Thursday, July 17, 2008

पेटार ३

तानपूरा
अशोक

विनोद बाबू सरकारी लोक छथि। सरकारी अधिकारी। वित्त अंकेक्षक। काजमे काज रहनि सरकारी आॅफिस सभक आॅडिट केनाइ। खर्चा आ आमदनीक हिसाब-किताब देखनाइ। नियम-कानूनक आधार पर ओकर जाँच करब। एहि लेल कार्यक्रमक अनुसार विभिन्न सरकारी कार्यालय जाए पड़ैत छनि। बस-टेªनसँ यात्रा कर’ पड़ैत छनि। विभिन्न स्थान पर ठहर’ पड़ैत छनि। अकच्छ भ’ जाइ छथि। अकच्छ ओ अपन काजोसँ छथि। एक त’ ई काज हुनका बोर टाइप के काज बुझाइ छनि। दोसर, एहिमे झँझटि सेहो लगै छनि। आॅडिटसँ ल’ क’ यात्रा धरिमे झँझटिए... ओ झँझटिसँ छीह कटैत रहै छथि। जेना अपन स्वभावसँ लाचार भ’ गेल छथि ओ। मुदा झँझटिकेँ एहिसँ की लेना-देना छै। ओहो अपन स्वभावसँ लाचार अछि। ई झँझटि विनोद बाबूकेँ कत्तहु, कोनो ठाम उपस्थित भ’ जाइत छनि। कोनो रूपमे उपस्थित भ’ जाइत छनि। अपन मुख्य कार्यालयमे जत’ आॅडिट करैत रहै छथि, आॅडिटक दरमियान जत’ ठहरल रहै छथि। बस मे, टेªन मे, टीशन पर, बस स्टैंड पर, सड़क पर आ घरमे त’ सहजहिं। घरक झँझटि हुनका लेल जनमारा भ’ जाइत अछि। सभ ठामसँ थाकि-हारि जखन घर अबैत छथि त’ चाहैत छथि जे कने आराम हुअए। अबितहि पैंट-शर्ट खोलि लुंगी पहीरि पड़ि रहै छथि। डेरा पहुँचला पर जँ हुनका पैंट-शर्ट खोलैत देखब त’ हुनकर स्वभाव छने मे बुझि जाएब। पैंट-शर्टक बटन सभ ओहि कालमे हुनकर बड़का शत्राु भ’ जाइत अछि। तैं अक्सर अही कालमे हुनकर कपड़ाक बटन सभ टुटैत छनि। बटन सभकेँ धराशायी करबाक विजय-बोध मुदा बेसीकाल रहि नइं पबैए। पत्नीक तामस सदेह उपस्थित भ’ जाइत अछि आ एहि प्रकारेँ पुनः एक नव झँझटि बजरि जाइए।
-आहि रे बा, फेर आइ बटन तोड़ि देलिऐ?
-तोरबै नइं त’ की। अकच्छ केने रहै अछि। जल्दी खुजिते नइं रहैए।
-त’ एहिमे बटन के दोष छै?
-बटन के दोष छै नइं त’ की हमर दोष अछि? अहाँ त’ सदिखन हमरे दोष देब।
-अहाँक दोष नइं अछि त’ ककर दोष छै? एतेक खीचि-तोड़ि क’ कतहु बटन खोलल जाइ। सभटा तामस ओकरे पर झाड़ि दैत छिऐ।
-हमर तामससँ अहाँकेँ की लेना-देना अछि?
-की लेना-देना अछि? बटन हमरे लगब’ पड़ै अछि ने। कहियो अपने लगबैत छी अहाँ? एक दिन लगा क’ देखियौ ने त’ बुझबै।
-की बुझबै? हमरा बुते लगौल नइं हैत की? हमरा अहाँ एतेक अपटु बुझैत छी?
-आब हम से कोना कहू? बटन लगाइयो लेब त’ सौंसे आँगुर सुइ भोंकि लेब।
-एहिमे अहाँकेँ की हैत? हमरे कष्ट हैत ने? हमर कष्ट त’ अहाँकेँ नीके लगैत अछि।
विनोद बाबू आ हुनक पत्नी मायाक एहि तरहक वात्र्तालाप घरमे बेसी काल सुनल जा सकैत अछि। एहन गप्प-सप्प होइते रहै अछि। एही क्रममे मायाक मोन कहियो फाटि जाइत छनि त’ कहियो विनोद बाबूक दिमाग सुन्न भ’ जाइत छनि। दुनूक बीच मुहाँबज्जी बन्द भ’ जेबाक प्रबल सम्भावना सेहो उपस्थित होइत रहै छनि। बन्दी आ हड़तालक अवधि एक घंटासँ ल’ क’ चारि दिन धरि एखन तक रहल अछि। कोनो ने कोनो प्रकारेँ फेर समझौता भइए जाइत अछि। आब ई समझौता जेना हुअए। जत्ते काल टिकए। एहि पूरा प्रकरणमे सभसँ बेसी कठिन समय विनोद बाबूक लेल तखन होइत छनि, जखन माया कान’ लगैत छथिन। मायाक कननाइ हुनका सभ दिन बरदास्तसँ बाहर बुझाइत छनि। हुनका लाग’ लगैत छनि जेना बीच बाजारमे क्यो हुनकर इज्जति उतारि रहल होनि। ओ बेइज्जत भ’ रहल होथि। अपन इज्जत नुका क’ रखबाक चक्करमे ओ बहुधा बेइज्जत होइत रहै छथि। हुनकर धर्मपत्नी माया, नोर चुबबैत रहै छथिन। मायाक नोर तेजाब सन हुनकर देह-मोनकेँ गलबैत रहैए। तेहन स्थिति उत्पन्न नइं हुअ’ देबाक चक्करमे सेहो ओ विखिन्न रहै छथि। तैं झँझटिकेँ कतियबैत रहै छथि। टारैत रहै छथि। आर बेसी लाचार होइत रहै छथि।
आइ मुदा घर पहुँचला पर हुनकर मोन प्रसन्न रहनि। पुरैनियाँसँ आॅडिट क’ कए घुरल रहथि। ट्रांसपोर्ट आॅफिसक आॅडिट रहै। बेस स्वागत-सत्कार भेल रहनि पाँच दिन धरि। भोजन-साजन। बर-विदाइ। डेरा धरि विभागीय गाड़ीसँ पहुँचा देने रहनि। आनन्दमे छलाह। कोनो पुरनका गीतक भास गुनगुनाइत घरमे प्रवेश केलनि त’ माया ड्राइंगरूममे बैसल छलखिन। पतिकेँ देखि अकचकेली ओ। एहि दुआरे नइं जे अकस्मात् आबि गेल छलखिन। एहि दुआरे जे ओ गुनगुना रहल छलाह। ओ गुनगुना रहल छलाह ओहि गीतक भास, जे बियाहक बाद सभसँ पहिने मायाकेँ सुनौने रहथिन। ‘बनके चकोरी गोरी झूम-झूम नाचो री।’ मायाकेँ धक्कसँ मोन पड़ि जाइत छनि। मायाकेँ मुसकुराइत तकैत छथि। मुदा माया पर एकर कोनो असरि नइं होइत छनि। हुनकर मोनकेँ आइ दोसरे चिन्ता घेरने छनि। पन्द्रह वर्षक बेटाक चेहरा बेर-बेर मोन पड़ि अबैत छनि। तैं ओ गम्भीर बनल रहै छथि। मुदा विनोद बाबू त’ आइ मस्त छलाह।
-श्रीमती जी, अहाँकेँ मोन अछि, ओ जे हम पहिल बेर अहाँकेँ सुनौने रही? आह, की गीत छै? आ हे, ओ गीत जखन हम सुनबैत रही तखन जे अहाँ नीचाँ ताकि क’ हँसी, से जे सुन्दर लगैत छल।-विनोद बाबू आबेससँ मायाकेँ देखि रहल छलाह। मुदा माया किछु नइं बजलीह। ओहिना गम्भीर भेल बैसल रहलीह। विनोद बाबूकेँ कोनादन लगलनि। आइ ओ प्रसन्न छलाह। ई अवसर कहियो काल अबैत छलै, जखन ओ एतेक प्रसन्न होथि। अपन प्रसन्नतामे ओ पत्नीक सहभागिता चाहैत छलाह। मुदा जखन ओ सम्मिलित नइं भेलखिन, त’ हुनकर मोन लोहछि गेलनि।
-की बात छै? किऐ आइ घुघना लटकौने छी? कने हँसब-बाजब से नइं?
-हँसब-बाजब हमर करममे रहए तखन ने। कखनो अहाँ हँसी छीनि लैत छी, कखनो बेटा छीनि लैत अछि। सेहो सभटा अहीं दुआरे।
-से की? हमरा दुआरे की? की कहै छल गौतम?-विनोद बाबू गम्भीर हुअ’ लागल छलाह।
-कहै छल जे पापाकेँ पाँच माससँ कहि रहल छिअनि जे हम संगीत सीख’ चाहै छी, मुदा ओ ध्याने नइं दै छथि। ताहि पर हम कहलियै जे पढ़ाइ-लिखाइ करबह से नइं। ई संगीत सिखबाक कोन धुनि सवार भ’ गेल छह? एहि बात पर तमसा क’ की-की ने कहलक। कहै छल जे पापा बेर-बेर ठकि दै छथि। हमरा बड़ क्रोध भेल। आइ, दू थापड़ मारबो केलियै अछि बहुत दिन पर।
विनोद बाबू आब गम्भीर भ’ गेलाह। गौतमक संगीत सिखबाक जिद्द हुनका पसिन्न नइं छलनि। ओना ई फराक बात जे ओ अपनहु कहियो संगीत सिखबाक कोशिश केने छलाह। किछु दिन सिखनहुँ छलाह। मुदा अन्तमे छोड़ि देने रहथि। तहिया विनोद बाबूक पिता जूट मीलमे काज करैत छलखिन। मीलेक एकटा क्वार्टरमे हुनकर डेरा रहनि। जूट मीलक ई नोकरी हुनका तीन-चारि टा काज-धन्धाक बाद भेटल छलनि। एकटा मारवाड़ी सेठक ओहि ठाम नोकरी केने रहथि। बच्चा सभकेँ पढ़ाबथि। एक दिन सेठानी बाजारसँ तरकारी आनि देबाक लेल कहलकनि त’ ट्यूशन छोड़ि देलनि। कोनो बाबू साहेबक ओहि ठाम सेहो खेती-बारीक व्यवस्था देखबाक लेल नियुक्त भेल छलाह, मुदा एक दिन बाबू साहेब कोनो बात पर बिगड़ि क’ पजेबाक एकटा खण्ड उठा क’ फेकलखिन, त’ नोकरीकेँ लात मारि अएलाह। किछु दिन गाम पर खेती-बारी केलनि। संयुक्त परिवार रहनि। चारि भाइक भैयारी। खूब मेहनति करथि। मेहनतिक बल पर अन्न उपज’ लगलनि। एतेक धान हुअ’ लगलनि जे बखारी बान्ह’ पड़लनि। परिवारक स्थिति-पात नीक भेलनि। जाहि परिवार के बेसाह पर गुजर चलैत छलै, से भरि वर्ष अपन खेतक अन्न खा जीब’ लागल। मुदा ई स्थिति बेसी दिन नइं रहि सकलनि। भैयारीमे भिन्न-भिनाउज भ’ गेलनि। खेत जमीन बँटाएल त’ हुनकर मोन टूटि गेलनि। बँटाएल जमीन पर गुजरो सम्भव नइं छलनि। गाम छोड़ि पुनः शहर अएलाह। जूट मीलमे नोकरी शुरू केलनि। मिडिल पास रहथि। अँग्रेजी आ हिसाबक नीक ज्ञान रहनि। मेहनतिक बल पर लेखा-शाखामे किरानी भ’ गेल रहथि। बहुत खट’ पड़नि। मुदा लेखा पदाधिकारीकेँ कहियो कोनो शिकाइतक मौका नइं देलखिन।
मील काॅलोनीक बगलेमे राधाकृष्णक एकटा भव्य मन्दिर रहै। दरभंगा राजक रानी लक्ष्मीवती बनबौने रहथिन। ओहि मन्दिर पर झूलनमे खूब गीत-नाद होइ। राशि-राशि के गबैया सभ जुटए। राति भरि पकिया गानासँ ल’ कए लोकगीत धरि श्रोताक मोनकेँ झुमा दिअए। जूट मीलक कर्मचारी, मजदूर ओहि श्रोतामण्डलीमे बेसी संख्यामे रहै छल। विनोद बाबू बारह-तेरह वर्षक रहथि। हुनका भेल रहनि जे गबैया बनितहुँ। पिताकेँ कहलखिन-बाबूजी, हम गबैया बन’ चाहैत छी।-पिता कने काल चुप्प भ’ गेल छलखिन। ई हुनकर आदति छलनि। कोनो बात आ प्रस्ताव पर ओ तुरन्त सहमति-असहमति व्यक्त नइं करै छलाह। कने कालक बाद बजलाह-अहाँकेँ गीत गाब’ अबै अछि?
-हँ, सुना दी?-विनोद उत्फुल्ल भेल रहथि।
-सुनाउ।-पिता कहलखिन। विनोद एकटा गबैया द्वारा गाओल जे गीत हुनका मोन छलनि, सुनाब’ लगलाह-
गौरा तोर अँगना
बड़ अजगुत देखल तोर अँगना
गौरा तोर अँगना।
खेती ने पथारी शिवकेँ गुजर कोना?
जगतक दानी थिका, तीन भुवना
गौरा तोर अँगना।।
पिताकेँ गीत सुनि हँसी लगलनि। मुदा भेलनि, जे कण्ठ नीक छनि विनोदक। ओ कहलखिन जे-ठीक छै। व्यवस्था करैत छी।-विनोद प्रसन्न भ’ गेल छलाह। पिता अपन पत्नीसँ विचार केलनि। पत्नी कहलखिन जे-गबैया बनबाक मोन होइत छै त’ एहिमे की क्षति छै। हमर मामो त’ गबैया छथि।-पिता विचार केलनि जे गबैया नहियो बनत, तैयो संगीत त’ किछु सीखिए लेत। एहिमे कोन बेजाए छै? जीवन लेल संगीत त’ जरूरी छै। संगीत जीवनकेँ उस्सठ नइं हुअ’ दैत छै। ओ विनोदकेँ संगीत सिखेबाक लेल एकटा गुरुक खोजमे लागि गेलाह। लोक सभसँ पुछलखिन। पता चललनि जे बंगाली टोलामे एकटा किओ घोष बाबू छथि। ओ बच्चा सभकेँ संगीत सिखबै छथिन। स्थानीय स्कूलमे संगीतक टीचर छथि। घोष बाबूसँ सम्पर्क केलनि। ओ बेस आदरसँ स्वागत केलखिन। कहलखिन जे हम साँझमे दू घण्टा सिखबै छिऐ। मासमे बीस टाका फी बच्चा लै छिऐ। विनोदक पिता असमंजसमे पड़लाह। बीस टाका हुनका लेल छोट राशि नइं छलनि। काटि खोंटि कुल्लम एक सए सत्तरि टाका भेटै छलनि दरमाहा। ताहिमे पाँच व्यक्तिक परिवार। दू बेटा, एक बेटी। जेठका बेटा दसमामे पढ़ै छलनि। ओहिसँ छोट विनोद सतमामे, आ बेटी दूसरामे। सभक खर्चा-बर्चाक अतिरिक्त गाम पर रहैत माइकेँ सेहो तीन मासक खर्चा दिअए पड़नि हुनका। चारू भैयारीमे तीन-तीन मासक पार रहनि। हुनका विनोदकेँ संगीत सिखाएब कने कठिन बुझेलनि। ताहि परसँ एखन हारमोनियमक व्यवस्था सेहो कर’ पड़तनि। मुदा मासमे बीस टाकाक अतिरिक्त व्यवस्था अथवा नियमित खर्चामे कटौती त’ हुनका करहि पड़तनि। ओ ओभर-टाइम करबाक मादे सोचलनि। अपन पान खाएब बन्द करबाक मादे सोचलनि। सोचलिन जे तमाकू पर काज चला लेताह। आ ओ निश्चय क’ लेलनि। घोष बाबूकेँ कहि देलखिन जे अगिला माससँ विनोद संगीत सीखत अहाँसँ। आब हारमोनियमक समस्या रहनि। घोष बाबूक ओहि ठाम सिखबाक लेल त’ हारमोनियम रहै। मुदा घरो पर रियाज आवश्यक छलै। तैं एकटा अपन हारमोनियम एकदम्मे जरूरी रहै। दिक्कत ई रहनि जे ओत’ हारमोनियम भेटै नइं छलै। लोक कहलकनि जे कलकत्ता अथवा पटनामे भेटत। दाम द’ पता लगौलनि त’ ज्ञात भेलनि जे नीक, डबल रीडक हारमोनियम डेढ़ सएसँ कममे नइं भेटत। दू सए धरि लागि सकैए। आब ई दू सए कत’सँ आबए? सम्भवे नइं छलनि। पता लगब’ लगलाह जे कतहु ककरो ल’गमे कोनो पुरना हारमोनियम छै की नइं? पता लगलनि जे राजहातामे मिसरजी ल’ग एकटा पुरना सिंगल रीडकेँ हारमोनियम छनि। हुनकासँ सम्पर्क केलनि। ओ सहर्ष देबाक लेल तैयार भ’ गेलखिन। किऐ त’ हुनका आब एकर कोना काज नइं रहि गेल छलनि। विनोदक पिता हारमोनियम बजा क’ देखलखिन। आवाज ठीक नइं रहै। घून कैक ठाम भूर क’ देने रहै। मिसरजी कहलखिन जे एकर मरम्मति भ’ सकैत अछि। एहि छेद सभकेँ मोमसँ भरि देल जाइ त’ काज चलि जाएत। विनोदक पिता हारमोनियम डेरा पर अनलनि। भूर सभकंे मोमसँ भरलनि। हारमोनियम बाज’ लागल। विनोद संगीत सीख’ लगलाह। डेरा पर हारमोनियम बजा क’ रियाज करथि त’ सभकेँ कौतूहल होइ। नीक लागै। एवम प्रकारेँ विनोद हारमोनियमक पटरी पर हाथ बैसब’ लगलाह। सरगम सीख’ लगलाह।
सम्पूर्ण परिवारकंे नीक लागि रहल छलै। ई क्रम दू-तीन मास धरि चलैत रहल। मुदा अकस्मात् एक दिन विनोद मुँह लटकौने आपस भेलाह। कहलखिन-गुरुजी कहैत छथि जे हम संगीत नइं सीखि सकैत छी। गायक नइं भ’ सकैत छी। हमर आवाज हारमोनियमक सुरसँ मेल नइं खाइत अछि। गुरुजीक कहब छनि जे हम गबैया नइं, हारमोनियम मास्टर भ’ सकै छी। खाली हारमोनियम बजा सकैत छी।-पता लगौला पर विनोदक पिताकेँ ज्ञात भेलनि जे विनोदमे लगनके अभाव छनि। मेहनति नइं क’ पाबि रहल छथि। आगू नइं बढ़ि रहलाहे। पिता कहबो केलखिन। लगनसँ मेहनति कर’। मुदा विनोदक हृदय टूटि गेल रहनि। आब मोन नइं लगैत छलनि। क्रमशः संगीत सीखब छोड़ि देलनि। तहिया जे छुटलनि से छुटले रहि गेलनि।
मुदा छुटलाहा ओएह संगीत फेरसँ आइ सोझाँ ठाढ़ छलनि। जाहि संगीतसँ हुनकर आकर्षण-विकर्षणक सम्बन्ध छलनि से पुनः समस्या उत्पन्न क’ देने रहए। एहि बेर अपना सिखबाक नइं छलनि। बेटाकेँ सिखबाक व्यवस्था करबाक छलनि। मुदा ओ पिता सन नइं छलाह। विनोद बाबूकेँ पिता जकाँ पाइ कौड़ीक अभाव नइं छलनि। तैयो गौतमक संगीत सिखबाक विचार हुनकामे तनाव उत्पन्न क’ देने छल। ओ बेटासँ आशा लगा नेने रहथि। पढ़ि-लीखि क’ बड़का हाकिम बनत। खूब पाइ कमाओत। पाइ हुनका बेसी जरूरी बुझाइत छलनि। पाइक अभावमे ओ सेहन्ताक काज सभ नइं क’ सकल छलाह। बहुत रास सुख-सुविधाक वस्तु नइं जुटा सकल छलाह। एकटा नीक मकान। एकटा नीक रंगीन टी. वी. आ वी. सी. पी. लेबाक सेहन्ता बहुत दिनसँ दबा क’ रखने रहथि। अपन मकानमे एकटा शीशावला वार्डरोब बनब’ चाहैत छलाह, जाहिमे राशि-राशिके अँग्रेजी-फ्रेंच शराब सभ सजा क’ राख’ चाहैत रहथि। अपन मोन माफिक दोस-महिम संग कहियो काल बैसि क’ पीब’ चाहैत छलाह। उत्तेजक फिल्म देखबाक इच्छा अक्सर जोर मारैत रहनि। अँग्रेजी सिनेमा सभक चर्चा सुनथि। उमिरक एहि ढलान पर अँग्रेजी सिनेमा हुनकामे गुदगुदी उत्पन्न कर’ लागल छल। कहियो काल सिनेमा हालमे जा क’ भिनसुरका सिनेमा देखि आबथि। मुदा पत्नी संग देखबाक जे सुख छै से सुख उठेबाक हिम्मति नइं होइन। मायाकेँ ल’ क’ सिनेमा हाॅलमे नइं जा पाबथि। एक बेर मोन जोर केलकनि त’ माया लग प्रस्तावो रखलनि-सुनै छी?
-की?
-उमा मे ‘कोल्ड स्वीट’ लागल छै। भिनसरमे दस बजेसँ होइत छै। चलू ने एक दिन देखि आबी।
-धौर, ई अंग्रेजी-तंग्रेजी सिनेमा हमरा नइं नीक लगैत अछि। ई की फूरि गेल अए अहाँकेँ?
-अरे, अहाँ सभ दिन एहिना रहि जाएब। अँग्रेजी सिनेमाक सीन सब, आह, की सुन्दर होइत छै? देखबै तखन ने!
-नइं, नइं, हमरा बुते नइं हैत। खलनायक देख’ गेल रही त’ लोक सभ कोना आँखि फाड़ि क’ देखै छल।
विनोद बाबूकेँ हँसी लागि गेल छलनि। माया दिस ककरो तकैत देखि हुनको क्रोध होइत छलनि। तैं वी. सी. पी. कीन’ चाहैत छलाह। घरमे देखबाक सुविधा भ’ जेतनि। मुदा तकर जोगार नइं भ’ रहल छलनि। राँची दिस पोस्ंिटग भ’ जेतनि त’ सम्भव भ’ सकैत छलनि। मुदा राँची पोस्ंिटग लै लए जे खर्चा छलै से जुटिए नइं पबै छलनि।
तैयो एहिसँ देखबा-सुनबाक लालसा कम नइं भ’ रहल छलनि। आर बढ़िए रहल छलनि। एहि लालसा-लोभमे विनोद बाबू धीरे-धीरे परेसान रह’ लागल छलाह। कोनो काजमे मोन नइं लगैत छलनि। काज नइं करबाक कतेक रास बहाना आब ओ ताक’ लागल रहथि। एहि लेल कतेको बात ओ गढ़ि नेने रहथि।
-आब काजक वातावरण नइं रहि गेल छै।
-काज केलासँ की हेतै? कोनो इनाम छै काजक?
-कतेक लोक त’ बिना कोनो काजक दरमाहा उठबै अछि। के पुछैत छै?
-एहि राजमे काज क’ क’ की हेतै? कोनो इज्जति छै?
-परिश्रमसँ आॅडिटे क’ कए की होइत छै? क्यो घूरि क’ आॅडिट नोटो पढ़ैत अछि?
-ककरो पर कोनो एक्शन थोड़े होइत छै? अनेरे देखार होउ।
-अरे, अहिना चलैत छै दुनिया। हमरा कएलासँ किछु हेतै थोड़े?-लोककेँ कहबाक लेल आ अपनाकंे बुझेबाक लेल हुनका लगमे बहुत रास बात छलनि। मुदा आब ओ थाकि रहल छलाह। सभ बातमे झंझटि बुझाइत छलनि। ओ निचेनसँ रह’ चाहै छलाह। चैन तकैत रहै छलाह। बाहर जाथि त’ घर दिस भागथि। घर आबथि त’ बिछान पर पड़ि रहथि। बिछान गर’ लागनि त’ गप्प लड़बै लेल कोनो दोस महिमक ओहि ठाम पड़ाथि। कतहु चैन नइं भेटनि।
एहिमे गौतमक संगीत सिखबाक लगन हुनका एकदम्मे उत्तेजित क’ देने रहनि। संगीत सिखबाक इच्छा हुनका निरर्थक आ लक्ष्यहीन जीवन जीबाक लौल बुझा रहल छलनि। बालहठ सन लागि रहल छलनि। जेकरा कहुना, कोनो प्रकारेँ टारि देबा पर ओ तुलल रहथि।
-बड़ जिद्दी भ’ गेल अछि गौतम। पढ़ाइ-लिखाइमे ओकरा मोन नइं लगैत छै। संगीत सीख क’ की हेतै? गबैया बनत! इस्स, ई कीड़ा कोना ओकर माथमे आबि गेलै?-विनोद बाबू तमतमा गेल छलाह। माया हुनका बुझेबाक चेष्टा केलनि।
-मुदा आब ओकरा ठकल नइं जा सकैए। बहुत दिन अहाँ अनठौलिऐ।
-अरे, हमरा होइत छल जे कनिएँ दिनमे बात बिसरि जाएत। एहिना मोनमे ई सभ उजाहि अबैत रहै छै। एखन बुद्धिए की भेलै अछि?-ओ किचकिचा रहल छलाह।
-ओ नइं मानत। सीखबे करत। कहैत छल जे मल्लिकजी आश्वासन देने छथिन। पाँच माससँ लगातार हुनका ओहि ठाम जा रहल अछि। आइ सभटा कहैत छल। तानपूरा कीनबाक छै ओकरा। तकरे जोगारमे लागल अछि।
-गदहा अछि ओ। ई मल्लिकजी ओकरा दूरि क’ रहल छथिन। हमरा बिना पुछने किऐ ओ मल्लिकजीक ओहि ठाम जाए लागल। आब’ दियौ, बिगड़ैत छिऐ।-विनोद बाबू खिसिया रहल छलाह। बड़बड़ा रहल छलाह...
-आब ट्यूशन फीस दिअ’ पड़त। हारमोनियम कीन’ पड़त। तानपूरा कीन’ पड़त।
-से त’ कीनहि पड़त। कते दिन ठकबै ओकरा। तीन-चारि माससँ कहि रहल अछि जे एकटा तानपूरा कीनि दिअ’। मुदा अहाँ ध्याने नइं दैत छिऐ। कतेक बेर कहबै जे अगिला मास पाइ भेटला पर कीनि देब। टी. ए. भेटत त’ कीनि देब। एखन आॅफिसमे बड़ काज अछि। आन-आन खर्चा सभ अछि। लगैए आब ओ बूझ’ लागल अछि जे अहाँ ओकरा संगीत नइं सीख’ देबै।-माया कने रोषमे आबि गेल छलीह।
विनोद बाबू आब कने मोलायम भेलाह। मायाकेँ बुझबैत कहलखिन-अहाँ बात बुझबाक कोशिश करियौ। हम कोनो ओकर दुश्मन छिऐ? बापे छिऐ की ने? अपन बेटाकेँ दूरि होइत हम कोना देखि सकैत छी। संगीत सीखलासँ की होइ बला छै? बड़का ओस्ताद बनत। मुदा आइ. ए. एस. तँ नइं होएत, पैघ लोक त’ नइं होएत। हाकिम नइं कहाओत। अहाँकेँ नीक लागत की? आब विनोद बाबू मायाक मर्मस्थलकेँ छूबि लेबाक चेष्टा क’ रहल छलाह।
-से हमरा किऐ नीक लागत? हमहूँ त’ ओकर माइ छिऐ। ओकर नीक चाहबे करबै-माया बजलीह।
-सएह त’ हमहू कहैत छी। आर किछु दिन धरि जँ हम सभ अनठा देबै त’ ओ क्रमशः जिद्द बिसरि जायत। फेर पढ़बा-लिखबामे मोन लगाओत। एहि लेल जँ कने हम अहाँ ठकिए देबै त’ की भ’ जेतै।-कने विचारैत सन विनोद बाबू बजलाह।
डेरा प्रवेश कालक मानसिकता क्रमशः हुनका घेरि रहल छल। अप्रत्याशित रूपें माया आइ एहि मामिलामे पतिक संग एकमत भ’ रहल छलीह। विनोद बाबू आब मायाक लग सहटि आएल छलाह। अन्ततः दुनू बेकतीकेँ स्वर साधबाक लेल कोनो तानपूराक प्रयोजन जेना एकदम्मे नइं रहि गेल छलनि।

