Friday, July 18, 2008

हम नहि जायब विदेश

हम नहि जायब विदेश

 

यौ  भैय्या। कनेक काकासँ भेँट नहि करा देब

काका छथि अहाँक। आभेँट करा दिअ हम

यौ। ओतँ हमरा सभकेँ चिन्हितो नहि छथि। बच्चेमे गामसँ निकलि गेलथि , से घुरि कए कहाँ अएलाह

बेश। तखन चलू भेँट करबादैत छी। मुदा कोनो पैरवी आकि काज होय तँ पहिने कहि दैत छी, से ओनहि करताह

नहि। कोनो काज नहि अछि। मात्र भेँट करबाक इच्छा अछि। भारत वर्षमे एतेक नाम छन्हि, सभ चिन्हैत छन्हि, मुदा नहिये हमरा सभ चिन्हैत छियन्हि , आऽ नहि वैह चिन्हैत छथि

लाल गेल छलाह दस दिन पहिने, द्विजेन्द्र जीक घर पर। जाइते देरी लालक कटाक्ष शुरू भजाइत छन्हि। गामकेँ बिसरि गेलियैक। घुरि कदेखबो नहि कएलहुँ। खोपड़ीकेँ घर तबना लैतहुँ।आजबाबो भेटन्हि, ओहिना बनल बनाओल।जे जाकय की करब। एक कट्ठाक घरारी आताहि पर कतेक बाबूक कतेक भाँय। आफेर वामपंथी विचारधाराक चिन्तन शुरू भजाइत छलन्हि। गाम अछि धनीकक लेल। यावत गामक जनसंख्या कम नहि होयत तावत धरि तँ अवश्ये। गरीबीमे लोककेँ लोक नहि बुझैत अछि क्यो। मुदा नगर मात्र दिल्ली, कलकत्ता नहि अछि। यावत मधेपुर, मधेपुरा, बनैली आझंझारपुरक विकास नहि होयत, शोषित वर्ग रहबे करत। तावत द्विजेन्द्र जीक कनियाँ चाह राखि गेलथि।

द्विजेन्द्रजी गामेमे प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि।झंझारपुरमे मिड्ल स्कूल आहाइ स्कूल पैरे जाथि। पिताजी राँचीमे ठिकेदारी करैत छलखिन्ह। माय पढ़ल-लिखल छलीह। लोक कहैत छल जे उपन्यास सेहो पढ़ैत छलीह।

दरभंगासँ सोझे प्रयाग पहुँचि गेलाह द्विजेन्द्र। पिता छलाह नबका बसातक लोक। खूब कमाथि आखूब खर्च करथि। गामसँ कोनो सरोकार नहि। कनियाँक खोजो-खबरि नहि लैत छलाह। लोक कहैत छल जे दोसर बिआह कलेने छलाह राँचीमे। लोक ईहो कहैत अछि, जे यावत गाममे छलाह ओतावतो वैह हाल छलन्हि। बेरू पहर तीन बजेसँ कनियाँ हुनका लेल भाङ पीसब प्रारम्भ कदैत छलीह। मुदा बड़का बेटाकेँ खूब मानैत छलाह। छोटका बेटा हुनके पर गेल छलन्हि। नाम छल हरेन्द्र आलोक कहैत अछि, जे पटनाक कोनो गैराजमे काज करैत रहथि। द्विजेन्द्र गुरु-गम्भीर, पढ़बामे तेज, सभ विषयमे पितासँ विपरीत। आताहि द्वारे पिता हुनकर खर्च पठेबामे कोनो विलम्ब नहि करैत छलाह। एहि पठाओल पाइसँ द्विजेन्द्र छोट भाइकेँ सेहो नुकाकेँ पाइ पठा दैत छलाह। मायक सुधि मुदा हुनको नहि रहैत छलन्हि, आकि भसकैत अछि जे ओतेक पाइ आसमय नहि रहैत होयतन्हि।

माय बेचारीकेँ क्यो कहि दएन्हि, जे बेटाकेँ फेर फर्स्ट डिवीजन भेल छन्हि, आकि पतिकेँ हाइवे केर ठेका भेटि गेल छन्हि, तँ ओतिरपित भजाइत छलीह। गाममे बटाइदार सभ जे किछु ददएन्हि ताहिसँ कोनो तरहेँ गुजर चलि जाइत छलन्हि। नील रंगक नूआ, रुबिया वाइल कहैत छल कोटाक दोकान बला सभ ओहि नूआकेँ, सेहो सस्तमे भेटि जाइत छलन्हि, ओहि कोटा बला दोकानसँ। रने-बने गाछीमे घुमय पड़ैत छलन्हि जारनिक हेतु। गाममे सभक गुजर कोहुनाकेँ भजाइत छैक ।

