Thursday, July 17, 2008

पेटार ६

श्रीमती सुस्मिता पाठक
देवशंकर नवीन
विद्यानन्द झा

पिन कोड

नोट क’ लेब भाइ
हमर पतामे भेल परिवत्र्तन
आब जोका नहि अछि
दक्षिण चैबीस परगना,
पश्चिम बंग
चैहत्तरि पैंतीस बारह।

भ’गेल अछि जोक आब
कलकत्ता एक सय चारि

आर कते दिन
जखन
कैथिनियाँ पहिने हैत
पटना एक सय चारि
तखन दिल्ली एक हजार चारि
आ फेर
अमेरिका एक लाख चारि।

आर कतेक दिन?


हमर भय
एकैसम शताब्दीक
पहिल बर्ख सबमे
कहियो
कम्प्यूटरक संग बिताओल
पन्द्रह बीस बर्ख
अन्तिम रूपें विजयी भ’
प्रायः
क’ देत हमर कायान्तरण

की तहियो
बहराएत हमरा मुँहें
शब्द
सार्थक ध्वनिमय
शब्द वा मात्रा
सांकेतिक पिप-पिप

की तहियो
स्मरण हएत हमरा
अपन गामक दक्षिणमे स्थित
ओ पुरान पोखरि
आ ओहिमे पसरल
हरियर
मखानक पात
मखान उपछैत नबू मलाह
आ हुनकर चाँछल बाँहि
(जकरा मोन रखबाक
कोनो टा तार्किक कारण
नहि द’ पाएब हम)
वा
कम्प्यूटरक
समय समय पर होइत
पुर्नव्यवस्थामे
हेरा जाएत ओ
आ चमकत सन्देश
‘अवांछनीय दस्तावेज
हटा देल गेल’

की तहियो
बिचारि सकब हम
मनुक्ख भ’ क’
अपन धुरी पर नचैत
एकटा गोला-एहि पृथ्वी
आ एहि पर नुकाएल
एकटा गाम
(जकरा पैघो पैघ नक्शामे
ताकब होइ छै असम्भव)

ओहि गाममे हेराएल
एकटा सम्भावनापूर्ण
अतीतक विषयमे
वा
कम्प्यूटरक पूर्वनिर्धारित सीमा
(जे बनाओल गेल अछि
कोनो अट्टालिकाक तेरहम वा चैदहम महल पर
एकटा शीततापनियन्त्रिात कोठरीमे बैसल
कोनो नगरजीवी प्रोग्रामर द्वारा)
रोकि देत हमरा ई कहैत
जे ‘वैरिएबल नहि भेटल’

की तहिया
मोन पाड़ि सकब हम
अहाँक
समयक लहरिसँ झखाड़ल
मुदा तैयो चमकैत
अधवयसू मुँहेठ
आ भरल भरल ठोर
आ सिहरि जाएब
अहाँक नाम लैत
वा
चमकत मात्रा
एकटा सन्देश
रंगीन आकि श्वेतश्याम पर्दा पर
‘अनचिन्हार आदेश वा क्रिया नाम’
अहाँकें स्मरण करबाक प्रयासमे

कैकटा भय
घेरने रहैत अछि सदिखन
एहि स्पन्दनहीन
सीमाबद्ध
मशीन लग बैसल

टीवी-1
बजारक समयमे
आइना छी टीवी
कोनो संग्रहालयक
मुँहेठ पर राखल
जत’
बजारक मन माफिक
मुँह अपन देखै छी
हमरा सभ टीवीमे।

टीवी-3
हमरा अहाँंक
अन्तःपुरमे
शयनागारमे
मोनक निजू
कोन सान्हिमे
ढुकि अएला अछि ओ

आन कोनो पुरुख नहि
ने आन कोनो नारी
मात्रा विश्वसुंदर,
आ विश्वसुंदरी
जीबैत नीरस जीवन अपन
कोनहुना जीबैत अपन
रसहीन जीवन संगी संग
मनमे बसौने
रहै छी मात्रा हमरा लोकनि
विश्व संुदर
आ विश्वसुंदरीकें

मटुकनाथ
हुनकर पत्नी
आ तेसर कोनो,
एकसर नहि छथि कथमपि
कथमपि नहि अजगुत--
आगूसँ बजैत
प्रेमक गप आकि दुर्बोल
अपन पति
वा प्रेमीक संग
नीक जकाँ ताकि लेब चारू कात
सखी
कोनो नुकाएल वा देखाइत
माइक्रोफोन वा कैमरा
ने होअए अहाँक
गतिविधि नोट करैत।

एकसरि ठाढ़ि कदम तर तँ नहिएँ,
अपन
घरक सुरक्षाक भीतरो
आश्वस्त नहि रहि सकैत छी अहाँ
कखनहुँ

सदति
सर्वदा
उपस्थित रहैत अछि
टीवी कैमरा
अहाँक जीवनकें
तमाशा बनेबा लेल।


कृष्णमोहन झा

एकटा सोनाक नितम्ब
जखन अपनहि कोठलीक देबालसँ निकलि
एकटा आगिक बरछी
हमरा पाँजर दिस ससर’ लगैत अछि
आ हमरा छाहरिमे नुकाएल एकटा प्रेतक चीत्कार पर
हमरा पीठक धोधरिसँ झहर’ लगैत अछि भुस्सा
हम अपन नाम
आ खूनमे बचल एकटा धूसर गामकें ल’ क’
लोक-बेद आ घर दुआरसँ छारल जगह दिस हूलि पड़ै छी--

एकटा उसनल एकान्तसँ प्राण बचेबाक
एहिसँ नीक उपाय आर दोसर की भ’ सकैत अछि
कि भोजन नीन आ सिनेहक खोजमे भटकैत असंख्य तरबाक गन्धसँ
अपन लहकल मनोरथकें जोड़ि लौ
आ जेना बहुत दिनसँ निरन्तर सोचैत रहलहुँ अछि
सोचैत रही
जे चाहे कोनो कारणें हमरा ज्ञात नहि
मुदा एहन घर जरूर होयत कतहु
जत’ हमर पदचापक प्रतीक्षा हेतैक सभकें
जत’ चाहक पेयाली उठबैत हमर हाथ नहि थरथरायत
जत’ नीनमे भीजल एक जोड़ा बेकल आँखिकें
हमर थकनी आ जगरनाकें पी जएबाक एखनहुँ सेहन्ता हेतैक...


आखिर ई कोना भ’ सकैत अछि
कि जत’ पचासो एकड़ जमीन पर रंग-बिरंगक फूल रोपल जाए
जाहि ठामक गाछ-पात अपन रंग ओएह जमुनाक डबडबाइत स्मृतिसँ सोखए
जत’ दुःखक निवारण लेल
कोट-कचहरी आ हाकिम-हुकुमक मारिते बजार बसि जाए
ओहि ठामक कोनो घरमे केओ ककरो आस-बाट नहि ताकए?
धुआँ सा पसेनाक आँचमे बरकैत रातिक अनिद्राक बाद
अगिला दिन आँखिमे एकटा फूजल केबाड़क दृश्य भरने
मनोकामनाक पछुआरसँ अपना लेल कोनो सोन्हगर सम्बोधन अकानैत
चिनिया बादाम फोड़ैत आ भूजल नून चटैत
अन्ततः
जाहि संसारक खाधिमे हम अपनाकें ढरकल पबै छी

ओ नाँगड़िमे पटक्खा बान्हि क’ भगैत
हँसैत कनैत प्रेम करैत आ स्मृतिविहीन उत्सवमे देहक डिब्बाकें झमारैत
सिनेमा हाॅलसँ बहराएल भीड़क दृश्य बुझाइत अछि
जे रसे-रसे हमरा
एकटा गुदगर अभिनेत्राीक फोटोसँ सुसज्जित सान्ध्य-टाइम्समे
गाँथि लैत अछि

आर बहुत दिन जकाँ एकटा आर दिनकें मिझाबैत
अपन नामक प्रयोजन तकैत
आ मुइल माइक स्मरण करैत
एकटा विशाल पार्कक बेन्च पर बैसि जहिना एहि समयकें सोचैत छी
आँखिक आगू एकटा सोनाक नितम्ब नाच’ लगैत अछि
जे कखनहुँ कला-दीर्घाक रंग-रोगनमे झलकैत अछि
कखनहुँ काव्य-गोष्ठीमे कविता बँचैत अछि
आ कखनहुँ
एकटा अदृश्य स्त्राीक रति-सुखक चीत्कारमे बदलि जाइत अछि।



अहाँकें केओ सोर करै’ए
यह कविता अपूर्ण है।
रोज रातिमे अहाँकें केओ सोर करै’ए।
सिनेमाक अन्तिम शो खत्म भेलाक बाद
जखन लोकबेद घरमुँहाँ बरद जकाँ
घूरि जाइत अछि
अपन-अपन ठेकान पर
सोयासटीक चैकीदार
एक बेर आर अपन सीटी बजा क’
पहाड़क स्मृतिमे डूबल जखन
बिला जाइत अछि एक टा प्रदत्त अन्हारमे
जखन रातिक परती खेतकें
अपन सहस्त्रा फारसँ चिरैत-फाड़ैत पड़ा जाइत अछि
हकासल-पियासल एकबजिया टेªन
बहुत दूरसँ अहाँक नाक ल’क’
केओ सोर करै’ए।

अहाँ गाढ़ नीन्दमे रहै छी मातल
कि इठात भीजि जाइत अछि सगर देह
आ भालारि जकाँ काँप’ लगैत अछि अहाँक प्राण
अहाँ उठि क’ बैसै छी
जल पीबै छी
आ जहिना करौट बदलि क’ कोनो आन ठाम
लगब’ चाहै छी अपन ध्यान
कि एक टा करुण-कातर आवाज सूनि क’
फेर ठाढ़ भ’ जाइत अछि अहाँक कान

अहाँ सुतै छी आ उठै छी
उठै छी आ सुतै छी
सुतैत-उठैत अपन अनिद्राक मरुथलकें
एक टा बूढ़ जर्जर ऊँट जकाँ कहुना पार करै छी
राति भरि जपैत भगवानक नाम
मुदा एक टा अनुत्तरित गाम
बेर-बेर अपन नाम आ ठाम बदलि क’
बहुत दूरसँ अहाँकंे सोर करै’ए।
अहाँकें सोर करै’ए
बिढ़नीक छत्ताक ऊपरमे लटकल एक टा डमहा लताम
गुनेसर साहक दुआरि पर ठाढ़ तेतरिक गाछ
आ खलीफाक आड़ाक सिनुरिआ आम

अहाँकें सोर करै’ए
चूबैत घर आ नोनियाँ लागल देबाल
बाट तकैत खड़ाम आ फोटोमे लागल मकराक जाल
अहाँकें सोर करै’ए गाछ-पात लोकबेद आँगन आ दुआरि
एक आँगुर धँसल आँखि कि टूटल केबाड़?
अहाँकें सोर करै अहीसँ छूटल
अहाँक अभिशप्त अंश
खाइत-पिबैत सुतैत-उठैत ओएह मारैत अछि दंश
अइ दुनियामे माँगे छै सभ चीज अपन-अपन हिसाब
ओ पाँच घण्टाक बाद माँगए कि पचास बर्खक बाद।

एक टा गाछक यात्रा-वृत्तान्त
... कि तखनहि
हमरा आगूमे खन द’ खसल ओ एक हाथक छिम्मड़ि
आ खण्ड-खण्ड विभाजित भ’ गेल।
बैसाखक दुपहर
दूभि आ छाउर सँ रगड़ि-रगड़ि क’ माँजल
फूलक एक टा विराट थारी सन उज्जर
छल धरती पर राखल

गाछमे जतबा पात छल बाँचल
कोनो दुख मे डूबल छल
आकि सम्भावित चिलकाक कल्पित लोकमे
हवा सन चंचल चीज धरि ठाढ़ छल अविचल
आ अपनहि आगिमे टभकैत समय
कुकुरक जीसँ टप्-टप् चूबि रहल छल

माने ई
जे फूलक एक टा विराट थारीमे
नीरवतासँ ठसाठस भरल छल ओ दृश्य
जखन हम ओइमे एक टा आघात जकाँ
पैसल छलहुँ
कि तखनहि--
हमरा आगूमे खन द’ क’ खसल ओ एक हाथक छिम्मड़ि
आ खण्ड-खण्ड विभाजित भ’ गेल।


एहि सृष्टिक
सभसँ कोमल आ सभसँ उदात्त घटना छल
जखन कि एक टा गाछ
अपन संचित सपनाक संग पुनर्जन्मक यात्रा पर निकलि चुकल छल

तें
अपन पदचापसँ ओहि आदिम पवित्राताकें भाँगब
हमरा नीक नहि लागल
आ हम ठामहि घुरै वला छलहुँ
(ई किनसाइत प्रकृतिसँ अपना कें अलग बुझबाक अहंकार छल)
कि घुरब व्यर्थ बुझाएल

हमरा लागल
जे भ’ सकै’ए कि एक दिन
जखन एहि बीयाक ई यात्रा निश्चित भेल हेतैक
तखन ओकर यात्रा-वृतान्तमे ई क्षेपक सन्निहित हेतैक
जे बरकैत-टभकैत दुपहरमे
एक बीत छाह लेल आतुर एक टा लोक
एक चुरू पानि लेल बेकल एक टा प्राणी जकाँ आयत
आ अपन उत्तप्त रक्तमे
एहि गाछक मूल आकांक्षाकें ल’ क’ बहुत दूर चल जाएत
ओकरा देहमे
एक दिस बहैत रहतै ई अभिशप्त समय
आ दोसर दिस ओकर हड्डीक प्रागैतिहासिक
अन्हारमे
मोथाक एक टा गिरह बनि क’ जिबैत रहतै
एहि गाछक हृदय
आ कालान्तरमे
वृक्षविहीन एहि दुनियाक कोपड़ सन सुक्खल धरती पर
हरियर गोदीसँ वंचित आ दुखसँ थरथर
जखन दिनानुदिन होइत रहतै मर्मक क्षय
अपन संकल्पमे अविचल निर्भय
ओहि लोकक आत्मामे कल्पतरु जकाँ ठाढ़ रहतै
ई चिर पितर गाछ।





रमण कुमार सिंह

घेघही लताम पर

पता नहि कहियासँ प्रचलित अछि ई मोहाबरा
जे आइ धरि हमरा भाषामे करैत अछि हुड़दुंग
की साँंचे कोनो घेघही छलीह जे
आन छौंड़ी सभसँ फराक रहै छलीह लताम पर
किऐ नहि बैसै छलै ओकर पटनी अनका संग
आ की कोनो घरक केवाड़ नहि फुजैत छल ओकरा लेल
की ओकरा नहि करै छल केओ दुलार
जेना हम अपन भतीजी छोटी आ नीकूसँ करै छी

की ओकर माइ-बाप छल लाचार जे नहि करौलक ओकर इलाज
आ की अनठा देल गेलै ओकर समस्या
आ क’ देल गेलै ओकरा निर्वासित घरसँ
केहन लगैत हेतै ओकरा, सभक उपेक्षा
असगर भ’ जेबाक पीड़ा होइछ केहन भयाओन
जेना साँच बजनिहार कहाइ छै बुड़बक
कविकें कहल जाइ छै बताह
की तहिना लताम पर रहै वाली छौंड़ीकें
कहि देल गेल घृणा आ उपेक्षासँ घेघही

बेर-बेर ई प्रश्न सभ मथैत रहैत अछि हमरा
आ हमहूँ अनठा क’ सूति रहै छी
मुदा हम की जवाब दी नीकूकें
जे पूछै छलीह आइए--
कका, आब तँ भ’ गेल अछि बहुते आविष्कार
मुदा किऐ नहि भ’ पबै अछि घेघही सभक इलाज
कहिया धरि अहाँक भाषामे टाँकल रहत
एहन खराब मोहाबरा??

नवका बाटक तलाशमे छी
जीवन बाँचल अछि थोड़ आ
मोश्किल बढ़ले जा रहल अछि
जेना ओजोन परतक भूर हो

रोज नव-नव परेशानी रोज नव-नव टण्टा
गाममे जमीनक झगड़ा ल’ रहल अछि खतरनाक मोड़
आ आफिसमे बाॅसक दृष्टि रहैत अछि कुपित
घर जेना हमर नहि बिमारीक घर भ’ गेल अछि
सम्बन्धी लोकनिक सुनैत रहै छी उपराग जे
‘बड़का लोक भ’ गेलह अछि किऐ अएबह तू’
दोस्त कसैत अछि तन्त्रा जे -- महान काज क’ रहल छी हम
पत्नी पूछैत रहैत अछि जे -- कोन पहाड़ उनटा देलहुँ हम
हम कह’ चाहै छी जे ने हम बड़का लोक भ’ गेलहुँ अछि
आ ने क’ रहल छी कोनो महान काज
तेहन किछु करितहुँ तँ सुनए नहि पड़ितए पत्नीक उपराग
पहाड़ उनटएबाक गप्प तँ दूर हम तँ इच्छा होइतो
नहि उनटा पबै छी राजाक टोपी
जकरा त’रमे नुकाएल अछि मूस
घरसँ निकलैत ई भरोस नहि रहैछ जे घूरब सकुशल
आ घर घुरला पर भेटत सभ किछु ठीक-ठाक
मुदा तै सँ की हम हारि जाएब?
कोनो गठबन्धन सरकारक तँ नहि थिकहुँ मन्त्राी
जे बात-बात पर दैत रहब इस्तीफा
एहि मोश्किल सभक बीचसँ निकालि लेब जीवन
एखन नवका बाटक तलाशमे छी हम।

किऐक तँ चुप छी
नहि, कोनो पश्चात्तापक कारणें नहि
अपन उदारता साबित करबा लेल
राजा हुकुर-हुकुर जीब’ देताह अहाँकें
जेना जीबैत आएल अछि कुकुर कौरा पर।

जँ बैसै लेल कहलनि आ अहाँ
साँप जकाँ लोटन देब’ लागी
तँ अवस्से चढ़ब सफलताक सीढ़ी
एहन लोक सदिखन प्रिय रहल अछि राजाकें

राजा फेरसँ लिखबा रहल अछि
नगरक नबका इतिहास
जँ अहाँ होइ कनाह आ दिमागसँ शून्य
तँ एहि लेल सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति छी अहाँ

प्रजाक सुरक्षा लेल नहि
राजाक आतंकक प्रसार लेल
निकलल अछि गौरव-यात्रा
एकटा रहस्य जकाँ जँ अहाँ पसारि सकी
राजाक डर लोक सभमे
तँ बनि सकैत छी राजाक प्रिय

मुदा अन्यायक किलामे
ताकतक खिलाफ रचब जँ प्रतिवाद
आ करब जखने परिवर्तनक बात
तँ अहाँक हत्याक शत प्रतिशत गारण्टी अछि
हमहूँ आइ धरि बाँचल छी
किऐक तँ चुप छी।

तामस
ई कोनो नीक चीज नहि थिक
हम बुझैत छी जे दुनिया तामससँ नहि
प्रेम आ विवेकसँ चलैत अछि

तामस चाटि जाइत अछि विवेक
शोणित सुखा दैत अछि
हम सूति नहि पबै छी कतेक-कतेक राति
ई चोरा लैत अछि हमर सपनाक सभटा रंग

साधुजन कहैत रहलाह अछि जे
तामस नहि करू बाउ,
ई नहि अछि अहाँ लेल धर्मसम्मत
ई फराक गप्प जे आइ तामसे केर डण्डा पर
फहराइत अछि धर्मक झण्डा
आ एहि उपदेश केर ओतबो मोल नहि
जतबा कूड़ा केर

माइ सिखबै छथिन बेटीकें घरसँ बहराइ काल-
लीबि क’ चलब नीक, लोक किछु कहए
लोक किछु करए तों नहि दे ओइ पर कान-बात
सहि ले सभटा चुपचाप
तामस आ प्रतिवाद कएलासँ अपने इज्जति दूरि हेतौ
बेटी सुनैत अछि आ सहि लैत अछि सभटा उत्पीड़न
एहिना सहैत-सहैत ई ओकर बनि जाइत अछि स्वभाव
सभसँ बेजाए गप्प तँ ई जे एक दिन ओहो अपना बेटीकें
सिखबैत अछि ओएह सभ जे ओकरा सिखौने छल ओकर माइ
आब अहीं कहू त’
की एहि बात पर तामस नहि उठबाक चाही?


