Sunday, July 27, 2008

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० ७. संस्कृत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर

७. संस्कृत शिक्षा
(आँगा)
-गजेन्द्र ठाकुर
काचित् वृद्धा आसीत्। तस्याः चत्वारः पुत्राः आसन्। ते पुत्राः अतीव सूराः आसन्। माता वृद्धा सर्वदा अपि तान् मातृभूमेः विशये कथाः श्रावयति स्म। अतः ते सर्वे अपि राष्ट्र विषये, अस्माकम् देश विषये बहु श्रद्धालवः आसन्। एकदा देशस्य उपरि शत्रूणाम् आक्रमणं भवति। तदा सर्वस्मिन् गृहे अपि एकैकः युद्धार्थं गच्छति। तदा वृद्धा माता प्रथम् पुत्रम् आह्वयति। तिलकं धारयति- भवान् युद्धार्थं गच्छतु- इति वदति। अनन्तरं प्रथमः पुत्रः युद्धार्थं गच्छति- तत्र शौर्येन युद्धं करोति, किन्तु वीर स्वर्गं प्राप्नोति। तदा एषा वृद्धा माता प्रथमः पुत्रः मृतः- इति वार्त्तां श्रुणोति। वृद्धा माता द्वितीय पुत्रं आह्वयति- तमपि युद्धार्थं प्रेषयति। सः अपि शौर्येन् युद्धं करोति। सः अपि वीर स्वर्गं प्राप्नोति। तदा वृद्धा माता तृतीय पुत्रं आह्वयति। तृतीय पुत्रम् आलिङ्गति-प्रीत्या वदति। पुत्र, भवान् अपि युद्धार्थं गच्छतु। देशस्य रक्षनं करोतु। अस्माकं देशस्य कर्त्तव्यं अस्ति, अतः भवान् गच्छतु- इति वदति। तृतीयः पुत्रम् अपि युद्धार्थं गच्छति। वीरं स्वर्गं प्राप्नोति। तृतीयः पुत्रः अपि युद्धार्थं गतवान्। तत्राभि कर्मयुद्धं प्रवृत्तम्। किंचित् दिनानन्तरं वार्त्ता आगता- तृतीयः पुत्रः अपि मृतः। तदा ग्रामस्ताः सर्वे अपि वृद्धायाः समीपम् आगतवन्तः। ते सर्वे वृद्धाम् उक्त्तवन्तः- मातः- भवत्याः तृतीयः पुत्रः अपि रणरंगे मृतः अस्ति। भवत्याः अंतिम समये सः भवत्याः रक्षणार्थं भवत्याः कर्त्तव्यपालनार्थम् आवश्यकम् अस्ति। अतः भवती चतुर्थं पुत्रं मा प्रेषयतु। तदा वृद्धा माता तेषां वचनं न श्रुणोति। वृद्धा माता चतुर्थं पुत्रम् आह्वयति। वीर तिलकं धारयति- वदति अपि। पुत्रः भवान् गच्छतु- विजयं प्राप्यम् आगच्छतु। अस्माकं देशस्य रक्षनम् अस्माकं कर्त्तव्यम्। अतः भवान् गच्छतु। इति चतुर्थ पुत्रम् अपि प्रेषयति। एवं रणरंगेभि कर्मयुद्धं प्रवृत्तम्। अनन्तरं वार्त्ता आगच्छति- चतुर्थ पुत्रः अपि मृतः अस्ति। तदा मातुः नेत्रे अश्रुणि आगच्छति। तदा ग्रामस्य अधिकारी वृद्धायाः समीपम् आगच्छति। सः मातरं वदति- भोः मातः- वयं पूर्वमेव उक्त्तवन्तः- भवती चतुर्थं पुत्रं न प्रेषयेतु। परन्तु भवती न श्रुतवती। चतुर्थम् अपि पुत्रं प्रेषितवती। वयम् इदानीं किम् कुर्मः। भवती इदानीं रोदनं करोति चेत्- किम् प्रयोजनम्- इति पृच्छति। तदा माता वदति- भो महाशया। मम् चतुर्थः पुत्रः मृतः इति रोदनं नास्ति। दुःखं नास्ति। मम् मातृभूमेः रक्षणम् अवश्यं करणीयम्- इति इच्छा भवति। किन्तु देशस्य रक्षणार्थं प्रेषयितुम् मम् पञ्चमः पुत्रः नास्ति खलु इति दुःखं भवति। एवम् अस्माकं देशस्य रक्षणाय कतिचन् मातरः शत् पुत्राणां बलिदानं कृतवत्याः- अतएव इदानीम् अपि अस्माकं देशः सुरक्षितः अस्ति।

सुभाषितम्

वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः।
षड् दोषाः पुरुषेणेह ह्यातव्या भूतिमिच्छिता।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्य दीर्घसूत्रता॥