एम्हर ठेकेदार साहेब पैघ बेटाकेँ समय पर पाइ पठेबाक अतिरिक्त्त अपन सभ कर्त्तव्य बिसरि गेल छलाहकमाउ खाउ छल मात्र हुनकर मंत्रगाम-घरसँ कोनो मतलबे नहि

द्विजेन्द्र इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे सभक आदर्श बनि गेल छलाहइतिहास विषयक तिथि सभ हुनकर संगी बनि गेल छलविश्वविद्यालयमे सर्वप्रथम तँ अबिते रहथि, संगहि हुनकर चालि-चलन, गुरु-गम्भीर स्वभाव, परिपक्व मानसिकता एहि सभसँ सभ क्यो प्रभावित रहैत छलसंगी-साथी सेहो कम्मे छलन्हिएकटा संगी छलन्हि उपेन्द्र एकटा आलोकमहिला संगी कोनोटा नहिसभ कहितो छलीह जे द्विजेन्द्र तँ घुरि कय तकितो नहि छथि ओहिमे एकटा छलीह अरुन्धतीपढ़बामे तेज, राजनीति विज्ञानक विद्यार्थी। प्रतियोगी स्वभावक छलीहबापक दुलारू, पिताकेँ हुनका पर सेहो असीम विश्वास छलन्हिएडवान्स कहि सकैत छीद्विजेन्द्रसँ बहुत बिन्दु पर सुझावक आकांक्षी छलीहमुदा द्विजेन्द्र बाबू तँ दोसरे लोक छलाहघरक कोनो गप तँ ककरो बुझल नहि रहैकमुदा से कारण छल जे द्विजेन्द्र सभक प्रति निरपेक्ष रहैत छलाह

यौ उपेन्द्रराजनीति विज्ञानमे तँ हमरा कोनो दिक्कत नहि अछि, मुदा इतिहासमे तिथि दृष्टिकोणसँ बड्ड दिक्कतिमे पड़ि गेल छी।अरुन्धती उपेन्द्रसँ पुछलन्हि

दुनू गोटे इतिहास पर अपन- अपन दृष्टिकोण एक दोसरकेँ देबय लगलथिरासबिहारी बोस आजाद हिन्द फ्औजक स्थापना कएलन्हि सुभाष चन्द्र बोस नहि नीलक खेतीक हेतु सरखेज जे गुजरातमे छल बड्ड प्रसिद्ध छल, धोलावीर सभसँ पैघ सिन्धु घाटी आकि सरस्वती नदी सभ्यताक स्थल छल दारा शिकोहकेँ सभसँ पैघ मनसब देल गेल छल, उपेन्द्र सभ गप द्विजेन्द्रसँ पूछि कए आबथि फेर अरुन्धतीसँ वार्त्तालाप करथिएहिमे समयक हानि होइत छलसे उपेन्द्र कहलन्हि, जे किएक नहि द्विजेन्द्रकेँ सेहो अपन समूहमे शामिल कए लेल जाय

मात्र द्विजेन्द्रकेँ शामिल करूबेशी गोटेकेँ आनब तँ पढ़ाइ कम गप सरक्का बेशी होयत

उपेन्द्रक कहलासँ द्विजेन्द्र आबय लगलाह, सामूहिक अध्ययनमे

तावत एक दिन समाचार आयल जे पिताक मोन बड्ड खराब छन्हिपहुँचलाह तँ लीवर खराब होयबाक समाचार भेटलन्हिसतमायसँ सेहो भेँट भेलन्हिगाम-घर पर कोनो खबरि नहिफेर 15 दिनमे मृत्यु गेलन्हि पिताकगाम पर तखन जाकय खबरि भेलनहि तँ कोनो पता,नञ तँ कोनो फोनमाय बेचारी कनैत रहि गेलीहबेटा दाह-संस्कारक बाद सोझे प्रयाग चलि गेलाह गाम घुरियो नहि गेलाह

 

