Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ )४.महाकाव्यमहाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ)

४.महाकाव्य
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ) ------
५.उद्योग पर्व
करए लगलाह पांडव युद्धक तैयारी विराट द्रुपदक संग पाबि
लगाए कुरुक्षेत्र लग पांडव रुकलाह शिविर पसारि।
दुर्योधनकेँ जखन लागल खबरि ओहो कएलक तैयारी,
संदेश पठाओल राजा सभकेँ कौरव पांडव तखन,
अपन पक्षमे करबा लेल युद्ध शुरु होएत जखन।
कुरुक्षेत्रक स्थलीमे सभटा जुटान लागल होए शुरू,
यादव गणकेँ पक्ष करबा लए दुर्योधन द्वारका गेल स्वयं।
पहुँचि दुर्योधन गेल देखल कॄष्ण छलाह सुतल ओतए,
अर्जुन सेहो पहुँचल पैर दिशि बैसि गेल ओऽ ओतए।
कृष्ण जखन उठि देखल अर्जुन छल ओतए,
कहू वत्स की चाही अहाँ आयल छी एतए।
युद्धमे संग अहाँक हमरा चाही हे नारायण,
अर्जुनकेँ बजिते दुर्योधन टोकल अएलहुँ पहिने एतए।
कृष्ण कहल हम शस्त्र नहि उठाएब युद्धमे,
नारायणी सेना चाही वा हमरा करब अँह पक्षमे।
दुर्योधन नारायणी सेना चुनि भेल संतुष्ट ऒऽ,
अर्जुनकेँ नारायण भेटल छल प्रफुल्लित सेहो।
पांडव मामा छलाह शल्य माद्रीक भाइ जे,
आबि रहल युद्धक लेल दुर्योधन सुनि गेल ओतए।
रस्तामे व्यवस्था-बात कएल तेहन छल,
शल्य कहल अछि मोन पुरस्कृत करी काज जकर।
दुर्योधन भेख बना जाए रहल छल ओतए,
प्रकट भए माँगल युद्धमे होऊ साहाय्य हमर,
एहि सभ व्यवस्थाक छी हमही निर्माण कएल।
शल्य दए स्वस्ति पहुँचलाह जखन कुरुक्षेत्र,
युधिष्ठिर सुनू छल भेल हमरा संग अतए।
कौरवक पक्षमे युद्ध करबा लए वचन बद्ध,
कहू कोन विध होए साहाय्य अहाँक व्त्स।
युधिष्ठिर कहल बनू सारथी कर्णक आऽ कर्रू,
हतोत्साहित कर्णकेँ गुणगान गाबि पांडवक।
शल्य कौरवक शिविर दिशि चललाह तखन,
युद्ध सन्निकट अछि कृष्ण अएलाह जानि सेहो,
एतए सुनल द्रुपदक पुरहित गेल छल धृतराष्ट्र लग।
संधिक प्रस्ताव पर देलक क्यो नहि टेर ओतए,
दुर्योधन कहल राज्य छोड़ू सुइयाक नोक देखने छी?
नहि भेटत पृथ्वी ओतबो राज्यक तँ छोड़ू बात ई।
युधिष्ठिर कहल श्रीकृष्णकेँ आध राज्य छोड़ैत छी,
जाऊ कृष्ण पाँच गाम दुर्योधन देत जौँ राखू ई प्रस्ताव,
ओतबहिमे करब हम सभ भाँय मायक संग निर्वाह।
सात्यकीक संग कृष्ण हस्तिनापुरक लेल चलला जखन,
द्रौपदी कहलन्हि देखू केश फुजले अछि ओहिना धरि एखन,
कानि कहल सँधि होयत युद्ध बिन खुजले रहत वेणी तखन।

कृष्ण कहल मानत नहि सँधिक गप कखनहु दुर्योधन,
युद्ध अछि अनिवार्य मनोरथ पूर्ण होयत द्रौपदीक अहँक।

कृष्ण जखन गेलाह हस्तिनापुर सभ प्रसन्न छल,
धृतराष्ट्र, दुःशासन-दुर्योधनक संग स्वागत कएल।
मुदा कृष्ण ओतए नहि ठहरि दीदी कुन्तीक लग गेलाह,
विदुरक गृहमे छलीह ओतए गप विस्तृत भेल आब।
कहल कुन्ती दीदी जाऽ कए कर्णकेँ परिचए दिअ,
आबि जाएत भ्रातृ-पाण्डव लग सत्य ओऽ जानि कए।

