Monday, July 28, 2008

'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ )१. नाटकश्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’/ नो एंट्री : मा प्रविश

१. नाटक
श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-१९५१ ई. कलकत्तामे। १९६६ मे १५ वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’। १९७१ ‘अमृतस्य पुत्राः’ (कविता संकलन) आऽ ‘नायकक नाम जीवन’ (नाटक)| १९७४ मे ‘एक छल राजा’/ ’नाटकक लेल’ (नाटक)। १९७६-७७ ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। १९७८मे जनक आऽ अन्य एकांकी। १९८१ ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। १९८८ ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। १९९७-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। १९९८ ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। १९९९ ‘अश्रु ओ परिहास’। २००२ ‘खाम खेयाली’। २००६मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आऽ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। १४ टा पी.एच.डी. आऽ २९ टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आऽ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर।
नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि-अंकीय मैथिली नाटक)
नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर
(मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौन भंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।)
तेसर कल्लोल जारी....विदेहक एहि बारहम अंक १५ जून २००८ सँ।
नो एंट्री : मा प्रविश

तेसर कल्लोल पहिल खेप


तेसर कल्लोल
[भाषण - मंचपर नेता आ वामपंथी युवा पूर्ववत ठाढ़ छथि—हुनके दुनू पर प्रकाश पड़ैत छनि। बाकी मंच पर लगइत अछि एखनहु भोरूका कुहेस अछि—सब क्यो अर्ध- जाग्रत अर्ध-मृत जकाँ पड़ल छथि। मात्र चारि टा मृत सैनिक बन्दूक तानने भाषण - मंचक आस - पास पहरा दैत नजरि आबि रहल छलाह। तीनटा स्पॉट लाईट—दूटा भाषण-मंच पर आ एकटा बुलंद दरबज्जा पर पड़ल।]

वामपंथी : (क्षुरधार स्वरमे) एकटा बात साफ-साफ बाजू त’...
नेता : कोन बात ?
वामपंथी : इयैह, ई चोरबा जे किछु बाजि रहल छल...
नेता : से ?
वामपंथी : अहाँ तकर सभटा विश्वास करै छी ? (नेता हँसि दैत छथि। से देखि वामपंथी युवा खिसिया जाइत छथि।) हँसि कियै रहल छी ?
नेता : कियै ? हँसी पर पानंदी छैक की ?
वामपंथी : हँसी पर कियैक रहत पानंदी ? मुदा आर कतेको बात पर पानंदी त’ छैक.. अहाँक पार्टी तकरा मानत तखन ने ?
नेता : हमर पार्टी जकरा मानलक अछि, हमरा ताहि पर कोन आपत्ति ?
वामपंथी : (बातकेँ काटैत) झूठ ! सबटा फूसि !
नेता : से कोना ?
वामपंथी : (तर्क दैत) कियैक ? ई नञि निश्चित भेल जे हमसब बान्हल रहब एकटा बंधन मे ?
नेता : हँ, गठ-बंधन त’ भेल छल, जेना मिलल-जुलल सरकार मे
होइ छइ...?
वामपंथी : (व्यंग्य करैत) आ तकर कैकटा असूल सेहो होइत छैक....
नेता : जेना ?
वामपंथी : जेना सबटा महत्वपूर्ण बात पर आपसमे बातचीत क’ कए तखन दुनियाक सामने मुँह खोलब... की ? एहन निश्चय भेल छल वा नञि ?
नेता : हँ...!
वामपंथी : आ ताहि बातपर हमसब सरकार केँ बाहर सँ समर्थन द’ रहल छी... छै कि नञि ?
नेता : बेशक ! ठीके बात बाजि देलहुँ।
वामपंथी : मुदा अहाँ की क’ रहल छी ?
नेता : की ?
वामपंथी : (आर धीरज नञि ध’ पबैत छथि--)
तखन बात - बात पर हमरा सब सँ हँटि कए बिल्कुल आने बात कियै करै लागै छी ? सदिखन विरोध कियै करै चाहै छी ?
नेता : “वाह रे भैया ! वाह कन्हैया—
जैह कहै छी जतबे टा हो—
सब मे कहि दी ता-ता-थैया ?”
की बुझै छी , अहाँ सबक नाङरि धैने चलत हमर पार्टी ?
वामपंथी : प्रयोजन पड़त त’ सैह करै पड़त !
नेता : हँ ! से हिंछा त्यागिये दी त’ नीक ! की त’ हम सरकार केँ नैतिक समर्थन दै छी ? तकर माने की, इयैह जे अहाँ अंट - संट जैह किछु बाजब , हँ-मे-हँ कह’ पड़त ? (वामपंथी किछु कह’ चाहैत छथि) बात त’ ओ कलाकार लाख टाकाक कहि रहल छल। चोरी करैत छल तैं की ? तर्क त’ ओ ठीके देने छल...झूठ त’ नञि बाजि रहल छल ओ !
वामपंथी : तखन आर की ? चोर उचक्के केँ अपन पार्टी मे राखि लियह।
नेता : कियै ? राजनीति मे एत्तेक बड़का-बड़का चोरी क’ कए कतेको गोटे त’ प्रख्यात भैये गेल छथि। आब हुनका सभक पास हैरैबाक योग्य कतेको वस्तु हेतनि ! मुदा तकरा लेल अहाँ आ अहाँक पार्टी कियै डरै छी ?
वामपंथी : हम सब कियै डरब ? हम सब की सरकार चलबै छी जे डर हैत ?
नेता : (हँसैत) ठीके कहलहुँ ! सब सँ नीक त’ छी अहीं सब-ने कोनो काज करबाक दायित्व ने कोनो हेरैबाक दुश्चिन्ता, मात्र बीच-बीच मे हिनका सवाल पूछू त’ हुनका खेदाड़ि केँ भगाउ ! नहि त’ हमरा सभक पार्टिये केँ खबरदार करै लागै छी...... डरा धमका क’ चाहै छी बाजी मारि ली---
वामपंथी : ई त’ अहाँक सोच भेल। हम सब त’ मात्र सदर्थक आलोचना करैत छी—“कॉन्सट्रक्टिव क्रिटिसिज्म” !
नेता : आ हम सब अहाँ लोकनिक पाछाँ घुरिते फकरा कहै छी—
“वाह रे वामा बम-बम भोले !
दाहिना नञि जो बामा बोलै !
दच्छिन घुरने प्राण रहत नञि !
अंकक जोरो साथ रहत नञि !
कतय चकेवा, सामा डोलै,
“वाह रे वामा बम-बम बोलै !”
वामपंथी : (एसगरे व्यंग्य करैत थपड़ी पाड़ैत छथि) वाह ! कविता त’ नीके क’ लै छी।
नेता : हम सब छी राजनीतिक उपज, हमरा सब बुते सबटा संभव अछि.....
वामपंथी : छी त’ नेता, मुदा भ’ सकैछी....
नेता : (बात केँ जेना लोकि लैत छथि) अभिनेता सेहो !

