Monday, July 28, 2008

'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ ) ११. बालानां कृते-१.मूर्खाधिराज-गजेन्द्र ठाकुर/ २. देवीजी: पिंजराक पक्षी- ज्योति झा चौधरी

११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर
बालानां कृते
-गजेन्द्र ठाकुर
१.मूर्खाधिराज-गजेन्द्र ठाकुर
२. देवीजी: पिंजराक पक्षी- ज्योति झा चौधरी
१.मूर्खाधिराज

चित्र: ज्योति झा चौधरी
एकटा गोपालक छल। तकर एकटा बेटा छल। ओकर कनियाँ पुत्रक जन्मक समय मरि गेलीह। बा बच्चाक पालन कएलन्हि। मुदा ओऽ बच्चा छल महामूर्ख। जखन ओऽ बारह वर्षक भेल तखन ओकर विवाह भए गेल। मुदा ओऽ विवाहो बिसरि गेल।
बुढ़िया बाकेँ काज करएमे दिक्कत होइत छलन्हि। से ओऽ बुझा-सुझाकेँ ओकरा कनियाकेँ द्विरागमन करा कए अनबाक हेतु कहलन्हि। बा ओकरा गमछामे रस्ता लेल मुरही बान्हि देलन्हि। रस्तामे बच्चाकेँ भूख लगलैक। ओऽ गमछासँ मुरही निकालि कए जखने मुँहमे देबए चाहैत छल आकि मुरही उड़ि जाइत छल। बच्चा बाजए लागल- आऊ, आऊ उड़ि जाऊ।
लगमे बोनमे एकटा चिड़ीमार जाल पसारने छल, मुदा बच्चाक गप सुनि कए ओकरा बड्ड तामस उठलैक। ओकरा लगलैक जेना ई बच्चा ओकर चिड़ैकेँ उड़ाबए चाहैत अछि। चिड़ीमार बच्चाकेँ पकड़ि कए पुष्ट पिटान पिटलक। बच्चा पुछलक- हमर दोख तँ कहू? चिड़ीमार कहलक- एना नहि। एना बाजू। आबि जो। फँसि जो।
आब बच्चा सैह बजैत आगू जाए लागल। आब साँझ भए रहल छल। बोन खतम होएबला छल। ओतए चोर सभ चोरिक योजना बनाए रहल छलाह। ओऽ सभ सुनलन्हि जे ई बच्चा हमरा सभकेँ पकड़ाबए चाहैत अछि। से ओऽ लोकनि सेहो ओकरा पुष्ट पिटान पिटलन्हि। बच्चा फेर पुछलक- हम बाजी तँ की बाजी? चोरक सरदार कहलक- बाज जे एहन सभ घरमे होए।
आब बच्चा यैह कहैत आगाँ बढ़ए लागल। आब श्मसानभूमि आबि गेल। एकटा जमीन्दारक एकेटा बेटा छलैक। से मरि गेल छल आऽ सभ ओकरा डाहबाक लेल आबि रहल छलाह। ओऽ लोकनि बच्चाक गप पर बड़ कुपित भेलाह आऽ ओकरा पुष्ट पिटलन्हि। फेर जखन बच्चा पुछलक जे की बाजब उचित होएत तँ सभ गोटे कहलखिन्ह जे एना बाजू- एहन कोनो घरमे नहि होए। बच्चा यैह गप बाजए लागल। आब नगर आबि गेल छल आऽ राजाक बेटाक विवाहक बाजा-बत्ती सभ भए रहल छल। बरियाती लोकनि बच्चाकेँ कहैत सुनलन्हि जे एहन कोनो घरमे नहो होए तँ ओऽ लोकनि क्रोधित भए फेर ओहि बच्चाकेँ पिटपिटा देलखिन्ह। जखन बच्चा पुछलक जे की बजबाक चाही तँ सभ कहलकन्हि जे किछु नहि बाजू। मुँह बन्न राखू।
बच्चा सासुर आबि गेल। ओतए नहिये किछु बाजल नहिये किछु खएलक, कारण खएबामे मुँह खोलए पड़ितैक। भोरे सकाले सासुर बला सभ अपन बेटीकेँ ओहि बच्चाक संग बिदा कए देलन्हि। रस्तामे बड्ड प्रखर रौद छलैक। ओऽ सुस्ताए लागल। मुदा कलममे सेहो बड्ड गुमार छलैक। कनियाकेँ बड्ड घाम खसए लगलैक आऽ ताहिसँ ओकर सिन्दूर धोखरि गेलैक। बच्चाकेँ भेलैक जे सासुर बला ओकरासँ छल कएलक आऽ ओकरा भँगलाहा कपार बला कनियाँ दए जाइ गेल अछि। एहन कनियाँकेँ गाम पर लए जाय ओऽ की करत। ओऽ तखने एकटा हजामकेँ बकरी चरबैत देखलक। ओकरासँ अपन पेटक बात कहबाक लेल अपन मुँह खोललक आऽ सभटा कहि गेल। हजाम बुझि गेल जे ई बच्चा मूर्खाधिराज अछि। ओऽ ओकरा अपन दूध दए बाली बकड़ीक संग कनियाँक बदलेन करबाक हेतु कहलक। बच्चा सहर्ष तैयार भए गेल। आगू ओऽ बच्चा सुस्ताए लागल आऽ खुट्टीसँ बकड़ीकेँ बान्हि देलक। बकड़ी पाउज करए लागल तँ बच्चाकेँ भेलैक जे बकड़ी ओकर मुँह दूसि रहल अछि। ओऽ ओकरा हाट लए गेल आऽ कदीमाक संग ओकरो बदलेन कए लेलक। गाम पर जखन ओऽ पहुँचल तँ ओकर बा बड्ड प्रसन्न भेलीह। हुनका भेलन्हि जे कनियाँक नैहरसँ सनेसमे कदीमा आएल अछि। मुदा कनियाँकेँ नहि देखि तकर जिगेसा कएलन्हि तँ बच्चा सभटा खिस्सा सुना देलकन्हि। ओऽ माथ पीटि लेलन्हि। मुदा बच्चा ई कहैत खेलाए चलि गेल जे कदीमाक तरकारी बना कए राखू।
२. देवीजी: पिंजराक पक्षी



