Thursday, July 17, 2008

पेटार ४

चाँगुर
शैलेन्द्र कुमार झा

मोन पड़ैए तहिया प्रायः हम एम. ए. पहिल वर्षमे रही। आमक मास रहै आ अचानक सौंसे परिवारक संग गाम जेबाक कार्यक्रम बनि गेल रहै। गाम पहुँचल रही राति क’। से, रातिमे तँ ककरोसँ भेंट हेबाक प्रश्ने नइं। मुदा प्रात भिनसरे सभसँ पहिने बिलटुए झासँ भेंट भ’ गेल। इनारक बड़का चबुतरा पर चुक्की-माली बैसल, तमाकू चूना रहल छल। जा क’ गोड़ लगबाक उपक्रम करैत कहलिऐ-गोड़ लगै छियह बिलटू झा।
पाँच सात टा तालीक कड़गर चोट तमाकू पर दैत बिलटू झा बाजल-कए दिन रहबाक विचार छौ लाल भाइ?-कहलिऐ-आब तँ आम सधाइए क’ जाएब।
-से ठीक। अइ बेर बड्ड आएल छलौ। मुदा आब तँ कलकतिया, सुकुल आ राढ़ी भेटतौ।-बिलटू झा चुटकी दैत बाजल।
-आ मालदह?
-हँ, कका तोरे सभक लेल किछु तँ बचा क’ रखने छथुन। चलबें धार कात की?-भरि तरहत्थी खुलले तमाकूक फक्का मारैत बिलटू झा पुछलक।
-चलै छी, कने लोटा ल’ ली।
-धुर बूड़ि, धारक कात जएताह लोटा ल’ क’! चल!-मुदा हम ओकर कह’ पर ध्यान नइं दैत दलाने पर राखल लोटा उठा लेलहुँ आ बिदा भेलहुँ।