[कहिते देरी बाहर हल्ला मचै लागैत अछि—जेना उच्च-स्वरमे फिल्मक गीत बाजि रहल हो ; तकरहि संगे तालीक गड़गड़ाहटि, सीटीक आवाज सेहो ।
हो-हल्ला होइत देरी मंचो पर सुस्तायल लोग सबटा मे जेना खलबली मचि गेल हो। सब क्यो हड़बड़ा कए उठैत एक–दोसरा सँ पूछि रहल छथि—‘की भेल, त’ की भेल ?’
तावत एकटा नमहर माला पहिरने एकटा फिल्मी हीरो प्रवेश करैत छथि। पाछाँ-पाछाँ पाँच-दसटा धीया-पुता सब ‘ऑटोग्राफ’क लेल धावित होइत छथि। दू-चारि गोटेक खाता पर गर्वक संग अपन हस्ताक्षर करैत—“बस, आब नञि, बाँकी बादमे....” कहैत अभिनेता मंचक दिसि अगुआ आबैत छथि। आँखिक करिया चश्मा खोलि हाथ मे लैत छथि। मंच परक लोक सब तालीक गड़गड़ाहटि सँ हुनकर स्वागत करैत छथि—तावत् धीया-पुता सभ धुरि जाइछ।]
अभिनेता : (भाषण-मंच पर चढ़ैत) नमस्कार बदरी बाबू, जय सियाराम !
नेता : नमस्कार ! मुदा अहाँ केँ की भेल छल जे एत’ आब’ पड़ल ?
अभिनेता : वैह... जे होइते छैक... अपन ‘स्टंट’ अपनहि क’ रहल छलहुँ मोटर साइकिल पर सवार भ’ कए ....आ कि ऐक्सिडेंट भ’ गेल... आ सोझे एत’ चल अयलहुँ...
नेता : अहो भाग्य हमरा सभक।
अभिनेता : (हाथ सँ हुनक बात केँ नकारबाक मुद्रा दैखबैत) जाय दिअ ओहि बात केँ, (वामपंथी युवा केँ देखा कए) मुदा.. हिनका नहि चिन्हलियनि।
नेता : ओ-हो ! ई छथि नवीन निश्छल ! कॉमरेड हमर सभक समर्थक थिकाह।
अभिनेता : (सलाम ठोकैत) लाल सलाम, कॉमरेड !
वामपंथी : (हाथ जोड़ि कए नमस्कार करैत छथि—ततबा प्रसन्न नहि बुझाइत छथि।) नमस्कार !
नेता : (अभिनेताक परिचय कराबैत) हिनका त’ चिन्हते हैबनि....!