हम आएब, मीता

मीता, हम आएब
जेना मेघक कनलाक बाद
आकाशमे उगैत अछि पनिसोखा
हम सतरंगा अंगा पहिर क’ आएब।

हवासँ कने मस्ती
पानिसँ शीतलता
आ गाछसँ हरियरी माँगि लेब हम
जखन आएब अहाँ लग

पाथरसँ दृढ़ता
आगिसँ कने तेज
आकाशसँ उदारता
आ धरतीसँ सहनशीलता माँगि लेब
हम फूलसँ महक
चिडै़सँ पाँखि
नदीसँ प्रवाह
आ सागरसँ गहराइ माँगि लेब

खालिये हाथ अहाँ लग कोना आएब, मीता
सपनाक पीठ पर सवार भेल
चानसँ रस्ता पूछैत
एक दिन अहाँ लग पहुँंचिए जाएब, मीता


एक टा कुर्सी भेटला पर
एक टा कुर्सी भेटि जाएत तँ जीवन हएत सहज
ई भागम-भाग खतम होएत
रोजी-रोटीक चिन्ता होएत थोड़
कने समय बाँचत तँ भरब अपन सपनामे रंग
खुब खूलि क’ हँसब-बाजब मित्रा-सम्बन्धी संग

जखन दुख बढ़ि गेल बेस तखने
डूबै काल खैंकक सहारा बनि भेटल एक टा कुर्सी
सपनाक चानकें छूब बुझाएल आसान
छोट-छोट खुशीक तरेगन आँखिमे चमकए लागल

मुदा ई नहि बुझल छल जे ई कुर्सी
दूर क’ देत हमरा अपन जमीनसँ
मित्रा-सम्बन्धीक संग हँसी-ठट्ठाक गप तँ दूर
भेंटो भेना भ’ जाएत मोसकिल

बाजार एहि बीच खूब गरमा गेल छल
आ बाजारक चीज वस्तु छल एते दूर
जे हम अपन कुर्सीसँ उचकियो क’ नहि छूबि सकलहुँ
सपनाक चान रहल दूरे आ
नहुँ-नहुँ एक दिन खुशीक तरेगनो अलोपित भ’ गेल
मनुक्ख छलहुँ मुदा आब
कोल्हूक बरद बनि गेलहुँ

अन्तमे उपाए की छल हमरा लग
भोकारि पारि क’ कनैत हम
उतरि गेलहुँ ओहि कुर्सी परसँ।


ई सृष्टिक स्थगित हएब नहि थिक
मृत्यु एक दिन निश्चित अछि
मुदा कहिया, ककरो नहि पता!
ओ अबैत अछि जेना साँप सरसरैत अछि
हरियर घासक बीच वेगसँ

अतल गहराइमे फटैत अछि धरतीक छाती
आ समुद्री विक्षोभ बनि अबैत अछि ओ
लाखो लोकक जिनगी पर विराम-चिह्न लगबैत

ओकरा अबैत देरी मचि जाइत अछि हड़बोंग
एक टा उदास धुन पसरि जाइत अछि सगरो
हाकरोस, विलाप आ बरबादीक दृश्य लिखैत
ओ अबैत अछि बिना कोनो पदचापक
समुद्र जे बँटैत छल जिनगीक उल्लास
सीप, शंख मोती आ बहुत रास लोककें जीविका
मृत्यु बिलहि गेल अछि घर-घरमे
बिना कोनो मतभेद कएने गीड़ैत अछि
गली-गलीक अजस्र जीवन-रागकें

दौड़ैत अछि पत्राकार, नेता आ सामाजिक कार्यकर्ता
फेर राहतक सरन्जाम जुटाओल जाइत अछि
मुँह देखि मुँगबा बँटबाक चलनसारि
अखनो बाँचले अछि
सुनामीक लहरि किछु नहि बिगाड़ि सकल ओकर
अखनो पण्डितगण दलितक संग
राहतक अन्न खएबा लेल तैयार नहि
की ई आपदा जिनगीएक लेल छल
जिनगीक रंध्रमे घोसियाएल विकृतिक लेल नहि

मातबर लोक अपन दानवीरताक परिचय दैत
मुस्किया रहल अछि अखबारक पृष्ठ पर
आ मृत्युक मुखसँ बाँचल लोक
एक मुट्ठी अन्न लेल क’ रहल अछि हाकरोस
राजनीतिक नाग एतहु फण काढ़ि क’
अछि मुस्तैद
एक टा नेना अपन पोथी हेरि रहल अछि मलबामे
एक टा स्त्राी कनैत अछि हबोढ़कार अपन टूटल
घर देखि
एक टा दोसर स्त्राी नोर पोछैत परबोधैत
अछि ओकरा--
‘नहि कानू बहिन
फेर शुरू करू जीवन
मृत्युसँ रुकैत नहि अछि किछु
खतम नहि भ’ जाइत अछि जीवन-राग
पुरान घर खसला पर बनैत अछि नव घर
कतहु ने कतहु एक टा बीया अँखुआ रहल अछि अखनो
ई नहि थिक सृष्टिक स्थगित हएब
ई नव-निर्माणक शुरुआतक बेर थिक
आ एहि लेल नहि भेटत शक्ति कतहु आन ठाम
अपनहि रक्त आ सम्वेदनामे अछि
सृष्टिक नव निर्माणक अपूर्व शक्ति।

अविनाश

हम छी कमलाकांत

भरि राति खसल सीत
चन्द्रमणि गबैत रहला गीत
केओ थोपड़ी केओ चुटकीसँ दैत रहल जोश
मुदा जे देलक टिहकारी कनखिया क’
ओ छल सभसँ फर्रोश

एमेलेकेडमी’क पण्डालमे पसरल अछि पुआर
मुदा जिनकर पैसब छनि प्रतिबन्धित से छथि गुआर

तें जखन बदलल जमाना
बदलि गेल ‘रामकथा ससि किरन समाना’
आब अछि पासमानक भरनी दुसाधक ताना

संकल्पलोकक बैसि गेल भट्ठा
गुदड़ीमे बिका गेल सोन सन इतिहास कट्ठा पर कट्ठा

आब एमएलएसएममे होइत अछि बिदापत समारोह
आह, की आरोह-अवरोह!
मंचसँ बाजि रहला अछि संचालक,

‘हारमोनियम पर छथि शशिकान्त
तबला पर छथि चन्द्रकान्त
झालि बजओता उदयकान्त
गओता हेमकान्त
आ हम छी कमलाकान्त!’
अहियो पर थोपड़ी!

मुदा सुनै बला सुनि रहल अछि
संस्कृतिक ओसारा पर बड़का लोकक कोरस
गाँतीमे केओ नहि अछि गुआर
चैबगली पसरल अछि पावन-पवित्रा पुआर

मिथिलाक पोखरि बाभनक बन्सीसँ डेराएल
संस्कृतिमे सामाजिक न्याय एखनो अछि हेराएल

तें कतबो कहथु संचालक, हम छी कमलाकान्त
लोकबेद करबे टा करत टोन्ट जे अदौसँ अछि आक्रान्त!
अदौसँ अछि श्रोताकान्त!


शिवेन्द्र दास

नेपथ्य-कथा

तीर्थक अनुसन्धान
गति मनुष्य केर!

प्रत्येक यात्राी चैबटिया पर ठाढ़ अछि
कृष्ण-दान-याचना लेल बढ़ौने
दहिना हाथ!
रुदन कवच-कुण्डल केर
कटल औंठा केर
छर् िंधर्म केर, द्यूत केर
ऐश्वर्य मन्दिर केर!

विपुल बाजार
सिन्दूरलेपित
आडम्बरसिंचित मूत्र्ति केर!

भित्तिचित्राक पँचसितारा वैभव
आकण्ठ मदिरामे डूबल जल-महल
स्थापत्य, शिल्प केर
रत्नजटित स्वप्न-संसार!

विराजथु देवगण
सर्वधर्म; सर्वत्रा!
सबहिं भूमि गोपाल केर!
भूमिहीन सर्वस्वछिन्न जन!
दण्ड धर्म केर; सार्वभौम सत्ता ईश्वर केर
ईस्वी-सन पर सत्तासीन आदि-पुरोहित
चरण-कमलसँ पददलित करैत अछि
काल-शिशुकंे!
श्रद्धावनत भक्तक झुकल पीठ पर
निरन्तर चाबुक-दंश
--नेपथ्यमे अहिंसाक मद्धिम स्वर!

ताण्डव
भग्नावशेष केर
देवगुफा मध्य धूम्र-गन्ध आप्लावित
षड्यन्त्रा
भंगिमा-पाषाणक
ताम्र, काँस्य केर
अष्टधातु विलास!

इन्द्र लगाबथु दरबार!
चतुर्दिक अप्सरा, कंचुकी, नीवीबंध व्याख्यायित
स्तुत्य कामचेष्टादि: मुद्रा-विनिमय
--नेपथ्यमे अहिंसाक मद्धिम स्वर!

परिक्रमा: भाग्य केर
तीर्थ केर नियति जन केर
सामूहिक स्वर्गारोहण वाया गंगासागर
--नियति जन केर
गरलपान नीलकण्ठ केर
--नियति जन केर
नेपथ्य मे अहिंसाक मद्धिम स्वर!!


श्री पंकज पराशर
श्री अजित आजाद


















































सीताराम झा

हमरा क्यो कहलनि

कते कहू अजगुत जे देखल ओ कान सुनल
भारतमे बैसल अमेरिकाक गान सुनल
ई की एखन देखल सुनल, की की न पछाति सुनब
घर-घर बेटाक मुँहें बापक सिकाति सुनब
गंगहुमे साबुन ओ तेलसँ नहाति देखब
गरदनिमे तुलसी आ माछ-माँसु खाति देखब
जे बुझै छी पुन्न आइ तकरहि आगाँ पाप देखब
उषमहिमे पाला आ शिशिरहिमे ताप देखब
पहिने होएत फ’ड़ तकर बाद फूलपात देखब
मनुक्खक हुकूमतिमे बान्हल बसात देखब।

आगि-पानि भूमि ओ आकाश होएत सत्तामे
नाँच होएत बम्बइ देखब कलकत्तामे
धरतीसँ पानि आब जाएत असमानमे
खेती करब अहाँ सब तरेगन ओ चानमे
बामन आ सोलकन्हमे बदलि जाएत नाता
माँथ पर पनही रहत पैरमे रहत छाता
पृथ्वी प्रदच्छिनामे साँझसँ भोर हएत
यूरप अमेरिका तँ डेगहुसँ थोड़ हएत
अगहनक रान्हल भात तपते खाएब पूसमे
भारतमे पीढ़ी रहत थारी रहत रूसमे
तुल्य ग्रन्थकार ओ प्रकाश दिन राति हएत
भेदहीन मानव-समाज एक जाति हएत।।
ककरहु ई देखि सुनि कोंढ़ नहि दहलनि
मोन पाड़ि लीहथि जे ‘हमरा क्यो कहलनि’।।


कांचीनाथ झा किरण

माटिक महादेव
बलवान मानवक हाथक बलसँ
बैसल छह तों सराइ पर
बनि गेलह अछि पूज्य
पाबैत छह धूप-दीप-नैवेद
कबुलापाती सेहो होइत छह
लोक अछि आन्हर परबुद्धी
जानैत अछि स्थानक टा सम्मान
नहि तँ, जकर बलें रुचिगर
बनैत छै, भोज्य पदार्थ
तै लोढ़ी सिलौटकेॅं ओंघड़ा
मन्दिरमे पड़ल निरर्थक
पाषाण पिण्डकेॅं क्यो की करैत प्रणाम
तैं हे माटिक महादेव! नहि करह कनेको अहंकार
जखनहि हेतह विसर्जन
लगतह सभ बोकिआबए
हँ, अक्षत चानन फूल
पूज्य पदक किछु चेन्ह
जा धरि रहतह लागल
लत-खुर्दनिसँ रहि सकैत छह बाँचल
किन्तु निष्पक्ष परीक्षाक
कालक प्रहारसँ पाबि न सकबह त्राण
झड़ि धोखरि जेतह सब चेन्ह।
तखन की हेबह? से करह कने अनुमान
पदेॅं प्रतिष्ठित केर होइत अछि
की अन्तिम परिणाम
से जनैत छह
केवल पद-सत्कार
जय महादेव

भूत-प्रेत-अर्द्धनग्न कंकाल सार
मानव केर दल, नर-नारी समभावेॅं संयुक्त एकाकार
कृषि कर्मक मौलिक प्रतीक बड़द पर भेल सवार
हे ईश अहाँ छी जन-एकता साकार
घर-घर भीख माँगि जीबै छलहुँ पहिने
होइतहि चेतनावन्त समर्थ
पाबि गेलहुँ नगराज सुता सन सुदृढ़ शक्ति
जे, पशुबल प्रतीक मृगराज सदृश
परशोणितपायीओकें केलक वशीभूत
तोड़ि देलक मानवशत्राु विषधरो केर दाँत
से भ’ गेल तनय अहींक सेनापति ओ गणनायक
छी अहाँ सदाशिव, विश्वम्भर
भ’ क्रुद्ध बनै छी प्रलयंकर
सुन्दर नवयुग निर्माण हेतु
करै छी जगकेॅं क्षार-खार
पीबि सुरा
अप्सरा संग नन्दन वनमे विहरथु महेन्द्र
रमथु रमा संगमे उपेन्द्र
धरा परक सर्वोच्च हिम-निर्मल अवदात स्थान
पर करैत पिनाक टंकार, अहीं छी बास करैत
कल्पनातीत अछि अहाँक सामथ्र्य
लक्ष्मीकान्तक विष प्रयोग भ’ गेलनि व्यर्थ
छी अहाँ निर्भीक, करै अछि सत्य सतत निवास
अहाँ केर कण्ठमे
सत्यसँ भयभीत दुष्ट कहै अछि नीलकण्ठ
कहौ! ताहिसँ की
दैत छी जगकेॅं अहीं निज माथसँ
शशिकला सम रुचिर स्निग्ध प्रकाश
मन्दाकिनी केर विमल शीतल
सलिल धारा सदृश जीवनदान
हे नकुल! कुल मूलक अहंकारकेॅं तोड़निहार
छी अहाँ जन-एकता सकार

अर्जुन

शास्त्रा ज्ञान, सामथ्र्य
सहनशीलता, संयम
सत्यनिष्ठता अनुशासन केर प्रतिमान
भारतवर्षक गरिमामय इतिहासक चूड़ामणि!

हे अर्जुन!
देखि अहाँक चरित्रा-विचित्रा
विस्मित छी भ’ जाइत!
अक्षौहिणी अठारह सेनाक मध्य
क्यो नहि रहए अहाँक समान
शस्त्रा शक्ति कौशलमे।

कते परिश्रम करए पड़ल छल होएत
एहन निपुणता केर अर्जनमे?
अद्भुत लक्ष्यबेध क’ अर्जल
दु्रपद महाराजक कन्या सुकुमारी सुन्दरी
कें तुच्छवस्तु सन भैयारीमेे लेलहुँ बाँटि
माइक बात पर।

के अछि दोसर भेल अहाँक समान
मातृदेव वास्तविक अर्थमे?
सौन्दर्यक उपमान उर्वसी
इन्द्रक विलासमय महलक भीतर
मदन विह्नला एकसरि दुपहरि रजनीमे
डोला सकल नहि चित्त अहाँक!

पण्डित सबहक
अनुभाव विभाव संचारिभाव
कानि कलपि मरि गेल
अहाँक संयमी मनक निकटमे।
सुनितहि गोरक्षाक गोहारि
संकल्पक पालन लग्न अहाँक मन
बिसरि गेल सुधि संसारक
शस्त्रा मात्रा छल

कएने आक्रान्त
अहाँक ध्यानकें
तेॅं चलि गेलहुँ जेठ-युधिष्ठिर केर
शयन कक्षमे
भ’ गेल व्यवस्था केर उल्लंघन
तें स्वयं ग्रहण क’ लेलहुँ दण्ड
बारह वर्षक देशनिकाल।

अनुशासन केर एहन
परिपालन, नहि भेटि सकल अछि अनतए
मुदा कुरुक्षेत्रामे रूप अहाँक
छी पबैत
ज्ञान विवेकविहीन, यन्त्रा समान लड़ैत
भातिज भाइ, मामा बहिनोइ
गुरु पितामह
सबहक करैत खून
नरहत्या केर संख्यासँ
करैत अपन प्रतिष्ठा केर संस्थापन!

ठूठमूठ अपने पाँचो भाँइ
टा रहल छलहुँ बाँचल।
ने क्यो दूर्वाक्षत देनिहार
ने क्यो जय जयकार
करबैया रहि गेल!
पुत्राक मरणें व्याकुलमना सुभद्रा पांचाली
विधवा पुत्रावधू उत्तराक संग मिलि
कोन रागमे गओने होएती गीत
चुमौन कालमे?
जाहि कौशलंे पातालक जल
भीष्मक हेतु निकालल
यदि करितहुँ उपयोग तकर
शान्त मने, तँ की नहि भ’ जाइत
अइ देशक मरुभूमि
शस्यें हरिअर नयन मनोहर?
मानव हितकारी कोन कीर्ति क’ सकलहुँ
अहाँ अपन
अतुलनीय पराक्रम बलसँ?
अहाँक महत्वक परिचायक
अछि आइ
अन्धाधुन्ध नरहत्या केर
गाथा मात्रा किने?


कृष्ण

कहथु क्यो विद्वान अहाँकंे योगिराज
भगवान स्वयं गोलोक निबासी
मुदा हमर हृदय नहि अछि तैयार
तकरा मान’क लेल!

भैयारीमे हिस्सा-बखरा केर विवाद
सामान्य बात थिक। वरं तुच्छ बात थिक!
यदि दुय्र्योंधन नहि दैत रहथि
पाण्डवकें धनमे बखरा
तँ पंचैतीक प्रयत्नमे लगितहुँ!
कौरव पाण्डवक पक्षसँ भिन्न
निरपेक्ष दलक करितहुँ संघटना!
जकर दबाबंे, दुर्योधन
समझौताक बाट पर आनल जा सकितथि
अथवा पाण्डवगण तँ रहथि
अहाँ केर बात सुनैत,
हुनके सबकें हिस्सा छोड़ि देबाक
विचार दितहुँ।
जीवन यात्रा केर पथ पर बढ़बामे
पुरुषक लेल
सम्पत्ति बपौती नहि होइछ आवश्यक।
एक अर्जुन केर नजरि पर अपनहुँ अएलनि
युद्धक सत्यानाशी परिणाम दुखद
आ फेकि अपन गाण्डीव
कएल घोषणा नहि लड़बाक
तँ अहाँ हुनको अपन वाग्जालसँ बान्हि
सनका क’ चढ़ा देलहुँ युद्धक पथ पर।
बर्बर पशुक समान लड़ैत गेल।
कास-पटेरक बोन-जकाँ
मनुक्खक मस्तक कटैत गेल।

बेटा भातिज भाइ
काका मामा बाबा नाना
बहिनोइ सार
गुरु पितामह
कोनो प्रकारक सम्बन्धक बन्धन-स्नेह
नहि रहि सकल अवंच!
एहि युद्ध केर प्रेरक, प्रोत्साहक
संचालक बनि अहाँ
की नहि कएलहुँ मानवताक लहास पर
पशुताक स्थापना?
निर्जन प्रदेशमे बसिते अछि चिर शान्ति
तेंॅ शान्ति स्थापना केर बातो थिक असंगत!
काम वासना केर दमन करबा लेल
सकल पुरुषकें बधिया क’ देब
के मानत बुधियारी?
कोन बहुजन हितकारी दर्शनक
स्थापना कएल अहाँ पाण्डवक राजमे?
अट्ठारह अक्षौहिणी सेनामे
आठ गोट जन मात्रा बाँचल
एहन भयानक नरसंहारक संघटना
एक अहीं केर प्रेरणाक बस भेल रहए।
कलियुगहुमे आइ धरि एहन भेल नहि दोसर
अहाँकें निर्मम कहि के फोड़ाओत कपार?
मुदा तैं भगवानो मान’क लेल छी नहि हम तैयार।


तन्त्रानाथ झा

धनछूहा
1
आतप-कलान्त महिमण्डल समस्त
बाट सब तकैत कखन सूर्य होएता अस्त
डारि पर पातक छाया तर
बैसल अछि कार कौआ
बिसरि गेल बाजब जेना
किम्वा केओ कएलक एकरा मनाहि बजवासँ
ई की भीरु जीव किन्तु वारण माननिहार
ई अग्निकण्ठ
सम्प्रति भेल शुष्क-कण्ठ
मुँह टा बबैत अछि जेठक दुपहरयिामे।

2
लागल अगराही एहि निर्जन प्रान्तरमे
पड़ल जेना आहुति निदाघक यज्ञ-कुण्डमे,
धह-धह तरैत अछि
रौद मिलि जाइत अछि धधराक रंग
प्रत्युक्षहुमे धूमहि हो वह्निक अनुमान,
कतहु प्राणी मात्राक संचार नहि,
जेहो अछि जिबैत
सेहो जेना जिबैछ निष्प्राण भ’,
एक मात्रा उड़ै अछि अगराहीक कात-कात
भरि मुट्ठीक जन्तु ई,
कतेक उत्साह छै, कतेक उल्लास छै,
रंग एकर छै एकबरना कारी-सियाह।

3
अगराहीक कात-कात उडै़ अछि, नचै अछि
अगराहीक ऊपर उड़ि-उड़ि जाइत अछि
अजमाबए नापए जेना
दूरीक अनुपातमे अगराहीक तापक मान
कखनहु लपकै अछि, झपटै अछि
धधरा पर वेगसँ,
धधराकें छूबि क’ पड़ाए जेना
करैत कर्णभेदी उत्क्रोश

4
विश्वमे ख्यात ई धनछूहाक नामसँ
जतए अगराही ततहि ई विराजमान
जतए अगराही ततहि जेना एकरा
महाभोज्य सम्प्राप्त
उड़ि-उड़ि नाचि-नाचि बुझाबए लोककें
एहन दुर्घट समयमे, एहना क्लेशक स्थानमे
रहइछ ई अपना स्वाभाविक उल्लासमे।

5
ओमहर जुनि जाउ अहाँ,
यदि हो आवश्यक,
जाएब सावधान भ’,
तौनीसँ माथ धरि झाँपि लेब
नहि तँ बेरेक
नहिओ किछु कहबै, नहिओ किछु करबै
उजरहिसँ टीक धरि नोचि लेत।

नूतन वत्सर (साॅनेट)
भूत-सिन्धु-जल-बिच भासल चल जाए
वत्सर, काल-तरंग तरंगित भेल।
द्रुतगामी रथचक्र फेर घुरि गेल
नीरव आयुक पथ पर बिनसल हाए!
हृदय-पिवन-बिच आशक लता सुखाए
कत शत, हृदय मरुस्थल अछि भ’ गेल।
जे अछि बीज अतीतहिं निष्फल भेल
क’ कोन साहस रोपब तकरहि जाए?
बढ़ल समय, डूबल जीवन रवि क्षीण
सत्वर तिमिरहिं, होएत रजनि सम्प्राप्त
नहि पवनक संचार, दशोदिश व्याप्त
नीरवता, कुन्तल तारक मणिहीन
जकर द्वार चिररुद्ध करत नहि मुक्त
अरुण रमणि रवि अनुचार उषा अशक्त


काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’

घसल अठन्नी

जेठक दुपहरि
बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला
आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि
पछबा प्रचण्ड
बिरड़ो उदण्ड
सन सन सन सन
छन छन छन छन
आगिक कण सन
सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल।
खोंतामे पक्षी संच मंच
हिलबए न पाँखि
खोलए न आँखि
तरुतर पशु हाँफै सजल नयन
चरबाह भागि घर गेल विमन
इनहोर बनल पोखरीक पानि
जलचर-थलचर काँपए थर थर
टाटी, फड़की, खिड़की, केवाड़ लागल घर-घर
ई अग्निवृष्टि!
नहि कतउ बाटमे बटोहीक हो एखन दृष्टि
संहार करत की प्रकृति सृष्टि-
ई अग्निवृष्टि!
श्री मान लोकनि
जे तुन्दिल बनि
मसलंगमे ओंगठल
शरबत छनि-मिसरी बदाम बरफें घोरल
नर्तित बिजुली पंखा तर छथि
सेहो अशान्त बाजथि हरि! हरि!!
की कथा सजीवक
छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि
जेठक दुपहरि!

