Sunday, July 27, 2008

विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8-PART I

विदेह ८म अंक १५ अप्रैल २००८ (वर्ष १ मास ४ अंक ८)



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सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary at http://www.videha.co.in/ विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे।
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions

१.'विदेह' पुरान अंकक आर्काइव VIDEHA ARCHIVE OF OLD ISSUES http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ ,
२.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ,
३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ ,
४. मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/
५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/
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VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/new_page_15.htm

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आऽ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आऽ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओऽ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओऽ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। http://www.videha.co.in/photo.htm
गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आऽ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आऽ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आऽ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'। http://www.videha.co.in/favorite.htm


मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" । http://www.videha.co.in/feedback.htm


महत्त्वपूर्ण सूचना: (1) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे अगिला अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित होयत।
महत्त्वपूर्ण सूचना: (2) मैथिलीक वरिष्ठ रचनाकार श्री गंगेश गुंजनजीक कविता अगिला अंकसँ (01 मई 2008) विदेहमे।
महत्त्वपूर्ण सूचना: (3) मैथिलीक वरिष्ठ कवि आ' नाटककार श्री उदयनारायण सिंह 'नचिकेता' जीक नाटक 'नो एंट्री :मा प्रविश' 15 अपैल 2008 सँ 'विदेह' ई पत्रिकामे धारावाहिक रूपमे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(4) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।१.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
महत्त्वपूर्ण सूचना:(5) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद - कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
महत्त्वपूर्ण सूचना (6): महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com
महत्त्वपूर्ण सूचना (7): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।

एहि अंकमे अछि:-15 अप्रैल 2008वर्ष 1 मास 4 अंक 8
1.मैथिली मंथन श्री गंगेश गुंजन
2.नो एंट्री: मा प्रविश श्री उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'
मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।सर्वप्रथम विदेहमे एकरा धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल जा रहल अछि।पढ़ू नाटकक प्रथम कल्लोलक पहिल खेप।
3. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आगाँ)
4. उपन्यास सहस्रबाढ़नि – गजेन्द्र ठाकुर (आगाँ)
5. महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ) 6. कथा(भैयारी बिसरब नहि )-गजेन्द्र ठाकुर
7. पद्य ज्योति झा चौधरीक पद्य आधुनिक जीवन-दर्शन
गजेन्द्र ठाकुर- मिथिलाक ध्वज गीत
8. संस्कृत शिक्षा(आँगा)-गजेन्द्र ठाकुर
9. मिथिला कला(आँगा)
10. संगीत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर 11. बालानां कृते- गजेन्द्र ठाकुर ज्योति पँजियार-लोकगाथा
12. पञ्जी प्रबंध –गजेन्द्र ठाकुर (आगाँ) पञ्जी-संग्राहक श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी )
13. संस्कृत मिथिला बच्चा झा(भाग-3)
-गजेन्द्र ठाकुर
14.मैथिली भाषापाक –गजेन्द्र ठाकुर 15. रचना लेखन-गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ)
16. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS . VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT...
17.मिथिला आ’ मैथिलीसँ संबंधित किछु मुख्य साइट18. मिथिला रत्न19.मिथिलाक खोज




विदेह (दिनांक 15 अपैल 2008)
संपादकीय
वर्ष: 1 मास: 4 अंक:8

मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक 8 दिनांक 15 अप्रैल 2008) ई पब्लिश भ’ रहल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
एहि अंकमे नचिकेता अपन 25 सालक चुप्पी तोड़ि नो एंट्री: मा प्रविश नाटक मैथिलीक पाठकक समक्ष विदेह ई-पत्रिकाक माध्यमसँ पहुँचा रहल छथि।धारावाहिक रूँपे ई नाटक विदेहमे ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
श्री गंगेश गुंजन जीक वैचारिक मंथन एहि बेर पाठकक समक्ष अछि। अगिला अंकसँ पाठक हुनकर कविताक वैचारिक रस ल’ सकताह।बालानां कृतेमे ज्योति पँजियारक लोकगाथा प्रस्तुत कएल गेल अछि। हमर कथा ‘भैयारी बिसरब नहि’ नव पीढ़ीक विजयक प्रति लगावकेँ दर्शा रहल अछि।शेष सभ स्तंभ वर्त्तमान अछि।
मिथिलाक रत्न स्तंभकेँ नाम आ' वर्षसँ जतय तक संभव भ' सकल विभूषित कएल गेल अछि। एकर परिवर्द्धनक हेतु सुझाव आमंत्रित अछि।
अपनेक रचना आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि।
गजेन्द्र ठाकुर 15 अप्रैल 2008
389,पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-110070.
फैक्स:011-41771725
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(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल।

1.मैथिली मंथन
श्री गंगेश गुंजन(1942- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।