दोसर दिन सभामे पहुँचलाह कृष्ण छल ओतए मुदा,
दुर्योधन विचारल बान्हि राखब कृष्णकेँ अएताह जौँ।
भीष्म धृतराष्ट द्रोण कृप कर्ण शकुनि दुःशासन ओतए,
कृष्ण कहल शकुनिक चौपड़ दुर्योधनक दिशिसँ फेकब,
अन्यायपूर्ण छल ओहिना द्रौपदीक अपमान छल करब।
विराट पर आक्रमण पाण्डवकेँ सतेबाक उपक्रम बनल,
आध राज्य जौँ दए दी तखनो शान्तिसँ रहि सकैछ सभ।
सभ कएल स्वागत एकर दुर्योधन मुदा क्रोधित बनल,
कृष्णकेँ बन्हबाक आज्ञा देलक भीष्म तमसयलाह बड़।
तेज कृष्णक मुखक देखि कौरव भयसँ छल सिहरल।
दुर्योधन कहल पिता ज्येष्ठ हमर अंध छलाह से राज्य नहि भेटलन्हि,
हुनक पुत्र ज्येष्ठ हम से अधिकार हस्तिनापुर पर अछि सुनलहुँ।
पाण्डव अन्यायसँ लए राज्य करए छथि तैय्यारी युद्धक,
कृष्ण अछि पाछाँ ओकर हम तँ रक्षा राज्यक करए छी।
कृष्ण कहलन्हि तखन पाँच गाम दिअ करबाऽ लए निर्वाह,
मुदा दुर्योधन कहल राज्यक भाग नहि होएत गए आब।
कृष्ण बाजि जे हे दुर्योधन मदान्ध छी बनल अहाँ,
पाण्डवक शक्त्तिक सोझाँ नाश निश्चित बुझू अहाँक।

कुन्ती बादमे गेलीह कर्णकेँ कहल दुर्वासाक मंत्र भेटल,
पढ़ल सूर्यकेँ स्मरण कए पुत्र हमर भेलहुँ अहाँ तखन।
प्रणाम कएल माताकेँ कर्ण तखन बजलीह सुनू ई,
ज्येष्ठ पाण्डव छी अहाँ राज्य युधिष्ठिर देत अहीकेँ।
जखन नहि मानल कर्ण कुन्ती पुछल मातृऋणसँ,
उबड़ब कोना कर्ण बाजल हे माता तखन सुनू ई।
अर्जुनकेँ छोड़ि चारू पाण्डवसँ नहि लड़ब पूर्ण शक्त्तियेँ,
अर्जुनकेँ मारब तखन बनब पुत्र अहीकेँ।
वा मरब हम पुत्र तैयो पाँच टा रहबे करत,
ई प्रतिज्ञा हम करए छी माता कुन्ती अएलीह घुरि।

कृष्ण आबि घुरि पहुँचि शिविर पाण्डवक जखन,
पाण्डव युद्धक कएल प्रक्रिया शुरू ओतए तखन।
सात अक्षौहिणी सेना घोड़ा, रथ, हाथी, सैनिकक,
अर्जुन भीम सात्यिकि धृष्टद्युम्न द्रुपद विराट लग।
कौरव सेहो एगारह अक्षौहिणी सेना कृपाचार्य शल्य भूरिश्रवा,
भीष्म द्रोण कर्ण अश्वत्थामा जयद्रथ कृतवर्मा भगदत्त छल।
धृष्टद्युम्न सेनापति पाण्डवक भीष्म कौरवक बनल,
कर्ण शस्त्र नहि उठेबाक कएल प्रतिज्ञा
भीष्म यावत युद्धक्षेत्रमे रहताह गए।
भीष्म कहल मारब नहि पाण्डवकेँ एकोटा,
सेनाक संहार करब यथा संभव होएत।

ब्यास धृतराष्ट्रक लग गेलाह कहल ब्यासजी सुनू,
अंधत्व भेल वर हमर कुल संहार देखब नहि किएक।
मुदा वीरक गाथा सुनबाक अछि इच्छा बहुत,
ब्यास देल योगसँ दिव्यदृष्टि संजयकेँ कहल,
बैसले-बैसल देखि संजय वर्णन करताह युद्धक,
बाजि ई ब्यास बिदा भए गेलाह ओतएसँ।

६. भीष्म पर्व
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...