Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ )५कथा बैसाखी-गजेन्द्र ठाकुर-

५कथा
गजेन्द्र ठाकुर-
बैसाखी
“गरमी तातिलक छुट्टीक बाद कॉलेज कहिया खुजतैक”। एकटा विद्यार्थी कॉलेजक एकटा कर्मचारीकेँ पुछने छलाह।
“हमरा कपार पर लिखल छैक आकि नोटिस बोर्ड पर जाऽ कए देखबैक”। ओल सनक बोल बाजल ओऽ कर्मचारी जकर नाम गुणदेव छल।
“ओहो गुणदेबा भयङ्करे छल। एडमिशन क्लर्क छल, ताहि द्वारे चलतीमे छल”।
“नञि यौ। चपरासी छल। एडमिशन क्लर्क तँ मुँहदुब्बर छल आऽ ताहि द्वारे सभ ओकरे एडमिशन क्लर्क बुझैत छलाह”।
रतीश आऽ फूलक बीचमे ई वार्त्तालाप चलि रहल छल। बहुत दिनका बाद दुनू गोटेकेँ एक दोसरासँ भेँट भेल छलन्हि। स्कूल आऽ कॉलेजमे संगे-संग दुनू गोटे पढ़ने छलाह। मुदा तकरा बाद सालक साल बीति गेल छल, आऽ आइ चन्द्रधारी मिथिला कॉलेजमे अपन-अपन बेटाकेँ अभियान्त्रिकीक प्रवेश परीक्षा दिअएबाक लेल दुनू गोटे आयल छलाह आकि अनायासहि एक-दोसरासँ भेँट भए गेलन्हि। दुनू गोटेक बालक परीक्षा हॉलमे रहथि से दुनू गोटेक लग गप करबाक लेल तीन घण्टा समय छलन्हि।

करची कलमसँ लिखना लिखैत-लिखैत रतीश आऽ फूल दुनू गोटेक अक्षर सुन्दर भए गेल छलन्हि। रोशनाइक गोटीकेँ गरम पानिमे दए दवातमे दए ओहिमे करची कलम डुबा कए लिखना लिखैत छलाह दुनू गोटा। अपन-अपन गामसँ केजरीबाल हाइ स्कूल पहुँचैत छ्लाह दुनू गोटे। विज्ञानक प्रायोगिक कक्षाक कॉपी रतीशक सेहो साफ आऽ स्पष्ट होइत छलन्हि, मुदा फूलक अक्षर फूल सन सुन्दर होइत छलन्हि। मैट्रिकमे रतीशकेँ प्रथम श्रेणी आयल छलन्हि मुदा पूलकेँ द्वितीय श्रेणी अएलन्हि। आ.एस.सी. केर बाद रतीशतँ इंजीनियरिङमे नाम लिखा लेलन्हि मुदा रतीश पोस्टऑफिसमे किरानीक नोकरी पकड़ि लेने छलाह। आऽ तकर बाद १८ साल धरि दुनू गोटेकेँ एक दोसरासँ भेँट नहि भेल छलन्हि। नोकरी लगलाक बाद फूलक विवाह भए गेलन्हि।
“विवाहक बाद की भेल। हम तँ विवाहोमे नहि जाऽ सकल छलहुँ। पहिने ओतेक फोन-फानक सेहो प्रचलन नहि छल। ताहि द्वारे सम्पर्क सेहो नहि रहल”।
“नोकरीक बाद छोट भाय आऽ कनियाँकेँ लए नोकरी पर कोहिमा चल गेलहुँ। छोट भाए एकटा हाथसँ लुल्ह रहथि। दोसर हाथे प्रयाससँ लिखैत छलाह। किछु दिनुका बाद विकलांगक लेल आरक्षणक अंतर्गत हुनका सेहो किरानीमे केन्द्र सरकारक अंतर्गत नोकरी लागि गेलन्हि, आऽ ओऽ पटना चलि गेलाह। हमर माएकेँ हुनकर विवाहक बड़ सौख छलन्हि। मुदा घटको आबए तखन ने। से कतेक दिनुका बाद जखन माए हमरा ओहिठाम आएल छलीह, तँ एक गोट मैथिल परिवार हमरा ओहिठाम घुमए लेल आयल रहथि। हमर मायक वयसक एक गोट महिला छलीह जे अपन पुतोहुक संग आयल छलीह। गपे-शपमे हुनका पता चलि गेलन्हि, जे एहि घरमे एकटा विकलांग सरकारी नोकरी बला विवाहयोग्य बालक छैक। से ओऽ हठात् अपन पुत्रीक विवाहक प्रस्ताव सोझाँ आनि रखलन्हि।