ई समय यदपि
बुचनी घर आँगन छोड़ि तदपि
गिरहस्थक कोड़ए खेत एखन
की करति बेचारी!
आठ पहर दुर्दैवक डाँगें अछि पीटलि
विधवा परिवारहीन बिलटलि
छौ मासक एके टा बच्चा
भाविक सम्बल
जे कानि रहल छै धूर उपर
परिबोध कोना क’ करति तकर?
शोणितोक आब नहि छैक शेष
पुनि दूधक हएत कोना सम्भव?
सहि तीनि सांँझ ई आइ आएल
बनि मजदुरनी अठ अन्नी पर
सूर्योदयसँ सूर्यास्त तक्क
करतैक काज
नहि पनिपिआइयो पाबि सकति!

सन्ध्याक समय
संसार अभय
उगि चान सदय
शीतल ज्योत्सनासँ कएल मुदित ब्रह्माण्ड सकल
नेरूक हित दौड़लि हुँकरि गाय
टुन-टुन-टुन-टुन
टन-टन-टन-टन
घण्टीक शब्द
घर-घरसँ बाहर भेल धूम
तैयो भूखलि-प्यासलि बुचनी
आँचल तर झपने पुत्रा अपन
कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन
हड्डी जागल
सौन्दर्य गरीबीसँ दागल
भूखक ज्वालासँ जरक डरें
तारुण्य जकर अबितहिं भागल
पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल
पीयर ओ दूबर-पातर तन
फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर
आमक फाड़ा सन नयन
खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर
चिन्ता-चुड़ैल केर चढ़ल कोर
झरकाइ रहल छै आंग जकर
प्रतिपल हा! आशा बनि अंगोर
दे कने अन्न-जल प्राण जकर
अछि बाजि रहल छलसँ नोरक,
से बनि कातरि
कहुना क’ डरि
कर जोरि कहल:
ओ घसल अठन्नी चलि न सकल
हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि
छी आबि रहलि
करु कृपा अठन्नी द’ दोसर
एसकरुआ हम
भ’ गेल राति
गिरहत, न आब देरी लगाउ
भूखें-प्यासें हम छी मरैत
लेबै बेसाह
कूटब-पीसब
बच्चा भोरेसँ कानि-कानि
छट-पट करैत अछि जान लैत।

ई फेर आएल भुकब’ कपार
कहुँ असल अठन्नी अदलि-बदलि
क’ रहलि चलाकी साफ-साफ
रौ! ठोंठ पकड़ि क’ कर न कात
ई डाइनि अछि
देखही न आँखि
अछि गुड़रि रहलि
अबिताहिं बुधना सन स्वामीकें
चट चिबा गेलि
लक्ष्मीक बेरिमे महाजनी
अछि चुका रहल
क्यो अछि नहि ?
एहन अलच्छीकें क’ देत कात ?

मालिक!
हम कर्ज न छी मँगैत
अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु
उपजले बोनि टा देल जाए
हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत
कै बेरि एलउँ
टुटि गेल टाँग
अन्नक मारल अछि हमर आँग
जरलहा दैव मरनो न दैछ
की समय भेल
हा! देह तोड़ि क’ कएल काज
सुपथो न बोनि अछि भेटि रहल
तें जगमे ई पड़लै अकाल
उठबितहिं डेग लागए अन्हार
मरि जाएब एतइ
ककरा कहबै?
हित क्यो ने हमर
अनुचितो पैघ जनकें शोभा
भगवान! आह!

गै छौक न डर?
कै खून पचैलनि ई बण्डा
रोइयों न भंग
युग-युग दारोगाजी जीबथु
क’ देबौ खून
गै भाग भाग
बनिहारकें द’ क’ उचित बोनि
कुलमे लगाएब की हमहिं दाग?
ई अपन भभटपन आनक लग
तों देखा
थिकहुँ हम काल नाग
ई ओना जाएत?
यम माथ उपर छै नाचि रहल
रौ, की तकैत छें मूँह हमर
छोटका लोकौक एते ठेसी?

चट-चट-चट-चट
कुलिशहँुसँ कर्कश भीमकाय
मखनाक चाटसँ निस्सहाय
भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत
भ’ गेलि बेहोश
तैयो सरोष
क’ बज्रनाद
भुटकुनबाबू उठलाह गरजि:
मखना! मखना!
केलकौक भगल
ला बेंत हमर
नारिक चरित्रा तों की बुझबें?
जीवने बितौलहुँ ऐ सबमे।
दन-दन-दन-दन
मूचर््िछतो देह पर बेंत वृष्टि
बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन
शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि!
सविषाद हासमे चन्द्रमाक
ओ घसल अठन्नी बाजि उठल:
हम कत’ जाउ
अवलम्ब पाउ
के शरण?
घसल जनिकर अदृष्टि!

सुरेन्द्र झा ‘सुमन’

दायित्व

भरि दी स्वर अहाँ, हम तँ मात्रा व्यंजना।
आवृत्ति टा हमर, अहँक कला रंजना।।
चरण हमर, गति अहाँक
सहज शब्द, उक्ति बाँक
कविताक तान, अहँक छन्द-बन्धना।।
भुजा हमर, शक्ति तोहर
कर्म एम्हर, भक्ति ओम्हर
प्रतिमाक प्राण देत अहँक वन्दना।।
तरुक उगब मात्रा कर्म
फड़ब फुलब अहँक मर्म
वन-उपवन मधु जगाएब ऋतुक योजना।।
भूतलकें तपब ताप
हृदय-रसक बनब भाफ
उमड़ि-घुमड़ि बरिसब, ई घनक घोषणा।।

नारी-वर्णना
नयन
नयन-बंकिमा!
जनु मदन मीन बझबैछ बंशी घुमा!
स्मित
अधर पर हँसी!
दिन-दिखारे क्षितिज पर उगथि जनु शशि!
हृदय-हार
हृदय-हार ई!
गिरि-शिखरसँ चलल अछि विमल धार की?
कान्ची
डरकसक व्यंजना!
शून्यता अंकसँ हो जेना दस-गुना!
नूपुर
पैर नूपुर बजए!
की अधोमुख कदलि पर विहग-दल कुजए!

देश
देश हमर अछि भारतवर्ष, सभसँ बढ़ल चढ़ल उत्कर्ष
जनिक माथ पर उज्जर केश, बनल हिमालय निर्मल वेश
हिलि-मिलि गंगा-यमुना नीर, उमड़ल जहिना मन आवेश
वृद्ध पितामह भारतवर्ष, जनिक कोर चढ़ि पाबी हर्ष।।

कुरुक्षेत्रा केर कथा सुनाय, आखर रामायणक बुझाय
बोधथि गुन-गुन गीता गाबि, कानि उठी हम जखन चेहाय
नानी वृद्धा भारतवर्ष, कथा सुनाबथु लाखो वर्ष।।

स्वदेश

तिरहुति हमरा सभक स्वदेश, जनम लेल हम जनिक उदेस
उठी न कखनहुँ प्यासें कानि, कूप-कूप भरि राखथि पानि
हमरा ले’ जोगबै छथि अन्न, बाध-बोन आँचरमे बान्हि
माइ हमर छथि तिरहुति देश, जकर कोर सपनहुँ न कलेस।।

जकर माटि माखनसँ मीठ, जकर पानि लग दूधो ढीठ
मलय वायुसँ सरस बसात, पुष्ठ भेल छी जनिकहि दीठ
सीखल भाषा, सीटल वेश, जतए हमर से जयतु स्वेदश।।



वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’


एहि घर पर बैसल रहए गिद्ध

एहि घरमे लगा दियौ आगि
अपने हाथें धरा दियौ एहिमे
दियासलाइक काठी
सुड्डाह होब’ दियौ एकरा
व्यर्थ जुनि मोह राखी चारक
व्यर्थ जुनि मोह राखी
खाम्ह, खाम्ही, बरेड़ी धरैनक
ढाहि दियौ अपने हाथें एहि घरक भीत
नाम-निशान हटाउ एकर
काल्हि-परसू आ चारिम दिन
एहि चारक मुड़ेर पर गिद्ध बैसल छल
एकटा नहि
दू टा नहि
पूरा पाँती छलै ओकर
जँ कुशल चाही अपन
जँ कुशल चाही परिवारक
जँ कुशल चाही गामक औ’ परोपट्टाक
अपने हाथें लगाउ एहि घरमे आगि
ई घर अपवित्रा भ’ गेल
एकर चारू चारक छाहरि
भ’ गेल अलच्छ
अमांगलिक भ’ गेल
एहि घर पर गोड़ चारियेक गिद्ध बैसल रहए
ने जानि ओ सभ
कोन-कोन जीव-जन्तुक सड़ल ओ विकृत माँसु
कएने छल भक्षण ओहि दिन
ने जानि कोम्हरसँ आएल छल
उड़ि गेल कोन दिस, ने जानि

मुदा बड़ी काल धरि
बैसल रहए अहाँक घर पर चारि टा गिद्ध
अपनो तँ देखनहि होएबै
तँ आब जुनि करी बिलम्ब
अपने हाथें धरा दियौ एहि घरमे
दियासलाइक काठी

ओ तँ थिकाह दधीचिक हाड़
महात्मा गान्धी
राष्ट्रपिता हमरा लोकनिक
छथि बड्ड पैघ....
देखू हुनका चैरंगीक कातमे ठाढ़
मास थिकै अखाढ़
भीजै छथि बर्खा-बुन्नीमे बापू!
गलतै त नहिएँ
प्रतिमा थिकै धातुक
मुदा तें की?
लागत नहि अनसोहाँत ई दृश्य
कने दूर हटि क’ अही मैदानमे
चमकै’ए दुग्ध धवल विक्टोरिया टेम्पुल
आउ, एम्हर आउ!
दर्शन करू राजराजेश्वरीक...
चित्त हएत निर्मल!
प्रपितामहि एलिजाबेथक...
करथु कल्याण हमरा लोकनिक
ई कथी ल’ भिजती बर्खा-बुन्नीमे कहिओ!
हिनका किऐ लगतैन बैशाखक रौद
हिनका किऐ लगतैन पूसक पाला
आउ, भीतर आउ
दर्शन करू हिनकर
बिसरि जाउ भिजै छथि गान्धी...
ओ त थिकाह दधीचिक हाड़
रहथु मने ठाढ़
मैदानक कतबहिमे खुल्लम-खुल्ला!


आजुक महाकारुणिक बुद्ध
आजुक महाकारुणिक बुद्ध
छपबै छथि अपन वक्तव्य
अमेरिका-इंग्लैण्ड-फ्रांस-जापानमे
ने जानि, कत’ कत’सँ अबै छनि भक्त-अनुरक्त
जाइ छनि चढ़ा नानाविध नैवेद्य!
आजुक महाकारुणिक बुद्ध
पहिरि लै छथि कौखन कौखन
सए टाकावला जोड़ा चढ़ौवा चप्पल
ओढ़ि लै छथि कौखन कौखन
हजार टाकावाला जोड़ा पश्मीना चद्दरि
पाबि लै छथि कौखन कौखन
आस्ट्रेलियाक सेब, इजराइलक अंगूर
आजुक महाकारुणिक बुद्ध
रहै छथि सदक्षण अपस्याँत
कुबेर लोकनिक हृदयकें द्रवित करबा हेतु
औनाएल घुरै छथि दिवारात्रि
कलकत्ता-बम्बई-मद्रास-कलकत्ता
आजुक महाकारुणिक बुद्ध
ने जानि, कहिआ धरि पूर्ण हेतैन हिनक भिक्षापात्रा!
साठिसँ बेशिए भ’ गेलैन वयःक्रम
आहि रओ बा!... कत’ विश्वक कोन दोगमे
नुकाइलि छथि आजुक विशाखा मृगारमाता!
अपार वैभवक अधिस्वामिनी--
सहज द्रवणशीला, परम अनुरक्ता...
भेटथिन कहिआ धरि हिनका सेठाणी विशाखा?
के कहओ, कहिआ, सिद्धिक प्रतापें
अमावस्याक निबिड़ निशीथ मध्य
आप्लावित क’ देथिन
निरंजना नदीक बलुआही पाट
आजुक महाकारुणिक बुद्ध!
भिक्षाटन? भिक्षाटन त’ हिनक महालीलाक
मामूली अभिनय थिक शतांश मात्रा!

आजुक महाकारुणिक बुद्ध
केलिफोर्नियाक देहातमे
खेने रहथि खीर गौरांगी सुजातक हाथें
बुद्धत्व-प्राप्तिसँ एक राति पूर्व!
तत्पश्चात केने रहथि युगधर्म-चक्र-प्रवर्तन!
सौंसे सृष्टिमे लागल पहुँचाब’
हिनक प्रवचनक एक एक आखरकें
भारत भूमिक दोरस बसात...
जूम’ लगलथिन नहँू-नहूँ
सारिपुत्रा, मौद्गल्यायन, महाकाश्यप...
छलथिन आएल शरणमे हिनको
नगरवधु आम्रपाली...
अपन परित्यक्ता यशोधरा पर
भेल छलनि अंकुरित हिनको हृदयमे
अपरिसीम करुणा...

साइन्सक पचफोड़नासँ छौंकल छनि
आजुक बुद्धक विवेक ओ संयम
शोधित छनि मैत्राी भावना हिनक
अर्थशास्त्रा-राजनीति आदिक पुटपाकसँ ...
वियतनाम दिश केने पीठ,
ताकै छथि तिब्बत दिश
आजुक महाकारुणिक बुद्ध!



ओ ना मा सी धं!
ओ ना मा सी धं!
आहि रे बा, आहि रे बा,
ख्रुश्चेव खसला, चितंग!
क्रान्तिमे थूरल गेला शान्तिक दूत
लोककें लगलै अजगूत
उतारि क’ फेकि देल गेलनि फोटो
अपनो तँ एहिना
रहथिन कएने स्तालिन केर कपाल-क्रिया
सुनने रही कतहु की मुर्दाक ओहन दुर्गति?
आहि रे कप्पार!
दशो प्रतिशत क्षमा नहि पूर्वजक लेल
ऊपर अन्तरिक्षमे चलैत रहौ उड़ानक खेल
क्रेमलिनक मुदा कीदन भ’ गेल
कैक टा खु्रश्चेव ढहनेता मने उसिनल बेल
भारतीय थिकहुँ, सभकें तिल-जल देल...
‘येनास्ता पितरो जाताः, येन जाताः पितामहाः’
सएह गति होउन हिनको
ओं शान्तिः शान्तिः शान्ति !!



पत्राहीन नग्न गाछ
पत्राहीन नग्न गाछ
लगै’ए कारी बस कारी, ठूठाकृति
अन्हार गुज्ज रातिमे
स्पन्दनहीन, रूक्ष, तक्षक शिशिर
पसरल अछि सबतरि ऊपर-ऊपर
नीचाँ किन्तु, तरबा तर दूबिक मोलाएम नवांकुर
बाँटि रहल रोमांचक टटका प्रसाद सौंसे शरीरकें
मोन होइ’ए, गाबी अन्हरिओमे वसन्तक आगमनी
आउ हे ऋतुराज,
नुकाएल छी कालक कोखिमे अनेरे!
दिऔ निश्छल आशीर्वाद
तकै’ए अहींक बाट घासक पेंपी
आउ हे ऋतुराज!


अखाढ़
उठल’ए बेश बिहाड़ि
ताहि पर झपलक मेघ आकाश
साधि लेलक दम पुरबा-पछबा
सृष्टि-भेल निस्तब्ध
गड़गड़ गड़गड़ गुड़म गुड़ुुम गुम...
गरजल इन्द्रक हाथी
छाड़ि नचारी गाबए लगला गिरहथ लोकनि मलार
प्रमुदित दूबिक सीर-सीर
अछि पुलकित कूशक पेंपी
बगए बदलि गेलैक माटि केर
पानि भेल मटमैल
एकार्णवा करह पृथिवीकें
आब’ हे अखाढ!
आब’ हे अखाढ़!

बीच सड़क पर
बीच सड़क पर
हरिअर-हरिअर घास
तै पर ससरए ट्राम
मने आरि पर डोका
भदबारिक ई भीजल-भीजल
चिक्कन-चाकन सनगर बालीगंज
मध्य वक्ष पर ट्राम-लाइन केर जनौ पहिरने

जगतारनि!
बाँसक
ओधि
उपाड़ि
करै छी जारनि...
हमर
दीन
नहि
घूरत की जगतारिन?

पसेनाक गुण-धर्म
क्षार-अम्ल
विगलनकारी, दाहक
रेचक, उर्वरक...
रिक्शाबलाक पीठ दिशुका फाटल तार-तार बनियाइन
पसेनाक अधिकांश गुण-धर्मकें
क’ रहल अछि प्रमाणित
मोन होइए हमरा
विज्ञानक कोनो छात्रासँ जा क’ पुछिअनि--
बेशी सँ बेशी की सभ होइ छै
पसेनाक गुण-धर्म?
रिक्शाबलाक पीठक चाम
आओर कते शुष्क-श्याम हेतै?
स्नायु-तंतुक ऊर्जा आओर कते बरकतै?
एहि नरवाहनक प्राणशक्ति आओर कते सिद्ध हेतै?
आओर कते...
क्षार-अम्ल, दाहक विगलनकारी...

बाँसक छाहरि
केहेन बिखाह होइत अछि
बाँसक छाहरि
केहेन झरकाह होइत अछि
बाँसक छाहरि
एकोटा घास किऐ जनमत
बँसबिट्टीक छायातर
कोनो टा अंकुर--
कथू टा बीजक उद्भिद्
किम्बा गुल्मग्रन्थिक पेंपी
कहिओ किऐ देखबामे आओत
बँसबिट्टीक छाया तर...
केहेन दूरदर्शी रहथि हमर पितामह
बुद्धि छलनि कते मेंही
आरिसँ सटा क’ कैक ठाम
लगा गेल छथिन बँसबिट्टी
ने जानि ककर खेत काते काते
कनै छै हकन्न, सुनै छै गारि-फज्झति!

ताड़क गाछ
विकट पाँतर माँझ
एसगरे अछि ठाढ़ ताड़क गाछ
स्वयं सौंसे तर्जनी बनि,
विधाताकें रहल अछि ललकारि
नहि उपस्थित करै छनि ककरो बंगौर लगाए
सब फूसि ओकरा हेतु!

जेठक रौद!
झमाझम बरसैत मूसलधार;
माघक ठार;
चैतक तस;
सब फूसि ओकरा हेतु!

लगाबथु ग’ केओ कतेको जोर
बाप पित्तीकें करथु ग’ सोर
मुदा रोइयाँ एको टा ओकर
उपाड़ल नहि हेतनि ककरो बुतें!


