Sunday, July 27, 2008

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० ४.महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा)

४.महाकाव्य
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा) ------
३. वन पर्व

पाबि युधिष्ठिरक आज्ञा चललाह अर्जुन,
पर्वत कैलास पर पार कए कऽ गंधमदन।
तूणीर आऽ धनुष हुनकर संगमे छल,
साधु जटाधारी तपस्वी अर्जुनसँ पुछल।
ई छी तपोभूमि शस्त्रक काज नहि कोनो,
अर्जुन कहल हम क्षात्र धर्म कहाँ छोड़ल।
तावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि,
प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।
माँगू वत्स वर हमरासँ प्रसन्ना छी हम,
शिक्षाक संग दिव्यास्त्र भेटय एहि क्षण।
अर्जुन अहाँक ई लालसा पूर्ण होयत मुदा,
जाऊ शिवकेँ प्रसन्न कए पाशुपत पाऊ।
फेर देवगण देताह दिव्यास्त्र अहाँकेँ,
ई शस्त्र सभ मानव पर चलायब अछि वर्जित,
कहू अहाँ पाबि करब की दिव्यास्त्र सभ ई।
शक्त्ति-संचय अछि हमर उद्देश्य मात्र देव,
कौरव छीनल अछि राज्य छलसँ परञ्च,
नहि करब एकर कोनो कुप्रयोग नहि हम।
इन्द्रक अन्तर्धान भेलाक उत्तर अर्जुनक,
शिव तपस्या कठोर छल होमय लागल।
तखन पार्वती संग शिव चललाह तपोभूमि,
अर्जुन पुष्प बीछि रहल छलाह अबैत क्षण,
वाराह वनसँ निकलि कए सम्मुख आएल।
जखनहिँ तूणीर धनुष राखि संधान कएलक,
किरात वराहकेँ लक्ष्य कएने दृष्टि आएल।
दुनू गोटे चलाओल वाण वाराह मारल,
एहि बात पर दुहू गोटे झगड़ा बजारल।
अर्जुनक गप पर जखन ठठाइत किरात,
अर्जुन ओकरा पर तखन वाण चलाओल,
परञ्च देखि नहि घाव कोनो प्रकारक,
अर्जुन किरात पर छल तलवार भाँजल।
मुदा किरातक देहसँ टकाराइत देरी,
भेल अर्जुनक खड्गक टुकड़ी छुबैत देरी।
मल्ल युद्ध शुरू भेल भेल अचेत अर्जुन,
उठल जखन शुरू कएल पूजन कुलदेवक ओ;,
पुष्प पहिराए शिवकेँ उठल गर छल ओऽ माला,
किरातक गरदनि मध्य, देखि साष्टांग कएल तहिखन।
किरात वेशधारी शिव कहल वर माँग अर्जुन,
पाशुपत अस्त्र माँगल छोड़ब रोकब सीखल पुनि।
शिव कहल बुझू मुदा ई तथ्य अछि जे,
मनुष्यक ऊपर एकर प्रयोग कखनहु करब नञि।

तखन अर्जुन निकलि गेल इन्द्रलोक दिशामे,
पाबि दिव्य अस्त्रक शिक्षा मारल असुर ओहिसँ।
एक दिनुक गप उर्वशा आयलि करैत याचना प्रेमक,
अर्जुन कहल अहाँ तँ छी अप्सरा गुरु इन्द्रक।
माता तुल्य भेलहुँ ओहि संबंधसँ अहाँ हमर,
आयल छी हम एतय शिक्षा प्राप्तिक लेल शस्त्रक,
तपस्या नृत्यक आऽ संगीतक करए भोग नहि,
ताहि दृष्टिये अहाँ भेलहुँ हमर माता गुरु दुनु।

उर्वशी तखन देलक ओकरा शाप ई टा,
कामिनीक अहाँ शाप सुनू निर्वीर्य रहब अहाँ,
वर्ष भरि मुदा किएक तँ कहल माता,
शाप ई पुनि बनत वरदान नुकि सकब अहाँ।