[वामपंथी युवा केँ माथ हिलाबै सँ पहिनहि बाँकी जनता चीत्कार करैत कहैत अछि—“विवेक कुमार !”आ पुनः ताली बजा कए हिनक अभिनन्दन करैत अछि। आभिनेता अपनहु कखनहु झुकि कए, कखनहु आधुनिक भंगिमामे हाथ हिला कए त’ ककरहु दिसि “आदाब” करबाक अभिनय करैत छथि—हुनक हाव-भाव सँ स्पष्ट अछि जे अपन लोकप्रियताक खूब उपभोग क’ रहल छथि।]

वामपंथी : हिनका के नहि जानत ? टी.वी. केर छोट पर्दा सँ ल’ कए फिल्मक पर्दा धरि ई त’ सदिखन लखा दैत छथि---
अभिनेता : (एकाधिक अर्थमे) छी त’ हम सबटा पर्दा पर, मुदा पर्दाफाश करबा आ करैबा लेल नञि... मात्र अभिनय करबा लेल !
वामपंथी : ‘पर्दाफाश’ कियै नञि..
अभिनेता : (वाक्य केँ पूरा नहि करै दैत छथि) हम तँ मात्र सैह बाजै छी जे बात आने क्यो गढ़ैत अछि....
नेता : ठीक ! पर्दाफाश त’ ओ करत जकरा सदिखन किछु नव कहबाक आ नव खबरि बेचबाक ‘टेनशन’ रहल हो ! (‘हेडलाइन’ दैखैबाक लेल दुनू हाथ केँ पसारि कए-) ‘ब्रेकिंग न्यूज’ नवका खबरि, टटका खबरि, हेडलाइन !
अभिनेता : औ बाबू—हम ने नव बात कहै छी आ ने कहि सकै छी... हमर डोरि त’ कथाकार आ निर्देशकक हाथ मे रहैत अछि... ओ कहैत छथि ‘राम कहू’ त’ ‘राम’ कहै छी, कहै छथि ‘नमाज़’ पढ़ू त’ सैह करै छी।
अनुचर 1 : कहल जाइ छनि, बाम दिसि घुरू आ खूब नारा लगाउ....
अनुचर 2 : त’ शोर कर’ लागैत छथि “मानछी ना” “मानबो ना” !
अनुचर 1 : मानब नञि, जानब नञि...
तोरा आर केँ गुदानब नञि...
अनुचर 2 : हम जे चाही मानै पड़त,
नञि त’ राज गमाबै पड़त !
(नेता आ दुनू अनुचर हँसि दैत छथि। अभिनेता सेहो कौतुकक बोध करै छथि)
वामपंथी : (व्यंग्य करैत) माने ई बुझी जे अहाँ जे किछु करै छी, सबटा घीसल-पीटल पुरनके कथा पर....?
अभिनेता : घीसल हो वा पीटल, तकर दायित्व हमर थिक थोड़बे ?
वामपंथी : त’ ककर थिक ?
अभिनेता : तकर सभक दायित्व छनि आन-आन लोकक... हमर काज मे बाँकी सबटा त’ पुराने होइ छइ...कहियहु- कखनहु ‘डायलॉग’ आ गीतक बोल सेहो ...मुदा किछु रहिते छइ नव, नञि त’ तकरा पब्लिक कियै लेत ? (एतबा सुनतहि चोर उठि कए ठाढ़ होइत अछि)
चोर : अरे, इहो त’ हमरहि बात दोहरा रहल छथि...जे...
अनुचर 1 : नव नञि, किछु नञि, किछु नव नञि...
अनुचर 2 : बात पुराने, नव परिचय...
अनुचर 1 : सौ मे आधा जानले बात...
अनुचर 2 : बाँकी सेहो छइहे साथ !
चोर : (दुनूक कविता गढ़बाक प्रयास केँ अस्वीकार करैत आ अपन तर्क केँ आगाँ बढ़बैत) नञि, नञि हम ‘मज़ाक’ नहि करै चाहै छी...इयैह त’ हमहूँ कहै चाहै छलहुँ जे संसार मे सबतरि पुराने बात पसरल अछि...नव किछु होइ छइ... मुदा कहियहु - कखनहु...
बाजारी : (गला खखारि कए...एतबा काल, जागि जैबाक बादो मात्र श्रोताक भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छलाह) हँ-हँ, आब मानि लेलियह तोहर बात नव- पुरान दय... मुदा कहै छह ‘संसार’ सँ बाहर निकलू तखन नव-पुरानक सबटा हिसाब बदलि जाइ छइ ?