मैथिलीक उर्वर क्षेत्रमे कॉरपोरेट-जगत धाप
एम्हर आब मैथिलीकेँ ई अष्टम सूचीक मान्यता एकटा आओर नव वादक उपहार-दरभंगा-मधुबनी-सहरसा वादक उपहार बनि रहलए। नव बाजारी प्रवृत्तिक ई प्रच्छन्न बीज-वपन आरम्भ भ’ चुकल अछि। सावधान। जे वर्ग एहि नव प्रयोजन-सिद्धिक बाट पर चलि आ’ चला रहलाह अछि, तनिकासँ संवाद होयबाक चाही। एखनहि-एही काल। अन्यथा मैथिलीक जतेक आ’ जेहन हानि आइ धरि नहि भेल छलैक, ताहिसँ बहुत बेशी आ’ खतरनाक नोकसान भ’ जयतैक। देशमे प्रचलित तुच्छतावादी प्रवृत्तिक विरुद्ध रखबारी कर’ पड़त। पूरवाग्रह मुक्त्त मन-प्राणसँ। अपना-अप्नी क’ क’ सुतारबाक, हथिययबाक अवसरवादी प्रवृत्तिसँ बाज अबै जाथि।
मैथिलीक विषयकेँ समग्रतामे -देखि-बूझि क’- जाहिमे सम्पूर्ण मिथिला, मैथिल आ’ मैथिली अछि। छुछे दरभंगा-सहरसा-मधुबनी –ए टा नहि। आ’ ने छुच्छे सोति-ब्राह्मण-ब्राह्म्णेतर मैथिली भाषा-संस्कृति। तहिना साहित्य कथा कि कविता कि उपन्यास कि नाटके टा नहि। ई सभटा समस्त मिथिलांचलक एक जातीय सांस्कृतिक समग्रता तथा लोक गरिमाक, मानवीय गुणवत्ता, जीवनमूल्यक दबाबमे करैत रचनाकर-विचारकक संघर्ष आ’ आदर्शोन्मुख अभिव्यक्त्तिमे समस्त युग-यथार्थ बनैत अछि।
ओना अपना-अपना पीढ़ीक प्रति आग्रह-आवेश स्वाभाविक, तेँ सभ दिना यथार्थ। मुदा वैह यदि कट्टरताक रूप ल’ लिअय तँ सामाजिक जहर बनि जाइछ। दुःखद आ’ चिन्तक विषय तँ ई जे एहन प्रवृत्ति मैथिली भाषा आ’ साहित्यमे सृजनरत अधिकांश नव्यतम रचनाकारमे पर्यंत देखाइ पड़’ लागलए। जनिकर लेखनसँ मैथिलीकेँ बड़-बड़ आशा छैक। से लोक सेहो।ई दुश्चिन्तेक विषय। एहन विभाजनकारी, विद्वेषोन्मुखी डेगकेँ रोकबाक चेतना जगाउ। आरम्भेमे-एखने।
एहन वेगमे संस्थामूल्य सभक क्षय होयबामे समकालीन लोकक नकारात्मक पहल केर मुख्य भूमिका रहैत आयल छैक। आइ तँ आर। संस्था समेत साहित्यक आकलन-मूल्यांकनसँ ल’ साहित्य-सम्मान धरिक मानदण्ड-निकष-कसौटीक निष्पक्षता आ’ ईमानदारी पर प्रश्न उठि रहल अछि। संस्था मूल्य सभक क्षरण आ’ कठघरामे ठाढ़ कएल जयबाक घटना सभकेँ, हल्लुक क’ नहि, बहुत गंभीरता आ’ जिम्मेदारीसँ स्वीकार करबाक एखनहि अछि- बेर छैक। नहि तँ पछताय लेल तँ सौँसे भविष्य धएल अछि। एहि परिस्थिति तथा एकर खतरनाक प्रवृत्ति पर लोकक ध्यान जयबाक चाही, जे कोना एन.आर.आइ. प्रकारक लोक सभ आइ एक-बएक अचानक मैथिलीक भाषा-सांस्कृतिक आँगनकेँ सेहो कब्जा क’ रहल छथि। तेहन देशी एन.आर.आइ प्रकारक लोककेँ अवश्य चिन्हित कयल जयबाक चाही जे मिथिलांचल-मैथिली भाषा आ’ लोकक प्रसँग कहियो किछु नहि कयलनि। कोनो योगदान नहि। परन्तु आइ मैथिलीक ओहू क्षेत्रक अवसर आ’ संस्थाकेँ अपने अधीन क’ लेबाक प्रबंधमे सक्रिय, लगातार सफल भ’ रहल छथि। विडंबना तँ ई जे मैथिली-मिथिलांचलक विरुद्ध एहि गतिविधिमे बहुत रास तथाकथित मैथिलीक उच्चकोटिक लेखक-समालोचक-कवि ( छद्म प्रातिशील रचनाकार समेत) सेहो कोनो आपत्ति वा विरोध दर्ज नहि क’ रहल छथि। बल्कि मैथिलीक एहि नवोदयक-साम्राज्यवादक परोक्ष सहयोगे क’ रहल छथि। सँभव जे भविष्यमे अपना लेल कोनो उत्पादक अवसरक वास्ते निवेश बुद्धिसँ, ई सभ क’ रहल होथि, एकरे व्यावहारिक बाट मानि क’ चुप बनल छथि। युवा पीढ़ीक सेहो। के पड़य एहि सभमे?
अद्यावधि प्राप्त इतिहासक जानकारीमे तत्काल यश-धनक अति-उताहुल , व्यग्र नव पीढ़ी! ई पराभव बजार आ’ भूमंडलीकरण (प्रायः!) मिथिलांचलक एहि नव गणित आ’ समाजशास्त्रकेँ की चीन्हओ? जा रहल लोक चीन्हओ कि आबि रहल लोक? ककर दायित्व।
हमरा जनैत अवसर आ’ दूरगामी प्रभाव परिणतिकेँ दृष्टिमे राखि क’, छुच्छे बौद्धिकताक, बुद्धिजीविताक संकीर्णताक नहि, सबजन मैथिल अर्थात् जनसाधारणक मंगलकेँ नजरि पर राखि, स्वच्छ हृदय, पारदर्शी व्य्वहारवादक चलन अनै जाउ। यदि सत्ये मैथिली, मिथिलासँ अनुराग हो। पारम्परिक मैथिल कूटिचालि चोड़ै जाइ जाउ। अंततः मैथिली अपना सभक एकहि टा नाओ अछि। सभ गोटय एही नाओमे सवार छी। पार उतरब तँ सभ क्यो। तेँ नाओमे भूर नहि हो। बीचहिमे डूबय ने कतहु। अन्हारोमे अनका टाटक भूर देखबाक आँखि आ’ नेत बदल’ पड़तैक।(अन्हारोमे अनका टाटक भूर देखबाक बिम्ब पूर्णियाक कवि- प्रशान्तजीक मन पड़ि गेलय ‘सद्य मैथिल छी’) जे ओ’ आकश्ववाणी पटनाक मैथिली कार्यक्रम भारतीमे प्रसारित कयने रहथि)।
नकारात्मक-ध्वंसात्मक समझ आ’ बुद्धिसँ परहेज करए जाइ जे क्यो से क’ रह्ल होइ। चन्द्रमा पर नव प्रभुवर्गक प्लॉट-रजिस्ट्री जेकाँ सद्याः उपलब्ध मैथिलीक एहन ऐतिहासिक अवसरक उपयोग सोचै जाउ-उपभोग नहि। दरभंगा बनाम सहरसा बना क’ मैथिलीक क्षेत्रीय रजिस्ट्री जुनि करबै जाउ। मनै छी, कहियो छल हेतै ई मनवाद। मुदा से मैथिलीक नितांत दोसर दौर छलैक। से ध्यान रखबाक थिक।
ई(वि)काल प्रायः सभ भाषा-साहित्यक इतिहासमे अबैत रहलैए। साहित्यिक सरोकार समाजसँ रहैत छैक, तथा समाज जीवन-यापन समेत जीवन-शैली आ’ जीवन मूल्यक निर्मिति आ’ निर्वहन तत्कालीन सत्ताक उपज होइत अछि। तेँ जन साधारणे लोकटा नहि, बुद्धिजीवी आ’ नेतृवर्ग सेहो ताही दबाबमे अपन प्राथमिकता तय क’ क’ अपन बाट बनबैत अछि आ’ सुभीता चह’ लगैत अछि। कालांतरमे जल्दीये तकर अभ्यस्त भ’ जाइत अछि। मध्यम वर्ग बेशी आ’ जल्दी।
ई सुविधावादी जीवन-शैली आ’ जीवनदर्शन जन्मैत छैक- कहियो धर्म-सत्ता, कहियो राज-सत्ता, कहियो विकलांग लोकतंत्र वा कहियो अपरिपक्व लोक सत्ताक विचार-व्यवहारक संवेदनशील व्यवस्था शासनक अधीनतामे। बहुसंख्यक जनताक अशिक्षा दुआरे। तखन ओहि समयक जे बुधियार वर्ग रहैत अछि से सत्ताक अनुगमन करबाक सुभीतगर निष्कंटक बाट चुनैये। सुभीताकेँ अपन जीवन-मूल्य बना लैत अछि। जे बुधियार नहि अर्थात् जनसाधारण लोक, ताहि परिस्थितिकेँ अपन नियति वा प्रारब्ध मानि लैत अछि। एना अगिला कएक पीढ़ी धरि एहिना ओंघड़ाइत चलैत चलि जाइत छैक।
गुलामी खाली कोनो बाहरीये देश वा सम्राट-साम्राज्येक टा नहि होइत अछि। गतानुगतिकता आ’ यथास्थितिवादी मानसिकता आ’ युगक प्रगति-गतिकेँ नहि बूझि, मूड़ी निहुँरैने सभ किछु स्वीकार आ’ सहैत चलि जाइक प्रवृत्ति सेहो गुलामियेक थिक। सत्ता तुष्ट लोकक ताबेदारी सेहो नव भाँग-गाँजाक अभ्यास अर्थात् गुलामिये होइत अछि। से ई सभ प्रकारक गुलामी बहुत युग धरि चलैत रहि जाइत छैक- अगिला कोनो सामाजिक परिवर्त्तन- कोनो महाक्रांति अयबा धरि। एखन धरिक इतिहासक शिक्षा तँ यैह कहैत अछि।
उर्वर क्षेत्रक आविष्कारक बाद बजार ओकरा हथियबैत छैक। तेहन लोक से क’ नहि गुजरय। निजी सम्पत्ति ने बना लिअय। एकर रजिस्ट्री-केबाला ने करबा ने करबा लिअय। मैथिलीकेँ मसोमातक जमीन जेकाँ अपना-अपना नामे लिखबाक व्योंतमे लागल तेहन लोक से क’ नहि लिअय।
एहि प्रक्रियामे माफियो –घुसपैठियो सभक गतिविधि अचानक तेज भ’ जाइत छैक। कहबाक प्र्योजन नहि जे मैथिली एखन सैह उर्वर क्षेत्र बनल अछि। मैथिली माफियाक कॉरपोरेट सेक्टर जोशमे अछि। गतिविधि तेज केने अछि।
मैथिलीक विषयकेँ समग्रतामे -देखि-बूझि क’- जाहिमे सम्पूर्ण मिथिला, मैथिल आ’ मैथिली अछि। छुच्छे दरभंगा-सहरसा-मधुबनी-ए टा नहि। आ’ ने छुच्छे सोति-ब्राह्मण-ब्राह्मणेतर मैथिली भाषा, संस्कृति। तहिना साहित्य कथा कि कविता कि उपन्यास कि नाटके नहि। ई सभटा समस्त मिथिलांचलक एक जातीय सांस्कृतिक समग्रता तथा लोक गरिमा, मानवीय गुणवत्ता, जीवनमूल्यक दबाबमे करैत रचनाकार-विचारकक संघर्ष आ’ तकरे आदर्शोन्मुख अभिव्यक्त्तिमे युग-यथार्थ बनैत अछि। सद्यः उपलब्ध मैथिलीक एहन ऐतिहासिक अवसरक उपयोग सोचै जाइ- उपभोग नहि। दरभंगा बनाम सहरसा बना क’ मैथिलीक रजिस्ट्री-बन्दोबस्त नहि करबै जाइ जाय।

