल करै’ए आँखि
मेघक मारिसँ त्रास्त उदास इजोरियामे
कोनो अनाम अदृश्य नदीक तट आ
बालु आ बालु आ बालु
अदौ कालसँ
एहिना बितैत जा रहल छै राति
किछु नहि बदलै छै
ने सन्त्रास्त इजोरिया ने अदृश्य नदी
ने हवामे नचैत कोनो बिसरल उदासीक भास

सभ राति एहिना होइ छै
बाँचल भेटै’ए कारी-झामर चूल्हिमे
एक बाकुट छाउर आ माटिक तीख गन्ह
आ जीह पर बैसि जाइ’ए जरल माँड़क स्वाद
हमर दुनू गफ्फा एक दोसरामे फँसि जाइए
तरहत्थीसँ बहराए लगै’ए
सलाइ खरड़बाक ध्वनि
निहुरि जाइ’ए धुआँ
चूल्हि फुकबाक मुद्रामे आबि जाइ’ए
ठोर जीह गलफड़
गुड़...गुड़...गुड़ाम्
धारमे कोनो तामक लोटा की कलसा की घैल डुबबाक
विकट शोर गूँजि जाइ छै
कोना आ की भ’ जाइ छै
लेबराह इजोतमे सभ टा उनट-पुनट होअ’ लगै छै
आ तै खन टिटहीक कनबाक ध्वनि-प्रतिध्वनिक संग
अवतरित होइ’ए छाया शृंखला
अपन पुरातात्विक बाना उतारि ठाढ़ भ’ जाइए खगता
विचारक खगता
पानिक खगता
आखरक खगता
इजोतक खगता
अपन खगता हुनकर खगता
देह-छोहक खगता
तरल-कठोर स्पर्शक खगता
रक्त आ रक्तमे उष्मा आ प्रवाहक खगता
खगता कारी खगता उज्जर खगता लाल खगता रंग-बेरंग
चिराइन गन्हक संग खगताक रेत पर
ककरो हाक देबाक प्रयासमे
फटबाक सीमान्त धरि तनि जाइ’ए गरदनिक नस
कि तै खन खुजि जाइ’ए आँखि मुदा
पिपनी पर बैसले रहै’ए जबदाह सपना
सभ दिनुका राति एहिना बितै छै
सभ रतुका भोर एहिना होइ छै
सभ साँझ अनादि सपना आकुल करै’ए
सभ भोर अनन्त सपना व्याकुल करै’ए

चाकर-चैरस कान्ह आ बलिष्ठ बाहु
वामनसँ प्रतिस्पद्र्धामे बाझल चरण चक्र
हमरहि श्रमसँ चमकैत दिनमे
समय हमर निस्संग बनल रहै’ए
घुन्ना आ चुप्पा
अनुपस्थित मोगलक कर्जदार
विश्वासघाती यौवनसँ लड़ैत-लड़ैत
वयसक पाँतर नपैत-नपैत
एक दिन घास पर पटाएले-पटाएल
माति गेल मोन
कानमे गूँजल संगीत
मौसमसँ लड़ैत घास-पातक संगीत
जीव-जन्तुक चरण चालनक संगीत
चिड़ै-चुनमुनीक जमीन पर उतरबाक
आ पाँखि तौलि अकाससँ उड़बाक संगीत
पहाड़सँ खसबाक बाध-बोन पटबएबाक
धारक प्रवाह बनैत सागर मिलनमे आतुर
धरफराइत दौड़ैत पानिक संगीत
सूर्य-चान ताराक उगबाक संगीत
किछु खसबाक किछु उठबाक संगीत
कोनो हास कोनो रुदन कोनो हाक
कोनो जागरण कोनो मूच्र्छना
सभटा सुनलिऐ
धरतीक संगीत सुनलिऐ
बड़ी काल धरि
पड़ले पड़ल
कान पाथने
गति संगीतक एक्के टा बोल सुनलिऐ
सुकान्त, अहाँ पर दया अबै’ए!