समाप्तप्राय अखाढ़ मासक भयानक रौद जेना देहमे गड़ए लागल छल आ मात्रा आधा माइल कि ताहूसँ कम दूरी पार करैत-करैत हम घामे-पसीने तर भ’ गेलहुँ। धारक कातमे एकटा झमटगर गाछ तर ठाढ़ भ’ हम कहलिऐ-हौ बिलटू झा, हम एत’ छाहरिमे कने सुस्ताइ छी। तों जएबह त’ भ’ आबह।
डाँड़सँ खैनीक डिब्बा निकालि ओहिमे सँ बेस भरि चुटकी खैनी आ भरि न’ह चून तरहत्थी पर राखि बिलटू झा चुनियाबए लागल। कहलिऐ-अरे एखने तँ खेने रह’ भरि जूम, फेर?
चुनौटी डाँड़मे खोंसैत आ भरि मुँह खैनी-थूक पच्च द’ थुकड़ैत ओ हँसिते बाजल-ओ तँ बाटक जोगाड़ छलै ने, आब कने बेग’क जोगाड़ क’ दिऐ।-फटाफट पाँच-सात चाटी मारि सभ टा खैनी खुलले हाथें फाँकि लेलक आ धारक पछबरिया महार पर बेस झमटगर बँसबिट्टी दिस चल गेल।
घुरलहुँ तँ बिलटू झा कहलक-चल ने डेरा-भौजीसँ भेंट नइं करबें?
-एखन...?-हम कने संकोच करैत पुछलिऐ।
-आ धुह... रहि गेलें सभ दिन लजकोटरे! चल।-आ बाँहि पकड़ने ओ हमरा अपना डेरा नेने चल गेल। जेम्हर पहिने बड़की टा लमछर अँगना छलै से कपचि क’ बिच्चेमे सँ घेरल। बुझलहुँ, ई बिलटू झाक अपन अलग व्यवस्था। बाप आ एक मात्रा भाइ-भाउज ओहि कात-ई एहि कात।
अँगना पहुँचैत देरी बिलटू झा हाक लगौलक-हे यै! देखियौ त’ के आएल अछि?
क्यो कत्तहुसँ नइं निकलल।
-कत’ छी यै?-बिलटू झा फेर सोर केलक। मुदा कोनो संचार नइं। बिलटू झा धाप दैत कोठलीमे गेल, फेर वापस आबि कहलक-नः, नइं छथुन।
हम कहलिऐ-अरे बिलटू झा, भोरका समय छै, एम्हर-ओम्हर कतहु गेल हेथुन। हम एखन जाइ छी, दोसर बेर आएब।
बिलटू झा गुम भ’ गेल, मुदा दछिनबारि कातवला टाटक पाछाँसँ जेना बाल्टी-लोटा ओंघड़एबाक स्वर आएल। हम टाट दिस इंगित करैत बिलटू झाकेँ कहलिऐ-हे ओम्हर छथुन...।
-हँ तखन बैस...-बिलटू झा चमकि क’ बाजल।-तोरासँ त’ भेंटो नइं छनि। ओना तोहर चर्चा बराबरि होइत रहै छौ...। आ बुझलें, ओही ठाम, बियाहे बेरमे जे सासुरमे रही त’ पुछैत छलीह... जे फोटो घीचैत छल से अहाँक के?-हमहूँ सोझे कोना कहि दितियनि? उनटि पुछलियनि... अहाँ कोना देखलिऐ जे के फोटो घीचै छल?-त’ बजलीह-बाह रे, देखलिऐ कहुना। आ संगी सभ सेहो कहै छल।-तखन हम बुझा देलियनि जे ओना हम तोरा लाल भाइ कहैत छियौ, मुदा छें तों हमरासँ सत्राह दिन छोट। तैं तों देअर आ ओ भाउज।
हम ओही ठाम धापे पर राखल एकटा पिड़ही घीचि क’ पैर लटकौने बैसि रहलहुँ। बिलटू झा फेर नब जूम तैयार करैमे व्यस्त भ’ गेल। अनायासे हमर ध्यान आ दृष्टि टाटक ओहि पार, दू-चारि बेर ऊपर-नीचा होइत रस्सी आ बाँसक पनि-चपना दिस चल गेल। मुदा हम सायास अपन ध्यान ओम्हरसँ हटा क’ पुछलिऐ-बिलटू झा, तोहर दुरागमन कहिया भेलौ? बुझबो नइं केलियौ!
-बुझबही कोना? कहियो की गाम अबै छें जे बुझबही! तेसरे वर्ष भेल, आ तों पूरा दू वर्षक बाद गाम अएलेंहें। असलमे तों त’ खाली आमे खाइ लेल गाम अबै छें ने! आर गाम-समाजसँ तोरा मतलबे कोन?-बिलटू झा उपराग दैत सन बाजल।
-नइं, से बात नइं, असलमे पढ़ाइ-लिखाइ, कालेज छोड़ि क’ त’ नहिएँ आबि सकै छी ने-आ परुकाँ-बी. ए. के फाइनल परीक्षो तँ रहए। कोना अबितहुँ?
पत्नी अएलखिन तँ बिलटू झा बाजल-देखियौ त’ के आएल अछि! मड़ोत कने सरकल। फजली आमक फाँक सन आँखि, काने लगसँ हमरा देखलक। अनायास हमर दृष्टि झुकि गेल। बिलटू झा बजने जा रहल छल-अरे ई की? ई घोघ ककरासँ। ई-ई त’ देअर लागत ने। ‘लाल-भाइ’ कहैत छिऐ तें की? हमरासँ दू-चारि दिन नइं, पूरा-पूरी सत्राह दिन छोट अछि।-हम उठलहुँ आ चारि डेग आगू बढ़ि, हुनका सोझामे जाए पैर छूबाक उपक्रम कएलहुँ। मुदा ओ चमकि क’ दू डेग पाछाँ चलि गेलीह। मड़ोत हटि गेल। द्वितीयाक चन्द्र एकहि क्षणमे पूर्ण-चन्द्र बनि गेल। हमरा जेना काठ मारि देलक। ओह, की सौन्दर्य...! जेना हजार वाटक बल्ब भक्क द’ जरि उठल हो। सद्यः स्नाता, खुजल-भीजल केश, दू-चारि ठोप पानि, कान-कपोल लग टघरल सन। जेना स्वर्ण-कमल-दल पर सीत बिन्दु पारा सदृश छहकैत हो। बड़की दू टा घन-कारी आँखि, लवंगयुक्त सीटल नाक, आ कोंचियाएल सन रक्ताभ ठोर। एक क्षणसँ बेसी ओहि उत्कट सौन्दर्यकेँ देखनाइ हमरा लेल सम्भव नइं छल। हम दृष्टि झुका लेलहुँ।
बिलटू झा बाजल-हे! एकरा चाह नइं पियेबै? शहरुआ अछि ने। माथ दर्द शुरू भ’ जेतैक! हम एकरा इम्हरे घिचने चल अएलियै!
ओ किछु बजलीह नइं। धाप पर आबि खड़-पात खड़का, चूल्हि फूकि डेगचीमे पानि चढ़ा देलखिन आ चुल्हिए लग बैसि रहलीह। सुखाएल खढ़-पातक धधरामे डेगची तुरन्ते सनसना उठल। दू-टा स्टीलक गिलासमे चाह छानि, उठा क’ कोठलीमे चलि गेलीह, आ देहरि पर आबि बिलटू झाकेँ कहलखिन-हे सुनै छी भीतरे नेने अबियनु।-जेना जलतरंगमे हिलोर उठल हो।
-केहन बढ़िया त’ छी!-हम कहए चाहलहुँ। मुदा देहरि दिस नजरि पड़ैत देरी जेना अशक्क भ’ गेलहुँ। उठि क’ कोठलीमे चलि अएलहुँ। बिलटू झा बाहरे बैसल रहल। भीतर एक टा बेश चकरगर चैकी पर चद्दरिकेँ हँसोथैत बजलीह-बैसू ने।-हम बैसि रहलहुँ। गिलास सोझाँमे बढ़ा देलनि। हम ल’ लेलहुँ। एकटा गिलास अपने लेलनि।-आ बिलटू झा?-हम पुछलियनि।
-ओ पीता चाह?-चाऽऽऽहकेँ लम्बा खीचैत बजलीह-अरे हुनका तँ चाही भंगगोला। उठि क’ गेलाह-कतहु एक गोला द’ देथिन आ पड़ि रहता। अहाँ पीबू।
-बड्ड भारी अडै़ल अछि ई बिलटू झा।-मने-मन सोचलहुँ। एकसर कोठलीमे एहि अप्रतिम सौन्दर्यक संग एकान्तमे बैसल हम। क्रमहि हमरा लागल जे हम अपस्याँत भेल जा रहल छी। जल्दीसँ गिलास ठोरसँ लगौलहुँ। स्टीलक धीपल गिलास छक्क द’ लागल। चाह छलकि गेल। ओ खिलखिला क’ हँसि पड़लीह-बड़े हड़बड़ाएल छी। आस्ते-आस्ते पीबू ने। आ कि ड’र लगैऐ?
-ड’र?-हम हड़बड़ाइत बजलहुँ-ककरासँ डर लागत?
-हमरासँ...। आर ककरासँ...।-ओ उन्मुक्त बिहुँसैत बजलीह। हमरा आशा नइं छल जे एतेक जल्दी ओ हमरासँ एतेक खुलि क’ हँसी करए लगतीह। हम दृष्टि उठा हुनका दिस देखलियनि। मड़ोत हटि गेल छलनि। आँचर माथ पर अवस्से छलनि। हमरा लागल जेना शारदीय-पूर्णिमाक प्रखर चन्द्र कोनो मेघ-खण्डक सघन छाहरि त’रसँ बलात् निकलि हमर समस्त चेतनाकेँ छपने जा रहल अछि। हम जल्दी-जल्दी चाह पीबि क’ उठि गेलहुँ।
-जाइ छी...-कहि हम बाहर दिस बिदा भेलहुँ।
-फेर आएब ने? अहाँक डेरा पर तँ चाह नइं पिबै अए क्यो... साँझमे चल आएब! बुझलहुँ... ड’र नइं करब...।-कहि ओ फेर हँसए लगलीह। हम झटकैत डेगें अपना दलान पर घुरि अएलहुँ। बड़ी काल धरि चैकी पर बैसल रहलहुँ। केहन कटाक्ष! आ तरंगित हिलोर लैत हँसी। ड’र त’ ने लगैऐ?-आ संगहि केहेन आमंत्राण... फेर साँझमे चल आएब चाह पीबए, ड’र नइं करब...।
-ओह नइं जाएब, किन्नहु नइं जाएब।-मुदा ई परम बूड़ि बिलटू झा। कहू त’ हमरा ओत’ बैसा देलक आ भोरे-भोर भांगक गोला दै लेल सरकि गेल...। जूम-पर-जूम तमाकू, भांग, गाँजा पर्यन्त। नः, एकर किछु करए पड़त। मुदा की? बिलटू झा ककरो कहबाक मोजर देलकै जे आब हमर सुनत! मुदा हम तँ ओहि समाजक नइं, जे ओकरा सभ दिन दुरदुरएबे केलकै-अभिशप्त आ अलच्छ बना देलकै। ओ कि सुनत? तैयो जे होइ, कहबै अबस्से... आ दबाड़ि क’ कहबै...। मुदा ओकरा ओत’ जाएब नइं... किन्नहु नइं।
ओही दिन साँझमे आमक गाछी गेल रही। साँझ झलफला क’ आमक गाछी पर उतरि गेल छलै। गाम-घरमे हमरा अन्हारसँ बड्ड डर लगैत अछि। टार्चो नइं छल। से वापस घुरए लगलहुँ। पण्डित जीक दलानक आगूसँ निकलिए रहल छलहुँ कि कानमे बिलटू झाक स्वर पड़ल-अरे लाल भाइ... कत’सँ...-देखलहुँ बिलटू झा चुटकी मारैत एम्हरे आबि रहल छल। झलफल अन्हारोमे स्पष्ट छल जे ओ पूरा तरंगमे अछि। पैर लटपटाइत सन। गामक छौंड़ा सभहिक फकड़ा सत्य लागल-सूर्य अस्त, बिलटू झा मदमस्त।
ल’ग आबि बिलटू झा बाट छेकि ठाढ़ भ’ गेल। एकाध मिनट धरि सोझाँमे आगू-पाछू झुलैत रहल। फेर तमाकूक फक्का मारि ऊपरसँ नीचा खुजल तरहत्थीसँ हवा कटैत पुछलक-चाह पीलें?
कहलिऐ-हँ, कने चल गेल रही हाट दिस।
-नः!-ओ हमरा डपटैत सन बाजल-झूठ बजै छें तों, झूठ बजै छें लाल भाइ!
ओकर खैनी भरल ठोर तरसँ थूकक फुरहरी हमरा चेहरा पर सहस्र सुइ जकाँ गँथि गेल। एक मोन तँ भेल जे... मुदा, अपनाकेँ संयत क’ आगू बढ़ि गेलहुँ। ओहो लटपटाइत डेगें संग लागि गेल। अपना डेरावला मोड़ पर घूमए लगलहुँ तँ डेन पकड़ि लेलक। अपना दिस घीचैत बाजल-ओम्हर कत’...? चल हमरा डेरा।
-आब एखन नइं काल्हि अएबो...-हम कहलिऐ।
-नः, बिलटू झा फेर थूकक फुरहुरा छोड़ैत बाजल-एखन... एक्खन... चाह पीबए लेल... एखने चल, तोरा चलए पड़तौ।