देशदशाष्टक
पलरि गेल छनि नेतालोकनिक सूढ़
भ’ गेलाह जमाहिर धुत्थुर बूढ़
प्रभु पटेल छथि सर्वशक्ति-सम्पन्न
कनबथि तइओ चीनीक लेल हकन्न

बनिआँ-लीडर-अफसर तीन त्रिमूर्ति
क’ रहला अछि अपन मनोरथ-पूर्ति
अपना लए सभ, अनका हेतु बंगौर
तै पर फाटनि रहि रहि कते बुकौर

बापुक भजन करै छथि साँझ परात
टकुरी काटथि बैसल सड़कक कात
जपथि सदक्षण अष्टोतर--शत नाम
ईश्वर अल्ला रघुपति राघव राम

भाइ-भातिजक साढ़ूक सारक लेल
अपनहि चढ़ि क’, तोड़थि झोंझका बेल
धन्न भाग जे चानि नइं छनि उघाड़
नहि तँ कोना पचबितथि सौंस पहाड़

श्री श्रीकृष्ण अनुग्रह होथु सहाय
जनिक गुणक कीर्तन नहि कएना जाए
हे जनकवि हठ अपन पुरनका छाड़ि
आबहुँ जाउ बनू ग’ बिसुन-बिलाड़ि

अपनहि हाथें देता पान मखान
पाएब थुल थुल देहक तौलल दान
सत्त ने कौखन बाजी बजबी झालि
भेटत सोनक गुल्ली चानिक टालि

छनि तिनरंगा घोघ, ताड़ सन देह
रुच्छ अलच्छा पैर, कतहु नहि नेह
महगिक बड़का खरड़ा नेने ठाढ़ि
की होएत स्वाधीन एहिसँ बाढ़ि

धन्न रहू हे भारतमाता, धन्न!
महगिक मारल लोक कनैछ हकन्न!
ढाकिक ढाकी पास होए प्रस्ताव
तइओ बढ़ले जाइछ सबथुक भाव
देशदशाष्टक जे पढ़थि मन लगाए नित प्रात
ओ पाबथि पार्सल सदए, जगर्नाथजिक भात

परम सत्य
फूसि थिक संसार
फूसि धरती, फूसि थिक आकाश
फूसि थिक ई माटि
फूसि थिक ई पानि
हम, अहाँ ओ, ई भने क्यौ होथु--
व्यक्ति मात्रा थिकाह अगबे फूसि
सत्य की तँ शून्य
सत्य की तँ ब्रह्म,
सत्य की तँ घनानन्द, अखण्ड, चित्, कूटस्थ,
--सैन्धवलवणसम नीरन्ध्र
सत्य की तँ जे ने देखल जाए
सत्य की तँ जकर गुण वर्णन ने कएना जाए...
बाप-पित्ती पितामह-मातामहक मुहसँ सुनल ई बात
जीवनक संग्राममे यदि आबि जैतए काज
तखन की छल!
तखन सरिपहुँ
हमहँु बजितहुँ--
फूसि थिक संसार
फूसि धरती, फूसि थिक आकाश

जुनि पूछी, आइ-काल्हुक हाल
नहि अबै छथि काज कोनो ब्रह्म
नहि अबैत अछि काज ई कुल गोत्रा
शिखा-सूत्रा त्रिपुण्ड चानन-ठोप
अबैत अछि किछु काज नहि ई पुरनका आटोप
फूसि सभटा थीक
फूसि महाजंजाल
फूसि ब्रह्म-विष्णु दशदिक्पाल
फूसि श्रुति-स्मृति
फूसि शास्त्रा-पुराण
फूसि व्रत-उपवास
फूसि थिक राजा सभक इतिहास
सत्य की, तँ--
सत्य थिक ई माटि
सत्य थिक ई पानि
सत्य थिक संसार
सत्य धरती, सत्य थिक आकाश
हम, अहाँ ओ, ई, थिकहुँ सब गोटे बड़का सत्य
सत्य जीवन, सत्य थिक संघर्ष
सत्य आशा, सत्य थिक आयास
सत्य थिक निर्माण चेष्टा, सत्य थिक आवास
सत्य थिक ई देह
सत्य थिक ई बुद्धि,
सत्य थिक ई धैर्य आओर विवेक
सत्य थिक ई मनोबल अ-विजेय
सत्य थिक ई बाँहि
सत्य थिक ई हाथ--
जे एकरे प्रतापें कमा लै छी चारि कैंचा नित्त
नहि अबै छथि काज हमरा चारि हाथबला ओ भगवान
नहि अबैत अछि काज वेद-पुरान
छाड़ि अप्पन काज
अनेरे हम किऐ हएब हरान?
नहि कुकर्म करै छी जे ‘नरक’ जाएब ‘यम’ पकड़ता कान
करा लैत अछि काज राच्छस जखन दश टाकाक
तखन दैत अछि दुइ टाका, ओह!
पच्छ ओकरे लै छथिन भगवान
पैघ लोकक--धनिकहा सबहिक
हाथमे छनि राम-कृष्णक टीक
जे बजैत अछि फूसि तकरा डरें थर थर कँपै छथि हलुमान
घूस रोटक पाबि दुष्टक पीठ ठोकथि काल भैरब-सन
बिकट बलवान
सत्त थिक मनुक्ख
सत्त थिक समाँग
धीया-पुता स्वजन-परिजन खेत ओ खरिहान
मकइ मड़ुआ साम-कौन आँसु-गम्हड़ी धान
माछ-मधु फल-मूल पान-मखान
एहिसँ की बाढ़ि होएत सत्य?
जाहि भाखामे बजै छी, सत्त थिक से बोल
आन बाणी थीक दूरक ढोल
सत्य ई जे बाप-माइक बीचसँ धीया-पुता
ताहिसँ पुनि पौत्रा-पौत्राी नाति-नतिनी आदि
बंशवृक्ष वितान
नित्य नूतन बस्तु सबहिक सदक्षण सन्धान
स्थिति-स्थापकताक पूर्ति संघर्ष
फेर परिवर्तन
पुनः निर्माण
स्थितिक स्थापन फेर
तखन पुनि गति-रोध
तखन पुनि संघर्ष...
एहि क्रमसँ निरन्तर परिवर्तमान प्रगतिशील समाज
जहिना, जुआएल बँसबिट्टीक दमगर ओधिमे सँ
फेर कोपड़
फेर पोरगर बाँस
फेर बाँसक झमटगरहा झोंझ...
सत्य ई क्षय वृद्धिकेर व्यवहार
सत्य ई संसार
चिंतनाक प्रवाहमे भसिआए
पुरखा लोकनि प्रायः
खसि पड़ल छलाह
जाहि सीमाहीन सागर-माँझ
(‘नेति-नेति’क बिकट मोनिक मध्य)
खसू ग’ की तहीमे हमरो लोकनि?
आधिभौतिक उपद्रवसँ खिन्न,
प्रकृति केर रहस्यसँ सन्त्रास्त,
आदि मानव देखि लेलनि भीड़ जँ दिवड़ाक
आ’ कि पीपर-पाकड़िक वा आम-जामुक गाछ
स्तुति कर’ लगलाह तैखन, तकर पट द’,
ऋचा निर्मित भेल
मानि लेलहुँ,
ताहि युगमे सएह छल हो सत्य
किन्तु तैं की आइ
दिवाड़क ओ भीड़
पीपर-पाकड़िक ओ गाछ
हमरा लोकनिक कोनो वेगर्ता
करत कौखन शान्त?
वा वरदान कोनो देत?
पिठारक घोड़कलस, दूधक पार--
व्यर्थ थिक, बेकार!
आइ काल्हुक मनुक्खक क्षमताक आगाँ
मानि लेलनि देवता-गण हारि
आब एटम बमक आगाँ भ’ गेलनि अछि
भोथ चामुण्डाक ओ तरुआरि
ताहि दिन छल एक पुष्पक
आइ नभमे विविध वर्ग विमान लाखक लाख
उड़ि रहल अछि शानसँ दिन राति
तरहत्थीक अओरा जकाँ सम्पूर्ण ई संसार
आब सबहक नजरि पर अछि साफ
आइ नहि तँ, काल्हि हिमगिरि मानताह हारि
महोदय स्वाधीन ओ सम्बुद्ध--
सर्व साधारण मनुक्खक लेल
की रहत अज्ञेय
के रहत अ-विजेय

धन्य हे श्रमशील मानव -- विश्व भरिमे व्याप्त
धन्य तोहर जाति!
नरककें सुरपुर बनएबा लेल
सदच्छन तों रहै छह अपस्याँत
एक दिशसँ तोड़ि रहलह राक्षसक तों दाँत
सम्मिलित स्वेच्छा प्रणोदित जयति जन जनशक्ति!
हृदयमे अछि एक केवल तोहरे टा भक्ति
आन देवी-देवता दिश नहि नवै अछि माथ
आइ नहि तँ काल्हि दानव दलक करबह अबस्से उच्छेद
कृषक श्रमिकक जीवनोकें बनबिहह पुनिवेद
लैत प्राचीनक सगुण सद्ज्ञान
लोक हितमे लगबिहह अपना युगक विज्ञान
क्यो ने रहतै अकिंचन, सभ हएत लक्ष्मीबान
सबहि कर्मठ सबहि भोगी हएत सभ विद्वान
एहि धरतीक ओहि स्वर्गक दिव्य सुख जँ हम कदाचित्
भोगि नहि पौलहुँ तखन भोगत हमर सन्तान
आइए हम मुक्त कण्ठें करै छी जनताक तैं जय-गान

जयति जनता-जनार्दन भगवान
कविक बाणी करओ दीपित आलसीहुक हृदयमे अभिमान
विजयिनी जनवाहिनी-संगसँ मिलितमे करओ ओहो--
ओहिना अभियान
सत्य थिक संसार
सत्य थिक मानवसमाजक क्रमिक उन्नति--
क्रमिक बुद्धि-बिकास
सत्य थिक संघर्षरत जनताक ई इतिहास
सत्य धरती, सत्य थिक आकाश
परम सत्य मनुक्ख अपनहि थीक

सिंहवाहिनी दशभुजा चण्डी

सिंहवाहिनी दशभुजा चण्डी
शत-सहस्त्रा शरीरधारिणी
कोना रहती सन्न्द्ध?
रक्षा कोना करती सीमान्त-रेखाक?
क्षीरसागर मध्य बारहो मास बर्खक बर्ख
अहिना यदि सुतले रहि गेलाह विष्णु!
अहिना यदि रहलाह बैसल
नाभिपर् िंसम्भूत अपरोजक विधाता!
अहिना यदि रहि गेली लक्ष्मी बाँझक बाँझे!
अहिना यदि स्वर्णमृगक पाछाँ--
रहलाह अपस्याँत पृथ्वी
अहिना यदि कनैत रहली हकन्न!



आरसी प्रसाद सिंह

बाजि रहल अछि डंका

बाजि रहल अछि डंका, रहि-रहि गरजि रहल अछि तोप
समर देवता आइ स्वदेशक कएलनि अछि रण-कोप
बरजोरी लादल अछि भारत-शिर पर ई संग्राम
बलधकेल कएलक अछि दुश्मन जगमे अछि बदनाम
सीमा पार बढ़ल अछि देशक निर्भय वीर जुआन
विजय हमर निश्चित अछि रणमे, पछड़त पकिस्तान
देशक जे अविभाज्य अंग से देशक प्राण-शरीर
छीनि सकै’ अछि के भारतसँ केसरिया कश्मीर?
औ देशक रणवीर सन्तरी करू अमर अभियान
शत्राु-सर्प-मुँह चूरि करू भारत-स्वदेश-जयगान
ई अवसर नहि फेर भेटत, नहि फेर भेटत ई मान,
भारत-जननी माँगि रहल छथि आइ हमर बलिदान
उठू-उठू हे भारत प्रहरी जागू भारत-भक्त
नहि स्वतन्त्राता क्यो पबैत अछि बिना चढ़ौने रक्त


ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपर्’िं

तखन कोन सोना केर मोल

सोना-बेटा कटए युद्धमे
तखन कोन सोना केर मोल?
रे ‘प्रताप’ जूझए ‘हल्दी’मे
भामाशाह! खजाना खोल
आइ विश्व भरि केर स्वतन्त्राता
माँगि रहल हमरेसँ मोल
दही लेपि क’ माँस चटा दे
उठ दधीचि, निज हड्डी तौल!
कंचनजंघा डगमग-डगमग
मानसरोवरमे तूफान
‘जय जय भैरवि असुर भयाउनि’
अधर-अधर पर गंूजए गान
हमरे गतिमे विश्वक गति छै
ताकि रहल अणु-हत भूगोल
सोना-बेटा कटए युद्धमे
तखन कोन सोना केर मोल?

कवि-कोकिलसँ भेंट
देखल क्षितिजक अरुण कोर पर
सुरभित पर्किं पर्ािंसन पर
कवि-कोकिल बैसल छलाह जे!
गूंजल हुनकर मधु-प्लावित स्वर।
नयन-कोर छल नोरें छल-छल
चन्ना-सन ललाट छल झलमल
कएल प्रणाम भक्तिमे भरि क’
अन्तरमे छल मधुमय हलचल।
प्राण-वीणकें झंकृत करइत
हमरा मस्तक पर कर धरइत
कहलनि कवि-गुरु आर्द्र कण्ठसँ
दबकल मनमे जीवन भरइत।
तोहर शिवसिंह लागनि धेने
आगू बड़दक जोड़ी नेने
लखिमा कानथि अन्न बिना रे
चोटकल शिशुकें कोरा नेेने।
तोहर राधा जारनि तोड़थि
कृष्ण पसर उठि महिष चराबथि
नन्दक घर छनि गाय तीन टा
एक बुन्न घोरो नहि पाबथि।
गोपी दूध बेचथि अनका लै
घर घूरथि फूटल कनखा लै
नोर पिबथि प्यासल विद्यापति
उगना गेलइ पूब कमाइ लै।
गाबह वत्स, प्रलय केर ओ स्वर
जै सँ धरती काँपय थरथर
डिमडिम डमरू उगना बजबए
झंझा गरजए हड़हड़-गड़गड़।
हम बजौल बस अपन मुक्ति लै
तों बजबह जन-जनक मुक्ति लै
बहथि क्रान्ति केर गंगा घर-घर
शुचि समता केर दिव्य सूक्ति लै।
टूटल स्वप्न प्रभात हँसै छल
कौसरमे जलजात खेलै छल
बलिदानीक रक्तसँ रंजित
मधुरी शत-शत आइ फुलै छल।


गोविन्द झा

युग-पुरुष
कत’ उघने जाइ छह हे युग-पुरुष ई
पर्वताकृति माथ?
अरे कोन पदार्थसँ छहु गर्भिणी ई मगज-पेटी?
बहै छहु अविराम एहिमे पर्मिं काष्ठक ह’र
तीक्ष्ण बुद्धिक फार, ज्ञानेन्द्रियक बसहा
विकट नियमक रासि
अकट तर्कक नाथ।
एहि सभकें गर्भमे कएने जरायु समान
पर्वताकृति माथ
कत’ उघने जाइ छह हे युग-पुरुष तों?
जा रहल छह आइ जोतै लेल नबका चास
दूर, अतिशय दूर?
जोति चुकलह घ’र लगक चैमास?
जोति चुकलह बाध-बोनक चास?
जोति चुकलह चीन ओ जापान?
रूस, अमेरिका, अरब, ईरान?
खूब तेज हँकै छह तों अपन मगजक ह’र।
बाह रे हरबाह!
जाह, जत्ते दूर जेबह, जाह।
शिवास्ते पन्थाह!
कते उपजौलह एखन धरि?
कए अरब टन? कए खरब टन?
ताहिसँ की भेलह नहि सन्तोष जे तों
आइ जोतए जा रहल छह दूर, अतिशय दूर
बढ़ि गेलहु अछि गृð दृष्टिक भूर
घ’रे बैसल देखि लै छह लाख योजन दूर।

दूर लटकल जे गगनमे चान
आइ हस्तामलकवत् से भ’ रहल छहु भान
देखि रहलह अछि जोत’ तों लहलहाइत चास
जा रहलह अछि ओतहि तों, अरे लोभक दास।
ल’ अपन ई पर् िंकाष्ठक ह’र!
वाह रे हरबाह
जाह, जत्ते दूर जएबह, जाह।
शिवास्ते पन्थाह।

अपन माथक भारसँ अपनहि पिचाइत
रेलवेक कुली जकाँ बेजान दौड़ल जा रहल
हे पर्वताकृति माथ
सर्षपाकृति माथ केर सम्वाद किछु सुनि लएह
गर्वसँ क’ उच्च मस्तक ताल-वक्ष-समान
जा रहलह अछि गगनसँ आइ आनए चान
हाल की धरतीक छै; नहि ताहि दिस छहु ध्यान
लगौने छह मात्रा ऊपर टकटकी बड़ जोर
कहि देतहु मुँहफट कोनो मैथिल अकास-काँकोड़
भेल नहि अछि आइयो धरतीक पीड़ा शान्त
होअह जँ, विश्वास नहि तँ चलह हमरा संग
भ’ जेतहु ‘स्पुतनिक युग’क अभिमान क्षणमे भंग
जखन देखबह अपन दुनू आँखिसँ प्रत्यक्ष
दूध बिनु म्रियमान शत-शत बाल
अन्न बिनु म्रियमान नर-कंकाल
वस्त्रा बिनु म्रियमान माइक लाज
धाँगि चुकलह अपन सप्तद्वीप धरती
मथि गेलह अगाध सातो सिन्धु
किन्तु नहिएँ कतहु भेटलहु एकर औषध हाय!
जा रहलह तें गगनमे आइ संजीवनी जोह’
जाह हे युगपुरुष, सुखसँ जाह
शिवास्ते पन्थाह!
कहह हमरा लेल अनबह कोन-कोन सनेस?
सर्षपाकृति माथकें चाही न किछु विशेष
भरल बाटी दूध लाबह भरल थारी भात
आर लाबह वस्त्रा टा भरि गात।
जाह हे युगपुरुष, सुखसँ जाह
शिवास्ते पन्थाह!

अन्न देवता
छल गगन-सन नील करड़िक पात
ताहि पर राकाक शशि-सन भात
ताहि पर छल हिंगु-गन्धी दालि
विविध व्यंजन तकर चारू कात
ताहि पर छल दृष्टि चिर धरि लग्न
किन्तु मन छल कतहु अन्तह मग्न।

‘खाह ने!’ कहि उठल के ई बात?
चकित भ’ चैदिस कएल दृक्पात
छल केओ नहि, कहि उठल ओ फेर
‘खाह ने! हम थिकहुँ परसल भात।
खाह झटपट, नहि करह अपमान
कोन चिन्तामे तोहर छहु ध्यान?’

सूनि भातक बोल ई अजगूत
फेर ताकल दृष्टि क’ मजगूत
भेल भासित हमर सम्मुख एक
प्राणवन्त पदार्थ, पिण्डीभूत
कहल हृदयक बात निःसंकोच
क्रोधवश, नहि रहल किछुओ रोच।

‘अरे मुट्ठी-भरि मनुक्खक दास
एकसरे हम खाउ तोहर माँस!
सन्निहित छह जकर कण-कण मध्य
लाख भूखल मानवक अंशांश!
खाउ एकसर कोन विधि हम, हाए!
नहि सकब एत गोट पाप पचाए
छल-छुरीसँ काटि आनक घेंट
जे अपन भरने रहै अछि टेंट
जाह, ओकरे ओतए हँसि क’ जाह
भरह ग’ ओकरे अगस्ती पेट
आ कि जँ छहु कतहु हृदयक लेश
जाह तँ झट ताहि भीषण देश
जतए भूखल प्रबल ज्वाला-मध्य
मानवक अछि अस्थि टा अवशेष
जाह बनि क’ ततए अमृत-धार
जाह झट, जा अस्थि होइ न छार।’

‘खाउ ने!’ कहि उठल के ई फेर?
छली गृह-लक्ष्मी स्वयं एहि बेर।
चलए लागल भात पर झट हाथ
गेल उड़ि सब कल्पना मन केर
किन्तु गिड़इत काल अनुभव भेल
काँट हो ग’रमे जेना गड़ि गेल।

रामकृष्ण झा ‘किसुन’

खिस्सा-पिहानी

ह’
उखड़ि गेल गाछ
अतिवृद्ध, जर्जर
डारि सभमे कठपिल्लू
घोरन छल लुधकल
टुस्सी सभमे बाँझी आ कोंकराहा
जाला छलै छाड़ल
बेस उँचका डीह पर
इतिहासक जीह पर
दोहराओल जाइ छल ओकर नाम
फल्लाँ बाबूक घड़ारी परक गाछ
(हड़ाशंख गाछ)
जनम’ नहि दै छलै छाहरि तर किछु
उच्च वंशावतंस पीपरक गाछ
बैसाख नहाबए बाली सभ
ओकरा जड़िमे पानि ढारि
गोसाँइक नाम सुनैत छलि
पुण्यलोभें ओकर खिधाँस सुनि
आँखि-कान मुनैत छलि
कतेकोकें बेटा
बेटाकें नोकरीक जोगार
फल्लाँ गामबालीक जमायक भातिज
आ कि भागिनक सार
भरिसक ओहि गाछक कृपासँ पौने छल
खुशफैल रोजगार
तें सब लुबधल छलि
पसरल आँचर
हे भगवान
रखिहह एहि पर ध्यान
ज’ड़ि लग बह्मक घोड़ा
फुनगी पर बह्मराक्षस
की लेब?
की ले...ब...?
ब’र आब नहि छलै
दर्प छलै छाहरिक
नवका छौंड़ा सभ ढेलमौस चलबै छल
कोनो फुनगीकें निशाना बनबै छल
वृद्ध जरद्गवकें कनबै छल
उखड़ि गेल पुरना से गाछ
बिहाड़िये छल जोरगर
उखड़ल अछि, तैयो जड़ि छै लगले
तंे पारू कोदाड़ि
खूनि दियौ चकरगर क’ चैर
चलाउ कुड़हरि
काटू एकर मुसरा
जे हँटए ई ढेंग
जमीन हो साफ
पुरनाकें आब कहू के करतै माफ?

प्रतिवादक स्वर

हमरा नहि नीक लगैछ
अहाँक उपदेश
जे बाउ धैर्य राखू
सन्तोष करू।

हम खोखरि देम’ चाहै छी
अहाँ लोकनिक खोल
खाहे लहू-लहुआन भ’ जाए
हमर सौंसे देह।

हम देखए चाहै छी
अहाँक नग्न प्लास्टिक पिरामिड रूप
जे चाटुकार इतिहास द्वारा
बलात हमरा पीढ़ीक माथ पर
लादि देल गेल अछि।

हम जनै छी जे
अहाँक सभ्यता, संस्कृति
प्रगति आ सुख-सुविधा आदि
फूसि इन्द्रधनुषी
शब्द सभक जालमे
बझएबाक सामथ्र्य आब
खतम भ’ गेल अछि
मुइल अछि
गन्हाएल अछि
अहाँक सकल शब्द-कीट।

हम तोड़ि देम’ चाहै छी
अहाँक समस्त अधिष्ठित बिम्ब
जे हमरा लोकनिक चारू कात
एक-एकटा उँचका सिंहासन
गाड़ि देने अछि।
समवेत अछि ओ बल
आइ हमरा बाँहिमे
जे माथ परक आकाशमे
अनका भरोसे चमकैत चन्द्रमाकें
अपना मुक्कासँ
तोड़ि क’ थकचुन्ना-थकचुन्ना क’ दी।

तेज ग्रहण क’
धरती परक माटि-पानिसँ
लोक-नायक बनल सूर्यक
तेजोमय प्रकाश-पिण्डकें
घीचि क’ धरती पर पटकि दी
आ एँड़ीसँ मीड़ि क’
रित्ती-छित्ती क’ दी।
कहिया धरि ई पीढ़ी
अहाँक गोली खा क’
आधि-व्याधिकें देहमे झँपने जाएत
कबरक लहाशमे की
नहि करै छै पीलु खद-खद?
हम नहि होम’ देब
एहि समस्त संसारकें
पागलखाना बनएबाक
दुरभिसन्धिकें सफल।

नहि चाही हमरा
हफीमी निन्नक अमृत
मर्फियाक शान्ति
फुसियाहा स्वप्नलोक
कर्जखोर आश्वासन
बनावटी इजोत
आ बनावटी बसात
नहि चाही हमरा
कोनो बनावटी बात।
अनुत्तरित
प्रत्यह भोरमे उठला पर
हम अपना कान्ह पर
एकटा जहाजक बोझ उठौने
अंगैठी मोड़ आ हाफी करै छी
योजनाक पहेलीकें जुगता क’ भरै छी
सुरूजक चक्का देखिते
मदारीक बानर भ’
डमरूक बोल पर नाच’ लगै छी
जखने जगै छी
सहसा मनुक्खसँ गदहा बड़द बनि
राति धरि अनेक खेप जनमैत-मरैत छी
सभ किछु करैत छी
प्रत्यह ‘क्षण’क बड़का जुलूस
नाम सभक नारा लगा
सड़क सभ टपैत अछि
हमर कनहा कँपैत अछि।
हमरा खोलसँ बेसी काल
एकटा कुकूर बहरा क’
रोटी आ नूआ लग नाँगरि हिलबैत अछि
ओकर छर् िंव्यक्तित्व सदिखन
हँ’मे हँ’ मिलबैत अछि
सभ प्रश्नक सामूहिक उत्तर भेटैत अछि
...ई सभटा करैत छी हम केवल जीबा लेल।
जीबै छी कथी लेल?...
अनुत्तरित प्रश्न अछि!