वयम् इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। यः पुरुषः ऐश्वर्य्यम् इच्छति, समृद्धिम् इच्छति, अभिवृद्धिम् इच्छति, संपदाम् इच्छति, सः एतान् सर्वान् दोषान् दूरी क्रियात्। के के दोषाः। निद्रा- सर्वत्र निद्रा न करणीयम्। तंद्रा- सर्वदा निद्रावस्थायामेव भवति तथा न भवेत- तंद्रा न भवेत। भयम्- सर्वेषु विषयेषु भयं न भवेत्। क्रोधः/ कोपः- यत्र-यत्र आवश्यकता अस्ति, तत्र कोपः करनीयः- यत्र कोपस्य आवश्यकता नास्ति, तत्र क्रोधः न दर्शनीयः। आलस्यम्- वयं तु सर्वदा विद्यार्थिनः एव। जीवने सर्वस्मिन् क्षणे अपि वयं शिक्षणं प्राप्नुमः, अतः अस्माषु कदा आलस्यं न भवेत्। दीर्घसूत्रम्- कार्यम् अद्य करोमि न श्वः करोमि परश्वः करोमि परश्वः सायंकाले करोमि एवं विलम्बः न भवेत् अद्यतन् कार्यम् अद्य करोमि, इदानीमेव करोमि इति एवं भवेत्।

सम्भाषणम्

रामः प्रीतिम्/ लतां पृच्छति।
रामः काम् पृच्छति।

अहं विज्ञानं जानामि।
अहं गृहतः आगच्छामि।
अहं विदेशतः/ विद्यालयतः/ मार्गतः/ कार्यालयतः/ हिमालयतः/ वाटिकातः/ नदीतः/ मन्दिरतः/ पुष्पतः
अहं पेटिकातः उपनेत्रं स्वीकरोमि।
कूप्यां जलम् अस्ति।
अहं कूपीतः जलं स्वीकरोमि।
अहं संचिकातः पत्रं स्वीकरोमि।
अहं शारदातः लेखनीम् स्वीकरोमि।
अहं गजेन्द्रतः करवस्त्रं स्वीकरोमि।
अहं कोषतः लेखनीं स्वीकरोमि।
अहं नदीतः जलम् आनयामि।
भवन्तः कुतः किम् आनयन्ति।
गङ्गा हिमालयतः प्रवहति।
गङ्गा कुतः प्रवहति।– प्रश्नं कुर्वन्।
रामः विद्यालयतः आगच्छति।
रामः कुतः आगच्छति।
अहं गच्छामि। अहम् आपणं गच्छामि।
आपणतः गृहं गच्छामि। गृहतः विद्यालयं गच्छामि। विद्यालयतः गृहम् आगच्छामि।
रमानन्दः कुतः कुत्र गच्छति।
रमानन्दः लखनऊ गच्छति। लखनऊतः अहमदाबादं गच्छति।
अहमदाबादतः बेङ्गलुरु गच्छति।
ज्ञानार्थं रामायणं पठामि।
अहं पाठनार्थं पठामि।
आनन्दार्थं नृत्यं करोमि।
आनन्दार्थं गीतं गायामि।
पठनार्थं ग्रंथालयं गच्छामि।
ओषधार्थम् औषधालयं गच्छामि।
अहम् उत्तरं वदामि।भवन्तः प्रश्नं वदन्तु।
राधाकृष्णः किमर्थं विद्यलयं गच्छति।
राधाकृष्णः पठनार्थं विद्यालयं गच्छति।
रामः ध्यानार्थं मंदिरं गच्छति।
रामः किमर्थं मंदिरं गच्छति।
रामः किमर्थं दूरदर्शनं पश्यति।
रामः आनन्दार्थं दूरदर्शनं पश्यति।
भोजनार्थम् उपहारमन्दिरं गच्छति।
रवीन्द्र उत्तिष्ठति। आदित्यः अपि उत्तिष्ठति।
रवीन्द्र उपविशति। आदित्यः अपि उपविशति।
शारदा लिखति। चित्रा अपि लिखति।
नाटकं पश्यति। चित्रम् अपि पश्यति।
अहं वाक्यद्वयम् अपि वदामि।
भवन्तः वदन्तु। वदन्तिवा।
अस्तु- अस्तु आगच्छामि।
अस्तु पिबामि।
विद्यां ददातु। तथास्तु। देवः किम् वदति।
देवः प्रत्यक्षः भवति। सः भवान्/ भवती पृच्छति।

पूर्वः- प्राची- इन्द्रः
दक्षिणः- अवाची- यमः
पश्चिमः-प्रतीची- वरुणः
उत्तरः-उदीची- कुबेरः
पूर्व-दक्षिण कोणः- आग्नेयकोणः-अग्निः
दक्षिण-पश्चिम कोणः- नैर्ऋत्यकोणः-नैऋत्य
पश्चिम-उत्तरकोणः- वायव्यकोणः- मरुतः
उत्तर-पूर्व कोणः- ईशानकोणः- ईशः शङ्करो

पद्य
सत्कार्यं प्रति रमणीयम्,
असत्य वचनं न वदनीयम्,
पापकर्म न करणीयम्,
क्रोधलोभ मम त्ययणीयम्।
विपत्तिकाले शत्रु आगता,
तत्र स्थापिता मम सहनीयम्,
पूर्णविजय मम करणीयम्,
सत्कार्यं प्रति रमणीयम्।


(अनुवर्तते)
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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