Thursday, July 17, 2008

सन सत्तासीक बाढ़ि

सन सत्तासीक बाढ़ि

कमलामहारानीकेँ पार कएल पैरे,
बलानकेँ मुदा नाउक सहारे।
मुदा आइ ई की भेल बात,
दुनू छ’हरक बीच ई पानि,
झझा देत किछु कालमे लियऽ मानि।

चरित्रक ई परिवर्तन देलक डराय,

नव विज्ञानक बात सुनाय।
बाँध-बाँधि सकत प्रकृति की?
भीषण भेल आर अछि ई।
हृदयमे देलक भयक अवतार,
देखल छल हम गामक बात।
बड़का क’लम आ’ फुलवारीमे,
बड़का बाहा देल छल गेल;
पानिक निकासी होइत छल खेल।
नव विज्ञानी ई की केलथि,
बाहा सभटा बन्न भऽ गेल।
फाटक लागल छहरक भीतर,
बालु मूँहकेँ बन्न कय देल।
एक पेड़िया पर छलहुँ चलल हम,
आरिये-आरिये, देखल रुक्ष।
पहिने छल अरिया दुर्भिक्ष,
आब दुर्भिक्ष अछि छुच्छ।
सिल्ली, नीलगाय सभटा सुन्न,
उपनयनमे शाही काँट अनुपलब्ध।
जूड़िशीतलक भोगक छल राखल,
गाछक नीचाँ सप्ताह बीतल।
नहि क्यो वन्यप्राणी आयल खाय,
चुट्टीक पाँत पसरायल जाय।

छहरपर ठाढ़ अभियन्ताक गप,
छलहुँ सुनैत हम निर्लिप्त।
मुदा जाहि धारकेँ कएल पैर पार,
तकर रूप अछि ई विस्तार।
नवविज्ञानिक चरित्रानुवाद होयत एहन नहि छल हम जानल,
मुदा देने छल ओकरा दुत्कार,
कुसियारक किछु गाछ,पानिक बीचमे ठाढ़।
माटिक रंगक पानि,आ’ हरियर कचोड़ गाछ,
छहरक ऊपरसँ झझायल पानि,
लागल काटय छहरकेँ धारक-धार।
ठाम-ठाम क़टल छल छहर,
ऊपरसँ बुन्नी परि रहल।
सभटा धान-चारु,भीतक कोठी,
टूटि खसल,पानिक भेल ग्रास।
हेलिकॉप्टरसँ खसल चूड़ा-गूड़,
जतय नहि आयल छल बाढ़ि,
किएकतँ पानिमे खसाकय होयत बर्बाद।
हेलीकॉप्टरक नीचाँ दौड़ैत छल भीड़,
भूखल पेट, युवा आ’ वृद्ध।
ओ’ बूढ़ खा’ रहल छथि चूड़ा-गूड़,
बेटा-पुतोहुक शोक की करि सकत पेटक क्षुधा दूर?

एकटा बी.डी.ओ.क बेटा छल मित्र,
कहलक ई सरकार अछि क्षुद्र,
ओकरा पिताकेँ शंटिंग केलक पोस्टिंग,
गिरीडीह सँ झंझारपुरक डिमोशन, कनिंग।
मुदा भाग्यक प्रारब्ध अछि जोड़,
आयल बाढ़ि पोस्टिंग भेल फिट।
सोचलहुँ जे हमरेटा प्रारब्ध अछि नीच,
शनियो नीच, सरस्वती मँगेतथि की भीख?
पहुँचलहुँ गाम, पप्पू भाइक मोन छोट,
विकासक रूपरेखा, जल-छाजन,निकासी..,...
बात पर बात फेर सरकारक घोषणा,
बाढ़ि राहत, एक-एक बोरा अनाज,
सभ बोरामे पंद्रह किलो निकाललथि ब्लॉकक कर्मचारी।
बूरि छी पप्पू भाई अहूँ,
मँगनीक बरदक गनैत छी दाँत,
पिछला बेर ईहो नहीं प्राप्त।
हप्ता दस दिनक बादक बात,
क्यो गेल बंबई,क्यो धेलक दिल्लीक बाट;
गाममे स्त्री,वृद्ध आ’ बच्चा,
बंबईमे तँ तरकारी बेचब,बोझो उठायब;
सभ क्यो केलक ई प्रण,
मायक स्वप्न अछि कोठाक होय घर,
अगिलहीक बाद फूस आ’ खपड़ा,
पुनः बनायल बखाड़ी जखन भेल बखड़ा।
भने भसल बाढ़िमे भीत,
बनायब कोठाक घर हे मीत।
खसल लागल ईंटा गाममे,
कोठा-कोठामे भेल ठाम-ठाममे।
पुरनका कोनटा सभ गेल हेराय,
जतय हेरयबाक नुक्का-छिप्पी खेलायल ह’म भाय।
आब सुनु सरकारक खटरास,
आर्थिक स्थिति सुधारल
ह’म मेहथमे क’ खास।
आदर्श ग्राम प्रखंडक एकरा बनाओल,
कहैत छी जे ह’म बंबई दिल्लीमे कमाओल,
सुनु तखन ई बात,
जौं रहैत अस्थिर सरकार,
तँ रहैत नहीं दिल्ली नहि बम्मई,
विजयनहरम साम्राज्यक हाल,
पुरातात्विककेँ अछि बूझल ई बात।
धन्यभाग ई मनाऊ,
हमरा जितबिते रहू हे दाऊ।
प्रगति-परिश्रम अहाँ करू,
हमर समस्यासँ दूर रहू।
बाढ़ि आयल सत्तासीमे,
तबाही देखलहूँ,
मुदा कहैत छी हम,
देखू आबाजाहीकेँ।

धन्यभाग हे नेता भाई,
अहीसँ तँ मनोरंजन होइत अछि,
मेला-ठेला खतम भय गेल,
हुक्कालोली भेल दिवाली,
आ’ जूड़िशीतलक थाल-कादो-गर्दा
भेल होली।
तखन अहूँक बात सुनने दोष नहि ,
कमायलेल हमहूतँ दिल्ली-बंबई आयल छी,
कमसँ कम अहाँक ई बड़कपन,
जे गामकेँ नहि छोड़ल,
मनोरंजनो करैत छी,
कमाइतो छी,खाइतो छी।
आ’ दिल्ली बंबइ सेहो घुमैत छी।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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