बेकाली प्रसंग
देहरि नाँघू
दरबज्जा छोडू
घोघ उठाउ
मिरजइ त्यागू
डेग बढ़ाउ
बाहर आउ
बजारमे आउ
अपन सभ टा सम्पन्नता नेने
अपन सभ टा विपन्नता नेने
आउ, बजारमे तँ आउ

सौदे बनि क’ आउ
सौदागर बनि क’ आउ
रंग आ रूप ल’ क’ आउ
नाज-नखरा ल’ क’ आउ
जाड़ आ गर्मी ल’ क’ आउ
खेतक माटि खरिहानक मेह
सरोवरक कमल डबराक भेंट
आम लताम हींग हरदि
गूलड़ि पाकड़ि आक-धतूर
रोग व्याधि औषध-आसव
मरनी-हरनी शौच-अशौच
जे किछु अछि सभ ल’ क’ आउ
अहाँ आउ, बजारमे आउ

हँसैत समृद्धि कनैत गरीबी
फोफनाएल दुक्ख चिक्कन सुख
उद्दण्ड मर्दानगी दमित मातृत्व
गिद्ध लालसा शिखर आडम्बर
फेनिल शिल्प अर्थहीन वाग्मिता
नष्ट विचार कुण्ठित चेतना
ध्वंस मन्दिर छर् िंआस्था
दाहक प्रेमलीला तेजाबी व्यभिचार
उपेक्षित इजोत पोषित अन्हार
एकरे बेगरता एकरे व्यापार

गीत नहि भास ल’ क’ आउ
ज्ञान नहि आखर ल’ क’ आउ
संस्कार नहि आचार ल’ क’ आउ
संसार नहि घर ल’ क’ आउ
संगी-संगतिया नहि असकर आउ
पझाएल आगि नेने
जबकल पानि नेने
लोथ पैर नेने
लुल्ह बाँहि नेने
जबिआएल मुँह खोलसाएल आँखि
बहीर कान बन्न नाक मोट चाम आ
बिन खोपड़ीक माथ ल’ क’ आउ
आउ, अहाँ बजारमे जरूर आउ



पूर्णेन्दु चैधरी
महेन्द्र
ललितेश मिश्र

जीवन संधान
हमरा लोकनिक जन्महिसँ
चतुर्दिक पसरल रहैछ
बहुतो रास बबूर आ नागफेनीक काँट
अन्हार घर आ साँपे साँप...
एहि गलीसँ ओहि कोनटा
एहि गामसँ ओहि नगर
एहि जंगलसँ ओहि नदी
ओहि उत्तान पहाड़--
अकचकाइत, समधानैत हमरा लोकनि
दौगैत रहै छी
मुदा, कतहु नहि भेटैछ कोनो रस्ता
नहि सम्भव भ’ पबैत अछि
कोनो निर्णायक अभियान-संकल्प
हमरा लोकनिसँ कहियो...
एहि ठामसँ ओत’ धरि
पसरल रहैछ
मात्रा अनिश्चितताक ख’ढ़सँ छाड़ल
एकटा अन्हार घर
नागफेकनीक दंश भरल काँट
चारू कात साँपे-साँप।
हमरा लोकनि एकटा क्रीतदास सदृश
जन्महिसँ एक गोट संकल्पहीन लड़ाइ
काँट, साँप आ अन्हार घरक विरोधमे
मोने मोन
ठनने रहि जाइ छी समग्र जीवन
मुट्ठी कसल, मुँह बन्न वला स्थितिमे
हमरा लोकनि अपन शवयात्राक
अन्तिम पड़ाव धरि
रहि जाइत छी निरुपाय ओ
अकिंचन!
कदाचिते कखनो-कहियो
कोनो मनोहारी ‘निशात’
अथवा ‘ब्रूस’क कथा
अथवा, मुक्त प्रणबद्ध जीवन यात्राक
कोनो कल्पना उपजैत अछि
हमरा लोकनिक मोन प्राणमे!

शरविद्ध हरिण जकाँ हमरा लोकनि
जन्महिसँ दौगैत रहै छी
थोड़बे टा इजोत आ थोड़बे टा आकास लेल
मुदा,
नहि भेटैछ कतहु पानि आ ठौर
ने ओहार
पसरल रहैछ मात्रा बबूरक काँट
घरक अन्हार, मोनक पियास
जीवन केर नियति-गति
आ साँपे-साँप!