पाण्डव जन सेहो पाबि रहल ऋषि मुनिसँ शिक्षा,
समाचार देलन्हि नारद अर्जुनक कहल आएत,
लोमश ऋषि आबि समाचार अर्जुनक सुनाएत।
किछु दिनमे लोमश ऋषि अएलाह ओतए,
कहल प्राप्त कए पाशुपत शिवसँ कैलासमे,
अर्जुन देवलोकमे प्राप्त दिव्याशस्त्र कएल,
नृत्य संगीतक शिक्षा अप्सरा गंधर्वगणसँ
लए रहल शिक्षा अर्जुन देवलोकमे सनजमसँ।

तखन ऋषि तीर्थाटन कराऊ हमरा लोकनिकेँ,
लोमश तखन गेलाह नैमिषारण्य पाण्डव संग।
प्रयाग गया गंगासागर पुनि टपि कलिंग पहुँचल,
पच्छिम दिशि प्रभासतीर्थ यादवगण जतए छल।
स्वागत भेल ओतए सुभद्रा मिललि द्रौपदीसँ,
बलराम कृष्णक सांत्वना पाबि बढ़ल आगाँ,
सरस्वती पार कए कश्मीर आऽ गंधमादन पर्वत,
पार कए चढ़ल पर्वत एक वर्षा आऽ शिलापतन बिच।
पहुँचि गेलाह बदरिकाश्रम विश्राम कएल ठहरि।
ओतहि दुःशला पति जयद्रथ काम्यक वनसँ,
छल जाऽ रहल देखल द्रौपदीकेँ असगर ओतए,
पाण्डवगण गेल छल शिकारक लेल तखन।
बैसल कुटीमे विवाह प्रस्ताव देल द्रौपदीकेँ,
नीचता देखि द्रौपदी कठोर वचन जखन कहल,
रथमे लए भागल अपहरण कए दुष्ट जयद्रथ।
आश्रम आबि पाबि समाचार भीम ओकरा पर छुटल,
तखनहि अर्जुन सेहो आएल पाछू जयद्रथक गेल,
युधिष्ठिर कहल प्राणदान देब पति दुःशलाक छी ओऽ,
जयद्रथ देखल अबैत दुनू भाएकेँ द्रौपदीकेँ छोड़ि भागल,
भीम पटकि बान्हि आनल ओकरा द्रौपदीक सोझाँ,
द्रौपदी अपमानित कए छोड़बाओल ओकरा।
शिवक तपस्या कएल जयद्रथ वरदान माँगल,
जितबाक पाँचू पाण्डवसँ कहल शिव ई,
नहि हारब अहाँ कोनो भाएसँ अर्जुनकेँ छोड़ि।
कर्ण छल तपस्या कए रहल अर्जुनकँ हरएबाले,
इन्द्र सोचल शरीरक कवच कुण्डल अछैत ओऽ,
हारत नहि ककरहुसँ दानवीर पराक्रमी ओऽ छल।
सोचि ओकरासँ हम माँगब कवच कुण्डल,
देखि ई सूर्य कएलन्हि होऊ सचेत अर्जुन,
आबि रहल इन्द्र छद्म वेषमे याचना करत ई,
कवच कुण्डल छोड़ि किछु माँगत नहि ओऽ।
कहल कर्ण याचककेँ हम नहि नञि कहब प्रण,
प्रण हमर नहि टूटत चाहे जे परिणाम होमए।
तखनहि विप्र वेशमे इन्द्र आबि दुहु वस्तु माँगल,
ठोढ़ पर मर्मक मुस्की कर्णक हाथ शस्त्र आयल,
काटि देहसँ कवच कुण्डल समर्पित कएल तखनहि,
इन्द्र देल वर माँगू छोड़ि ई वज्र हमर आर किछुओ,
अमोघ शक्त्ति माँगल कर्ण इन्द्र देलन्हि कहि कए,
मारत जकरा पर चलत पुनि घुरत लग हमर आयत।