मायक खिस्सा यैह अछि, जे फेर गुम-शुम रहय लगलीहकोनो चीजक ठेकान नहि रहन्हिएक बेर तँ डिबिया सँ चारक घरमे तेहन आगि लागि गेल जे सौँसे टोल जरि गेलओहि समयमे सभकेँ चारक घर रहैकसभ घर एक दोसरसँ सटलपूरा टोल जरि गेलसभ कहय जे द्विजेन्द्रक माय उपन्यास पढ़ैत-पढ़ैत सुति गेलीह डिबियामे हाथ लागि गेलन्हिसौँसे टोल जरैत रहय, भेर भेल सूतल छलीहककरो फुरेलइ तँ हुनका उठा-पुठा बाहर कएलकबादमे हुनकर आरो अवहेलना होमय लागललोक गारि सेहो पढ़ि देने छलन्हि कताक बेर ओहिनामे एक बेर जारक झपसीमे गुजरि गेलीहद्विजेन्द्रक पता सेहो नहि छलन्हि ककरो लगघरारीक लोभमे एक गोट समाङ आगि देलकन्हि

द्विजेन्द्रक निकटता अरुन्धतीसँ बढ़य लगलन्हिउपेन्द्रकेँ अरुन्धती एक बेर कहियो देलखिन्ह जे अहाँ सीढ़ी छलहुँ हमर द्विजेन्द्रक बीचमेअरुन्धतीक माय सेहो बच्चेमे गुजरि गेल छलीहपिताक दुलरी छलीहे अरुन्धतीक कहला पर द्विजेन्द्र आबि गेलाह हुनका घर पर रहबाक लेलसंगे पढ़लन्हि, फेर दुनू गोटे प्रयाग विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर बनि गेलाहविवाह सेहो गेलन्हिमात्र मधुबनीक एक गोट पीसाकेँ बुझल छलन्हि हिनकर विवाहक बातपीसा छलाह पत्रकार मधुबनीक कोनो हॉस्पीटलमे काज केनहारि केरलक नर्स सँ ताहि जमानामे विवाह कएने छलाहघर परिवार हुनका बारि जेकाँ देने छलन्हिमुदा छलाह बड्ड नीक लोकद्विजेन्द्रकेँ वैह बेर-बखत पर कहियो काल मदति करैत छलाहमुदा विवाहमे ओहो नहि अयलाहअपन सलाहो देने छलाह एहि विवाहक विरुद्धअपन उदाहरण देलन्हि, जे कतेक दिक्कत भेलन्हि।मुदा संगमे ईहो कहलन्हि, जे अहाँकेँ तँ बाहर रहबाक अछिहम तँ मधुबनीमे रहैत छलहुँ, कहियो कनियाकेँ गामो नहि जासकलहुँ

द्विजेंन्द्रकरिसर्च पर रिसर्च प्रकाशित होइत गेलन्हि। देश-विदेशमे सेमीनार पर जाथिअरुन्धती जेना बेर पर मदति कएने छलीह, तकरा बाद द्विजेन्द्र अपना पर भरोस कएनाइ छोड़ि देने छलाहवामपंथी इतिहासकारक रूपमे छवि बनाकय मात्र इतिहास पुरातत्त्व सँ सम्पर्क बनओने छलाहसालक-साल बितैत गेलगामक लोकमे मात्र लाल छलाह जे ओहि नगरमे रहैत छलाह ताहि द्वारे कहियो काल भेँट अबैत छलखिन्हलालक गप पर अनुत्तरित जाइत छलाह द्विजेन्द्रमायक कोनो चर्चा पर नोर पीबि जाइत छलाहसोचने रहथि जे किछु बनि जयताहतँ मायकेँ संग आनि रखितथि सभ पापक पश्चाताप लितथिमुदा यावत अपन खर्चा नहि जुमन्हि तवततँ जीवित रहलीह जखन किछु बनलाह तँ तकर पहिनहि छोड़ि गेलीहकोन मुँह ककरा देखेतथि

जखन लाल पहुँचलाह हुनका लगमे बजैत जे लियह, भातिज आयल छथि भेँट करबाक हेतु, अहाँ तँ कोनो सरोकार ककरोसँ रखबे नहि कएलहुँ, तँ पहिल बेर बजलाह द्विजेन्द्र-

कोन सरोकार मायसँ पैघ छल यौ लाल, जे अहाँ कहैत छी जे हम ककरोसँ सरोकार नहि रखने छी

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...