विभूति आनन्द
अग्निपुष्प

लोरहाक धान
लोरहाक धानसँ
आँचर भरि अनै छलौं
लाइ, मुरही आ पान
आब उगल चान सन
एकटा पिआजु किनै छी
अपन आँखि हम
अपने हाथे मलै छी
अहाँ किऐ
बेर-बेर हँसै छी
बेर-बेर चिकरै छी

लोरहाक धान
कातिकक बाद हमर प्राण छल
हमर अस्तित्वक गुमान छल
अहाँ बेर-बेर लुझि क’
सरकार बनबै छी
आ बेर-बेर तोड़ै छी


नव बाट बनाबी
आउ, आरो लग आउ
किछु डेग संग-संग
एहि अनजान महानगरमे चली
आड़ि पर जेना
आगू-पाछू चलै’ए लोक
परछाँइ हमर सभक
टकड़ाए एहि स्याह सड़क पर
मुदा, भीतर चुपचाप बैसल मोन
बाहर निकलए
जेना नव दूभि
निकलै’ए खेतमे
आउ, आरो लग आउ
चली ओइ नुक्कड़ दिस
अस्त होइत सूर्यकें रोकि दी
अफवाहक अन्धकारकें
छाउर क’ दी
बरु एकपेड़िए सही
अइ सुनसानमे
एकटा नव बाट बना दी


तारानन्द वियोगी

हम थम्हैत छी जखन कलम
मेटा जाइए सभसँं पहिने
सभ केर सभ दुश्चिन्ता
मेटा जाइए द्वेष, क्लेश
उद्वेग हृदय केर,
मन केर चंचलता दुष्टाही
विदा होइछ पलछिनमे।

एकाकीपन किला भयावह
ढहि जाइत अछि,
टूटि-बिला जाइछ पलछिनमे
दुर्जय अहंकार केर दुर्ग

ई सभ होइए
सभटा होइए
बस पलछिनमे।

झबर-झबर क’
खूजि जाइए रिक्तताक केबाड़,
प्राणक बन्हन, गेंठ हृदय केर
खूजि जाइए
कोसी केर जनु टूटि गेल हो बान्ह

आफन तोड़ि किछु-किछु
बड़ किछु
बहुत-बहुत किछु
हमर प्राणमे आत्मामे
हमर मोन केर अकाबोनमे
आफन तोड़ि भरैए बड़ किछु--
हम थम्हैत छी जखन कलम
कलम थम्हैत अछि
जै खन हमरा।



केदार कानन

बासन
एखन तँ
पृथ्वीक गर्भमे पड़ल
मुदा सुरक्षित
माटि छी हम

कहियो कोनो कुम्हार
जतनसँ
बड्ड जतनसँ
उपारत हमरा
पृथ्वीक गर्भसँ बहार करत

ओ आकार देत हमरा
माटि-पानिकें सानि
रचत हमरा
निष्ठाक संग
विभोर होइत

रौद
ओस
आ हवाक सुखद स्पर्शसँ
सकताएब हम
आवामे तपब
कते दिन
लहलह करैत प्रचण्ड आवामे
कते दिन
तखन होएब
एकटा बासन
पनपिआइ लेल पाकत
ओहिमे रोटी
तृप्तिबोधसँ भरल छी
ओहि दिनक प्रतीक्षामे

एखन तँ
पृथ्वीक गर्भमे पड़ल
मुदा सुरक्षित
माटि छी हम।


कवितासँ बेसी आवश्यक
आरतक पात सन लाल मुँह
सुखा क’ भ’ गेलै
पानक पीयर पात सन
कते बीमार रहल
कलेसर भदोइ से
ने क्यो देखनिहार
ने क्यो सुननिहार
पीयर कपीस चेहरा नेने
ओ चुपचाप हमर
ओछाओन लग आबि क’ ठाढ़ भ’ गेल

कलेसर जे कमौने छल
अबै काल
गाड़ीमे छीनि लेलकै क्यो
मुँहमे बोल तँ रहै
मुदा नहि क’ सकल प्रतिकार
कोनो विरोध
बीसम शताब्दीक सीमान्त पर
एकटा शब्द
कतेक भारी भ’ गेलै कलेसर लेल
हम सोचैत छी

आब हम पहिल काज ई करब
जे कलेसरक इलाज कराएब
स्वास्थ्थ्य ओकरा लेल आवश्यक छै
ओकर सम्पूर्ण परिवारक
प्रतीक्षारत बेकल आँखि लेल

दोसर काज
जे हमरा क’ लेबाक अछि लगले
ओकरा ठोर पर देबाक अछि
हमरा एकटा नव शब्द
विरोध आ प्रतिकार
कवितासँ बेसी आवश्यक
एखन हमरा इएह बुझाइत अछि।