॥ किछु एहनो बात विषय॥

यद्यपि एहि बात –‘सगर राति दीप जरय’ पर हम सिद्धांततः प्रभासजीसँ सहमत नहि रहलौँ, परन्तु एम्हर पछिला दशकमे ई तिमाही-कथा गोष्ठी- ‘सगर राति दीप जरय’- आजुक मैथिली कथा-विधामे की योगदान कएलक अछि, से तथ्य आब इतिहासमे दर्ज अछि। ई बात सही छैक जे एहन कोनो कार्य कोनो एक गोटेक नहि होइछ। मुदा सभ वर्त्तमानकेँ ओहि एक संस्थापना-कल्पक व्यक्त्ति-लेखककेँ अवसरोचित रूपेँ कृतज्ञतासँ स्मरण अवश्य कयल जयबाक चाही। से लेखकीय नैतिकता थिक। आ’ हमरा जनतबे, से रहथि- स्व. प्रभास कुमार चौधरी।
हमरा तखन दुखद निराशा भेल जखन एहि बेरक मैथिली साहित्य अकादेमी पुरस्कार पओनिहार प्रदीप बिहारीजी साहित्य अकादेमी-सभागारमे लेखक-सम्मिलन-अवसर पर अपना वक्तव्यमे सगर राति दीप्प जरयक उपलब्धिक चर्चा तँ कएलन्हि, मुदा स्व. प्रभास जीक नामोल्लेखो नहि कयलखिन। एकरा हम साधारण घटना नहि मानि सकैत छी। गंभीर बात बुझैत छी। कारण हमरा लोकनि रचनाकार छी। औसत कोटिक कोनो राजनीतिक नहि। संभव हो नाम अनावधानतामे छूटि गेल होनि। मुदा हमरा सभ लेखक छी तेँ एहन असावधानी करबा लेल स्वाधीन नहि छी। यद्यपि अपन खेद हम हुनका प्रकट कयलियनि।
हमरा लगैये जे अपन-अपन सकारात्मक इतिहासक प्रति सभ पीढ़ीक मनमे कृतज्ञताक भाव अंततः लेखकक ऊर्जा आ’ प्रेरणे बनैत रहैत छैक। बतौर कवि हम मैथिलीमे जाहि काल-बिन्दु पर ठाढ छी, तकर जड़ि विद्यापतिसँ ल’ सुमन-किरण-मधुप- आ यात्रीएमे। ई सोचि क’ मन कृतज्ञ होइत अछि! बल्कि गौरांवित। ओना, एकटा लेखक रूपमे हम एहिमे सँ क्यो नहि छी। जेना सभ, सभक कारयित्री प्रस्थान छथि, तहिना हमहुँ नागार्जुन-यात्रीक कारयात्री प्रस्थान छी। आ’ ई भाव हमरा रचनाकर्ममे अग्रसर करबाक उत्तरदायित्व द’ गेलय।
तर्पण तिल-कुश –अंजलि बला कर्मकाण्डकेँ तँ हम नहि मानैत छी, मुदा पुरखाक तर्पण हमरा प्रिय अछि। अपना शैलीमे। अपन जीवन-मूल्यक एकटा अभिन्न तत्त्व बुझाइत अछि।
तकर बाट की हो? अवसर पर कृतज्ञ स्मृति! अवसर पर- तिथि पर नहि।

2. नाटक

श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-1951 ई. कलकत्तामे।1966 मे 15 वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’ | 1971 ‘अमृतस्य पुत्राः’(कविता संकलन) आ’ ‘नायकक नाम जीवन’(नाटक)| 1974 मे ‘एक छल राजा’/’नाटकक लेल’(नाटक)। 1976-77 ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। 1978मे जनक आ’ अन्य एकांकी। 1981 ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। 1988 ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। 1997-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। 1998 ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। 1999 ‘अश्रु ओ परिहास’। 2002 ‘खाम खेयाली’। 2006मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आ’ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। 14 टा पी.एह.डी. आ’ 29 टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आ’ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर।
नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि-अंकीय मैथिली नाटक)
नाटककार
उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’
निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर
(मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।)
पहिल अंक जारी....विदेहक एहि आठम अंक 15 अप्रैल 2008 सँ|
नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि-अंकीय मैथिली नाटक)
पात्र–परिचय
पर्दा उठितहि –
ढोल–पिपही, बाजा–गाजा बजौनिहार–सब
दूटा चोर, जाहि मे सँ एक गोटे पॉकिट–मार आ
एकटा उचक्का
दू गोट भद्र व्यक्ति
प्रेमी
प्रेमिका
बाजार सँ घुरैत प्रौढ़ व्यक्ति
बीमा कंपनीक एजेंट
रद्दी किनै–बेचैबला
भिख-मंगनी
रमणी-मोहन
नंदी–भृंगी
कैकटा मृत सैनिक

बाद मे
नेता आ नेताक एक-दूटा चमचा/अनुयायी
अभिनेता
वाम-पंथी युवा
उच्च–वंशीय महिला

अंत मे
यम
चित्रगुप्त



प्रथम कल्लोल

[एकटा बड़का–टा दरबज्जा मंचक बीच मे देखल जाइछ। दरबज्जाक दुनू दिसि एकटा अदृश्य मुदा सक्कत देवार छैक, जे बुझि लेबाक अछि– कखनहु अभिनेता लोकनिक अभिनय–कुशलता सँ तथा कतेको वार्तालाप सँ से स्पष्ट भ’ जाइछ। मंच परक प्रकाश–व्यवस्था सँ ई पता नहि चलैत अछि जे दिन थिक अथवा राति, आलीक कनेक मद्धिम, सुर–संगत होइत सेहो कने मरियल सन।
एकटा कतार मे दस–बारह गोटे ठाढ़ छथि–जाहि मे कैकटा चोर–उचक्का, एक-दू गोटे भद्र व्यक्तित मुदा ई स्पष्ट जे हुनका लोकनिक निधन भ’ चुकल छन्हि। एकटा प्रेमी–युगल जे विष-पान क’ कए आत्म-हत्या कैल अछि, मुदा एत’ स्वर्गक (चाही त’ नरकक सेहो कहि सकै छी) द्वार लग आबि कए कने विह्वल भ’ गेल छथि जे आब की कैल जाइक। एकटा प्रौढ व्यक्तित जे बजारक झोरा ल’ कए आबि गेल छथि–बुझाइछ कोनो पथ–दुर्घटनाक शिकार भेल छथि बाजार सँ घुरैत काल। एकटा बीमा कंपनीक एजेंट सेहो छथि, किछु परेशानी छनि सेहो स्पष्ट। एकटा रद्दीबला जे रद्दी कागजक खरीद–बिक्री करैत छल, एकटा भिखमंगनी–एकटा पुतलाकेँ अपन बौआ (भरिसक ई कहै चाहैत छल जे वैह छल ओकर मुइल बालक अथवा तकर प्रतिरूप) जकाँ काँख तर नेने, एक गोट अत्यंत बूढ़ व्यक्ति सेहो, जनिक रमणी–प्रीति एखनहु कम नहि भेल छनि, हुनका हमसब रमणी–मोहने कहबनि।
सब गोटे कतार मे त’ छथि, मुदा धीरजक अभाव स्पष्ट भ’ जाइछ। क्यो-क्यो अनकाकेँ लाँघि आगाँ जैबाक प्रयास करैत छथि, त’ क्यो से देखि कए शोर करय लागैत छथि। मात्र तीन–चारिटा मृत सैनिक–जे कि सब सँ पाछाँ ठाढ़ छथि, हुनका सबमे ने कोनो विकृति लखा दैछ आ ने कोनो हड़बड़ी।
बजार-बला वृद्ध : हे – हे – हे देखै जाउ... देखि रहलछी कि नहि सबटा तमाशा... कोना–कोना क’ रहल छइ ई सब !
की ? त’ कनीटा त’ आगाँ बढ़ि जाई !
[एकटा चोर आ एकटा उचक्का केँ देखा कए बाजि रहल छथि, जे सब ओना त’ चारिम तथा पाँचम स्थान पर ढ़ाढ छैक, मुदा कतेको काल सँ अथक प्रयास क’ रहल अछि जे कोना दुनू भद्र व्यक्ति आ प्रेमी–प्रेमिका युगलकेँ पार क’ कए कतारक आगाँ पहुँचि जाई!]

बीमा एजेंट : [नहि बूझि पबैत छथि जे ओ वृद्ध व्यक्ति हुनके सँ
किछु कहि रहल छथि कि आन ककरहु सँ। बजार-
बला वृद्ध सँ आगाँ छल रद्दी बेचैबला आ तकरहु
सँ आगाँ छलाह बीमा बाबू।] हमरा किछु कहलहुँ ?

बाजारी : अहाँ ओम्हर देखब त’ बूझि जायब हम की कहि
रहल छी आ ककरा दय...! [अकस्मात् अत्यंत
क्रोधक आवेश मे आबि ] हे रौ! की बुझै छहीं...
क्यो नहि देखि रहल छौ ? [बीमा बाबू केँ बजारक झोरा थम्हबैत -] हे ई धरू त’! हम देखै छी।
[कहैत शोर करैत आगाँ बढ़ि कए एकटा चोर आ उचक्का केँ कॉलर पकड़ि कए घसीटैत पुनः पाछाँ चारिम-पाँचम स्थान पर ल’ अबैत छथि, ओसब वाद–प्रतिवाद कर’ लगैत अछि -]