खुटेसल
हमरा लोकनि बान्हल छी
हमरा सभकें अतीत ‘हरी’मे ठोकने अछि
हजार-हजार वर्ष बितलाक बादो
हमरा सभ निरन्तर चलैत
ओही ठाम ठाढ़ छी
हमरा लोकनिक अगिला पड़ाव
भरि दिन चललाक बाद
साँझमे
पुनः ओही ठाम होइत अछि
जत’ भोर खन उठल छलहुँ
कोल्हूक बड़द जकाँ
हम सभ समन्वयवादी छी
लड़बाक अपेक्षें हमरा सभ
बचि जएबाक बाट बनबै छी
जीवन भरि अतीतक पाउजे करै छी
हमरा लोकनि
बापक बाप आ तकरा बापक बाप
माने संख्यातीत बापक परम्परामे
जीबै छी
एकटा दुर्निवार माया
सौंसे देशकें
अपना आँचर तर झँपने अछि
तें हाँजक हाँज लहासक संग रहबामे
गौरव-बोध होइत अछि
लहास सभक अनेक अक्षौहिणी
हमरा सभक माथमे प्रेत नृत्य क’ रहल अछि
अपना हथियारसँ ‘हैण्ड्स-अप’ करौने अछि
समस्त वत्र्तमान आ भविष्यकें
एकटा अजोध अजगर दकचने अछि
अपन चोख बिखाह दाँत
हमरा लोकनिक पीठमे भोंकने अछि
हमरा लोकनि बान्हल छी
हमरा सभकें अतीत ‘हरी’मे ठोकने अछि।


चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

देखहक हौ गाँधी बाबा

देखहक हौ गाँधी बाबा तोरो स्वराजमे
लाखो करै’ छह काँहि-काँहि हौ!

पेटमे न अन्न छै’ न देह पर कपड़ा,
घरमे न खर्ची ने चार पर खपरा,
जेठक चण्डाल दुपहरिया नचै’ छै
कागा डकै’ छै टाँहि-टाँहि हौ!

ढन-ढन पड़ल छै घरमे कोठी,
लोक बनल अछि फाँड़ल पोठी,
भात खएनिहारकें ने अल्हुआ जुड़ै छै
सब क्यो करै अछि फाँहि-फाँहि हौ!

दिनकर तपौने जाइ छथि धरती,
धरती से बाँझ पड़ल बनि परती,
करती बहुआसिन की चुलहा जरा क’
नेना करै’ छनि खाँहि-खाँहि हौ!

चेला ओ चाटी से बनल अपावन,
अएलै’ महा-पपिआहा सत्तावन
लाबन पर डिबिया से छुच्छे पड़ल छै
टेमी जरै’ छै’ छाँहि-छाँहि हौ!

जीर सन उपजलै’ गहुमक दाना,
आबि गेलै अगिलगुआ जमाना
छोटका-मझोलकाक बात की कहिअ’
बड़को खसै’ छै धाँहि-धाँहि हौ!

नेतावचनामृत

लड़े लड़े कहि मतदाताकें आँंगुर पकड़ा बुलब’ दे
जकरा जे होइ छौ से होइ छौ, हमरा कुरथी उलब’ दे।

जनतन्त्राक महिमा बड़ भारी दुनिया-भरि अनघोल छै
भने भरल हो भुस्सा-गोबर तैयो मुण्डक मोल छै
राजनीति थिक सौंस सुपारी तें तँ सक्कत होइत छै
तैयो ला, हमरा कल्ला तर गमे-गमे गुलगुलब’ दे।

राज चलाएब ठट्ठा नहि छै, तिकड़म भिड़ब’ पड़िते छै
जते विरोधी होइ छै से जी-जान लगा क’ लड़िते छै
मुदा असल गुड़किल्ली सबकें नीक जकाँ नहि बूझल छै
तें स्वतन्त्राता-देवीकें ता हमरे मचकी झुलब’ दे।

गाम छलौ बड़ सुन्दर, सब क्यो प्रेमभावसँ रहै छलें
सुख-दुखक जखन जेना जे अएलौ सब मिलि जुलि क’ सहै छलें
के जानए जे आगि लगा क’ लंका बनल नुकाएल छौ
पानिक कर ओरिआओन, मुदा ता हमरा रोटी फुलब’ दे।

बुझलहुँ जे बड़ मेहनति कएलें, लागत पूरा लागल छौ
खेती तँ छौहे बड़ सनगर, संग कपारो जागल छौ
ई सामाजिक न्याय थिकै जे सबकें भाग बराबरि हो
समगर्दा सम्पत्ति थिकै तें हमरा पाड़ा हुलब’ दे।

स्वतन्त्रातामे जनकल्याणे तँ सरकारक काज थिकै
नेता होइ छै एक, असलमे तँ जनते के राज थिकै
क्यो अधीर जुनि हो, धैरज धर, एखन एकर फल काँचे छौ
एम्हर ला, ताबत एकरा हमरा मुट्ठीमे घुलब’ दे।



युगचक्र
ई अजगुत कोन पुरनके सबटा रंग छै
कने मने किछु भेद छैक जे
दुहुक फराके वेद छैक जे
दुहुक माँझमे एक जाल
आ ताहूमे जे छेद छैक से
अद्भुत कोन असलके सबटा ढँग छै।
कम-सँ-कम सब देशी अछि तँ
उजरा वस्त्रा स्वदेशी अछि तँ
गनले गूथल भोग करौ
तइयो पहिने सँ बेशी अछि तँ
बूझि लिअ’ जे बाँचल एक अलंग छै।
गप्पक बोर खाइ छै माँगुर
गड़ल छैक बुधियारक चाँगुर
बनल योजना पूल सात टा
योजनसँ बेसी दू आँगुर
ताही पर तँ भीतर जोर उमंग छै।
सर्वोदय केर फाँकू अँकुरी
वस्त्रा-दान लेल काटू टकुरी
नव उन्नति बिजुली घर देखू
बान्हू पाथे, पहुँचू सकरी
यन्त्रा देखि जनतन्त्राक के नहि संग छै।
नव निर्माणक हूलि-मालिमे
घोड़ा फर्जी केर चालिमे
भेद न कनिओ मानक चाही
हलुआ पूरी भात दालिमे
रंग आइ संसार भरिक बदरंग छै।



राजकमल चैधरी

सीता मृत्यु: अहिल्याक जन्म

प्रस्तावना
बिना कएने धरम-समाजक लोक-लाजक कोनो परवाहि
वृद्ध पितामह अनने छथि खोड़षीकें बिआहि...

परिस्थिति
पंडित सुधाकरजीक धर्मपत्नी द्वितीया, स्वकीया
आ हमर नवजात वासना परकीया
दुन्नू अछि बान्हल कुल-शील ससरफानीसँ
वैवस्वत मनुक महावाणीसँ
परनारीक नाम नहि लिअ’
परपुरुषकें दिअ’ देह नहि छूअ’
मनेच्छाक करू जुनि गप्प, हृदयधारकें राखू सम्हारि
देखू काटए नहि, बिखधरकें पहिनहि दिअ’ मारि
मोनक वातायन पर टाँगू मोट-मोट कारी-कारी परदा
खाइत रहू कामनाक माटि, फँकैत रहू निवृत्तिक गरदा
द्रवित, दुखित, भ्रमित रहू होइते आत्माक क्रन्दनसँ
बान्हल छेकल रहू स्मृति-पुराण संहिताक बन्हनसँ
लक्ष्मण-रेखासँ
नियतिक व्यंग्यपूर्ण लेखासँ...
कथा
मुदा, (ई ‘मुदा’ अछि कतेक नग्न, अछि कतेक भग्न)
अर्थार्जनमे सदिखन रहै छथि सुधाकरजी मग्न
जमीन्दर (पहिने छलाह। आब नेता) देशक द्वार पर प्रति राति
करैत गप्प शप्प ओएह जे जमिन्दारिनीकें सोहाति
बँचै छथि पुराण
बँटै छथि धर्मक ज्ञान, त्याग, बलिदान
जे एहेन छलाह राजा शिवि, एहेन छलाह दधीचि
कर्तव्य-रक्षार्थें अपने सोनितसँ धरा देलनि सींचि
एहेन छलीह गार्गी, मैत्रोयी, सीता, अनुसूया, सावित्राी
अपन शक्तिसँ केलनि गौरवान्वित ई धरित्राी
एहेन छलाह पूर्णपरब्रह्म श्रीकृष्ण भगवान
केलनि गोपिकाक रूप-गंगामे भरिपोख स्नान
... सुधाकरजी बँटै छथि मर्मज्ञान
आ, एम्हर हुनकर द्वितीया, बनि पूर्णिमाक चान
गबै छथि मधुर स्वरें कोनो नटुआसँ सूनल गान--
केहेन चतुर भौजाइ रे
मोन होइ छै दिअर संगें जाइ रे
कनकलता सन देहक कंचन फल छै
कतबो जतनहुँ आँचर तर ने समाइ रे...
सत्य
गबै छथि मधुर स्वरें गान, भ’ खिड़की लग ठाढ़ि
हमरा हृदयमे उठै’ए जेना कोसिकाक बाढ़ि
उफनै’ए कामनाक धार
(की हएत अनर्गल जँ रोकी नइं मोन-सागरक फेनिल ई ज्वार?)
उपसंहार
फूसि थिक मनुदेवताक स्मृति, फूसि थिक व्यासदेवक गीत
आइ थिक कलियुग, त्रोतामे मरलीह सीता
मरि गेलाह एक पत्नीव्रतधारी पुरुषोत्तम राम
नइं मरल मुदा, शिवक तृतीयो नेत्रा ज्वालासँ काम
भेलै नइं संसारक कोनो क्षति
सीताक मरनइं की, जीविते छथि एखन लक्ष-लक्ष रति
मरलीह एखनऊँ नइं गौतमक पत्नी अहिल्या सुकामा
मरलाह श्रीकृष्ण, जिबते अछि रूपभिक्षुक हमरा सन सुदामा
आ,
जनमिते रहती नितप्रति अगणित अहिल्या सुकुमारी
(ताकत अवस्से स्वस्थ वृक्ष, माधवी लता थिक नारी)
जावत अछि जीवित एक्कोटा बूढ़ बोको गौतम
नइं हटि सकत ई तम
गबिते रहती नारी परपुरुखक सहगान
करिते रहत पुरुख-जाति सहस्त्रा अहिल्याक धेआन...
स्वागत भाषण
हमरा अन्तरक लुच्चा, लफंगा, बतहा कुकूर
चलए नइं देखि कोनो आरि-धूर
फनए खेते-खेत
हमर वासनाक विक्षिप्त सन प्रेत
ठाढ़ि छथि अहिल्या फोलि मोन खिड़कीक दुआर
एकर अतिरिक्त सौंसे विश्व थिक असार...
भरत वाक्य
सीताकें हरि क’ ल’ जाइ’ए रावण महावीर
रावण की, मारीचहुँकें ने मारि सकत रामक सबल तीर
अहिल्याक डरें गौतम ऋषि कँपै छथि थरथर
आब नइं मुनि-शापें हेतीह ओ पाथर...


इजोरिया धनुकाइन

बाढ़ि डूबल खेतक ऋजु आरि
रक्त-सागरमे जेना दहाइत हो तरुआरि
खेतक आरि...
जै पर उगि रहल अछि दूबि
जेना मरण काल मुस्कान लै छै अधरपुटकें छूबि
हरित, टटका दूबि...
जइ पर उगि रहल अछि पथिक चरणक छाप
मृत्यु-सन अभिशाप
एकस्वरा बैसले अछि प्रतीक्षा-मग्न
बाढ़ि डूबल खेतमे क’ स्वप्न सभटा भग्न
अक्षयदेहा, देह-रस मातलि
मुदा, दू साँझसँ भूखलि-पिआसलि
इजोरिया धनुकाइन
(आइ कहतै गाम सौंसे ‘वेश्या’ काल्हि कहतै ‘डाइन’)
जकर पतिदेवता पड़ेलै मोरंग
अकालक समय देलकै ने दुइओ दिवस किछुओ संग
विरहाग्नि नइं, जठराग्निसँ झरै छै सभ अंग
जकरा जिन्दगी पर उगि रहल अछि दूबि
जेना मरण काल मुस्कान लै छै अधरपुटकें छूबि
झरकल, पाकल दूबि...
जै पर उगि रहल अछि पथिक चरणक छाप
युगक बड़का पाप...

निन्न ने टूटए
राति अन्हार अछि, काँपै’ए थर-थर बिजुरी, मेघ, गगन
दिशा ने सूझए
घाट-बाट आँतर-पाँतर ब’ड़-पीपर बाध-बोन गाछी-बिरछी
अछि अन्हारमे डूबल सभ कन-कन
छोड़ू बहिर्जगत के चिन्ता
करू ने गृहसँ बहार भ’ जग देखबाक सेहन्ता
सीरक ओढ़ि, लगा मसनद, करू काव्य-चिन्तन
करू गज-गामिनि कामिनि आगमन-प्रतीक्षा
लिअ’ प्रेम के दीक्षा
निन्न ने टूटए!
पिता-पुत्रा-कलत्रा-परिजन-पुरजन नोन तेल तरकारीमे
लागल रहि जाउ
बड़’द बनल, साधारण सुख-सुविधा के टूटल गाड़ीमे
जोतल रहि जाउ
माइक रोग, हँसी भौजीक, धर्मपत्नीक फाटल साड़ीमे
बान्हल रहि जाउ
दरबज्जा पर बैस रचू शतरंज, तास
बाड़ीमे रोपू भाँटा, पिआजु-लहसुन सोल्लास
गाम टोलक राजनीतिमे सदिखन लीन रहू
गामक-पोखरिमे बोहिआइत मीन रहू
खबासिन बहिकिरनीसँ सीखू वात्स्यायनक काम-सूत्रा अनुभव
वृद्ध करू बाप-पित्तीक अरजल वैभव
भँवरमे डूबए देशक नाह
भ’ जाए सभ्यता आ संस्कृति सुड्डाह
निन्न ने टूटए!

कोनो दुख नइं, किछु कलेस नइं, कोनो बेथा नइं
कान द’ सुनू समाजक कष्ट-कथा नइं
भोजनो धरिक आसरा छूटए
घर-दुआर, आँगन, टोल, गाम, देश भने सभ टूटए,
मुदा, अहाँक निन्न ने टूटए कखनऊँ
अप्पन टूटल खाट ने छूटए कखनऊँ
हे कुम्भकर्ण!
बनि ने सकै छी अहाँ महारथी कर्ण
बनि ने सकै छी कर्णक गुरु परशुराम
बनि ने सकै छी मय्र्यादा-पुरुषोत्तम राम
कर्ण जकाँ क’ ने सकब वचनक रक्षा, द’ सभ किछु दान
परशुराम बनि फरसा उठा करब ने सोनित-गंगामे स्नान
राम जकाँ नइं करब रावणक नाश

--हमरा होइ’ए एतबा घोर निराशामय विश्वास
देश, भाषा रक्षार्थे अछि बाजि रहल युद्धक डंका
सूतल छी अहाँ, बुझै छी, अछि देश अहाँक लंका
हे कुम्भकर्ण!
देश-जाति-गौरव बिसरि क’ भ’ गेलऊँ अहाँ अवर्ण
भ’ गेलऊँ अहाँ शिखण्डी, ने पुरुख, ने नारी
भ’ गेलऊँ मरण निद्राक व्यापारी

निन्न ने टूटए!


बन्धन मोक्ष
आरम्भिक धारणा:
मानि लिअ’, एकटा वृत्त थिक परिवार
पिता सूय्र्य छथि, पृथ्वी जकाँ परिक्रमा करै छथि सतमाइ
पत्नी छथि शशि, सूय्र्यसँ ज्योतित
पृथ्वीक चतुर्दिक परिधि-जकाँ बनबैत...
मुदा, ज्यामितिक सूत्रा नइं थीक हमर जीवन
किऐ मानि ली हम सूत्रात्मकताक बन्धन(?)
कदापि नइं छी हम मात्रा बिन्दु वा सरल रेखा

माध्यमिक परिस्थिति:
एहि पार पिंजरासँ मुक्त विहग जकाँ हम
मध्यमे ड्योढ़ीक विशाल, जर्जर केबाड़
ओहि पार अश्वत्थक वृद्ध वृक्ष सन पिता
आ दू टा भावुकमना नारी
माइ, जे हमरा गर्भमे धारण नइं केलनि
पत्नी, जे वहन केलनि नइं हमर सिनेह
आ, उदास-उदास थाकल सन तीन जोड़ आँखि
बेधैत दृष्टिबाण--
इएह थिक अहाँक गृह
इएह थिक अहाँक भविष्य, वत्र्तमान, भूत
इएह थिक अहाँक स्वर्ग, नरक मत्र्य
इएह थिक अहाँक दिवस, निशि, प्रभात
जुनि बनू पुत्रा, अहाँ गौतम सिद्धार्थ
नइं पूरल छनि एखन यशोधराक आशा
कतए अछि राहुल?
आ हम?-- बनल छी विराट विकल विद्रोह
हमरा लेल टूटि गेल अछि घरक देबाल
हमरा लेल नइं’ए कोनो गृह, कोनो परिवार...
भरि दिन, भरि राति आँगनमे
प्रदक्षिणा रहल करैत सौंसे विश्व:
तिब्बतक रहस्यमय प्राचीन मन्दिर: धर्म
मानसरोवरक श्वेत-तनु हंस: सौंदर्य
ताजमहलक गोल-गोल गुम्बद: कला
काहिराक कदलिजंघा नर्तकी: वासना
पेरिसक महाकाय ओपेरा: विलास
रूसक मास्को-विश्वविद्यालय: ज्ञान
कश्मीरक अपरिचिता सुन्दरी: प्रेम
सभ वस्तु अही आँगनमे गएलक स्वागत-गीत
तदुपरान्त वायुमे बिला गेल, हेरा गेल
धधकैत रहल ज्वालामुख हमरा सभक अन्तर
मुदा चेहरा पर शून्यक आवरण, मौनक परदा...

अन्तिम विद्रोह:
दौगै छी हम सभ केवाड़-पारक ध्वनि दिस
द्रुतगतिएँ तेआगि क’ पुरना सभ व्यवस्था
अव्यवस्थित पंक्ति बना, जुलूस लगा क’
मुदा, एक दोसरासँ पूर्णतः अपरिचित रहि
हे अपरिचित पिता, हे अनचिन्हार माइ
हे अज्ञात पत्नी
के छी अहाँ सभ? हमरासँ अछि की सम्बन्ध?
आ, कतए छी हम? आबि गेल छी कोन गाम?
कोना स्थगित क’ दी हम अपन महायात्रा
के रोकत, के बान्हत, के मनाओत?
चक्रव्यूहमे मरि गेल अछि अभिमन्यु
कनैत रहू हे अर्जुन, हे द्रौपदी, कोनो लाभ नइं
चीत्कार करू हे उत्तरा
ने अहाँ जमदग्नि छी, ने हम परशुराम
ने अहाँ कुन्ती छी, ने हम कर्ण
ने अहाँ सावित्राी छी, ने हम सत्यवान!


तथाकथित परम्परावादीक प्रति
जँ नवका ईंटा पाथि हम सभ बना रहल छी अपन दोमहला
गुरुवर, तामस जुनि करू!
जँ अन्हारमे हम सभ नवका रस्ता हेरि रहल छी अनुखन,
कनिओ जुनि डरू!
काव्यक शव पर अहाँक मैथुनी आसन हम सभ नहि छीनि लेब!
मृदु, ललित स्वरें विविध रागमे मादक अलापसँ
अहाँ गबै छी, से मधु-गायन नहि छीनि लेब!
पुरखा छलाह मैथिल-कोकिल विद्यापति महाराज
विपुल नितम्ब अति बेकल भेल, पालटि तापर कुन्तल देल
उरज उपर जब देहल दीठि, उर मोरि बैसल हरि करि पीठि
अहाँ लाज जुनि करू, कि सदिखन काव्यक फोलू कंचुकी, नीवी,
दूरहिसँ हम्मर शत-शत प्रणाम, हे महाकवे कवि-सम्मेलन-जीवी!

गितगाइन बनू, मधु छन्द लहरिमे डूबि डूबि बोहिआउ,
करू नहि भाव-अभावक चिन्ता,
करू नहि समाजके अन्तस्तलमे पैसि, हेलि जनसागरमे अथाह
काव्यक अमृतघट, लक्ष्मी, ऐरावत, धन्वन्तरि,
ऊपर करबाक सेहन्ता,
अहाँक लेल त’ काव्य थीक मानस-विलास, रति!
पवनक रथ पर कारी कारी बादरि आएल
दूर्वादल पर ओसक छहरल अश्रुविन्दु, कमलिनि मौलाएल
जय जय वसन्त, जय जय वसन्त, जय प्रकृति प्रिया
--एहि इतिवृत्तात्मक वर्णनसँ कएल करू काव्यक कपाल-क्रिया,
के रोकत, ककरा पलखति छै?
भसिआइत रहै’ए मोन अहाँक सुनि सुनि कोकिलक गीत,
बीसम शताब्दीक एहि मशीन युगमे आबहु
फैक्टरीक भोंपा नहि, यन्त्रा-सुन्दरीक लौह खोपा नहि,
ट्रैक्टरक विकट निनाद नहि, पूँजीपतिसँ श्रमिकक विवाद नहि,
कन्ट्रोलक गहूम, भुखमरी, अकाल नहि, दंगा जुलूस, हड़ताल नहि
--बजैत अछि कर्णकुहरमे एखनहुँ निर्झर-संगीत।
मुदा, के टोकत, ककरा अवगति छै!
कविवर सुनू, परम्पराक ई छाहरि,
सहस्त्राछिद्र चालनिक छाहरि थीक,
नवयुगक किरणजालसँ भ’ सकत आब नहि रक्षा।
साहित्यक निर्माणक मन्दिरकें जुनि बुझिऔ स्कूलक कक्षा,
जे, जे कहबै अहाँ से सभ मानि लेत
जँ युगसँ पाछू रहब, विश्व मृतक अहाँकें जानि लेत
नवतुरिया-समाजकें हाँकि सकत नहि एक्को छन
स्वर्गस्थ पितामहक ओ टूटल फराठी
नहि ककरो लगतै चोट, जे कतबा एकसरमे भाँजत लाठी!

