Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ ) ९. पाबनि संस्कार तीर्थ डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’पंचदेवोपासक भूमि मिथिला

९. पाबनि संस्कार तीर्थ
डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (1938- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि।
पंचदेवोपासक भूमि मिथिला
-डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’

हिमालयक पादप्रदेशमे गंगासँ उत्तर, कोशीसँ पश्चिम एवं गण्डकसँ पूर्वक भूभाग सांस्कृतिक मिथिलांचलक नामे ख्यात अछि। मिथिलांचलक ई सीमा लोकमान्य, शास्त्रसम्म्त ओऽ परम्परित अछि। सत्पथब्राह्मणक अंतःसाक्ष्यक अनुसारे आर्यलोकनिक एक पूर्वाभिमुखी शाखा विदेह माथवक नेतृत्वमे सदानीरा (गण्डक) पार कऽ एहि भूमिक अग्नि संस्कार कऽ बसिवास कएलनि, जे विदेहक नामे प्रतिष्ठित भेल। कालान्तरमे एकर विस्तार सुविदेह, पूर्व विदेह, ओऽ अपर विदेहक रूपेँ अभिज्ञात अछि। विदेहक ओऽ प्राथमिक स्थलक रूपमे पश्चिम चम्पारणक लौरियानन्दनगढ़क पहिचान सुनिश्चित भेल अछि। आजुक लौरियानन्दनगढ़ प्राचीन आर्य राजा लोकनि एवं बौद्धलोकनिक स्तूपाकार समाधिस्थल सभक संगम बनल अछि। कालक्रमे अहि इक्षवाकु आर्यवंशक निमि पुत्र मिथि मिथिलापुत्रक स्थापना कयलनि। प्राचीन बौद्धसाहित्यमे विदेहकेँ राष्ट्र (देश) ओऽ मिथिलाकेँ राजधानीनगर कहल गेल अछि। अर्थात् मिथिला विदेहक राजधानी छल। मुदा ओहि भव्य मिथिलापुरीक अभिज्ञान एखन धरि सुनिश्चित नहि भेल अछि। तथापि प्राचीन विदेहक सम्पूर्ण जनपदकेँ आइ मिथिलांचल कहल जाइछ।

ओऽ मिथिलांचलक भूमि महान अछि, जकर माथेपर तपस्वी हिमालयक सतत वरदहस्त हो, पादप्रदेशमे पुण्यतोया गंगा, पार्श्ववाहिनी अमृत कलश धारिणी गंडक ओऽ कलकल निनादिनी कौशिकीक धारसँ प्रक्षालित हो। एहि नदी मातृक जनपदकेँ पूर्व मध्यकालीन ऐतिहासिक परिवेशमे तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत कहल गेल, जकर सांस्कितिक मूलमे धर्म ओऽ दर्शनक गांभीर्य, कलासभक रागात्मक उत्कर्ष, ज्ञान-विज्ञानक गरिमा ओऽ भाषा-साहित्यक समृद्ध परम्पराक अंतः सलिला अंतर्प्रवाहित अछि। एहि सभक साक्षात् मिथिलाक शैव-शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, सौर (सूर्य) ओऽ बौद्ध-जैनक आस्था केन्द्र एवं ऋषि-मुनिक साधना परम्परामे उपलभ्य अछि। प्रकारान्तरसँ ओहि स्थल सभकेँ सांस्कृतिक चेतनाक ऐतिहासिक स्थलक संज्ञा देल जाऽ सकैछ, जकर आइ-काल्हि पर्यटनक दृष्टिसँ महत्व बढ़ि गेल अछि।
मिथिलाक प्रसिद्धि ओकर पाण्डित्य परम्परा, दार्शनिक-नैयायिक चिन्तन, साहित्य-संगीतक रागात्मक परिवेश, लोकचित्रक बहुआयामी विस्तार, धार्मिक आस्थाक स्थल, ऐतिहासिक धरोहर आदिक कारणे विशेष अनुशीलनीय अछि। जनक-याज्ञवल्क्य, कपिल, गौतम, कणाद, मंडन, उदयन, वाचस्पति, कुमारिल आदि सदृष विभूति, गार्गी, मैत्रेयी, भारती, लखिमा आदि सन आदर्श नारी चरित, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, विनयश्री, चन्दा झा, लाल दास आदि सन आलोकवाही साधक लोकनिक प्रसादे एहि ठामक जीवन-जगतमे आध्यात्मिक सुखानुभूति ओऽ सारस्वत चेतनादिक मणिकांचन संयोग देखना जाइछ। मिथिला आध्यात्म विद्याक केन्द्र मानल जाइछ।
आजुक मिथिलांचलक संस्कृति उत्तर बिहारमे अवस्थित वाल्मीकिनगर (भैँसालोटन, पश्चिम चम्पारण) सँ मंदार (बाँका, भागलपुर) धरि, चतरा-वाराह क्षेत्र (कोशी-अंचल, नेपाल) सँ जनकपुर-धनुषा (नेपाल) धरि ओऽ कटरा (चामुण्डा, मुजफ्फरपुर), वनगाँव-महिषी, जयमंगला (बेगूसराय), वारी-बसुदेवा (समस्तीपुर), कपिलेश्वर-कुशेश्वर-तिलकेश्वर (दरभंगा), अहियारी-अकौर-कोर्थु(मधुबनी), आमी(अम्बिकास्थान, सारण), हरिहरक्षेत्र (सोनपुर, सारण) वैशाली आदि धरि सूत्रबद्ध अछि। एहि सभ धार्मिक तीर्थस्थल सभक परिवेक्षणसँ प्रमाणित होइछ जे मिथिलांचल पंचदेवोपासक क्षेत्र अछि। कालान्तरमे एहिसँ बौद्ध ओऽ जैन स्थल सभ सेहो अंतर्मुक्त भऽ आलोच्य भूभागकेँ गौर्वान्वित कयलनि।