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गाछ-पात
शिवशंकर श्रीनिवास

बुरहीक बेटा अएलखिन अछि। सपरिवार अएलखिन अछि। पुतोहु अएलखिन, पौत्रा-पौत्राी अएलनि अछि। ओ लोकनि एहि बेर विचारि क’ अबै गेलाहे। विचार छनि जे एहि बेर कोनो हालतमे बुरहीकेँ अपना सभक संग बोकारो लइए जेथिन।
बुरहीकेँ एक मात्रा बेटा, आर कोनो सन्तान नइं। बेटा बोकारोमे इन्जीनियर। पुतोहु ओतहि कोनो हाइस्कूलमे शिक्षिका। दू टा पौत्रा आ एक पौत्राी। दुनू पौत्रा कोनो पब्लिक स्कूलमे पढ़ैत जाइत रहए आ पौत्राी छठा वर्गमे पढ़ैत छल।
पाँच बर्ख पहिने बुरहा जीबैत रहथि। जाबत बुरहा जीबैत रहथि, बुरही बूढ़ भ’ जेबाक बोध नइं करथि। कोनो काजमे थाकनि नइं अनुभव होइन। हरदम बुरहाक आइ-पाइमे लागल, अपस्याँत। मुदा कहियो जँ बुरहाक मुँहसँ किछु तेहन तिक्ख बहरा जाइन तँ बुरहीक आँखि छुटनि गंगा-जमुनाक धार भ’ जाइन। तखन बुरहाकेँ नवकनियाँ जकाँ बौंस’ पड़नि। जखनि बुरही दुलारल भ’ जाथिन तँ बुरहा परिहासमे कहथिन-बुझलौं। अहाँसँ धीया-पुताक चालि कहियो नइं जाएत। आब जँ पौत्रा-पौत्राी बोकारोसँ अबै जाएत आ अहाँकेँ रूसल देखत तँ की कहत?
बुरही बिहंसैत अनुरागें बाजथि-भगवान अहाँकेँ कुशल-क्षेम राखथि। हमर सोहाग भरल अरथी उठए अइ आँगनसँ। हम अहाँक सभ दिन एहिना रहब।
-से नइं हैत दाइ-एहन अशुभ कथा जुनि बाजू, से कहि देलए।
ओ, अहाँ बजलहुँ से किछु नइं आ हम बजलहुँ से अशुभ भेलै? से नइं हैत।
-अहाँक कहने की हैत। हमर भगवान छथिन।
-भगवान तँ हमरो छथि।
-चुप्प रहू। हिनकर भगवान होइ छथिन। अहाँकेँ जे पण्डित कहैए ओकरा पर तामस उठैए। एकटा जनउ तँ रखबे नइं करै छथि, आ पण्डित छथि, भगवान छथिन।-तामसें बुरही भनभनाए लागथि। आ, बुरहा, हुनकर भनभनाएब पर हँसैत-हँसैत लोटपोट होइत रहथि।
से देखियौ, नाना तरहें व्रत-पूजा करैत, भगवानकेँ कबुला-पाती चढ़बैत रहली बुरही, मुदा भगवान सुनलखिन बुरहाक। बुरहा पहिने चल गेलाह। बुरहाक मृत्युक बाद बुरहीक रोदन ककरा ने दहला देलक।
पहिने भोरे बुरहा उठलाह तँ हुनका पानि दीऔन, चाह दीऔन, पान दीऔन, ई दीऔन ओ दीऔन आ ओ सभ जुटेबामे बुरही व्यस्त रहै छलीह, मगन रहै छलीह। बुरहो बैसल नइं रहैत छलाह। हाथमे हरदम खुरपिए रहैत छलनि। बाड़ीमे रंग-बिरंगी वस्तु लगबैत रहथि। गाछ-पातक सेवामे बुरहाक समय बड़ आनन्दमे बीतनि। नाना तरहक तरकारी, नेबो, लताम, केरा सभसँ बाड़ी भरल रहैत छलनि।
बाड़ी सँ तरकारी बुरहा नइं, बुरही तोड़ैत छलीह। बुरहाकेँ मात्रा लगेबासँ मतलब छनि। सभ दिन भिनसरे बुरही चाह-ताह बनेलाक बाद एक धामी तरकारी तोड़ि अनैत छलीह। किछुए अपना लेल रखै छलीह। दू बेकती कते खैतथि? बेचथि नइं। लोक सभकेँ देबामे नीक लगै छलनि। बड़ तृप्ति होइन। कहियो काल बेटाक कचोट मनकेँ दुखा दइन। से कचोटक गप्प बुरहाकेँ कहथिन तँ बुरहा कहथिन-से अहाँ की करबनि, अप्पन बाड़ीक टटका तरकारी हुनका लोकनिक भागेमे नइं छनि।-दीर्घ श्वास ल’ क’ फेर बुरहा कहथिन-कोना पठेबनि? असम्भव अछि। जे सम्भव अछि सएह करू। लोकक धीया-पूताकेँ जुड़ाउ, प्रसन्न करू, आ ओकरा सभक खुशीसँ सुख लीअ’। बुरहा बुरहीकेँ बुझबथिन; बुरही सएह करथि। लोकक बेटाकेँ जुड़ेबाक प्रयास करथि। बादमे हुनकर एहन धारणा भ’ गेलनि जे जँ हम दोसराक बेटाकेँ जुड़ेबै त’ हमरा बेटा जुड़ाएल रहत आ एहि आनन्दमे मस्त रहथि बुरही।
ताहू दिन बेटा दुनू गोटएकेँ बेर-बेर कहनि-अहाँ सभ हमरा संगें चलू। गाममे असगरे किएक रहै जाएब?
बुरहा हँसि क’ गप्प अनठिया देथिन। बेटा मात्रा बापक धाखें जोर नइं द’ सकनि। मुदा, वासतविकता ई छलै जे बुरहाकेँ गामे नीक लगनि।
गामक फुटकल फुटकल घ’र। आम लतामक गाछ। केराक फूटल घौड़, बाड़ी-झाड़ीमे लाल हरिअर पोरोक लतरल लत्ती, माटि पर चतरल गेन्हारीक साग। कलशायल गाछ। तिलकोरक पातक बीच-बीच घोसिआएल लाल-लाल फ’ड़, हरिअर कँच अरिकोंच। एहि सभ नयनाभिराम दृश्यसँ महासुख भेटनि बुरहाकेँ। गामक ठहक्का दैत इजोरियामे दूर-दूर तक देखाइत बाध-बोन। लहलहाइत धान-पानिसँ भरल कोला-कोला, कित्ता-कित्ता कत’ देख पाबी शहरमे। शहरक राति ठीके कठिन भ’ जानि बुरहा लेल। सौंसे बिजलीक चक-चकाइत इजोत लागि जानि। शहर नइं पचनि। भरि जन्म गामे ने रहला। दलान वा अंँगनाक घरक ओसारा पर सूतथि। सूतल रहथि आ नीलाभ आकाश...आकशमे लौकैत तरेगन... कखनो-कखनो क’ चुनमुन करैत चिड़ै। बड़द-महीसक घुँघरुक टना-टन...देखै छथि, सुनै छथि। एहन स्थिति बड़ स्वाभाविक होइन बुरहाक लेल आ एहन सहजतामे निसभेर भ’ सूतथि, मुदा शहरमे सटल-सटल बड़का-बड़का फ्लैट, आँखि चोन्हरबैत बिजलीक इजोत नइं बर्दाश्त होइन। असहजताक बीच मोन औल बौल कर’ लगनि। जँ शहर कहियो जाए पड़नि तँ जल्दी पड़ाइक प्रयासमे लागल रहथि। से बुरहा बेटाक संग सभ दिनक हेतु कोना जैतथि? बेटाक आग्रह निरर्थक जाइन।
बुरहाक मृत्युक बाद बेटा बुरहीकेँ कहलकनि-माइ तोरा आब एहि ठाम असगर नइं रह’ देबौ। पुतोहु सेहो बड़ मनोरथें कहने छलखिन-हँ माइ, चलथु, एहि बेर हम सब नइं मानबनि। हिनका चलए पड़तनि। बोकारोमे सभक डेरा पर सभक सासु-ससुर अबैत जाइत रहै छथिन। ई सभ कहियो नइं गेलीह। ने बाबू, आ ने ई। सभकेँ आश्चर्य लगै छै। हमरा सभ द’ की की ने बजै जाइए। आबो चलथु। ओतहि रहिहथि। आब एत’ असगर किऐ रहतीह? आब एहि ठाम छनिहें की?
पुतोहुक गप्पक बुरही कोनो उत्तर नइं देने छलखिन। मोनमे भेलनि-ठीके हुनका बाद एत’ किछु नइं अछि?-चारू कात ताक’ लागल रहथि। चारू कात गाछ-पात लहलहा रहल छलै। बुरहीकेँ भेलनि जेना बुरहाक रोपल गाछ-वृ़क्ष हिनका कहि रहल होइन-बुरहा मुइलाहे कहाँ। हमरा सभमे वैह तँ छथि। देखियौ ने, जीविते छथि।-बुरही भावुक भ’ गेल रहथि।
बुरहा जखन कहियो कोनो नव गाछ रोपथि तँ बुरहीकेँ बजा क’ देखबथि-हे देखियौ बौआक माइ।-की ने की कहैत रहथिन। एक बेरक गप्प बुरहीकेँ मोन पड़लनि-बुरहा नेबोक गाछ रोपि क’ बुरहीकेँ देखबैत कहने छलखिन देखियौ ने? ई अपन भूमि छोड़ि क’ कतौ नइं होइ छै। अद्भुते स्वादक होइ छै ई नेबो। फ’ड़’ दीऔ, एत्ते-एत्तेटा होइ छै। जकरा देबै मोन हरषा जेतै। हम चाहै छी गाममे सभकेँ ई गाछ अपन-अपन बाड़ीमे लागि जाइ, देखियौ हमर परिश्रम की फल दैए।
एक बेर नवादासँ धात्राीक गाछ अनने रहथि। ओहिमे जे मेहनति भेल रहनि से कहल नइं जाए, किन्तु मुँह पर ओ छिलकैत परम आध्ाद देखिते बुझाइ छल। रोपि क’ पटा क’ गाछकंे निहारैत हिनका कहने रहथिन-बौआक माइ, रोपलासँ नइं होइ छै। तलता चाही। अहाँ तँ माइ छी। अहाँसँ नीक के बुझतै जे जनमौटी बच्चाकेँ कोना पोसल पालल जाइ छै। कोना, तलता कएल जाइ छै। ओएह पालन-पोषण गाछ वृक्षकेँ चाहिऐ। से पालन-पोषण नइं कएलासँ मनुक्खेक बच्चा जकाँ गाछो हेहरू भ’ जाइ छै।
-नइं-नइं...।-ई नइं जेतीह। ई गाछ-वृक्षकेँ हेहरू नइं होब’ देथिन।-अँए ई कोना जेतीह? ...बड़बड़ाइत फेर चारू कात देख’ लागल रहथि। हुनका भेल रहनि, जेना बुरहा कहि रहल होथिन-बौआक माइ, एकर जड़िक माटिकेँ कने कोड़ि दीऔ। हे सुनू, एहिमे पानि दीऔ। आ बुरही पहिने जकाँ बुरहाक आदेश पालनमे रमि गेलीह। लगनि जेना एहि सभ गाछ-वृक्षकंे देखै-सुनै लेल बुरहा हिनका छोड़ि गेल छथिन। एहि तरहें ओहू बेर बुरही बेटा-पुतोहुक जबरदस्त, अनुरोधकेँ टारि देलखिन।
मुदा एहि बेर जाहि तरहक रुखि अख्तियार क’ कए ओ सभ कहि रहलखिन अछि से बुरहीकेँ जेबाक लेल विवश क’ रहलनि अछि। बुरही जेबाक मोन बना रहलीह अछि। जहियासँ बाल बच्चा अएलनि सभ हिनका घेरने रहै छनि। बुरही विभोर भेल ओकरा सभमे लेपटाएल रहलीह।
बेरमे एहिना पौत्रा-पौत्राी घेरि क’ बैसल रहनि। ओकरा सभक संग बुरही मनोविनोदमे लागल रहथि। ओही बीच पौत्राी कमला पुछलकनि-दाइमाँ, अहाँकेँ कते गीत अबैए?
-दुर जो, से की हमरा गनल अइ?
-तइयो, एक सय?
-एक्के सय? एहिसँ बेसी!
-दू सय?
-अहूसँ बेसी!
-किताबसँ सिखने हेबै?
-नइं हइ, पोथीसँ कत’ सिखबै। माइसँ सिखलिऐ। मैयाँसँ सिखलिऐ। काकीसँ, सखी-बहिनपासँ, आ सभसँ बेसी, हमरा नैहरमे रहथिन एकटा बुरही, हुनकासँ। ओ छलखिन गामक बेटी। बाल-विधवा। हमरा लोकनि हुनका पीसी कहिअनि। हुनका राशि राशिक गीत अबनि। ओ सभ पावनि-तिहारक गीत सिखबथिन। सभ उपलक्षक गीत। टोलक सभटा धी-जनी हुनकेसँ गीत सिखने रहिऐ। ओ सभकेँ अपना लग बैसा क’ गीत सिखबथिन। ओ लोक आब कत’? माइसँ कम दरेग नइं रहनि हुनका।
-अहाँ सभ बड़ गीत गबिऐ?
-हँ हइ, पहिने लोक बड़ गीत गबै। नान्हियोटा कोनो शुभ काज शुरू होइ त’ गीतेसँ शुरू होइ। हमरा सभक माइ मैयाँ कहथि जे गीत सीखू। गीत गाएब ओहि समयमे बेटीक गुण बुझल जाइ। गीत सीखू, अरिपन दीअ’, लिखिया पढ़िया करू।...
सभसँ छोटका पौत्रा जे पाँच वर्षक छल, बीचहिमे पुछि देलकनि-दाइमाँ, अहाँकेँ राइम्स अबैए?
-हा...हा...हा...ही...ही...ही।-पप्पूसँ दू बर्खक जेठ पौत्रा मुन्नू पप्पूक गप्प पर हँसैत-हँसैत लाबा भ’ गेल। ओ हँसिते बाजल-दाइमाँकेँ राइम्स औतनि?
ओकरा अपन पब्लिक स्कूल मोन पड़लै। प्रिपेरटरी क्लास मोन पड़लै, मैडल मोन पड़लै। सलवार, समीज पहिरने मैडम देह-हाथ नचबैत आ सिखबैत-बा...बा...ब्लैक सीप, हैव यू एनी ऊल? यस सर यस सर थ्री बैग्स फूल...।
मुन्नूकेँ सलवार-समीज पहिरने नचैत मैडमक वेशभूषामे दाइमाँके कल्पना क’ कए नइं रहल भेलै। ओ हँसैत-हँसैत दाइमाँक कोरामे ओंघरा गेल। कमला भाइकेँ डटलक-मुन्नू, अहाँ दाइमाँकेँ तंग करबनि। हइया कहै छिअनि माँकेँ।
-किऐ कहबहक माँकेँ। तंग कहाँ करैए? हमर बच्चा अपन दाइमाँ संगें खेलाइए-कहैत बुरही अपन बड़का पौत्राक माथ पर हाथ राखि केस सोहराब’ लगली।
-एनामे बहसि जेताह, दाइमाँ।-कमला भाइकेँ इष्र्यासँ देखैत बाजल।
-किए बहसि जेताह? नइं बहसताह।
-हँ, बहसि जेताह। बोकारोमे मुजफ्फपुर वाली अंटीक डेरा पर दाइमाँ आएल रहथिन। ओहो बच्चा सभकेँ बहसा क’ चल गेलखिन। अंटी एक दिन माँसँ कहै छलखिन।-कमला बाजल
-धक...।-कमलाक गप्प पर बुरहीक करेज काँपि उठलनि। कमलाक मुँह दिस ताक’ लगली। ओकर चक-चक करैत दुनू आँखि जेना गप्पक विश्वास दिआ रहल छलनि हिनका।
आइ बुरहीकेँ अपन माइ मोन पड़ि गेलनि। ओहो जखन पौत्रा-पौत्राीकेँ दुलार’ लागथि तँ पुतोहु सभ बाजि उठथिन एना दुलार नइं करथुन। दुलार करैत-करैत सभकेँ बहसा देलखिन। कहि क’ भनभनाइए लगै जाथिन। ओ बेचारी सकपका जाथि। आँखिक आगू जेना शून्य पसरि जानि। बुरहीकेँ अपन माइक ओ दशा आइयो कखनो मोन पड़ै छनि तँ मोन कचोटा जाइ छनि। आइयो कमलाक गप्पसँ माइ मोन पड़लखिन। ओ ओहने अपन कल्पना क’ क’ सिहरि गेलीह, देहक रोइयाँ भुटकि गेलनि। उदास भ’ गेलीह।
मुन्नू टोकलकनि-की भ’ गेल दाइमाँ?
-नइं किछु बाउ- दाइमाँ अपनाकेँ सम्हार’ लगलीह। पौत्रा-पौत्राीक नेह-भक्तिमे पुनः अपनाकेँ लगाब’ लगलीह। लगब’ तँ लगली मुदा बेटा-पुतोहु संग बोकारो जाथि वा नइं एहि दिशामे सोचबाक लेल बेसी एकाग्र होब’ लगली। बेटा-पुतोहु जेना जिद्दक वातावरण बनौने छलखिन, जे बुरही जेबाक लेल अपनाकेँ ओरिया रहल छली मुदा फेर सोचाए रहलनि अछि।
साँझमे खा-पी क’ बुरही निच्चेमे पटिया ओछा क’ पड़ि रहली। असगर नइं, पौत्रा-पौत्राीक संग। तीनू अपनामे झगड़’ लागल। सभ दाइमाँसँ सटिये क’ सूत’ चाहै छल। बीच-बीचमे पप्पू-मुन्नू दाइमाँक देह पर ओंघरा जाइ छल। एहि तरहें सभ अपन-अपन बेसी अधिकार बुझेबाक लेल दाइमाँकेँ नंगो-चंगो कएने छल। ओहि नंग-चंग हेबामे दाइमाँके अपार सुख भेट रहल छलनि। बोकारो जेबाक इच्छाकेँ गहेरबाक प्रयास कर’ लागल छलीह। मोने-मोने सोचै छथि-एकेटा बेटा अइ, जकरा पर हरदम मोन टाँगल रहैए। ओत’ सभ रहत। बेटा रहता, पुतोहु रहती, धीया-पूता रहत। आब हमरा ओही फूलबाड़ीक बीच जएबाक चाही। मोन उत्साहै छथि। उत्साहै त’ छथि मुदा उत्साह नइं आबि रहलनि। कमलाक गप्प बेर-बेर मोने पड़ै छनि। सोचै छथि, मुजफ्फरपुर वाली जकाँ पुतोहु हमरा किछु कहथि तखन? ओह, हिनका ओ बरदाश्त नइं हेतनि।
बुरहीक, जीवन सभ दिन स्वतन्त्रा रहलनि। ककरो अनेरक हँ’ट-दबारसँ कहियो नइं घेरेली। एकटा कहबी मोन पड़लनि-बापक राज राज, साँइक राज महाराज आ बेटाक राज मुँहतक्की। बोकारोमे बेटाक कमाइ खाइत, पुतोहुक तिक्ख बात सुनि सकतीह? की बाजि सकतीह बेटाक डेरा पर? यदि ओत’ किछु ककरो देबाक इच्छा होइन तँ? किछु तेहन खएबाक इच्छा होइन तँ? कोनो ओत’ बुरहाक कमाइ रहतनि? ...बुरही कते की मोने-मोन सोच’ लगली, मुदा फेर अपने मोनकेँ मनेलनि-हमर पुतोहु ओहेन नइं छथि।
भिनसर भेलै। सभ बोकारो जेबाक तैयारीमे जुटि गेल छल। बेटा-पुतोहु जल्दी करै लेल बुरहीकेँ कहि रहल छलनि। किन्तु बुरही बाड़ीमे टहलि रहल छलीह। जेना कतौ दोसर ठाम माइ अपन छोटे-छोटे बच्चा सभके दुलारैत मलारैत अछि। ओहिना गाछ-वृक्षक बीच बुरही सभकेँ ओहने माइ-मोने निहारि रहल छलीह, बुझियौ जे दुलारि रहल छलीह।
बुरहीकेँ कोनो गाछक जड़िक माटि कोड़नाइ आवश्यक बुझेलनि। कोनोमे पानि देब। कोनो पात सभ पर छाउर छीटब आवश्यक लगलनि, तँ कोनो पर दवाइ देब।
मन्द-मन्द वायु बहि रहल छलै। गाछक पात सभ डोलि रहल छलै। बुरहीकेँ भेलनि जेना गाछ सभ उदास भ’ रहलैए। पात सभ मौलाए रहलैए।
-आब तँ हम जा रहल छी। अहाँकेँ के देखत?-बड़बड़ा उठली बुरही। बुरहा मोन पड़ि गेलखिन। हुनकर गप्प-शप्प मोन पड़’ लगलनि। गाछ-पातसँ हुनकर जुड़ाव मोन पड़लनि। फेर मोन भेलनि-की करथि, जाथि वा नइं?-कैकटा प्रश्न उठलनि। मुजफ्फरपुर वालीक गप्प जे कमला कहने छलनि, मोन पड़लनि। अपन स्थिति ध्यानमे अएलनि। बेटा पुतोहुक ममत्व आ फेर अपन स्थिति। आँखिमे नोर भरि गेलनि।
बेटा लग आबि क’ कहलकनि-की माइ, कोन मायामे घेराए लगलें? चल, जल्दी तैयार हो।
बुरही दहलि गेली। मोनमे भेलनि जे दौड़ि क’ बेटाकेँ कोंढ़सँ साटि लेथि। मुँहसँ बहार भेलनि-बच्चा, आब हमरा एत्तै रह’ दैह। एही गाछ-पातक बीच। एकर सभक सेवामे। हम कत्तौ जाएब, मन एतै टाँगल रहत। तहन फेर जा क’ हेबे की करत?
बेटा अवाक् माइक मुँह ताक’ लागल।

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मकड़ी
प्रदीप बिहारी

सौंसे बजारमे हल्ला पसरि गेलै जे एकटा मौगी अयलैए। सिलाइ-मशीन चलबैत छै। नव-पुरान कपड़ा सीबैत छै। बड़ सुन्नरि छै। एकसरिए छै। ओकरा संगमे केओ नइं छै आ ओ ककरो दिस तकितो नइं छै।
दारू आ चाहक दोकान वाली मौगी सभ अपन संसद शुरू क’ देने रहै। भागि क’ आएल हेतै। घरबला छोड़ि देने हेतै। चोरनी होएत। छिनारि होएत।
एकटा दोसर मौगी बजलै-जरूरी छै जे अधलाहे हेतै। नीक लोक नइं भ’ सकै छै कि? इहो त’ भ’ सकैत छै जे...
मुदा सत्तारूढ़ मौगी ई कहि ओकरा चुप क’ देलकै जे सतबरती रहितै, तँ दिल कुमारीक घरमे किराया नइं लैतै। दिल कुमारी अपने कतेक घाटक पानि पीने अछि! ओकर किरायादार की सैंतल रहतै?
जे, से। समय बीत’ लगलै। सुनीता नवसँ पुरान होम’ लागल। दिल कुमारी ओकर व्यवसाय आ जीवनमे अनेरे कोनो हस्तक्षेप नइं करै।
दिल कुमारीकेँ ओ ‘काकी’ कह’ लागल।
आब किछु स्त्राीगण सेहो ब्लाउज आ साया सियाब’ या भंगठी कराब’ आब’ लगलै। मुदा, बेसी काज जुअनके छौंड़ा सभक ओकरा लग आबै।
ओ अनुभव कएलक जे ओकरा अएलाक बाद जुआन सभक पैन्ट आ अंगा बेसी फाट’ लगलै अछि। सभ ओकरे लग कोनो-ने-कोनो बहन्ने आबि जाए।
मौगी सभक संसदमे प्रस्ताव पारित भ’ गेलै। जँ मीठ नइं छै, तँ चुट्टी किऐ सोहरै छै?
सुनीताकेँ अपन खर्चक योग्य आमदनी भ’ जाइ। आर बेसी ओकरा किऐ चाही? ओकर के छै? ने आगाँ ने पाछाँ।
एकटा गहिंकी आएल छलै। नगरपालिकाक मेहतर। ओ कहलकै सुनीताकेँ-हमर बेटीक बियाहमे किछु कपड़ा सीअएतै। सीबि देबहक बहिन? तोहर सिआइ किछु देबह आ किछु उधार रहि जेतह। अगिला मास देबह।
सुनीताकेँ लगलै जे जीवनमे पहिल बेर क्यो ओकरा बहिन कहलकै-ए। ओ द्रवित भ’ गेल-तोरा बेटीक बियाहमे जतेक कपड़ा सीअएतह, हम एक्कहु टाक पाइ नइं लेब’। जाह! जहिया मोन होअ’ द’ जइह’।