वली दकनी
जेना क्यो कुहरै’ए
राति-राति भरि
क्यो पढ़ैत रहै’ए
आदिकवि वली दकनीक शेर
रातिमे
निःशब्द रातिमे अबैए
सधल सुरमे आवाज
जेना एकदम लगीचसँ
अख्यासै छी
त’ लगैए
हमर कोनो पुरखा सुना रहल छथि
दर्दसँ भरल कोनो शे’र
जइमे भरल अछि जीवन-रस
भरल अछि उल्लास
मुदा दर्दसँ भीजल अछि स्वर
थोड़ेक उदास
थोड़ेक हताश

बना देल गेल अछि सड़क
सारा बनि गेल अछि सड़क
सड़क पर रक्तरंजित लहासक खण्ड
पड़ल अछि लावारिस
ल’ग-पास ने एकटा कुकूर
ने आकाश रोमैत गिद्ध
खाली एकटा चिड़ाइन गन्ध
ई केहन निस्तब्धता
पजरि रहल अछि आगि जकाँ
पसरि रहल अछि
एत’सँ ओत’ धरि
कोन बर्बर युगमे
सुनगि रहल छी हम सभ
हाथ मुट्ठीक रूपमे बन्हाइए
आ मुट्ठी कसल जाइत अछि निरन्तर
मुदा, अइ क्रूरता आ बर्बरताक आगाँ
तनल हमर मुट्ठी प्रतिरोध त’ करैत’ए
मुदा असहाय भ’ जाइए थोडे़क
सोझाँमे देखैत छी बुलडोजर
पेट्रोल बम
बन्दूकक लहराइत गोली आ बारूद
मुदा हम हारि नहि मानल’ए
कसले रह’ैए प्रतिरोधमे तनल मुट्ठी

कोनो बाट नहि अछि
जतए खसल नहि हो
मनुक्खक अंग
टटका रक्त-श्लथ अंग
जेना कोनो हाथ
जेना कोनो टाँग
जेना कोनो ध’ड़
जेना कोनो माथ
सभटा पूछि रहल’ए
अपन-अपन अपराध
मनुक्ख भ’ क’ अइ पृथ्वी पर
अएबाक अपन अपराध
साबरमतीक देशमे
ई केहन नग्न नृत्य क’ रहल’ए
सृष्टिक सर्वोत्तम सृजन
सुनू कबीर
सुनू रसखान
सुनू मलिक मोहम्मद जायसी
दर्दक अइ आवाजकें अंगेजू ग’र सँ सुनू
किताबक दुनियाँसँ
अक्षरक दुनियाँसँ
बहरा क’ सुनू
आततायीक स्वर-सन्धान-धिक्कार
हम सभ अहाँक केहन सन्तान!

नहि किन्नहुँ नहि चिन्ता करू
वली दकनी साहेब
अहाँ एखनो जीवित छी
हमर सभक दुनियाँमे
हमर सभक रक्तक कण-कणमे
आ जीवित रहब
हजार-हजार बर्ख धरि
दंगाई-फसादी एहिना आओत
आ मरि-खपि जाएत
जेना मरैए
असंख्य कीड़ा-मकोड़ा
चलैत मनुक्खक पैर तर पिचा कए
अहाँ मुदा रहब जीवित
युग-युग धरि
आखर-आखरक सुगन्धिमे सुवासित
तावत आमीन!
तावत अलविदा!!

समयक सम्पूर्ण धाह
चाहै छी
जीवनक उष्मासँ
लिखल जाइ कविता
हथियार हेरबाक प्रयास करैत
कतए चुकैत अछि शब्द

चाहै छी
ओरिया क’
धपचटमे नहि
अनचोक्के नहि
प्राणक अन्तस्तलसँ
बहराबए ओ शब्द

जाड़मे करु तेल जकाँ
अपन रोम-रोममे
औंसि लेबए चाहै छी कविताकें
छूटि नहि जाए जीवन-रागसँ
कविता

ओ जखन कहए
मनुक्खक बात कहए
ओकरे दुख-दर्दकें सुनए
दिशाहारा नहि भ’ जाए कविता
तें रहैत छी सदति सावधान
जे अलाइ-बलाइ नहि कहए लागए कविता