कारी बादरिकें सुमुखिक केशपाश बुझि, ओझराएल रहब
वा, खेतक फाटल दरारिकंे जल-बलसँ मूनब?
ढहल भीतकें फोड़ि बनाएब नूतन, स्वस्थ दोमहला
वा, नढ़िया बनि अप्पन हाथें अप्पन सारा खूनब?
हे अतीतद्रष्टा युगभ्रष्टा गीतकार!
पुरना विधान, पुरना यति, गति, लय, छन्द, ताल, मात्रा
नहि चलत आब, नहि चलत आब, नहि चलत
युगधाराक संग ध’, साहित्य करैत अछि नव-यात्रा,
कविता आब नहि अछि नायिक भेद, नख-सिख सिंगार,
कविता नहि अछि रतिविपरीतक उनटल ग्रीवा-हार,
कविता थिक जन-भैरवी, सर्वहाराक क्रुद्ध हुंकार ,
कविता थिक जनजीवनक अग्निप्राण जयघोष,
कवि, जुनि करू रोष
जँ अहाँ पुरनका धुड़खुड़, पुरना खुट्टा नहि छोड़ि सकै छी
हमरा सभकें जुनि दिअ दोष,
जँ अहाँ सड़लका, जर्जर छान-बान नहि तोड़ि सकै छी
कविवर, अपने परम सुगन्धित दिवास्वप्न देखैत रहू
हम सभ त’ दुःकालक दुर्गन्धि ज्वालमे सदति जरै छी!
दस ताड़ ऊँच मचान गाड़ि, तै पर बैसि गबैत रहू
हम सभ त’ धरती पर जल प्रलय रुद्ध करबाक प्रयत्न करै छी!
आ, ई के कहलक जे हम सभ एकस्वर-एकसर छी,
ई के कहलक जे, हमरा संगें नहि अछि जन समाज?
गाएब, गाबि क’ लोककें रिझाएब नहि थिक कविता
लय छन्दक ईटासँ बान्हल इनार थिक, पोखरि थिक,
कथमपि नहि थिक सरिता,

बंेग मुदा, सरिता नहि डूबए
वामन नीलगगन नहि छूबए!

ई गप्प अहाँकें के बुझबए
आँखि राखि जे आन्हर अछि, तकरा के रस्ता सुझबए
काव्य तूर थिक, धुनैत रहू
अनका नहि फुरसति छै एत्ते जे धुनि सकतै
जे जे फुरै’छ से गाबि लिअ’
अनका नहि छुट्टी छै एत्ते जे सुनि सकतै!

महावन
1
जीवनक एहि समय-दाहक महावनमे, कतेक युगसँ
ताकि रहल छी--
कोनो अरूप देवता पर चढ़ाओल गेल किरणमाला
हम सभ अनिकेतन, अपराजित;
एकटा हेराएल रस्ता
एकटा हेराएल स्वप्नक लाल-उज्ज्र तारतम्य,
एकटा हेराएल मुख ककरो,
हम सभ अनिकेत, अपराजित कतेक युगसँ ताकि रहल छी
जीवनक एहि प्राण-पावक महावनमे
किरणामाला!

अन्हारमे भेटैत अछि अतीत-प्रेतक वृक्ष-शव अनेक!
पैर तर ओंघराइत छथि स्वर्ग-पतित
अप्सरा!
आँखिमे जाड़ें कँपैत अछि ज्वरग्रस्त चिड़ै-चुनमुनी!
उचरैत अछि एकटा कारी-पीयर गिद्ध बारम्बार
हमरे नाम--
चलू हे कवि, एहि बेर अहीं चलू भुतहा मसान
खापड़िमे भूजू अहीं अप्पन प्राण!
पैर तर ओंघराइत स्वर्ग-भ्रष्ट अप्सरा, आ
हेराएल स्वप्नक लाल-उज्जर तारतम्य
हमरा सभकें--
आबो विकल-व्यथित क’ रहल अछि, अकारण!
आबो मथि रहल छथि नीर-सागर,
देव-दानव अविवेकी;
आबो नचिकेता सदिखन पुछैत अछि धर्मराजसँ
जीवन आ मृत्युक रहस्य;
आबो एकटा अश्वत्थामा हाथी निहत होइत अछि
कोनो युधिष्ठिरक
सत्य आ नैतिकताक सुरक्षार्थें
--मुदा,
ई सभटा पौराणिक दुष्काण्ड होइत अछि, एही महावनमे
हमरे सभक अन्तरंगमे होइत अछि
द्रौपदी-चीर-हरण
आ, राजा जनमेजयक विख्यात नाग-यज्ञ!
2
अन्हारमे भेटैत अछि, अतीत-प्रेतक शव-वृक्ष अनेक;
ककरो एकटा चिन्हार मुख
नहि भेटैत अछि, जे तकरेसँ पूछल जाए--
ओहि मन्दिरक मार्ग;
पूछल जाए ओहि अरूप देवताक हिरण्यगर्भ सिंहासन;
जाहि पर उत्सर्ग केलहुँ किरणमाला
हम सभ
ताकि रहल छी मनुपुत्राक लेल!

महावनमे गुँजैत अछि केवल मृत वेश्या सभक क्रन्दन
केवल एकटा कारी पीयर गिद्ध
उचरैत हमरे नाम--
सुखाएल सेमरक कुष्ठोदरमे बैसल हँसैत अछि;
हम सभ अनिकेत, अपराजित बरखासँ
बचबा लेल;
बचबा लेल बज्र-ठनकासँ
सेमरक एहि डारिसँ ओहि डारि तर नुकाइत
मृत्युसँ नुक्का-चोरी खेलाइत रहै छी राति भरि।
किन्तु,
कहियो नहि समाप्त होइत अछि राति!
कहियो पंचम सुरमे नहि गबैत अछि कोकिल
भोरक, अथवा वसन्तक गान!

हमरा सभक पूर्वज भोर देखने छलाह!
गौने छलाह पराती, वसन्तक स्वागतमे वसन्त-बहार
बनि गेल छलाह;
किन्तु, आइ हम सभ एहि महावने छी समस्त
पूर्वज-विहीन!
हुनका सभक कोनो संस्कार,
कोनो परम्परा
कोनो श्रद्धा नहि रहि गेल अछि हमरा सभमे!
हम सभ निराश्रित, निराधार
क’ रहल छी अमावस्याक एहि श्मशानमे
सभ व्यतीत वस्तु-जातकें
अस्वीकार!
3
आब अस्तित्वक अविचल यथार्थ दुइए टा अछि
प्रथम ई जे हम सभ ताकि रहल छी
किरणमाला;
दोसर एतबे जे अतीत-प्रेतक अनिवार्य संगतिमे, महावनमे
जीवित छी हम सभ!


कवि परिचय
हमरा दुख अछि--
हम कविता लिखै छी, सदति अपना हेतु
मात्रा अपने टा हेतु
हम कविता लिखै छी!
अहाँक लेल लिखबाक
मिलन-कथा कोनो गरें सिखबाक
अवसर नहि भेल, जे अहाँसँ अपना धरि
दिनुका बेगरता सभसँ
रातुक मरम-भेद आध-निन्न सपना धरि
बना लेब एकटा सातरंग सेतु
अपना हेतु
मात्रा अपने टा हेतु
तकर कोनो लाथें, केशो भरि
अवसर नहि भेल
हमरा दुख अछि
कविता हमरा काँचे रहि गेल
एहि जारनिसँ उड़ल कहाँ धधरा
व्यथा कहब ककरा
कथा कहब ककरा?

गामक नाम थिक पुरबा बसात पछबा बसात

एक
कतबो दूर चल जाइ छी अन्न स्त्राी आ भरि पेट निन्नक हम
उद्योगमे कतबो दूर चल जाइत छी
सभ दिनक लेल भीड़मे हेरा जाइ मेलामे
भसिया जाइ
तरुआरिसँ दुनू पाँखि काटि जँ देअए कोनो रावण-राजा
राशनकार्डक गेंटमे
डूबि जाइ रोशनाइ जकाँ ‘ब्लौटिन’ पर
पसरि जाए सौंसे व्यक्तित्व
मुदा घरमुँहा बड़’द सदिखन सभ स्थान काल पात्रामे
घरमुँहे बड़’द होइत अछि
सिमरिया-घाटसँ गामक प्र्राइमरी शिक्षकक संगें
हाजीपुर अथवा कलकत्ता पड़ा जाइत अछि कोनो सधवा
विधवा फुलकुम्मरि धी कुम्मरि स्त्राी...
एकटा घबहा कुकूर भरि राति भरि दिन सदरि काल
ओंघाइत रहैत अछि
एहि गलीमे ओहि मचान तर...।

दू
एहि गलीमे ओहि मचान तर ओहि ठाम भुतहा गाछीक
अन्हारमे गामक बीस टा नवयुवक
ठाढ़ भेल निर्णय नहि क’ सकै छथि जे अन्न-प्रसवा खेत
दिस जाइ किंवा मौरंगिया गाँजाक पात्रा धरि
किंवा बरौनी-कारखाना
किंवा संखिया-भाँग धतूर हफीम खा क’ एक्के इनारमे
खसि पड़ी बीसो नवयुवक
प्रेत बनि नचैत रहि जाइ युग-युगान्तर धरि
भुतहा गाछीक अन्हारमे...।

तीन
कतबो दूर चल जाइ छी अन्न स्त्राी आ भरिपोख निन्नक
उद्योगमे हम कतबो दूर चल जाइत छी
मुदा,
घरमुँहा बड़’द सदिखन घरमुँहे बड’़द रहि जाइत अछि
सौंसे पृथ्वी सभटा युग चक्र
सगरे ऋतुधर्मक परिक्रमा क’ कखनहुँ घूरि क’
आबहि पड़त
बेलीक फूल सिन्दूरक रेखा उग्रताराक समीप
जरइए पड़त जेना भरि राति जरैत एकसर मुख-मलान
भगवती-घरक दीप।

चार
हमरा गामक नाम थिक पुरबा पछबा बसात जखन
दुनू हवा एक संगंे बहैत अछि
जखन केवल पछवा चलैत अछि सोलहो कला
सतरहो उद्योगक संग गामक मध्य रामशाला पर गामक
एक सौ आठ कुमारि
अबै छथि गबै छथि हे पछबा महरानी
आब नहि, आब नहि,
तखन पुरबा बसात बह’ लगैत अछि
पुरुष वर्ग खेत खरिहान स्कूल-दोकान अस्पतालमे
स्त्राीगण आँगनमे एतबे गप्प एतबे खिस्सा-पिहानी एतबे
सगुन-असगुन जे
चमेली दाइ किऐ चलि गेलीह दरभंगा
किऐ प्रेमनगर कनियाँ पसेरी भरि धान लेल भैंसुरसँ
करैत अछि अलाप कोन कारणें
प्रत्येक पाँचम मास अस्पतालक ओ सरकारी चमैन
कौशल्याक
आँगनमे गबैत अछि मलार।

पांच
बीेसो नवयुवक आ एक सौ आठ कुमारिकें अप्पन आँखि
अप्पन देह अप्पन मोनमे नुकौने
हम कते दिन धरि गामसँ जंगल जंगलसँ गाम
बौआइत रहब
कते दिन धरि खाइत रहब पुरबा बसात
पछबा बसात...
कते दिन धरि गाममे कहाएब नगरवासी
ओ नगरमे केवल प्रवासी...।

छह
जँ सत्त बाजब अपराध नहि घोषित भेल हो एखन धरि
गाम आ नगरमे
सुसंस्कृत मनुक्ख आ बताह जानवरमे
कोनो अन्तर नहि, कोनो अन्तर नहि बेली चमेली
आ अंग्रेजी गुलाबक सुखाएल ठोरमे
एक्के पराग
गबैत अछि सौंसे प्रकृति समस्त देश कोस एक्के सुरमे
एक्के टा गीत एक्के टा राग।


पति-पत्नी कथा
स्त्राी अपन सखा-सन्तान, भानस-बासन
सुख-सेहन्ता, पीठक
हरियर-पीयर दर्द, आ उधार-लहनाक
कथा
कहैत अछि,
कहैत रहि जाइत अछि भोरसँ साँझ धरि
बाड़ीक कोनटासँ
आँगनक माँझ धरि
कहैत रहि जाइत अछि साँझ धरि
पुरुख ओहि स्त्राी, आ ओहि स्त्राीक सखा-सन्तान
भानस-बासन, सुख-सेहन्ता पीठक
कथा
सुनैत अछि
सुनैत रहि जाइत अछि साँझसँ भोर धरि
ठोरक मन्द मन्द मुस्कीसँ
आँखिक नोर धरि
सुनैत रहि जाइत अछि भोर धरि


उपमा
प्रखर रौदमे सुखाइत मलाहक जाल
मोट किताबक पन्नामे दबल एक टा पीअर कीड़ा
मेलामे हेराएल बालकक आँखिमे आतंक
पेपरवेटक भीतर बनल लाल-हरियर फूल
पोखरिमे एकसरि नहाइले अबोध बालिका
ई सभ एकहि स्वपनमे देखल!

दृष्टि उत्थापन
ताकि रहल छी
कोनो डारिमे होएत अवस्से कतहु एक टा फूल
ताकि रहल छी
परतीमे छूटि गेल छल, हमरे कारी गाय
ताकि रहल छी
जाएब गाम, कहिया थिक भदबा आ दिग्सूल
ताकि रहल छी
दूधकें, वा माहुरकें, नहि अछि आन उपाय



मायानन्द मिश्र

मूल्य
दूबर पातर छोट-छीन इजोतक टुकड़ी
महाकाय महादानव अन्हारसँ लड़ैत लड़ैत
थाकि रहल अछि
अंग प्रत्यंग टूटि रहल छै
समर्थन लेल एम्हर ओम्हर तकैत अछि
तकैत अछि दूबर पातर छोट-छीन
एसगर इजोतक एकटा टुकड़ी।
टुकड़ीक मोनमे निश्चयक एकटा विस्तृत आकाश अछि
ई लड़त,
अन्त धरि लड़त
एसगरो लड़त, लड़िते रहत
‘अन्हार’कें परास्त करत
निश्चय करत
दूबर-पातर
छोट-छीन
इजोतक ई टुकड़ी।

पैघत्व
पैघत्व नहि थिक पूस मासक रौद
नहि थिक
गुमसराइन भादवक सिहकी
ओ थिक क्रेन
जे उतरल इंजिनकें
पुनः पटरी पर चढ़ा दैछ।


हमर पीढ़ी
कियो कहलक जे हमर पूर्वज जानवर छल
हम जानवरेक स्मृति-शेष छी
परम्परा विशेष छी।
खोहसँ अट्टालिका धरि
छालसँ टेरेलिन धरि
अनेक भूगोलक अनेक इतिहास थिक।
वस्तुतः हम ‘महान’ जानवरक
अति ‘क्षुद्र’ सन्तान छी
ओकर हत्या, भूख लेल छल
हमरा भूख, हत्याक लेल अछि
एही हत्याक लेल
जन्मल अछि विज्ञान।
असली विज्ञान।
नकली हृदय आ नकली धड़कन बनबैत अछि
असली कार्य लेल नकली मनुष्य बनबैत अछि।
नकली नहि बना सकल हथियार
नकली नहि बना सकल युद्ध।
असली विज्ञान असली आदमी
नहि बना सकल।
हम सब असली जानवरक
नकली सन्तान छी।



इतिहासक गली
फूटल घैलक खपटा जकाँ
हम अपन अतीतकें
इतिहासक गलीमे फेकि आएल छी,
हमर वत्र्तमान
डस्टबीनमे फेकल अयनाक छोट-छोट
टुकड़ी जकाँ
चमकि उठैत अछि
जाहिमे देखबामे अबैत अछि
पाँच वर्षक लेल कटल हमर हाथ
सटकल हमर पेट
नग्न हमर देह
प्यासें तबधल हमर खेत
उदास तकैत चिमनी
बिनु माथक भीड़
अपस्याँत चैराहा,
सबटा डस्टबीनमे चमकि रहल अछि
(आ भविष्य)
भविष्य तँ ग्लेशियर जकाँ अदृश्य अछि
ठोसो अछि, तरलो अछि, बहैत आबि रहल अछि।
फुटल घैलक खपटा जकाँ
हम अपन अतीतकें इतिहासक गलीमे
फेकि आएल छी।

चिन्ता
अहाँ सड़क पर भागि सकैत छी।
सड़क: जे एकटा ‘कालगर्ल’ जकाँ संग हेबाक
लेल प्रतीक्षामे रहैत अछि।
जे खण्डिता अछि
मर्दिता अछि, चिरनवीना अछि,
कोलाहल जकर निरन्तर शील-हरण
करैत रहैत अछि।
सड़क जे अनेक इतिहासक साक्षी अछि।
अहाँ कुकुरमाछी जकाँ लुधकल
सड़क परक भीड़सँ
अपन जान बचा क’
भागि आबि सकै छी अपन घर।
मुदा
अपन अन्तरक परिचित अपरिचित भीड़सँ
अखण्ड कोलाहलसँ
कोना बाँचि सकैत छी?
कोना भागि सकैत छी?
(वस्तुतः)
अहाँ सड़के जकाँ विवश छी
अहाँ मात्रा सड़क छी
बिचारक यात्राी चलि रहल अछि अविराम।


ताजा खबरि
पाँचम मंजिलसँ छप’बला अकबार
हमरा जनैत अछि, रगरग जनैत अछि
छपिते रहैत अछि
लिपिस्टिकक खबरि, महिला-वर्षक नाम पर
छपैत रहल हाॅस्पीटलक थाकल झमारल
स्कर्ट केर खबरि, बलात्कारक खबरि,
अन्हार मोड़ परक खबरि, कोनो फूलन देवीक खबरि
उजरा इजोतमे पढ़ैत रहब करिया खबरि।
पाँचम मंजिलसँ छप’बला अकबारमे
उदास नीरसतामे ठाढ़ हमर गामक खबरि नहि रहैत अछि
नहि रहैत अछि बेमाइ फाटल खेत
हकन्न खुरपी आ कोदारि
ठोर पर फुफरी पड़ल खरिहान
हाटक बाट तकैत चेथरा पहिरने होलमानी ध्वजा
अरिपनक पिठारक प्रतीक्षामे
वेनंगन चार परक कौआ
खलिया लादि पर थुथून रगड़ैत सिलेबिया बड़द
पेटकान लधने कुकूर
कड़चीक अभावमे औनाइत टाटक पोरो-लत्ती
फाटल आँगीक सीयनि जकाँ दरकल मुसुकान।
ई सब किछु नहि रहैत अछि
रहैत अछि फूलन देवीक खबरि
पाँचम मंजिलसँ छप’बला अकबार हमरा
जनैत अछि
रग-रग जनैत अछि।



सोमदेव

कर्मनाशा
जतेक काग छथि सभ क्यो पसिन करैत छथि
कर्मनाशामे डूब देब!
गंगाकात तँ मुर्दा डहैत अछि।
ओत’ डूब देबा लेल
एकटा मनुक्खक तलाश अछि।

नहि भेटल अछि मनुक्ख
तें तुक्कड़ लोकनि
कागतक मुरुत छेबैत रहला-ए!

आउ एहि तुक्कड़ सभकें
नुक्कड़ पर सजा ली
मुक्त आकाश तर
संग्रहालयक मजा ली!

सामाजिक राजनीतिक कठघरामे ठाढ़ छथि मुलुको प्रेत
नायकक अभिनय करैत।
खिखिर लोकनि नाँगरि डोला रहलाह अछि
भ्रष्टाचारक भूरमे लसकल
कार्यालय-कन्याक बाहुमे असबस। सदानीरा-घाटक
उद्घाटन क’ रहला अछि।

ता एम्हर गीदड़ लोकनि सड़क,
पुल आ दफ्तर सभक भवन
अगबे कर्मनाशाक बालु पर जोड़ि रहल छथि।
गंगोकें कर्मनाशा दिस मोड़ि रहल अछि!
प्रदूषणसँ घबाह गंगाजल
नाश क’ देत कर्मनाशाक शुद्ध लेर
भ’ जाएत अन्हेर!
खसि पड़ताह त्रिशंकु नहुष। आ विश्वामित्रा
कौशिकीमे डूबि मरताह!
तखन टूअर बेचारो जनता -- हरिश्चन्द्र की खएताह?

