Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ ) ११. बालानां कृते-१.कौआ आऽ फुद्दी-गजेन्द्र ठाकुर२. देवीजी: विद्यार्थी बनल माली- ज्योति झा चौधरी

११. बालानां कृते-
१.कौआ आऽ फुद्दी-गजेन्द्र ठाकुर
२. देवीजी: विद्यार्थी बनल माली- ज्योति झा चौधरी
1.कौवा आऽ फुद्दी


चित्र: ज्योति झा चौधरी
एकटा छलि कौआ आऽ एकटा छल फुद्दी। दुनूक बीच भजार-सखी केर संबंध। एक बेर दुर्भिक्ष पड़ल। खेनाइक अभाव एहन भेल जे दुनू गोटे अपन-अपन बच्चाकेँ खएबाक निर्णय कएलन्हि। पहिने कोआक बेर आयल। फुद्दी आऽ कौआ दुनू मिलि कए कौआक बच्चाकेँ खाऽ गेल। आब फुद्दीक बेर आयल। मुदा फुद्दी सभ तँ होइते अछि धूर्त्त।
“अहाँ तँ अखाद्य पदार्थ खाइत छी। हमर बच्चा अशुद्ध भए जायत। से अहाँ गंगाजीमे मुँह धोबि कए आबि जाऊ”।
कौआ उड़ैत-उड़ैत जंगाजी लग गेल-
“हे गंगा माय, दिए पानि, धोबि कए ठोढ़, खाइ फुद्दीक बच्चा”।
गंगा माय पानिक लेल चुक्का अनबाक लेल कहलखिन्ह।
आब चुक्का अनबाक लेल कौआ गेल तँ ओतएसँ माटि अनबाक लेल कुम्हार महाराज पठा देलखिन्ह्। खेत पर माटिक लेल कौआ गेल तँ खेत ओकरा माटि खोदबाक लेल हिरणिक सिंघ अनबाक लेल विदा कए देलकन्हि। हिरण कहलकन्हि जे सिंहकेँ बजा कए आनू जाहिसँ ओऽ हमरा मारि कए अहाँकेँ हमर सिंघ दऽ दए। आब जे कौआ गेल सिंघ लग तँ ओऽ सिंह कहलक- “हम भेलहुँ शक्त्तिहीन, बूढ़। गाञक दूध आनू, ओकरा पीबि कए हमरामे ताकति आयत आऽ हम शिकार कए सकब”।
गाञक लग गेल कौआ तँ गाञ ओकरा घास अनबाक लेल पठा देलखिन्ह। घास कौआकेँ कहलक जे हाँसू आनि हमरा काटि लिअ।
कौआ गेल लोहार लग, बाजल-
“हे लोहार भाञ,
दिअ हाँसू, काटब घास, खुआयब गाय, पाबि दूध,
पिआयब सिंहकेँ, ओऽ मारत हरिण,
भेटत हरिणक सिंघ, ताहिसँ कोरब माटि,
माटिसँ कुम्हार बनओताह चुक्का, भरब गङ्गाजल,
धोब ठोर, आऽ खायब फुद्दीक बच्चा”।
लोहार कहलन्हि, “हमरा लग दू टा हाँसू अछि, एकटा कारी आऽ एकटा लाल। जे पसिन्न परए लए लिअ”।
कौआकेँ ललका हाँसू पसिन्न पड़लैक। ओऽ हाँसू धीपल छल, जहाँ कौआ ओकरा अपन लोलमे दबओलक, छरपटा कए मरि गेल।

2.देवीजी विद्यार्थी बनल माली

एकटा बच्चा छलै जे छलै बड़ा खुरापाती।विद्यालय आबैत काल ओ रस्ताक सब फूल पात नोचने आबै छलै।विद्यालयमे सेहो फूलक गाछ के नोइच कऽ राइख दैत छल।अतब्ैा नहि ओ आनो बच्चा सबके उकसाबै छल।ओकर संगी साथी सब सेहो संगतक प््राभावे बड उपद्रवी भऽ गेल।तंग भऽ विद्यालय के माली प््राधानध्यापक लग अपन समस्या बाजल ''महोदय हम बच्चा सबहक खुरापात सऽ बड तंग छी।हम्मर दिन भरिक मिहनत ई सब क्षण भरि मे मटियामेट कऽ दैत अछि आ हम्मर बातक मोजर सेहो नहि दैत अछि।च्च् ताही पर प््राधानाध्यापक ओकरा आश्वासन देलखिन ''हम एहि पर अवश्य कार्यवाही करब।हम एहन बच्चा सभके दंडित करब।च्च्
जखन देवीजी के अहि बातक खबरि लगलैन तऽ ओ स्वयम्‌ माली सॅं बात क बालक के पता केलीह फेर ओकरा सभके बजा कऽ पुछलखिन ''अहॉ सभ एहेन काज कियैक करै छी। बेचारा माली रौद बसात मे काज करैत अछि आ अहॉ सभ उारे ओकर परिणाम नहि आबैत छै। अहॉं सभके नहि ईच्छा होइत अछि विद्यालय के सुन्दर बनाब के।च्च् ताहि पर कियो बजलै ''हमरा सभके तितली पकड़नाई नीक लागैत अछि आ तितली सभत फूले पर बैसैत छै।च्च् आब देवीजीके फसादक जड़ि ज्ञात भेलैन।ओ प््राधानाचार्य सॅं आदेश पाबि सभ बच्चा सभके छुट्रटी वला दिन विद्यालय बजेलखिन। माली सेहो आयल।
देवीजी खेले खेलमे सभके बागवानी सिखेलखिन। सभके मिलकऽ काज केनाइ ततेक नीक लागल जे क्षण भरिमे सभ टूटल मरल गाछ सभ हटा नब फूलक गाछ लागि गेल। देवीजी सभके कहलखिन जे जॅं ई गाछ सबके कियो तोड़त नहि त कञिये दिनमे अहि मे सुन्दर सुन्दर पुष्प लागत जाहि सॅं आकर्षित भऽ तितली के जमौड़ा लागत।संगहि देवीजी तितली के पकड़ सॅ मना केलखिन।ओकरा सुन्दरता दूर स देख के शिक्षा देलखिन।सभ बच्चा आह्‌लादित छल तैं उत्पात बन्द कऽ देलक। प््राधानाचार्य अहि परिवर्तन सॅं प््राभावित भेला।
किछुए दिन बाद गाछमे फूल लाग लगलै।आ संगहि तितलीक आगमण सेहो बढ़ि गेल। आब खाली समय निकाइल कऽ देवीजी संग बच्चा सभ ओहि दृष्यक आनन्द लेब लागल।उपद्रवी बच्चा सभसॅं सकारात्मक काज करबाबऽ लेल देवीजीके सभसॅं प््राशंसा भेटलैन।
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बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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