कविता
समयक सम्पूर्ण धाहकें
जीवनक सम्पूर्ण धारकें
व्यक्त करए हमर कविता

चाहै छी
जीवनक उष्मासँ
लिखल जाइ कविता
रमेश

कोसी-लोक
दाह-बोहसँ घेराएल बालुक ढिमका पर,
फेनक पाउज करैत ठाढ़ मेनियाँ महींस,
पाउजक फेनमे बालु सटल चम-चम
हरियर घासक सपनामे नोराइत आँखि।
पौस-टूना, बाछी-पाठी...बाँ-बाँ...
में...में...मंे...
ल’गेमे ठाढ़ सर्वसोख बड़दक
जमीन्दारी-हाथसँ ऐंठल गिरह वला नाँगरि,
टुकुर-टुकुर तकैत दर्जन भरि आँखि कोसीमे डूबल।
असमाहि जीवन-धारामे लुकझुक करैत।
आशक बालुक टिल्हा/लुकझुक करैत सूर्ज।
लुकझुक करैत हिरदेनरैन जादवक हृदयक धड़कन
दुःखी झा गेल छथि दवाइ आन’ महिषी।
भेलाहीवालीक आँखिमे दाह-बोह!
हा...फू...फू...फा...बुढ़िया बाढ़ि
भरिसक...आइ पानि घटत...कोसी-पेटमे।
आह! करुण-करुण महाकाव्य-कोसीक जीवन!
आह! खौंझाएल दीर्घ-काव्य कोसीक जीवन!
आह! जिदिआएल आस्था-कोसीक जीवन!
आह! ममताएलआशा-कोसीक जीवन।

नारायण जी
ज्योत्स्ना चन्द्रम

हरे कृष्ण झा
फार सँ छिटकत आब बेलीक फूल
फारसँ छिटकैत अछि
कनखा इजोतक,
भक टुटि जाइत अछि।

सोझाँमे अबैत अछि
अर्घासनक कोहा
चर्बीसँ उमसाम,
एकटा कुंजी
चकरी मारने बीचोबीच।

बामा हाथ रखै छी
हरीस पर
हरबाहक बाम हाथक संग,
दहिना हाथसँ धरै छी लागनि,
ताव लै छी
खपटी पेटसँ,
मारै छी जोर
ह’रक नास पर
ठीकोठीक कुंजीक सी’कमे।
फारसँ छिटकत आब
बेलीक फूल हरबाहक माथ पर
हट्ठासँ घुरै काल,
पिजा गेल अछि माटिक
प्राण-शक्तिसँ।


ई गसल बीट किरणक
आइ कइएक जुगक बाद
इतिहासकें भेलैक अछि सुधि
अहाँ लोकनिक
आत्मा बाटे जएबाक;
आइ कइएक जुगक बाद
कालकें धेलकैक अछि सुरता
अहाँ लोकनिक
सुधिबुधिमे पैसबाक;
आ हुमड़ि आएल अछि
प्राणशक्ति अहाँक
जे जोगाओल छल
माटिक त’ह-त’हमे,
धरतीक थाती
बनि गेल छल।

जाहि छातीमे जाँक छल
जबकल खखरीक,
ताहिमे अड़हूलक नाद
गनगनाइत अछि आब;
माथ महक अन्हरोखक कुहेस
फाटि रहल अछि आब;
आ आबि गेल अछि लालिम
इजोत ओहि आँखिमे
जाहिमे ममड़ी
पड़ि गेल छल।
आ ई समाद
जे अबैत रहैत अछि
अहाँ सभक पोर-पोरमे
माटिक अगिन-लोकसँ--
ताहि पर आफन
तोड़ैत अछि
प्राणशक्ति अहाँक
गदमीसान
करबाक लेल।

देखै छी गसल बीट
अहाँ लोकनिक बन्धु
आ लगीचेमे
देखाइत अछि
झमटगर किरण-बीट
सूर्यादय कालक:
ई धाप पर धाप
आगू बढ़बाक
घड़ी थिक, बन्धु
ई पृथ्वीक डफरा पर
कड़गर थाप देबाक
घड़ी थिक, बन्धु!!

अपराध
हमही छनै छी पेनी अपराधक
हमही करै छी हाक्रोस
एकर असार-पसार पर!
हमर एक साँझक सचारसँ
ककरो मास भरिक उपास,
कहियो ततमत नहि करैत अछि क’र
मुँहमे जाइ काल।
हमर रेशमी-ऊनी इलबासिसँ
केओ साल भरि उघार,
कनेको ठकुआइ नहि अछि हाथ
कपड़ा पहिरै काल।
हमही बुनै छी
तानी-भरनी अपराधक
हमही होइ छी उत्फाल
एकर पसरैत जाल पर!