चोर : हमर कॉलर कियै धरै छी ?
उचक्का : हे बूढ़ौ ! हमर कमीज, फाड़ि देबैं की ?
बाजारी : कमीजे कियैक ? तोहर आँखि सेहो देबौ हम फोड़ि !
की बूझै छेँ ? क्यो किछु कहै बाला नहि छौ एत’?
उचक्का : के छै हमरा टोकै–बला एत’? देखा त’ दिय’ ?
चोर : आहि रे बा ! हम की कैल जे हमर टीक धैने छी?
दोसर चोर : (जे कि असल मे पॉकिट–मार छल) हे हे,
टीक छोड़ि दी, नंगड़ी पकड़ि लियह सरबा क !
चोर : (गोस्सा सँ) तोँ चुप रह ! बदमाश नहितन !
पॉकिटमार : (अकड़ि कए) कियै ? हम कियै नहि बाजब ?
उचक्का : (वृद्ध व्यक्तिक हाथ सँ अपना केँ छोड़बैत) ओय खुदरा !
बेसी बड़बड़ैलें त’... (हाथ सँ इशारा करैत अछि गरा
काटि देबाक)
पॉकिटमार : त’ की करबें ?
उचक्का : (भयंकर मुद्रामे आगाँ बढ़ैत) त’ देब धड़ सँ गरा केँ
अलगाय... रामपुरी देखने छह ? रामपुरी ? (कहैत एकटा
चाकू बहार करैत अछि।)
चोर : हे, की क’ रहल छी... भाइजी, छोड़ि दियौक ने !
बच्चा छै... कखनहु–कखनहु जोश मे आबि जाइ छै !
भद्र व्यक्ति 1 : (पंक्तिक आगाँ सँ) हँ, हँ... छोड़ि ने देल जाय !
उचक्का : [भयंकर मुद्रा आ नाटकीयता केँ बरकरार रखैत
पंक्तिक आगाँ दिसि जा कए... अपन रामपुरी
चाकू केँ दोसर हाथ मे उस्तरा जकाँ घसैत ] छोड़ि
दियह की मजा चखा देल जाय ? [एहन भाव–
भंगिमा देखि दुनू भद्र व्यक्ति डरै छथि–प्रेमी–
युगल अपनहिमे मगन छथि; हुनका दुनू केँ
दुनियाक आर किछु सँ कोनो लेन-देन नहि...] की ?
[घुरि कए पॉकिट–मार दिसि अबैत... तावत् ई
सब देखि बाजारी वृद्धक होश उड़ि जाइत छनि...
ओ चोरक टीक/कॉलर जे कही... छोड़ि दैत छथि
घबड़ा कए ] की रौ ? दियौ भोंकि ? आ कि…?
चोर : उचकू–भाइजी ! बच्चा छै... अपने बिरादरीक
बुझू...! [आँखि सँ इशारा करै छथि।]
उचक्का : [अट्टहास् करैत] ऐं ? अपने बिरादरीक थिकै ?
[हँसब बंद कए- पूछैत] की रौ ? कोन काज करै
छेँ?
[पॉकिट-मार डरेँ किछु बाजि नहि पबैत अछि–
मात्र दाहिना हाथक दूटा आङुर केँ कैंची जकाँ चला
कए देखबैत छैक।]
उचक्का : पॉकिट-मार थिकेँ रौ ? [पुनः हँस’ लागै छथि-छूरी केँ
तह लगबैत’]
चोर : कहलहुँ नहि भाईजी ? ने ई हमरा सन माँजल चोर
बनि सकल आ ने कहियो सपनहु मे सोचि सकल
जे अहाँ सन गुंडा आ बदमाशो बनि सकत !
उचक्का : बदमाश ? ककरा कहलेँ बदमाश ? आँय !
पॉकिट-मार : हमरा, हुजूर ! ओकर बात जाय दियह ! गेल छल
गिरहथक घर मे सेंध देब’... जे आइ ने जानि कत्ते टका-पैसा-गहना भेटत ! त’ पहिले बेरि मे
जागि गेल गिरहथ, आ तकर चारि–चारिटा
जवान-जहान बालक आ सँगहि आठ–आठटा
कुकुर... तेहन ने हल्ला मचा देलक जे पकड़ि कए
पीटैत–पीटैत एत’ पठा देलक ! [हँसैत... उचक्का
सेहो हँसि दैत अछि] आब बुझु ! ई केहन चोर थिक !
(मुँह दूसैत) हमरा कहैत छथि !
[कतारक आनो-आन लोक आ अंततः सब गोटे
हँसय लागैत छथि]
भद्र-व्यक्तित 1: आँय यौ,चोर थिकौं ? लागै त’ नहि छी चोर
जकाँ...
चोर : किएक ? चोर देख’ मे केहन होइत छैक ?
पॉकिट-मार : हमरा जकाँ...! (कहैत, हँसैत अछि, आरो एक-दू
गोटे हँसि दैत छथि।) चललाह भिखारी बौआ बन’... ?
की ? त’ हम तस्कर-राज छी ! [कतहु सँ एकटा
टूल आनि ताहि पर ठाढ़ होइत... मंचक आन
दिसिसँ भाषणक भंगिमा मे] सुनू, सुनू, सुनू, भाई–भगिनी! सुनू सब गोटे! श्रीमान्, श्रील 108
श्री श्री बुद्धि-शंकर महाराज तस्कर सम्राट आबि
रहल छथि! सावधान, होशियार! [एतबा कहैत टूल
पर सँ उतरि अपन हाथ-मुँहक मूकाभिनयसँ
एहन भंगिमा करैत छथि जेना कि भोंपू बजा
रहल होथि... पाछाँ सँ भोंपू – पिपहीक शब्द
कनिये काल सुनल जाइछ, जाबत ओ ‘मार्च’ करैत
चोर लग अबैत अछि...]
चोर : [कनेक लजबैत] नहि तोरा हम साथ लितहुँ ओहि
रातिकेँ, आ ने हमर पिटाइ देखबाक मौके तोरा
भैटतिहौक! [कहैत आँखि मे एक-दूइ बुन्न पानि
आबि जाइत छैक।]
पॉकिट-मार : आ-हा-हा! एहि मे लजबैक आ मोन दुखैक कोन
गप्प?
[थम्हैत, लग आबि कए] देखह! आइ ने त’
काल्हि-चोरि त’ पकड़ले जाइछ। आ एकबेर जँ भंडा-
फोड़ भ’ जाइत अछि त’ बज्जर त’ माथ पर खसबे
करत ! सैह भेल... एहि मे दुख कोन बातक ?
उचक्का : (हँसैत) हँ, दुखी कियै होइ छहक?
बाजारी : [एतबा काल आश्चर्य भए सबटा सुनि रहल छलाह।
आब रहल नहि गेलनि – अगुआ कए बाजय
लगलाह]
हे भगवान! हमर भाग मे छल स्वस्थहि शरीर मे
बिना कोनो रोग-शोक भेनहि स्वर्ग मे जायब... तैँ
हम एत’ ऐलहुँ, आ स्वर्गक द्वार पर ठ़ाढ छी
क्यू मे...! मुदा ई सब चोर–उचक्का जँ
स्वर्गे मे जायत, तखन केहन हैत ओ स्वर्ग
रहबाक लेल ?
पॉकिट-मार : से कियै बाबा ? अहाँ की बूझै छी, स्वर्ग त’ सभक
लेल होइत अछि ! एहि मे ककरहु बपौती त’ नञि।
बाजारी : [बीमा एजेंट केँ] आब बूझू ! आब....
चोर सिखाबय गुण केर महिमा,
पॉकिट–मारो करै बयान!
मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि,
पाट–कपाट त’ जय सियाराम !

[चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।]
चोर : ई त’ नीक फकरा बनि गेल यौ!
पॉकिट-मार : एम्हर तस्कर-राज त’ ओम्हर कवि-राज!
बाजारी : (खौंझैत’) कियै ? कोन गुण छह तोहर, जकर
बखान करै अयलह एत’?
पॉकिट-मार : (इंगित करैत आ हँसैत) हाथक सफाई... अपन
जेब मे त’ देखू , किछुओ बाकी अछि वा नञि...
बाजारी : [बाजारी तुरंत अपन जेब टटोलैत छथि – त’ हाथ
पॉकिटक भूर देने बाहर आबि जाइत छनि। आश्चर्य
चकित भ’ कए मुँह सँ मात्र विस्मयक आभास होइत छनि।] जा !

[बीमा बाबूकेँ आब रहल नञि गेलनि। ओ ठहक्का पाड़ि
कए हँस’ लगलाह, हुनकर देखा–देखी कैक गोटे बाजारी दिसि हाथ सँ इशारा करैत हँसि रहल छलाह।]

चोर : [हाथ उठा कए सबकेँ थम्हबाक इशारा करैत] हँसि त’
रहल छी खूब !
उचक्का : ई बात त’ स्पष्ट जे मनोरंजनो खूब भेल हैतनि।
पॉकिट-मार : मुदा अपन-अपन पॉकिट मे त’ हाथ ध’ कए देखू !

[भिखमंगनी आ प्रेमी-युगल केँ छोड़ि सब क्यो पॉकिट टेब’ लागैत’ छथि आ बैगक भीतर ताकि-झाँकि कए देख’ लागैत छथि त’ पता चलैत छनि जे सभक पाइ, आ नहि त’ बटुआ गायब भ’ गेल छनि। हुनका सबकेँ ई बात बुझिते देरी चोर, उचक्का, पॉकिट-मार आ भिख-मंगनी हँस’ लागैत छथि। बाकी सब गोटे हतबुद्धि भए टुकुर- टुकुर ताकिते रहि जाइत छथि]

भिखमंगनी : नंगटाक कोन डर चोर की उचक्का ?
जेम्हरहि तकै छी लागै अछि धक्का !
धक्का खा कए नाचब त’ नाचू ने !
खेल खेल हारि कए बाँचब त’ बाँचू ने !