जानि नइं सुनीताकेँ ओहि राति की भ’ गेलै? निन्ने ने होइत रहै। ओहि गहिंकीक गप्प बेर-बेर मोन पड़ै छलै-हम तँ जानि-बुझि क’ फाटल-पुरान ल’ क’ तोरा लग अबै छी। तोहर रूप हमरा मोहने जाइत अछि। तों एकटा मरद किऐ ने क’ लै छह। असगरे कते खटबह?
सुनीता डाँटि क’ भगा देने छल ओहि गहिंकीकेँ। ओकर कपड़ा सेहो घुरा देने छल।
मुदा, सुनीता बेर-बेर अएनामे अपन मुँह देखैत छल। साँचे, ओ एखनहुँ सुन्नरि अछि। ओकर बयसे की भेलै अछि। बड़का घरक बेटी रहैत तँ एखन बियाहो नइं भेल रहितै। बीस-एकैस कोनो बयस होइत छै? ई बयस तँ पोखरिमे चुभक’ बला होइ छै... साओनक झूला झूल’ बला होइ छै... कोनो राजकुमारक सपना देख’ बला होइ छै। मुदा, पुरुषक प्रतापें सुनीताकेँ एही बयसमे गृहस्थी सम्हार’ पड़ि रहल छै।
ओकरा बियहुआ मोन पड़लै। पहिल बियाह, बियाहे सन भेल रहै। ब’र अएलै, बरियात अएलै। गाजा-बाजा अएलै। खूब धूम-धामसँ ओकर बियाह कएने रहै ओकर बाप। माइ तँ ओकरा अबोधेमे छोड़ि अनका संग चलि गेल रहै। तैं सभ निमेरा ओकर बाप केलकै।
ओहि समय सुनीताक बयसे कतेक रहै? पनरहममे छल। ई कोनो बियाहक बयस होइत छै? मुदा, ओकरा बापकेँ अल्प बयसहिमे विकसित ओकर देह अबूह लाग’ लगलै। दोसर आशंका एहि बातक रहै जे माइए जकाँ इहो ने ककरो संग माया-पिरती जोड़ि लिअए आ...। तेसर स्वार्थ प्रायः ई रहै जे बेटीकेँ बिदा क’ देने दारू पीब’ लए छुट्टा भ’ जायत। क्यो रोकनिहार नइं रहतै।
आ तैं सुनीताकेँ गरदामी पहिरा देलकै ओकर बाप।
मुदा, छओ मास नइं बीतलै कि अनर्थ भ’ गेलै। सुनीताक सीउथ उज्जर भ’ गेलै। चूड़ी फूटि गेलै आ पोते टूटि गेलै। लोक सभ सराप’ लगलै। सालो ने बीतलै कि बियहुआकेँ खा गेल।
सुनीताक चारू कातक संसार सुन्न भ’ गेलै। कतहु किछु नइं। चारू कात अन्हारे अन्हार। कतहु कोनो प्रकाश-पुंज नइं देखाइ छलै ओकरा।
बियहुआक विरासतमे भेटल रहै एकटा देशी गाय, जकर सेवा-सुश्रूषा करए। दूध बेचए आ दिन काटए।
मुदा, बयसकेँ बेसी दिन धरि गारि क’ तँ नइं राखल जा सकैत अछि।
किछु गोटें लोभाएल रहै सुनीता पर, आ किछु धपाएल। मुदा, समय सुनीताकेँ साकांक्ष बना देने रहै। ओ भावावेशमे ककरो जालमे फँस’ बाली नइं छल।
किछु छौंड़ा सभ तँ हाथ धो क’ ओकरा पाछाँ पड़ल छल। ओकरा घर पर अएबाक हिम्मति तँ नइं करै, मुदा साँझ खन क’ जखन घास आन’ बाध दिस जाए, तँ छौंड़ा सभ किछु-ने-किछु टोनैत रहै ओकरा।
जखने काली खोला पार क’ चाहक दोकान दिस मुड़ए आ कि हेम बहादुर टहंकारसँ गीत उठबैक-मानै ने छौंड़ी हमर बतिया... फेरै ने एको बेर अँखिया... होऽऽऽ होऽऽऽ।-आ सुनीताक संगी सभ ओकरा खौंझाब’ लगै-एक बेर फेरही नजरि हेमे दिस। छौंड़ा जुआन छै। सुन्नर छै। तरहत्थी पर रखतौ।-आर-आर बहुत रास बात सभ कह’ लगै, मुदा सुनीता लेल धनि सन।
ओहि दिन सुनीता काली खोला दिस नइं गेल। सतीघट्टा बगान दिस चलि गेल एकसरिए। जानि नइं किऐ बाट भरि हेम बहादुर ओकर मानस पटल पर जगजियार होइत रहलै। आइ ओ छौंड़ा काली खोला लग एकर बाट तकिते रहि जएतै। मुँहक गीत मुँहेंमे रहि जएतै छौंड़ाक।
सतीघट्टा बगानमे निश्चिन्तसँ घास कटैत छल सुनीता। कने कालक बाद एकटा गीत सुनाइ पड़लै माया को बाड़ी ना पिरती को फूल, संभाली राख’ है कुसुमे रुमाल...।
सुनीता चैंकि गेल। ई तँ हेमेक स्वर छिऐ। एम्हरो चलि अएलै छौंड़ा। ई तँ दिक् क’ देलक।-ओ सोचलक’। आइ जे ने झड़ान झाड़त जे...।
पुनः दोसर मोन कहलकै। छौंड़ा, कोनो बेजाए तँ नइं छै। इएह ने कने अहदी छै। एसगरुआ छै छौंड़ा, तैं ने जेना-तेना रहै छै। दोसराति भेटतै, तँ सम्हरि जेतै। ओकरो तँ एकटा पुरुष चाही। दुनू मिलि क’ कमाएत-खटाएत। समय बीतैत रहतै।
मुदा, ओ हेम बहादुरकेँ बोर्डर पर दू-नम्मरी धन्धा नइं कर’ देत। बहुत रास दोसर-तेसर काज छै। नीको काजसँ पेट भरैत छै...।
सुनीताक गफ्फा घा’सँ भरि गेल छलै। गफ्फा दुखएलै तखन अखियास भेलै।-ओह...। ओ की सोच’ लागल छल। धुर जो...।-ओ स्वयं मुस्कियाइत छल।-ई की भ’ रहल छै ओकरा?
आ कि तखने हेम बहादुर जुमि गेल। बाजल-आखिर कहिया धरि अपन कोमल हाथसँ हँसुआ धरैत रहबही, सुनीता?
सुनीता बाजल-देख हेम! बरोबरि जे हमरा पछुअबैत रहै छें, से नीक बात नइं। तोरा मोनमे की छौ? तो अपन बाट किऐ ने बदलै छें?
हेम बहादुर छक्का मारलक-हमरा मोनमे ओएह बात अछि, जे तोरो मोनमे छौ। हम तोरा चाहैत छियौ। हम तोरासँ बियाह कर’ चाहैत छी। हम चाहैत छी जे अपना दुनू गोटें...।
सुनीता बिच्चहिमे रोकलक-अपन मुँह देखलेहें। इह! हमरासँ बियाह करताह। तोरासँ के बियाह करतौ? जकर सभ साँझ कान्छीक दारूक दोकानमे बीतै छै, तकरा बुतें बहु की डेबल हेतै?
मुदा, हेम बहादुर मान’बला नइं छल। ओ बाजल-हम तँ सदिखन तोरे मुँह देखैत रहै छियौ, अपन मुँह की देखिऐ?-कने थम्हैत पुनः बाजल-तों जनिते छें। हमरा माइ-बाप क्यो नइं अछि। एकटा खोपड़ी अछि, ओहीमे रहै छी। ओहीमे तोरो राखबौ। राखबौ मुदा माया-पिरतीक संग। आ जहिया हम आ तों एक मोन-एक परान भ’ जाएब, तहियासँ कान्छीक होटल जाएब बन्न भ’ जेतै।
सुनीताक देह झुनझुना गेलै। रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेलै। करेज धरक’ लगलै आ ठोंठ सुखाए लगलै।
ओ प्रश्न दृष्टिएँ हेम बहादुर दिस तकलक।
-सत्ते कहै छियौ सुनीता।
ओ तकैत रहल।
-एकदम सत्त। जे किरिया खुआ ले।
ओ तकिते रहल।
-विद्या नाश।
सुनीताकेँ हँसी लागि गेलै। ओ बड़ी जोरसँ हँसल।
-हँसिते बाजल सुनीता-तों पढ़ले-लिखल कतेक छें जे विद्या नाश बला किरिया लगतौ।
-विश्वास नइं होउ, तँ आर दोसर जे किरिया खुआ ले, मुदा...।-हेम बहादुर सुनीताक मनःस्थिति बुझि चुकल छल। ओ सुनीताक हाथ पकड़ि लेलक-संसारक पैघसँ पैघ किरिया खा सकैत छी हम। खुआ ले।
सुनीताकेँ मात्रा एतबे बाजल भेलै-आब तकर बेगरता नइं छै।
बहुत दूर पच्छिम दिस मेघ हड़हड़ा उठलै। बिजुली चमकि उठलै। लगलै जेना ओत’ दू गोटा नइं, एक्कहि गोटा ठाढ़ होअए।
हेम बहादुरक बाहुपाशमे सुनीताकेँ सुखक अनुभूति भेलै।
मोन्हारि साँझ भ’ गेलै। दुनू बिदा भेल। सुनीता निर्णय नइं क’ पाबि रहल छल जे ओ हारल छल आ कि जीतल।
दुनू दाम्पत्य बन्हनमे बन्हा गेल। टोल-पड़ोसमे फदका होम’ लगलै। नहूँ-नहूँ सभ किछु सामान्य भ’ गेलै।
बियाहक बादो सुनीता अपन घर आ गायक सेवा नइं छोड़लक। हेम बहादुर अपन खोपड़ी, अपन संगी दीपक सुब्बाक हाथें बेचि देलकै।
दुनू कमाए-खाए लागल आ रह’ लागल। घास काट’ लए सुनीता नइं, हेम बहादुर जाए।
समय पर समयक पथार लाग’ लगलै।
मुदा, बहुत दिन धरि एहि तरहें नइं रहि सकल ओ सभ। हेम बहादुरक बहसल मोन छान-पगहा तोड़’ लगलै। ओकर लुत्तुक अकास चढ़’ लगलै। सुनीता अपनामे कमी ताक’ लागल। आखिर ओकर हेम पुनः किऐ बहकि रहल छै।
हेम बहादुर दारू पीबि क’ आब’ लागल आ सभ राति दुनू प्राणीमे झगड़ा होम’ लगलै।
दरुपीबा पुरुष सुनीताकेँ किन्नहुँ पसिन नइं छलै।
नहूँ-नहूँ हेम बहादुरक आन-आन बानि सभ सेहो सुनीताकेँ बुझबामे अएलै। ओ हेम बहादुरकेँ समझाब’ बुझाब’ लागल, मुदा ओकर सभ प्रयास व्यर्थ भ’ गेलै।
स्थिति एत’ धरि पहुँच गेलै जे हेम बहादुर आठ-आठ दिन घरसँ बाहर रह’ लागल। ओकरा लेल सुनीतासँ बेसी महत्वपूर्ण भ’ गेल छलै कान्छी दोकानक दारू... तिनपतिया... पपलू... फलास...।
सुनीता सभ किछु सहैत रहल।
सुनीताकेँ सभसँ बेसी दुःख ओहि दिन भेल रहै जहिया ओकर गाय बिका गेलै। हेम बहादुर दुखित होम’ लागल रहए। ओकरे दबाइ-बीरो लेल सुनीताकेँ गाय बेच’ पड़लै।
सुनीताक गाय दीपक सुब्बा कीनने छल। हेम बहादुरक दोस।
एते दिन सभ किछु बर्दासि कएलक सुनीता। मुदा ओहि दिन हेम बहादुर साफे कहि देने रहै-आब तोरासँ मोन ओंगठि गेल।-ई गप्प सुनीताकेँ सहरजमीन पर आनि देलकै। ओकरा पराजय-बोध भेलै। लगलै जे ओकरा जीवनमे हारिए-हारि छै।
गाय बेचलाक बाद जे टाका भेटलै, ताहिसँ थोड़ेक हेम बहादुरक दबाइ लए खर्च कएलक आ एकटा सेकेण्ड हैण्ड सिलाइ मशीन किनलक। ओएह सिलाइ मशीन ओकरा जीवनक आबलम्ब भ’ गेल रहै।
हेम बहादुर अपन बानि नइं छोड़ि सकल। ओकर रोग बढ़िते गेलै। आब ओ घर आएब सेहो बन्न क’ देने रहए। दीपक सुब्बा कहने रहै सुनीताकेँ-भौजी! दोसक रोग ठीक होम’ बला नइं छौ। सम्पूर्ण विश्व एहि रोगक इलाज लेल अपस्यांत अछि। हम-तों की छी?
अन्ततः हेम बहादुरक जीवन-लीला समाप्त भ’ गेलै। मेचीक कातमे मुइल पड़ल देखलकै लोक सभ। सुनीताकेँ कहलकै। ओ पाथर भ’ गेल। देखहु लेल नइं गेल हेम बहादुरक लहासकेँ।
हेम बहादुरक सेवामे ओ स्वयंकेँ एहि तरहंे समर्पित क’ देने छल जे ओकरा इहो सोह नइं रहलै जे मज्जर कहिया टिकुला भ’ गेलै। सुनीताक हाथ-पैर भारी होम’ लगलै। अन्न-पानिसँ अरुचि होम’ लगलै। देह पीयर भेल जाइत छलै... आदि आदि। आइ जखन हेम बहादुर नइं छै, तखन ओकरा सोह भ’ रहल छै जो ओ माइ बन’ बाली अछि।
दीपक सुब्बाक अबरजात बढ़ि गेलै। मुदा, सुनीता ओकरा अपन उद्देश्यमे सफल नइं होम’ देलकै।
सातम मासमे सुनीताकेँ बच्चा भेलै। बेटा रहै। मुदा छौंड़ा बचलै नइं। जनमि क’ मरि गेलै। दीपक दबाइ-बीरो करौने रहै ओकर।

सुनीताक देहमे सक्क लाग’ लगलै। ओ मशीन चलाब’ लागल छल। दीपक आबै। घंटाक घंटा बैसै आ प्रणय निवेदन क’ चल जाइ।
सुनीताक मोन कोनादन कर’ लगलै। लगै जेना कोनो आवामे जड़ल जाइत होअए... अथाह पानिमे डूबल जाइत होअए... कोनो सड़ल-गन्हाएल डबरामे उबडुब करैत होअए।
सभ पुरुषक आकृतिमे हेम बहादुरक छवि देखए सुनीता, आ ओकर मोन तुरूछि जाइ।
ओ सोचलक। दीपक सुब्बा घर-परिवार बला लोक अछि। ओकरा मात्रा सुनीताक घर आ देहसँ मतलब छै। ओ सुनीताक भ’ क’ नइं रहि सकैछ।
ओ नियारलक-आब बेसी दिन धरि अपन चेतनाकेँ ठकि क’ नइं राखि सकैछ। ओकरा की चाही? ओकरा नइं चाही सिन्नुर आ ने कोनो इलबाइस। ओकरा किछु नइं चाही। मात्रा जीबाक लेल चाही पाँच हाथ वस्त्रा आ पाँच क’र अन्न। से ओ मशीन चला क’ उगाहि लेत। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नइं चाही। ई घर नइं चाही। ई घर ओकरा काटि क’ खा जेतै। एत’ भरि घर हेमे बहादुर देखाइत छै ओकरा।
आ एक दिन सुनीता अपन मशीन आ मोटा-चोटा उठौलक आ आबि गेल बजार। दिल कुमारीक घरमे किरायामे रह’ लागल।

दिल कुमारी केबाड़ पीटलकै, तखन तंद्रा भंग भेलै सुनीताक। ओ हड़बड़ायल। उठल। राति भरि जागबाक उझकी रहै। अंगैठी-मोर कएलक। मोन भेलै जे आइ काज नइं करए। दिन भरि अरामे करए।
मुदा से भ’ नइं सकलै। नगरपालिकाक मेहतर अपन बेटीक बियाह बला कपड़ा आ नाप सभ द’ गेलै। संगहि एकटा समाद सेहो कहने रहै-बहिन गे! प्रधान पंच तोरा बजलकौए। आइए दू बजे। आॅफिसमे।
सुनीता अचरजमे पड़ि गेल। प्रधान पंच ओकरा किऐ बजौतै? ओकरासँ कोनो अपराध तँ ने भ’ गेलै अछि।
एत’ अएलाक बाद कतोक आँखिक प्रहार सहलक अछि सुनीता। बहुतो लोक हुलकी-बुलकी देलकै। एक दिन दीपक सुब्बा सेहो आएल रहै, मुदा ओ ओकरो मुँह दुसि देलकै। ओ अपरतीव भ’ क’ चल गेल। सुनीता अपन निर्णय पर दृढ़ अछि। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नइं चाही।
पुनः एकटा प्रश्न ओकरा मोनकेँ हौंड़ि दैक। प्रधान पंच किऐ बजौलकैए?
ओ कार्यालय पहुँचल। प्रधान पंचसँ बजएबाक कारण पुछलक। प्रधान पंच पुछलकै-तों एकसरिए रहै छें?
-हँ।
-आर क्यो?
-क्यो नइं।
-एकटा काज क’ सकैत छें?
सुनीताकेँ डर भेलै। ओ डेरायल बाजल-कोन काज?
-कोनो खराप काज कर’ नइं कहैत छियौ।-प्रधान पंच एकटा अबोध बच्चा दिस संकेत करैत बाजल-देख! ई अबोध अनाथ छै। तोरो क्यो नइं छौ। एकरा पोस। धर्मो हेतौ। पाछाँ जा क’ ई बुढ़ारीक सहारा हेतौ। नगरपालिकासँ एकर खर्च सेहो भेटतौ, एक सए टाका मास।
सुनीता ओहि छौंड़ा दिस तकलक। देखनुक रहै छौंड़ा। तीन-चारि बर्खक रहल हेतै। ओ सकपका गेल। बाजल-विचारि क’ कहब।
-ककरासँ?
-अपन मोनसँ... काकीसँ।
ताबत ओ अबोध आबि क’ सुनीताक आँचर पकड़ि लेलक। सुनीता पुनः ओहि छौंड़ाकेँ देखलक। ओकर मात्सर्य उमड़ि गेलै। ओकर मोन पिघलि क’ आँखि बाटें बहार होम’ लगलै।
क्षणहिं ओ नोर पोछलक। नइं, ओ एक सए टाकामे एकटा घेघ नइं लेत। स्वयंकेँ कोनो सम्बन्धमे नइं बान्हत। कोनो सम्बन्ध नइं... कोनो सरोकार नइं...।
छौंड़ा आँचर पकड़नहिं छल।
दोसर मोन कहलकै। ई घेघ नइं। कंठी-माला छौ-राम नामा। ई नइं ठकतौ। ई धोखा नइं देतौ। कतहु पड़ा क’ नइं जेतौ।
सुनीताक मोन सकपक कर’ लगलै। ओकर करेज जोर-जोरसँ काँप’ लगलै। ओ किछु निर्णय नइं क’ पाबि रहल छल। लोक सभ देखैत रहलै। करुणा आ ममताक विचित्रा दृश्य उपस्थित भ’ गेलै।
सुनीताकेँ लगलै जेना क्षणहिमे माया, मोह, स्नेह, भूख, प्यास आ ओकर सम्पूर्ण संवेदना जागि उठल हो। ओकरा सकपंज क’ नेने हो। ओकरा हरलै ने फुरलै, ओहि नेना दिस तकलक आ ओकरा कोरामे उठा क’ चुम्मा लेब’ लागल।
मातृत्वक सजीव मूर्ति बनि गेल सुनीता।
सुनीता कागज बनौलक। नगरपालिका दिससँ तीन मासक अग्रिम भेटलै आ छौंड़ाकेँ ल’ क’ डेरा आएल।
सुनीताक निर्णय दिल कुमारीकेँ सेहो नीक लागल रहै।
छौंड़ा बौक छलै। छौंड़ाक बौक होएब, सुनीताकेँ कने झूस बना देने रहै। ओ छौंड़ाकेँ बजएबाक प्रयास कर’ लागल।
ओहि राति लागल रहै सुनीताकेँ, जेना खूब सुखसँ सूतल होअए। बौकाकेँ करेजमे साटि क’ सूतल छल। अपन जनमल नइं भेलै ताहिसँ की? ओकर मातृत्व सजग भ’ गेलै। मातृत्वक सम्पूर्णताक बोध भेल रहै ओहि राति।
छौंड़ा बौके नइं, अखलाह सेहो रहै। मुदा सुनीताक लेल ओ सोन सन रहै। आब सुनीता ओकरा अपना संग, काज बट्टम बला काजमे सेहो लगाब’ लगलै।
शुरुहमे छौंड़ा बड़ तंग करै ओकरा। काज दिस बट्टम लगा दै आ बट्टम दिस काज बना दै। नहूँ-नहूँ सुनीता ओकरा सीखाब’ लागल। छौंड़ा सीखि लेलक।
मुदा छौंड़ाक एकटा बानि एखनो छै। एखनो ओ सुनीताक करेजेमे सटि क’ सुतैत अछि। एक हाथ सुनीताक देह पर, दोसर... आ टाँग सुनीताक दुनू टाँगक बीच घोसिया क’...। निर्विकार भावें सूति रहै बौका। सुनीताक मातृत्व छलकि जाइ। ओहो ओकरा पजिया क’ सूति रहए।
ओना दिल कुमारी एक दिन मना कएने रहै-बौकाक ई आदति नीक नइं छै। एखन ने नेना छौ! आ नेना की? आब तँ सियान भेल जाइत छौ। ओकर एहि आदतिकेँ छोड़ायब जरूरी।
सुनीता बाजि उठल-काकी। तोरो मोनमे पापे उठैत छौ। धुर जो...।
समय बीत’ लगलै। सुनीताक मशीनक चक्का चल’ लगलै। बौका काज-बट्टम कर’ लागल।
समयक संग महगी बढ़लै। मजूरी, दरमाहा बढ़लै। बढ़लै कपड़ाक सिआइ। बाट बढ़लै। पीच रोड बढ़लै। मोटर गाड़ी बढ़लै। उड़ीस-मच्छर बढ़ि गेलै। लबरै-लुचपनी बढ़लै। दू-नमरी धन्धा आकास छूब’ लगलै।
घरक किराया बढ़ि गेलै। सुनीताक दोकान आ सुतबाक कोठरी फराक भ’ गेलै। नगरपालिकासँ भेट’ बला टका बन्न भ’ गेलै।
दिल कुमारीक बयस बढ़ि गेलै।
बौका सेहो जुआन होम’ लागल। सुनीता प्रौढ़ा होम’ लागल।
समय बदललै। राति-दिन मासमे बदलि गेलै। मास बर्खमे। बर्ख युगमे। पंचायती व्यवस्था बदललै। प्रधान पंच बदलि गेलै। मेयर भ’ गेलै। जनमत संग्रह भेलै। आम चुनाव भेलै। प्रजातांत्रिक व्यवस्था भेलै। संविधान बदललै।
मुदा, बौकाक बानि नइं बदललै।
सुनीताकेँ लगै जे ओ डोलि ने जाए। ओ बौकाक ओछाओन फराक क’ देने छल। मुदा बौका राति-राति भरि जागि क’ बिता दै। प्रात भेने जखन काज-बट्टम करै तँ निसभेर भेल बुझाइ, आँगुरमे सुइया भोंकि लै। सुनीताक ममता जागि जाइ।
एते दिन तँ नइं मुदा आब बौका सुनीताक गराक घेघ बनि गेल छै। सुनीता विचित्रा उहापोहमे फँसल छल। बौका ओकरा गरदनिक ढोल बनि गेल छै, ने बजौनहिं कल्याण आ ने हटौनहि शान्ति। कत’ जेतै छौंड़ा?
माघक पाला पड़ैत छलै। बौकाकेँ दोकान बला कोठरीमे ओछाओन क’ देने रहै सुनीता। मुदा छौंड़ा नइं मानलकै। अन्ततः सुनीता अपन कोठरी बन्न क’ लेलक। बौका दोकान बला कोठरीमे ठिठुरैत रहल।
सुनीताकेँ सेहो निन्न नइं भेल रहै। एकटा आशंका जगौने रहै। बौका सुतलै, आ कि जगले छै?
ओ केबाड़ खोललक। बौकाकेँ ठिठुरैत देखि ममता जागि उठलै। ओकरा पुनः अपने लग बजा लेलक। बौका गेल आ सुनीता लग अपन बानिक अनुसारेँ निर्विकार भावें सूति रहल-एकटा हाथ सुनीताक देह पर... दोसर... आ टाँग...। ओ निन्न पड़ि गेल।
ई क्रम पुनः चल’ लगलै। एही क्रममे एक राति डोलि गेल सुनीता। कोन सीमा धरि संयमित रहितै? ओकर संयम टूटि गेलै। सीमा पार क’ गेल। ओकर चेतना मरि गेलै। ओ, घिना गेल।
मुदा, बौकाक लेल धनि सन। ओकरा ने हर्षे होइ, ने विषादे।
प्रात भेने सभ किछु सामान्य रहै। असामान्य मात्रा एतबे रहै जे सुनीता भरि मोन बौकाकेँ देखि नइं पाबए। ओकरा ग्लानि होइ। मोन होइ जे एहि घिनाएल जिनगीसँ मुक्तिए उचित। मुदा बौका? ओकरा बाद बौकाकेँ के देखतै?
आ सुनीता किछु नइं क’ पाबए।
अपन सभटा असमर्थता एक दिन दिल कुमारीकेँ कहने रहै सुनीता। दिल कुमारी सभ किछु सुनि नेने छल आ अन्तमे बड़ निर्दयी भ’ बाजल छल-जाहि दिन एहि छौंड़ाके जिम्मा लेलही, तहिया नइं बुझलही जे नमहर भ’ क’ इहो पुरुषे हेतै।
-मुदा बौकाक की दोष छै, काकी? ओकर कोनो दोष नइं छै। हमहीं...।
एक दिन साँझ खन बौका बजार दिस बहार भेलै, से घुरि क’ नइं अएलै। चारू कात ताका-हेरीमे लागि गेल सुनीता। राति बीति गेलै, मुदा बौका नइं अएलै।
पाँच दिन बीति गेलै। सुनीता कात करोटक सभ शहर-बजार आ गाम घर छानि लेलक, मुदा बौका ने भेटलै आ ने अएलै।
सुनीता हारि क’ बैसि रहल। ओकर मोन हदमदाए लागल रहै। देहमे कोनो सक्के नइं लगै।
दिल कुमारी ओकरा सम्बल देलकै ओहि दिन। ओ सुनीताक माथ अपन जाँघ पर राखि नेने रहै आ ओकर केश पर हाथ फेर’ लगलै। सुनीताकेँ जीवनमे पहिल बेर माइक छाँह सन लगलै दिल कुमारीक स्नेहिल हाथ।
कने कालक बाद दिल कुमारी बाजलि-उठ! आब बौका नइं औतौ। चल अस्पताल। खसबा दैत छियौ।
सुनीता टुकुर-टुकुर दिल कुमारी दिस ताक’ लागल। ओ कोनो निर्णय नइं क’ पाबि रहलि छल। दिल कुमारी बाजल-जा धरि मरैत नइं छें, मशीन चलाबहि पड़तौ। लोकक फाटल-पुरान सीबहि पड़तौ।
सुनीताक सिलाइ मशीन एखनहुँ चलिते छै। कपड़ा सीबि लेलाक बाद ओ एक बेर विराट शून्यमे तकैत अछि... तकैत रहैछ, मुदा तखनहि दिल कुमारी ओकर तंद्रा भंग क’ दैछ-ला! काज-बट्टम क’ दैत छियौ!

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पन्द्रह अगस्त सन्तानबे
तारानन्द वियोगी

-तों हमरा बहुत तंग करै छह हीरा! देखहक जे आइ फेर लेट भ’ गेलै। एना काज चलतह? तहन तँ लगाए दहक धीया-पुताक मुँहमे जाबी-हीरा महतो अपनेकेँ अपना कहलनि।
-हम करिऐ तँ की करिऐ? मोने सक्कमे नइं रहैए। सब कहैए जे बेकार के चिन्तामे पड़ल छह, लेकिन हमरा कहाँ लगैए जे बेकार के चिन्ता छिऐ-हीरा महतो सोचलनि।
चारू कात रौद पसरि गेल रहै। महिसबार सभ महीस चरा क’ घुरि आएल रहए। हराठ गेनिहार सभक प्रायः अन्तिम दल बाध दिस प्रस्थान करै छल। कोढ़ियाठे हरबाह सभ आब बचल होअए तँ होअए। ऐती जैती तीन टा मैक्सी एखन धरि चैक परसँ विदा भ’ चुकल रहै। भोरुका बेरमे चैक पर चाह पिनहार लोक सभ आबि क’ घुरि गेल रहै। मास्टर लोकनि साइकिल पर सवार अपन-अपन स्कूल लेल विदा होअए लागल रहथि। चैक मेन्टेन केनिहार गामक बेरोजगार जुबक लोकनि अपन-अपन स्थान ग्रहण क’ नेने रहथि।
हीरा महतोकेँ आइ फेर देरी भ’ गेल रहनि।
उत्साहहीन आ लयहीन पैरेँ चलैत हीरा महतो अपन दोकान लग पहुँलाह। तीन-चारि गोटे मचान पर बैसल रहथि। सहरसा दिस जाइबला अनगौआं मोसाफिर लोकनि छलाह।
हीरा महतो कठघरा खोललनि। सर-समान बहार कएलनि। पानि भरि क’ अनलनि, बरतन-बासन धोलथि-पोछलथि आ स्टोव जरा क’ पानि चढ़ा देलखिन। औंटल दूध जे संग अनने छला तकरा दुधौंटामे ध’ देलखिन। ई सभ काज मुदा बड़ा असथिर-असथिर भेल। लागै छल जेना हीरा भीतरे-भीतर कोनो भारी गुनधुनमे पड़ल खौंत सहि रहल होथि आ ई सभटा काज जेना अपने, सहज गतिमे मशीनी ढंगसँ पूरा भ’ गेल हो।
-सएह, ई हालति भ’ गेलै समाजक? बसुदेवा हमरा एहन बात कहि देलक? बसुदेवा कहलक? हें...-हीरा महतो अपनेकेँ अपना कहलनि आ एक बेर उदास हँसी हँसलाह।
पहिल खेपक चाह तैयार भ’ गेल छलै। मोसाफिर सभ जे बैसल छलाह से लोकनि चाह मँगलनि। हीरा हुनका सभकेँ चाह देलखिन आ एक गिलासमे निकालि क’ अपनहुँ पीब’ लगलाह।
-की हीरा? खुलि गेलौ दोकान?-हीरा देखलनि पं. भोलानाथ मिसर छलाह। पुरान गांधीवादी। हीरासँ हुनका खूब अपेक्षितारए छलै, आ ओ एहि दोकानक नियमित गँहिकी छलाह।
-हँ कका, अबियौ। बैसियौ।-हीरा बजलाह आ पण्डिज जी लेल चाह बहार करए लगलाह।
पण्डित जी मचानक एक कोन पर बैसि गेलाह। ओ प्रायः जलाश्रय दिससँ घुरल छलाह। हुनका धोतीक निचला भागमे मारिते रास चिड़चिड़ी लागल रहनि।
पण्डित जीकेँ पाबि हीरा कने उत्साहित भ’ गेल छलाह। ओ अप्पन लोक-सन लागैत रहलखिन हें। ई बात भिन्न जे हीरा जहिया कहियो कोनो मुद्दा पर सीधा संघर्षमे फानलाह अछि, सभ दिन पण्डित जीकेँ अपना संग अएबाक अनुरोध केलखिन, मुदा ताहिसँ कहियो पण्डित जी सीधा संघर्षमे नइं उतरलाह। निष्कर्ष पर पहुँचलाह जे सीधा संघर्षे टा एक मात्रा रस्ता नइं छिऐक, पण्डित जीक जे बाट छनि सेहो अपना जगह पर ठीक छनि।
हीराक नजरि पण्डित जीक धोतीमे लागल चिड़चिड़ी पर पड़ल। ओ मुस्कियाइत बजलाह-सएह, एकरा देखियौ कका, चिड़चिड़ी सनक नाचीज वस्तु! की औकाति छै? लेकिन मनुक्ख सन बलशाली आदमी जँ एकरा दललक तँ तकरो नइं छोड़लक। भरि जानें बकुटि लेलक। की?
पण्डित जी हँस’ लगलाह। कहलखिन-गांधी जी देशवासीकेँ सभसँ पैघ बात इएह ने कहलखिन हौ! ओ कहलखिन जे जे जतहि छह, निर्भय बनह। बड़ पैघ बात ई भेलै की ने? देखहक हीरा, शोषक कतबो बलशाली होअए, लोक जँ ओकरासँ डेराएब छोड़ि दिअए, तँ प्रश्ने नइं छै जे ओ जीतत। भगवान जे ई दुनिया बनेलखिन, तँ सभकेँ उचित-उचित हथियार देलखिन, जे अपन-अपन रक्षा करह। से सबकेँ छै। मुदा, लोक भयभीत अछि, तँ अपने हथियार ओकरा अपने नइं देखार पड़ै छै! की?
-हँ कका, ठीके।-हीरा बजलाह-आब ई बात दोसर जे हथियार भगवान देलखिन आ कि लोककेँ अपनेसँ तकर विकास करबाक छै!
पण्डित जी मुस्किएलाह-हँ, हमरा-तोरा विचारमे एतबा तँ अन्तर रहले ताकए।
हीराक दोकानक बामाकात गोलम्बर छै। पाखरिक विशाल गाछक चैबगली जवाहरलालक रोजगार योजनाक अन्तर्गत गोल चबूतरा बना देल गेलैए। चारि बरख बनना भेलैए। एहि बीचमे, एक खेप तँ निर्माण भेल, आ दू-दू खेप मरम्मती भ’ चुकल अछि। ओ चबूतरा ताड़ीबाज, दारूबाज, गँजेरी, जुआरी सभक अतिरिक्त गामक बेरोजगार जुबक सभक आश्रय स्थल सेहो थिक।
ओहि गोलम्बर पर एखनहुँ गोट दसेक नौजबान सभक मजलिस लागल रहै। ताहि मजलिसमे एकाएक बड़ जोर हल्ला भेलै। हल्ला सूनि पण्डित जी उठि क’ ठाढ़ भेलाह आ पाँच डेग आगाँ बढ़ि देख’ लगलाह जे की बात अछि! कोनो बात नइं रहै। नौजबान सभ गाँजा पीबि रहल छल, निशांक आवेग मे थोड़े हँसी-मजाक भेल रहै। पण्डित जी आगाँ बढ़ि क’ नौजबान सभकेँ देखलनि तँ ओहो सभ पण्डित जीकेँ देखि लेलक। नौजबान सभ पण्डित जीकेँ देखलक तँ पूरा शक्ति लगा क’ मन्त्रा उचारलक-
बम भटक, चिलम पटक
दम मारए पुबारि टोल
गांड़ि फाटए पछबारि टोल
हर हर महादे... व...

