Sunday, July 27, 2008

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० १. नाटक/ नो एंट्री : मा प्रविश श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’

१. नाटक

श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-1951 ई. कलकत्तामे।1966 मे 15 वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’ | 1971 ‘अमृतस्य पुत्राः’(कविता संकलन) आ’ ‘नायकक नाम जीवन’(नाटक)| 1974 मे ‘एक छल राजा’/’नाटकक लेल’(नाटक)। 1976-77 ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। 1978मे जनक आ’ अन्य एकांकी। 1981 ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। 1988 ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। 1997-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। 1998 ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। 1999 ‘अश्रु ओ परिहास’। 2002 ‘खाम खेयाली’। 2006मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आ’ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। 14 टा पी.एह.डी. आ’ 29 टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आ’ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर।
नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि-अंकीय मैथिली नाटक)
नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर
(मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौन भंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।)
दोसर कल्लोलक पहिल भाग जारी....विदेहक एहि दसम अंक १५ मई २००८ मे।
नो एंट्री : मा प्रविश

दोसर कल्लोल पहिल खेप

दोसर कल्लोल
[पश्चाद्पट मे स्वर्ग-द्वारे लखा दैछ मुदा मंचक एक दिसि द्वारक बाम भागक देबार लग एकटा भाषण देबा जोकर कनेक ऊँच भाषण-मंच आ ताहि पर एकटा माईक देखल जायत। भाषण-मंच पर तीनटा नीक कुर्सी देखल जायत। ओमहर दरबज्जाक सामने आ भाषण-मंचक लग बाईस-चौबीस-टा भाड़ा केर कुर्सी सेहो राखल रहत जाहि पर चारि-टा मृत सैनिक सँ ल’ कए चारि-गोट बाजा बजौनिहार आ प्रथम कल्लोल मे देखल सब गोटे – नंदी– भृंगी केँ ल’ कए चौदहो गोटे बैसल प्रतीक्षा करैत छथि। लगैछ सब क्यो प्रतीक्षा करैत-करैत परेशान भ’ गेल छथि।]

अनुचर-1 :(नेताजी एखनहु धरि नहि आयल छलाह। हुनक दूटा अनुचर मे सँ एक गोटे कहुना माईक पर किछु ने किछु बजबाक प्रयास क’ रहल छल – जाहि सँ लोग ऊबि कए कतहु सरकि ने जाय!) त’ भाई – बहिन सब ! जे हम कहै छलहुँ... आजुक एहि अशांतिमय परिवेश मे एकमात्र बदरीये बाबू छथि जे शांतिक दूत बनि कए मथिले मात्र नहि, समस्त भारतक आतंकवादी, कलेसवादी, उग्रवादी, अत्यूग्रवादी, चंडवादी, प्रचंडवादी सँ ल’ कए सब तरहक विवादीक झगड़ा-विवादकेँ मेटैबाक लेल द्विचक्रयान सँ ल’ कए वायुयान धरि , सभ तरहक वाहन मे अत्यंत कष्ट आ जोखिम उठा कए सफर करैत रहलाह। आ अहिना सब ठाम... सगरे, अपन बातक जादुई छड़ीकेँ चलबैत सभक दुःख- दर्द केँ दूर करैत रहलाह। मिथिलाक महान नेता एक बद्री-विशाल सिंहे छथि जे...