की लिखल छनि वैदेहीक कपारमे
बाप छथिन विदेह
किएक रहतनि एक्को बाकुट माँसल माटि। अगबे सुगन्धि
सुखाएले छनि रग-रग केर पानि। स्वेदे-स्वेद
बुता गेलनि-ए कहिया ने नाभि-कुण्डक आगि। छाउरक बगए
हृदय कुहरमे कुहरै छनि प्राण। स्पर्श-बोध मात्रा
खएता की? कण्ठमे फाँसल छनि आकाश। फाँकथु उज्जायी...
विदेह भ’ गेलाह-ए आन्हर, बहीर आ तें मौन!
विदेहक धुथरी सनक मौनीमे राखि राजनीतिक गूड़-चाउर
बालभोग लगा रहला-ए लंकासँ पड़ा क’ आएल बाबाजीक भेसी छदामी
राकस-समूह

कनी टाक देह। बड़ी टाक मुँह
बजै छथि मैथिली, कहै छथि हिन्दी
बजै छथि हिन्दी, कहै छथि अंग्रेजी
बजै छथि अंग्रेजी, कहै छथि हिन्दी
जेना ‘मुदा’ मे घोसिया रहल अछि ‘मगर’
जेना गाममे घोसिया रहल अछि नगर
नगरमे सूपनखा सन-सन पब्लिक इस्कूल
गाँधी सेतु भेल जा रहल अछि ‘टेम्सक पूल’
दलान पर त्रास्त बाबा बजबै छथिन, सुनू बाउ श्री श्री!
टीभी लग व्यस्त पौत्रा कहै छनि, ग्रैंड’पा टरी-टरी।

सभकें चाहिअनि खुशफैल देह
खाली वैदेही टाक बाप रहथु विदेह
क्रान्ति दन्तविहीन, भ्रान्तिमज्जाक तन
आयातित विवेक काल्पनिक मन
--की भेटलनि अपने गेहसँ
एतावता स्पर्श नहि भेलनि साकेतक संविधानी रेहसँ?
जनबली हनुमानो नहि क’ सकलाह हिनकर रक्षा
अन्यायक जातिवादी लाल भालुसँ!
लोरिक, सलहेस, नैका, कारू, दुलरा आ बण्ठाक संस्कृति
भसिया रहल अछि ऊसक पथार जकाँ
आधुनिकताक लाथें घर दिबराक ढेर भेल
भासैत अछि आँगनक धार जकाँ
बाढ़िमे रिलीफ बँटैत एक्को टा ‘अहाँ’ नहि, अगबे ‘आप’ कि ‘आप’!
नाव पर एक्कोटा समांग नहि, अगबे लाल आ हरियर साँपे-साँप!!
--आब बान्ह पर बैसल काहे-कूहे लग कुहैत रहू
हेलीकाॅप्टर तकैत आश्वासनी बकरी दूहैत रहू
टेंटमे ल’ जाउ दुग्धचूर्ण। अवसरक अछिंजल मिला-मिला
भेदी-कुर्सीक ‘जयकार’ कहैत रहू। मौका देखि
सभा-संस्थानकें महैत रहू।

जकरा सभक माइक अता-पता नहि। मुदा
बाप छलै आकाश। से सभ आइ
ठेकल छथि आकाश!
--अवस्से कि ने?
वैदेही टाक माइ रहथि रत्नगर्भा धरती
तखन के नहि लूटत हिनक पौतीसँ रत्न?
आ बेटी कुहरि-कुहरि किऐ नहि मरती!
अवस्से कि ने?

--आह! की निकलल नतीजा?
अकादमी कि विश्वविद्यालय
कि सरकारी विद्यालय
पाठ्यक्रम की मुदा भ्रम
कतए नहि छथि घोसिआओल--वाह रे भतीजा!
दोहाइ ओइ पार पटनाक
जिबैत रहथु शकुनी श्री श्री जीजी!!
अवस्से कि ने?
आउ, आउ! बड़ चैनसँ रहलहुँ। आउ
आब सभ गोटे लड़ैत जाउ
लोभ-ललक द्वेष-बाटी पर खसैत जाउ, जरैत जाउ। एखन की भेल-ए?
जाहि दिन मरि जएतीह माइ ताहि दिन कानब।
सेहो किऐ?
नेपाली संग्रहालयक मुरुत देखि-देखि हिनका मृत किऐ मानब?
किछु नहि। किछु नहि। एखन की भेल-ए मैथिल बाउ?
अपने किऐ आएल सन हएब एहि लावारिस वार्डमे
उतरब किऐ वैदेहीक माटि पर
बैसल रहू सरकारी कारमे।
जानि नहि की लिखल छनि वैदेहीक कपारमे!!!

कीलन
हमर छाँही समटा क’, कीलित भ’ गेल अछि जाहि ठाम
ततएसँ आगाँ
बढ़ले नहि होइत अछि!... आ आकाश अछि जे
युद्धविराम लेल
आगू अबिते नहि अछि!!
सन्धि-पत्रा हेतु
एहन हालतमे कतएसँ ल’ आनी मेघक कागत?
आखिर किऐ एहि समाजी-छाँहीमे, सदति
लेपटाएल रहैत छथि लोक?... सुझैत नहि छनि--
हमर अपनो उप्पर तँ हमर अपने एक गोट छाँही अछि...!!
जँ कहीं ओ छाँही उनटि क’ कीलित भ’ जाए
तखन बुझू जे सुरुजे भ’ जएताह समष्टि शक्तिगृह...
किऐ तँ सूर्यक छाँही सेहो भ’ जाएत कीलित
नीचाँ उप्पर एक्के धुरीमे
प्रतिष्ठित भ’ पाओत तखने बिना छाँहीक
दू गोट काया
पुरुख ओ माया

मुदा आइ बारहे बजेमे अभगला बजबए लागल अछि साइरन?
फेर कीलित होमए लगलाह अछि अपने अपन छाँहीमे लोक!!!

तैयो जुलूस नहि रुकल
घोर अन्हार। खाली पदचाप
कफ्र्यूक समान शान्ति। जेना
बिना यात्राीक सुसुआइत ट्रेन
दुबगली प्रतीक्षालय। बीचमे
धारा एक सय चैवालीस।
चैकी पर हकमैत जासूस कुकूर
ठकाठक। ठक्-ठक! चढ़ि गेल कन्हा पर
चारि गोट राइफल। एक गोट
स्टेनगन...
खोंखिआएल, ‘मनुक्ख-गन्ध! मनुक्ख गन्ध!’
‘जुलूस! जुलूस! जुलूस!’
‘हथियार तैयार!’
‘तैयार!!’
घुर्र घुर्र कर’ लागल जीप। तामसें भेर
थरथराइत ओकर समग्र शरीर...
मोंछक तरसँ हँसैत बिलाड़ आबि क’ देलक
सूचना -- मुर्दा छैक!
‘सएह तँ! जिन्दा कोना निकलि जाएत कोनो मनुक्ख!!’

मूड़ी झुला क’ समर्थन केलक कुकूर
आ आश्वस्त भ’ गेल चारि गोट
राइफल। एक गोट स्टेनगन
गुम्मी धएलक जीप...
साफ सुनाइ देबए लगलै। बाट ध’ जाइत
... राम नाम सत्त-ऐ!
... आम नाम हत्त-ऐ!
... आँव आँव अत्त-ऐ!
... आँ ऽ ऽ ऽ ...

आगाँ जा क’ अर्थी ठाढ़ भ’ गेल। आ ओकर
चारि पैर भ’ गेलै दू पैर!
ओ जुलूसक आगाँ भ’ गेल। नारा लगबैत
बदलि गेल रामधुन। आ दुबगली
प्रतीक्षालयसँ बुल-बुल क’ बहराइत चल गेल
मनुक्ख। आ नमरैत गेल जुलूस
आगाँ बढै़त। पाछाँ
ठामक ठाम। अन्तहीन...

महाभिनिष्क्रमण
आइ हमरा सभकें बोध भेल अछि जे सभसँ नीक काज थिक चोरि करब
ई विचारैत हमरा सभ आइ भरि दिन ‘चोर’कें श्रेणीबद्ध करैत रहलहुँ!
--अपन यश आ पदलिप्सा लेल डकैती केनिहार
राजनीतिक त्रिशंकु लोकनि-- नम्बर एक
--विशेष सुख-सुविधा भोग’क इच्छुक
प्रतिष्ठाक प्रतिमान-- नम्बर दू
--नचार भ’ किछु उचंेग क’ पड़ाएल जाइत अपसियाँत
कुकूर-सन दाँत निपोरैत दुविधामे फँसल शिखण्डी- नम्बर तीन
मुदा विश्वक कोनो टा सीमा नहि माननिहार
हमरा सभकें
‘तस्कर’ भ’ जएबाक चाही
गाय। नारी। आ द्रव्य--
अन्नमय। मनोमय। अर्थमय। एत’ छथि वेद
से हमरा सभकें आइ कोनहुना जा क’ ब्रह्मज्ञान भ’ सकल अछि

जाउ नेतागण, जाउ! जाउ आचार्य, जाउ! घूरि जाउ!
हमरा सभ युद्धाभ्यास नहि करब
नहि लेब धार्मिक पाठ, नहि धारण करब आन्हर उद्दण्डता
बनब नहि अहँक अस्त्रा अथवा मनोरंजन...
दुधारू कन्याक बिसुखल चिचोड़ल सुखाएल कठुआएल स्तन नहि बनब
नहि बनब मात्रा एकटा निरर्थकता, संशय-बोध, युगत्रास अथवा पीड़ा अथवा
कुण्ठाक रुमान
आब हमरा सभ विद्रोही लोकनि भाव-सन्निपात, अर्थज्वर अथवा हफीमसँ
जकड़ल आ जमकल नहि रहब
नहि ओढ़ब अभिशाप आ ने अपन जीवित एखनुका पितर-पुरखा जकाँ स्कूल टीचर
बा प्रोफेसरक
जामामे बचनबीर क्रान्तिदर्शी कहबैत फूल कटैत
छोपैत सामान्य जनक घेंट रायल्टी चोर आ दलाली सुख भोगैत
भाँग पिबैत मात्रा जिबैत टा नहि रहब, रेशमी अभिनन्दनक कब्रमे टाँग झुलबैत
कीत्र्तिक कुरसी पर आंेगठल ओंघाइत कोनो सरकारी पीठिका पर नहि खसि पड़ब
नहि बनबाक अछि आलोचक वा सभापति हमरा सभकें
नहि अछि करबाक संचय-सम्पादन अथवा छर् िंगर्जना
हमरा सभक पुत्रा चोरि करबा लेल मजिस्टेªट नहि बनत
ओहिना बिना बँचने गीता बाइबिल अथवा कुरान चोरि क’ लेत।

आइ हमरा सभकें प्रज्ञा भेल अछि
अपराध बोधि-महावृक्षक नीचाँ
आ हमरा सभ सिरकीमे बैसल
खा रहल छी पतुरिया हाथक खिच्चड़ि
आ अपने हाथें अपन यशोधराक गट्टासँ फोलि रहल छी सोनुहला घड़ी चुपचाप
राखि लै छी अपन जेबीमे बन्हकी राख’क लेल
जाहिसँ कीनि सकी टिकस
अनुसन्धान यात्रा हेतु--जे ओ के अछि?
जे स्वतः हमर ‘स्व’कें चोरौने अछि
आइ हमरा सभ ओही महान चोरक हेतु महाभिनिष्क्रमण क’ रहल छी।

किछु भ’ सकैछ

कौखन किछु भ’ सकैछ
पता नहि कखन की भ’ जाओ!
तैं हम ताकि रहल छी एकटा अणु-छाता
जाहि त’रमे हम निरापद भ’ सूति सकी
हम ताकि रहल छी एकटा कैप्सूल
जकर भीतर घोसिया क’ हम भ’ जाइ ‘मनु’
आदिम। अदन्त। अनन्त।
कौखन तँ तमाशा देख’ लेल अपन कछुआक
खपलोइयासँ बहार करी मूड़।
चारू दिस जरैत। करैत क्रन्दन धूमायित जेट। आर
होटलक खपलोइयामे सिपाही संग नचैत
नवजात जेटक माइ
मारू गोली
कखन की भ’ जाए?
हम अपन अनन्त कालक खपलोइयामे समेटि लै छी
अपन अग्निमुख। आ
बहार रहि जाइत अछि मात्रा जिह्ना! आ आँखि!


धीरेन्द्र

मनुक्ख आ मशीनी आदमी
तोरा संग हँसैत छी
तोरा संग बजैत छी
खा’ लै’ छी तोरा संग--दू खिल्ली पान!
तेजी सँ चलै छी,
जोरसँ बजै छी,
रहैत अछि ठोर पर हरदम मुस्कान!
बूझि लैह से तों, हल्लुक छी तूर जकाँ?
सहि लेब अवज्ञा फेकल नूर जकाँ?
बदलि गेल रंजक होएत ने अवधान?
मुदा गुप्प से नहि छै मित्रा!
हँसी देखलह अछि, हँसीक त’रक नोर नहि।
चंचलता देखलह अछि, अन्तरमे पालित होड़ नहि।
मुस्कीक बिहाड़ि तों देखलह अछि कहाँ!!
इच्छा छल बाँटि दी अप्पन मुस्की,
नोर आ बिहाड़िकें घोंटि पीबि जाइ।
डुबा दी व्यष्टिक चिन्ता समष्टिक समुद्रमे!
मोन नहि छल जे समुद्रक पानि नोनगर होइछ
पियास ओ मिझाओत नहि।
तें कहलिअह ई सभ!
मुदा नमस्कार बन्धु!
देखि लैह कृत्रिमताक उच्च-पहाड़,
अर्चना करए लागह गम्भीरता बूझि तों।
(बिना बुझने बिहाड़िक पूर्वक शान्ति,
बिना बुझने मित्राताक पण्डुकीक हत्या।)
किन्तु गप्प एतबे जे मनुक्ख मरि गेल,
ई जकरा देखैत छह--ओ थिक मशीनी आदमी।

हमर जिनगी
हमर जिनगी चाह केर लीकर सदृश अछि,
जाहिमे ने दूध आ ने चीनी कनेको,
कोनो जिद्दी चहक्कर-सन छी सुड़कने जाइत।
हमर जिनगी एक डोंगी, जाहिमे ने पाल आ ने करुआरि
मुदा हाथ बलें एकरा खेबि रहलहुँ मित्रा
हमर जिनगी एक टूटल घर जाहिमे अछि नाम मात्रो ख’ढ़,
मुदा आश्रित स्नेह तैयो दैछ।
एहि तरहें हमर जिनगी चाह केर लीकर, एक डोंगी,
एक टूटल घर।

चलि रहल छी
चलि रहल छी बाट दुर्गम दूर मंजिल दूर,
हमर जिनगीक रेल ई सरपट रहल अछि भागि।
बिलमैछ, टीसन पर, मुदा अछि गति ने कनियो रुद्ध।
(चलि रहल ई जिन्दगी केर युद्ध!)
सहयात्राी कतको मित्रा अएला, कएलनि भेंट, बजला,
घुलि-मिलि गेला, झगड़ो भेल, हँसला आ अन्तमे
‘बस विदा’ कहि, छाप अप्पन छोड़ि, ससरि भेला गुम्म,
सहयात्राी कतेको रहलाह गुम्मे-गुम्मे,
ने परिचय लेल आ’ ने देल!
मुखड़ा सभक अछि एहि दिमागी कैमरामे बन्द।
कालक एहि स्लेट पर हम नित्य लिखलहुँ
नित्य धोलहुँ जिन्दगी केर पाठ
भ्रान्ति भेल बहुत राशे; भ’ रहल अछि आर,
मुदा प्रतिपल घटि रहल ओ!
बजन्ता हम बड्ड बेशी,
ठहाका हमर अछि बेश जोरगर।
झगड़ा करै’ छी खूब डटि क’
खौंझाइ छी, चिचियाइ छी,
स्नेह सानल गप मुदा सभसँ लगै अछि नीक!
कनेको नहि रोष ककरो हेतु अछि हमरा।
गप्प जे रेलक कम्पाटक रहओ रेले धरि!
‘बस विदा’ केर समय लगैछ छिना रहल’ए वस्तु कोनो।
किछु काल धरि जेना लगैत अछि मने सुन्न-मसान!
मुदा लगले हेरा जाइ छी नव परिचयमे, नव झगड़ामे,
आदति रहल अछि इएह हम्मर!
हम बुझै’ छी रेल केर ई खेल, अछि कते कालक,
खाली बाट कटबा लेल झगड़ा-मित्राता केर स्वांग,
अन्तमे तें ‘बस विदा’ कहि सभ हएत कात।
अनुभव कएल एतबे अठतीस वर्षक एहि सफरमे,
(सहयात्राी ने कोनो रेल केर अछि मित्रा बा कि शत्राु!
क्षण बितएबा हेतु ओना चलि रहल सभ

की हेतै?
मानसक हरियर-कंच जलक कोरामे फुलाएल कोनो
पंच-दल कमलक
कोनो एकटा बा सभटा दलकें यदि नोचि-नाचि
फेकि दै केओ।
थकुचि दै बड़ड़ी आ छिड़िया दै’ किजल्क तँ
की हेतै तखन?
की हेतै तखन? उद्वेलित यदि भ’ उठए
पुनः मौन हेबा लेल
जल तँ, की ई अपराध थिक???
उत्तर दैह हे नव-स्मृतिकार! हम कानूनवेत्ता नहि।
पात्रा छी प्रवासी एक, जकर शब्द-शब्दमे उदासियेटा
सुनबह, की करू इएह थिक नियति हमर!!

सत्य
निश्चित रूपेण ई एकटा सत्य थिक जे जीवनमे आ’
जगतमे
एकटा राति अबैत अछि--अन्हार-गुज्ज राति!
जकर स्याह छाया मोनकें कम्पित क’ दैछ।
सत्य थिक जे एहि निशा-कालमे मनुष्यकें
अपन सुरक्षाक चिन्ता होबए लगै छै,
(अपन अस्तित्वक रक्षाक!)
मुदा अन्हारसँ बचबा लेल
डिबिया, लालटेन, गैस बत्ती बा बिजली जराएब?
वा ढारि दू-गैलन ओंघराएब कोनो मोड़ीमे???
(भ’ निश्चिन्त!)
डाकू-फक्स्यारक भय अछि तँ
तानब बन्दूक वा गाएब ‘बीटल-राग’?
हे बन्धु! लाल-परीक निसाँसँ निशाक भय नहि छूटत
नहि हटत दस्यु केर डर ‘बीटल-गीत’सँ!!
(जिनगी ई नहि क्लीवत्वक थिक, थिक पौरुषक!
क्षण केर अर्जुन पूज्य जखन ओ पार्थ बनै’ छथि!
सुनै-गुनै छथि गीता!)
यदि अन्हार केर सत्य अहाँ छी देखि रहल,
तँ कि अस्वीकार करब जे प्रत्येक अन्हारक
बाद अबैछ स्वर्णिम प्रातपूर्ण विभाभय! पूर्ण कर्णमय!
तें एकभग्गू सत्यक दर्शनकें नहि फानू!
नहि करू विश्वकें नष्ट अपन लम्पट-प्रवृत्तिसँ
द’ दर्शन केर रूप अपन उद्दाम वासनाकें!
हटि रहलै’, अछि धोन्हि!!
आबि रहल अछि उदयाचल पर सत्यक दिनकर!
हिमगिरि शृंगार देखि लाल-धाहीकें
नहि सोचू जे रक्त थिक ई कोनो आत्म-हत्या केर!
शैल-शिखर पर जमल बर्फ पर देखि लालिमा
नहि भरमू!
गलि रहलै’ अछि बर्फ, हिमानी पिघलि रहल छथि!
सविताक किरण अछि संग, ई तकरे थिक!
जल्दी भागू पाखण्ड!
महेशक मुनि डमरू केर नाद,
देखि प्रकाशक प्रखर ज्योति!
भागू! सूतू ग’ पीबि सोमरस कोनो गुफामे।
सुधांशुक विमल ज्योत्सनाक छाहरिमे
हंसक कल-गान!
मोहन बंशीक तान आ पांचजन्य केर नाद
पसरि रहल अछि।
भागि रहल अछि राति--
हिमानी जागि रहल छथि क’ सत्यक दर्शन!


गुरु द्रोणक प्रति
हे गुरु दोण! रहू ग’ अपने महारथी!
हमरा रह’ दिअ’ बस एहने मामूली सन मनुक्ख
कारण महारथीकें महाभारत चाही
(जे हमरा इष्ट नहि!)
संगहि चाही बड़का मान ओ सम्मान,
जकरा पएबा लेल--
कोनो अर्जुनक ठुनकी पर कतेको एकलव्यक औंठा छपठि
लेल जाइछ।
कोनो दुर्योधनक इंगित पर वध कएल जाइछ कतेको
अभिमन्युक।
हमरा ककरो औंठा काटब इष्ट नहि।
हमरा ककरो बध करब अभीप्सित नहि।
रह’ दिअ’! रह’ दिअ’!!
ई मान आ सम्मान
हमरा अपन एहि आधा रोटीमे जीब’ दिअ’।
नहि चाही हमरा दूध, दही ओ मिष्टान्न।
किऐ तँ हमरा नीक लगैछ कोनो एकलव्यक बढ़ोत्तरी।
हमर इच्छा रहैछ जे कोनो अभिमन्युकें
व्यूहसँ बहार होएबाक कला सिखा दिऐ।
बेचब किऐ हम अपन व्यक्तित्व?
बुत्ता रहल ताकए हमर बाँहिमे;
चेतना रहल ताकए हमर माथमे।
घी-दूध नहि जुटओ;
मुदा दालि-रोटी के छीनत???
आ तें हे गुरु द्रोण ! रहू ग’ अपने महारथी।
हमरा रह’ दिअ’ एहने मामूली सन मनुक्ख
अगबे मनुक्ख?


हंसराज
गन्ध
गन्ध, गन्ध, गन्ध
ने पुरबा-पछबाक गन्ध
ने कोनो फूल-पातक गन्ध
खाली घामक गन्ध
मनुक्खक चामक गन्ध
सुखा गेल अछि फूल-पात
ठाढ़ अछि बसात
हमहूँ जेना भ’ गेलहुँ अछि बूढ़ आन्हर
झलफलमे सभटा रंग लगैत अछि पीयर।

तैयो सभ नव फूल-पात
नबका बसात अनबामे सक्रिय अछि अपस्याँत
नव लोक, नब आलोक पएबा लेल
एहि, घाम-गन्धक कोठा पर भेटत नव लोक,
नव आलोक
फुलाएत फूल
नाचक पात, बहत शीतल बसात!
सुखाएल फूल-पात नहि
थाकल बसात नहि
हमरा आँखिमे अछि एकटा आभास
एकटा नव आकाश
अथच हमरा नीक लगैत अछि गन्ध
मनुक्खक चामक, घामक ई गन्ध।

ईश्वर
पहाड़क खाधिमे जनमल
एहि गोबरछत्ताक एकटा दोगमे
शरशय्या पर पड़ल
अहर्निश उकासी,
भरि अढ़िया कफ आ रक्तक वमन;
दस टा रोगग्रस्त बन्धुक बीच
एकसर हम सोचि रहलहुँ--
यन्त्राणाक सीमा ईश्वर!