-पीलहुँ त’ चाह हाट पर...-हम प्रतिवाद कएलहुँ।-से नइं हेतौ। हमरा अँगनामे पुछलक जे चाह पीबए किऐ ने गेलैं? से नइं हेतौ। तोरा जाए पड़तौ। चल। आ बिलटू झा हमर बाँहि पकड़ि अपना दिस घीच’ लागल। ओकर मातंगी प्रभावें बेसम्हार असक्क हाथकेँ हम एक्के क्षणमे झमारि क’ हटा सकैत छलहुँ, मुदा हठात् मोन पड़ल नारंगीक फाँक सन कोचियाएल ठोरक उपहास आ फजली आमक साबुत फाड़ा सन आँखिक कटाक्ष-ड’र त’ ने होएत?
हाथ झटकैत हम बजलहुँ-छोड़ चलैत छियौ। बीसे-पच्चीस डेग पर ओकर आँगन रहै। फड़किए लगसँ देखलहुँ ओ देहरि लग ठाढ़ि छलीह। बिलटू झा फेर डिकड़ल-ऐ... देखलही, पकड़ि क’ अनलिऐ किने? तों कहैत छलें हें जे हमर बात नइं मानत। अरे हमर बात कोना नइं मानत लाल भाइ...। हम सत्राह दिन जेठ छी एकरासँ-आ ई तँ राँची रहै अए-बड़का काॅलेजमे पढ़ै अए। आ हमर बात नइं मानत? जरूर मानत।-ओ फेर हमर बाँहि पकड़ि दलान पर चढ़ैत पुछलक-बाज त’ लाल भाइ; हमर बात तों मानबें ने? बाज ने!
हम ओकर दुनू बाँहि पकड़ने ओकरा नेने सोझे कोठलीमे गेलहुँ आ ओकरा बिछाओन पर गुड़का देलियै। ओ दू-तीन बेर एम्हर-ओम्हर गुड़कुनिया मारलक। विकृत सन मुँह बना क’ उठए चाहलक-किछु अनर्गल सन प्रलाप केलक-फेर क्रमहि शिथिल पड़ि गेल। घूमि क’ देखलहँु ओ ताबत धरि केबाड़े लग ठाढ़ि छलीह। किछु क्षण एकदम गाढ़ निस्तब्धता पसरल रहल आ आस्ते-आस्ते हमरा फेर लागल जेना भीतर किछु सनसना सन रहल अछि। हम फेर अपस्याँत सन भेल जा रहल छी। मुदा सरिपहुँ रक्षा भेल। ओ पूछि रहल छलीह-चाह पीबए लेल किऐ ने अएलहुँ?-हम कने धखाइत सन कहलिअनि-ओहिना, कोनो खास बात नइं, ध्यानेमे नइं रहल।
-मुदा चाह पीब’ हाट पर गेल रही से भेल!-ओ उपराग दैत सन बजलीह।
-अरे अहाँकेँ के कहलक?
-अहीं तँ कहलहुँ लाल बाबू...
-हम...?
-हँ... अहीं त’...
-मुदा हम त’... अहाँकेँ किछु ने कहलहुँ?-हम अकचका क’ पुछलियनि।
-अरे मोड़ पर हिनका अहाँ नइं कहै छलियनि जे हाटे पर चाह पीबि अएलहुँ? सएह सुनलहुँ-आर की! देहरिए पर त’ रही ठाढ़ि हम।-ई कहि ओ खिलखिला क’ हँसि पड़लीह। हम संत्रास्त भ’ गेलहुँ। ढरैत साँझ, ढिबरीक मन्द प्रकाश, छोट-छीन कोठली, संक्रामक-सौन्दर्यक सान्निध्य। आ चैकी पर पड़ल मदमत्त बिलटू झा। हमरा लागल जे हम संक्रमित भेल जा रहल छी। कने सकुचाइत सन बिलटू झा दिस देखा क’ कहलियनि-एकरा कने सोझ क’ दियौ। हम जाइ छी।
-अरे छोड़ ू। हिनका सोझ कएनाइ ककरो बुते सम्भव नइं छै। ओहिना पड़ल रहताह। कखनो निन्न टुटतनि त’ फेर एक चिलम सोंटि औताह कि एक गोला गीड़ि लेताह। नइं हेतनि, तँ बिन पिसने-घोटने फाँकि लेताह, आ जँ सेहो नइं त’ बाड़ी जा क’ काँचे-पात सिसोहि क’ चिबा औताह। हिनका के सोझ करत?
हम स्तब्ध भेल सुनैत रहलहुँ। बूझल तँ छलैहे जे बिलटू झा... मुदा एना भ’ क’!
टोकलियनि-अहाँ बुझबै नइं छियनि?
-के... हम...?
लागल जेना समस्त पीड़ा आ लोहछल आक्रोश एक्के टा दीर्घ उच्छ्वास बनि गेल। बड़ी काल धरि गुम्मे रहलीह, फेर बजलीह...-हम बुझेबनि लाल बाबू? हम आ हमर कम्र्म। कोना कही, की जानि बाबू बियाह करा देलनि। आ हुनको की दोष देबनि? लिखलाहा सएह। शुरूमे त’ किछु ज्ञान नइं छल लाल बाबू। जखनसँ बूझ’ लगलिऐ तखनेसँ कोशिश करए लगलहुँ। मुदा हिनका बुझबै लए कहै छी? कत्ते बुझौलिअनि, निहोरा-बिनती कएलहुँ, रुसलहुँ, मान कएलहुँ, भूखें-पियासें कए-कए दिन पड़ल रहलहुँ, कत्ते कबुला-पाती कएलहुँ कोनो असरि नइं। तामसें आओर खा-पीबि लेताह-आ बो-बो करैत कत्तहु ओंघड़ाएल पड़ल रहताह। कए बेर त’... कए बेर त’... बजैत-बजैत ओ हठात् चुप भ’ गेलीह। हमहूँ चुप्पे रहलहुँ। किछु बजबा लेल छलो कहाँ? बड़ी काल धरि ओहि चैकी लग ठाढ़ रहलहुँ। ओहो गरदनि झुकौने देहरिए लग ठाढ़ि रहलीह। मन्द प्रकाशमे लागल जेना आँचरक कोरसँ नोर पोछबाक उपक्रम कएने होथि। हम कने सम्हरि क’ कहलियनि-अच्छा अहाँ चिन्ता जुनि करू। काल्हिए हम एकरा बुझबै छी। ई बुझलक अछि की अपनाकेँ? मानत नइं कोना? देखै छिऐ कोना ने मानैए?-मुदा हमरा अपनो लागल जे ई व्यर्थ आ निष्फल आश्वासन अछि। देखलहुँ ओ नहुँ-नहुँ नकारात्मक भावें गरदनि डोला रहल छलीह।-बुझबियनु अहूँ। बुझा क’ देखि लियनु लाल बाबू! हम तँ आब सन्तोष क’ नेने छी-एकदम सन्तोष... सब तरहें। नइं त’ चारि-पाँच वर्ष त’ बियाहोकेँ भेल... मुदा एखन धरि... भरि दिन अँगनामे एकसरि पड़ल-पड़ल...। खैर छोड़ ू।
-सत्ते त’-हमरा आब ध्यान गेल-बिलटू झाक बियाहक पाँचम वर्ष, आ ...एखन धरि ओहिना। गाम-घरमे त’।-बिलटू झाक प्रति मोन क्रोध आ ग्लानिसँ लोहछि गेल। निश्चय कएलहुँ जे काल्हि ओकरा कोनो टा दशा बाँकी नइं रखबै। आ तेजीसँ देहरि टपि गेलहुँ।
-लाल बाबू!-पाछाँसँ स्वरपाश जेना हमर पैर छानि लेलक। घुरलहँु नइं-ठमकि गेलहुँ।
-चाह पीबि लिअ’-तखन जाएब!
हम अवज्ञा करबामे असमर्थ छलहँु। ओही ठाम धाप पर पिड़ही ल’ बैस गेलहुँ। चाह बनि गेल। एक्के गिलास, अपना ले नइं बनौलनि। एहि बेर हम साकांक्ष रही। ठोर नइं पाकल। चाह खतम भेल। उठ’ लगलहुँ त’ आँचरसँ दू-टूक सुपारी निकालि क’ देलनि आ बजलीह-एक टा बात पूछू लाल बाबू?-हम गुम रहलहुँ। ओ कहैत गेलीह-अहाँ त’ बड़का काॅलेजमे पढ़ै छी। सुनलहुँ जे छौंड़ा, छौंड़ी, सब पढ़ै छै। अहाँकेँ त’ कतेक छौंड़ियो सभ संगी होएत!
हम बुझि नइं सकलहुँ-ई की पूछए चाहैत छथि! दृष्टि उठा क’ हुनका दिस देखलिअनि। हमर हाथसँ लेल स्टीलक गिलास हुनका हाथेमे छलनि। आँखिक दुनू कोर भीजल सन छलनि। हम धीरेसँ कहलियनि-हँ! संगी तँ बहुत रास अछि। छौंड़ियो सभ, मुदा।
-त’ अहाँ कहू त’ लाल बाबू! ओ एक डेग बढ़ि ठीक हमरा सोझाँमे एकदम ल’ग आबि गेलीह। माथ परसँ आँचर, नइं जानि कखन सरकि गेल छलनि। दुनू हाथें गिलास पकड़ने-बिन पल उठौने अत्यन्त मन्द स्वरेँ पुछलनि-अहाँ त’ बहुत नीक बेजाए देखने छी लाल बाबू। अहाँसँ पुछैत छी, हम की तेहेन नइं? हमर खाली एक टा बात ई मानि लेताह-से की हम ताहि जोगर नइं?
हुनकर स्वर भखरि गेलनि, गरदनि झुकि गेलनि। किछु सन्न द’ उठल। कोठरीमे पड़ल बिलटू झा फेर गोंगिया क’ शान्त भ’ गेल। हम उनटे पैरेँ घुरि गेलहुँ।
प्रात भेल। बिछौन छोड़ैत देरी भ’ गेल। दलान पर इनारक चबुतरा पर बिलटू झा नइं छल। धारक कात बिलटू झा नइं छल। पण्डित जीक दलान लग बिलटू झा नइं छल। खोज केलिऐ तँ कक्का कहलनि-ओ त’ भोरे चल गेल मधुबनी! आएल छल-कहलक अहाँकेँ उठबै लेल नइं। तीन-चारि दिन बाद घुरत। कोनो काज छल की?
-जी नइं ओहिना...-हम चुप भ’ गेलहुँ।
बाबूकेँ घुरबाक हड़बड़ी रहनि। हमहूँ अपन समान ठीक क’ लेलहुँ। कक्का रोकैत रहलाह, मुदा हम नइं मानलियनि। वापस जाएब। ट्यूटोरियल क्लास चलि रहल अछि। जएबे करब। कक्का हारि क’ दू टोकरी डम्हकल कलकतिया, राढ़ी ओ किछु सरदी, गाड़ीमे लदबा देलनि। भोरुकबा धरि एक्को क्षणक लेल निन्न नइं भेल छल। भरि राति सुतबाक प्रयास करैत रहलहुँ। मुदा जहाँ आँखि बन्द करी कि ढिबरीक मन्द प्रकाशमे भरल-भीजल आँखिक कोर ठीक सोझाँमे चल आबए। आ कानमे निरन्तर एक टा हताश आ डूबैत स्वर गूँजए लागए...।-हम की ताहि जोगर नइं लाल बाबू?-नारंगीक फाँक सन कोंचियाएल ठोर मोन पड़ए-हम की ताहि जोगर नइं?-नील हरियर साड़ीक मड़ोत, तारसँ हुलकी दैत द्वितीयाक चन्द्रक आभा मोन पड़ि जाए-हम की ताहि जोगर नइं?
एहि घटनाक दू-तीन वर्षक अन्तरालमे एक्को बेर गाम जएबाक संयोग नइं बनि सकल। पढ़ाइ-लिखाइ, परीक्षा, इन्टरभ्यू आ नबका नौकरी, सएह सब। मुदा बिलटू झाक मृत्युक समाचार सुनि पाँच-छओ दिनक छुट्टी ल’ परसूए गाम आबि गेलहुँ। भौजीसँ भेंट करबाक साहस नइं भ’ सकल। लोके-बेद कहलक। अभाव तँ छलैे, भांगो कतएसँ जुटितैक? से प्रायः एक राति चल गेल धारक कात। पुबरिया महार पर जे बँसबिट्टीसँ सटल भांगक अनेरुआ झाँखुर सब जनमि गेल छै, ताहीसँ सिसोहि क’ काँचे-पात खाइ लेल। आ फेर के जानए की भेलै नइं भेलै? क्यो देखलकै थोड़े। ओ त’ चरितरा-बेटा अन्हरोखे महींस ल’ क’ जाइ छल तँ महींस बिदकि गेलै। ईहो ओंघड़ा गेल। खसल थालमे। आ जे देखलक तँ चिकरैत-हाक्रोस करैत दौड़ल। लोक-बेद जुटल। ताबत कने फड़िच्छो सन भ’ गेल रहै। देखलक जे बिलटू झा धारक कातमे धुमान लग, काँकोड़ जकाँ चारू हाथें-पैरेँ भरि ठेहुन थालमे, घेघबा आ कुम्भीकेँ बकुटने, सन्हियाएल, अकड़ल मृत पड़ल छल। मुँह, कान, आँखि सभमे थाल-कादो कोंचल। बड़ मुश्किलसँ लोक ओकरा घिसिया क’ बाहर निकाललक। काँकोड़ बनल अकड़ल लहासकेँ संस्कारक जोग बनएबा लेल जखन नहा-धोआ क’ घीच-तीर क’ सोझ कएल जा रहल छलै तखन लोक देखलक जे ओकर दुनू चाँगुरमे भरि-भरि बाकुट भांगक सिसोहल डारि-पात कसले रहै। चिता पर सुतएबा लेल दुनू ठेहुन आ दुनू केहुनीक हड्डी तोड़ए पड़ल छलै। बूढ़-बाप मुखाग्नि देलखिन। चाँगुरमे बकुटल भांगक डारि-पात ओहिना रहलै-ओकरा क्यो नइं हटओलकै।

