Thursday, July 17, 2008

बिसरलहुँ फेर

बिसरलहुँ फेर
खूब ठेकनेने जाइत,
जे नहि बिसरब आइ,
मुदा गप्प पर गप्प चलल,
कृत्रिमता गेल ढ़हाइत।
फेर काजक बेर मोन,
नहि पड़ल पड़ैत-पड़ैत मोन,
कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप,
आ’ तकरा बाद मसोसि कय
रहि जाइत छी गुम्म।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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