पण्डित जी चुपचाप घुरि अएलाह। चिलम-पार्टीक नौजबान सभ पुबारि टोलक छल आ पण्डित जीक घर पछबारि टोल पड़ैत छलनि, कहब आवश्यक नइं।
पण्डित जी चुपचाप घुरि अएलाह। हीरा सभ टा बात सुनिए रहल छलाह। हुनका लेल ई कोनो नब बात नइं रहनि। चैकक इएह संस्कृति छलै, इएह सभ्यता। हीरा अनेक बेर एकर विश्लेषणो कएने रहथि आ निर्णय कएने रहथि जे वस्तुतः चैक सम्पूर्ण गामक सभ्यताक एक अइना मात्रा छल। ओ एकाध बेर एहि प्रकारक नौजबान सभसँ भिड़न्तो कएने रहथि। मुदा, हीराक हथियार बहुत पुरान छल। दुनाली बन्दूकसँ ए. के. 47 केँ मातु नइं देल जा सकैत छल। हीरा ओकरा सभकेँ कहने रहथिन-की यौ विद्यार्थी सब! इएह होइ? एखन जीवन निर्माणक समय अछि? माइ-बाप आस लगेने बैसल छथि। भारत माता कते सेहन्तासँ अहाँ सबकेँ देखि रहल छथि। इएह होइ?
हीरा अन्दाज कएने रहथि जे एतबा कहलाक बाद नौजबान सभ तर्क करत। चिलम पिबाक पक्षमे अपन विचार देत। कहत जे ई नेता सब आ ई लोकतंत्रा नौजबान पीढ़ीकेँ श्मशान-घाट पहुँचा देलकै-आब जीवन निर्माणक कोन सवाल? हीरा सोचने छलाह जे जुबक सभ एतबा बात कहत तँ हमहँू अपन बात कहबै जे रे भाइ, निराश भेने तँ काज नइं चलतहु। अन्हरिया जँ बड़ जड़िआएल छै तँ इजोतक ओरियान करी, तखन ने मर्द? हीरा अन्दाज कएने रहथि जे अन्ततः एहि जुबक सभकेँ जीवन दिस आ निर्माण दिस आकृष्ट कइए लेबनि!
मुदा, हीराकेँ खूब नीक जकाँ मोन छै। ओ नौजबान सभ कोनो तर्क, कोनो विचार नइं रखने रहए। ओ सभ गप-सपक भाषा गद्य मे कोनो उच्चारणे नइं कएने रहए, ओ सभ जबाब देने रहए कोरस-मय संगीतबद्ध पद्यमे-
बम भटक, चिलम पटक
दम मारए ब्राह्मण-पुत्रा
गांड़ि फाटए राड़-पुत्रा
हर हर महादे... व...
पण्डित जी चुपचाप घुरि अएलाह आ मचान पर बैसि रहलाह।
गँहिकी सभ पाइ द’ द’ क’ ससरि गेल रहए। सहरसा दिस जेबा लेल एकटा गाड़ी आबि गेल रहै। पाँच-छह गोटे जल्दीसँ चाह मांगलकै। ओकरो सभकेँ इएह गाड़ी पकड़बाक रहै। हीरा बिनु एक शब्द बजने गँहिकी सभकेँ चाह पियौलक आ पाइ लेलक। दोकान तखन खाली भ’ गेलै।
पण्डित जी पुछलखिन-हीरा, आइ-काल्हि तोरा बड़ उदासीन देखै छियह...
हीरा गिलास साफ करैत रहथि। बजलाह-हँ कका, हे इएह, बारहो बरनक अइंठ धोइ छी, अहिना धोइत रहब। एनामे के उदासीन नइं हैत?
पण्डित जीकेँ ओ समुच्चा प्रसंग मोन पड़ि गेलनि। तीन दिन पहिनेक ओ प्रसंग। ओही दिन साँझमे हीरा हुनका सुनौने रहथिन। हीरा ओहि दिन बहुत दुखी रहथि। हीराक मुँहेठ पर दुखक गहनता देखि क’ ओहि दिन पण्डित जी हिसाब कर’ लागल रहथि जे देसक आजादी दिन गांधी जीक मुँहेठ पर प्रायः एहने पीड़ा रहल हेतनि। ओ हीराकेँ सम्हारबाक बहुत कोसिस कएने रहथि। हनुमानकेँ जेना जामवन्त आत्मनिरीक्षण करबौने रहथिन, प्रायः सएह चेष्टा ओहि दिन पण्डित जी कएने रहथि। मुदा सभ व्यर्थ गेल जेना। हीरा आइयो दुखी छथि आ उदासीन छथि।
-कका, ओ खिस्सा अहाँकेँ मोन अछि? सन सतहत्तरि मे जे हमर दोकान जरौने रहए! अहाँ तँ ओहि समयमे गाममे नइं रहैत रही। ओही साल हम लखनउसँ घूरल रही। लखनउ युनिवर्सिटीमे सुनल-देखल बात सब अतमा मे हिलकोर लैत रहए। देखनहि रहिऐ जे इमरजेन्सी मे जनताकेँ कते सताएल गेल रहै। भारत माताकेँ कोना निखत्तर पहुँचाए देने रहै। हमर बाप ओही साल मुइल छलाह। माइ कहलक जे गामे आबि क’ दोकान-दौरी करह। अइ गामकेँ ताधरि हम चिन्हैत नइं रहिऐ कका! ओहि साल एलेक्सन जे भेल रहै, के ठाढ़ भेल रहथि अइ ठाँ सँ?
-हँ, नन्दकिशोर पाठक ठाढ़ भेल रहथि।-पण्डित जी कहलखिन।
-आ, से नन्दकिशोर पाठक ने हगबा जोग ने मुतबा जोग।
-हँ, ठीक कहलिऐ कका! आ ओएह अइ ठाँ सँ जीतल रहै। किऐ यौ बाबू, तँ ब्राह्मण छी। वाह रे जाति। समुच्चा ब्राह्मण समाज काँग्रेस दिस। आ पचपनिया जे रहै से तँ बुझियौ जे ब्राह्मणक पैर तरक खढ़ रहै। सबटा भोंट छापि लेलकै।
-तहिया बुझितो नइं रहै लोक आ हिम्मतो नइं रहै।-पण्डित जी कहलखिन।
-से बात असली नइं रहै कका। असली बात रहै जे लोक भिखमंगा रहै। उचित मजदूरी भेटै नइं तँ पेट नइं भरै। तखन तँ ब्राह्मणम् शरणम्। दिल्ली-पंजाब जहियासँ लोक देखलक, तहियासँ मुँहमे बोल होअए लगलै, माथमे दिमाग... हँ तँ से खैर! हमर मोन नइं मानलक। हम लखनउ यूनिवर्सिटीक हालति देखने छी कका! जान दै ले लोक तैयार रहए। उचित बात लोक तते चिकरि क’ बाजए जे अपकारी सब कोन दाबि दै। सब मामिलामे देस चलि आबैक। ई बात जे हैत से देसक हितमे की नइं? देशक कल्याण लेल जे उचित थिक, सएह टा एहि राज्यमे, कि एहि जिलामे होना चाही। आ से बुझबै? द्वारिका मिसर मुख्यमंत्राी नइं बनथि, तकर चेष्टा लेल जँ पचीस-पचास क्रान्तिकारी जुबककेँ गोली खाए पड़नि तँ तकरा लेल तैयार लोक भेटै छल। कैक टाकेँ तँ हम पुलिसक गोलीसँ मरैत देखलिऐ यूनिवर्सिटी गेट पर। हम तँ चाह-दोकानक नोकर रही, हमर की औकाति? लेकिन कका, पाँच-छह टा शहीद सभक जुलूसमे हम घाट तक गेल छी। छिनरी भाइ मलिकबा, तै लए हमरा आठ चैरिक मारि मारए...
हीरा महतो कने थम्हलाह, आ तुरंते पहुँचल दू टा गँहिकी लेल चाहक पानि चढ़ा देलनि। स्टोभ पर दूध चढ़ल रहै, तकरा उतारि देलनि।
हीराक गप्पक आवेग उतर’ लागल छल, मुदा विधिवत समापन करब हुनका जरूरी बुझना गेलनि। ओ बजलाह-सएह कहलहुँ कका, ताहू दिनमे अइ गाँमे हम ठाढ़ भ’ गेल रहिऐ। ब्राह्मण लोकनि तँ हमर बात नइं सुनलनि, लेकिन सौंसे गामक पचपनियाकेँ हम होशमे आनि देलिऐ।-हीरा फेर चुप भेलाह।
-हँ, ठीके होशमे आनि देलहक-पण्डित जी बजलाह।
-हँ, अपना दिमागसँ आदमी सोचए लागए, सएह ने होश भेलै।-हीराकेँ लगलनि जे पण्डित जीकेँ भाव पकड़ैमे किछु दिक्कति भ’ रहलनि अछि, ओ स्पष्ट कएलनि।
ससपेनमे चीनी आ चाह पत्ती खसबैत हीरा फेर बजलाह-आ तै गाममे आइ हम भगौआ-पड़ौआ भ’ गेलहुँ। ओ लुच्चा बसुदेबा कहलक जे लबर-लबर नइं करह, बारहो बरनक अइंठ धोइत जीवन गेलह हें, अहिना अपन चुपचाप करैत रहह। इएह होअए कका, इएह होअए?
हीरा महतो चुप भ’ गेलाह। मुदा, हुनक मुँहेंठ एकदम विकृत आ ललौन रहनि। बड़का बिहाड़ि-पानि भीतर चलि रहल छलनि, जकर झाँट बाहर मुखाकृति पर साफ खसैत देखार पड़ैत छल। ओ एकदम अशान्त छला। हुनक मौन एकदम भ्रामक मौन छलनि। ओ भीतरसँ एकदम मुखर छलाह। बाहर जँ मौन आबि क’ व्याप्त भ’ गेल छल तँ से एही टा कारण कि ओ गहन निस्संगताक पीड़ासँ दुखी रहथि।
-बाजब तँ, मुदा सुनत के? आ जँ क्यो सुनबे नइं करत तँ बाजब कथी लए-भीतरे-भीतर मुदा जड़ैत-धधकैत रहब, खौलैत-खदकैत रहब-एहि पीड़ाक अनुभव कहियो अहाँकेँ अछि?
हीरा जाहि प्रश्नसँ अपन बात समाप्त कएने रहए, तकर कोनो जवाब बूढ़ आ रिटायर्ड गांधीवादी, हाइस्कूलक मास्टर पण्डित भोलानाथ मिसर लग नइं रहनि। एहि प्रश्नक उत्तर एहि गाममे, एहि परोपट्टामे, एहि राज्य आ एहि देशमे ककरो लग नइं रहै...
पण्डित जी चुपचाप मूड़ी निहुरा लेलनि आ प्रकृतिस्थ हेबाक चेष्टा कर’ लगलाह। हीरा हुनको उद्विग्न क’ देने रहनि। ओ बजलाह-चलै छियह हीरा, आब! फेर सँझुकी पहर भेंट हेतै।
-बड़ बेस।-हीरा उत्तर देलकनि।
ता, दुसधटोली के आठ-दस टा जुबक सभ दोकान पर पहुँचलै। सभ क्यो बेरा-बेरी कहलकै-गोड़ लागै छियह हीरा कका!-हीरा सभक अभिवादन स्वीकार कएलनि।
ओकरा सभक मेठ रहै पितम्बर पासवान। ओ कहलकै जे जुबक सभ दिल्ली दिस चलै गेल अछि। की करतै? गाँमे कोनो काज-रोजगार नइं छै। बी. डी. ओ. जा धरि जेल नइं गेल रहै, ता धरि कोनो-ने-कोनो स्कीम चलैत रहै। मजूरी भेटि जाइक। मुदा, बी. डी. ओ. जेलो नइं जइतए तँ सेहो तँ नइं उचित। साला तिन-तिन हजार लोकक बुढ़बा पेंशन असगरे खा जाइ? जखन बड़का-बड़का नेता जेल जा सकै छथि तखन तँ बी. डी. ओ.केँ जेबाके चाही...
एकरा सभक दिल्ली गेनाइ हीराकेँ नीक नइं लगलै। ओ बजलाह-मियांक दौड़ मस्जिदे तक सब दिन रहतै पितम्बर?
पितम्बर बाजल-उपाय की कका?
-दिल्ली-पंजाब तँ पूँजी छिऐ ने हौ? ओएह जे कहबहक जे हमरा सभक जीवन छी, से त नइं ने छिऐ? ओतएसँ कमा क’ आनलह तँ आब अपन मातृभूमिकेँ रोशन करह। जेना देखहक तूँ जे दस टा जुबक छह, दसो मिलि क’ सौंसे फटोरिया बाध मनहुंडा पर ल’ लैह। दसो मिलि क’ ओतहि डेरा खसबह आ सौंसे बाधक सामूहिक खेती करह। बोरिंग दहक। टैªक्टर लगाबह। जेना ओतए खटै छह, तेना एतए खटह। दिल्ली-पंजाब फीका भ’ जेतौ पितम्बर!
हीरा कहलखिन आ प्रेरित-सम्मोहित करै लेल जेना थोड़े काल धरि पितम्बरक आँखिमे आँखि मिला क’ तकैत रहलाह।
-चाह दहक हीरा कका, आठ-दस गो।-पितम्बर बात बदलि देलक।
हीरा मुदा रौ मे छलाह, ओ बजलाह-नब्बे के एलेक्सन तोरा मोन छौ, पितम्बर? कोना दस-दस दिन हम सब घुरि कए घर नइं आबी! कोनो टोल कोनो घर नइं छोड़ने रहिऐ! अवधारि नेने रहथि ब्राह्मण सब जे जादबकेँ जीतए नइं देना छै। लेकिन देखलहक रहए, सबटा दछिनाहा पहलमान सब कोने दाबने रहि गेलै! एक्को टा बूथ कैप्चर क’ भेलै? आ, ओ जे गौरी झा हमरा पर बम फेंकने रहए पितम्बर, मननपुर चैक पर; मोन छौ ने, ओकरा पकड़ि क’ तूँ सब कते मारि मारने रहक!
पितम्बर सेहो आब अतीतक झलक पाबए लागल रहए। ओ बाजल-हँ कका, एह ओ तँ समैये जुलुम रहै!
-सभक जड़िमे छै मर्दानगी! अपन मातृभूमि पर जै शानसँ रहबहक, दिल्ली-पंजाबमे से शान चलतौ?-हीरा असली बात पर आबि गेलाह।
-अपन-अपन सोचै के बात छै!-पितम्बर फेर कनछी काटि गेल।
-ई बात किऐ कहलहक? हम की कोनो नजायज बात कहै छिअ’?-हीरा विचार-विनिमय के मूडमे छलाह।
पितम्बर एहि बेर सक्कत भ’ गेल। ओ बाजल-हीरा कका, एकटा बात पुछियह? खराबो लागतह?
-नइं भाइ, खराब किऐ लागत?
-तूँ तँ गोली-बम खा क’ जिता देलहक जादब जीकेँ। सरकारो बनि गेलह। लेकिन बाजह, दुसधटोलीमे एकटा इन्दिरा आवास बिना घूस के दिआए भेलह? धनुकटोलीमे ककरो एकटा बोरिंग भेटलै? तोरा टोलमे रोड बनलह? उचित बात जँ कहियो कहलहक तँ मेाजर देलकह जादब जी? नेता भेल के तँ असरफी दास आ बसुदेबा! तूँ ही ने कहैत रहह हीरा कका जे बसुदेबा पहिने मुंगेर लाइनमे पकेटमारी करैत रहए। आइ ओकर रुतबा देखहक। मुखमंत्राी एतै तँ ककरा दरबज्जा पर सरबत पीतै? तोरा दरबज्जा पर? छह मुखमंत्राी जोगर दरबज्जा? सेहो बसुदेबेकेँ छै ने हौ? मर्दानगी के गप की कहै छहक हीरा कका! भगवान जखन पेट देलखिन हें तँ कहुना लोक ओकरा भरै के जोगाड़मे लागत। अइमे मर्दानगी के कोन बात छै?-एक्के दममे पितम्बर बहुत रास बात कहि गेलै। मुदा, तुरन्त ओकरा लागलै जे कदाचित ओ किछु बेसिए रुक्ख भ’ गेल। ओ बाजल-माफ करिह’ हीरा कका! तूँ हमरा सबहक माथ के मुकुट छियह। लेकिन, उचित बात जँ बाजबहक तँ उचित बात सुनैयो ने पड़तह?
हीरा भकोभन्न चुप्पीमे बन्न भ’ गेलाह। खिस्सा फेर ओही ठाम आबि क’ ठमकि गेल रहए-ओही बसुदेबा लगमे।
जुबक सभ लए चाह बनि गेल रहै। ओ सभ चाह पिबिते रहए ता धरि मैक्सी स्टार्ट होअए लगलै। हबर-हबर सभ क्यो चाह खतम केलक। पितम्बर पैसा देलकै आ हीराकेँ पैर छूबि प्रणाम केलक। सभ जुबक बेरा-बेरी हीराकेँ प्रणाम केलक। पितम्बर कहलकै-चलै छियह हीरा कका, धीया-पुताकेँ देखिहक।
हीरा महतो कननमुँह भ’ गेल छलाह। गाड़ी खुलि गेलै। पितम्बरक अन्तिम वाक्य जेना वायुमण्डलमे गूँजैत रहलैक-धीया-पुताकंे देखिहक। धीया-पुताकेँ देखिहक।
-हें हें...-हीरा महतो मूड़ी डोलबैत एकान्ती हँसी हँसलाह आ अपनेकेँ अपना कहलखिन-इएह होइछै। लोक बड़ा जतनसँ घर ठाढ़ करैए। मुदा, पाँच बरस दस बरसमे घर ढहि जाइ छै! ठीक बात छिऐ। सभक एकटा औरदा होइ छै। मुदा अकाल मिर्त किऐ होइछै? अकाल मिर्त?
एही चिन्ता-विचारमे हीरा महतो पड़ल रहलाह। एक्का-दुक्का गँहिकी आबए, तकरा ओ चाह पिया देथि, पाइ ल’ लेथि, मुदा हृदयसँ आ मस्तिष्कसँ ओ कतहु आन ठाम छलाह। पछिला बीस बर्खक इतिहासमे ओ बौआ रहल छलाह। इतिहास जे छलै पछिला बीस बर्खक, जे घनघोर जंगल बनि गेल छलै। ओहि दिनमे जतनसँ रोपल पौध सभ आब बेतरतीब झाँखड़ बनि गेल रहए। औषधीय वनस्पति सभ सूखि क’ काठ भ’ गेल रहए आ ब’र-पीपर-पाखड़ि सन वृक्ष सभ धरतीक सभटा उर्वरता सोखि ल’ रहल छलै। हीरा महतो देखलनि जे छोटहन लता-गुल्म सभ कि तँ सुखा गेल छल, अथवा पीयर-कपीस भेल सुखा जेबाक क्षणमे प्रवेश क’ रहल छल। विशाल वृक्ष सभ अपन-अपन छाड़निक रद्दीसँ सौंसे इतिहासकेँ कबाड़खाना बना देने रहए। आ ताहि परसँ, सभटा रस चूसि गेल, तैयो सन्तोख नइं-हीरा पौलनि जे एकहक टा विशाल वृक्ष दस-दस टा जड़ि नमरा क’ धरतीकेँ सोंखि लेबाक आकुलतामे अछि। छोटहनसँ जे विशाल बनि रहल छल, सेहो सभ नहुएँ-नहुएँ एही अभियानमे जुटि गेल छल। आ रे बहिं, ई हमर देस थिक आ कि कोनो जंगल?-हीरा अपनेकेँ अपना कहलनि।
-ओहि बेर जे बड़का बाढ़ि एलै रहए हीरा-हीरा महतो अपनेकेँ अपना कहैत रहलाह-आ रे बा, एहन बिपत्ति काल नइं देखलौंहें। इन्दिरे गांधी के राज रहै ने? जते छाँटल शैतान सभ रहै, सबटा आन-आन काज छोड़ि क’ ब्लौक ध’ नेने रहै। बी. डी. ओ.केँ कहै जाइ हग, तँ हगए, मूत तँ मूतए। मिनिस्टर जे रहए चैधरी जी, से तँ लागए जेना एकरे सभक बल पर मिनिस्टर अछि। पचपनियाँ सभक सभटा रिलीफ साला इएह सभ खा जाइ? आ तों जे ठाढ़ भेलहक रहए हीरा, पचपनियाँ दिससँ, अन्हड़-बिहाड़ि आबि गेल रहै। नइं? आ ओ जे छिनरी भाइ दू जूता मारलकौ रहए तोरा, से तँ आरो कमाल क’ गेलै। सौंसे परोपट्टा के पचपनियाँ तहिया एक भ’ गेल रहै। गुलामी के ओ अन्तिम दिन रहै। नइं? आइ कोइ कहतै जे ओहो समय अही गाममे बीति चुकलैए?
-आ ओ जे रहथि हीरा, गजेन्दर मंडल पचगछिया बला, ओहो खूब मदति केने रहथि। हफ्ते-हफ्ते मीटिंग बैसए पचपनियाँ के, सौंसे परोपट्टामे चेतना पसरि गेल रहै। पचपनियाँ के डीलर अलग, विभाग अलग, कोन लुच्चाक मजाल रहै जे एकटा बेहूसल बात कहि देतै? बात-बात पर कलक्टर-एस. पी.केँ उतरए पड़ैक, बी. डी. ओ. के कोन मानि? सभ कहौ तोरा नेताजी। नइं? लेकिन, नेता तों भेलहक कहिया? सभ दिन चाहक दोकान करैत रहलह, बारहो बरनक अइँठ धोइत रहलह!
फेर हीरा ओतहि पहुँचि गेलाह आ फेर उदासीनता गछाड़ि लेलकनि। मोन कचकि उठलनि।
कचकले मोनसँ हीरा धरती पर उतरलाह तँ यादि पड़लनि जे दूधबलाकेँ आबैक बेर भ’ गेलैए। ओ दुधौंटा खाली केलनि आ ससपेन-डेकची-दुधौंटाकेँ कल पर ल’ जा क’ माँज’ लगलाह। आब बड़ी काल धरि कोनो गाड़ीकेँ आना-जाना नइं छै, चैक खाली भ’ गेल अछि।