कनोजरि
अक्षत आ फूल
बहराइत अछि वर्णमालासँ,
खलसैत अछि
कपूरक लौ भीतरमे!

इजोतक कनोजरि
फुटैत अछि
एहि मुसहर नेना सभक
आँखिमे,
फटैत अछि कुहेस!

कनेक-कनेक
कटैत अछि पाप
एकरा सभकें नित्तह
ककहरा सिखबै काल!

ओ जुबक

लपट जेना झपटि लेत
तेहेन दुपहरिया छै;
शहरक बीच सड़कक दुनू कात
लोक करमान लागल अछि।

पाँच टा सिपाही आगू
पाँच टा पाछू
बन्दूक समधानने,
बीचमे ओ जुबक
जा रहल अछि।

जुआएल गहुमन जकाँ रस्सा
बान्हल छै
ओकर डाँड़ हाथमे
गतानि क’,
महोर पाकल दाड़िम
ओकर मुँह परसँ
भखड़ि रहल छै।

जी नहि,
हमरा आँखिमे ध’न्ह
नहि लागल अछिः
दूरबीन लागल अछि,
खुर्दबीन लागल अछि।

हम देखै छी जे
एकटा अजोध जामुनक धड़
ओहि जुबकक ध’ड़मे सँ
बहरा रहल अछि;
एतेक मोटगर आ तानल
जे जुबकक देह परक रस्सा
टुकड़ी-टुकड़ी भ’ क’
भुइयाँ पर
खसि रहल अछि!

तमसगीर सब लपकि क’
आगू अबैत अछि,
आ टुकड़ी-टुकड़ी भेल रस्साकंे
लतखुर्दनि क’ क’
कुट्टी-कुट्टी क’ दैत अछि!

ढोलहो
दिआ देल गेल छलै
जे ई जुबक
खुनियाँ अपराधी थिक।

एकटा अड़हूल भरि मोन फुलाए
ताही टा लेल उताहुल
छल ई जुबक!
दसो सिपाही
बन्दूक तनने,
ओ जुबक
जहल जा रहल अछि।

जी नहि, हमर आँखि
चोन्हराएल नहि अछि;
हम साफ देखै छी
जे एक छन पहिने धरि
तमसगीर भेल लोक
सिपाही सभक पछोड़ ध’ लेलक अछि,
आ लोहक छड़क पाछाँ
जाइत मातर,
जुबक जामुक अकादारुन
गाछ भ’ गेल अछि!

जी नहि,
हमरा चकचोन्ही
नहि लागल अछिः
हम साफ-साफ देखै छी
जे पछोर धेने आएल लोक सभ
झपटल अछि चारू कातसँ,
आ दोमाएल अछि
अकादारुन गाछ जामुक।

जी नहि,
कोनो टा शक नहि,
हम साफ-साफ देखै छी
जे डगडग जामुक पथार
लागि गेल अछि जहलक
ठाम पर,
जे हजारो बच्चा किलकाबिर्त
करैत बीछि-बीछि क’
खा रहल अछि!

जी, छगुन्तामे जुनि
पड़िऔ अपने,
हमर आँखि ओतबे साफ अछि,
जते कि भोरुकबा तारा!

तुसारी
तीन टा तारा माँझ आँगनमे
लाल उज्जर पीयर,
तीन टा तारा
झरैत अछि नित्य
नीपल भुइयाँ पर
माघक भोरहरबामे
सपनाक आकाशसँ।

हमर बेटीक
अहाँक बहिनक
हुनक भतीजीक
आँगुरक टुरनीसँ,
लगजोरीक लाल उज्जर पीयर
पिठार होइत।

तुराइक ममतासँ
बाहर आबि
जाइ छथि कन्या लोकनि
अहल भोरक हेमाल सर्दमे,
पुजैत छथि गौरीकें
अपनाकें अरपि क’।
आ सूतल रहै छथि
ओ लोकनि
अपन-अपन सपनाक
धाह मे!

गहबरित भ’ क’
तीन ठोप नोरे टा
खसा जाइत अछि आँगनमे
भोरुकबा तारा,
आ नुका जाइत अछि
आकाशमे!

खड़ामसँ
जूता चप्पलसँ
लतमर्दन भेल देखि
तीनू ताराक,
उक्खाक मुँह
कहकह लाल
भ’ जाइत छनि...

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...