ऽऽऽ
























सरिसोमे भूत
श्याम दरिहरे

पुलिस प्रमुखकेँ बिदा भेलाक बाद सुप्रीमो दुमहला पर जएबाक लेल सुरेसार करै छलाह कि एकटा अंगरक्षक आबि क’ सैल्यूट केलकनि। सुप्रीमो गरदनिमे झुलैत चश्माकेँ आँखिमे लगौलनि आ पुछलखिन-आब की छौ?
-सर बी.टी.वी. क मालिक बड़ी कालसँ भेंट करबा लेल बैसल अछि।- अंगरक्षक अदबसँ बाजल।
-एखन हम कोनो टी. वी. बलासँ नइं भेंट करबै। कही बादमे आबै लेल। सेहो अप्वाइन्टमेंट ल’ क’।-सुप्रीमो दुमहला पर जएबा लेल सीढ़ी पर चढ़ैत बजलाह।
-सर, ओ इनटरव्यू लेबा लेल नइं, अपन फरियाद ल’ क’ आएल छथि। हुनकर भातिजक अपहरण भ’ गेल छनि।-अंगरक्षक पाछाँसँ फेर बाजल।
सुप्रीमोक डेग ठामहिं थम्हि गेलनि। मूड़ी घुमा क’ पुछलखिन-अपहरण भ’ गेल छै? भातीजक? से कोना? कहिया?
-हमरा से सब ओ नइं कहलनि।-अंगरक्षक अदबसँ फेर बाजल।
-ठीक छै ओकरा बाहर बला ड्राइंग रूममे बैसो।-हम तुरन्ते ऊपरसँ अबै छी।-ई कहैत सुप्रीमो दुमहला पर चलि गेलाह आ तुरन्ते फोन उठा क’ बहिनोइकेँ पुछलखिन-ऐं यौ! बी.टी.वी. क मालिकक भातिजक अपहरण कोना क’ लेलिऐ?
संतलाल ई सुनिते चेहा उठलाह। बजलाह-की कहै छी सर! हमरा टीमक कब्जामे त’ एकटा डाक्टर छै, जकर सूचना अपनेकेँ हम दैए देने छी। हमरा टी. वी.क मालिकक समाँगक कोनो सूचना नइं अछि। हमर टीम बिनु हमरा पुछने ककरो पर हाथ नइं दै छै सर। जरूर ई कोनो दोसर टीमक काज छी।
सुप्रीमोक आँखि लाल भ’ गेलनि। बजला-एतेक पैघ हस्तीक ऊपर हाथ देबाक ताकति त’ खाली अहींक टीममे अछि। एहन हाथ मारक लेल कोनो आन टीम अधिकृतो नइं अछि। अहाँ बी. टीम, सी. टीम, डी. टीम सबसँ सम्पर्क क’ दस मिनटमे सूचित करू जे ओ ककरा कब्जामे अछि। ताबत हम बी.टी.वी.क मालिकसँ भेंट करै छी आ डाँटि-डपटि क’ बातमे बझबै छी।
सुप्रीमो तामसें दू टाक बदला तीनटा खिल्ली पान मुँहमे गलोठि लेलनि आ भनभनाइते दुमहलासँ नीचाँ उतरए लगलाह-सार सब एतेक बड़का पाटीक फिरौती असगरे हड़पि लेब’ चाहैए। तें सूचित नइं केलक। ई बुझिते नइं अछि जे जकर बिलाड़ि तकरासँ म्याउं नइं होइ छै।
सुप्रीमो कान परसँ चश्मा उतारि क’ छाती पर लटका लेलनि। एक लोइया पीक रूमक बाहर राखल पीकदानीमे थुकरि, बाहर बला ड्राइंग रूममे प्रवेश केलनि। बी.टी.वी.क मालिक आ संग आएल समाचार सम्पादक आ वरिष्ठ फोटोग्राफर उठि क’ नमस्ते करैत ठाढ़ भ’ गेलाह। सुप्रीमोक बैसि गेलाक बाद मालिक बजला-सर हम छी बी.टी.वी.क सी. ई. ओ. सुरेश बहल...।
-ऐं, ऐं की छी, सी. ओ.?-सुप्रीमो बात कटैत पुछलखिन।
-नइं सर, सी. ई. ओ.।-सुरेश बहल फेरसँ फरिछा क’ कहलखिन।
-ई की होइ छै?-सुप्रीमो अनठा क’ बातकेँ पसारैत बजलाह।
-सर, चीफ एक्जीक्यूटिव आॅफिसर।
-ओ, जे पाकिस्तानक राष्ट्रपति अपनाकेँ कहै छै, आ एकाधटा मुख्यमंत्राी सेहो अपनाकेँ कहएबामे गौरव बुझैए।-सुप्रीमो अपन ज्ञानक पेटार उघारैत कहलखिन।
-जी सर...जी सर।-सुरेश बहल अपन बात बुझा देब’मे सफल भेलाक प्रसन्नता व्यक्त करैत बजलाह। फेर परिचय करएबाक हेतु बजला-सर, ई छथि समाचार सम्पादक मोहन भाटिया आ...।
फेर सुप्रीमो बिचहिमे बात काटि देलखिन-कि यौ भाट जी! अहाँ की सम्पादन करै छी समाचारक। हमरा राज्यक सबटा खिधांसे रहैए अहाँक समाचारमे। हमरा परिवार पर त’ अहाँक टी. वी. खास क’ कए लागल रहैए। कखनो हमरा सभक पाजिटीव साइड सेहो देखबिऔ।
-जेना सर!-भाटिया जी पुछलखिन।
-जेना की? ...ई हमरासँ की पुछै छी? अहाँ देख सकै छिऐ जे हमरा कोठीक पोखड़िमे कत्ते-कत्ते टा माछ छै...। मत्स्य पालन उद्योग अइसँ प्रोत्साहित भ’ सकैए। हमरा कोठीमे आलू-प्याज-कोबीक उत्तम किसिम उपजौल जाइए। कृषि क्षेत्रामे एहन तकलो पर नइं भेटत। डेयरीमे एक-एकटा गाय, तीस-तीस लीटर दूध दै छै। ई सब अहाँ नइं देखबै छी। खाली खिधांस करैत रहै छी।
भाटिया जी सकदम्म भ’ गेलाह। बुझेलनि जे अइ बात पर अखन बहस करब अपहृतक लेल अनिष्ठकारी भ’ सकै छै। ओ हाथ जोड़ि लेलनि-साॅरी सर। आगाँसँ खेयाल रखबै सर।
-हँ, से सब खेयाल राखक चाही। ई तेसर के छथि सी. ओ. साहेब?-सुप्रीमो पुछलखिन।
-हमर नाम अछि प्रबल मिश्र। हम बी.टी.वी.मे वरिष्ठ फोटोग्राफर छी। तेसर व्यक्ति हाथ जोड़ि अपन परिचय दैत बजला।
-ओऽऽऽ! त’ अहीं छी परबल मिश्र। अहीं ने हमर रैलीकेँ कभर करए आएल रही, त’ सातु लेल होइत मारा-मारी आ भाषण सुनबाक बदला झगड़ा करैत लोकक फोटो खिंचने रही। दोकानदार सबसँ इन्टरव्यू नेने रही, जे कोना हमर पाटीक लोक जबरदस्ती चन्दा नेने रहै। आइ की कर’ अएलहुँ अए? फेर कोनो खिधांसक फोटो ख्ंिाचब की? अहाँ सब विपक्षसँ मेल केने छी। सबटा मिडिया बला हमर गरीब गुरबाक सरकारकेँ बदनाम करबाक साजिस करै छी...।
सुप्रीमो अपन खास शैलीमे सबकेँ हड़का रहल छलाह जाहिसँ ओ सब पहिनहि ततेक सटकि जाए जे कल्ला नइं अलगै। ओम्हर सुरेश बहलकेँ कोढ़ काँपि रहल छलनि जे कहीं एहन ने होअए जे खाली हाथ घूम’ पड़ए।
सुप्रीमोक भाषण चलिए रहल छलनि-अहाँक वर्णक लोक त’ खास क’ हमरा सरकारकेँ देख’ नइं चाहै अए। मुदा फोटो देखौने नइं हैत। हमर गरीब गुरबाक सरकार चलिते रहत। आब अइ लालसामे नइं रहू जे अहाँक जातिक सरकार अइ प्रान्तमे होब’ देब। केहन केहन पण्डित हमरा दरबारमे आब भाट आ चारण बनल गुड़कै छथि आ अहाँ एकटा फोकसीन ल’ क’ बदनाम करए चलल छी...।-सुप्रीमोक ठोरसँ पानक पीक गाउज जकाँ बाहर होब’ लगलनि। एकटा अंगरक्षक दौड़ि क’ पीकदानी उठा अनलक। पीकदानी सुप्रीमोक मुँह लग ल’ गेलनि। ओ ओइमे गाउज बोकरलनि। फेर कण्ठमे पैसि गेल पानक टुकड़ीकेँ खखसि-खखसि क’ खखारक संग पीकदानीमे थुकरलनि। अंगरक्षक पीकदानी एक हाथमे लटका लेलक। दोसर हाथसँ नेपकिन बढ़ा देलकनि। ओ ठोर पर लटकि आएल लेरकेँ पोछि क’ नेपकिन अंगरक्षकक मुँह दिस उछालि देलखिन। अंगरक्षक लपकि क’ नेपकिन पकड़ि लेलक। अइ करिश्माइ वीरता पूर्ण आचरण लेल ओ तीनू आगंतुक दिस तकलक। मुदा प्रशंसा भावक बदला तीनूक मुँह पर पसरल वीभत्स आ भय रसक भाव ओ नइं पढ़ि सकल। ओइसँ ओकरा कोनो मतलबो नइं छलै। तें मन्हुआएल मोनें बाहर चलि गेल।
खखसब सुनि आ खखारक लोइया देखि सुरेश बहलक मोन हदमदाए लागल छलनि। माथ नीचाँ क’ क’ मोनकेँ सबूर करौलनि आ बजला-सर हम सब आइ इन्टरव्यू लेबाक लेल वा कोनो समाचार कवर करए नइं आएल छी।
-तखन आर कोन काज लेल आएल छी। घटकैती कर’ त’ आएल नइं हैब, किएक त’ हमर बेटा अखन बड़ छोट अछि, आ नोत हम देने नइं छी।-सुप्रीमो ठहाका मारैत बजलाह।
सुरेश बहल हुनका बातमे नुकाएल गारिकेँ मटियाबैत बजला-सर, हमर भातिजक अपहरण भ’ गेल अए। ओही लेल मदति माँग’ अएलहुँ।
-ऐं अहाँक भातिजक अपहरण भ’ गेल अए? कहिआ? कत्त’सँ? सुप्रीमो अकचकएबाक स्वाँग करैत बजलाह।
कातमे राखल पनबट्टीसँ दू खिल्ली पान मुँहमे ठेलि क’ जरदा झोंकलनि आ जाॅनसन बडसँ कान खोध’ लगलाह। बहल जी अपन बात जारी रखलनि-सर, परसू खन हमर भातिज राजधानीमे एकटा विशेष रिपोर्ट तैयार करबा लेल आएल। होटलसँ निकलिते ओकर अपहरण भ’ गेलै। प्रबल मिश्र जीक आँखिक सोझाँमे चारिटा पिस्तौलधारी छौंड़ा सब जबरदस्ती अपना कारमे बैसा क’ उड़ि गेलै।
सुप्रीमो कानक मैलकेँ एशट्रेमे झाड़ैत बजला-थानामे रपट क’ देलिऐ?
-नइं सर।
-फोटो प्रभारी मिसर जीक सामने कारमे बैसा क’ भगलै त’ ओकर नम्मर ओ देखने हेथिन।-सुप्रीमो सशंकित होइत पुछलखिन।
प्रबल मिर सत्यकेँ नुकबैत बजला-नइं सर। हड़बड़ीमे नम्बर नइं पढ़ि सकलिऐ।
सुप्रीमो निसास छोड़लनि। बहल जी सभ गोटा अइ निसाससँ कने आशान्वित भेलाह। भाटिया जी अइ बेर बजला-सर अइ प्रान्तमे अहाँक ततेक धाक अछि जे ब्यूरोक्रेट आ पुलिस प्रशासन थर-थर काँपैत रहैए। तैं हम सब सोचलहुँ जे पुलिसमे रिपोर्ट कएलासँ बेसी प्रचार हेतै, तै सँ ओकरा जान पर खतरा भ’ सकै छै आ अहाँक सरकारक नाहँसी सेहो हैत। अहाँ कने पुलिसकेँ कहि दिऔ ओ सब दविस बनौतै।
सुरेश बहल भाटिया जीक बातकेँ कटैत बजला-सर, हमरा सबकेँ अखन फिरौती लेल फोन सेहो नइं आएल अछि। जँ से आबि जाइत त’ ओम्हरे फरिया लितौं। अहाँकेँ कष्ट नइं दितौं सर!