चोर : हमरा सन चोर की जानत आन ठामक खबरि ?
अनुचर 1 : ठीक !
अनुचर 2 : चोर की जानत स्वर्गक महिमा ?
चोर : जतय हम सब एखन छी, भ’ सकैछ एतहुका नियम किछु आर हो...
अभिनेता : ठीक कहलह हौ ! भ’ सकैछ, एतय ने किछु नव होइ छइ, आ ने कछु पुरान !
नेता : ने क्यो दच्छिन रहि सकैछ आ ने बाम !
चोर : आ ने नेता आ अभिनेताक बीच मे कोनो फर्क रहि जाइछ...
अभिनेता : (हँसैत) ओहुना, हमरा सभक पृथ्वी पर नेता थोड़े कोनो नव बात कहै छथि... खाली हमरे सब पर दोष कियै दै जाइ छइ लोक ?
वामपंथी : आ बिनु अभिनेता भेने कि क्यो नेता बनि सकैत अछि ?
चोर : किन्नहु नञि !
नेता : ओना देखल जाय त’ दुनियाँ मे एखन ‘कॉम्पीटीशन’ बड़ बेसी छैक...सबटा अभिनेता चाहै छइ जे हमहूँ नेता बनि जाइ... हमहूँ कियै नञि देश चला सकै छी ?
चोर : खाली हमरे सभक जाति-बिरादरी छइ जे कखनहु सपनो नञि दोखि सकै छइ नेता बनबाक....चोर- उचक्का-भिखारी- रद्दीवला छी...छलहुँ आ सैह रहि जायब...
वामपंथी : मुदा अहूँ सब केँ मोसकिल होमै वला अछि....
चोर : कियै ?
वामपंथी : कियै त’ चोर नहियो नेता बनि सकय, नेता-लोकनि त’ चोरी करै मे ककरहु सँ पाछाँ नञि होइ छथि। जेम्हरे देखू... सब ठाम ‘स्कैंडल’ एक सँ बढ़ि कए एक...
नेता : (खौंझैत) मोन राखब...अहूँक पार्टीमे गुंडा-बदमाश भरल अछि....सब छटल चोर-उचक्का...(एहि बात पर चोर-उचक्का-भिख-मंगनी आदि सब हँसि दैत छथि।)
अभिनेता : (वामपंथी, नेता केँ किछ कटु शब्द बाजै लगताह से बूझि , तकरा रोकैत) औ बाबू ! हम त’ एत’ नव छी , मुदा हमरा त’ लागैये .... एत’ ने किछु ‘हम्मर’ थीक आ ने कछु अनकर तैं ने चोरीक प्रश्न उठै छइ आ ने सीना जोरीक !
चोर : ठीक...ठीक ! बिल्कुल ठीक कहलहुँ।
(अभिनेताक बात शुरू होइत देरी मंच पर एक गोट उच्च- वंशीय महिला प्रवेश करैत छथि आ अभिनेताक बाद चोर केँ उठि कए ठाढ़ भए बात करैत देखि सोझे चोरेक लग चलि आबै छथि अपन प्रश्न पूछै।)
महिला : (चोर सँ) एकटा बात कहू... एत’ स्वर्गक द्वार त’ इयैह थिक कि नहि ? (बंद दरबज्जा केँ देखा कए)
चोर : आँय !
महिला : स्वर्गक दरबज्जा.... ?
रमणी मोहन : (उत्सुकता देखबैत, उठि कए लग अबैत) हँ-हँ ! इयैह त’ भेल स्वर्गक प्रवेश द्वार !
महिला : (रमणी-मोहन दिस सप्रश्न) त’ एत’ की कोनो क्यू- ‘सिस्टम’ छइ ?
बाजारी : (उठि कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि, जेना पुन: कतार बनाबै लेल जुटि जैताह) हँ से त’ छइहे....
(क्रमश:)
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विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...