कोनो छोट छीन क्रिया अपन समानताक बहन्नासँ पैघ-पैघ घटना सभकेँ स्मृतिमे जगा दैत छै। हीरा बासन माँज’ लगलाह तँ अनेरो एकान्ती मुस्की मुस्कियाब’ लगलाह। अपनहिकेँ अपना सम्बोधित कर’ लगलाह। जेना एहि बासनकेँ ओ माँजि रहलाहें, तहिना एक दिन भीलो-तिरबेनीकेँ, नागेसर-टुनमाकेँ, सीतो आ बसन्तकेँ, धुर कते कही, सौंसे पचपनियेकेँ माँजने रहथि। वाह जी नेताजी, खूब केलह, माँजैत-माँजैत गतर-गतर के मैल छोड़ा देलहक-ओ अपनेकेँ अपना कहैत छथि। मुदा, सब चलि गेल। सबहक सब चलि गेल। मैदान एकदम्म खाली। हीराकेँ फेर मोन पड़लनि-जाइत काल पितम्बर कहने रहए-चलै छियह हीरा कका, धीया-पुताकेँ देखिहक।
-ठीके तँ बात छिऐ भाइ, हमहीं ने एकटा बचल छिऐ-अपनेकेँ अपना हीरा कहैत छथि-एक मानेमे अगर सोचहक तँ बसुदेबा कोनो अनुचित बात नइं कहने रहए। हमहूँ तँ ओकरा बड़ भारी बात कहने रहिऐ! हँ उचित कहने रहिऐ से अलग बात, लेकिन रहै तँ भारिए!
परसू साँझ खन हीराक दोकान पर नेता सभक रेठान लागल रहै। बजरंग दल के पाठक जी, आ कांगे्रसक ठाकुर जीमे टक्कर सुरू भेल रहए। विषय रहए-हवाला कांड। तुरन्त चर्चा चारा-घोटाला धरि पहुँचि गेल रहै। तखन एहिमे वि. पी. पाक सुनील झा आ राजद के बासुदेब भगत सेहो संग भ’ गेलाह। भाजपाक रामचन्द्र झा आ समताक धनुषधारी सिंहकेँ चैक पहुँचबामे आइ थोड़े बिलम्ब भेल रहनि जरूर, मुदा चारा-घोटाला सुरू होइत-होइत, ओहो लोकनि जुमि गेल छलाह। धुरझार चल’ लागल, धुआँधार। कखनो-कखनो तँ एहन होइ जे एक्के बेर पँच-पँच टा बीर अपन बहुमूल्य सिद्धान्त-वाक्य दाग’ लगै छलाह। ओ क्षण आसमानकेँ फाड़ि दैबला क्षण होइ छलै। चैक मुदा अभ्यस्त छल। चैक लेल धनि सन। जनता-जनार्दन सभ अपन-अपन काज-रोजगारमे, अपन-अपन अमलमे लागल रहै छलाह।
चर्चा चलि रहल छल घमासान, हरेक नेता अधिकसँ अधिक अभिव्यक्त हेबाक अफरातफरीमे छलाह। मुदा, सभ क्यो एतबा समय निकालि लेल करथि जे बीचमे एक बेर हीराकेँ पूछि लेल करथिन-की हीरा, ठीक कहै छिऐ ने? ...की हीरा भाइ, तोहर की विचार? ...हीरा कका, तूँही कहक जे ई बात छिऐ कि नइं?-हीरा एक तरहें विचार-गोष्ठीक केन्द्रमे छलाह, यद्यपि ककरो कहियो ओ मंगनी चाह नइं पियाबैत रहथिन।
लागए जेना मण्डन-दल आ शंकराचार्य-दलमे तुमुल शास्त्रार्थ चलि रहल अछि आ निर्णायक छथिन भारतीक अवतार हीरा महतो। ताहि तरहक प्रतिष्ठा हुनका देल जाइनि!
प्रतिष्ठा हुनका बड़ भारी देल जाइनि, तकर कारण ई नइं जे चर्चाक अन्तमे ओ विजेताकेँ माला पहिरा क’ श्रेष्ठ घोषित करै छलखिन, तकर कारण ई जे ओ लगातार चुप्प रहए छलाह, एकदम्म गुम्म आ बड़ जरूरी भेल तँ ‘हाँ हूँ’ करैत।
चर्चा चलल छल ओहि दिन जबर्दस्त, मुदा, पण्डित लोकनिक कहल छनि जे दुनियामे जतेक तरहक बल अछि, ओहिमे टाकाक बल सभसँ जब्बर होइए। जितलाह अन्ततः बासुदेब भगत। सौंसे इलाकामे अनघोल छै जे बासुदेब भगत पछिला पाँच सालमे पचास लाख टाका कमेलक अछि। ओ सभकेँ निरुत्तर क’ देलखिन। एक तरहें बुझू जे सभ क्यो गछि लेलनि जे चारा घोटाला जे छल से, बहुतो कारणसँ उचित बात छल। आ ई जे भेल अछि से कोनो गलत नइं भेल अछि।
बस, इएह क्षण छल जखन हीराक देहमे आगि लागि गेल रहै। आगि मात्रा मुहावरे टामे लागल होइ, से बात नइं, हीरा एकदम होशमे अनुभव कएने रहथि जे हुनका देहमे आगि लागि गेल अछि आ ओ धू-धू क’ जरि रहलाह अछि।
भयावह प्रतिहिंसाक आवेगमे ओ बुमकारा छोड़ने रहथि-रे बसुदेबाऽऽऽ-एतबे बाजि क’ ओ रेघा देने रहथि। विस्फारित आँखि रहनि-आगिमे धह-धह करैत आँखि, एकाग्र बासुदेब भगत पर टिकल। निचला ठोर समुच्चा ओ दाँत तरमे दाबने रहथि आ दाँत किचने छलाह। सभ क्यो चकित रहि गेल रहथि। बासुदेब भगतकेँ सेहो आश्चर्य लागल रहए जे ई हीरा कका तँ हुनका ओइ दिनमे बासुदेव छोड़ि क’ बसुदेबा नइं कहियो कहने रहथि, जाहि दिनमे ई हुनकर चेला छलखिन।
प्रतिहिंसाक आगिमे जरैत हीरा महतो बाजल छलाह-रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छें से अपन करैत रह, लेकिन एना समाजमे नइं कहिऐ जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो रहम कर बहिं...
ई तँ बड़ भारी बात भेलै! करोड़पति आ एम. एल. ए. होइ लेल अग्रसर बासुदेब भगतकेँ फूकि देने रहए। आऽऽऽ रे राम, एना तँ कोइ एस. पी. कलक्टरो ओकरा नइं कहि सकै छै। ओ क्रोधमे उठि क’ ठाढ़ भ’ गेल रहए। आ हीरा महतोक मुँह लग हाथ ल’ जा क’ कहने रहए-ऐ हीरा कका, जबान सम्हारि क’ बात करह! कोन बेटीचोद के कोठीक चाउर हम निकालि क’ ल’ आनलिऐ हें हौ? कहि त’ दिअए अइ गामक कोइ आदमी? बिना परमान के बात नइं बाजल करह।
-परमान? हँ रे बाबू, परमान तँ तोरे टा हिरदय जानैत हेतौ।-हीरा महतो आस्तेसँ बजलाह।
बासुदेब भगत मुदा, जेना हीराक बाते नइं सुनने होथि, घृणा आ क्रोधक पूर्ववत आवेगमे ओ बजलाह-आदमीकेँ अपन औकात देखि क’ बात करना चाही। खाइ लए बार नइं, बोल बड़ भारी हौ? बारहो बरनक अइँठ धोइ छह, अहिना धोइत जिनगी बिततह।
एही सभ तरहक दू-चारि टा आरो सूक्ति आ लोकोक्तिक प्रयोग ओ प्रायः कएने हेताह, से तकर स्मरण सोगक कारण हीराकेँ नइं छै, आ क्रोधक कारण बासुदेबोकेँ नइं।
-एक मानेमे अगर देखहक तँ बसुदेबा कोनो खराबो बात नइं कहने रहए!-हीरा महतो अपनेकेँ अपना कहलनि-तोंही ओकरा कम भारी बात कहि देलहक?-दोख तोरे छौ हीरा, कोइ दोसर दोखी नइं अछि। जादब जी जखन मिनिस्टर भेलाह तँ ओहो तँ तोरा कहने रहथुन-हीरा छोड़ह ई धन्धा, ठीकेदारी लाइनमे आबह।-तोंही नइं गेलहक।
बरतन-बासन माँजि क’ हीरा घुरलाह, तखन, हुनका मोन पड़लनि जे दूधबलाकेँ तँ आइ ओ मना क’ देलखिन अछि। साँझमे तँ आइ दोकान बन्द रहतै।
हीराक नसमे उत्साहक सुरसुरी पसरि गेलनि। ओ दोकान बन्न क’ आँगन जाएब उचित बुझलनि। धीया-पुता फुच्ची-शीशी जमा क’ सकतै की नइं! दू टा केराक गाछ सेहो काटबाक अछि, गेटो बनाए देबै। दीप जरए आइ भारत माता के नाम पर। वन्दे मातरम्। हीरा अपनेकेँ अपना कहलनि-नइं रे भैया, नइं! हारि तँ हम नहिएँ मानबहु।
काल्हि सँझुकी पहर जिला जन सम्पर्क विभागक गाड़ी चैक पर एलै रहए। जीपसँ प्रचार होइत रहए जे अइ साल ‘आजादी के पचासम वर्षगांठ’ छिऐ। स्वर्ण जयन्ती। से, अइ दिन सब क्यो अपना-अपना घरमे ‘दिवाली’ मनाउ। हीरा सुनने छलाह, अझक्के-सन। कान-बात नइं देलखिन। एहिना बहुत तरहक प्रचार होइत रहै छै। मुदा, गाड़ी चैक पर आबि क’ रुकि गेलै आ रुकि क’ प्रचार करए लगलै। गोलम्बर पर ओहि कालमे ‘एलेवन स्टार’ के नौजबान सभ गाँजा पिबैत रहए। ओहि नौजबान सभक कानमे झ’र पड़लै आ दिक भेलै। ओ सभ चहटि क’ जीप बला लग आएल छल आ प्रचार बन्द करबा लेल कहने छल। तकरा बाद ‘एलेवन स्टार’ क बाॅस प्रचार बलाकेँ कहने रहै-आप किसके तरफ से परचार करने आए हैं?
-बिहार सरकार के तरफ से।
-ओ...। बिहार सरकार हमको कहता है दिवाली मनाने के लिए, हम तेल कहाँ से लाएँगे? बिहार सरकार हमको तेल का पैसा देगा? साला घोटाला करेगा वो सब, और दिवाली मनाएगा पब्लिक? इतना बेकूफ समझते हैं पब्लिक को? बोलिए, जवाब दीजिए।
प्रचार बला गुम भ’ गेल रहए। बाँकी नौजबान सभ हिहिया देने रहए।
एहि क्रममे जखन हल्ला भेलै, तखन हीरा महतो अकानने छलाह आ बातकेँ बुझने रहथिन। प्रचार बला अपन जीप ल’ क’ आन-आन टोल प्रचार करए चलि गेल रहै। हीरा महतोकेँ एलेवन स्टारक मन्तव्य बड़ स्पर्श कएने रहनि। ओ बड़ी काल एहि विषयमे विचार कएने रहथि। आ तखन अपनेकेँ अपना कहने रहथिन-रस्ता लेकिन ई ठीक नइं भेलै हीरा! नइं? की इएह होअए जे हम सभ किछु नइं करी? हमर कोनो फर्ज नइं?
आ, हीरा तखनहि निर्णय कएने छलाह जे आइ दिवाली मनौताह। दूधबलाकेँ रोकि देने रहथिन। तेलक इन्तिजाम केने रहथि। आँगन जा क’ कनियाँ आ धीया-पुताकेँ निर्देशो द’ देलखिन। मुदा, जुलुम देखियौ जे आइ भरि दिन बिसरल रहलाह।
हीरा आँगन घुरलाह। फुच्ची-शीशी ताकल गेल। बाती बनल। तेल पड़ल। केराक थम्ह काटल गेल। गेट सजल। बाँसक बत्ती जहाँ-तहाँ बान्हल गेल आ ताहि पर डिबिया जराओल गेल। धीया-पुता आनन्दमे छल। सौंसे टोलक नेना-भुटका जुमि गेलै। मुक्त आलाप पसरए लागल। हीरा परम प्रसन्न छलाह। हुनकर मोनक उदासीनता जेना झरकि-झरकि धरती पर खस’ लागल-एनमेन फतिंगा जकाँ।
ताही कालमे पं. भोलानाथ मिसर हीराक ओहि ठाम पहुँचलाह। देखलनि जे सौंसे गामक भकोभन्न अन्हरियाक बीच हीरा महतोक दलान जगमगा रहलनि अछि। पुछलखिन-की हीरा, ई की हौ?
-आइ स्वर्ण जयन्ती दिवस छिऐ कका।
-हँ हौ, प्रचार हमहूँ सुनने रहिऐ। इच्छो भेल रहए जे दीप जराएल जाए। मुदा, बिसरि गेलिऐ। तोहूँ हमरा नइं कहलह!
-उचित बात कोइ थोड़े बिसरै छै कका!-बहुत आस्तेसँ हीरा कहलखिन, जेना ओ पण्डित जीकेँ नइं, अपनेकेँ अपना कहि रहल होथि!!
पण्डित जी आगाँ बढ़ि दरबज्जा पर जा क’ चैकी पर बैसि रहला। ओहू ठाम जगमग करै छलै। बजलाह-आबह हीरा, बैसल जाए कनी काल।
-हे इएह अबै छी कका-कहैत हीरा आँगन गेलाह आ ओम्हरसँ भरि चँगेरी पेड़ा नेने घुरलाह। सौंसे टोलक नेना-भुटकाकेँ पेड़ा बिलहि क’ ओ पंडी जी लग पहुँचलाह। पण्डित जी एकटा पेड़ा लेलनि, एकटा हीरा अपनहुँ लेलनि।
इजोतक जगमगी आ पेड़ाक मिठाससँ प्रसन्न होइत पण्डित जी बजलाह-वाह हीरा, वाह, असल मर्द तों छह जे भारतमाताक पर्व मनेलह। ओम्हर देखहक जे सौंसे गाम अन्हारमे बिलाएल छै।
बाल-गोपालक संग हँसी-खेल करैत हीरा एखन चंचल बनल छलाह। पण्डित जीक गप हुनका अचानक गम्भीर बना देलकनि। बजलाह-दुनू बात तँ अहीं करै छिऐ कका! सौंसे गाम जखन अन्हरियामे बिलाएल छैहे, तखन हम असल मर्द कोना भेलहुँ?
-हँ, बात तँ ठीक हौ; मुदा ई ककर सक?-पण्डित जी बजलाह।
-हें... हें... हें हें...-हीरा हँस’ लगलाह। बजलाह-अइ गामक पचपनियाँकेँ देखियौ कका! आ, अइ गामकेँ की, सौंसे देशेकेँ देखि लियौ। लोक गुलाम रहए। क्यो एकटा मर्द आदमी एलै, जुगुत बतेलकै, लोक जतन केलक आ आजाद भेल। थोड़ बरस बितलै कि फेर गुलाम भ’ गेल। आजादीकेँ सम्हारि क’ राखब जँ पार नइं लागए तँ एकरा की कहबै?
ताधरि, बहारमे बच्चा-पार्टीमे घोल-घमासान होअए लागलै। हीरा बहार निकललाह। ओ देखलनि जे ऊँचका बत्ती परहक एकटा डिबिया मिझा गेलैए, जकरा फेरसँ जरेबाक लेल बच्चा सभमे अफरा-तफरी मचल छै। सभसँ बेसी परेशान अछि बबलू, पितम्बर पासवानक बेटा। हीरा महतोकेँ ई दृश्य बड़ नीक लगलनि। ओ पण्डित जीकेँ बजौलनि। कहलखिन-कका, एखने अहाँ पुछने रही ने जे ई ककर सक? हे इएह देखियौ! मिझाएल डिबियाकेँ जरेबाक लेल कते बेचैनी छै!
पण्डित जी बबलूकेँ पीठ ठोकलखिन। हीरा ओकरा कोरामे उठौलनि। बबलू मिझाएल डिबिया उतारलक। डिबियामे तेल छलैहे, ओ बसातक झोंकमे मिझा गेल छल। बबलुए हाथें फेर डिबिया जरबाओल गेल। सभ बच्चा थपड़ी पाड़ए लागल।

ऽऽऽ



















खान साहेब
विभा रानी

खान साहेब जहन अपन सभटा माल असबाब ल’ क’ उतरलाह त’ रातिक एगारहसँ ऊपर भ’ गेल छल। टीसन मसान जकाँ सुन्न छल। बस्तीमे सेहो सभ क्यो निसभेर छल। कोना ने कोना ई ताँगाबला जागल छल तखन। मुदा, आबै लेल राजी किन्नहुँ नइं हुअए। कतेक नेहोरा-पाँतीसँ आएल छल-डबल भाड़ा आ ताइ परसँ बख्शीश! ताहू पर राजी नइं जे रस्तामे एकटा बड़का पीपरक गाछ पड़ैत छै, ओहि गाछ पर भूत आ चुड़ीन सभ रहै छै। ओहि बाटे जाइबला मरद मानुखकेँ चुड़ीन, डकिनियाँ आ स्त्राी जातिकंे भूत और गसिया लैत छै, तैं राति अही ठाँ काटि लेल जाओ। भिनसरमे अन्हारे पहुँचा देब।
खान साहेबकेँ ताँगाबलाक बातक भरोस की होइतनि, मुदा कहलखिन-अइ फुजल, गन्हाइत आ मच्छर लुधकैत टीसन पर राति कोना गुजारल जा सकैए? भिनसर होइत-होइत त’ मच्छर भम्होड़ि क’ खा जाएत।-ओ भरोस दिऔलखिन-तों चल’। हे, हम ओझा सेहो छी, आ भूत-प्रेत सभ त’ ओझा-गुनीकेँ देखिए क’ पड़ा जाइ छै, आ कि नइं?
खान साहेबक ई फूसि ताँगाबला लेल भरोस आ साहसक पैघ लग्गी बनि गेल, जकरा सहारेँ ओ अपन ताँगा हँकौने एत’ ल’ अनने छल। जहन रस्तामे नीमक गाछ पड़लै, त’ डरेँ ओकर आँखि मुना गेलै। सटका पर हाथ कसि गेलै। घोड़ाक लगाम खूब जोरसँ गसलक। घोड़ा पड़ाक-पड़ाक दौगैत ओहि हातासँ बाहर निकलि आएल। सभकेँ सकुशल देखि ताँगाबला पतिया गेल जे साहेब सत्तेमे ओझागिरी जनै छथि।
आ सएह पाइ दैत काल जखन ओ स्पष्ट कहलखिन जे ओ ओझा-गुनी किछु नइं छथि, मात्रा एक गोट साधारण लोक छथि, आ भूत-प्रेत मोनक बहम मात्रा अछि। जहिना ओ आएल अए, तहिना ओ घूरि क’ टीसन जाइयो सकैत अछि; मुदा ताँगाबलाकेँ ई सभ पोल्हाब’ बला गप्प लगलै ओ भिनसर हेबा धरि जाएसँ साफे नकारि देलक।
फेर त’ ओहि राति खान साहेबक गृहस्थी जमि गेलै। बस्तीबला सभ सूतल छल, मुदा ई दुनू प्राणी पेटी-बक्शासँ सामान सभ खोलि-खोलि क’ बाहर क’ रहल छलाह आ एवं प्रकारेँ घर सरिया रहल छलाह। मुदा, घर सरियाबैसँ पहिने ओ एकटा बैगसँ चाय पत्ती, चीनी आदि बाहर केलनि आ ताँगाबलासँ पुछलखिन-तोहर नाम की छौ?
-चनरा, असलमे माइ-बाप रूपचन्नर रखने छलै, मुदा आब त’ लोक और खाली चनरे कहै हइ ग’।
खान साहेब अनुमान लगौलनि जे ओकर नाम रूपचन्द्र राखल गेल हेतै, जकरा माइ-बाप अपना हिसाबें रूपचन्नर कहैत हेतै। इएह रूपचन्नर फेर रूपचनरा आ आब चनरामे बदलि गेल होएतै।
खान साहेब कहलखिन-पहिने त’ चाह पीबाक चाही। ई भेलै चाय, ई चीनी आ ई पाउडरबला दूध। चाह बनो, तोहूँ पी आ हमरो पिया।
चनराक मुँहमे पानि भरि एलै-चाहक नामसँ नइं, पाउडरबला अँग्रेजी दूधक नामसँ; कहाँ दनि सुनै छिऐ जे बड़का-बड़का मेम सभ अपना धीयो-पुताकेँ इएह पोडरबला दूध पियबै छै। ई कए-कए मास धरि खराबो नइं होइ छै। ओकर बड्ड भाग जे पोडरबला दूध देखै ले नइं, पिबइयो लेल भेटतै।
-मुदा, चाह बनाब’सँ पहिने सुनि ले। हमर नाम भेल फैजल खान, माने हम भेलहुँ मियाँ; मुसलमान। ओना हम धरम-करम एतबे मानै छी जे लोक अपन फर्ज पूरा करौ, अल्लाह पर यकीन राखौ। किन्तु लोकक नजरिमे आइ मजहबक माने इबादत, याने पूजापाठ, छुआछूत, हेन-तेन सभ भ’ गेल छै। तैं हम ई नइं चाहै छी जे काल्हि आन ककरोसँ तोरा हमरा मादे पता लगौ आ तहन तों हमरा गरिअएबें, जे हमर धर्म भ्रष्ट क’ देलक ई मियाँ आ पँचैती बैसेबें-ई सभ नइं चाहै छी। आब जौं पीबाक मोन छौ त’ चीज सभ राखल छौ। हम अपन हाथो नइं लगेबौ। तोहीं बनो।
चनरा जेना मुँहबले भट्ट द’ खसल हुअए। एतेक काल धरि ओ एकटा मियाँ संगे छल, जकरा लेल ओकरा मोनमे एतेक घिरना रहै छलै जे टीसन पर दूरेसँ ओहि सवारीकेँ मना क’ दै छल, मुदा ई आदमी ने त’ रूप-रंग, ने कपड़ा लत्ता आ ने बोलिए-चालीसँ मियाँ लगैत अछि। पहिल बेर कोनो मियाँक मुँहसँ एहेन शुद्ध मैथिली सुनल अए। ताही कारणें त’ और धोखा खा गेल, नइं त’ ओकरा सभक बोलिए दोसर होइ छै जकरा ओ सभ मियंडी बोली कहै छल। नेनपनेसँ ओ सुनने छल जे मियाँ सभ बड्ड खराब होइ छै-ओकरा औरक करेजामे दया-माया नामक वस्तु नइं होइ छै-ओ सदिखन एकटा तेज चक्कू ल’ क’ चलैत अछि आ कनियों मतभेद भेने चक्कू, अगिलाक छातीमे घोंपि दैत अछि। बाघ आ एकरा आओरमे कोनो फरक नइं।
परन्तु, आइ से भ्रम टूटि गेलै। ई आदमी एखन धरि ओकरा लेल कोनो बाबू साहेब छल। बाबू साहेब माने-बाभन, छत्राी, कायस्थ, भूमिहार, जकरा सभकेँ बाबूसाहेबी जमेबाक जेना ठेका भेटल होइ; जे सदिखन रोब-दाब गाँठबाक आ हमरा आओरकेँ फनिगा बुझबाक जन्मसिद्ध अधिकार मानैत छथि। मुदा ई आदमी एको खन ई त’ नइं परतीत होब’ देलक जे इहो कोनो बाबू साहेबसँ कम छथि।
रातिक दू केर अमल होब’ बला छलै। चनरा गुन-धुनमे पड़ल छल। काल्हि जहन लोक आओरकेँ पता लगतै जे ओ एक गोट मियाँक ओहि ठाँ खेनाइ-पिनाइ केलक अछि, त’ लोक ओकरा जातिसँ त’ बारबे करतै; कोन ठेकान जे पँचैती सेहो ने बैसा दै। आन समय ओ भने एकटा कुर्मी कहार हुअए, अइ समयमे ओ मात्रा एक गोट हिन्दू भ’ जाएत, जकर धरम बचाब’ हेतु सभटा बाबू-बबुआन सभ उठि जेताह-ओएह बाबू बबुआन सभ जे ओकरा आओरक परछाँहियोसँ घिरना करैत छथि।
-तों एना कर चनरा, जे ओम्हर बैसि जो। हमरा त’ चाहक तलब लागलए, तैं हम त’ चाह पीबे करब। हट, हम बनबै छी-ई कहैत ओ स्टोब दिस बढ़लाह।
चनरा जेना स्वप्नावस्थासँ बाहर आएल-नइं-नइं बाबू साहेब। हम बनबै छी। मुदा अहाँकेँ बताब’ पड़त, किऐक त’ हम कहियो चाह नइं बनौने छी।
-त’ बनौने की छें?
चनरा लजा गेल।-हमरा आओरमे मरद भनसा घरमे घुसतै त’ माने जे मौगमेहरा भ’ गेल।
खान साहेब ओकरा बताब’ लगलाह-एना स्टोबक सभटा बत्ती लेसि दही। देख, धधरा नील रंग भ’ गेलौ। आब पानि चढ़ो। हँ, डिब्बा खोलि गिलास ल’ आन आ डेढ़ चम्मच दूध निकाल। कने गरम पानि ओकरामे दही, आ फेंटि ले। बस आब पत्ती छोड़ पानिमे, हँ, आब दूध द’ क’ एक बेर खौला क’ उतारि ले। ई बत्ती सभ एना क’ कम क’ दही आ मुँहसँ फूँकि क’ मिझा दही।
चनरा जहन दूधक डिब्बा खोललक त’ देखलक एकदम धप-धप उज्जर पोडर जकाँ कोनो चीज। ओहने, जेहन मेलासँ अपन घरबाली लेल गमकौआ पोडर कीनने छल आ ओकर देह पर छीटि भरि राति ओकर सुगन्धिमे डूबि गेल छल... ओ आप्यायित भ’ उठल। एतेक आजादी कोनो बाबू साहेब दितैक? तहन त’ हुनका आओरक भनसा आ बासन छुआ जेतनि, आ ई अपना जनिते कतेक बचाव केलनि। पोडरबला दूधक चाह पीबि चनरा तिरपित भ’ गेल-एहेन गाढ़ आ सबदगर चाह, जेना चाहेमे खोआ मिलाएल हुअए।
तहिया चनरा आ खान साहेबमे इयारीक जे निओं पड़लै, ताहि पर ओकरा दुनूक नित नवीन भावक ईंट चढ़िते गेल। जहिया खान साहेब टीसन जैतथि वा रस्तामे कतहु भेटा जैतथि, चनरा, अपन सवारी छोड़ि हुनका ध’ लैत छल। एक-दू बेर खान साहेब पाइ देबाक प्रयत्न सेहो केलनि, मुदा चनराक भाव आ आक्रोश देखि फेर कहियो पाइक गप्प नइं उठौलनि।
भोर होइत-होइत पूरा टोलमे ई कथा बोनक आगि जकाँ पसरि गेलै जे बी. डी. ओ. आॅफिसमे नया बड़ा बाबू आबि गेला हए। सभ क्यो हुनका देख’, हुनकासँ भेंट-घाँट कर’ आएल। सभ सोझाँमे परनाम करए आ बाहर निकलतहि-मियाँ छै रौ भाइ-कहैत फक्कसँ निसाँस छोड़ए।
परन्तु, जल्दीए खान साहेब परसँ ई लेबल हटि गेलै। हुनकर बेबहार, बोली, काज करबाक ढंग आ सभसँ पैघ उमिर मोताबिक लोक आओरक लेहाज। गमैया सोच’ लागल जे जौं कोनो दोसर रहितै त’ बात-बात पर डाँट-डपट आ डेग-डेग पर पैर पुजाइ। त’ की मियाँ सभ एतेक नीक होइ छै।
-नइं, कदापि नइं-खान साहेब खुलासा केलनि-अँहीं सभ जकाँ हमरो आओरमे छुआछूत होइ छै। अहाँ सभक हाथक खाए पीअ’मे हमरो आओरक लोक सभ छूत मानै छै। हमरो सभमे धरमक माने ओएह सभ भ’ गेल छै जे अहाँ आओरमे अछि।
-तहन अहाँ...
-हँ, हम बेशक पाँचो बेर नमाज पढ़ै छी, भरि मास रोजा रखै छी, मुदा तैयो मजहबक अइ रूपसँ सहमत नइं छी। हमरा नजरिमे मजहब माने-खुदा वा भगवान जे कही, पर अपन यकीन बनेबाक अछि आ हमर मानतब अछि जे जौं अपना धरमक सम्मान अहाँ दोसरासँ चाहैत छी, त’ पहिने दोसराक धरमक इज्जत करब सीखी।
आ ई इज्जत-आफजाईमे खान साहेब कहियो चूक नइं केलनि। चनराक ताँगा परसँ एक दिन फेर बक्सा-पेटी उतरल आ उतरली गोर-गोर सुन्दर-सुन्दर पैरबाली अप्सरा जकाँ एक गोट स्त्राी, जकरा भौजी कहबाक अधिकार ओ बिनु मँगनहि ल’ लेलक।
दोसर दिन घरक पछुवाड़िमे हलुवाइ बैसल आ लड्डू बनल। घर पाछू पाँच-पाँचक हिसाबसँ। खान साहेब दूरेसँ निगरानी करैत छलाह जे सभ किछु ठीक-ठाक त’ बनि रहल अछि। नंदा हलुवाइकेँ ओ पाइ आ लिस्ट थमा देने छलाह आ एखन ओ अपन कारीगर संगें लड्डू बान्हबामे व्यस्त छल। खान साहेबकेँ बूझल छलै जे किछु हासिल कर’ लेल किछु गमाब’ पड़ै छै। लोक आओरक घृणास्पद दृष्टि आ मियाँक उपेक्षित आ अपमानित उच्चारणसँ मुक्ति लेल एतेक संतोख जरूरी छल। ओ जनैत छलाह जे लोक हाथक छूत मानै छै, हाथसँ निकालल पाइक नइं। तैं पाइ हुनकर, वस्तु बजारसँ, आ हाथ नंदा हलुवाइक...। घरे-घर लड्डू बँटल, चनरा लेल फराकेसँ पाँच टा लड्डू, नंदा हलुवाइसँ रखबा देल गेल।
खान साहेबक घरवालीकेँ देखबा लेल पूरा गमैया स्त्राी समुदाय जुमि गेल। खान साहेब बेगम साहिबाकेँ बुझा देलनि जे चाह-पानि लेल पूछि क’ ककरो असौकर्य नइं करबै।
हलीमाकेँ देखि पूरा स्त्राी समुदाय अवाक रहि गेल। यद्यपि मैथिल ललनाक सुन्दरता अपने-आपमे अद्वितीय होइत छै, परन्तु ई त’ ओकरोसँ अतुलनीय छली-धप-धप करैत रंग, जेना छुबिते मलिन भ’ जाएत। लाल-लाल गाल, गुलाबी ठोर आ सभसँ ऊपर मुँह पर नेन्ना जकाँ भोलापन। उमरि सेहो बेसी नइं छलै, सतरह-अठारह वर्ष; यद्यपि ताहि समयमे ई उमिर बहुत मानल जाइत छलै।

देशक बँटवारा भेल छल आ हिन्दुस्तान-पाकिस्तानकेँ अपना हिसाबें वरीयता देब शुरू भ’ गेल छल। हाँजिक-हाँजि हिन्दू ओम्हरसँ एम्हर, झुँडक-झुँड मुसलमान एम्हरसँ ओम्हर आबि रहल छल, जा रहल छल। जे खतरा पाकिस्तानसँ हिन्दूकेँ होइत छलै, सएह खतरा मुसलमान सभकेँ हिन्दुस्तानसँ होब’ लागल छलै। तैयो जेना बहुत हिन्दू पाकिस्तानेमे रहि गेलाह; तहिना हिन्दुस्तानमे रह’बला असंख्य मुसलमानो देश छोड़बा लेल राजी नइं भेलाह। खान साहेबक दुनू जेठ भाइ पाकिस्तान चलि गेलाह। बहुत जोर पड़लनि हुनको पर, मुदा ओ जाइसँ साफ नकारि देलनि। बजला-नीक वा अधलाह, जाहि धरती पर जन्म लेल, सएह भेल हमर मादरे-वतन! अइठाँ यदि मुसलमान सुरक्षित नइं त’ एकर कोन गारंटी जे ओतए ओ सभ तरहें, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूपें सुरक्षित रहताह। हुनक आधासँ बेसी परिवार पाकिस्तान चलि गेल। माइ-बाप, छोटका भाइ आ दू गोट अविवाहित बहिन अही ठाम रहल।

चनरा अबैत रहल आ भौजी लेल अपना बाड़ीक भाँटा, सजमनि आनैत रहल। एखनि धरि खानो साहेब ओकरा बुझि गेल छलाह, तैं पाइ लेबा लेल कहियो नइं कहलखिन। मुदा होली दिवाली-सालमे ई दुनू पर्वमे ओकरा गंजी, लुंगी, गमछा देबाक जेना नियम बना लेलनि।
आइ माइ दाइ चाह-पानि नइं पिबथि, मुदा एक चक्कर क्यो ने क्यो हलीमा लग अबस्से लगा जाथि। झा जीक घरवाली, मिसराइन, सुलक्षणा माइ-सभ क्यो अपन-अपन अनुभवक पृष्ठ फातिमाक आगाँ खोलथि आ ताकीद क’ देथि जे अइ समयमे बेसी भारी काज जुनि करी, भारी समान सभ नइं उठाबी, आ हे, कने खान साहेबकेँ सेहो बुझा देबनि जे अहाँक अबस्था देखि संयमसँ काज लेथि, फातिमा लाजें काठ भ’ मूड़ी निहुरा लिअए-सुलक्षणा माइकेँ बुझाइ जे जौं ई मियाँ नइं रहितियै त’ एकरा हाथसँ बड़ी खोटबैबितहुँ, चाह बनबैबतहुँ।
बेरहटियामे हलीमाकेँ पीड़ा उठलनि। खान साहेब आॅफिसमे छलाह आ हलीमा असगरे छटपट क’ रहल छली। आइ माइ दाइ सभ त’ ओकरे ओइ ठाँ अबै छली-ओ ककरो ओइ ठाँ नइं जाइत छल। क्यो नइं न्यौतने छल, खाली चनरे एक बेर दुनू बेकैतकेँ ल’ गेल छल अपना ताँगा पर बैसा क’। किन्तु ओकर घर त’ बहुत दूर छल। हलीमा बेचैन होब’ लगली। मोहल्लाक कोनो स्त्राी एखन धरि नइं पहुँचल छल। हलीमाकेँ अक्क सुझाइ ने बक्क। भिनसुरका भात ओहिना पड़ल छलै। खान साहेबकेँ खुआ क’ बिदा कए घरक काज निपटाब’ लागल छल कि दरद उठलै। आब दरद बढ़िते जा रहल छलै। ओ दूरा लग आएल, हँ ओएह नन्हकी सुलक्षणा जा रहल छल। हिम्मति क’ कए ओ आवाज देलक, जे माइकेँ पठाबी जल्दीसँ। सुलक्षणा दौगल-माइ गे, सुनरकी चाचीक मोन ठीक नइं छै। तोरा बजेलकउ हें।
सुलक्षणा माइ दौड़ली। मिसराइन आ अन्य स्त्राीगण सेहो। हलीमाक गोर मुँह स्याह पड़ल जा रहल छल। तुरन्ते सभटा ओरियान भेल।

बेटाक नार काटैत घुटरा माइ चमैन सुना गेल जे बिनु छपुआ नुआ नेने किन्नहु छोड़बै नइं। हलीमा सूति गेल छल। साँझ भ’ गेल छल। घरमे स्त्रिागणक मजमा देखि खान साहेब कोनो आसन्न विपत्तिसँ काँपि उठलाह। ता सुलक्षणा बाजलि-खान चाचा! सुनरकी चाची खूब सुन्नर भैया ल’ क’ अएलीए। दुनू सूतल छथि।-खान साहेब स्नेहसँ ओकर मूड़ी छुबि केश सोहरा देलखिन। रातिमे आठ बजे हलीमाक नींद खुजल। खान साहेब मुस्कियाओल। हलीमाक मलिन मुँह पर सेहो हँसी आबि गेलै। बेटा हेबाक खुशीमे खान साहेब माँस रान्हने छलाह। दिनुका भात चैकामे छलैहे। हलीमासँ पुछलथि-भूख लागल अए?