चित्र: ज्योति झा चौधरी

एकटा शिक्षिका छलीह, जिनका गाम पर सभ देवी जी कहैत छलन्हि। हुनकासॅं सभ विद्यार्थी डेराइतो छल, मुदा सम्मान सेहो करैत छल। एक दिन ओऽ एकटा कक्षामे गेलीह तँ हुनका एकटा छात्र पिंजरामे बंद एकटा सुग्गा देलकन्हि, जकरा 'देवी जी’ बजनाइ सिखा देल गेल छल । ओकरा बजैत सुनि सभ छात्र प्रसन्न भऽ हॅंसऽ लागल। देवीजी ओकरा तत्काल स्वीकार कऽ पढाबऽ मे लागि गेलीह । बादमे ओऽ ओहि बालकसँ पुछलखिन्ह जे '' जौं अहाँकेँ क्यो अपन शौक पूरा करऽ लेल सभसँ अलग कऽ छोट जगह पर बान्हि कऽ राखए तँ केहन लागत। हमरा एहि भेँटसँ कोनो खुशी नहि भेल”। बालककेँ अपन गलतीक अनुभव तुरत भऽ गेलैक। ओऽ तुरत ओहि पक्षीकेँ पिंजरासॅं मुक्त कऽ देलक।
अगिला दिन देवी जी सभकेँ पक्षी देखबाक अलग तरीका सिखेलखिन्ह। पाठशालाक प्रांगणक एकान्त स्थान पर एकटा पुरान टेबुल राखि देलखिन्ह। ताहि पर मकई, चाउर, गहुम, अंकुरैल चना, रोटीक टुकड़ा, कटोरीमे पानि आदि राखि देलखिन्ह। सभ क्यो दूर बैसि कऽ प्रतीक्षा करऽ लगलैथ। कनिके देरीमे तरह-तरहक पक्षी ओतए हलचल करय लागल। ई दृष्य सभक लेल ओहि पिंजरामे पक्षी देखबासँ बेसी सुखद छलैक। तखन देवीजी कहलखिन्ह ''असली खुशी दोसराक खुश करबामे छैक। अपन स्वार्थ मात्र लेल दोसराकेँ कष्ट देनाइ पाप कहाइत छैक। सभ बच्चा शपथ लेलक जे आब कोनो पक्षीकेँ पिंजरामे बन्द नहि करत।
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बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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