हमर माय बजलीह, “बहिनदाइ। अछि तँ हमर बेटा सरकारी नोकरी करैत मुदा ई पहिनहिये कहि देनाइ ठीक बुझैत छी जे बादमे अहाँ नहि कही। शील-स्वभाव सभमे कोनो कमी नहि छैक, मुदा नहि जानि किएक भगवान एक हाथसँ लुल्ह कए देलखिन्ह। गाममे लोक सभ लुल्हा-लुल्हा कहि कए सोर करैत छैक। शुरूमे तँ हमरा बरदास्त नहि होइत छल, एहि गप पर झगड़ा भए जाइत छल। मुदा बादमे हमहू ई सोचि धैर्य धए लेलहुँ जे जखन भगवाने नजरि घुमा लेलन्हि, तँ ककरा की कहबैक”।
“से तँ हमरा गप-शपमे बुझबामे आबि गेल छल। आऽ ताहि द्वारे ई कथा करबाक साहसो भेल। अहाँ सँ की कहू। हमर बेटी पेदार अछि। पैर छोट-पैघ छैक। से सौँसे तेहल्लाकेँ बुझल छैक। इलाकामे ककरो लग कथाक लेल जायब सेहो हिम्मत नहि होइत अछि। भगवान छथिन्ह, नञि नैहरे आऽ नहिये सासुरमे क्यो पेदार भेल छल। भगवान भल करथिन्ह, देखबैक हमर बुचियाक बच्चा सर्वगुण सम्पन्न होयत”।
ई गप सुनिते हमर माय तँ सन्न दए रहि गेलीह। कनेक काल धरि गुम-सुम रहलाक बाद कहलन्हि जे सोचि कए खबरि पठाएब। घरमे किछु दिन धरि एहि गप पर चरचा भेल आऽ आगाँ जाऽ कए मायक विचार भेलन्हि, जे विवाह भए जएबाक चाही। विवाहक उपरान्त कताक बेर बच्चा खराप भए जाइत छल। तीन चारि बेर एहिना भेल। हमर भाए तँ मोनकेँ बुझा लेलन्हि मुदा, भाबहु विक्षिप्त जेकाँ भए गेलीह। राति-दिन घरमे उठा-पटकक अबाज पड़ोसी सभ सुनैत छल। मुदा आस्ते-आस्ते ओहो मोनकेँ बहटारि लेलन्हि। मुदा दस बरखक बाद भगवानक कृपा जे एकटा बच्चा भेलन्हि, सभ अंग दुरुस्त। मुदा एक दिन तेल-कूर लगा कए बाहर हबामे देलखिन्ह भाबहु। भाए हमर कहबो कएलन्हि, जे बच्चाकेँ भीतर कए लिअ, मुदा होनी जे कहैत छैक। साँझसँ बच्चाकेँ हुकहुक्की लागि गेलैक। अगिला दिन भोर धरि ओऽ एहि जगकेँ छोड़ि चलि गेल। हमरो पदस्थापन ताधरि पटने भए गेल छल, आऽ सभ गोटे संगे रहैत छलहुँ। मुदा भगवानोक लीला। जखन सभ आस छोड़ि देने छल, तखन फेर एकटा बालक भेलन्हि छोट भाँयकेँ। एहि बेर हुनकर सासु सेहो बच्चाक टहल-टिकोर करबाक लेल आबि गेलखिन्ह। आब तँ बेश टल्हगर भए गेल अछि, हृष्ट-पुष्ट कोनो पैअ नहि”। फूल बजिते रहलाह।
रतीश कहलन्हि-“अहाँ परेशानीयेमे रहलहुँ एतेक दिन धरि। मुदा अहाँकेँ कैकटा बच्चा अछि, की करए जाइत छथि से नहि कहलहुँ”।
“एकेटा अछि, से परीक्षा हॉलमे छथि, कनेक कालमे देखिए लेबन्हि। मुदा अहाँ अपन बच्चाकेँ परीक्षा दिआबए किएक आयल छी। आइ.एस.सी. पास कएने छथि, बेश चेतनगर भए गेल होएताह”। फूल भाए कहलन्हि।
“मुदा अहूँ तँ आएल छी...”।
रतीश बजैत चुप भए गेलाह। कारण एक गोट बालक वैशाखी पर चलि फूलक लग आबि ठाढ़ भए गेल छल। परीक्षा खतम भए गेल छल, आऽ रतीशकेँ ई बुझबामे बाङठ नहि रहलन्हि, जे ई बालक फूलक छियन्हि। कालक विचित्र गति, भाए-भाबहु विकलांग छन्हि, मुदा तत्ता-सिहर देखेलाक बादो भगवान हृष्ट-पुष्ट नेना देलखिन्ह, आऽ फूल सन लिखनहार फूल भाइक लेल विधनाक कलम नहि चललन्हि। मुदा फूल भाए शांत-धैर्य धए बेटासँ परीक्षाक विषयमे पूछि रहल छलाह।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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