बाजारी : (परेशान भ’ कए) हौ, से सबटा त’ बुझलियह मुदा
ई त’ बताब’ जे बद्री बाबू छथि कत’?
बीमा-बाबू : आर कतेक देर प्रतीक्षा करय पड़त ?
अनुचर 2 : (जे भाषण-मंचक कोना पर ठाढ़ रहैत अछि आ
बीच-बीच मे उतरि कए बाहर जा कए झाँकि कए
देखबाक प्रयास क’ कए घुरि-घुरि आबैत छल।) हे,
आब आबिये रहल हेताह !
बाजारी : हे हौ! इयैह बात त’ हम सब बड़ी काल सँ सुनि
रहल छियह ! “आब आबिये रहल छथि...”
बीमा-बाबू : आ बैसल बैसल पैर मे बघा लागि रहल
अछि...हमरा सँ त’ बेसी देर धरि बैसले नहि
जाइत अछि।
अनुचर 1 : (सब केँ शांत करैत) हे...बात सुनू... बात सुनू
भाइ-सब ! बैसै जाउ, कने शांत भ’ कए बैसल ने
जाइ जाउ!
अनुचर 2 : (बजबाक भंगिमा सँ स्पष्ट भ’ जाइत छनि जे फूसि बाजि रहल छथि-) कनिये काल पूर्व ओ धर्म-शिला हैलिकॉप्टर पर सँ उतरल छथि। आब ओ रास्ता मे छथि– कखनहु पहुँचि सकै छथि... !
अनुचर 1 : आब जखन ओ आबिये रहल छथि, प्रायः पहुँचिये
गेल छथि, आजुक समय-समन्वय-सामान्यजन
आ चारुकात चलि रहल अनाचार दय बद्री बाबूकेँ
की कहबाक छनि, से सुनैत जाय जाउ !
बाजारी : अच्छा त’ कह’ ने कोन नव बात कहब’!
अनुचर1 : ओना अहीं कियैक हम सब चाहै छी जे सब किछु
नव हो... ! रास्ता नव हो, ओ पथ जतय पहुँचत से
लक्ष्य नव हो, एहन पथ पर सँ चलनिहार हमरा-
अहाँ सनक पुरनका जमानाक लोग मात्र नञि –
नवीन युगक नवतुरिया सब हो ! पुरातन ग्लानि,
पुरना दुःख-दर्द सब, प्राचीने इतिहासक पृष्ठ पर
हमसब ओझरायल जकाँ मात्र ठाढ़ नहि रही,
किछु नव करी... !

बीमा-बाबू : ई बात त’ ठीके कहि रहल छी।
भद्र व्यक्ति : (दुनू गोटे) ‘ठीक, ठीक ! एकदम ठीक”,आदि।
अनुचर1 : आ इयैह बात बद्री विशाल बाबू सेहो बाजैत छथि-
विशाल जनिक हृदय, श्रम-जीवी मनुक्खक लेल
जनिक हृदय सँ सदिखन रक्त झरै छनि, जनिका
लेल पुरनका लोक, रीति-रेवाज ततबे महत्वपूर्ण
जतबा नवयौवनक ज्वार, नवीन पीढ़ीक आशा-
आकांक्षा - ई सब किछु। आजुक युग मे वैह एकटा
राजनेता छथि जे नव आ पुरानक बीच मे एकटा
सेतु बनल स्वयं ठाढ छथि आ ओ सेतु जेना
कहि रहल हो---
आउ पुरातन, आऊ हे नूतन।
हे नवयौवन, आऊ सनातन ।।
प्राण-परायण, जीर्ण जरायन।
बज्र-कठिन प्रण गौण गरायन।।
सुतनु सुधनु सुख सँ गायन।
जीर्ण ई धरणी तटमुख त्रायन ।।
अघन सधन मन धन-दुख-दायन।
जाऊ पुरातन, आऊ नवायन।।

[एहन उत्कृष्ट काव्य-पाठ सुनि रद्दी-बला आ भिख-मंगनी प्रशंसा सूचक “वाह-वाह” कहैत ताली बजाब’ लागै’ छथि। त’ हिनका दुनू केँ देखि अनुचर 2 आ नंदी-भृंगी केँ छोड़ि बाकी सब सोटे ताली बजाब’ लागैत छथि।]

चोर : (लगमे बैसल रद्दी-बला केँ) हे... किछु बुझलह
एकर कविता कि आहिना ? (रद्दी-बला आँखि उठा
कए मात्र देखैत अछि, जिज्ञासा आँखि मे...) हमरा
त’ किछु नहि बुझ’ मे आयल।
रद्दी-बला : नव किछु भरि जिनगी कैने रहित’ तखन ने? एहि ठामक
माल ओम्हर...आ ओहि ठामक एम्हर... !
भिख-मंगनी : ठीके त’! तोँ कोना बुझबह ?
चोर : पहिल दूटा पाँती त’ बुझिये गेल छलहुँ। मुदा तकर
बाद सबटा कुहेस जकाँ अस्पष्ट...एत्तेक नवीन छल
जे बुझ’ मे नहि आयल !
अनुचर 2 : हे! के हल्ला क’ रहल छी ?
भिख-मंगनी : हे ई चोरबा कहै छल...

