Thursday, July 17, 2008

लोली/ काँकड़ु/ एकटा आर कोपर / गद्दरिक भात/ बिकौआ/ दूध/दि’न/ पुत्रप्राप्ति/ कोठिया पछबाइ टोल/ कैप्टन/जाति

लोली
एहि शब्द पर भेल धमगिज्जर,
लोल हम्मर अछि नहि बढ़ल,
एतेक सुन्दर ठोढ़केँ छी,
अहाँ लोली कहि रहल।
हँसल हम नहि स्मृतिकेँ,
छोड़ि छी सकलहुँ अहाँ,
फैशन-लिपिस्टिक युगोमे,
लोलीकेँ खराब बुझलहुँ अहाँ।

काँकड़ु
काँकड़ुगणकेँ छोड़ल एकटा ड्रममे,
नहि बन्न कएलक ऊपरसँ,
पुछल हम छी निःशंक अपने।
यौ मिथिलाक ई अछि काँकड़ु सभ,
एक दोसराक टाँग खींचत,
बक्शा बन्द कर्बाक करू नहि चिन्ता,
खुजलो सभटा सभ ठामे रहत।


एकटा आर कोपर
गप्प पर गप्प,
प्रकाण्डताक विद्वताक।
हम्मर पुरखा ई,
हाथीक चर्चा,
सिक्कड़ि-जंजीर टा जकर बचल।
आँगनमे लालटेन नहि
वरन् डिबिया टिमटिमाइत,
लालटेन गाममे समृद्धिक प्रतीक।
फेर दलान पर गप्पक छोड़,
एकटा कोपर दियौक आउर।

गद्दरिक भात
गत्र- गत्र अछि पाँजर सन,
हड्डी निकलल बाहर भेल।
भात धानक नहि भेटयतँ,
गद्दरियोक किए नहि देल।
औ’ बबू गहूमक नहि पूछू,
दाम बेशी भेल।
गेल ओ’ जमाना बड़का,
बात-गप्प नहि खेलत खेल।
बिकौआ
बड़ पैघ भोज उपनयनक,
पछबारि पारक छथि नव-धनिक।
बी.के.झा नाम नहि सुनल,
ओतय ठाढ़ ओ’ धनिक।
आरौ बिकौआ छँ तूहीँ,
दूटा पाइ भेल ओ’ भाइ,
कलकत्ता नगरीक प्रतापे।
नहि तँ मरितहुँ बिकौए बनि,
झा,बी.के. नाम भेल।

दूध

महीस लागल छल लागय,
बहिन दाइक ठाम।
पहुँचलहुँ आस लेने,
ठाँऊ भेल बैसलहुँ ओहि गाम।
दूध छल जाइत औँटल,
मुदा बहिन दाइकेँ गप्पमे
होस नहि रहल।
भोजन समाप्ते प्राय छल,
दूध राखल औँटाइते रहल।
कहल हम हे बहिन दाइ,
अबैत रही रस्तामे देखल,
साँप एक बड़-पैघ,
एतयसँ ओहि लोहिया धरि,
दूध जतय औँटाइछ।
ओह भैया बिसरलहुँ हम,
दूध रहल औँटाइत,
मोनमे बात ततेक छल घुमरल,
होश कहाँ छल आइ।
दि’न

विवाह दिन तकेबाक बात,
युवक बाजल पंडितजी अहूँ,
नहि बुझलहुँ अमेरिकाक प्रगति,
ओतय के दि’न तकबैत अछि कहू।
अहाँ अधखिज्जू विद्वान सुनू।
हमर तकलाहा दिनमे विवाह कय,
झगड़ा-झाँटि करितहु बुझु,
जिनगी भरि पड़ै अछि निमाहय।
ओतय बिनु दिनुक विवाह,
भोरसँ साँझेमे भय जाइछ समाप्त।


पुत्रप्राप्ति
लुधियानाक मन्दिर पर रहैत छी,
पूजा पाठ करैत छी।
कहैत छी अहाँ ठकि कय हम खाइत छी,
गाममे तँ एक साँझ भुखले रहैत जाइत छी।
दस गोटेकेँ पुत्र प्रप्तिक आशीर्वाद देल,
पाँचटाकेँ फलीभूत भेल।
पुत्री जकरा भेलैक से हमरा बिसरि गेल,
मुदा पुत्रबला कएलक हमर प्रचार,
मिथिलाबाबाकेँ ठक कहैत छह,
गामक हमर ओ’ दियादी डाह।

कोठिया पछबाइ टोल

बूढ़ छलाह मरैक मान,
पुत्र पुछल अछि कोनो इच्छा,
जेना मधुर खयबाक मोन,
नीक कपड़ा पहिरबाक मोन,
फल-फूल खयबाक मोन।
कोठाक घर बनयबाक इच्छा,
पूर्ण भय पायत किछु सालक बादे,
कहू कोनो छोट-मोट इच्छा,
पूर करब हम ठामे।

हौ’ कहितो लाजे होइत अछि,
पछिबारि टोल कोठियाक रस्ता,
दुरिगरो रहला उत्तर ओकरे धेलहुँ,
जाइत दुर्गास्थान कारण,
टोल छल ओ’ अडवांस्ड।
मोनमे लेने ई इच्छा जाइत छी,
जे ओहि टोलमे होइत विवाह।
कहैत तावत हालत बिगड़ि गेलन्हि,
ओ’ बूढ़ स्वर्गवासी भेलाह।

कैप्टन
वॉलीवॉलमे खेलाइत काल,
पप्पू भाइक होइछ हुरदंग,
खेलायब हम फॉरवार्डसँ,
नहि नीक खेलैत छे नीक,
आगू खेलाय देखैब हम।
सभ सोचि विचार कय,
बनाओल कैप्टन पप्पू भायकेँ,
टीमक हारि देखि कय जिद्द,
खेलाय पाछुएसँ।
फारवॉर्ड बनू अहीं सभ
नहि तँ मैच हारू आगुएसँ।
जाति
ऑफिसमे छल काज बाँझल,
किरानी पर एकगोट तमसायल।
कोन जातिक छी अहाँ,
धैर्य आब नहि बाँचल,
दशो लोककेँ कैक दिनसँ छी झुट्ठो घुमाओल।

छाती ठोकिकय जातिक नाम छल ओ’ बाजल,
दसोलोकक दिशि निन्गहारि ताकल,
ताहिमेसँ एक सजाति उठल बाजल,
घोल-आसमर्द्दक बीच कहलक नहि बाजू,
जातिक नाम धय कय,
ई यादि राखू।
काज अछि हमरो बाँझल,
मुदा जातिक अछि बात जौँ,
अछि कलेजावला जाति ई,
से काज कतबो लेट हो।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...