-कष्टक बात नइं छै। आखिर ई छै त’ बड़ बेजाए बात ने, जे पत्राकारक अपहरण भ’ जाइक। ई सबटा हमरा सरकारकेँ बदनाम करबाक साजिश छै। हमरा पर भरोस राखू। तैयो ई सब बात कोनो दालि-भातक कौर त’ छै नइं जे तुरन्ते मुँहमे चलि जाएत। मोनकेँ कने थीर राख’ पड़त।-सुप्रीमो आश्वस्त केलखिन।
एकटा अंगरक्षक आबि क’ सैल्यूट केलकनि-सर मेम साहेब ऊपर बजबै छथि।
-देखै नइं छें, बात करै छी।-सुप्रीमो ललकारलखिन।
-सर मेहमानक फोन छनि।-अंगरक्षक थेथर जकाँ बाजल।
-ओ, से ने कहक चाही।-सुप्रीमो ई बजैत सीढ़ी दिस लपकलाह।
बहल जी, प्रबल मिश्र आ भाटिया जीक आँखि दिस देखलनि। प्रबल मिश्र बजला-अइ फोन सब पर सुप्रीमो अंतरंग बात नइं करै छथिन। बेड रूममे किछु फोन सब छै जै पर ओ खास बात करै छथिन।
फेर सब गोटा चुप भ’ गेलाह।
गोटेक दस मिनटक बाद सुप्रीमो फेर कक्षमे उदित भेलाह आ बजला-अखन अहाँ सब जाउ। मोन थीर क’ क’ राखू। हम प्रान्तक पुलिस प्रमुखकेँ कहि देलिअनि आ दरोगाकेँ सेहो डँटलिऐ। साँझ धरि किछु ने किछु सूचना भेटक चाही।
-हम सब फेर कखन आउ सर?-सुरेश बहल पुछलखिन।
-फोनसँ पूछि क’ आएब।-सुप्रीमो उठि क’ ठाढ़ होइत कहलखिन।
ओइ तीनू के जाइते सुप्रीमो फेर ऊपर लपकलाह। बड़का बहिनोइ आबि क’ उपरका बरण्डा पर बैसल छलखिन। सुप्रीमो डँटैत कहलखिन, फोन पर की ई बात सब कएल जाइत छै? पूरा रामायण फोन पर सुनब’ लगै छी अहाँ सब, बुझै छिऐ जे हमर दुश्मन सौंसे सह सह करैए। तैयो गेआने नइं। आब कहू की पता लागल?
-सर, हम अपना टीमक सब मेम्बरसँ पुछि लेलिऐ ओ सब सप्पत खा क’ कहलक जे एकटा डाक्टरकेँ छोड़ि क’ कोनो असामी कब्जामे नइं छै।-संतलाल सकपकाइत बजला।
-आन टीमसँ गप्प भेल?-सुप्रीमोक आँखि लाल भेल जा रहल छलनि।
-जी सर, टोटल पाँच टा असामी कब्जामे छै-दू टा बेपारी, एकटा डाक्टर, एकटा छौंड़ी आ एकटा अनजान बड़का लोक।
-ककरासँ गप्प भेलए, अनजान असामीक मादे?
-नलकट्टासँ सर!
-की कहलक ओ?-सुप्रीमो पुछलखिन।
-ओकरा पूरा पता नइं छै। मुदा एतेक अवस्से कहलक जे ओकरा ग्रुपकेँ परसू एकटा मोटगर मुर्गा हाथ लागल छै।-संतलाल सूचना देलखिन।
-बहिंचो नलकट्टा अछि कत’?-सुप्रीमो तामसें भेर भ’ गेल छलाह।
-ओकरा निजगुत पता लगा क’ अही ठाम आब’ कहने छिऐ सर!
सुप्रीमोक तामस कम नइं भेलनि। बजला-आब सार नलकट्टा करोड़पति पार्टीकेँ उठाब’ लागल अछि। आ अहाँ मुँह ताकि रहल छी। सब टीमक एरिया बाँटल छै तखन ई बी टीम बला कोना अइ असामीकेँ छुलकै। अहाँ की करै छी? जँ अहाँक पेट भरि गेल होअए त’ बाजू।
संतलाल सिटपिटा गेलाह। डरेँ बकार नइं फुटलनि।
सुप्रीमोक पत्नी आबि क’ बगलमे बैसैत पुछलखिन-की बात छै? एतेक किऐ डँटै छिअनि।
-अहाँ अपन काज देखू। सब बातमे झीक नइं दिअ’। एकटा खास बात भ’ रहल छै।-सुप्रीमोक तामस ताड़ गाछ पर छलनि।
एकटा अर्दली आबि क’ खबरि देलकनि-सर अहाँक पिसियौत नीचामे ठाढ़ छथि।
-नलकट्टा आबि गेल सर!-संतलाल खुशीसँ बजला।
-ओकर नाम नलकट्टा कहिआ पड़ि गेलै।-मेम साहब हँँसैत बजली।
एकटा पातर सन मुस्कीक रेखा सुप्रीमोक मनुहार पर पसरलनि। पत्नी दिस मुस्की पसारलाक बाद पुनः आदेश देलनि-अहाँ एत’सँ जाउ। नलकट्टाकेँ डाँटक अछि।
पत्नी उठि क’ चल गेलखिन।
नलकट्टा आबि क’ सुप्रीमोकेँ साष्टाँग प्रणाम केलक। सुप्रीमो पाथर जकाँ बैसल रहलाह।
संतलाल पुछलखिन-की पता लागल?
नलकट्टाक ठोंठमे बात फँसल रहै। ओ गों-गों करए लागल। सुप्रीमो उठि क’ एक तबराक ओकरा गाल पर देलखिन-हरामजादा, आब तों सब करोड़पति असामी धर’ लगलें हें। अथीमे दम छौ ओकरा सम्हार’क।
-सर! ओ सब धोखासँ ध’ लेलकै।-नलकट्टा गाल हँसोथैत बाजल।
-धोखासँ कोना धेलकै?-संतलाल पुछलखिन।
-सर! ओकरा सूचना रहै जे होटलमे दिल्लीक एकटा होटलक मालिक ठहरल छै। ओ बियाहमे शामिल होब’ आएल छै। अहीमे बी.टी.वी.क मालिक धरा गेलै।- नलकट्टा सफाइ दैत बाजल।
सुप्रीमो एक लात फेर जमा देलखिन ओकरा पर-आब सम्हार’ के औकादि छौ मादर...? जतबे इन्फ्रास्ट्रकचर छौ ओतबे पैर पसार।
संतलाल नलकट्टाक दिससँ बजला-सर, आब एकरा सब बुतें एतेटा मुर्गा नइं सम्हरतै। ओतेक पैघ इन्तजाम एकरा सभ लग नइं छै। एकरा कहियौ जे असामीकेँ ई सब हमरा टीम लग ट्रान्सफर क’ देत। हिस्सा-बखरामे गड़बड़ी नइं करबै।
एते सुनिते सुप्रीमो बमकि उठलखिन-कथीक हिस्सा आ कथीक बखड़ा। एहन पाटीक अपहरणसँ सरकार धरि खसि सकैए। फेर सुप्रीमो नलकट्टा दिस फीरि क’ कहलखिन-दू घण्टाक भीतर असामी संतलालक टीमकेँ ट्रान्सफर कर। नइं त’ एक-एकटाके इनकाउन्टर भ’ जेतौ।
नलकट्टा डरेँ थरथराइत बाजल-भ’ जेतै सर। हम तुरन्त जा रहल छी।
नलकट्टा आ संतलाल दुनू उठि क’ बिदा भेलाह। पाछाँसँ सुप्रीमो कहलखिन-ट्रान्सफरक सूचना भेटलाक बादे हम अगिला स्टेप लेबै से मोन राख।
नलकट्टा आ संतलालक गेलाक बाद सुप्रीमो अपनेसँ अपना डिप्लोमेसी पर प्रफुल्लित होइत हँसि पड़लाह-सार सब रंगदार बनै अए। ई चारि-पाँच करोड़क पाटी हिनका सबकेँ देबनि आ हम सभ दिन तीसे परसेन्ट पर रहू। ला सार सब अइ बेर सोलहो आना।
ओकरा सबकेँ गेला अखन आधे घण्टा भेल छलै की पाटीक दू टा सांसद आ दू टा विधायक आबि गेलखिन। सुप्रीमो भोजन करए लेल बिदा भेल छलाह। पत्नीकेँ कहलखिन-ई ससुर सब कोनो बेर कुबेर नइं बुझैए। हुलकल फिरैए। हेतै कोनो ट्रान्सफर-पोस्टिंगक पैरवी। दस मिनट ठहरू। ओकरा सबकेँ ठोंठिऔने अबै छी।
सुप्रीमो मिटिंग रूममे प्रवेश करैत पुछलखिन-आहा... हा... दशरथक चारू ई भइयाँ एक्के संग कोना आबि गेलहुँ?
-सर! बाते तेहन भ’ गेलै जे आब’ पड़ल।-एकटा विधायक बजला।
-की बात भ’ गेलै?-सुप्रीमो पुछलखिन।
-सर! पूरा राज्यमे अपहरण उद्योग बड़ बढ़ि रहल छै।-एकटा सांसद कहलखिन।
सुप्रीमो ठहक्का मारि क’ हँसैत कहलखिन-बढ़िया छै ने! विरोधी सभ कहैए जे अपन सभक सरकार कोनो उद्योग नइं लगबैए, त’ ओकरा कहिअउ जे अपहरण उद्योग त’ फरै-फुलाइ छै किने।
चारू जनप्रतिधि लोकनि हुनकर मशखरापनीक सभ दिना प्रशंसक रहल छथि। मुदा अखन मोन बिधुआएल रहि गेलनि।
फेर सुप्रीमो पुछलखिन-मोन एतेक लटकल किऐ अछि?
-सर! दू दिन पहिने हमरा मोहल्लासँ एकटा मिसर जीक बेटीकेँ एकटा रंगदार बलजोरी पकड़ि क’ ल’ गेलै आ बियाह क’ लेलकै। लड़की चिचिआइत रहलै, मुदा स्टेनगनक डरेँ केओ नइं बचैलकै।
एकटा सांसद बजलाह।
-हँ-हँ ई बात त’ हमरा काल्हिए एसपीआ कहने रहए। खोजबीन भ’ रहल छै। बियाह क’ लेलकै आ दू दिनसँ रखने छै त’ बाभनक बेटी की आब अरबा हेतै जे अहाँ सब अपस्याँत होइ छी। आब त’ ओकरा ओही दुल्हाक संग रह’ पड़तै, चाहे रंगदार हो वा अहाँ सभ सन सज्जन। बाभन सब त’ उसना छौंड़ीकेँ उगिला बना दै छै। अहाँ सब कानमे तूर ध’ क’ पड़ल रहू। दस दिन हल्ला हेतै, फेर सबटा शान्त भ’ जेतै। पब्लिककेँ अइसँ बेसी पलखति नइं छै।
-मुदा मिडिया बड़ हल्ला क’ रहल छै।-दोसर विधायक बजला।
सुप्रीमो हुनका पर गुम्हरलाह-एहन डरपोक छलहुँ त’ राजनीतिमे किऐ अएलहुँ। चमड़ा मोट करू।
-मुदा जवाब किछु ने किछु त’ देबहि पड़ै छै।-पहिल सांसद पुनः बजला।
-जवाब देब’ पड़ै छै त’ दिऔ। कहिऔ जे वीरप्पन खुलेआम अपहरण क’ रहल छै तै लेल अहाँ सबकेँ दरदे नइं। गरीब गुरबाक राजमे जहाँ एकटा अपराध भेल की सब बदनाम कर’ लागल। विरोधी सभक षड्यन्त्रा छै। अइ राज्यक जनता देखि रहल छै जे गरीब गुरबाक राजकेँ कोना ओ सब बदनाम क’ रहल छै। अइ ठामक शोषित-पीड़ित जनता एकर ओलि अइ षड्यन्त्राकारी सभसँ अवस्से लेतै।-सुप्रीमो अपना सांसदकेँ मिडियासँ लड़बाक अस्त्रा धरा क’ बिदा भेलाह भोजन करबा लेल।
सांसद सभ सेहो हुनकर आफेन्सिव राजनीतिक प्रशंसा मोने मोन करैत सन्तुष्ट भ’ क’ जएबा लेल बिदा भेलाह।
जाइत-जाइत सुप्रीमो फेर बजला-अहाँ सब मिडियासँ नइं डेराउ। हमरा पाटीक वोटर अखबार नइं पढ़ैए तैं जकरा जे लिखबाक होइ से लिखओ। ओना हम एसपीआकेँ कहि देलिऐ-ए जे साँझमे प्रेस ब्रीफींग क’ लिअ’।