[चोर-उचक्का–पॉकिट-मार, समवेत स्वर मे जेना धुन गाबि रहल होथि]
नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का !
आँखिएक सामने पलटल छक्का !
भिख-मंगनी : खेल–खेल हारि कए सबटा फक्का !
समवेत-स्वर : नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ?

[कहैत चारू गोटे गोल-गोल घुर’ लागै छथि आ नाचि नाचि कए कहै छथि।]

सब गोटे : आब जायब, तब जायब, कत’ ओ कक्का ?
पॉकिट मे हाथ दी त’ सब किछु लक्खा !
नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का !

बीमा-बाबू : (चीत्कार करैत) हे थम्ह’ ! बंद कर’ ई तमाशा...
चोर : (जेना बीमा-बाबूक चारू दिसि सपना मे भासि रहल
होथि एहन भंगिमा मे) तमाशा नञि... हताशा....!
उचक्का : (ताहिना चलैत) हताशा नञि... निराशा !
पॉकिट-मार : [पॉकिट सँ छह-सातटा बटुआ बाहर क’ कए देखा –
देखा कए] ने हताशा आ ने निराशा, मात्र तमाशा...
ल’ लैह बाबू छह आना, हरेक बटुआ छह आना!
[कहैत एक–एकटा बटुआ बॉल जकाँ तकर मालिकक
दिसि फेंकैत छथि आ हुनका लोकनि मे तकरा
सबटाकेँ बटौर’ लेल हड़बड़ी मचि जाइत छनि। एहि
मौकाक फायदा उठबैत चोर–उचक्का-पॉकिटमार
आ भिख-मंगनी कतारक सब सँ आगाँ जा’ कए ठाढ
भ’ जाइत छथि।]
रद्दी-बला : [जकर कोनो नुकसान नहि भेल छल-ओ मात्र मस्ती क’ रहल छल आ घटनासँ भरपूर आनन्द ल’ रहल छल।] हे बाबू– भैया लोकनि ! एकर आनन्द नञि अछि कोनो जे “भूलल-भटकल कहुना क’ कए घुरि आयल अछि हमर बटुआ”। [कहैत दू डेग बढा’ कए नाचिओ लैत’ छथि।] ई जे बुझै छी जे अहाँक धन अहीं केँ घुरि आयल... से सबटा फूसि थिक !

बीमा-बाबू : (आश्चर्य होइत) आँय ? से की ?
बाजारी : (गरा सँ गरा मिला कए) सबटा फूसि ?
भद्र-व्यक्ति 1 : की कहै छी ?
भद्र-व्यक्ति 2 : माने बटुआ त’ भेटल, मुदा भीतर ढन–ढन !
रद्दी-बला : से हम कत’ कहलहुँ ? बटुओ अहींक आ पाइयो
छैहे! मुदा एखन ने बटुआक कोनो काज रहत’ आ
ने पाइयेक!
बीमा-बाबू : माने ?
रद्दी-बला : माने नञि बुझलियैक ? औ बाबू ! आयल छी सब
गोटे यमालय... ठाढ़ छी बन्द दरबज्जाक सामने...
कतार सँ... एक–दोसरा सँ जूझि रहल छी जे के
पहिल ठाम मे रहत आ के रहत तकर बाद...?
तखन ई पाइ आ बटुआक कोन काज ?
भद्र-व्यक्ति1 : सत्ये त’! भीतर गेलहुँ तखन त’ ई पाइ कोनो काज
मे नहि लागत !
बाजारी : आँय ?
भद्र-व्यक्ति2 : नहि बुझिलियैक ? दोसर देस मे जाइ छी त’ थोड़े
चलैत छैक अपन रुपैया ? (आन लोग सँ
सहमतिक अपेक्षा मे-) छै कि नञि ?
रमणी-मोहन : (जेना दीर्घ मौनता के तोड़ैत पहिल बेरि किछु ढंग
केर बात बाजि रहल छथि एहन भंगिमा मे... एहि
सँ पहिने ओ कखनहु प्रेमी-युगलक लग जाय
प्रेमिका केँ पियासल नजरि द’ रहल छलाह त’
कखनहु भिख-मंगनिये लग आबि आँखि सँ तकर
शरीर केँ जेना पीबि रहल छलाह...) अपन प्रेमिका
जखन अनकर बियाहल पत्नी बनि जाइत छथि
तखन तकरा सँ कोन लाभ ? (कहैत दीर्घ-श्वास
त्याग करैत छथि।)
बीमा-बाबू : (डाँटैत) हे...अहाँ चुप्प रहू! क’ रहल छी बात
रुपैयाक, आ ई कहै छथि रूप दय...!
रमणी-मोहन : हाय! हम त’ कहै छलहुँ रूपा दय! (भिख-मंगनी
रमणी-मोहन लग सटल चलि आबै छैक।)
भिख-मंगनी : हाय! के थिकी रूपा ?
रमणी-मोहन : “कानि-कानि प्रवक्ष्यामि रूपक्यानि रमणी च... !
बाजारी : माने ?
रमणी-मोहन : एकर अर्थ अनेक गंभीर होइत छैक... अहाँ सन
बाजारी नहि बूझत!
भिख-मंगनी : [लास्य करैत] हमरा बुझाउ ने!

[तावत भिख-मंगनीक भंगिमा देखि कने-कने बिहुँसैत’ पॉकिट–मार लग आबि जाइत अछि।]

भिख-मंगनी : [कपट क्रोधेँ] हँसै कियै छें ? हे... (कोरा सँ पुतलाकेँ
पॉकिट-मारकेँ थम्हबैत) हे पकड़ू त’ एकरा... (कहैत
रमणी-मोहन लग जा कए) औ मोहन जी! अहाँ की
ने कहलहुँ, एखनहु धरि भीतर मे एकटा छटपटी
मचल यै’! रमणी-धमनी कोन बात’ कहलहुँ ?
रमणी-मोहन : धूर मूर्ख! हम त’ करै छलहुँ शकुन्तलाक गप्प,
मन्दोदरीक व्यथा... तोँ की बुझबेँ ?
भिख-मंगनी : सबटा व्यथा केर गप बुझै छी हम... भीख मांगि-
मांगि खाइ छी, तकर माने ई थोड़े, जे ने हमर शरीर
अछि आ ने कोनो व्यथा... ?
रमणी-मोहन : धुत् तोरी ! अपन व्यथा–तथा छोड़, आ भीतर की
छैक, ताहि दय सोच ! (कहैत बंद दरबज्जा दिसि
देखबैत छथि-)
पॉकिट-मार : (अवाक् भ’ कए दरबज्जा दिसि देखैत) भीतर ? की
छइ भीतरमे... ?
रमणी-मोहन : (नृत्यक भंगिमा करैत ताल ठोकि- ठोकि कए) भीतर?
“धा–धिन–धिन्ना... भरल तमन्ना !
तेरे-केरे-धिन-ता... आब नञि चिन्ता !”
भिख-मंगनी : (आश्चर्य भए) माने ? की छैक ई ?
रमणी-मोहन : (गर्व सँ) ‘की’ नञि... ‘की’ नञि... ‘के’ बोल !
बोल- भीतर ‘के’ छथि ? के, के छथि?
पॉकिट-मार : के, के छथि?
रमणी-मोहन : एक बेरि अहि द्वारकेँ पार कयलेँ त’ भीतर भेटती
एक सँ एक सुर–नारी,उर्वशी–मेनका–रम्भा... (बाजैत- बाजैत जेना मुँहमे पानि आबि जाइत छनि--)

भिख-मंगनी : ईः! रंभा...मेनका... ! (मुँह दूसैत) मुँह-झरकी
सब... बज्जर खसौ सबटा पर!
रमणी-मोहन : (हँसैत) कोना खसतैक बज्जर ? बज्र त’ छनि देवराज
इन्द्र लग ! आ अप्सरा त’ सबटा छथि हुनकहि
नृत्यांगना।

[भिख-मंगनीक प्रतिक्रिया देखि कैक गोटे हँस’ लगैत छथि]

पॉकिट-मार : हे....एकटा बात हम कहि दैत छी – ई नहि बूझू जे
दरबज्जा खोलितहि आनंदे आनंद !
बाजारी : तखन ?
बीमा-बाबू : अहू ठाम छै अशांति, तोड़-फोड़, बाढ़ि आ सूखार ?
आ कि चारू दिसि छइ हरियर, अकाससँ झहरैत
खुशी केर लहर आ माटिसँ उगलैत सोना ?
पॉकिट-मार : किएक ? जँ अशांति, तोड़-फोड़ होइत त’ नीक... की
बूझै छी, एत्तहु अहाँ जीवन–बीमा चलाब’ चाहै छी की ?
चोर : (एतबा काल उचक्का सँ फुसुर-फुसुर क’ रहल
छल आ ओत्तहि, दरबज्जा लग ठाढ़ छल– एहि
बात पर हँसैत आगाँ आबि जाइत अछि) स्वर्गमे
जीवन-बीमा ? वाह ! ई त’ बड्ड नीक गप्प !
पॉकिट-मार : देवराज इंद्रक बज्र.. बोलू कतेक बोली लगबै छी?
उचक्का : पन्द्रह करोड़!
चोर : सोलह!
पॉकिट-मार : साढे-बाईस!
बीमा-बाबू : पच्चीस करोड़!
रमणी-मोहन : हे हौ! तोँ सब बताह भेलह ? स्वर्गक राजा केर बज्र,
तकर बीमा हेतैक एक सय करोड़ सँ कम मे ? [कतहु सँ एकटा स्टूलक जोगाड़ क’ कए ताहि पर चट दय ठाढ़ भ’ कए-]


पॉकिट-मार : बोलू, बोलू भाई-सब ! सौ करोड़ !
बीमा-बाबू : सौ करोड़ एक !
चोर : सौ करोड़ दू –
रमणी-मोहन : एक सौ दस !
भिख-मंगनी : सवा सौ करोड़ !
चोर : डेढ़सौ करोड़...
भिख-मंगनी : पचपन –
चोर : साठि –
भिख-मंगनी : एकसठि –

[दूनूक आँखि–मुँह पर ‘टेनशन’ क छाप स्पष्ट भ’ जाइत छैक। ]

चोर : (खौंझैत) एक सौ नब्बै...