अन्वेषण
क्षीरसागरमे सूतल भगवान
शेष शरीरक शय्या
नाभिकुण्डमे कमल फुलाएल
ब्रह्मा आसन लेल,
आँखि दूनू भारी।

चरण-कमलकें सेवि रहलि लक्ष्मी
खुजए न पाबए बन्द आँखि पतिदेवक
मुदा एकाग्र,
क्षितिजमे ताकि रहलीह किछु।


रामदेव झा

निर्जल मेेघ
राशि-राशि मेघ आबि
पड़ाएल जाइत अछि
पश्चिम दिस
प्रतीक्षककें डुबा क’
निराशाक सागरमे --

जेना कोनो
फ्लैग स्टेशन पर
कोनो एक्सप्रेस ट्रेन
हड़हड़ाइत जाइछ चल।

आ ठाढ़, प्लेटफारम पर
मोसाफिर देखि-देखि
ठकुआएल रहि जाइत अछि।


भारत-जननी
चरण-रज ल’ ठाढ़ि अछि कन्याकुमारी
अहँक चरणोदक जोगौने सागरक शुचि पात्रा भरि क’।
सतत लालायित परस हित आकुलित गति
संयमित नहि रहि सकल तें तरंगित अछि
नीरधिक छिलकैत छन-छन देह।

अहँक खोंइछामे भरल अछि
दूबि-धानक रूपमे ई विन्धय पर्वत केर शृंखल
अछि कते मिज्झर हरदि केर गेंठ सम छवि
जकर ल’ पीताभ बनल’ए हेम।

रत्नगर्भा आर वसुधा सार्थके अछि नाम
रोम-राजिक रूपमे अछि लक्ष-संख्यक गाम।
अछि कते ममताक परिमिति
जानि के सकत, कहू की
अपन सन्तति हेतु संचित
भ’ रहल स्रावित युगोसँ
स्वच्छ गंगा आ ब्रह्मपुत्राक सरितमे
पर्हिंृदये, परसि रहल’ए अहँक नीर-सिनेह।

हिम-धवलिमासँ सुशोभित
अहँक उन्नत शीश अछि हे --
हमर वृद्धा माँ, बहिक्रम केर गरिमासँ सुपूरित
श्वेत कान्तिक केश।
अछि कहब अवशेष।
केश नहि टूटए कनेको टा जननि हे।
नोचि लेबक हेतु दुस्साहस करय नहि
आततायी केर निर्मम हाथ।
विश्व भरिमे रहए उन्नत अहँक गुरुवत् माथ।

लागि नहि सकत अहँक तन
लघुहु कुशक कलेप
फेकि नहि पाओत कतहु क्यो
छोट-छीनो ढेप।
छी सतर्क, सचेत, तत्पर सतत रक्षा हेतु
केतु फहरए व्योममे निद्र्वन्द्व।
मन्द नहि हो ई मुखर मुस्कान
जननि हे, अर्पित हमर हो कोटि-कोटि प्रणाम





धूमकेतु
कविता
कविता थिक निश्शंक सार्थक शिलालेख कालक आतंकक
कविता मनुखक सत्य शाश्वत
कविता महज ईमान थिक
काव्य-विघटन-बीच काव्य अक्षर आस्था
कविता मनुखक मनुख हेबाक प्रमाण थिक।
कविता उपस्थित बात थिक दहकैत
बात, एकदम सोझ आ सपाट धधरा
युग-युगक संचित-दमित मनुषत्व के अवमानना के
कार्बनित महुराएल ज्वाला
कविता जीहक धार हन-हन आ कुलिश-सम दाँत
ढाहि क’ पाखण्ड के चट्टान
मुखर करतै अपन परिभाषा, अपन सन्दर्भ सन्धानक
नव जन-गणक उद्दाम जिज्ञासा
आ जन-जनक प्राणक भितरिया शान्ति के
आकांक्षाक निनाद
आ, मुक्तिकामी महत्तम आरोहणक अनुगूंज।

जे जनै छथि बात
आ देबालक लिखलाहाकें बाँचि सकै छथि, गूनि सकै छथि
तिनका कथीक बध लागल छनि?
वाक हरण भ’ कोन देशक कोन बैंकमे बन्द पड़ल छनि?
च वा हि तु भेद मात्रा कविता जनैत अछि।

जे शोणितमे बारि अपन अँतड़ी के टेमी
कुल्लम साजल महल अटारी
राजकक्ष आलोकित कएने छथि
जनिक रिक्ततामे बेहोशीक किसिम-किसिम के गैसक धूआँ
चुप्पेचाप भरल जाइत छनि दीना-राति
तिनके विवश निसट्ठ आँखि के
मार्मिक मूक मुदा औनाइत तप्पत आखर
उमड़ि सहज कविता बनैत अछि।
स्वयंसिद्ध अधिकार मनुख के हेरा जाइ छै जखने
वा विस्तृत आकास मनुख के लागि जाइत छै बन्हकी
वा पाखण्डक अन्हरजालमे
ओझरा जाइ छै सत्य मनुख के

तेहने कोनो विकट लग्नमे
फोड़ि कतौ धरती के छाती
अकस्मात अपरिपथगामी जनक आँखिमे
लहकि लपटि कविता जरैत अछि।

सभसँ ऊपर सत्य मनुक्खक
तै सँ ऊपर किछु नहि, किछु नहि
ताही सत्यक जयोद्घोषमे
कविता अछि अर्पित नित सहजहि।

मुक्ति
ओ सभ व्यक्ति थिका व्यास
जिनक जन्म, इछाइन कुहेस पसारि क’
भोगोपरान्त तत्क्षण मझधारहिमे
होइत-होइत-होइत छनि धूत्र्तताक वीर्यसँ।
बोधिसत्व जकाँ जंगले जंगल नइं बौआइ छथि व्यास
हुनक बोधे हुनक जन्म थिकनि
जन्मे थिकनि बोध
जन्म लैत देरी भ’ जाइ छथि
हीनचेता माँसभक्षी पराशर गिद्धक समाजसँ बाहर
ओना, वीर्यदानक महत्त्व ओ बुझै छथिन।

मुदा
भूधरकें फोड़ि स्वयं गंगा दौगलि औती
भगीरथ अन्तरसँ सोर एक बेर पाड़थु त’।

मरु केर आँचर हरियर कचोर भ’ फहराएत
कचनारक वर्षा हएत अंगोरक आँगनमे,
पतझाड़क छाती चीरि उगत ललका टुस्सा
मुर्दाेक प्राण-रस प्लावित होएत सावनमे।

ह’रक सिराउरसँ तत्क्षण बहरेती सीता
सीरध्वज लागनि ध’ दू मोड़ घुमाबथु त’।

जिनकर धमनीक उष्ण रक्त छनि पानि भेल
पौरुष हड्डीक पोर-पोरमे नुका रहल
ढहनाएल फिरै छथि जे नरेन्द्र शिवसिंह कते
लखिमाक लाज पर यवनक दल अछि धपा रहल।

जनमानसमे प्रस्फुटित हेतै चेतना-सुमन
युग-गायक विद्यापति केर स्वरमे गाबथु त’।

पाथर बनिते छथि कते अहल्या एखनहुँ धरि
गौतमक न्यायबुद्धि टा केवल बिसरि गेलनि,
छथि कते अयाची साग-पात खा क’ जिबिते
त्रिभुवन-वर्णन केर गर्व पुत्राकें घोसड़ि गेलनि।

प्रज्ज्वलित हेतै एत्तहु पुनि ज्ञानक दीपशिखा
वाचस्पति जीवन-यौवन अपन लगाबथु त’।
मिथिला तरुआरिक बिना न कथमपि जीबि सकत
ई कालकूटपायी चरणोदक पीबि सकत?
मिथिला तरुआरिक नोकहिसँ कविता लिखलक
आ मैथिलीक फाटल आँचर नहि सीबि सकत?

हिलकोर लेतै कन्दर्पीघाटहुमे यौवन
युग-नायक बिझलगुए तरुआरि उठाबथु त’।

गीतक लुत्तीसँ अगड़ाही छी लगा रहल
धरती आ अम्बरमे कहियो लगलैक आगि
बीयरिसँ बहराएत कोशी कातक गहुमन
तँ सबे सपेरिया मारि अहुरिया जाएत भागि।

औ सत्व अपन देवोसँ लड़ि लेबे करबनि
जनगण मनमे विश्वास अगम्य जगाबथु त’।




कीत्र्तिनारायण मिश्र
हेराएल अस्तित्व
हम जहिया जन्म नेने छलहुँ
हमर देश पराधीन छल
हमर नाम दर्ज कराओल गेल छल
कोनो म्लेच्छक बहीमे
सद्यःप्रसवा हमर माइक कानक चदराकेें
फाड़ने रहल होएतनि
मिलिटरीक बूटक आवाज

हम जहिया शिशु छलहुँ
देखने छलहुँ मात्रा अन्हार
‘ब्लैक आउट’मे हमर माइ
मटिया तेलक डिबियाकें मिझा क’
हमरा सुतबैत रहैत होइतीह
हुनका भयसँ निन्न नहि अबैत होइतनि
आ हमरा अन्हारक यन्त्राणा
लगैत होएत असह्य

युवा भेला पर हमर निन्ने पड़ा गेल
स्वार्थक बलधिंगरोमे
सौंसे अस्तित्व हेरा गेल
जे किछु अर्जित कएने छलहुँ
कालक वक्र गतिक संग बहि गेल
शून्य आकाश

नोनछर पानिक अथाह समुद्र
आँखिक सोझाँमे रहि गेल।


ओ अएलाह!
ओ अएलाह
नाटकक कोनो पात्रा जकाँ अएलाह
आ सौंसे मंचकें धाँगि क’ चल गेलाह
हम सतरंजी जकाँ हुनक पदाघात सहैत रहि गेलहुँ।

ओ अएलाह
छर्विंेशमे साधना केर पंचवटीमे प्रवेश क’ गेलाह
आ हमर संकल्पक लक्ष्मण रेखान्तसँ
हमरे टाँगि क’ ल’ गेलाह
हम राम जकाँ अपन महत्त्वाकांक्षाक सीताकें
जोहैत रहि गेलहुँ।

ओ अएलाह
हमर सुदामा-अवस्था पर
द्रवित भ’ अएलाह
आजुक कृष्ण!
हमरा आओर दरिद्र बना क’ चल गेलाह
हम फाटल बेमाइ जकाँ मुँह बौने रहि गेलहुँ।

ओ अएलाह
हमर मड़ैया पर गिद्ध जकाँ बैसि गेलाह
घर छोड़बा क’ आ घराड़ी बेचबा क’
स्वर्णदान ल’ चल गेलाह
हम अपन डीह पर
कुचरैत कौआकें देखैत रहि गेलहुँ।

एहि लेसल शरीरकें
पसरल अछि निस्तब्धता
एहि पारसँ ओहि पार धरि
ने पातक दोगसँ सनसनाइत अछि हवा
ने गाछ पर बैसलि कोइली कुहकैत अछि
ने ओससँ तीतल दूभि केर सिहकै छै गात
ने डोलैत अछि पुरैनिक पात
किन्तु एहेन निभोर रातियोमे बजैत अछि सायरन
द’ जाइत अछि कोनो आसन्न अशुभक सूचना
मसानी विलाप बला लयमे
आ संगहि छूब’ लगैत अछि
भोपाल आ चरनैलक गैसयुक्त हवा
कड़ुआइत अछि, सुखाइत अछि कण्ठ
आ खाट पर उठि क’ बैस’सँ पहिनहि
जकड़ि जाइत अछि सौंसे शरीर
एहि धुआँमे तँ किछुओ नहि सूझैत अछि
कोना भागी
ककरा छोड़ी
ककरा टाँगी
एहि धाह आ लेसल शरीरकें
बारूदक कोन ढेरी पर पहुँचा दी?

जीवकान्त
बस्तीक स्त्राी
बस्तीक हजार टा घ’रमे
नुकाएल अछि अनेक चीज
एक चीज अछि स्त्राी
स्त्राी नुकाएल रहत दिनमे
नुकाएल रहत रातिमे
सभ टा स्त्राी एक बेर बहराए
जमा भ’ जाए एक ठाम
से नहि होएत
स्त्राी नहि अंकित करत
अपन उपस्थिति

भानस करैत
नेना लेल अन्न आ कमीजक व्यवस्था करैत
छोट-छोट घ’रक थोड़ जगहमे
स्त्राी बिता देत आयुक अस्सी-नब्बे बर्ख!
रान्हलो भोजन ओ घाँटत नहि
राखलो वस्त्राकें देह पर नहि
पेटीमे ध’ देत

पृथ्वी पर सन्तति अछि
एक-एक सन्ततिक पाछाँ
अनेकानेक स्त्राी गला देत सम्पूर्ण आयु
सन्तति लेल कहियो ओ क्रोधसँ धधकत
कैकेयी जकाँ कोप-भवनमे जा बैसत गए
सन्ततिक उत्कर्ष लेल मन्दिरमे दीप देत
सन्ततिक समृद्धि लेल
पहिरत ओ बाघक नह
आ ककरो भम्होड़ि लेत।

माटि भेल मृदुल

बीज लेल माटि भेल
मृदुल आ ममत्वपूर्ण
समय बदलल अछि

समय चाहैत अछि
सभतरि पहुँचए प्रकाश
सूर्य आ चान भेल छथि उत्सुक
कोन-सान्हिक द्वारि फूजल अछि
प्रकाशक मार्ग भेल अछि निर्बाध

आकाशक मेघ आगाँ, आर आगाँ, बढ़ल अछि
जएबा लेल उत्सुक अछि
सुखेलहा कण्ठ धरि
पाँतीक अन्तमे ठाढ़ अछि जे पात्रा
ओकरा दिस तकैत अछि मेघखण्ड
नियारने अछि जाएत
एहि बेर जा क’ रहत
अन्तिम पात्रामे भरि देत वृद्धि
भरत उत्तेजना
अगुताइ नहि छै मेघकें
माझ बाटसँ घुरबाक नहि छै
बदलल अछि समय

आबि रहल छथि सूर्य
आबि रहल छथि सूर्य
जंगलक ऊपर छिटकैत अछि प्रकाश
भगजोगनी सभ छोट होब’ लगैत अछि
भ’ जाइत अछि नगण्य

छोट-छोट चिड़ै फोलि दैत अछि
पूराक पूरा कण्ठ
नान्हि-नान्हि टा पाँखिसँ नापए लगैत अछि
आलोकित आकाश
छोट-छोट जन्तु टाँग सोझ क’ विदा भेल
ओकरा सूझए लगैछ बाट
भेटए लगैछ चराउरक दिशा

डेराओन साँप थकमका गेल इजोतमे
खन डेग होब’ लगलै नमहर
घुमैत अछि अपन बीहरिक दिशामे
घास-पातमे अ’ढ़ तकैत अछि
पड़ाइत अछि
लटपटाइत अछि खसैत अछि


शुभ हो
चर-चाँचरमे पानि
थोड़ेक घास
चिडै़क झुण्ड एखन उड़ल आकाश
देलक चकभाउर ओ भोरुका कुहेसमे
दोसर झुण्ड उड़ल आकाश
दूनू झुण्ड शोभित अछि अपन चकभाउरमे
चुहचुह आवाज अछि अपन
आर कनेक ऊपर अछि दोसर
दूनूक चकभाउर घटित एक ठाम
सतह मुदा फूट-फूट

बैसत तँ फेर ओहि पानिवाला माटि पर
उड़त तँ एक्के आकाशमे ओ सभ
गाओत तँ एक गीत
शुभ हो ई धरती
शुभ हो आकाश
शुभ हो आकाश
शुभ हो कुहेस आ भोरुका प्रकाश

किरिन एक मुट्ठी भरि
आँकुरक धक्का अछि
सहे-सहे फाटि रहल अछि
बदामक मोट छाल
थोड़-थोड़ देखाइत अछि
पानिक एक पातर तह
दाना सभक बीचमे
चमकैत पानिक तह
छू कए करैत अछि
खोंइचाकें कोमल
जगबैत अछि, निन्नसँ
खोलैछ ओकर पिपनी
दैत अछि, आँकुरकें बहरएबाक वेग
पानिकें चमकौने अछि
सूर्यक किरिन मुट्ठी भरि
दोग दने ओ पैसल अछि अन्नमे
आँकुरक कोंढ़मे
आ सहे-सहे दीप्त करैछ ओकर जीवन

नचैत ग्लोब जकाँ
नचैत ग्लोब जकाँ एक टा सम्पूर्ण ग्रहकें
ग्रह पर उपस्थित सृष्टिकें जीवनकें
ओकर चारू कात मेघ आ सूर्यकंे
ध’ लेबए चाहैत छी
अपना पाँजमे समेटि लेबाक इच्छासँ
चिल्काकें हँसोथि क’ भरि लैत छथि आँगमे
आइयो दादी माँ

जोगए चाहैत छी जीवनकें
एक-एक फूलमे फुटैत रंगकें
सौरभकें
जंगली बसातक एक-एक श्वासकें
मेघसँ दयापूर्वक खसैत एक-एक घोंट प्राणकें
जोगए चाहैत छी
दूधक दाँतवला नेना पानि छपछपबैत अछि
लेढ़ाइत अछि
ओकरा उठा क’ छातीमे सटा लेबा लेल अबैत छी
दादी माँ आँचरक खूटमे बन्हने रहै छथि रैजकी

तहिना जोगए चाहैत छी
सूर्य चानकें
बरखाकें धोन्हिकें
कान्ह पर चिल्काकें लदने
नहि होइछ थाकनि
होइत अछि जेना पृथ्वीक चक्राकार गतिकें
करैत छी दुलार
बारह मासक बारह टा सूर्यकें
अपना अंजलिमे धरैत छी
करैत छी दुलार
समस्त स्पन्दनकें
प्रस्फुटनकें करैत छी दुलार
घुरि-घुरि क’ अबैत छी दूधक दाँतवला चिल्का लग
दुलारकें निंघटा देबाक सीमा धरि करब दुलार
खाली करए चाहैत छी भरती भड़ार

खदकैत रही रसमे

माटि होइत अछि दू रंग
रौदमे पकै छै एक स्वाद एक रंग
पानिमे सिझाइ छै एक गन्ध एक रंग
माटि रखैत अछि मंजूषामे बीज
जोगबैत अछि प्राण
अपन दूनू रंगकें सनैत अछि
आ प्राणकें दीप्त करबाक उत्सवमे
सातो रंग पहिरैत अछि

हम चाहैत रही
जे माटिक रसकें जीबी
उसर्गि दी निन्न
तेयागि दी अपना रसकें पकएबाक बेगरता
हम ओकर रसमे
रहलहुँ अछि खदकैत
ओ हम स्रोत हमर आदान
हमर समस्त बाट जाइत अछि निच्चाँ
जाइत अछि माटि दिस
पछिला खेप आब नहि अछि मोन
अगिला खेप लेल
एतबे अछि मोन
खदकैत रही रसमे
आधा तापमे
आधा जलमे



रमानन्द रेणु


व्यक्ति
परिस्थितिक नुक्कड़ पर
बैसल हम
पीबि रहलहुँ अछि अनुभूतिक गरम-गरम चाह।
कि एकटा कड़ू घोंट झिकझोरि देलक जे ठमकि गेलहुँ
सतह परहक भाफक उड़ैत गुब्बारामे देखल
बिगड़ितहुँ-बिगड़ितहुँ बजै अछि आकृति मानवक
आर गन्ध अबैछ ‘अहँ’क, ‘ऐश्वर्य’क
विश्वक विराट सत्ता, आकर्षण, सम्वेदन
आ कतेको ऊँच-नीचकें समेटि क’ जोगौने हो
जे अपन आन्हर परम्पराक गाछीमे।

एही हेतुएँ तँ आकृति सभ
तुच्छ अछि, क्षणिक अछि, अपूर्ण अछि
व्यर्थ सभ चेष्टा छै।

पियालीक चारू कात
उठै अछि अन्हड़ विश्वासक
आशाक मिठांस छै
दूधक छानल मोनक सभ वृत्ति छै,
पीड़ाक पानि जे ओहिना खौलायल छल,
सम्बोधक पत्तीसँ मिलल-जुलल जीवनक इच्छा-
चाह केर रंगत छै।
आर हमहुँ नहुएँ-नहुएँ पीने जाइ छी सोमरस।
किन्तु,
तृप्ति कहाँ? तृप्ति कहाँ??...


कहिया धरि
एकटा-चादरि ओढै़ छी
हमरा सभ
आ नेरा दै छी
आ दोसर चादरि ओढ़ि लै छी
सभ दिनसँ

बर्खक चादरि ओढ़ि
आइयो
समयक प्रवाहमे
अपन नाह खेबने जा रहल छी
जखन ओढ़ल चादरि नेरबै छी
तँ देखै छी
अपन देह
सर्वत्रा लुधकल घोड़न सदृश असंख्य जन्तु
चाहियो क’ नोचि नहि
फेकि पबै छी
आ पीड़ा सहैत हमरा सभ
दोसर चादरि ओढ़ि
अपनाकें नुका लै छी
पूर्ववत्।

हमर नैतिक मूल्य
हमर आस्था
हमर आचरण
एक्के संग सभ किछु भ’ गेल अछि खाक
आ मनुष्यताक गरदनिमे
बान्हल दोष/बेनिहाइत
पिटने जा रहल छी/अनवरत।

चादरि तँ एहिना बदलैत रहत
आ हमरा सभ एहिना देखैत रहब
किन्तु
कहिया धरि
हमरा सभ माँसु एना गलबैत रहब
कहिया धरि? ... कहिया धरि? ...

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...