चोर : (डाँटैत) चुप! भिख-मंगनी नहितन...हमरा ‘चोर’
कहैये!
भिख-मंगनी : हाय गौ माय! ‘चोर’ केँ ‘चोर’ नहि कहबै त’ की
कहू ? कोन नव नामे बजाऊ ?
अनुचर 1 : (माईक सँ, कनेक स्वर केँ कर्कश करैत) हे अहाँ
सब एक दोसरा सँ झगड़ा नहि करु! जे किछु
बतिआबक अछि, हमरे सँ पुछू ! (भिख-मंगनी केँ
देखा कए) हे अहाँ... (भिख-मंगनी एम्हर-ओम्हर
देखैत अछि) हँ,हँ – अही केँ कहै छी ! बाजू...की
बाजै छलहुँ ? पहिने बाजू- अहाँ के छी ?
चोर : (बिहुँसैत) भिख-मंग- (वाक्य अधूरे रहि जाइत
छनि, कियैक त’ भिख-मंगनी झपटि कए चोरक
मुँह पर हाथ ध’ दैत अछि-बाँकी बाजै नहि दैछ।)
(तावत् दुनू अनुचर झपटा-झपटी देखि कए,
“हे...हे...!” कहैत मना करबाक प्रयास मे अगुआ अबैत अछि।)
भिख-मंगनी : (चोरक मुँह पर सँ अपन हाथ केँ हँटाबैत, ठाढ़
भ’ कए अपन परिचय दैत, कने लजबैत...) हमर
नाम भेल ‘अनसूया!’
अनुचर1 : अच्छा, अच्छा! त’ अहाँ अवश्ये श्रमजीवी वर्गक
छी...सैह लागैत अछि !
भिख-मंगनी : हँ!
अनुचर 2 : कोन ठाम घर भेल ?
भिख-मंगनी : घर त’ भेल सरिसवपाही...मुदा,
अनुचर 2 : मुदा?
भिख-मंगनी : रहै छलहुँ दिल्ली मे... असोक नगर बस्ती मे...
अनुचर 1 : आ’ काज कोन करैत छलहुँ बहिन ?
भिख-मंगनी : गेल त’ छलहुँ मिथिला चित्रकलाक हुनर ल’ कए,
अपन बनायल किछु कृति बेच’ लेल... मुदा,...
(दीर्घ-श्वास त्यागि) के जानै छल, जे ओ शहरे
एहन छल जत’ कला-तला केर कोनो कदर नहि... अंतत: हमरा कोनो चौराहाक भिख-मंगनी बना कए
छोड़ि देलक।
अनुचर 2 : आ-हा-हा,ई त’ घोर अन्याय भेल अहाँक संग। घोर
अन्याय... अन्हेर भ’ गेल!
अनुचर 1 : (प्रयास करैत प्रसंगकेँ बदलैत छथि– गला
खखाड़ि कए) मुदा ई नहि बतैलहुँ जे अहाँ कह’
की चाहैत छलहुँ ?
भिख-मंगनी : हमरा लागल, अहाँ जे बात कहि रहल छलहुँ ताहि
मे बहुत किछु नव छल, तकर अलावे-
रद्दी-बला : हमरा सब केँ त’ बुझ’ मे कोनो दिक्कति नहि
भेल, मुदा
अनुचर 2 : मुदा ?
भिख-मंगनी : (चोर केँ देखा कए) हिनकर कहब छनि जे मात्र
पहिल दूटा पाँतीक अर्थ स्पष्ट छल, आ तकर
बाद...
अनुचर 1 : ओ...आब बुझलहुँ। भ’ सकैछ...ई भ’ सकैछ जे
किनको-किनको हमर सभक वक्तव्य कठिन आ
नहि त’ अपाच्य लगनि। ई संभव अछि जे हिनका
लेल नव-पुरानक संज्ञा किछु आरे...
[बात पूरा हैबाक पूर्वे रद्दी-बला आ भिख-मंगनी हँसि दैत अछि...संगहि उचक्का आ बाजारी सेहो। अनुचर-
द्वय बुझि नहि पबैत छथि जे ओसब कियैक हँसि रहल
छलाह।] कियैक ? की भेल ? हम किछु गलत कहलहुँ
की ?
रद्दी-बला : अहाँ कियैक गलत वा फूसि बाजब?
भिख-मंगनी : अहाँ त’ उचिते कहलियैक।
बाजारी : मुदा हिनका पूछि कए त’ देखू-ई कोन तरहक सेवा
मे नियुक्त छथि !
अनुचर 2 : [अनुचर-द्वय बूझि नहि पबैत छथि जे की कहताह।]
क.. कियैक?
अनुचर 1 : (चोर सँ) की सब बाजि रहल छथि ई-सब?

[चोर शांत-चित्तेँ उठि कए ठाढ होइत अछि आ भाषण–मंचक दिसि आगाँ बढैत जाइत अछि। अंत मे मंच पर चढ़ि कए बजैत छथि...]