साँझमे दू टा नोट कर’ बला बात भेलै। एकटा ई जे एस. पी. साहब साँझमे प्रेस ब्रीफींगमे कहलखिन-लड़कीक अपहरण नइं भेलैए। ई प्रेम प्रसंग छै।
मिडिया पुछलकनि-मुदा लड़की त’ चिचिआइत रहै आ अपराधी स्टेनगन चमकबैत दिने-देखारे ल’ गेलै। आइ दू दिन भ’ गेलै। पुलिस की क’ रहल छै?
एस. पी.क जवाब रहनि-अमेरिका सनक सुपर पावर ओतेक मेहनति केला पर जखन ओसामा बिन लादेनकेँ नइं पकड़ि सकलै त’ हम सब कोना तुरन्त अइ अपहत्र्ताकेँ पकड़ि लेबै। प्रयास भ’ रहल छै। प्रतीक्षा करू।
दोसर बात ई भेलै जे सुप्रीमोकेँ संतलालसँ सूचना भेटि गेलनि जे बी.टी.वी. बला असामी आब सुरक्षित स्थान पर आबि गेल छै। कोनो पुलिस आ मिडियाक बाप ओतए नइं पहुँच सकैए।
सुप्रीमो ई सुनिते मातर संतलालकेँ बुझबैत कहलखिन-आब अहूँ जन प्रतिनिधि छी, तैं अपने कोठीमे नइं ल’ आनब; आ हँ, फोन पर अपनेसँ गप-शप क’ लिअ’। शुरुआत सात करोड़सँ कमसँ नइं करब। अपहरण बला गाड़ी कतहु गैरेजमे नुका देबै। मिसरबा नम्मर अवस्से पढ़ने हैत।

सन्ध्याकाल सुरेश बहल असगरे फेर अइ हाइ सिक्यूरीटी जोनक सुप्रीमोक दरबारमे उपस्थित भेलाह। एकान्त भेला पर सूचना देलखिन।
-सर! थोड़ेक काल पहिने मोबाइल पर फोन आएल छल-एकटा फोन बूथसँ। अपहरणकत्र्ता सात करोड़ टाका माँगि रहल अछि।
सुप्रीमो आश्चर्य व्यक्त करैत कहलखिन-बड़ा बेहया भ’ गेल अछि ई अपराधी सब। कहू त’ सात करोड़ कतौ फिरौती रकम माँगल गेलैए। अहाँ घबराउ नइं। हम अहाँक सामने पुलिस प्रमुखकेँ बजबै छिऐ। चमरा त’ ओदारि देतै। एतेक मनबढ़ ू अपराधी। बाप रे बाप! हद भ’ गेल।
सुरेश बहल रोकैत कहलखिन-सर! पुलिसकेँ नइं कहिऔ। अपराधी जरूर हमर पाछू लागल हैत। जँ पुलिसकेँ कहबै त’ अपहृतक जान खतरामे पड़ि जेतै।
-त’ हमरासँ केहन मदति चाहै छी?-सुप्रीमो बजला। हुनका ई आशा नइं छलनि जे मिडियाक लोक तुरन्त फिरौती लेल तैयार भ’ जेतै।
-सर, सात करोड़ त’ बड़ बेसी छै। अहाँ बड़का लोक छी। कत्ते तरहक लोकसँ जान-पहचान अछि। अइ राज्यक बुट्टी-बुट्टी जनै छिऐ। ककरो थू्र बात करबा दिअ’। हम चारि करोड़ धरि द’ देबै।-सुरेश बहल कहलखिन।
-अहाँ मिडियाक लोक छी। एना नइं घबराउ। फिरौती द’ देबै त’ ओकर सभक मंसूबा आर बढ़ि जेतै। जँ अहाँ हिम्मति करी त’ हम समूचा सूबाक पुलिस ओकरा पाछू लगा देबै। हँ, तखन एहन अभियानमे कने रिस्क त’ रहिते छै। तै लेल त’ अहाँकेँ तैयार होबहि पड़त। किछु अशुभ भेला पर त’ अहीं सब हल्ला कर’ लागब।-सुप्रीमो अपन प्रशासनक क्षमता देखौलनि।
-नइं सर, हम सब कोनो हल्ला नइं करब। अहाँ निगोसिएशन करा दिअ’। वैह बड़का उपकार हैत। हम टाकाक इन्तजाम करै छी।-ई कहि सुरेश बहल बिदा भ’ गेलाह।
आगाँ कोना की निगोसिएशन भेलै आ कतेक पर बात टुटलै से त’ रहस्ये रहि गेलै मुदा तेसर दिन सुरेश बहलक भातिज सुरक्षित वापस आबि गेलखिन। ओही दिन सहारा इण्डियाक फ्लाइटसँ पूरा टीम अपन घर भागि गेल।

ऽऽऽ





अवकाश
नारायण जी

रोहिणीसँ घुरि रहल छी।
रोहिणीक सेक्टर-14 क जनयुग अपार्टमेंटमे हमर बालसखा, भागे रहै अछि। भागेसँ भेंट कर’ गेल रही।
भेंट ओकर तहिया केने रही, जहिया दिल्ली आएल रही। टेªनसँ उतरि, कतहु आन ठाम नइं जा सोझे ओकर आॅफिस गेल रही।
आॅफिसक दिन आ समय रहै। हमरा लेल सुविधाजनक छल, ओकर पत्रा द्वारा निर्देशित ओ जगह जत’ टेªनसँ उतरला पर हम झट पहुँच सकैत रही, जे ओकर आॅफिस रहै, जाहिमे कतेको बर्खसँ ओ कार्यरत रहए।
भागेसँ भंेट क’ हमरा अपना लेल एहि अनभुआर महानगरमे आर बेसी सुविधा प्राप्त करबाक छल, जे पहिल बेर दिल्ली अएला पर हमरा लेल आवश्यक छल।
हम भरि बाट जेना सोचैत आएल रही, भागे तहिना भेटल छल। मारते रास औपचारिकता पूरा करैत, जे ओ शहरसँ उचंगि नेने रहए, कोनो अवकाशक दिन, अपन आवास जे रोहिणी बनबओने रहए, पर अनिवार्य रूपसँ अएबाक आग्रह कएने रहए। रवि थिक आइ-सार्वजनिक अवकाशक दिन। से आइ हम भागेसँ भेंट कर’ रोहिणी गेल रही।
भागे फस्र्ट फ्लोर पर रहै अछि। हम सीढ़ी चढ़ि ओकर गेटक काॅलबेल बजबैत छी। मुदा, तखन जे गेट खोलैत छथि, से भागे नइं, भागेक कनियाँ रहै छथि। पहिने अकचकाइत, फेर मुस्कियाइत छथि। सोफासँ मुदा, तत्काल भागे उठि हमर हाथ पकड़ि अपना लग बैसबैत अछि।
हम भागेक कनियाँकेँ निहारैत छी। हुनकर नाक-ठोर आ उघार पीठक अव्यक्त मांसल सौन्दर्य, जे पहिनेसँ कतोक बर बेसी खुलि गेल रहै अछि, हमरा अपना आकर्षणमे बान्हि लैत अछि। मुदा, टकटकी लगाकेँ देखब अधलाह थिक, तें हम फ्रिज आ टी. वी. आ पंखा आ रंग कएल छत, जाहिमे टाइल्सक मोहक डिजाइन बनल अछि, निहारैत रहै छी।
भागे फ्लैटक सम्बन्धमे विभिन्न तरहक गप कह’ लगैत अछि। जेना, एहि अपार्टमेंटमे कतेक फ्लैट अछि? कतेक स्क्वायर फीटक छै फ्लैट सभ? तकरा सभक इंस्टाॅलमेंटक एमाउंट आ तकर पेमेंटक पीरियड की छै? आदि-आदि...।
हमरा सोझाँक देबाल पर टाँगल एकटा खूब बड़का पोटेªट देखाइत अछि। पोटेªटमे धरती सहित एक टा गाछक ध’ड़ टा छै। गाछक ध’ड़ सँ सटि चितिर-बितिर रौदमे भागे बैसल अछि। पोटेªट एतेक पैघ आ जीवन्त अछि, जे हमरा बुझाइत अछि, जे हम सभ ड्राइंग रूमक सोफा पर नइं, गाछ तर बैसल छी। वस्तुतः गाछ लगक धरतीक हम सभ कोनो हिस्सा छी।
भागेक कनियाँ एहि बीच कीचेनसँ अबैत-जाइत रहै छथि। ओ बिना कोनो कोताही कएने अपन मुस्की बिलहैत रहै छथि।
पोटेªटक जिज्ञासा कएला पर भागे बजैत अछि-जाहि ठाम ई अपार्टमेंट बनल अछि, ओतए एकटा झमटगर गाछ रहै। गाछ कटि भवन बनत, से हम ओहि गाछकेँ अपना स्मृतिमे जीवित रखबा लेल, गाछ त’र बैसि एक टा फोटो खिंचबा नेने रही।
हम भागेक गाछ-प्रेम पर चकित होइत छी। एहन रुचि ओ शहरमे विकसित क’ लेलक अछि। हम किछु बजै नइं छी। भागे आगू बजैत अछि-एही अपार्टमेंटमे मिश्राजी छथि, हुनकर जेठ बालक फाइन आर्टमे डिप्लोमा कएलक अछि। ओकर चित्राक किछु एकल प्रदर्शनी सेहो एहि शहरमे विभिन्न ठाम लगलै अछि। ओहि खिंचबाओल फोटोक आधार पर ओएह ई पोटेªट बनौलक अछि।
-बढ़िया लगैत छै।-हम उत्साहित भ’ बजैत छी।
-एहन देबाल एहि पोटेªट लेल नीक जगह थिक, से सोचि हम टाँगि देल।-बाजि भागे अपन तर्कपूर्ण कथन आ एहि प्रसंगक अन्त करैत अछि।
हमरा आश्चर्य लगैत अछि, जे मात्रा सोलह बर्खक शहरबासमे भागे कोना रुचिक संग एहन छोलल भाषा सेहो विकसित क’ लेलक अछि?
भागेक कनियाँ ताबत धरि हमरा सभ लेल दू टा प्लेटमे नोनगर बिस्कुट आ दू कप चाह अपन ओही परिचित मुस्की संग टेबुल पर द’ जाइत छथि।
हम चाहितहुँ त’ हुनकर मुस्कीक उत्तर मुस्कीसँ द’ सकैत रही। मुदा, जें कि भागेक आर्थिक स्तर शहरमे बसि गेलासँ हमरा अपनासँ ऊँच बुझाइत अछि, स्वभावतः ओकर कनियाँक सेहो, तें प्रतिदानमे हमरा द्वारा देल मुस्की हमरा अवश्य दयनीय बना देत, से सोचि हम अपन नजरि खसा लैत छी।
चाह पिबैत भागे बजैत अछि-अपन योजनाक अनुरूप नीचाँमे हम एक टा लाॅन बनबाओल अछि, जे एही टा अपार्टमेंटमे छै।
भागे एहि ठामक बहुत किछु देखएबाक अपना गतिमे आबि जाइत अछि, जाहिमे ओ स्वयं कोनो ने कोनो रूपमे उपस्थित अछि। हम ओकरा संग ओकर छाँह बनल रहै छी।
भागे नीचाँ उतरैत अछि। हम नीचाँ उतरैत छी। लाॅनमे दूभि ठीके कायदासँ कतरल अछि, नीक लगैत अछि।
तकरा बाद भागे संग हम ओहि ठामक एकटा खेल परिसरमे अबैत छी।
खेल परिसर घेरल अछि।
खेल परिसरमे बेंच सभ अछि। ओहिमे नाना प्रकारक गाछ-बिरीछ अछि।
एकटा बेंच पर बैसैत भागे बजैत अछि-गामक लोक अबैत अछि, भेंट नइं करैत अछि। एत’ नइं अबैत अछि।
-लोक काज लेल अबैत अछि, काजमे डूबल रहैत अछि, काज छोड़ि कोना आओत?-हम कहैत छिऐ।
-अबैत अछि, नौकरी लेल अबैत अछि। हम जेना रखने रहिऐ कोनो बनल-बनाएल काज आ ओहि पर बैसा दिऐ। भाइ दू-चारि दिन रह, अपन नजरि खिड़ा, काज टेब। हम आइ जे छी से कोनो राताराती थोड़े बनलहुँ अछि?-भागे हमरा दिस तकैत अपन अनुभव सुनबैत अछि।
किछु अप्रिय लगैतो हम बजैत छी-से त’ ठीके।
-एहि बेरमे आॅफिसमे डूबल रहै छी। अवकाशक दिन बिन्हैत अछि। तोहर भेंट आजुक अवकाशकेँ सार्थक बनौलक अछि।-भागे अपन देह पर गाछसँ खसल एक टा सुखाएल पातकेँ कात करैत बजैत अछि।
हम मात्रा बिहुँसैत रहै छी।
भागे हमरा गामक थिक। ओकर पिता ओकर छोट भाइक संग आब अपन मातृक नेपाल जा बसि गेल अछि।
मुदा, पित्ती-पितियाइन आ ओकरा हिस्साक कलम-गाछी, खेत-पथार, एकटा चैचाड़ा भकोभन्न घर गाममे आइयो छै। से भागे तकरा सभक हालचाल पुछैत अछि-अपना सभ जे पढ़ैत रही, से स्कूलक की हाल छै?
-छहरदेबाली सभ ढहि-ढनमना गेलै, मुदा स्कूल छै।
-आ बौआ गुरुजी? ओएह हमरा भट्ठा धरओने रहथि।
-आब आन्हर भ’ गेलाह, मुदा जीविते छथि।
-कनैलक छड़ीक मारिसँ गरहन सिखेने छथि।-भागे कहियो क’ ओहि दर्दकेँ मोन पाड़ैत बजैत अछि।
-से कनैलक गाछ आइयो ओतहि छै।
-गोनही गाछी त’ आब उपटि गेल हेतै, नइं?
-थोड़ेक गाछ कटि-सुखा गेलै अछि अवश्य, मुदा गाछी एखनो छै।
-आमक मासमे बेलहा गाछ पर गोढ़लत्ती लटका बंसमचकी झूली।-भागे बीतल जीवनमे प्रवेश करैत बजैत अछि।
-बंसमचकी आब कम लोक झूलए जाइत छै। मुदा, जे सभ झूलै छै, से आब गोढ़लत्ती नइं साइकिलक पुरना टायर लटका क’ झूलै छै।
-पुरनी पोखरि कते टा रहै, हम सभ फुचुंगामे बामी बझाबी।-भागे एक तरहें नेना बनैत बजैत अछि।
-पुरनी पोखरिमे आब रोहु-भाकुरक जीरा पोसाइत छै।
-तोरा कुसुमा गाछक लताम मोन छौ नारायणजी?
-इएह ने, जे अन्हारमे चोरा क’ तोड़बा काल तोरासँ बिढ़नीक छत्ता टूटि गेल रहौ, आ तूँ ओतहिसँ कूदि गेल रहें?
-तरिया ओलक डांट रगड़ने रहए, तैयो फूलि क’ कोइठ भ’ गेल रही।
-कतेक बरख ने भ’ गेलै, तरियाकेँ भदबारिक रातिमे साँप डँसलकै, आ ओ सूतले रहि गेल।
-गइडगराक बान्ह पर हम सभ बुढ़िया कबड्डी खेलाइत रही।-आँखि मुनि भागे बजैत अछि।
-कैक ठाम खोंड़ा भ’ गेलै। मुदा, बान्ह आइयो छै।
भागे कने काल किछु नइं बजैत अछि, आँखि मुनने रहैत अछि।
भागेकेँ चुप देखि हम आग्रहक स्वरमे कहै छिऐ-भागे सभ किछु अछि, आ तोहर बाट जोहैत अछि। किछु दिन लेल गाम चल ने?
भागे निःश्वास छोड़ैत अछि आ स्थिरसँ बजैत अछि-एहि ठाम तूँ हमर सभ किछु देखिए लेलें अछि, गाम जएबाक आब अवकाश कहाँ।
तत्काल हम उदास भ’ जाइत छी। आ उठि जाइ छी।
हमरा अपना अएबाक तात्कालिक सार्थकता-बोध त’ होइत अछि। आ अपन तात्कालिक उदास पैरेँ हम रोहिणीसँ घुरियो रहल छी।
मुदा हमरा बुझाइए, कहियो दिल्ली आएब त’ एकाध बेर आर रोहिणी आबहि पड़त। तखने अवकाश हेतै गाम जेबाक ओकरा। अवकाश पहिने मोनमे, हृदयमे होइ छै, से ओकरा नंगोटिए संगी बुझेतै कि ने?