आ कि अधरतियामे अनघोल मचि गेल। हलीमा दर्दसँ बाप-बाप कए पछाड़ खाए लगली। खान साहेब चनरा हाथें अपना आ हलीमाक घर समाद पठौने छलाह। मुदा एखन ई केहेन दरद? आ ओहो आधा रातिमे? बच्चा सेहो कानै छल। हलीमाकेँ अपने होश नइं छल। खान साहेब कौखन हलीमाक माथ सोहरबथि, कौखन बच्चाकेँ हो-हो क’ दुलारथि। नवजातकेँ छुबैमे हुनका भय होइन्ह-कतहु दबि नइं जाइ?
अन्ततः हिम्मति क’ कए खान साहेब मिसर जी ओहि ठाँ पहुँचलाह। झटपट मिसराइन अएली, पेट छुबि क’ देखलखिन-अएँ मांसु-भात के खुऔलक अहाँकेँ? बाप रौ बाप! आद-हरदी केर स्थान पर मांसु-भात? हे, खान साहेब भेलाह मरद-मानुस। हुनका की बूझल हेतैन, मुदा अहाँ त’ स्त्राी छी। अहूँकेँ किछु नइं पता? ...तुरन्ते जमाइन केर पानि औंटाएल। ओएह पानिसँ पेट ससारल गेल आ ओएह पानि पीबाक हिदायत आ संगहि हलीमाक खेनाइ-पिनाइ अपना घरसँ पठेबाक ताकीद क’ ओ बिदा भेलीह।
खान साहेबकेँ उमेद छल जे समाद पाबि दुनूमेसँ कोनो पक्षसँ कोनो स्त्राी समाँग त’ अएबे करत। मुदा घरसँ छोटका भाइ आ सासुरसँ सार पहुँचलाह। मोहल्लाक लोक तहन इएह तय कएलक जे कमसँ कम बरही धरि हलीमाक भोजन मोहल्लाक स्त्राीगण पठौती। खान साहेबकेँ अल्टीमेटम भेटलनि जे बच्चाक बाप भने अहीं भेलहँु, मुदा बिध बेवहार ओ सभ हेबाक चाही जे हमरा आओरमे चलै छै।
आ हलीमाकेँ नहाओल गेल। छठी पुजाएल। ओ पीयर नूआ पहिरली। झा जीक घरवाली, नाक धरि पीपा सेनूर पूरि देलखिन। फेर सोहर आ बधावाक जे तान उठल से लागल जे बच्चा खान साहेब ओहि ठाँ नइं, पूरे मोहल्लेमे भेल अए।
खान साहेबकेँ दोसर अल्टीमेटम भेटल जे भोज-तोज हेबाक चाही। एक बेर फेर नंदा हलुवाइ अपन दल-बल सहित जुमल। पूरा गाँव जुमल। चनरा अइ बेर पमरियाक भेस धए खूबे नाचल-हम नइं ननदि घर जएबै यौ बालम, हम नइं ननदि के बजेबै यौ बालम।-ओकरो गमछा बख्शीशसँ भरि गेलै।

अइ बेर खान साहेबक घरमे पूरा जुटान छल-माइ-बाप, साउस-ससुर, सार-सरहोजि; सभक भौंह तनल, मुँह खुजल। खान साहेबकंे ई की भेलनि? काफिर सभक संगें रहि सत्ते काफिर भ’ गेलाह। पाकिस्तान नइं जा क’ एकटा गलती कएल, आ अइ ठाँ रहि क’ गलती पर गलती केने जा रहल छथि। हलीमाकंे कतहु ककरो घ’र जएबाक इजाजत नइं छै आ अइ ठाँ मोहल्लाक तमाम औरतसँ घर गँजाएल रहै अछि। नसीम आ नुसरत के जनममे हिन्दू जकाँ छठियार मनाओल गेल, हलीमाकेँ सेनूर लगाओल गेल। तोबा... तोबा, तोबा... आ मियाँ फैजल खान सभ किछु खाली देखिते नइं छलाह; ओहिमे शामिल सेहो भेलाह। शामिले किऐ, एकरे रजामंदीसँ त’ सभ किछु भेल हेतै। तैं त’ ई हिन्दू आओरक एतेक मोन बढ़लै? आ आब, जे इस्लामक खिलाफ सभसँ पैघ बात कएलक, तकर कोन सजा हेबाक चाही। अरे, खुदाबन्दक रहमत होइ छै औलाद! हमरा आओर के होइत छी अइ रहमतकेँ रोक’ बला? मियाँ फैजल ई काज कएल सेहो अइ काफिर सभक सोहबतिएसँ ने?
-सोहबति नइं, दबाबसँ अपने त’ अइ ठाँ प्रत्येक घरमे चारि-चारि पाँच-पाँच टा लेद-गेल अछि, आ मियाँ दुइए टामे आॅपरेशन करबा लेल।
परिवारक लोक उत्तेजित छलाह। हलीमा मौन भावें घरक काज निपटा रहल छली। खान साहेबक ई डेग ओकरो पसीन नइं पड़ल छलै-ई कोनो हमर मजहबमे त’ नइं अछि। मुदा खान साहेब बुझाओल-देखू हलीमा, बच्चा के जन्म देनाइ पैघ बात नइं छै, आ नइं त’ पैघ बात छै बच्चाक फौज तैयार केनाइ। पैघ बात छै ओकर सही आ सेहतमंद परवरिश, नीक भोजन-भात आ नीक तालीम; आ ई तखने सम्भव भ’ सकैत अछि, जहन हमरा बच्चा कम रहत। हमर आमद अहाँकेँ पते अछि। ई बच्चाक हिसाबें वा हुनका आओरके बढ़ैत उमिरक मोताबिक त’ बढ़त नइं! आ माइ-बाप लेल दस गोट नालायक औलादसँ एकटा लायक औलाद सभसँ ऊपर होइ छै। अल्लाहतालाक मेहरबानीसँ अपना त’ दू-दू गोट नेना अछि-आ ओहूमे बेटा-बेटी दुनू। अल्लाह कोनो कमी नइं राखलनि अए। समयकेँ चीन्हू हलीमा! वक्त के संगें अपनाकेँ नइं बदलब त’ जीयब मोश्किल भ’ जाएत।
हलीमा बिचारलक। ठीके त’ छै। ईहो दुनू बच्चा त’ अइ मोहल्लेबालाक कारणें बाँचल छल, आ ओकर प्राण सेहो। लेद-गेद जन्माओत, त’ के बेर-बेर ओकर मदति लेल आओत। इहए दुनू पढ़ि-लिखि जाए त’ बहुत पैघ बात! मुदा की नुसरत पढ़ि सकत? हलीमाकेँ अपन निरक्षरताक बोध भेलै। अपन बचपन मोन पड़लै। कोना क’ घरमे रार ठानने छल जे भाइजान जकाँ ओहो स्कूल जाएत, पढ़त-लिखत, भाइएजान जकाँ ओहो हाकिम बनत। मुदा सभ बेर ओकरा बताओल गेल-अपना सभमे लड़कीकेँ घरसँ बाहर जा क’ पढ़बाक रेबाज नइं छै। आरम्भमे मोलाना आबि कुरान शरीफक आयतकेँ बिस्मिल्लाह क’ गेलाह। ओएह कने मने उर्दू पढ़ा देलनि, जाहि नतीजें एखन कहुना टो-टा कए हलीमा उर्दू-पढ़ि लै छल। किछु-किछु लिखियो लै छल। तहने ओकरा मोनमे ई ख्वाहिश जागल छल, हम अपना बेटीकेँ खूब पढ़ाएब।
हलीमा आब सोझाँमे ठाढ़ छली-शौहर ठानने छलनि इस्लामसँ पृथक किछु करबा लेल! हलीमाक मोन बदलल, मुदा एक शर्त पर-बेस! हम अहाँसँ सहमत छी। मुदा एक शर्त पर। अहाँ नुसरतोकेँ नसीमे संग पढ़ाएब-लिखाएब आ ता धरि ओकर निकाह नइं करब जा धरि ओ अपन रजामंदी नइं द’ दिअए।-खान साहेब दुलारसँ हुनक गाल छुबि लेलनि।
हलीमा शान्त छली। धीया-पुताक देखरेख के करत, जौं हलीमा पुनः अस्पतालमे भर्ती भ’ जाएत? पुरुषक आॅपरेशनमे कम समय लागै छै आ झंझट सेहो कम छै। तैं, खान साहेब अपने चलि गेलाह। मुदा ई समाद हुनक परिवारमे जलजला आनि देलक। बच्चा भेला पर त’ क्यो नइं आएल, मुदा बच्चा बन्द भ’ गेला पर सभ दल बल उपस्थित भेलाह आ लानत मलामत पहुँचा रहल छलाह।
खान साहेब चुप छलाह। जहन सभ क्यो अपन-अपन मोनक भरास निकालि लेलक तहन अन्तमे बजलाह-कहएबला किछु कहओ, ककरो कहने हम हिन्दू वा मुसलमान नइं भ’ जाएब। ककरो मजहबमे यदि कोनो नीक बात छै त’ ओकरा अपनएबामे हरज हम नइं बूझै छी। दोसर, मुसलमानसँ पहिने हम एकटा हिन्दुस्तानी छी। हम नइं त’ पाकिस्तानमे छी आ ने कहियो जएबाक इरादे राखै छी। एक हिन्दुस्तानी, एक वतन परस्त हेबाक कारणंे ई हमर फर्ज बनैत अछि जे हम अपन मादरेवतन लेल किछु करी। हमरा स’कमे आओर किछुओ नइं छल। फेर अइमे वतनसँ पहिने त’ हमर अपने फायदा अछि। हम अपना औलादकेँ नीक तालीम, नीक खान-पियनि द’ सकै छी... हमर विचार हिन्दू सभक बीच रहलासँ नइं बदलल अए आ जौं बदलिए गेल त’ कोन आफत। जहियासँ हम अइ ठाँ आएल रही, राति के बारह बजे हम अइ ठाम उतरल रही, तहियासँ ल’ क’ आइ धरि इएह हिन्दू परिवार सभ हमर सभ तरहक मददि कएलक, देखरेख कएलक। नसीम आ नुसरत दुनू बेर समाद पठौलाक बादो घरसँ कोनो मसोमात नइं आओल, अही ठामक हिन्दू औरत ओकरा आओरक जान बचैलक। आइ नसीम आ नुसरत खाली हमरे नइं, पूरा मोहल्लाक बच्चा अछि... अहाँ आओरकेँ जे करबाक हुअए, करी; मुदा हमरा अपन आ अपना बच्चाक भविष्य देखबाक अछि।
ताबत सुलक्षणा माइ अएली। खान साहेब आ आन मरद मानुसकेँ देखि, घोघ तानि हलीमा लग पहुँचली। हलीमा माँस चढ़ौने छली। सुलक्षणा माइकेँ देखि अपन पीढ़ी हुनका लेल घुसका देल। मुदा सुलक्षणा माइ बैसली नइं। बजली-हम बैसब नइं, बड्ड काज अछि, हम सुलक्षणाकेँ पठा देब। कनेक पोलाव आ जर्दा बनाएब सिखा देबै, परसू ओकरा लड़काबला देख’ आबि रहल छै। सोचै छिऐ जे भात त’ सभ क्यो खुआबै छै, कने मीट-पोलाव खुआबी तहन ने किछु अलग बात हेतै?

ऽऽऽ






अयना
नीता झा

-अन्हरीऽऽऽ, सूऽऽऽरदास।
-तोरा सूझै छौ ने? तों देखै छें ने? देख, और देख। आँखि फाड़ि-फाड़ि क’ देख। तत्ते निड़ार जे आँखि बहि जाउ। हमरा आँखि नइं अछि तँ तोरासँ कहाँ माँगए जाइ छिऔ? ...अपन आँखि अपने लग राख। कोनो काज क’ देबए कहै छिऔ! जे हमरा आँखि नइं देलनि, तिनके कहै छिअनि-तोरो आँखि ल’ लेथुन, तोरो नइं सूझौ।
एक नेत्राहीन बालिकाक ई रूप देखि हम चकित भ’ गेल रही। एहि बालिकाक एहि रूपक परिचय हमरा अनायासे भेटि गेल रहए। एकर मोनमे एतेक आक्रोश छै, तकर हम कल्पनो नइं क’ सकैत रही। अनाथालयक कोनो बच्चा खौंझा देने रहै आ ओ अगिया बेताल भ’ गेल रहए। एहिसँ पूर्व हम ओकरा दीन-हीन रूपमे देखने रहियै-सतत दाँत चिआरने रहए...। जाहि नेत्राहीन विद्यालय-सह-अनाथालयमे ओ रहैत रहए, ताहिमे इनर ह्नील क्लब, दरभंगा, यदा-कदा यथासाध्य आर्थिक सहायता दैत रहै। क्लबक सदस्य रहबाक कारणंे, ओही क्रममे हमहूँ ओतए जाइ। अन्य छात्रा-छात्राक संग ओहो आबए। साफ-सुथरा कपड़ा रहै... बान्हल केस रहै। दाँत हरदम चिआरल रहै...। झुकल कान्ह... ढुलमुल सन लटकल दुनू हाथ।
पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमक अनुसार क्लबक सदस्य सभ जखन पहुँचि जाइ, स्थान ग्रहण कएल भ’ जाइ तँ स्कूलक प्रधानाचार्य आदेश देथिन-बच्चा सभकेँ बजा।
एक धारीसँ बच्चा सभ अबै। आगाँ-आगाँ एकटा परिचारिका रहै... तकर हाथ पकड़ने एकटा नेना आ, तकर बाद बाँकी सभ नेना अपन अगिला बच्चाक कान्ह पर दहिना हाथ देने आबि क’ ठाढ़ भ’ जाइ। कारी चश्मा पहिरने हाथमे उज्जर छड़ी नेने। मास्टर साहेबक दोसर आदेश-प्रणाम करहुन-पर सभ बच्चा एक सुरमे बाजए-परनाम।
फेर आदेश निर्गत होइ-स्थिरसँ बैस आ गीत गबै जो।
एहि आदेश पर ठेलमठेल भ’ जाइ। एक दोसरकेँ ठेलैत, एक दोसरक देह पर खसैत-पड़ैत सभ बैसै जाइ...। एम्हर मास्टर साहेबक प्रवचन चालू भ’ जाइन-तों सभ कहिओ नइं सुधरबें। नालायक, गदहा सभ..., की कहथुन, जे एकरा सभकेँ किछु नइं सिखाओल जाइ छै।
ओही बीच हारमोनियम बाजए लगै, तबला ठोकाए लगै आ गीत शुरू भ’ जाइ-ए मालिक तेरे बन्दे हम...।
खतम भेला पर आदेश भेटै-चुपचाप बैसल रह।
और गोटे जे किछु करैत-बजैत होथिन, हम भगवानक लीला पर विचार करैत एकटक्क ओहि नेत्राहीन नेना सभकेँ निहारैत रहि जाइ। क्यो जन्मान्ध, क्यो मैआक मारल, क्यो कुपोषणक शिकार आ क्यो दुर्घटनाक शिकार...। की होइत छै दिन आ की होइत छै राति! उज्जर की आ कारी की? फूल की आ काँट की? भगवान की, शैतान की? माइ की, बाप की? अपन के, आन के? ओ स्वयं केहन अछि, ताहि सभसँ अनजान, भिन्ने दुनियाँमे मगन अछि। एकर दुनियाँ की छै? की छै एकर दुनियाँमे? इजोत नइं, रंग नइं, मेघ नइं, बिजलौका नइं, पनिसोखा नइं! छै मात्रा अन्धकार...। कहिओ नइं खतम होब’बला अन्धकार...। अन्धकारक बाद प्रकाश अवश्यम्भावी छै, ई अपवाद छै। एकर बदलो एकटा स्थायी भाव एकर सभक मुँह पर व्याप्त भ’ गेल छै। ध्वनि आ स्पर्शे पर एकर सभक जीवनक आधार छै।
क्लब दिससँ ब्रेल पेपर, चेक, टाॅफी, बिस्कुट, वस्त्रा मास्टर साहेबकेँ सुपुर्द क’ देल जाइन। बच्चा सभक प्रति स्नेह-संवेदना प्रकट कएल जाइ, भविष्यमे मदति करबाक आश्वासन देल जाइ आ मास्टर साहेब धन्यवाद ज्ञापन करथि। कार्यक्रम समाप्त भ’ जाइ आ सदस्य सभ-स्वस्थानं गच्छ-भ’ जाइ। एक एहने कार्यक्रमक समाप्त भेला पर हम मास्टर साहेब लग अपन इच्छा व्यक्त कएने रही जे जँ अनुमति देथि तँ हम व्यक्तिगत स्तर पर बच्चा सभसँ भेंट करए आबए चाहै छी। सहर्ष अनुमति देने रहथि आ हम अपन सुविधासँ जाए लागल रही।
ओहि समय ओहि नेत्राहीन विद्यालयमे बेयालिस टा विद्यार्थी रहै। एक खास स्तर धरि शिक्षण-प्रशिक्षणक व्यवस्था छै। ओहि स्तर धरि शिक्षित-प्रशिक्षित भ’ छात्रा सभ अपन घर चल जाए। माइ-बाप आबि क’ अपन नेनाकेँ संग ल’ जाए। सब बेर एकटा क’ रहि जाइ... एहू बेर रहि गेलै...। ओ कतए जेतै! ओकरा के ल’ जेतै? ओकर के अपन रहै जे ल’ जेतै? सरकार दिससँ प्रति छात्रा प्रतिमाह एकसठि रुपैया आ पचास पाइ अनुदान स्वीकृत रहै। ओहीमे भोजन-दवाइ आ शिक्षण-प्रशिक्षण सम्बन्धी व्यय। माइ-बाप भेंट करए अबै तँ कपड़ा-लत्ता अपन संतान हेतु नेने अबैक। आ, सनेसमे चूड़ा-मूढ़ी, साँच-पिड़ुकिया। खएबाक वस्तुक छोहक्का उड़ि जाइ... ककरो माइ-बाप अनने रहौक! ओ छौंड़ी स्थायी रहए। आब ओकर नामक अनुदान नइं भेटै। सभक हिस्सामेसँ हिस्सेदारी करबाक अतिरिक्त आर कोनो उपाय नइं रहनि मास्टर साहेबकेँ। खण्ड-खण्डमे बहुत रास बात बूझल भेल...।

स्थानीय अस्पतालक नेत्रा विभागक बरण्डा पर एकटा नवजात शिशु अपन समस्त शक्ति लगा क’ एहों-एहों-एहों क’ रहल छलै। नवजातक कननाइ सूनि नर्स बहरएलै तँ कत्तहु क्यो नइं। अगल-बगल तकलक, कात करौट देखबओलक, चिकरि-चिकरि क’ अज्ञात माइ-बापकेँ सोर पारलक, कतहुसँ कोनो बातक जवाब नइं भेटलै। कनैत नेनाकेँ ओ कोरामे ल’ लेलक... ड्रौपरसँ पानि मुँहमे देलकै तँ कनी टा-टा ठोर-जीहसँ चुट-चुट क’ पीबि लेलकै...। मुनायल आँखि दिस नर्सक ध्यान गेलै। अनुभवी नर्स बुझि गेलै जे एकर आँखि कहिओ नइं खुजतै... भरिसक तैं...। स्थायी समाधान भेलै जे एकरा स्थानीय नेत्राहीन विद्यालय-सह अनाथालयकेँ सुपुर्द क’ देल जाए। आ ओ कननी एतए आबि गेल। हँसीए-हँसीमे कननीक नाम ‘शान्ति’ रखा गेलै। पेट भरल रहौ अथवा खाली-हरदम समस्त शक्ति लगा क’ चिचिआइत रहए। ओकर चिचिअएनाइ शुरू होइ आ एम्हर मास्टर साहेबक ‘ऊँ शान्ति, शान्ति, शान्ति’ शुरू भ’ जाइन। बस, नामकरण भ’ गेलै शान्ति।
माइ-बाप नामक कोनो सम्बन्ध होइ छै, ताहिसँ जखन परिचित भेल तँ मास्टर साहेबकेँ पुछनि-हमर माइ-बाप किऐ ने अबै अछि? कत’ रहै छै?
मास्टर साहेब ‘एतौ-एतौ’ कहि क’ ओकरा फुसला लेथिन। सभ नेनासँ गप्प-सप्प करैत हम क्रमशः शान्ति धरि स्वयंकेँ सीमित क’ लेलहुँ। शनैः शनैः सभ बुझि गेलै जे हम केवल शान्ति द्वारे अबै छी। शान्ति सेहो एहि बातकेँ बूझए लागल। ओ शनैः शनैः हमरा संग खुलि क’ गप्प करए लागल। प्रश्न सभ पूछए लागल। हमहूँ ओकर सभ प्रश्नक जवाब नइं द’ सकियै। गाय, महींस, बकरी, कुकूर, बिलाइक बोली ओ हमर माध्यमे चिन्हलक। चिड़इ-चुनमुन्नीक कचबच चिन्हलक। कौआक काँव-काँव चिन्हलक। एक दिन हठात पुछि देलक-कौआ बजै छै तँ क्यो अबै छै ने? आइ के एतै? हमर माइ-बाप अएतै? अहाँ चिन्है छिऐ हमर माइ-बापकेँ? देखने छिऐ?
हम चुप्पे उठि क’ चलि अएलहुँ। ओकरा कहबो ने केलिऐ। मास्टर साहेब जकाँ हमरा बुतें फुसलाएल पार नइं लागल।
ब्रेल पद्धतिसँ शान्ति पढ़ि-लिखि गेल। प्रशिक्षण प्राप्त कएलक। प्रमाणपत्रा भेटि गेलै। प्रमाणपत्रा ल’ क’ ओ कत’ जाएत? सरकार दिससँ एकर नाम पर अनुदान नइं भेटै छै। मास्टर साहेब एकर सभटा व्यवस्था करैत रहलखिन। आँखिक इलाज बहुत भेलै, लेकिन दुनू पट मुनाएले रहलै। मास्टर साहेब ओकर माइ-बाप रूपमे ठाढ़ भेलखिन। एक दिन आभार व्यक्त करैत कहलखिन-एकर सभटा भार उठा क’ अहाँ हमरा चिन्तामुक्त क’ देलहुँ। हम आब कत्ते दिन? रिटायर करबासँ पूर्व एकर कोनो इन्तजाम भ’ जैतै... ककरो अंक लगा दितिऐ...।
एहिमे हम एकदम अक्षम रही। पहिल बेर जहिआ हम ओकरा लेल सलवार-कुर्ती-ओढ़नी, तेल-साबुन, चूड़ी-फीता ल’ क’ गेल रहिऐ तँ मास्टर साहेब ओकरा बजौलखिन। स्थायी भाव नेने ओ आबि क’ ठाढ़ि भ’ गेल। दहिना हाथ आगाँ बढ़ौने बाम-दहिन करैत पहुँचल रहए। प्लास्टिक बला झोरा हम ओकरा हाथमे देलिऐ। ओ दुनू हाथें ल’ लेलक। धरती पर पैर पसारि क’ बैसल आ झोरामेसँ एक-एक टा चीज निकालि क’, हाथसँ छूबि क’, टो क’, सोहरा क’ देखलक। देखलक की कहबै, गमलक-परखलक कहबै? की कहबै? ...फेर बाजल?-ई सभ हमर अछि? हम ल’ जाउ?
मास्टर साहेबसँ ‘हँ’ सुनि क’ सभ वस्तु झोरामे आपस राखि लेलक। गमे-गमे जेम्हरसँ आएल रहए, टोइया दैत चलि गेल। मास्टर साहेबसँ हम गप्प करैत रही, आकि ओ परिचारिका संग पुनः हाजिर भेल। सलवार-कुर्ती पहिरि नेने रहए। बाजल-देखियौ तँ मास्टर साहेब, केहन लगैत छै? ठीक छै? कोन रंगक छै?
परिचारिका टोकलकै-हमर बातक विश्वास नइं भेल?-शान्ति अपन मस्तीमे रहए। कुर्तीक डाँड़सँ ऊपर दुनू हाथ दुनू दिससँ दबैत बाजल-एहि ठाम ढील छै, दर्जीसँ ठीक करा देब मास्टर साहेब!
प्रत्यक्षतः हम ओकर मुँह बकर-बकर तकैत रहलिऐ। लेकिन हमर अन्तरमे विचारक बिहाड़ि उठि रहल रहए... अपने देखि नइं सकैत अछि। लेकिन दोसरक आँखिएँ अपन सरूपक आकलन चाहैत अछि। दोसर कहाँ, सिर्फ मास्टर साहेबक आँखिसँ ओ देखए चाहैत अछि। ओ तँ इहो नइं बुझैत छै जे मास्टरो साहेब सूरदास छथिन। हरेक बातमे मास्टर साहेब। मास्टर साहेब बिनु ओकर गुजर नइं। मास्टर साहेब पर ओकरा अन्धविश्वास छै... अगाध विश्वा...स। कोन रंग छै, से जानि क’ ओ की करत? कोनो रंग ओकर देखल-चिन्हल तँ छै नइं, जे रंग पुछैत छै। ढील छै तँ की हेतै? लेकिन नइं, ओकरो फिटिंग चाही। हाय रे मन! भगवान मोन द’ दै छथिन आ मोनकेँ पूर करबाक सामथ्र्य नइं दै छथिन। एहन भाग्य ककरो नइं होउ। भगवान मास्टर साहेबक नीक करथुन। स्वयं नेत्राहीन रहितो एहि टुअरक प्रति एतेक मोह-ममता छनि। ककरो आँगुर धरा देबाक प्रयासमे रहै छथि। आ भगवानकेँ कहैत रहै छथिन-शान्ति सन भाग्य ककरो नइं देबै।
जहिया-जहिया शान्तिसँ भेंट क’ क’ आबी, रातिमे बत्ती बन्द क’ दिऐ आ आँखि मूनि क’ चली...। किछु-किछु काज करबाक प्रयास करी। नहएबाक, कपड़ा पहिरबाक अभ्यास करी। कएल भ’ जाए त’ शान्तिक प्रति किंचित आश्वस्तिक भाव जाग्रत होअए। लेकिन लगले यथार्थक बोध होअए जे घर-आंगन हम खूजल आँखिएँ देखने छी। कत’ की छै, से हमरा बूझल अछि। तैं हम सभ तरि बूलि लैत छी, काज कएल पार लागि जाइत अछि। शान्तिक संग ई बात नइं छै। तैयो शान्ति काज क’ लैत अछि। बासन माँजि लैत अछि, कपड़ा खीचि लैत अछि आ चाहो बना लैत अछि। बस, लग-पासमे एकटा अँखिगर लोक रहबाक चाही। क्यो स्टोभ जरा दै छै, तँ चाह बना लैत अछि... हाथ फेरि क’ भाफक मात्रा आ गर्मीसँ अन्दाजि लैत अछि-पत्ती ध’ दै छै आ सुगन्धसँ बुझि जाइत अछि जे चाह तैयार भ’ गेलै। छानिओ लैत अछि।
जाड़मे शान्तिकेँ स्वेटर देलिऐ तँ प्रसन्न भ’ क’ पहिरि लेलक आ शाश्वत प्रश्न पूछि देलक-कोन रंगक छै?
ओ जतेक निधोख भ’ क’ प्रश्न पूछि दैत रहए, हमरा बुते जवाब देल पार नइं लागए। फेर कहलक-हमरा लाल रंगक शाॅल देब?
जेना लाल रंग ओकर चिन्हल होइ। दोसरे दिन लाल शाॅल देब’ गेलिऐ तँ बाजल-लाले छै ने? हम चीन्हि गेलिऐ।
वर्ष पर वर्ष बीतल गेलै। एकटा बाप जकाँ मास्टर साहेबक चिन्ता बढ़ैत गेलनि। एहि समस्याक समाधानमे हम कोनो तरहें स्वयंकेँ सहायिका नइं पाबी। नेनासँ बालिका, बालिकासँ किशोरी आ आब नवयौवना। शान्तिक एहि समस्याक प्रति हमरो ध्यान रहए। लेकिन...। शिक्षित-प्रशिक्षित भ’ क’ जे नेत्राहीन युवक एतएसँ जाए लगै, तकर माइ-बापसँ नेहोरा करथिन। पहिल बाधक होइ शान्तिक अज्ञात कुल-शील आ दोसर सूरदासकेँ अँखिगर दोसराइत चाही। बात तँ ठीक। लेकिन शान्तिक हेतु अँखिगर दोसराइत कत’सँ औतैक? सरकारी कर्मचारी, पदाधिकारी आ अन्य नेत्राहीन विद्यालयसँ आएल-गेल शिक्षक-प्रशिक्षक लग मास्टर साहेबक एक्के गोहारि रहनि। निराश भ’ क’ भगवानकेँ कहथिन-एहन भाग्य ककरो नइं देबैक।
गर्मी छुट्टीमे बाहर जेबाक रहए। शान्तिसँ भेंट क’ अएलहुँ आ कहि देलिऐ जे करीब डेढ़ मासक बाद घुरब। पुछलिऐ जे कोनो खास वस्तुक इच्छा होउ तँ कह। कहलक-अहाँ अपने मोनसँ नेने आएब।
विदा भेलहुँ तँ हमर आँचरक खूट पकड़ने कने दूर धरि आएल आ सटि क’ ठाढ़ि भ’ गेल। गओंसँ कहलक-एकटा बात कहू?
-कह ने!
-एकटा चीज नेने आएब? ककरो कहबै नइं। चुपचाप चोरा क’ हमरे हाथमे देब। एना क’ देब जे क्यो बुझै नइं...।
हमहूँ नहुएँ कहलिऐ-बाज ने, की लेबें?
...
-की लेबें? बाज, नेने अएबौ।
-अ..य...ना।
जोरसँ बजाइत-बजाइत ‘अयना’ शब्द हमर कण्ठे धरि रहि गेल... हम पाछाँ भरे खसैत-खसैत बचलहुँ...। ओ भने सूरदास रहए, परन्तु...। ‘हँ, हँ’ कहैत हम एक तरहें भगलहुँ ओकरा लगसँ।
कानबला, नाकबला, गरदनिक माला, औंठी, बिछिया, टिनही पायल, नेलपौलिश, लिपस्टिक आ ओकर फर्माइशी वस्तु ल’ क’ ओकरा देमए गेलिऐ तँ मास्टर साहेब बड़ प्रसन्न रहथि। कहलनि-खुशखबरी अछि। शान्ति सन भाग्य भगवान सभकेँ देथुन।
सुनि क’ मोनमे भेल, मास्टर साहेब चिन्तासँ बहकि गेलाह अछि-शान्ति सन भाग्य? सभकेँ?
चण्डीगढ़ नेत्राहीन विद्यालयक एक युवा शिक्षक शान्तिक संग विवाह कएलनि। ओकरा संगहि नेने गेलखिन। श्यामा मन्दिरमे विवाह भेलै आ नेने चल गेलखिन। हम बहुत दिनसँ एहि पाछाँ लागल रही। शान्ति बड़ सुखी अछि। ओतए ओकरा भनसीया छै। ओकरा कोनो काज नइं करए पड़ै छै। ओही स्कूलमे शान्तिओकेँ नोकरी भ’ जेतैक। भगवान एहन भाग्य सभकेँ देथुन!
हम हठात् सोचि नइं सकलहुँ जे आब एहि अयनाक हम की करी।