चोर : (अनुचर 1 केँ) जँ ई चाहै छी हमर उत्तर सुनब,आ जँ सत्ते
किछु नव सुन’ चाहै छी तखन हमरा कनीकाल माईक सँ
बाजै देमे पड़त।
(अनुचर-द्वय केँ चुप देखि) कहू की विचार!
अनुचर 1 : (नर्वस भ’ जाइत छथि) हँ-हँ, कियै नञि?
चोर : [माईक हाथ मे पाबि चोर कुर्ता केर आस्तीन आदि समटैत एकटा दीर्घ भाषणक लेल प्रस्तुत होइत
छथि।] अहाँ सब आश्चर्यचकित हैब आ भरिसक परेशान
सेहो, जे हम कोन नव बात कहि सकब। [अनुचर-
द्वय केँ अपन परिचय दैत] आखिर छी त’ हम एकटा सामान्य चोरे, छोट-छीन चोरि करैत छलहुँ, मुदा भूलो सँ ककरहु ने जान नेने छी आ ने आघाते केने छी। चोरि केँ हम अपन कर्म आ धर्म बुझैत छलहुँ – ई जेना हमर ढाल जकाँ छल हमरा कोनो बड़का अपराध सँ बचैबाक! सोचै छलहुँ जे चोरि, माने तस्करता – एकटा ऊँच दर्जा केर कला सैह थिक। सामान्य भद्र व्यक्तिक लेल एतेक सहजे ई काज संभव नहि भ’ सकैत छनि। (दुनू भद्र व्यक्तिकेँ देखा कए) हिनके दुनू केँ देखिऔन ने...त’ हमर बात बूझि जायब।(हँसैत) हिनका दुनूक समक्ष कोनो लोभनीय वस्तु राखि दियनु... तैयहु, इच्छा होइतहु ई लोकनि ओहि वस्तु केँ ल’ कए चम्पत् नहि भ’ सकैत छथि। (गंभीर मुद्रामे) कहबाक तात्पर्य ई जे जेना मिथिला चित्रकला एकटा कला थिक, चोरि करब सेहो चौंसठि कलाक भीतर एकटा कला होइत अछि।

अनुचर 2 : मानलहुँ। ई मानि गेलहुँ जे चौर्यकला एकटा
महत्वपूर्ण वृत्ति थिक, मात्र प्रवृत्ति नहि। मुदा...
चोर : (हुनक बात केँ जेना हवा मे लोकि लैत छथि) मुदा ई
प्रश्न उठि सकैत अछि जे हम चोरि करिते किएक छी ?
विशेष...तखन, जखन कि परिवारमे क्यो अछिये नहि.. तखन एहन कार्य अथवा कलाक प्रयोगक कोन प्रयोजन छल?
बाजारी : ठीक !
चोर : जँ आन-आन वृति सभ दय सोची त’ ई बूझब
कठिन भ’ जाइत अछि जे चोरी वा तस्करी कत’ नहि अछि ? आजुक संगीतकार पछिलुका जमाना केर गीत-संगीतसँ ‘प्रेरणा’ लैत छथि। तहियौका संगीतकार पुरनका संगीतकेँ नव शरीरमे गबबै छलाह। हुनकर सभक ‘प्रेरणा’ छलनि कीर्तन आ लोक-संगीत। आ कीर्तनिञा लोकनि केँ कथी लेल हिचकिचाहटि हैतनि अपनहु सँ प्राचीन शास्त्रीय संगीत सँ कनी-मनी नकल उतारबामे ? (थम्हैत सभक ‘मूड’ केँ बुझबाक प्रयास करैत) सैह बात सनीमा मे थियेटर मे ... कथा, कविता मे सेहो....!
बाजारी : तोँ कहैत छह आजुक सभटा लेखक कल्हुका साहित्यकारक नकल करैत अछि, आ कल्हुका लोक परसुका कवि लेखकक रचनासँ चोरी करै छल...?
अनुचर 1 : माने चोरि पर चोरि...?
अनुचर 2 : आ चोरिये पर टिकल अछि दुनियाँ ?
बाजारी : हे... ई त’ अन्हेर क’ देलह हौ...!
चोर : अन्हेर कियै हैत ? कोनो दू टा पाँति ल’ लिय’ ने-
‘मेघक बरखा....
बाजारी : ई त’ रवीन्द्रनाथ ठाकुरक कविता भेल, नेना-भुटका सभ
लेल लिखल...