शनैः-शनैः छल बीति रहल बारह वर्ष एहिना,
एक वर्षक अज्ञातवासक विषयमे विचारि रहल,
विचारि युधिष्ठिर रहल भाय आऽ द्रौपदीक संग,
तखने कनैत खिजैत एकटा विप्र आएल,
कहल अरणीक लकुड़ी छल कुटीक बाहर टाँगल,
हरिण एक आबि कुरयाबय लागल ओहिसँ,
जाए काल सिंहमे ओझरायल अरिणी ओकर,
विस्मित भागल ओऽ लए हमर लकुड़ी,
कोना कए होमक अग्नि आनब चिन्तित छी।
विप्रक संग पाँचो भाँय हरिणकेँ खेहारल,
मुदा छल ओऽ चपल भए गेल ओझल।
वरक गाछक नीचाँ ओऽ सभ लज्जित पियासल,
ठेहिआयल बैसल नकुल गेल सरोवर पानि आनए।
एकटा ध्वनि आएल ई चभच्चा हमर छी,
उत्तर हमर प्रश्नक बिनु देने पानि नञि भेटत ई।
नहि कान देल ओहि गप पर हकासल पियासल,
पानि जखने पिएल अरड़ा कए मृत ओऽ खसल।
सहदेवक संग सेहो एहने घटना घटल छल,
अर्जुन जखन आएल फेर वैह ध्वनि सुनल,
शब्दभेदी बाण छोड़ल मुदा नहि कोनो प्रतिफल,
पानि पीबैत देरी ओहो मृत भए खसल छल।
युधिष्ठिर भए चिन्तित भीमकेँ पठाओल ताकए,
पानि पीबि मृत भए नहि घुरल ओतए।
युधिष्ठिर जखन वन बीच सरोवर पहुँचल,
मृत भाए सभकेँ देखि व्याकुल पानिमे उतरल।
वैह ध्वनि आएल उत्तरक बिना प्यासल रहब,
होएत एहि तरहक परिणाम जौँ धृष्टता करब।
ई अछि कोनो यक्ष सोचि युधिष्ठिर बाजल,
पुछू प्रश्न उत्तर सम्यक देब शुरू भेल यक्ष।

मनुष्यक संग के अछि दैत? प्रथमतः ई बाजू,
धैर्य टा दैछ संग मनुक्खक सदिखन सोकाजू।
यशलाभक अछि कोन उपाय एकटा?
दान बिनु यश नहि भेटैछ कोनोटा।
वायुसँ त्वरित अछि कोन वस्तु?
मनक आगाँ वायुक गति नहि कतहु ।
प्रवासीक संगी अछि के एकेटा?
विद्याक इतर नहि संगी एकोटा।
ककरा त्यजि कए मनुक्खकेँ भेटैछ मुक्त्ति?
अहं छोड़ल तखन भेटत विमुक्त्ति।
कोन वस्तुक हराएलासँ नहि होइछ मन दुःखित?
क्रोधक हरएलासँ किए होयय क्यो शोकित।
कोन वस्तुक चोरिसँ होइछ मनुक्ख धनिक?
लोभक क्षति बनबैछ पुष्ट सबहिँ।
ब्राह्मण जन्म, विद्या, शील कोन गप पर अवलम्बित?
शील स्वभाव बिनु ब्राह्मण रहत नहि किछु।
धर्मसँ बढ़ि अछि की जगतमे?
उदार मनसि उच्च पदस्थ सभसँ।
कोन मित्र नहि होइत अछि पुरान?
सज्जनसँ कएल गेल मित्राताक कोना अवसान।
सभसँ पैघ अद्भुत की अछि एहि जगमे?
मृत्यु सभ दिनु देखनहु अछैतो जीवन लालसा,
एहिसँ बढ़ि अद्भुत आश्चर्य अछि की?
प्रसन्नचित्त भए यक्ष कहल युधिष्ठिर कहू,
कोनो एक भाएकेँ हम जीवित कए सकब।
तखन नकुलकेँ कए दिअ जीवित,
सुनि यक्ष पूछल कहब तँ भीम अर्जुन कोनोकेँ,
जीवित करब जकर रण कौशल करत रक्षा।
धर्मराज कहल धर्मक बिना नहि होइछ रक्षा,
कुन्ती पुत्र हम युधिष्ठिर जिबैत छी,
माद्री मातुक पुत्र जिबथु नकुल सैह उचित।
सुनि कहल हिरण वेशधारी यमराज हे पुत्र,
पक्षपात रहित छी अहाँ तेँ सभ भाए जीबथु।
पुत्रकेँ देखि मोन तृप्त भेलन्हि यमक,
पाण्डव गण तखन घुरि द्रौपदीक लग गेलाह।

४. विराट पर्व
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...