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नागदेसमे अयनाक व्यवसाय
रमेश

बबेक अमलसँ एत’ साँपक बास होअ’ लागल छल।
बाबा लोकनि उजरा नाग सभकेँ भगौने छलाह देससँ। तैओ फेर देसी नाग सबहक शिकार होअए लगलाह।
बाबा सुपारीक कतरन चिबबैत बजै छलाह-ई नागडीह थिक। ई गामे नागग्राम थिक।
पाछू काका आ बाबू सेहो बाजथि-ई नागडीह छी। अइ घराड़ी पर खाली साँपे-साँप। चतुर्माष्यामे के कहए, सालो भरि नाग देवतासँ साक्षात् होइत रहत।
हमरा ओहिना मोन अछि।
ताहि जबानामे हम बड्ड बच्चा रही। मुदा बच्चा रही बीसमे शताब्दीक, तें ततबा होसगर रही। साँपक अर्थ हम नीक जकाँ जनिते रही, से दाबी हम नइं करब। मुदा एतबा जरूर कहब जे साँपकेँ हमर चेतना कोनो नीक जीव कहियो नइं मानलक। ओकरा प्रति भय, आदंक आ दुश्मनीक भाव स्वाभाविक रूपें आदमीक मोनमे आदिम युगसँ रहैत अएलै अछि। से भावना पोसब आवश्यक छै-से हम नान्हिए टासँ बुझैत रही। हमरा विषहीनो साँपक प्रति दया भावक संचार कहियो नइं भेलए। छोट रही तँ बाबा हमरा साँप-समाजक प्रति सहज आ अभ्यस्त बनेबाक प्रयासक क्रम, ओकर अस्तित्वक औचित्य-स्थापन हेतु रंग-बिरंगक तर्क वा कुतर्कक जाल बुनबाक प्रयास केने रहथि। मुदा हम बेर-बेर हुनकर सायास बूनल भ्रमजालकेँ ‘अहाँ हमरा ठकै छी बाबा’ कहि-कहि ध्वंस क’ देल करी। हमरा ई जाल फाड़बामे बाबाक जाल बुनबासँ बेशी आनन्द आबए। बाबा हमर प्रहारकेँ कहियो नइं रोकि सकलाह।
साँपक सन्दर्भमे बाबा द्वारा देल गेल अनेक तरहक तर्क हमरा मानस-पटल पर कोनो क्षीणो टा छाप नइं छोड़ि सकल, आ बाबा दूधमे पानि मिला क’ हलुआइक हाथें बेचैत-बेचैत एहि दुनियाँसँ महाप्रयाण क’ गेलाह-जहिया नारक टालसँ एक पाँज नार घिचैत काल एकटा गहुमनक पोआ छू देलकनि। कत्ता बेर चाटी चलल, जोड़ीक-जोड़ी विषहाराक मंत्रा पढ़ल गेल। मोती बजाओल गेल। मुदा साँप नारक टालसँ निकलि बाबाक हाथमे हबक्का मारि पुनः खूनसँ जहर नइं चुसलक। आ बाबाक महाप्रयाण भ’ए टा गेल।
बाबाक माँछ-मासुक पराते एकटा आर साँप-घटना भेल। बाबाक जिवितेमे काका एक दिन फरीकेक खरहोड़िसँ दू सोरेह ख’ढ़ राता-राति काटि नेने रहथिन। फरीक कलकत्ता कमाइत छलाह, तैं काकाकेँ सुतरि आ पचि गेलनि। काका चारू अलंग घर छाड़ि लेलनि। आँगन चकमका गेलै, आ बाबाक मुसकीमे सौन्दर्य-बोध कोजगरा रातिक पचीसीक कौड़ी जकाँ छिड़िया गेल रहनि।
मुदा एक्के भदबारिक बाद ख’ढ़ पुरना गेलै। आ काकाकेँ तहिया बुझेलनि जे ओ अनका खरहोड़िसँ ख’ढ़ नइं, साँपे-साँप आनि क’ घर छाड़ि लेलनि अछि-जहिया ओ एकटा कदीमा तोड़’ चार पर चढ़लाह त’ तीन टा साँखरक पोआ आ अंडा गुज-गुज करैत बुझेलनि। काका चिचिया क’-भैया हौ भैया, साँप-बजलाह आ सीढ़ीसँ धड़फड़ा क’ उतरलाह।
रच्छ रहलनि जे साँखड़क बुढ़बा-बुढ़िया सबसँ भेंट नइं भेलनि। अन्यथा...
लोक कहलकनि-नइं मारहक। ई नागडीह थिकै। साँपमे लक्ष्मीक बास होइ छै।
काका कने डेरा गेलाह। पोआ गुजसँ उठल छलनि, गुदगुदी लागल छलनि। गुदगुदीक आदंकसँ डेरा गेल छलाह।
मुदा काका डेरेलाह नइं वस्तुतः।
ओ अनकर मसुरी-खेसारीकेँ घास बुझि माल-जाल लेल कटैत रहलाह आ आड़ि काटि-काटि क’ खेतक सिमान बढ़बैत रहलाह। हम कने-कने सज्ञान भेल जाइत रही, तें आश्चर्य लागल करए जे एते रास घटना भेलाक बादो हिनका ड’र किऐ नइं भ’ रहल छनि साँप जातिसँ? हमरा पूरा गाममे असंख्य बाबा डोलक दूधमे कल, डबरा आ इनारक साँप छोड़ैत बुझाथि। असंख्य काका साँपसँ खेलौड़ करैत बुझाथि। हमरा हुनका लोकनिक ई बात-जे ई नागडीह थिक-अपूर्ण बुझाए। वस्तुतः हमरा विचारेँ अपन सम्पूर्ण गामे नागग्राम थिक। पूरा गामक अधिकांश लोक तरह-तरहक साँपक गछाड़मे पड़ल अछि। अन्ततः साँप एकटा घृणित अ-जाति थिक, से लोक पता नइं, अनुभव करैसँ किऐ हिचकिचाइत अछि?
आब देखिऔ ने, घटनाक्रम किछु एना मोड़ लेलकै जे काका हमरा सभसँ भिन्न भ’ गेलखिन। माइ-काकी दुनू दियादनीमे बहुत झगड़ा भेल रहै। मानसिक स्तर पर दुनू-दुनू पर लागल रहलीह आ रहलाह। एक दियादनी अपन बेटीकेँ सिखा क’ पठाबथि-जो काकीक बाड़ीसँ भट्टा, खीरा, मेरचाइ तोड़ि ला। ओ भाँटाक भुजिया जखन थाड़ीमे परसल जाए तँ हमरा बुझाए जेना लोक अगबे तेलिया साँपकेँ भुजि क’ खा रहल अछि। हमरा जीह ओकियाए लागए। मोन पचपचाए लागए। सागमे मेरचाइ नइं, तेलिऐ साँप बुलैत बुझाए।
मुदा ओ सब बूझथि-ई नागडीह थिक। तें एकटा विशेष स्वाद सब किछुमे बुझाइनि। ओ सँपाह स्वाद हमरा मुँहमे भरि-भरि कुर्रा पानि अनैत रहल, जेना पेटमे चाली भ’ गेल हो। आ ओ सब भने-निके सँपाह स्वादकेँ चटकार ल’ ल’ खाइत रहलाह।
एक बेर एना भेलै जे हमर एकटा बहिन फूलचोरनी भ’ गेल। हेड मास्टर साहेब अपन दलानक आगूमे तरह-तरहक फूल लगौने छलाह। ओ फूल सब हुनकर जीवन आ मरण छलनि। बड़ खर्चा, बहुत परिश्रम केने छलाह। हरदम खुरपीए हाथें रहै छलाह। आ से सगर टोलक धीया-पुता तीन बजे भोरेमे चोरा क’ तोड़ि लिअए। हमर बाबू शालिग्राम पुजै छलाह। हमर बहिन परिकि गेल छल; अधरतिएमे ढाठमे लागल काँटकेँ छोड़ा क’ जुमि जाए हेड मास्टर साहेबक दलानमे आ दोहारा तीड़ा, कनैल, गेना, अड़हूल आदि तोड़ि गाछकेँ सुन्न क’ देल करै। फूल आ पोथीक चोरि, चोरि नइं थिक। हमरा परिवारमे से बेरम-बेर चर्चा भेल छल। तें ओकर चोरि क’ प्रशंसनीय नजरिसँ देखल जाइ छल, कारण चोरिक उद्देश्य शालिग्राम-पूजन छल। आ बाबू खूब प्रेमसँ ओहि फूलसँ पूजा कएल करथि।
हमर मोन नइं मानए। हेड मास्टर साहेब दुःख आ अवसाद आ फूल-चोरिक दुश्चिन्तामे रहै छलाह। चोरि अन्ततः चोरिए थिक। चाहे कथूक हो। हेड मास्टर साहेबक आत्मिक कष्टसँ हम बेचैन रही। एही क्रममे हमरा बाबाक कहल बात सब मोन पड़ि जाए जे कनैल फूलक गाछ पर सुगबा साँप रहै छै। बरसातिमे वा अनदिनो तीड़ा फूलक गाछक झोंझ आ जड़िमे तगबा साँप रहै छै। सुगबा साँप लोकक माथेमे काटि लै छै। केस ठाढ़ भ’ जाइ छै, ठोर स्याह भ’ जाइ छै, देह ऐंठि जाइ छै, मुँहसँ गौंज निकल’ लगै छै। तहिना तगबा साँप लोकमे लेपटा जाइ छै। ओ तागक लच्छी जकाँ पड़ल रहै छै। लोक जँ धोखोसँ डंाड़मे खोंसि लेलक तँ तगबा चुट्टी जकाँ काट’ लगै छै आ ओकर मीठ-मीठ जहर लोकक अधडरेरसँ ऊपर सुन्न कर’ लगै छै। लोक गस खा क’ खसि पड़ै छै।
हम ई सब बातसँ बहिनकेँ डरेबाक प्रयास केलिऐ, जाहिसँ ओ फूलक चोरिसँ विमुख भ’ जाए। मुदा बहिन एहि बात सभकेँ सुगबा आ तगबा साँप बना क’ उड़ा देलक। ओ फूलक चोरिकेँ चोरि नइं मानलक, कारण बाबा वाक्य प्रमाणम्। ओ हमरा बात पर एकदम्मे ध्यान नइं देलक।
बाबू जखन शालिग्रामक ऊपरमे ओ फूल सब चढ़ाब’ लागथि तँ तगबा साँप शालिग्रामकेँ डँसि लैत छलनि। हुनकर देहमे उज्जर-उज्जर धारी बनि जाइन, जकरा बाबू भगवतजन्य विशेषता मानथि। विशेष तरहक पाथरक शालिग्रामजन्य योग्यता मानथि। जेना तगबा साँप शालिग्रामक देहमे लेपटा गेल होइनि। हमरा डर लागए, कहियो बाबू लहना आ सूदिभरना वला टाका बुझि जँ तगबा साँपक लच्छीकेँ डाँड़मे खोंसि लेताह, तँ की हेतै। हम पितृहीन भ’ जाएब। ओ लच्छी हुनका सूदिक टाका जकाँ कट-कट कटैत-कटैत समस्त देहकेँ महुरा देतनि। तहिया ने कोनो ओझा-गुणी रहत गाममे, आ ने अस्पतालमे सर्पदंशवला टीका। तखन? तखन? ...आ हमर देह सिहरि जाए। रोइयाँ काँट-काँट भ’ जाए। हम जोर-जोरसँ चिचियाए लागी-बाबू यौ, साँप। ओ तागक लच्छी नइं, साँप थिक। ओकरा चीन्हू बाबू। ओ कैक पीढ़ीक संस्कारकेँ चाटि लेत...।
बाबू हमरा माथा हाथ देथि-गायत्राी पढ़ि-पढ़ि क’। हुनकर माथा हाथ देब हमरा सर्प-संस्कारसँ अभिभूत क’ देत-से ओ नइं जानथि। ओ सब सर्प-संस्कारक संवाहक बनल रहलाह। हमरा जीवनमे बेर-बेर सर्प-दृश्य अबैत रहल। नागडीहक इंची-इंची, दुनियाँ भरिक साँपसँ गज-गज करैत रहल, जेना कोनो खत्ताकेँ उपछि देला पर ढोंढ़-मछगिद्धीसँ गज-गज करैत अछि। क्रमशः गामक सब डीह नागडीह बनैत गेल आ सर्प-संस्कार जन-जनकेँ ग्रसैत गेल।
एक बेर एना भेलै जे हमर मैट्रिक परीक्षा शुरू भेल, तँ काकाकेँ बाबू केन्द्र पर पठौलखिन, जेना कोनो डाइनि भुतसप्पाकेँ पठौने हो। हमरा सीट पर खिड़कीसँ नमरल काकाक हाथ ओहिना नमरए जेना कोनो करेत बरेड़ीसँ नमरैत हो। हम चैंकि-चैंकि जाइ। काका चीट-पुर्जीमे करेतक केचुआ मचोड़ि-सचोड़ि क’, लेपटा क’ डेस्क पर फेकथि। हुनका डाँड़ पर पाछूसँ सिपाहीक पोसल लाठी ओहिना बजरनि जेना कोनो अधसरक डाँड़ पर कोनो पोसुआ मोछैल पहलमानक लाठी। काका सिपाहीकेँ करेतक एकटा पोआ धड़ा देथि। मुदा काका ठीक कोनो साँपक लुतुक जकाँ डँसनाइ नइं छोड़लनि। हुनकर केचुआवला चीटकेँ झमाड़ि क’ हम दूर फेकी तैओ ओ आँखि गुराड़ि-गुराड़ि बेर-बेर हमरा दिस खिड़कीसँ केचुआ फेकथि। हम अपनासँ दूर-दूर फेकी आ कैक टा लड़की ओ केँचुआ उठा-उठा अपन-अपन बेलाउज आ डाँड़मे खोंसि लिअए। गार्ड सब अपन मुँह घुमा-घुमा मुसुकि-मुसुकि पान गलोठ’ लागए। हमरा ई सोचि-सोचि क’ रोमांच भ’ उठए जे कहीं केचुआमे साँपक बच्चे नुकाएल हो त’ ओकरा सबहक छातीमे डँसि नइं लेतै? फेर केचुआ तँ केचुआ थिकै। ओकरा केना डाँड़ आ बेलाउजमे खोंसने अछि? देहो नइं सिहरै छै? फेर हम अपन काॅपीमे साँपक विरुद्ध निबन्ध लिख’ लागी।
जखन हम परीक्षा समाप्त क’ गाम घुरलहुँ, काका हमरा बाबूक समक्ष बहुत गंजन कएलनि, कारण हम हुनका द्वारा फेकल एकोटा केचुआ स्वीकार नइं केने रहियनि। हमरा बड़ कोनादन लगैत रहल। हम अपना सामथ्र्य भरि प्रतिवाद करबाक चेष्टा कएलहुँ। मुदा हम नितान्त असगर रही। बाबू, माइ, काका, बहिन सब मेल केने छलाह। हम ठीकसँ भोजनो नइं केलहुँ आ अपगराइनसँ उठि गेलहुँ। दलानमे सेजट कएल छल, ततहि काका संग हम सुतैत रही। ततहि जा पड़ि रहलहुँ।
राति भरि हम बिसनाइत रहलौं। साँपे-साँपक सपना-पर-सपना अबैत रहल। बीच रातिमे निन्न टूटल तँ ठेंगा ल’ क’ लगही करए उठलहुँ। लगही करैत किछु शंका भेल-काका यौ साँप! काका यौ! साँप!-चिचिएला पर काका दौड़लाह-कहाँ हौ? कहाँ हौ?
हम काकाक छाँहकेँ साँप बुझि तड़ातड़ि लाठीसँ पीट’ लगलहुँ-ई की करै छ’? ई की करै छ’? कहाँ छै साँप एत’?-काका बजैत, पाछू हटैत जाथि आ हम हुनका छाँहकेँ पिटैत, लाठी पटकैत आगू बढ़ल जाइ। काका ड’रसँ लगभग भागिए रहल छलाह, आ हम खेहारिते रहलहुँ। अन्ततः बाबू सूतलसँ उठाओल गेलाह आ कए गोटे मिलि क’ हमर लाठी पकड़ि नियंत्रित केलनि।
हमरा नौ बजे भोरमे निन्न टूटल, तँ आश्चर्य लागल काकाकेँ देखि क’। वस्तुतः रातिक साँपमे एहने चेहरा सटल छल आ देह साँपक छलै। जेना मेलामे बाबा एक बेर देखबैत कहने रहथि-ई नागचम्पा छिऐ। मुँह लड़कीक आ देह साँपक। फेर परीक्षा भवनक अनेक-अनेक लड़की जे अपन समीज आ बेलाउजमे केचुआ खोंसने छल, से सब नागचम्पाक रूपमे सामने आएल। असंख्य-असंख्य साँप आ नागचम्पाक छाया देखि हम लाठीक सन्धान करए लागल रही। हमरा बीटक-बीट बाँसकेँ काटि पाँजक-पाँज, बोझक-बोझ लाठी बनएबाक बेगरताक अनुभव भेल रहए।
एहि घटनाक बेसी दिन भेलो नइं रहै कि एक दिन बाबू हमरा सरकारी नोकरी लेल अपस्याँत भ’ क’ दस हजार साँपक गड्डी घूस द’ एलखिन, एगो बड़का हाकिम कंे। तखन हमर नागडीह साँपक महाकुंभ भ’ गेल आ हाकिमवला समस्त शहर सँपा गेल। गली-कुच्ची पर्यन्तमे बाबूक गड्डीसँ निकलि-निकलि साँप बूल’ लागल छल। हाकिमक अलमारीमे साँपक गड्डी बन्न नइं रहि सकल। शहर साँपमय भ’ गेल। आ तकर आयोजक वा संयोजक भेलाह हमर बाबू, जिनकर चालि हमरा फुटली आँखिएँ नइं सोहाइत छल।
एक सालक बाद आर दू टा घटना भेलै।
पहिला घटना हमरासँ सम्बद्ध छल, ओ दोसर घटना हमरा बहिनसँ।
पहिल तँ ई छल जे हमर घटकगण साठि हजारमे विवाह तए क’ गेलाह। जहिया सगुन उठबाक छल, हमरा गोरलगाइ विधिक उपरान्त साँपसँ भरल चंगेराकेँ उठएबा लेल कहल गेल। हम स्वभावतः अस्वीकार क’ देल। हमरा बुझाएल जेना असंख्य साँप थकियाएल हो। बाबूक विचारमे ई सर्वमान्य अछि जे बामी माँछ छी तँ मोटा-मोटी साँपे मुदा ईहो सर्वज्ञात अछि जे लोक ओकरा खाइत अछि। ई सर्वमान्य सामाजिक स्वीकृति बामीकेँ जाति-प्रजाति परिवर्तन आ सर्प-संस्कारसँ मुक्त क’ दैत अछि। मुदा ई हुनकर विचार छल। हमरा लेल तँ बामी, विषधर आ अन्य विषहीन प्रजाति... सभ छी तँ साँपे। चोरा क’ फूल तोड़ब होइ वा चोरिसँ परीक्षा देब, पाइ गनायब होइ वा अनकर जजात क्षति करब-थिक तँ सर्प-संस्कारगत क्रियाकलाप। कोनो साँपक मूड़ी, विषदन्त आ विषकुण्ड काटि क’ हटा देलाक उपरान्त ओ बामीए माँछ भ’ जाइ छै।
तें हम चंगेरासँ दूर हट’ लगलहुँ आ काका-बाबू हमर गट्टा पकड़ि चंगेराकेँ उठेबा लेल बाध्य करए लगलाह। घटकगण अवाक छलाह जे ई की भ’ रहल छै? जखन हमर प्राण अवग्रहमे पड़ि गेल। हम लगेमे ओंगठा क’ राखल काका हाथक लाठी उठा अनधुन भाँज’ लगलहुँ। हमरा होस नइं रहल जे ककर कान फुटलै, ककर कपार फुटलै? छगुआ-पटुआ उठा देलिऐ। अन्ततः माइकेँ आगू क’ क’ हमरा नियंत्रित कएल गेल आ हमरा रस्सा ल’ क’ हाथ-पैर बान्हि देल गेल। कन्यागत महराज हमरा मिर्गीक रोगी बुझि साँपवला चंगेरा समेटि विदा भेलाह। हमर बिआह बिआहे रहि गेल। तकरा बाद हमरा मोटा-मोटी सभ बताह बुझि मुक्त क’ देलक। लग आब’सँ लोक डेराए लागल।
आ दोसर घटना जे कहल से ई भेल जे हमरे परीक्षा जकाँ हमरा बहिनिक मैट्रिक परीक्षा छल। ओ जहिया परीक्षामे बैस’ लेल केन्द्र पर जाए लागल, ओकर गुलबिया ओढ़नीक तरमे हमरा साँपक उजरा केचुआ भरल बुझाएल। हमरा ईहो बुझाएल जेना ओकर डाँड़मे डराडोरि आ डरकस जकाँ केचुआ बान्हल हो।
हम ओकरा कहलिऐ-गे बहिन! तोरा ओढ़नी तरमे साँपक केचुआ छौ। तों सबटा केचुआ निकालि क’ एतहि फेकि दही। अन्यथा ई सब तोहर जीवनकेँ डँसि क’ फोंक आ झाँझड़ क’ देतौ। तोंहू नागचम्पा बनि जेबैं।
मुदा ओ हमर बात नइं मानलक। नहिएँ मानलक।
अन्ततः हम ओकर सभटा केचुआ निकालि फेक देलिऐ। ओकर डाँड़सँ केचुआ निकलबाक उपक्रम करिते रहिऐ कि माइ हमरा अंगनामे राखल आमक चेरासँ डेंगब’ लागल आ मारैत-मारैत अधमीरुत क’ देलक। हमर बहिन हबो-ढकार कान’ लागल आ बाबू अंगनामे माथा हाथ ध’ बैसि रहलाह।
जखन माइक हाथ पकड़ि क’ सौंसे टोलक लोक हमरा मारि-मुक्त क’ देलक, हम दौड़ल-दौड़ल घर गेलहुँ। दुनू हाथें अयना उठा क’ अनलहुँ आ बहिनिक मुँहक आगूमे राखि कहलिऐ-ई ल’ ले बहिन आ परीक्षा केन्द्र पर नेने जो। हरदम अपना हाथमे रखिहें। जखन-जखन तोरा दिस केचुआ ससर’ लगौ, तों ओकरा दिस अयना देखा दिहैं। साँप शीशा पर नइं चलि सकैए। बुझलही? साँप शीशा पर नइं चलि सकैए।
बहिन हमरा दिस टक-टक ताक’ लागल।
तहियासँ हम अपना देस भरिमे, जतएक लोक साँपक नाम सुनैत देरी आइ-काल्हि आन्हर आ सम्मोहित भ’ गेल करैत अछि, घूमि-घूमि क’ अयना बेचि रहल छी।