[एतेक बड़का बोली पर भिख-मंगनी चुप भ’ जाइत अछि।]

पॉकिट-मार : त’ भाई-सब ! आब अंतिम घड़ी आबि गेल अछि –
190 एक, 190 दू, 190...
[ठहक्का पाड़ि कए हँस’ लगलाह बाजारी, दूनू भद्र व्यक्ति आ रद्दी-बला-]
पॉकिट-मार : की भेल ?
चोर : हँस्सीक मतलब ?
बाजारी : (हँसैते कहैत छथि) हौ बाबू ! एहन मजेदार मोल-
नीलामी हम कतहु नञि देखने छी !
भद्र-व्यक्ति 1 : एकटा चोर...
भद्र-व्यक्ति 2 : त’ दोसर भिख-मंगनी...
बाजारी : आ चलबै बला पॉकिट-मार...
[कहैत तीनू गोटे हँस’ लागै छथि]
बीमा-बाबू : त’ एहि मे कोन अचरज?
भद्र-व्यक्ति 1 : आ कोन चीजक बीमाक मोल लागि रहल अछि–
त’ बज्र केर !
भद्र-व्यक्ति 2 : बज्जर खसौ एहन नीलामी पर !
बाजारी : (गीत गाब’ लागै’ छथि)
चोर सिखाबय बीमा–महिमा,
पॉकिट-मारो करै बयान !
मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि,
पाट कपाट त’ जय सियाराम !
दुनू भद्र-व्यक्ति : (एक्कहि संगे) जय सियाराम !

[पहिल खेप मे तीनू गोटे नाच’-गाब’ लागै छथि। तकर बाद धीरे-धीरे बीमा बाबू आ रद्दी-बला सेहो संग दैत छथि।]

बाजारी : कौआ बजबै हंसक बाजा
भद्र-व्यक्ति 1 : हंस गबै अछि मोरक गीत
भद्र-व्यक्ति 2 : गीत की गाओत ? छल बदनाम !
बाजारी : नाट-विराटल जय सियाराम !
समवेत : मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि।
पाट-कपाटक जय सियाराम !
[चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।]

(क्रमश:)


3.शोध लेख
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।

प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
दोसर सहस्राब्दी ई.पूर्व अरायुक्त्त रथ , भारतीय देवनाम, भारतक धार, ऋगवेदिक तत्त्वचिंतन, अश्वविद्या, शिल्प-तकनीकी आ’ पुरातन् कथा भारतसँ पच्छिम एशिया, क्रीट-यूनान दिशि जाय लागल। कालक्रमसँ मिश्र, सुमेर-बेबीलोन, आदि सभ्यता आ’ मित्तनी आ’ हित्ती सभ्यतासँ बहुत पहिनहि ऋगवेदक अधिकांश मंडलक रचना भ’ गेल छल।

मायानन्दजीक एहि सीरीजक दोसर रचना मंत्रपुत्र अछि। एहिमे ऋगवैदिक आधार पर जीवन-दर्शनकेँ राखल गेल अछि।
ऋगवेद 10 मंडलमे (आ’ आठ अष्टकमे सेहो) विभक्त्त अछि। मायानन्द मिश्रजी मंडलक आधार पर मंत्रपुत्रक विभाजन सेहो 10 मण्डलमे कएलन्हि अछि। एहि पुस्तकक भूमिकाक नाम अछि, ऋचालोक आ’ ई पुस्तकक अंतमे 10म मण्डलक बाद देल गेल अछि।
प्रथम मण्डलमे काक्षसेनी पुत्री ऋजिश्वाक चर्च अछि, संगहि ऋतुर्वित पुत्री शाश्वतीक सेहो। जन सभा आ’ जन-समिति द्वारा राजाकेँ च्युत करबाक/निर्वासन देबाक आ’ दोसर राजाक निर्वाचन करबाक चर्चा सेहो अछि। नेत्रक नील रंग रहबाक बदला श्यामल भ’ जयबाक चर्चा आ’ एकर कारण खास तरहक विवाहक होयबाक चर्चा सेहो भेल अछि।वितस्ता तटसँ कृष्ण सभक निरन्तर उपद्रवक चर्चा सेहो अछि।सुवास्तु तटसँ रक्त्त मिश्रणक प्रक्रियाक वर्णन अछि। गोमेधकेँ वर्जित कएल जाय, ई विचार विमर्श कएल जाय लागल। दासक चर्चा सेहो अछि। हरिपूपियापतन आ’ ओकर विभिन्न नगर सभ उजड़ि जयबाक चर्चा अछि आ’ पश्चात् बल्बूथ द्वारा अनार्य सभक ध्वस्त वाणिज्य व्यवस्थाकेँ संगठित करबाक चर्चा अछि।

द्वितीय मण्डलमे
(अनुवर्तते)

4.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर


गणित आ’ विज्ञानक अतिरिक्त्त कोनो आन विषयकेँ नहि तँ हम एक बेरसँ दोसर बेर पढ़ैत छलहुँ आ’ नहिये एहि हेतु मास्टर साहेबे कहैत छलाह। कोनो विद्यार्थीकेँ मास्टर साहेब इतिहास आ’ नागरिक शास्त्रक किताबकेँ एकसँ दोसर-तेसर बेर पढ़ैत देखि जाइत छलाह तखन तँ ओहि विद्यार्थीक नामे ओहि विषयसँ पड़ि जाइत छल। आब ओ’ गणितो पढ़त तँ ओकरा सुनय पड़तैक जे बाबू ई इतिहास नहि छियैक, जे कंठस्थ कए रहल छी। सैया-निनानबे अनठानबे- सन्तानबे-छियानबे-पनचानबे कहैत-कहैत आ’ बोराक आसनीकेँ बरषाक समयमे छत्ता बनओने पाँच चारि तीन दू एक-एक-एक करैत भागैत विद्यार्थी सभ। कहियो छुट्टीक दिन जौँ कबड्डी खेलाबय काल मास्टर साहेब साइकिल पर चढ़ल देखा पड़थि, तँ कबड्डी-कबड्डी, मास्टर साहेब प्रणाम कबड्डी-कबड्डी कहैत भागैत विद्यार्थी। आ’ एहने एकटा घटनामे हम मास्टर साहेबकेँ ठाढ़ भ’ कए साँस तोड़ि कए प्रणाम कएने रहियन्हि आ’ एहि क्रममे विपक्षी पार्टी द्वारा लोकि लेल गेल छलहुँ, तँ एहि पर कोइलख बला मास्टर साहेब प्रसन्न भेल रहथि, आ’ एकर चर्चा स्कूलमे सभक समक्ष कएने रहथि।

बुझु जे गामक प्रवास बादक समयमे एकटा पैघ संबल सिद्ध भेल छल।खड़ाम पहिरि कए गतिसँ दौगैत रही, फेर बर्षामे आरि पर पिच्छड़ पर खड़ाम पहिरि कए दौगैत रही।पिच्छड़ पर खड़ाम नहि पिछड़ैत छल। बादमे हवाइ चप्पलक आगमन भेलाक बाद कतेक गोटे खसि-खसि कए डाँर पर गरम पानिक भाप लैत छलाह। अगिलही, किरासन तेलक लाइन, रोशनाइक गोटी, लबनचूस, रबड़क बॉल, ओधिक गेंद, पसीधक रसक विषसँ पोखरिमे माछ मरलाक बाद भेल दू टोलक बीचमे बाझल मारि, बाढ़िक दृश्य देखबाक लेल जुटल भीड़,छोट-छोट गप पर होइत पंचैती, आमक मासक आमक जाबीसँ बहराइत गछपक्कू आमक छटा, ई सभ टा अलोपित तँ नहि भ’ जायत।

(अनुवर्तते)




5.महाकाव्य
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा) ------
2.सभा पर्व