ऽऽऽ




ढाठ
सियाराम सरस

नाम-लखन मिसर, पेसर-जग्गू मिसर, साकिन-मोहनपुर, जिला-मधुबनी, मैटरिक पास, आइए फेल... इएह छल संक्षिप्त परिचय, जे ल’ क’ लखन गामसँ चलल रहए।
अइ ठाँ कोनो तेहेन पैरबी-पेगाम तँ नहिएं रहै, तखन जे रहै से ल’ द’ क’ मामा गामक ओएह ठाकुरजी, जिनका जोड़ि-जाड़ि क’ बतर बलजोड़िए ई मामा-मामा कहैत शरणागत भेल रहए साल भरि पहिने। मामा गाममे ठाकुरजीक परिवारक खेती-पथाड़ी एकरे माम लोकनि करैत आ करबैत रहथिन। तैं नेनपनेसँ एकर अबरजात ठाकुरजीक आँगन-दलान धरि रहै।
ठाकुरजीक माइ रहथिन बड़ धर्मात्मा ठकुराइन! जँ कोनो अवसर होइन्ह पाँच टा नोतहारी खुएबाक, तँ एकरा माम लोकनिक खोज जरूर करथिन। गामक भगिनमान हेबाक कारणें सहजहिं लखनकेँ बिनु नोतोक नोत पड़ि जाइ। नेनपनमे तँ ओहुना बाप-पित्ती-नाना-बाबाक संगें लोटा ल’ क’ एकटा लुटकुन अपना ओत’ साधिकार भोजघारा जाइते अछि। इएह पुरान पृष्ठभूमि रहै ठाकुरजी आ लखन मिसरक सम्बन्धक, जे वास्तवमे, दूर-दूर धरि कोनो खास सम्बन्ध नइं रहै, सिवाए मनुष्यताक, किंवा सामाजिकताक।
अदद्दी लाट-घाटक भान नीक जकाँ छलै लखनकेँ, ओ जहिया समस्तीपुरमे पैर रखलक हुनका डेरामे, तहियेसँ एकटा व्रत निजगुत क’ लेलक-अहर्निशं सेवामहे!
ओना तँ जग्गुओ मिसर ‘सेवे’ करैत-करैत बरख तीनिएक पहिने परलोक गेलाह। जोगताक हिसाबें मामूलिए साक्षर रहथि, मुदा लूरि-मूह नीके कहबाक चाही। पण्डितक संगति आ सेवा करैत-करैत, मोटा उघैत-उघैत ओ पुरहित जरूर बनि गेल छलाह। बतर जनमघुट्टिए, लखनोकेँ घोड़ि क’ पिया देने रहथिन-नथिया तर द’ बहि गेल सरा-अभ्यासे नराः!-से, मोलबी सैहेबक ओ खिस्सा अपन पिताक मुहें कतेक बेर सुनने छल लखन, तकर गनती असम्भव छै! हँ, मुदा ओइ फकराक बीजमंत्रा टा अवस्से घोंटि गेल छल-अभ्यासे नराः! ओ अभ्यासेसँ सत्यनारायण स्वामीक कथा वट-सावित्राी, बियाह-दान आ एकोदिष्ट-पाबनि धरि रियाजि नेने छलाह। तहिना लखनो मँगनीक साइकिल, मोटर साइकिल आ बेगारी करैत ट्रैक्टर धरि हाँकब गामहिमे सीखि नेने रहए। पछाति आइए फेल क’ क’ दू बरखक बैसारीमे होमगार्डक ट्रेनी बनि गेल रहए। धनमे धन इएह ‘कठौत’ ल’ क’ ओ समस्तीपुर आएल रहए।
जग्गू मिसर अपन दिन कहुना कटलनि, तीन-तीन टा बेटीक कनेदान कहुना कइए लेलनि। माँगियो-चाँगियो क’, किताब-पिनसिनक बेवस्था क’ क’, मास्टर लोकनिक पैर-दाढ़ी ध’ क’, कहुना लखनोकेँ आइए धरि पहुँचाइए देलखिन। पैर तरक धरती कतबो सलसलाह किएक न रहल होइ, हजार टाका बेवस्था गना क’ जग्गू मिसर एकरो बिरबा देलनि भसाए!
मुदा जग्गू बाबूक परोक्ष भेलाक बाद, लखनकेँ अपन लक्षण-क्रम बदलब अनिवार्य भ’ गेलै, किएक तँ माइक रुग्नता, पत्नी-विमलाक सौख-सेहन्ता आ सोन सन-सन दुनू इसकूलिया बच्चाक बेगरताकेँ अनठाएब आब किन्नहुँ सम्भव नइं छलै।
पुरहिताइक मोटरी-चोटरी बन्न भ’ गेल रहै। दानमे भेटल सड़लाही गाय आब ठाँठ-बहिला भ’ गेल रहैक, आ पुबारि बाधक उसरगा तीनकठबा आ पछबारि बाधक चारिकठबा सेहो भरना लागि गेल रहै, तखन नोन-रोटीक जोगाड़ आब सहजहिं लखने आ खास लखने मिसरक दायित्व बनि गेल रहै। ओना तँ गाममे कैक गोटे अनेरोक शुभचिन्तक बनैत रंग-बिरंगक सलाह देने रहै। मुदा सए बातक एक बात-जे लखनकेँ अपन बपौती धंधामे कोनो टा रुचि नइं रहै। पूजा-पाठ क’ सकैत छल, कराइयो सकैत छल, कदाचित अपन पितासँ नीके, मुदा उसरगा मोटरी-पोटरी ने ओकरा बन्हैत नीक लगै, ने ओकर पत्नी-विमलाकेँ से खोलैत नीक लगै। दम्माक बेमारी बाली माइ सदिखन खों-खों करैत टुकुर-टुकुर अपन बेटा-पुतोहुकेँ निरीह भावें तकैत रहै छलै।
से, एहने परिस्थितिमे, होमगार्डवला बरदीसँ अपन फटलाहा गंजी आ मसकलहा अण्डरपेंटकेँ झँपने, घसलाहा चप्पलकेँ घिसियाबैत, लखन मिसर पहुँचैत भेल-समस्तीपुर, ठाकुर मामा लग।
मामा पुलिसक उच्चाधिकारी, सभ्य रहथिन, बोल-वचन बिगड़ल नइं रहनि। खान-पीन आ चालि-प्रकृति बहसल नइं रहनि। तैं ओ कतौ बेसी दिन टिकै नइं छलाह। ने नीच्चाँक सिपाही, जमेदार, दरोगाकेँ अरघैत छलखिन, ने उपरका आइजी, डीआइजीकेँ पचैत छलखिन। ने एक कप चाह पीब ने पीबए देब। ने एक खिल्ली पान ककरो खाएब, ने खाए देब। बेसी काल आ बेसी ठाम, ने कलक्टरसँ पटनि न एमेले-एमपीसँ। एकटा बागड़े एसपी रहथि-ठाकुरजी!
लखन हाथक झरपटहा बेग बरंदाक एक कोन पर रखलक आ हुनका पैर पर मूड़ी टेकि देलक। ओ ठामहिं झुकैत, लखनकेँ उठबैत, अपना छातीमे सटा लेलखिन।
भीतरीसँ मामियोंकेँ बहराइत देखि लखन लपकि क’ हुनको पैर छूलक। ओ एक रती थकमकेलखिन आ ठाकुरजी दिस तकलखिन। ठाकुरजी तुरन्ते शंकाक समाधान केलखिन-नइं चिन्हलियनि? अपने गामक रामजी भाइक मोहनपुरवला भागिन। अएँ हौ, नाँ की थिकह? बिसरि गेलियह?
-लखन मिसर।
-हँ-हँ, लखन! तोहर पिता-पण्डितजी बड़ मनलग्गू लोक रहथि। हम गाम जाइ पहिने तँ ओ जरूर आबथि आ पहरक पहर दरबज्जा पर बैसथि। अपना गामसँ हमरा गाम धरिक सबटा खेरहा सुनाबथि, चाह पीबथि, पान खाइथ आ तोरा मादे किछु ने किछु गुणाभाव कहल करथि। खैर, ओहेन पवित्रा आत्माक लोक आब होना मोश्किल! अएँ हौ, हुनकर किछु गुण-मंत्रा सिखलह कि नइं?
लखन धखाइते बाजल-पूजा-पाठ, पोथी-पतरा तँ अबैए मुदा...।
-की मुदा?
-हमरा ओइ सभमे मोने नइं लगैत अछि मामाजी!
-से किएक? काज तँ कोनो खराप नइं होइत छै! हमरा नैहरक सोनेलाल ठाकुर बम्मैमे पुजेगरीए करा क’ फ्लैट किनने अछि-मामी टीप देलखिन। लखन बकर-बकर हुनकर मुहें तकैत रहल। ओकरा आँखिक सोंझाँमे गाममे सतनारायण व्रत कथाक दक्षिणा सबा टाका, अढ़ाइ टाकासँ आब पँचटकही धरि पहुँचैत-पहुँचैत हकहक करए लगलै। आ आरतीमे दस पैसी, बीस पैसी, चैवन्नी, अठन्नी-कुल जमा पोने दू टाका। चारि छिम्मड़ि केरा, पा भरि प्रसाद आ आसेर अरबा चाउर, तै पर भगवानकेँ अर्पित ‘सपीत वस्त्रा’-गोटेक जोलही गमछी! समयक लागत-तीन घण्टा, अइ टोलसँ ओइ टोल धरिक टहलान, संगहिं भगवान शालिग्राम, शंख, आ अर्घा-पंचपात्रा-घंटी सेहो अपनेबला नेने आउ, नेने जाउ।
ओकरा आँखिमे बापक अमलदारीसँ अपना अमलदारी धरिक सभटा चित्रा उमड़ए लगलै, ओ ठामहिं सेप घोंटि लेलक। हाताक एक कोन पर गाड़ल चापाकलकेँ आहलक आ ओत’सँ जाबत हाथ-पैर धो क’ बरंडा पर आएल ताबत मामी पनपिआइक आग्रह केलखिन। गहूमक सोहारी पर नोन-तेल-अचार आर थोड़े भट्टाक चोखा। लखन सुआदि-सुआदि खेलक, ठंडा पानि पीलक आ मोन भेलै जे अही बरंडा पर पुरबाक हलफीमे गमछा ओछा लिअए, मुदा तैखन दुरुक्खासँ मामा सोर पाड़लखिन-लखन हौ, एम्हर आबह।
ओ तुरन्ते सोझाँमे दासोदास ठाढ़।
-तोरा लेल तत्खनात दू-तीन गो काज कहै छियह। एकटा नातिन अछि-तकरा इसकूल पहुँचाएब-लाएब तोरा जिम्मा। जे क्षण ने अबैत हैत। दोसर काज-संध्या कालक अपन मामीक संग झोड़ा ल’ क’ हाट-बजार-तीमन-तरकारीक जोगाड़। तकर बाद विभागमे देखै छिऐ जे तोरा लेल की-कोना भ’ सकैत छह मुदा तकर कोनो गारंटी नइं! बाजह मंजूर छह?
-जी, हम तँ सेवे करबा लेल आएल छी। जे कहल गेलैए, से सभ तँ हेबे करतै, आरो जे कोनो सेवा-टहल हेतै, मामियोंक जे हुकूम हेतनि-हम क्यो आन नइं छी जे...। मामीक भरि मुँह हँसी ओकरा नीक लगलै। अगिला पाँच-सात दिन बितैत-बितैत लखन ओइ परिवारक अंग बनि गेल। दिनसँ राति धरि मामा-मामीक मुँहें तकैत रहए-की खसतनि मुँहसँ जे पूरा करब। जेना कि ओ सभ साक्षात विक्रमक अवतार होथि आ ई जेना बेतालक अंश।
अही बीच मामी एकटा देहक साबुन आ एकटा कपड़ाक साबुन देलखिन, संगहिं मामक फेड़न-फाड़न पैंट-शर्ट सेहो। लखन सबटा अंगीकार करैत गेल, मुदा मोनक कछमछी किन्नहुँ शान्ते नइं होइ। एक दिन मामी पुछबो केलखिन-अहाँक मोन एना अलसाएल-मन्हुआएल जकाँ किएक रहैए? किछु होइए? से हुअए तँ कहब-एत’ डाक्टर-ताक्टरक बड़ सुख छै, हम तँ अहाँक मामाक द्वारे कतौ बहराइते नइं छी, नइं त’ कै गोटे डेरा आबि-आबि खोशामद करैत रहैए।
लखन मुदा अपन मनरोगकेँ आर भरिगर चेखान तर जेना चापि लेलक। रहिमन चुप ह्नै बैठिए...। मुदा चुप्पो भ’ क’ बेसी दिन बैसल रहब ओकरा वशक बात नइं रहै। ओकरा लगै, जेना विमलाक आँगी आ नूआ अही सात दिनमे आर बेसी रित्ती-रित्ती भ’ गेल होइक। दुनू धिया-पूताक चप्पल अही बीचमे कैक ठाम उखड़ल-टूटल हेतैक, पता नइं शनिचर मोची मँगनीमे आब ठीको क’ दैत हेतै कि नइं! पता नइं, टिफिनमे की ल’ क’ इसकूल जाइत हेतै ओ सब! जानि नइं, माइक दम ओहिना फूलैत हेतै कि बेसिये भ’ गेल हेतै! दुनू साँझ ओकरा लेल रोटिये ठीक रहै छै मुदा तकर इंतजाम...? की-कोना करैत हेतै ओकर विमल?
अबिते-अबिते ओ एकटा पोस्टकार्ड लीखि पठौने रहए, से आब पहुँच गेल हेतै। हाल-चाल ठीक आ मामा-मामीक बात-बेवहार नीक...। छुच्छे बोल-भरोस रहै।
मुदा अगिला दिन भोरे जखन मामा-मामीक गुड-मौर्निंग भेलै, ठीक तखने लखन लेल भेरी-भेरी गुड-मौर्निंग भ’ गेलै। चाहक शिप लैत मामा कहलखिन-आइए दस बजेसँ तोहर ड्यूटी टाउन थानामे शुरू हेतह। पद तँ छै चतुर्थ वर्गीय, मुदा जौं ठठि गेलह तँ स्थायी भ’ सकैत छह। देखह बाउ! काज कोनो खराप नइं होइ छै। जुत्ताक दोकानमे सेल्समैनी करैत बाभनक बेटा हमरा बेसी नीक लगैए बौआ। पण्डिताइ छँटने आ चानन-ठोप कएने आब गुजर नइं चलतै ककरो। अही तितम्हा सभक कारणें महामहो लोकनिक संतति जत्रा-कुत्रा भिक्षाटन करैत भेटथुन। छै किने?
-हमरो तँ इएह विचार अछि मामाजी! तैं तँ पोटरी बाबा नइं बनलहुँ, आ गाम त्यागि एत’ अएलहुँ अछि। हमरा पसेनाक मोल टा भेटल ताकए, काज खाहे जे कोनो होउ, परबाहि नइं।
मामी समय पर मामेजीक संगें एकरो खुआ-पिया क’ शुभाशीष द’ क’ विदा केलखिन। लखनकेँ एहि मामा-मामीमे एकटा नव माइ-बापक अनुभूति भेलैक। ओइ दिन पैरमे बान्हल 28 बरखक जाँत कोना आ कखन खुजि गेलै, ई बूझिए नइं पौलक। गदहाक छान खुजि गेल रहै आ गदहा धुरपट दौड़’ लागल, उछल’ कूद’ लागल। पीठ पर आइ कोनो भार नइं बूझि पड़ै, ने विमलाक भार, ने बरखाहु बेमारीवाली माइक भार, आ ने दुनू टेल्हक भार! ओकरा लगलै जे आब ओ गदहा नइं रहि गेल अछि, ओ तँ आब घोड़ा भ’ गेल। खाँटी घोड़ा!
टाउन थानाक बड़ा बाबू संग रीतिआइमे लखनकेँ एकसँ दू दिन लगलै। तत्खनात ओकरा भेटल काज कोनो भारी नइं रहै। मुदा गामक लेखें बेस भारी रहै। एक तँ राज्य सरकारमे चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी, ताहूमे पुलिस विभाग! सिपाहीक हुकुम बजबओ, जमेदार साहेब, बड़ा बाबू तँ सहजहिं बड़े बाबू रहै। तैसँ उपर इंस्पेक्टर साहेब, तखन फेर डीएसपी साहेब, मुदा जानमे जान एतबे रहै जे ओकर साहेब-मामा साहेब सभसँ उपर। सभक माथ पर एकर मामाजी बैसल रहथिन, से लखनकेँ बेर-बेर, डेग-डेग पर अनुभव होइ, मुदा ई धरि अपनाकेँ कखनौ मामाजीक ‘रैंक-बैज’ नइं बनौलक।
भरि दिनमे बीसो खेप चाह आनए, सभकेँ पानि पिआबए, अँइठ-कूठि गिलास-कप उठाबए। राइफलो उठाबए, मैगजीनो साफ-सफाइ करए। तत्काल एक सेट पुरने वरदी बड़ा बाबू इंतजाम क’ देलकै। मामीसँ ओ इस्तिरी करब सीखि लेलक। मामा-मामीक अनुमतिसँ मामक ललका जूतामे पालिश करए तँ दू हाथ अपनोमे लगा दैक। ओकरा बुझाइक जे आबहि ओ जुआन-जहान भ’ रहल अछि।