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हिस्सक
केदार कानन

एखन नीक जकाँ पह नइं फाटल छलै। कुहेसल भिनसरवा अपन अन्तिम चरणमे कँपैत छल। तखने काकी उठलीह। उठबाक मोन एकदमसँ नइं होइत छलनि। ओ सोचलनि जे राति रातिए रहि जेतै सब दिन लेल, अथवा ओ चैनसँ सूतले रहि जैतथि सब दिन लेल, कतेक नीक होइतै! मुदा काकीक ई अनर्गल सोच एकटा फूसि भ’ क’ हुनका फुसिया जाइनि।
प्रति दिन भिनसर होइत छलै आ ओ अन्हरोखे उठि क’ सबसँ पहिने गाय-माल बहार करथि। बरतन-बासन आ बाढ़नि उठबैत भोर भ’ जाइत छलनि। चूल्हि नीपैत चाह पीबाक इच्छा व्यग्र क’ दै छलनि। चाहक एहन अभ्याससँ परेशान रहथि काकी। खेनाइ भेटए वा नइं, चाह दैत जइयनु आ काज करबैत जइयनु काकीसँ।
मुदा बड़की कनियाँकेँ चाहक कोनो दर्द नइं बूझल छनि। ओ थारी भरि खा धरि लेतीह, चाहक कोनो इच्छा हुनका नइं होइत छलनि। तें काकीक चाहक निसाँसँ हुनका कोन लेब देब? कहियो, कखनो मोन होइत छलनि तँ बना क’ आगाँमे द’ अबैत छलखिन।
काकी किछु बाजि नइं पबैत छलीह। अपना बिनु पाइक लोक छलीह। बिनु पाइक लोक माने पाथर, माने देबाल, माने काठ। आ पुतोहुक आबि गेलाक बाद तँ बेटा सेहो आने भ’ गेल छलनि।
काकी एक बेर उतरबरिया घर दिस तकलनि। बरुआरी वाली कनियाँ आइ एखन धरि नइं उठल छलीह। आइ-काल्हि दू माससँ बरुआरीवाली कनियाँ भोरका चाह द’ जाइत छनि।
काकी अपन चाहबला गिलासकेँ चिक्कनसँ माँजि क’ बाहर बला चैकी पर ओन्हि क’ राखि देलनि। भनसा घरक ताखा पर डिब्बा-डिब्बी टोहए लगली। चीनी आ पत्तीक डिब्बा कतहु नइं भेटलनि हुनका। भनसा घरक केबाड़ लरपच छै। बड़की कनियाँ कुकूर-बिलाड़िक डरेँ चाहोक सामान अपने घरमे राखि दै छथिन रातिमे। काकी इच्छा रखितो कहियो चाह नइं बना पबैत छथि। कनियाँ अबेरकेँ उठैत छथिन। हुनका ठंढा नइं बरदाश्त होइत छनि।
नैहरमे भिनसरबे उठि क’ गोबर-करसी करएबाली, जाँत-ढेकी कूटए बाली कनियाँ, सासुर अबिते फुलकुम्मरि बनि गेल रहथि। कहियो जँ उठइयो चाहथि तँ देहसँ सटल पति डपटि दै छलखिन-अखन कतए जाइत छी? ठंढा मारत तँ हम दबाइ-तबाइ नइं कराएब...। आ अपन पतिक स्नेहसँ ओतप्रोत फटकारमे लटपटा क’ ओ फेर सीड़कमे अपन मूड़ी घोंसिया लैत छली।
बाहरमे काकी बाढ़निसँ आँगन बहारै छली, तकर आवाज हुनका अपन सीड़क तरमे बन्द कानमे नइं जाइत छलनि। जखन रौद चार पर खसि पड़ै, बड़की कनियाँ उठथि। थोड़ेक काल अठरैत-मठरैत चैकी पर बैसथि। कुरूड़-आचमन होइ आ तरकारीक चंगेरा, हांसूक संग चैकी पर रखा जाइ।
नहुएँ-नहुएँ आलू छीलैत बड़की कनियाँ अपन दैहिक दुर्बलताक वर्णन इतियौत-पितियौत ननदि-दियादिनी लग आरम्भ क’ देथि। काकी चाहक प्रत्याशामे बैसल रहथि। पहिने तरकारी काटल जाए, तकर बाद चाहक कोनो बात। पहिने चाह बना क’ चूल्हि मिझाएल नइं जाएत। एक्कहि बेर सब काज हेतै। पहिने चाह बनत आ तुरन्ते लोहियो चढ़त। ता काकी बाट तकैत रहथु।
तंग भ’ गेल छथि काकी चाहक हिस्सकसँ। एहि चाह लेल कतेको अपमान सहए पड़ै छनि हुनका। मुदा देह आ मोन कोनो एक वस्तुमे लबझाबए चाहैत अछि। खएबाक मोन नइं होइ छनि। चाह जेना एकटा अनमना होइनि। एम्हर तँ गुल करबाक आदति सेहो लागि गेलनि...। ई एकटा आर मोसकिल।
काकी एक बेर फेर उतरबरिया घर दिस तकलनि। बरुआरी वाली उठती तँ चाहक गिलास भरि देती। बोली-स्वभाव जेहन होउ मुदा बनबैत छथि बड्ड सुन्दर। मुदा बरुआरी वाली कनियाँ एहि दू माससँ किऐ देबए लगलीह हुनका चाह? ई बात काकीकेँ आइ बुझबामे अएलनि।
एही दू-तीन कप चाह लेल तँ हुनकर मझिली पुतोहु, जे सरकारी कर्मचारीक पत्नी छलीह, घरमे बिरड़ो उठा देने रहथि। ओ काकीक हाथमे चाहक गिलास देखिते बताहि भ’ जाइ छली। हुनका होइ छलनि जे हुनकर पाँच हजारी पतिक सभटा पाइ काकीक चाहे पर होम भ’ जाइ छनि।
कतेक षड्यंत्रा, धूत्र्तता आ उपराग द’ क’ ओ अपन पतिक बदली आन ठाम करबा लेलनि। हुनक एकहि टा वाक्य काकीकेँ सदति काल मोन पड़ैत रहै छनि-एक आदमीक चाह पर चारि सए टाका खर्च होइत छै। हमरा नइं रग अछि...। हमरा दू टा बेटी अछि कपार पर। चाहक एते खर्च हम नइं उठा सकबनि...।
तखनेसँ मझिली कनियाँ बड़की कनियाँक प्रतिद्वन्द्वी भ’ गेल छलीह। कनियाँ सब बेसी काल प्रतिद्वन्द्विए होइत छथि एक दोसराक। हुनकर ई वक्तव्य सुनि बड़की कनियाँकेँ छिछरी-पटिया उठि गेलनि। ओही काल सासुक प्रति हुनका कथित दायित्वक बोध भेलनि आ ओहो जोरसँ बाजल छली-अहाँ नइं देखबै तँ हम की मरि गेल छी? जेना रहबै सासुकेँ तेना रखबै।
काकीकेँ अपन दुब्बर भेल पीठ पर एकटा भरोसक अनुभव भेल छलनि। ओ उतरबरिया ओसार पर ठाढ़ एहि दुनू दियादिनीक वाक्युद्धक प्रकरण देखैत छली। बरुआरीवाली कनियाँक भौंह-ठोर चमकि रहल छलनि निरन्तर।
बड़की कनियाँ हुनका फूटलो आँखि नइं सोहाइत छलनि। हुनकर चलब, हुनकर बाजब... सभ किछु जेना हुनक रोइयाँ जरा दैत रहनि। ओ ओहि ओसार पर फुसफुसा उठली-देखबौ, देखबौ। एक कप चाह लेल तँ बेकल होइ छौ सासु आ दाबी करै छें...।
मुदा रच्छ भेल जे ओ अपने कहलनि आ अपने सुनलनि। जँ बड़की कनियाँक कानमे ई ़़़़़़़़़संवाद गेल रहैत तँ हड़कम्प मचि जाइत। दुनू दिससँ तेहन घमासान होइतै जे काकीक दम फड़फड़ा जैतनि। एहि दुनू दियादिनीक वाक्युद्ध आ हस्त-कलाक प्रदर्शनसँ काकी तीन लग्गा दूरे रहए चाहै छथि।
बरुआरीवाली कनियाँसँ हुनका अप्रत्यक्ष भय जकाँ होइ छलनि। एहि बातकेँ ओ स्वीकार नइं करै छथिन मुदा बात धरि सत्य थिक। एक तँ बरुआरी वालीक व्यक्तित्वो तेहने डेराओन छनि। भरिसके कखनो हँसैत छथि। काकी परिस्थितिमे संतुलन रखबाक लेल सदिखन हुनक उचित-अनुचितमे प्रतिरोध नइं करथि। एहिसँ ई होइत छल जे काकी पर ओ बेसी काल प्रसन्न रहै छली। मझिली कनियाँक देखा-देखी कहियो काल ओ आध कप चाह पठा देथि काकी लेल। मुदा झाड़लो बोली कम नइं कहथि ओ काकीकेँ। छोटे-छोट बात पर ओ झिड़कि दैत छली। अपनाकेँ सबसँ पैघ उचितवक्ता आ शुद्ध आत्माक बूझथि बरुआरीवाली। उचित बुझबएमे सासु, पितिया सासु किनको लेहाज हुनका नइं रहनि।
काकी ओहि नमहर परिवारक पैघ काकी छलखिन। बरुआरी वालीक पतिक अप्पन काकी। मुदा मानसिक स्तर पर सम्बन्धक डोरिकेँ ओ जुमा क’ बहुत दूर, फेकि देने छली। तें एक आध कप चाह अथवा एक बाटी तरकारी जँ ओ काकीकेँ दैत छली, तँ तकर घुमौआ नइं भेटला पर कतेको उलहन-उपराग भेटि जाइत रहनि काकीकेँ।
काकीकेँ बरुआरी वालीक असभ्य-उद्दण्ड व्यवहारसँ कोनो अन्तर नइं पड़ैत छलनि। हुनकर तँ अपनो दुनू पुतोहु तेहने छलनि। काकीक स्वभावमे आब विचित्रा स्थिरता आबि गेल छलनि। कोनो प्रकारक सृजन, कोनो तरहक सोचबाक शक्ति जेना भोतिआ गेल होनि। अगबे ढाकीक ढाकी दया, सहानुभूति आ करुणा आनो-आन लेल अपनामे भरने रहथि।
एहि बीच बरुआरीवाली कनियाँ दू मास धरि अकस्माते बीमार भ’ गेली। घरमे छोट-छोट बेटा-बेटी रहनि। भानस-भात केनिहार क्यो नइं। मोनक हाथें बेबस काकीकेँ देखल पार नइं लगलनि। जान-प्राण द’ क’ हुनक सेवामे लागि गेलीह। भानस-भात केनाइ, बाल-बच्चाकेँ स्कूल पठौनाइसँ ल’ क’ बरुआरीवालीकेँ जाँतब-पीचब धरि काकीक दैनिक चर्या भ’ गेलनि। एहि लेल कतेको गंजन सुनथि अपन पुतोहुसँ। मुदा काकी एतबे कहथि-जे हमरा की? जेहने अहाँ थिकहुँ, तेहने ओ...।
हुनकर पुतोहु एहन वाक्यक भीतरमे नुकाएल पीड़ा आ व्यंग्यकेँ नइं बुझि सकथि। नइं बूझथि तँ नइं बूझथि। काकीकेँ एहिसँ कोनो अन्तर नइं पड़ैत छलनि।
बरुआरीवाली जखन स्वस्थ भ’ क’ ओछान परसँ उठली तँ हुनक आँखि झुकल छलनि। एतेक तँ अपनो सासु नइं कएने छलनि कहियो। कृतज्ञतासँ लगै छलनि जे ओ झुकल जाइ छथि। हुनका सन गौरबाहि स्त्राीक एहन व्यवहारसँ काकी स्वयं थकमकाएल रहथि, अचम्भित रहथि-जे होइ, भगवान सभकेँ मति देथुन हे दिनकर दीनानाथ!-काकी गोसांइ घर नीपैत एतबे प्रार्थना करथि।
आ ताहि दिनसँ भोरका चाह काकीकेँ ओम्हरसँ भेटए लगलनि। भोरे-भोरे काकी सभ काज क’ कए गायक घरमे जमा भेल खढ़-पुआरक, घासक थोकड़ा ओलि ओहिमे आगि लगा देथि। धुआंइत-धुआंइत आगि तपैत रहथि, ओहने धुआइनि अपन जिनगीक सीयनि खोलैत रहथि आ तखने हुनका चाह भेटि जाइ छलनि।
एहि दू माससँ चाहक कोनो चिन्ता नइं छलनि। बड़की कनियाँ देरीसँ उठथु अथवा भोरहरिए। चूल्हि पजारथु वा नइं, हुनका परबाहि नइं। काकीक रोम-रोम बरुआरी वालीकेँ आशीषैत छलनि।
भोरे-भोरे हाड़ कँपबैत एहि जाड़मे चाहे टा हुनक संगी थिकनि-जीबथु बरुआरीवाली-सदिखन ओ बजैत रहै छलीह।
मुदा आइ की भ’ गेलनि?
ओ घूर लगसँ हटि क’ उतरबरिया ओसार दिस ससरैत दाबले पैरेँ बढ़लीह। बरुआरी वालीक भनसा घर खुजल रहनि, आँचो पजरल रहनि आ अदहनो सनसनाइत रहनि।
काकीकेँ आइ आन तरहक स्थिति बुझि पड़लनि। ओ बिन किछु बजने भनसाघरक फट्टक लग ठाढ़ि भ’ गेली। माइ-बेटी दुनू फट्टक दिस पीठ अड़ौने चाउर बीछैत छली।
दस बरखक बेटी माइकेँ टोकलकै-गै, आइ काकीकेँ चाह नइं देलही?
-तकर चिन्ता तोरे छौ? चल उठ, डोलमे पानि आन।-बरुआरीवाली बेटी दिस आँखि गुराड़ि जवाब देलखिन।
बेटी सर्द भ’ गेल।
बरुआरीवाली अदहनमे चाउर दैत बजलीह-आइ दू मास पूरि गेलै। आब सभ दिन हम की ठीका नेने छियनि? हुनको पुतोहु तँ दूध लैते छनि...।
काकी पैर दाबि ओतएसँ हटि गेलीह। चाह पीबाक इच्छा कखन ने समाप्त भ’ गेल रहनि। छाती धक-धक करए लगलनि। बरुआरीवाली कनियाँ ई नइं बुझि जाथि जे काकी हुनकर गप नुका कए सुनै छली।
नहुएँ-नहुएँ आबि कए फेर घूर लग बैसि गेलीह। थोकड़ासँ खूब धुआँ उठि रहल छलै। काकी अपन आँखि मीड़ैत ओतहि बैसल रहलीह, जेना पैर धरतीमे सटि गेल होनि। माँझ आँगनमे चैकी पर चाहक माँजल गिलास एखनो औन्हले राखल छलै।

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पेंपी
देवशंकर नवीन

ई चारिम खेप छलै। ब’र कोनो सरकारी स्कूलमे मास्टरी करैत आ पिता किसान। जमीन-जथा दुइ बिघा। मुदा मीनाक्षीक पिताकेँ ई कथा पसिन्न पड़लनि। तीन लाख टाका नगद आ एकटा हीरो होण्डा पर बात तय भेल रहै। सोलह दिनुक भीतरे दुरागमन सेहो। टाका गनती भ’ गेल छलै। खान-पीन, देखब-सुनब सब भ’ गेलै।
अचानक मध्यस्थता कएनिहार घटक सबटा पाइ नेने आपस आबि गेलखिन, आ मीनाक्षीक पिता सुरेशकेँ कहलखिन-विवाह फेर भंगठि गेल! कोनो दोसर कथा ताक’ पड़त...।
सुरेशक घरमे चरकामूड़ उठि गेल...! की भेलै...? कोना भेलै...? कोन उकबा उठलै फेर...? नाना तरहक शंकासँ�सुरेशक परिवार आर्त भ’ उठल। सबसँ बेसी आहत भेलीह मीनाक्षी। मीनाक्षी, सुरेशक एक मात्रा सन्तान। सब गुणक आगरि। सुन्नरि, सुशील, मेधावी, आइ. ए. पास, सुरेबगर कद-काठी, गोर-गहुमा रंग, गृह-कार्य-दक्षा, कुल-मर्यादाक रक्षिणी...। तथापि बेर-बेर विवाह भंगठि जाइत छै।

अत्यन्त निर्धन परिवारक सन्तान सुरेश, अपना समयक परम तेजस्वी छात्रा छलाह। पिताक कमाइसँ कोनो तरहें नोन-रोटी जुटि जाइ छलनि। उच्च शिक्षा हेतु खर्च जुटब असम्भव छलनि। स्वाबलम्बी भेने बिना गुजर नइं छलनि। से, आन की क’ सकै छलाह, ट्यूशन करबाक योग्यता छलनि। से करै छलाह। पढ़ै छलाह, पढ़बै छलाह। पढ़ि-लिखि लेलनि। विद्या, पद, प्रतिष्ठासँ पूर भ’ गेलाह।
सुरेश जखन एम. ए.मे पढ़ै छलाह, तखने विवाह भेलनि। पिताकेँ होनि जे हिनकर विवाहे नइं होएतनि। ...आ सुरेश एम्हर अलगे अकड़मे। तेहन प्रतिभाशाली छलाह, जे ककरहु किछु बुझबे नइं करथि। माता-पिताक लेल मुदा गजब भक्ति छलनि। से पिताक भीरुता आ पुत्राक पितृभक्तिक अनिवार्य परिणति इएह भेल जे सुरेशक विवाह शुभकला नामक उद्दण्ड स्त्राीसँ भ’ गेलनि।
सुरेश पढ़ल-लिखल आ बुझनुक लोक रहथि। हुनक मानब छलनि जे स्त्राीक हृदय सागर होइत अछि। ओ प्रेम आ सौहार्दक खान होइ अछि। एक्के जीवने कैक टा जीवन जीबि लैत अछि। एते धरि जे सुरेशक माइ जखन कखनहुँ अपन रूढ़िग्रस्त मान्यता राखथि, जे स्त्राीक जीवन पहाड़ होइ छै, तीन पुरुखक हाथें ओकर प्रतिपाल होइ छै-बापक हाथें, स्वामीक हाथें, सन्तानक हाथें, तँ सुरेश फाँड़ बान्हि क’ तैयार भ’ जाथि-नइं माँ, तोहर सोचब ठीक नइं छौ! एना सोचही जे एकटा स्त्राी अपन एकटा जीवन तीन पीढ़ीकेँ दान दै छै। ...स्त्राी-जातिकेँ जँ पता टा रहए जे ओकर पिता, स्वामी आ सन्तानकेँ की नीक लगै छै आ की अधलाह, त’ ओ अपन पुरुख-पात्राकेँ कखनहुँ उदास नइं होअ’ देत...!
अही तार-भजारमे सुरेश ई मान्यता दृढ़ कएने रहथि, जे जँ कोनो स्त्राीकेँ, अपन पुरुखक कमजोरी पकड़ा जाइ, अर्थात् ओहि स्त्राीकेँ ई पता लागि जाए, जे हमर स्वामीकेँ सबस ँ बेसी की, आ के प्रिय छनि, तँ ओ स्त्राी आसानीसँ अपन स्वामीक तन-मन-धनक स्वामिनी भ’ जा सकैए। अही मान्यताक कारणें सुरेश अपन नवविवाहिताकेँ पहिले परिचयमे अपन सब कमजोरी सुना क’ निश्चिन्त भ’ गेलाह।
मुदा शुभकलादाइ तँ अपन माइक असली सन्तान छलीह, जिनका शैतानी विद्याक सब खेत-खरिहान देखल-सुनल छलनि। ओ बुझलनि, जे सुरेश सुधंग लोक छथि, हिनका पर शासन करब बाम-दहिन हाथक काज थिक। ओ सुरेशक मोनकेँ जितबाक बदलामे हुनकर दिमाग पर कब्जा करबाक चेष्टा कएलनि। कारण, अन्दाज छलनिहें, जे माइ-बाप आ पोथी हुनकर कमजोरी छनि। से, माइ-बापकेँ तंग करबनि, पोथी-पतरा नष्ट करबनि, तँ लोक-लाजें हमरा लग झुकल रहताह। आन कोनो कारगर उद्योग नइं अछि। मुदा से नइं भेल। सुरेश एहू घटनासँ काबूमे नइं अएलखिन। ओ अपन बाटे फुटा लेलनि। अलग रह’ लगलाह। हँ, एहि बीचमे कोनहु उद्योगसँ, अथवा सुरेशक सुधाइसँ, शुभकलादाइकेँ एकटा बेटी भ’ गेल छलनि। बेटीक नाम सुरेशे रखने रहथि-मीनाक्षी।
मेहनती आ प्रतिभाशाली व्यक्ति तँ अक्खड़ होइते अछि। सुरेश अक्खड़ मिजाजक लोक, शुभकलाक समस्त अशुभ-कलाकेँ उपेक्षित करैत अपनाकेँ पोथी, आ बेटी... एही दू बिन्दु पर केन्द्रित क’ लेलनि। मुदा बेटीक मामिलामे सुरेश पराजित भ’ गेलाह। बेटीकेँ संग राखि क’ एक सभ्य स्त्राी बनएबाक श्रेय नइं ल’ सकलाह।
समय तेजीसँ बढ़’ लागल। शुभकला दाइकेँ माइ-बाप-भाइ आकि सुरेशक ग्रामीण थोड़ेक आँखि-पाँखि देलकनि-अए कनियाँ, ई छौंड़ा गुमाने टर्र रहैए, एकर मगजी हेठ करू!-...शुभकला दाइ सुरेशक मगजी हेठ कर’ लगली। ओकील-मोहरिर लग गेलीह। मोकदमा भेल। सुरेश कोटमे हाजिर भेलाह। मोकदमा चल’ लागल। ता धरि मीनाक्षी बुझनुक भ’ गेल रहए। अरोस-परोसक मौगी-मेहरि अथवा सखी-बहिनपा पूछै-मीनाक्षी! माँ कत’ गेलौ गे? मोकदमा लड़ै लए? तों ककरा दिससँ रहबिही...? माइ नीक लगै छौ, कि बाप...?
मीनाक्षी लाजें कठुआ जाइ छलीह। अपगरानिसँ ओकरा होइ जे किऐ जिबै छी! बापक गलती छै कि माइक, से ओहि समयमे बुझि नइं पाबए, मुदा बापक प्रति आदर उमरि जाइ। तखन एकटा अवश्य छलै, एहि त्रासदीमे मीनाक्षी बड़ तेजीसँ ठेकनगरि होअ’ लागल। ज्ञान आ गम्भीरता बड़ तीव्रतासँ बढ़’ लगलै। ओकरा होइ जे जँ आइ हम पिताक संगें रहितहुँ तँ कतेक नीक होइतए। ओ सोचए जे पढ़ाइमे मेहनति हमहूँ तँ कम नइं करै छी, मुदा बाट देखौनिहार क्यो नइं अछि। खर्च तँ सबटा पिते करै छथि, हम हुनकर प्रेमक भागी किऐ नइं भ’ पाबि रहल छी?
जखन-जखन ओकर सखी-बहिनपाक पिता बजारसँ कोनो नब कपड़ा-लत्ता अथवा आने किछु आनि क’ दै आ अट्ठा-गोटी अथवा सतघरिया अथवा लूडो खेलाइ काल ओकर सखी सब अपन पिताक सम्बन्धमे कोनो गप करै, ओकरो मोन कुलबुलाइ। होइ, जे हमहूँ किछु गप करी। मुदा की गप करितए। ओ तँ अपन पिताकेँ आइ धरि जानिए नइं सकल। ओकरा तँ पते नइं छलै, जे केहन स्वभावक छथि पिता। शान्त लोक छथि, कि तमसाह। स्नेही लोक छथि, कि खरूस। कोन बातसँ प्रसन्नता होइत छनि, कोन बात पर दुख होइत छनि-कहाँ किछु जनै छल ओ! ओ सोचए-हमर ई हाल तँ माइएक कारण अछि ने! पिता परदेशमे रहै छथि, मोकदमा लड़ै लेल कोट धरि अबै छथि, गाम अबिते नइं छथि। किऐ अओताह? ककरा लेल अओताह? ककर स्नेह-प्रेम बाँटै लेल अओताह? मुदा की, हमर पिताकेँ कहिओ हमर स्मरण नइं अबैत हेतनि? ...ओ अपनहिसँ उत्तरो ताकि लिअए-अवश्य अबैत हेतनि। से नइं रहितनि, तँ हमरा संग ल’ जएबाक कोशिश किऐ करितथि! हमरा लेल कपड़ा-लत्ता आकि किताब-कापी किऐ पठबितथि...? मीनाक्षी सोचैत-सोचैत अवचेतनमे चल जाइत छल। अपन दुर्भाग्यसँ पैघ ओकरा अपन पिताक दुर्भाग्य बुझाइ। ओ सोचए-सएह, एहि दुनियामे एहनो पिता छथि जे सन्तान लेल कर्तव्य तँ सबटा निमाहि रहलाहे, अधिकार किछु नइं प्राप्त छनि। एसगर भेला पर कते कनैत हेताह हमर पिता...! मीनाक्षी हिचुकि-हिचुकि कान’ लागए। सखी सब देह हिला क’ पूछै-की भेलौ मीनाक्षी, किऐ कनै छें? तोरे दाँव छिऔ आब, चलही ने!
मीनाक्षी हड़बड़ा क’ आँखि पोछैत, मुँह पोछैत, थरथराइत आवाजमे कहै-किछु नइं, तों सब खेला, हम जाइ छी!
सब पुछिते रहि जाइ आ मीनाक्षी जा क’ अपना घरक खाट पर मुँह झाँपि कान’ लागए, कनैत-कनैत सूति रहए।

विपत्ति मनुष्यकेँ ठोस बनबैत अछि, शुद्ध करैत अछि, अकाले वृद्ध क’ दैत अछि। मीनाक्षीक बालपन, ओकर माइ-बापक युद्धमे तहस-नहस भ’ गेलै। ओ बालिका रहिए नइं सकल कहियो। नेनपनेसँ उपेक्षा सहैत-सहैत पाथर भ’ गेल छल आ आब पकठोसि जकाँ गप कर’ लागल छल। माइकेँ जखन रातिक राति, दिनक दिन गाम-घरसँ फरार रहैत देखलक, तँ एक दिन तेज आँखिएँ पुछलक-माँ गे, तूँ राति-राति भरि कतए निपत्ता रहै छिही? किए एना केने फिरै छिही? अइ गामक जे लोक तोरा सीक्की दैत रहै छौ, ओएह परोछमे तोरा मादे की-की बाजै छौ, से बूझल छौ?
-की?
-कहै छौ, जे गेलैए छिरहरा खेलाइ ले! सुरेशबा बियाह केलक ओकीले-मोख्तारक सुख ले! ...तों एना किऐ करै छिही? कलमच घरमे बैसि नइं होइ छौ?
-गै छौंड़ी, तों त’ बापक भाखा बजै छें! तोरे लए हम अपन जीवन बेरबाद केलौं, आ तोंही हमरा पर शासन करबें? तोहर बाप त’ शासन चलाइए नइं सकलौ...! देखैत ने रही, ओकर हम कोन दशा करै छिऐ?
-माँ, सत्ते तूँ राछछनी छिही! तोरा अपन सासु, ससुर, स्वामी, बेटी... ककरो भक्खा ठीक नइं लगै छहु, मुदा आनक भक्खा मीठ लगै छौ। माँ, आबो सुधरि जो, अपन दीन-दुनिया सुधारि ले! क्यो काज नइं देतौ। अपन जीवन तों हमरा लेल नइं, अपन जिद्द, अपन मूर्खता आ अपन अहं लेल बर्बाद कएने छें! ...आ अपने किऐ, तों हमर पिताक, हमर दादा-दादीक जीवन धरि स्वाहा क’ देलें! तों त’ अइ खानदानकेँ नष्ट क’ देलही माँ। सत्ते, तों डीह पर जलदाता धरि नइं होअ देलही!
शुभकलाकेँ बेटीक एहि तीख वचनसँ माथ फाट’ लागल रहनि। अपनहि सन्तान जखन एहन वचन कहए, तँ...! कनेक टा मनोहानि भेलनि, तैयो गरजि उठली-चुप्प शैतान!
-हम त’ चुप भ’ जाएब, मुदा तों सोचही! आइ कोन गौरवसँ रहितिही, आ कोन अधोगतिसँ छिही! गामक कुकूर-कौआ थूक फेकै छौ! सोझाँमे क्यो किछु नइं कहै छौ। तोरासँ के लागत, सबसँ ढूसि लैत फिरै छिही। इज्जत-प्रतिष्ठा त’ सबकेँ पियरगर होइ छै। तोरा त’ कोनो इज्जत-प्रतिष्ठा छौ नइं! भरि टोलक लोक कहै छौ जे कोनो दिन ई उढ़ैर ने जाइ!-कने सोचही, जे तोरा सन माइक बेटी भ’ क’ हमरा की-की सह’ पड़ैए? किऐ एना करै छिही? अठारह बरखसँ ई धन्धा करैत रहलें, की भेटलौ? दुक्खो काटि क’ घरलगनी होइतें, त’ कमसँ कम लोक त’ खिधांस नइं करितौ। आबो शान्त भ’ क’ घरमे बैस। थोड़े दिन मनुक्ख भ’ क’ सेहो देखही माँ!
-जो जो, हमरा उपदेश जुनि दे!
मीनाक्षी चुप भ’ गेल।
एहि समय धरि अबैत-अबैत मीनाक्षी बेस होशियारि भ’ गेल छल। हरदम मोनमे होइ जे गामक लोक हमर पिताक तेजस्विताक एतेक चर्चा करैत अछि, से हमहूँ हुनकहि सन पढ़ि-लिखि सकितहुँ। पढ़ैत तँ छी, मुदा मोन थिर नइं रहै अछि।
माइक किरदानी हरदम ओकरा परेशान करैत छलै। पढ़िते काल जँ कोनो घटना मोन पड़ि जाइ, तँ परेशान भ’ जाए। पढ़ाइ बन्द कर’ पड़ै। मुदा, तैयो धीरे-धीरे मैट्रिक पास क’ गेल। सेकेण्ड डिवीजनसँ। दुख भेलै। भेलै जे फस्ट डिवीजन होइतए तँ पिताजी हमरा पर प्रसन्न होइतथि। मुदा एहिमे हमर कोन दोख! मेहनति तँ हम कम नइं कएलहुँ। ओकरा मोनमे भेलै जे हमहूँ काॅलेजमे पढ़ी। मुदा कोना पढ़ब। गाममे काॅलेज अछि नइं। माइ, पिता संगें जाए नइं देत। पिता संगें रहितहुँ तँ काॅलेजमे पढ़ब हमरा लेल कोन कठिन छल!
सोचि-विचारि क’ मीनाक्षी अपन पिताकेँ हुनकर एकटा बालसखाक माध्यमे दूटा सन्देश पठौलक-हमर अभिलाषा अछि जे एकटा घड़ी पहिरी, आ काॅलेजमे नाम लिखाबी!
सुरेशकेँ ई सूचना जहिया भेटलनि, ओ विह्नल भ’ गेलाह। एकटा शिशुक अवहेलनाक आकलनसँ व्यथित भ’ उठलाह। ओ सोच’ लगलाह जे एकटा उजड्ड स्त्राीक उद्दण्डताक कारण कतेक जीवन तबाह भ’ गेल। हमर माइ-बापकेँ पुतहुक सेवा-पूजा नइं भेटलनि। डीह पर उत्तराधिकारी नइं आएल। एकटा अबोध बालिकाक जीवन मौला गेलै। ...की-की सोचैत रहल होएत मीनाक्षी अपन बाल-सखी सभक बीचमे! ...विह्नल होइत सुरेश तत्काल उठलाह। बजार गेलाह। बेटी लेल एकटा उत्तम घड़ी किनलनि, आ सोझे गाम दिस विदा भ’ गेलाह...।
गाम पहुँचि क’ हाथमे घड़ी दैत बेटीकेँ पुछलनि-तोरा कोन काॅलेजमे नाम लिखएबाक मोन करै छौ? चल, आइए तोहर नाम लिखा दै छिऔ!
मीनाक्षीक जीवनमे ई पहिल घटना छलै। खुशीसँ जेना ओकर चेतना काज करब बन्द क’ देने छलै। घड़ीकेँ उनटा-पुनटा क’ देखए। ओकरा पहिरए, कि राखए, से सोचए। पिता काॅलेजमे नाम लिखा देबा लेल तत्पर छथि... ओकरा विश्वासे नइं होइ। अपन बाँहि पर चुट्टी काटि क’ जाँच कएलक-कहीं सपना तँ नइं देखि रहल छी! ...मुदा ई सपना नइं छल। ओ विह्नल होइत सोच’ लागल-हम एतेक आवेशी आ अदरगर पिताक सन्तान छी! एहि समस्त सुखसँ हम आइ धरि वंचित रहलहुँ! से माइक कारणें...! ई माइ थिक कि शत्राु...? स्त्राी-जाति तँ सम्पूर्ण परिवारक सुखमे अपन पूर्णता तकैत अछि। हमर माइ की कएलक! ओ स्त्राी थिक की नइं? घड़ी उनटा-पुनटा क’ देखै छल, कि सोझाँमे माइ ठाढ़ि देखएलै। मीनाक्षी भौंह सिकोड़ि क’ एक बेर माइ दिस देखलक। ओकर साँस तामससँ तेज भ’ गेलै। कंठमे किछु अँटकल सन लगलै। खखारि क’ कंठ साफ कएलक आ एक धोनहा खखार फेकि ओत’सँ टरि गेल।

ओहि मीनाक्षीक तय भेल विवाह आइ भंगठि गेलै अछि। दोष मीनाक्षीमे नइं, मीनाक्षीक बापमे नइं, मीनाक्षीक माइमे कहल गेलै अछि। ई चारिम खेप छलै। एहिसँ पहिनहुँ तीन बेर भंगठि चुकल छलै। सब ठाँसँ एक्के रंगक बहन्ना अबै छलै-जाहि कन्याक माइ एते हरजाहि अछि, कोट-कचहरी घूमि आएल अछि, ओकील-मोख्तारसँ भेंट क’ आएल अछि, तकरा बेटीकेँ कुलवधू बना क’ घरक संस्कार के बिगाड़त? माइक गुण तँ थोड़बो-थोड़ बेटीमे होएबे करतै!
मीनाक्षी की करए! ओ बैसि क’ अपन पिताक सम्बन्धमे सोचि रहल अछि। मैथिलक बेटीक विवाह कोन धरानिएँ तय होइत अछि, तकर अनुमान आब ओकरा भ’ चुकल छै। ओ सोचैए-माइ अपन जिद्दमे अपन, आ अपन स्वामीक जवानी तबाह कएलक, सासु-ससुरक बुढ़ारी जियान कएलक, अपन प्रतिष्ठा-मान गमौलक, एहि वंशक पटाक्षेप कएलक आ आब हमर भावी जीवनक सत्यानाश क’ रहल अछि। जवानीक उन्मादमे कोनो व्यक्ति एतेक पैघ त्रासदीक अनुभव किऐ नइं करैए!
व्यथित मीनाक्षी अपन पिता लग गेल आ किछु थम्हि कए बाजल-पिताजी, अहाँ व्यथित जुनि होउ। अहाँ जनै छी, जे स्त्राी-स्वभाव आ मनुष्यक प्रतिभा, आगि होइए! मुदा सबटा आगि अनिष्ट नइं करै छै। भँगठ’ दियौ विवाह! कतेक बेर भँगठतै? कहियो-ने-कहियो कोनो युवक ऐ सोचसँ ऊपर उठि क’ अवश्य सोझाँ आओत, तखन हम ऐ समस्त वरागतकेँ आ ऐ समाजक लोककेँ अवश्य देखाएब, जे एकटा उजड्ड स्त्राी जँ कोनो प्रतिभाशाली आ कुलीन व्यक्तिक सर्वनाश क’ सकैए, त’ ओकरे पेटसँ बहराएल ओकर बेटी केहनो पुरुषक खानदानकेँ नेहाल-सनाथ सेहो क’ सकैए।
सुरेश अचानक चेहा उठल रहथि। मीनाक्षीक भीतर जन्म लैत एकटा नब मनुक्खकेँ देखि खुशीसँ जेना नाच’ लागल रहथि।
ओ कैयन बर्ख बाद आइ कने कालक लेल स्वयंकेँ तनावमुक्त अनुभव कर’ लागल छलाह।

ऽऽऽ

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...