भय मदान्ध दुर्योधन कहल हे विदुर,
जाऊ समाचार ई द्रौपदीकेँ जाए सुनाऊ।
छथि ओ’ हमर दासी झाड़ू-बहारू करथि,
महलमे आबि हमर ई आदेश सुनाऊ।

विदुर कहल औ’ दुर्योधन घमण्ड छोड़ू,
स्त्रीक जुआरी अहाँ हमरा नहि बुझू।

देखि विदुरक ई रूप पठाओल विकर्णकेँ,
जाऊ दासी द्रौपदीकेँ जाय आनू गय,
विकर्ण ई द्रौपदी लग कहि सुनाओल।

चकित द्रौपदी कहल स्वयंकेँ जे हारल,
युधिष्ठिर कोनाकेँ अधिकार ई पाओल,
अपन हारिक बाद होयत क्यो सक्षम,
दोसरकेँ हेतु जुआमे लगाबए केहन।

ई प्रश्न जखन राखल विकर्ण सभा बीच आबि,
दुर्योधन कहल दुःशासन जाऊ पकड़िकेँ लाऊ।
बुझाओल द्रौपदी दुःशासनकेँ , जखन ने मानल,
भागलि गांधारीक भवन दिशि, दौगल दुःशासन,
खूजल केशकेँ पकड़ि घिसिअओने छल आनल।

सभा भवन महापुरुष नहि थोड़ जतय छल।
भीष्म, विदुर, द्रोण,कृपा लाजक लेल गोँतने,
गाड़ि माथ देखि रहल द्रौपदीक अश्रुपात।

सिंहनादमे भीम तखन ई बाजल,
सूर्य देवतागण रहब साक्षी अहाँ सभ,
हाथसँ दुःशासन केश द्रौपदीकेँ धएने,
उखाड़ि फेंकब हाथ ओकर ओ दूनू।

कौरव भय सँ भीत भेलाह नादसँ भीमक,
दुर्योधन देखल मुदा देखि ई छल बाजल,
जाँघ पर दैत थोपड़ी करैत घृणित इशारा,
द्रौपदीकेँ बैसबा लए ओतय कहैत छल।

गरजि कहल भीम अधम दुर्योधनसँ,
तोहर जाँघकेँ तोडब प्रचण्ड गदासँ।
खिसियाकेँ दुर्योधन देलक ई आज्ञा पुनः ई,
चीर-हरण करू दुःशासन द्रौपदी दासी छी।
द्रौपदी कएलन्हि नेहोरा श्रेष्ठ लोकनिसँ
विनय ई,लाज बचाऊ करैत छी विनती।

सभ क्यो झुका माथ अपन ओहि सभामे,
कृष्णा छोड़ल सभ आश सभ दिशासँ,
भक्त्त वत्सल अहाँसँ टा अछि ई आशा।
कोहुना राखू हमर ई लाज अछि प्रत्याशा।
आर्द्र-स्वरसँ छलि रहलि पुकारि द्रौपदी,
गोहाड़ि खसलि सभा-बिच, मूर्च्छित ।
लागल खीचय द्रौपदीक वस्त्र दुःशासन,
सभासद देखल चमत्कार ई प्रतिपल,
यावत रहल खिंचैत वस्त्रकेँ दुःशासन,
बढ़ैत रहल वस्त्र द्रौपदीक तावत खन।

थाकि-हाँफि बैसल जखन दुःशासन,
कहल भीम सुनू सभ एहि भवनमे,
यावत फाड़ि छाती दुःशासनक ऊष्म रुधिरकेँ,
पीयब, नहि पियास मेटत मृत्यु भेटत नहि।
सुनि प्रतिज्ञा ई सभ भयसँ थड़थड़ाय लागल छल।
धृतराष्ट्र देखि दुर्घटना द्रौपदीकेँ लगमे बजाओल,
सांत्वना दए शांत कएल युधिष्ठिरसँ छल बाजल,
बिसरि जाऊ इन्द्रप्रस्थ सुख-शांतिसँ रहए जाउ,
जे हाड़लहुँ,से बुझू देल हम ठामहि लौटायल ।
(अनुवर्तते)
6. कथा
8.भैयारी बिसरब नहि- गजेन्द्र ठाकुर
“कहलहुँ सुनैत छियैक। बेटी पैघ भ’ रहल अछि। बेटा सभक लेल किछु नहि कएलहुँ। अपन घरो नहि बनल। रिटायर भेलाक बाद कतय रहब।“
” बेटीक चिन्ता नहि करू। बेटा बला’ अपने चलि कए आयत।हमरा सभकेँ जतेक सुविधा भेटल छल, ताहिसँ बेशी सुविधा हिनका सभकेँ भेटि रहल छन्हि। तखन पढ़्थु वा नहि से ई सभ जानथि। रिटायरमेन्टक बाद गाम जा’ कय रहब। सात जन्म शहर दिशि घुमि कए नहि आयब।“
” क्यो सर-कुटुम अबैत छथि तँ हुनका सत्कार करबा लेल घरमे इंतजामो नहि रहैत अछि।“
” इंतजाम करबाक की जरूरति अछि। एक पैली बेशी लगा’ दियौक अदहनमे।“
आरुणि मायबापक एहि तरहक वार्त्तालाप सुनि पैघ भेलथि। एक बेर हॉस्पीटलमे पिताजीकेँ देखय लेल एक गोट कुटुम्ब आयल रहथि। हुनकर गप सेहो किछु एहने बुझा पड़लन्हि।
” की क’ लेलहुँ शरीरकेँ। ई बच्चा सभकेँ देखि कए मोहो नहि भेल। कतय पढ़ैत जाइत ई सभ। आ’ कोनो टा सुविधा, नहिये कोनो टा चिन्ते छल अहाँकेँ।अपनो आ’ एकरो सभक जिनगी बर्बाद कएलहुँ।“

“आरुणि। एकटा पैघ राजनीति चलि रहल अछि ऑफिसमे। अहाँक विरुद्ध षड्यंत्र चलि रहल अछि। अहाँकेँ चेतेनाइ हमर काज छल। मुदा अहाँ तँ कोनो तरहक प्रतिक्रिया दैते नहि छी।“ फोन पर एक गोट हितैषीक आवाज सुनि रहल छलाह आरुणि।
”आरुणि। की भ’ गेल। बाबूजी जेकाँ डरायल रहब।किछु दिनुका बाद हारि मानि ऋषि भ’ जायब। आकि दुष्टक संहार करब। एहि दुनूमे की चुनब अहाँ।“
”चिन्ता नहि करू। “ हँसैत बजलाह आरुणि फोन पर, आ’ फोन राखि देलन्हि।