भद्र व्यक्ति 1 : (असंतुष्ट स्वरमे) एहिमे चोरी केर कोन बात भेल ?
बाजारी : ओ ककर नकल उतारि रहल छलाह ?
भद्र व्यक्ति 2 : हुनका सन महान कविकेँ चोर कहै छी ?
चोर : (जेना हिनका सभक बात सुनतहि नहि छथि-हाथसँ सभटा बात केँ झारैत...) विद्यापतियेक पाँति लिय—“माधव बहुत मिनती करी तोय !”
उचक्का : एकरा लखे तँ सभ क्यो चोर...
पॉकिट-मार : (हँसैत) आ सबटा दुनियाँ अछि भरल फुसिसँ...सबटा महामाया...
बाजारी : हे एकर बातमे नहि आउ ! (अनुचर द्वयसँ) अहाँसभ कोन नव बात कहै दय छलहुँ...सैह कहु ।
चोर : (उच्च स्वरमे) कोना कहताह ओ नव बात ? विद्यापतिक एहि एक पाँतिमे कोन एहन शब्द छल जे ने अहाँ जानै छी आ ने हम ? ‘माधव’... ‘बहुत’... वा ‘मिनती’... अथवा एहन कोन वाक्य ओ बाजैत छलाह जे हुनकासँ पहिनहि क्यो नहि बाजि देने छल ? आ शतेको एहन कवि भेल हेताह जे मेघक बरिसब दय बजने हेताह आ एहन सभटा शब्दसँ गढ़ने हेताह अपन कविता केँ ?


(सभ क्यो एहि तर्क पर कनेक चुप भ’ क’ सोच’ लेल बाध्य भ’ जाइत छथि।)

अनुचर 1 : माने...?
चोर : माने ई जे दुनियाँ मे एहन कोनो वाक्य नञि भ’ सकैछ जकर एकटा बड़का टा अंश आन क्यो कखनहु कतहु कोनो ने कोनो उद्देश्यसँ वा मजबूरीसँ बाजि नञि देने होथि ! भ’ सकैछ अहाँ तीन व्यक्तिक तीनटा बातक टुकड़ी- टुकड़ी जोड़ि कय किछु बाजि रहल होइक ! एहिमे नव कोन बात भ’ सकैछ ?
बाजारी : हम सदिखन नव बात कहबा लेल थोड़े बाजै छी ? हम त’ मोनक कोनो ने कोनो भावनाकेँ बस उगड़ि दैत छी....।
चोर : आ तैँ आइ धरि जे किछु बजलहुँ से सभटा बाजारमे.... माने एहि पृथ्वीक कोनो ने कोनो बाजारमे क्यो ने क्यो अथवा कैक गोटे पहिनहुँ बजने छल ?
अनुचर 1 : तखन अहाँ कह’ चाहै छी जे....
चोर : (पुन: बातकेँ काटैत) ने अहाँ किछु नव बात कहि सकै छी आ ने अहाँ केर नेता...।


(तावत नेपथ्यमे शोर होइत छैक ..”नेताजी अयलाह”, “हे वैह छथि नेताजी” कतय, कतय यौ ! हे देखै नञि छी ? आदि सुनबामे अबैत अछि। क्यो नारा देम’ लागैत अछि---‘नेताजी जिन्दाबाद’ देशक नेता बदरी बाबू जिन्दाबाद, जिन्दाबाद ! आदि सुनल जाइछ। मंचपर बैसल सब गोटामे जेना खलबली मचि गेल होइक। सभ उठि कय ठाढ़ भ’ जाइत छथि। क्यो-क्यो अनका सभक परवाहि कयने बिनु अगुआ ऐबाक प्रयास करैत छथि।
तावत गर मे एकटा गेंदाक माला पहिरने आ कपार पर एकटा ललका तिलक लगौने कुर्ता - पैजामामे सभकेँ नमस्कार करैत नेताजी मंच पर अबैत छथि...पाछू- पाछू पाँच-सात गोटे आर अबैत छथि आ सब मिलि कए एकटा अकारण भीड़क कारण बनि जाइत छथि। “नमस्कार ! नमस्कार ! जय मिथिला... जय जानकी माता..कहैत ओ मंच पर उपस्थित होइत छथि आ बगलहिमे माईक पर चोरकेँ पबैत छथि।
धीरे-धीरे सब क्यो अपन-अपन आसन पर बैसि जाइत छथि, अनुचर दुनू कोना की करताह नेताजीक लेल से बुझि नहि पबैत छथि, कखनहु लोककेँ शांत करैत छथि त’ कखनहु “नेताजी जिन्दाबाद” ! कहि छथि त’ फेरो कखनहुँ हुनक पाछू-पाछू आबि कए कुर्सी आदि सरिआब’ लगैत छथि। अतिरिक्त लोक सभ तावत् बाहर चलि जाइत छथि।)

(क्रमश:)
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c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...