टाउन थानाक ड्यूटी! ...दैनिक मजूरीबलाक तँ रामे रखबार! ओना थाना पर अबैत जाइत जिला भरिक कैकटा छोटा बाबू, बड़ा बाबू अनेरो एकरा देहमे जोंक जकाँ सट’ चाहै मुदा एकरा मामी सब तरी-घट्टी बुझा देने रहथिन-जे साहेबकेँ बइमान आ कामचोर लोक नइं सोहाइ छनि। घूस-पैंच लेनिहार-देनिहारकेँ अहाँक माम खाली गोलिये टा नइं मारै छथिन, बाँकी कोनो टा दशा नइं छोड़ै छथिन। पैरवी-पैगाम लेल लोक अहाँकेँ कहत, खुआएत-पिआएत, मुदा तै सभ लपस्सामे नइं पड़ब। खबरदार!
लखन सत्ते, तैखन अपन दुनू कान पकड़ने रहए, मामी बिहुँसि देने रहथिन।
पछिला रवि दिन छुट्टी रहै। गाम पोस्टकार्ड लिखैत रहए लखन। मामी देखि लेलखिन-लीखू-लीखू। आब तँ गाम-गाम धरि फोन पहुँच रहलैए, अहाँक गाममे फोन बूथ नइं खूजल अछि?
-हँ मामी, कनिके दूर पर बजार छै, ओतहि दू-तीन टा खूजि गेलैए, मुदा जा क’ करए पड़तै, से के करतै? अइठाँसँ हम करबै, से समाद कियो पहुँचा देतै, सैह!
-आ ई चिट्ठी? कते दिने जाएत?
-घरे लग अपने समांग पोस्टमास्टर अछि, तीन-चारि दिनमे जरूर पहुँच जाएत।
-काल्हिए परसू तँ आएल रहए अहाँक चिट्ठी? की सब लिखने रहथि कनियाँ?
-की सब लिखती? ओएह दुख-धनियां! माइकेँ दमा बढ़ि गेल छनि, च्यवनप्राश नेने एबनि आर...
-आर की?-मामी एक रत्ती रभसैत जकाँ पूछि देलखिन।
ई लजा गेल रहए, मुदा फेर ओएह सम्हारि लेलखिन-नइं यौ, हम नइं बुझै छियै, तेहेन कोनो बात रहितै तँ कार्ड कथी लए अबितै! तै सभ लेल लोक लिफाफ आ अन्तरदेशी नइं लिखत?
-हँ, बुचुन आ गुड़ियाक इसकूलक मादे किछ-किछ लिखने रहथि।
इसकूलक चर्च अबिते जेना तिनकमियां काँट चप्प द’ छातिएमे भेंसा गेलै।
इसकूलसँ नोटिस पठेलकैए-दुनू मासक फीस दण्ड सहित सात दिनमे जमा करू, नइं तँ विद्यार्थीक नाम कटि जाएत। सौंसे कार्डमे जेना विमलाक चिन्तित मुखाकृतिक छाप छापल रहै। चिट्ठीक माध्यमे पठाओल चिन्ता ओ अंगेजि नेने छल। तकर बाद कदाचित विमलाक माथ हल्लुक आ एकर माथ भारी भ’ गेलै! एखन मास लगबामे आ मजूरी भेटबामे देरी छै। अइ बीचमे अवकाशो नइं रहै जे एक लपकान गामो भ’ अबितए। सोझाँ सोझी जँ कहि दितै तँ सम्भव रहै प्रिंसपल मानियो जैतै।
इम्हर मामाजी कोनो काजे दिल्ली-पटना गेल रहथिन। डेरोक देखभाल जरूरिए रहै। मामी लग लेन-देनबला ने सम्बन्ध रहै ने से एकरा उचित बुझएलै। आइ दू दिनसँ भोजनो नइं रुचै छै। ठीकसँ निन्नो नइं होइ छै। कछमच्छी धेने छै जेना। सदिखन बेचैनी! बाट नइं सुझबाक बेचैनी। अन्हारमे किछु नइं देखाइ पड़बाक औनाहटि आ कोनो अकाबोनसँ झट्ट द’ बहरएबाक छटपटाहटि!
कते सेहन्तें ओ दुनूक नाम अइ पब्लिक इसकूलमे लिखौने छल! कते पैरधरिया केने रहै तै लेल विमला! ओना सरकारी प्राथमिक विद्यालय तँ टोलोमे रहै, मुदा ओइमे बेसीकाल साँढ़े आराम फरमाबै छै। सगर टोलाक कुकूर आ पिलियाक सटौर लगै छै। एकटा मास्टर छै, सेहो कागते पर। हप्तामे दू दिन एक दिन अबैए, हाबडीब करैए आ साइकिल उठा विदा भ’ जाइए। गामक लोक किओ पूछै छै तँ कहियो जनगणना, कहियो पोलियो, कहियो चुनाव, कहियो ब्लौक आॅफिसक बहन्ना बना दै छै। के देखनिहार छै! ओकरा भरोसे तँ सौंसे गाम औंठे छाप रहि जेतै!
तैं गामक पड़ोसमे जखन ओ पब्लिक इसकूल खुजलै तँ लोक हूलि मारलक। इसकूलक चला-चलती भ’ गेलै। आब त’ गोर दसेक बेरोजगार युवक सभ आ दू तीन टा देवियोजी सभ पढ़बै छै। तीनिए बरखमे सात किलास धरि चालू भ’ गेलैए। मेहनति करै जाइ छै तँ बच्चो सभ चंसगर भ’ रहलैए। कहाँदन अइ सालसँ नवोदय आ सैनिको इसकूलक तैयारी करौतै।...
एहने अनमुनाइत मोने ओइ दिन ओ थाना पहुँचल। पैर पटकि क’ बड़ा बाबूकेँ सैलूट मारलकै तँ ओ तुरन्ते भाड़ाक दू टा जीप लाब’ कहलकै, कतौ अपरेशनमे जेबाक रहै। थानामे ओकरा कोनो अनोन-बिसनोन सन बुझना गेलै, मुदा तै सभक तहकियातक एखन अवसर नइं रहै।
इस्टैण्डसँ दू टा टेकरबलाकेँ हाँकि अनलक। देखि क’ बड़ा बाबू कहलकै-भेरी गुड लखनजी, भेरी गुड! चलब अहूँ तँ चलू।
जवान छै दुइए सेक्सन, तही ल’ क’ आपरेशनो चलेबाक छै, आ थानोक देखभाल करबाक छै। पुलिस लाइनकेँ काल्हि अहीं ने द’ आएल रहिऐ एक सेक्सन फोर्सक डिमाण्ड नोट? ओकरा सबकेँ कोनो गर्ज छै! साला, जे मरतै से मरतै!
लखन बड़ा बाबूक मूडकेँ परेखबाक चेष्टा केलक। विषय किछु असाधारण आ बेस गम्भीर बुझना गेलै। पूछलकै तँ बड़ा बाबू संक्षेपेमे कहलकै-बें-बें नइं करू। राति फेरो करिया सार करनामा क’ देलकैए। डीएसपी मिश्राजीक अन्दरमे दू सेक्सन हथियारबन्द फोर्स ल’ क’ सर्च आपरेशनमे चलबाक छै।
लखनक प्रश्नवाचक दृष्टिकेँ गमैत बड़ा बाबू कहलकै-औ जी, ट्रेनिंग भेल अछि ने? राइफल चलब’ अबैए ने? नइं अबैए तँ चलू, अहाँ गाड़ीएमे चुपचाप बैसल रहब आ वायरलेसे पर हेल्लो-हेल्लो करब! सेहो हैत की नइं? हम मरब तँ अहूँ मरब! शहीदी हरजाना बरोबरिए भेटत फेमिलीकेँ! ठीक छै ने? अहीं सन-सन आरो होमगार्ड ड्यूटी करै छै।
लखनक आशय से सब नइं रहै, मुदा ओ आब एखन चुप्पे रहब उचित बुझलक। ओकरा आब बात बुझबा जोगर भेलै जे कारी जादवक गिरोह फेर कतौ लग्गे-पासक गाममे काल्हि राति डकैती केलकैए, तकरे सर्च आपरेशनमे दल जा रहल छै। ओकरा कतौसँ कोनो भय नइं रहैक, उत्सुकते रहै। कैक बरख भ’ गेल रहै फायर केना। ओना पछिला चुनावमे राइफल पार्टीक मेम्बर रहए ओ, मुदा तेहेन परिस्थिति नइं भेल रहै कतौ।
दिन भरि कैक टोला-टपड़ामे खोजाइ करै गेल, कतौ कोनो चाल चूल नइं पबै गेल। वायरलेससँ डीएसपी मिश्रा साहेबक हुकुम भेटलै जे साँझ पड़ैत नदीक किन्हेरक बड़की गाछी लग दुनू कातसँ घेराव करै जाए। ओही आसपासमे गिरोह नुकाएल अछि कतौ, भ’ सकैए जे ओही गाछी कातक मुसहरीमे हुअए।
सूचना सही साबित भेलै आ दोसर सँ तेसर साँझ होइते ओही बड़की गाछीमे भिड़ंत भ’ गेलै। घमासान गोलीबारी भेलै, बड़ी राति धरि। तीन दिससँ घेराएल रहबाक कारणें गिरोहक कम्मे लोक बचि क’ निकलि सकलै।
जखन राति बारहक अमल भेलै तँ सब शान्त भ’ गेलै। गाड़ीक लाइट जरा क’ देखल गेल-गाछीेमेे पटोटन देने लहासे-लहास। एकटा जवानो शहीद भेल चारि टा घाइल।
सबकेँ लादि क’ सिभिल अस्पताल पहुँचाओल गेल। घाइलक इलाज आ मुर्दाक पोस्टमार्टम शुरुह भेल!
बड़ा बाबूक पैरकेँ आ डीएसपी साहेबक बामा हाथक केहुनीकेँ छूबैत गोली गेल छलै, घाव मामूलिए रहै। लखन मिसर ट्रेकरक अढ़े घाते ओंहराइत-पोंहराइत बेलागि बाँचि गेल छल। कारी जादव समेत छह डकैत साफ भेल छल, दू घाइलो पकड़ाएल रहए।
पोस्टमार्टमक पछाति राताराती फोटो घिचबाओल गेल। जिला मुख्यालयसँ राज्य मुख्यालय धरि सब ठाम फोन आ वितंतु संवाद पठा देल गेल। एकबारबला सभकेँ सेहो जगा देल गेल रहै।
मुदा दोसर दिस आला अफसरानकेँ चिन्ता गछाड़ने जे एते लहासक कोन उपाय हेतै। एसपी साहेबक अनुपस्थितिमे सभटा फैसला सोझे डीआइजी साहेबक आदेश पर चलैत रहै।
उपरसँ आदेश आबि गेलै जे लहास सभक ठर-ठेकान शीघ्र लगा देल जाए, मुइलहासँ घाइल धरि, अधिकांश एके जातिक रहै, अइ राजमे सभटा राजनीति जातियेक नाम पर होइत छै। जातिये नाम जहाज छै!
आब बड़ा बाबूक फिरीशानी बढ़ि गेलै। अइ थानामे जहियासँ कल्लू मरलै, तहियेसँ समस्या विकराल रहै, लाश के उठाओत, के जराओत! ई टना-दोखा समस्या बीच-बीचमे अबिते रहै आ तखन-तखन जेना बड़ा बाबूक गारामे उतरी पड़ि जाइक। सिभिल अस्पतालक पोस्टमार्टमबला रुकनाक खोशामद जरूरी भ’ जाइक। तखन ओकर मोल-भाव-महोजरो चलै आ तीन सएसँ होइत-होइत डेढ़ सए पर तय होइ।
बहुत लिखा-पढ़ीक बाद हेड क्वार्टरसँ डेढ़ सए टाकाक स्वीकृति आएल रहै, मुदा ताहूमे कैक टा हिस्सेदार पटीदार भ’ जाइ। अधिकांश सिपाही जमादार आदिक इच्छा होइ, जे पचासे रुपैयामे काज सलटि जाए आ बाँकी हजम क’ जाइ, किन्तु लहास धरि नइं छूब! छीया-छीया! राम-राम!
बहुत पराभव रहै बड़ा बाबूकेँ! आब एखने ई बेवस्था करबाक छै। भोर भ’ जेतै तँ फड़िच्छमे फेर कते तरहक असुविधा भ’ सकैछ। लहास सब जहिना पोस्टमार्टमसँ अएलै तहिना ट्रेकर पर जाकल रहै। ट्रेकरक डरेबर फुट्टे भनभनाइत रहए, मुदा डंटाक डरेँ किछु बाजि नइं होइक।
गाड़ी इस्टाट भेलै। डरेबर, बड़ा बाबू आ लखन मिसर सवार भेल। जगह सभ टेबाए लागल। ल’ द’ क’ बड़ा बाबूक इएह दू गो परामर्शी रहै-एगो डरेबर आ दोसर लखन मिसर। फल्लाँ ठाँ दियरा पर काश-पटेरक जंगलमे गाड़ि देल जाए-एक मत एलै।
फल्लाँ गामक कातमे जे कोसक कोस धरि पसरल करजान छै-ताहूमे ठीके रहतै, दोसर मत छलै। पाँच मोन लकड़ीक डगरना ल’ क’ सबकेँ एके संगे भूजि-भाजि क’ खतम क’ देल जाए-ई तेसर मत रहै।
लखन मुदा बेसीकाल गुम्मे छल, खाली हँ-हूँमे जवाब दैत रहल। ओ कोनो अपने गुनधुनमे ओझराएल छल। ओकरा मगजमे दोसरे कोनो बिहाड़ि उठल रहै। एक दिन बड़ा बाबू हँसिते-हँसिते कहने रहै जे अहाँक बहाली कल्लुएक जगह पर भेल अछि। ई जगह ओकरे मुइला पर खाली भेल रहै। से, एक दिस ओ कत्र्तव्यबोध आ दोसर दिस संस्कारबोध-दुनू पाटक बीचमे पीसीमाल होइत रहल लखन मिसर!
लखन मिसरक देह घामे-पसीने तर-बतर भ’ गेलै। ओ के थिक? ओ पण्डित जग्गू मिसरक बालक थिक! ओ के थिक?
-ओ पण्डित बलदेव ठाकुरक दौहित्रा थिक।
-ओ के थिक?
-ओ धारे झाक पाँजि थिक! ओ छह प्रबलक जनेउ पहिरैए। ओकर पुरखा सीयल वस्त्रा नइं धारण करैत छलखिन। ओकर दादाजी एकटंगा देने दस सहस्र गायत्राीक जाप प्रतिदिन करैत रहथिन। ओकरा माइक एकादशी आ पिताक कामरु सेहो नइं बिसरल छैक!
मुदा ओकरा इहो नइं बिसरल जाइत छै जे एखन, आजुक तारीखमे माइ लेल एकटा च्यवनप्राश कीनबाक सामथ्र्य नइं छै। अपना अर्धांगिनीकेँ देह झँपबाक लेल वस्त्रा देबाक आय-उपाय नइं छै। कैक दिनसँ उठैत-बैसैत, खाइत-सुतैत जे बात मतिछिप्पू बनौने रहै-नेन्ना सभक फीसो जमा करबाक कोनो टा जोगाड़ नइं रहै।
अवसर बढ़िया छै। सोझ सोझ छौ टा नमड़ी! कैक टा महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न क’ लेत एहि रकमसँ। मामा कहलखिन-काज कोनो टा छोट नइं होइछ। संसारक सभटा काज महत्त्वपूर्णे होइछ। पिता कहल करथिन-बाउ, समयकेँ चीन्हबाक चाही। अवसरक चूकल मनुष्य, डारिक चूकल बानर कतौक नइं रहैए।
गाड़ी आब शहरसँ छह किलोमीटर दूर करेह धारक लचका पुल पर पहुँच रहल छलै। पूब भर अकाश थोड़े-थोड़े साफ भ’ रहल छलै। लचका पुल पर अबैत-अबैत लखन दृढ़ स्वरेँ ट्रेकर रोकबौलक। फानि क’ नीचाँ उतरल आ कन्हेठि क’ एक टा लहास उठौलक-धारमे फेकलक, छपाक! जनौक एक प्रबल फुस्स! फेर दोसर छपाक! फेर दोसरो प्रबल टुन्न! फेर तेसर छपाक! संस्काराय स्वाहा! फेर छपाक! फेर परम्पराय स्वाहा!
आ अन्तमे कपार परहक घाम जे नाकक टुरनी पर द’ चूबि रहल छलै, तकरा कमीजक बाँहींसँ पोछैत, छठम लहासकेँ, जे सबसँ बेसी ओजनगर छलै कन्हेठि लेलक। घाड़ कनेक एक भाग झुकल, दुलकी चालि दैत लचका पुलक रेलिंग लग पहुँचैत लखन मिसर एखन एन-मेन हरकुलस सन लागि रहल छल। ...आ धरतीक गोलाकेँ कन्हेठने अइ हरकुलसकेँ देखबा लेल ओइठाँ बड़े बाबू टा उपस्थित छलै। ओना गाछ पर किछु कौआ सेहो पह फटबाक सूचना द’ रहल छलै।

ऽऽऽ

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...