पंचदेवोपासक क्षेत्रक अर्थ भेल- गणेश, विष्णु, सूर्य, शिव ओऽ भगवतीक क्षेत्र। एहिमे सूर्य सर्वप्राचीन देव छथि एवं शिव सर्वप्राचीन ऐतिहासिक देवता छथि। विघ्नांतक गणेशक पूजन प्राथमिक रूपेँ कयल जाइछ एवं मातृपूजनक संदर्भमे भगवती अपन तीनू रूपमे लोकपूजित छथि अर्थात् दुर्गा, काली, महालक्ष्मी एवं सरस्वती। भगवती शक्तिक आदि श्रोत छथि, जनिकामे सृष्टि, पोषण ओऽ संहार (लय) तीनू शक्ति निहित अछि। मुदा लोकक लेल ओऽ कल्याणकारिणी छथि। धनदेवी लक्ष्मीक परिकल्पना वैष्णव धर्मक उत्कर्ष कालमे भेल छल एवं ओऽ विष्णुक सेविका (अनंतशायी विष्णु), विष्णुक शक्ति (लक्ष्मी नारायण) एवं देवाभिषिक्त (गजलक्ष्मी) भगवतीक रूपमे अपन स्वरूपक विस्तार कयलनि। ओना तँ लक्ष्मी ओऽ सरस्वतीकेँ विष्णुक पर्श्वदेवीक रूपमे परिकल्पना सर्वव्यापक अछि। लक्ष्मी ओऽ गणेशक पूजन सुख-समृद्धिक लेल कयल जाइछ। प्राचीन राजकीय स्थापत्यक सोहावटीमे प्रायः गणेश अथवा लक्ष्मीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि।

पंचदेवोपासना वस्तुतः धार्मिक सद्भावक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे एहि पाँचो देवी-देवताक स्वतंत्र विग्रह सेहो प्राप्त होइछ। भारतीय देवभावनाक विस्तारक मूलमे भगवती छथि, जे कतहु सप्तमातृकाक रूपमे पूजित छथि तँ कतहु दशमहाविद्याक रूपमे। सप्तमातृका वस्तुतः सात देवता सभक शक्ति छथि- ब्रह्माणी (ब्रह्मा), वैष्णवी (विष्णु), माहेश्वरी (महेश), इन्द्राणी (इन्द्र), कौमारी (कुमार कार्तिकेय), वाराही (विष्णु-वाराह) ओऽ चामुण्डा (शिव)। एहि सप्तमातृकाक अवधारणा दानव-संहारक लेल संयुक्त शक्तिक रूपमे कयल गेल छल, जे आइ धरि पिण्ड रूपेँ लोकपूजित छथि। मुदा एक फलक पर सप्तमातृकाक शिल्पांकनक आरम्भ कुषाणकालमे भऽ गेल छल। चामुण्डाकेँ छोड़ि सभटा देवी द्विभुजी छथि। सभक एक हाथमे अम्तकलश एवं दोसर अभयमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक लोकजीवनमे जनपदीय अवधारणाक अनुसार सप्त मातृकाक नामावली भिन्न अछि। मुदा बिढ्क्षिया माइ (ज्येष्ठा, आदिमाता, मातृब्रह्म) सभमे समान रूपेँ प्रतिष्ठित छथि। यद्य सप्तमातृकाक ऐतिहासिक प्रस्तर शिल्पांकन एहि भूभागसँ अप्राप्य अछि, मुदा दशमहाविद्याक ऐतिहासिक मूर्ति सभ भीठभगवानपुर (मधुबनी) एवं गढ़-बरुआरी (सहरसा)मे उपलभ्य अछि।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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