ऑफिसक एकटा लॉबी आरुणिक पाँछा पड़ि गेल छल। ट्रांसफर-पोस्टिंग केर बाद आरुणिक ऊपर दवाब आबि गेल छल।किछु गोटे हुनकर विरुद्ध बिना-कोनो आधारक किछु कम्प्लेन कए देने छलन्हि। एकटा ऑफिसर शशांक केर हाथ छलैक एहिमे। ओकर खास-खास आदमीक पोस्टिंग मोन-मुताबिक नहि भेल रहय आ’ ओ’ प्रोमोशनमे आरुणिकेँ पाँछा करए चाहैत छल।एहि बीचमे आरुणिक फोन किछु दिन डेड छलन्हि। तकरा बाद हुनकर फोनसँ अबुधाबी आ’ दुबइ फोन कएल गेल छल। मुदा ओहि समयमे सरकारी फोनमे आइ.एस.डी. केर सुविधाक हेतु टेलीफोन विभागकेँ सूचित करए पड़ैत छल। हुनकर ऑफिसक एकटा प्रशासनिक अधिकारी टेलीफोन विभागकेँ चिट्ठी लिखि कए ई सुविधा आरुणिक जानकारीक बिना करबाए देने छल। विजीलेंसक जाँचमे ओ’ बयान देने छल जे आरुणि एहि ऑफिसक मुख्य छथि, आ’ हुनकर मौखिक आदेशोक पालन करए पड़ैत छन्हि हुनका। से आइ. एस.डी. केर सुविधाक लेल टेलीफोन विभागकेँ ओ’ आरुणिक मौखिक आदेश पर चिट्ठी लिखने छलाह।माफिया ओकरा तोड़ि लेने छल आ’ ओहिमे ओ’ प्रशासनिक अधिकारी अपनाकेँ सेहो फँसा लेने छल।
सोम दिन फैक्स आयल आ’ आरुणिक ट्रांसफर भ’ गेल।
”रिप्रेसेंट करू एहि आदेशक विरुद्ध”। वैह चिरपरिचित स्वर, मणीन्द्रक।
“अहूँ कोन झमेलामे पड़ल छी। सभ ठीक भ’ जायत”। बजलाह आरुणि फोन पर।
शशांकक घर पर पार्टी भेल।
”मिस्टर आरुणि रिप्रेसेन्ट तक नहि कएलन्हि। रिलीव भ’ कए चलि गेलाह। बुझू सरेन्डर कए देलन्हि अपनाकेँ”।
”प्रोमोशन बुझू जे दस साल धरि रुकल रहतन्हि। सीनियरिटी मारल जएतन्हि। बदनामी भेलन्हि से अलग। सुनैत छी जे फोन पर दुबइक स्मगलर सभसँ गप करैत छलाह”।
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ओम्हर आरुणिकेँ अपन बाबूजीक ट्रांसफर, ईमानदारीक संग कएल संघर्ष, संघर्षक विफलता आ’ तकर बाद हुनकर तंत्र-विद्या आ’ पूजा-पाठक दिशि अपनाकेँ ओझरायब आ’ घर-द्वार,ऑफिस आ’ सांसारिकतासँ विरक्त्ति मोन पड़ि गेलन्हि। एहि सभ घटनाक्रमक बाद हुनकर मुँह पर जे चिन्ताक रेखा आयल छलन्हि,से बेशी दिन धरि नहि रहलन्हि आरुणिक मोन पर। हारिकेँ जीतमे कतोक बेर बदलने छलाह ओ’। पढ़ाइक ग्राफ पिताक मोनक संग बनैत-बिगड़ैत रहैत छलन्हि। मुदा घुरि कए पुनः लक्ष्य प्राप्त करैत छलाह। नोकरीमे रहितहु ई घटना एक बेर भेल छल। एकटा सरकारी यात्राक बाद भेल एक्सीडेन्ट, 15 दिन धरि वेंटीलेटर पर,फेर एक साल धरि बैशाखी पर रहलाक बाद, पुनः अपन पैर पर ठाढ़ भ’ गेलाह। मृत्यु पर विजय कएलन्हि।मुदा डेढ़ साल बाद जखन ऑफिस अएलाह तखन लोककेँ विश्वासे नहि भेलैक।मुख पर वैह चिरपरिचित हँसी।लोक सभ तँ ईहो कहैत छल जे ई एक्सीडेंट भेल नहि छल वरन् करबाओल गेल छल।
” की यौ मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि। स्टेटसँ बाहर ट्रांसफर भ’ गेल तँ अहाँ सभ तँ बिसरिये गेलहुँ”।
” हम की सभ क्यो बिसरि गेल अहाँकेँ एतय।
“अहाँ की बुझलहुँ। जे हम सेहो बिसरि गेल छी। अहाँकेँ मोन अछि। हम जखन इंटरक बाद बाबूजीक इच्छाक विरुद्ध विज्ञान छोड़ि कए कला विषय लेने छलहुँ। विज्ञानक सभटा किताब 11 बजे रातिमे पोखड़िमे फेंकि देने छलियैक। कोनोटा अवशेषो नहि छोड़ने छलहुँ ओहि विषयक अपन घरमे। आ’ जखन कला विषयमे प्रथम श्रेणी आयल छल तखन गेल छलहुँ गाम। तकरा पहिने कतेक बरियाती छोड़ने छलहुँ, कतेक जन्म-मृत्यु। मुदा गाम नहि गेल छलहुँ”।
” एह भाई। अहाँकेँ तँ सभटा मोन अछि। हमरा तँ भेल जे अहूँ काका जेकाँ भ’ गेलहुँ। ई सभ क्षमाक योग्य नहि अछि। कनेक देखा’ दियौक। आब हमरा विश्वास भ’ गेल जे किछु होयत”।
” फेर वैह गप। जखन अहाँ नहि बदललहुँ तखन हम कोना बदलब। चोड़ने छलहुँ किछु दिन अपनाकेँ। आब सुनू। जे कहैत छी से टा करू। बेशी बाजब जुनि। जाहि समयक कॉल हमर टेलीफोनसँ बाहरी देश कएल गेल छल, ओहि समयमे तँ हमर टेलीफोन खराब छल, ई तँ अहाँकेँ बुझले अछि।घरसँ टेलीफोन विभागकेँ कम्प्लेन सेहो लिखबाओल गेल छल। मुदा से टेलीफोने पर लिखबाओल गेल छल। कोनो लिखित पत्र आ’ ओकर प्राप्ति रशीद तँ अछि नहि। मुदा ई पता करू जे एहि तरहक कम्प्लेनक कोनो रेकार्ड टेलीफोन विभागक लग रहैत छैक की नहि।“

मणीन्द्रक फोन आयल किछु दिनुका बाद जे फोन विभाग एक महीनाक बाद कम्प्लेन नंबर फेरसँ एक सँ देब शुरू कए दैत छैक। से ई काज नहि भेल।
” बेश तखन ई पता करू, जे हमर नंबरसँ ककरा-ककरा कोन-कोन नंबर पर विदेश फोन कएल गेल छल। आ’ ओहि विदेशीक फोन कोन-कोन नंबर पर आयल अछि”।
”हँ। एहि गपक तँ हमरा सुरते नहि रहल”।

आब मणीन्द्र जे टेलीफोन नंबरक सूची अनलन्हि, से सभटा टेलीफोन बूथ सभक छल। मुदा कोनो टा कॉल आरुणिक नंबर पर नहि आयल छल।

विजीलेंसक सुनबाहीमे ई सभ वर्णन जखन आरुणि कएलन्हि, तखन शशांक हतप्रभ रहि गेलाह। ई तँ नीक भेल जे हुनकर आदमी सभ बूथ बलासँ संपर्क रखने छल, नहि तँ ओहो सभ फण्सैत आ’ संगहि शशांकोक नाम अबैत एहि सभमे। अस्तु आरुणि जाँचसँ बाहर निकलि गेलाह।
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“ भाइ। हम मणीन्द्र। ओकरा सभकेँ तँ किछु नहि भेलैक।“
”हमर ट्रांसफर दिल्ली भेल अछि। देखैत छी। अहाँ निश्चिंत रहू।“
”हम तँ ओहि दिन निश्चिंत भ’ गेलहुँ जहिया अहाँ पुरनका गप सभ सुनेलहुँ। काकाक अपमानक बदला अहाँकेँ लेबाक अछि। मात्र व्यक्त्ति सभ बदलल अछि। चरित्र सभ वैह अछि”।
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दिल्लीमे आरुणि विजीलेंस विभागक सूचना-प्रौद्योगिकी शाखामे पदस्थापित भेलाह। एहि विभागकेँ शंटिंग पोस्टिंग मानल जाइत छल। विजीलेंसक एनक्वायरीसँ बाहर निकललाक बादो आरुणि एहि पोस्टिंगके चुनलन्हि, से एहिसँ तँ ईएह सिद्ध होइत अछि, जे आरुणि थाकि गेलाह। पाँच साल कोनमे बैसल रहताह। शशांकक ग्रुप प्रफुल्ल छल।
एम्हर आरुणि अपन विज्ञानक छोड़ल पाठ फेरसँ शुरू कएलन्हि। भरि दिन कम्प्युटर आ’ ओकर तकनीकी विशेषज्ञ सभसँ भिड़ल रहथि। ओहो लोकनि बहुत दिनक बाद एहन अधिकारी देखनी छलाह जे भिड़ल अछि, काजसँ। दोसरि लोकनि तँ कोहुना टर्म पूर्ण कए भागैत छथि।
ओना देखल जाय तँ ई विभाग बड्ड संवेदनशील छल। आब आरुणिक अपन विभागक सभ कर्मचारीसँ बेश निकटता भ’ गेल छलन्हि। सभक आवेदन समयसँ आगू बढ़ैत छल। सभटा ऑफिसक इक्विपमेंट नव आबय लागल। पहिलुका ऑफिसर सभ तँ समय काटि भागय केर फेरमे रहैत छल आ’ ऑफिसक आवश्यक आवश्यकता सेहो पूर्ण नहि करैत छल।
ऑफिसमे एकटा इक्विपमेन्ट आयल छल, एन्टी करप्शन रोकय लेल। एहिमे स्मगलर सभक फोन टेप करबाक सुविधा छल।

किछु दिन समय व्यतीत होइत रहल।
”मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि”।
”हम आब निश्चिन्त छी”।
”हँ समय आबि गेल अछि। एकटा काज करू स्मग्लरक संग शशांकक संबंधक संबंधमे एकटा न्यूज निकलबा दिऔक अखबारमे।आगाँ सभ चीज तैयार अछि”।
ओम्हर अखबारमे खबरि निकलल, आ’ मंत्रीक जन संपर्क पदाधिकारी जकर काज विभागक खबरिकेँ अखबारसँ काटि कए मंत्री धरि पहुँचायब छल, ओ’ क्लिपिंग मंत्रीजी लग पहुँचाय देलन्हि। समय समीचीन छल कारण विभागीय मंत्रीजी पर ढेर आरोप ओहि समय आयल छलन्हि,संसदक सत्र चलि रहल छल, से ओ’ कोनो तरहक रिस्क नहि लेलन्हि। इंक्वायरीक ऑर्डर दय देलन्हि।
विजिलेंस विभागमे केश आयल। ओकर आंतरिक बैठकी होइत छल, जाहिमे प्रौद्योगिकी विभागकेँ सेहो बजाओल जाइत छल। सभ केशमे मोटा-मोटी प्रौद्योगिकी विभाग अनाधिकार प्रामाण पत्र दए दैत छल।आ’ केश इंक्वायरीक बाद समाप्त भ’ जाइत छल।
मीटिंगक तिथि तय भेल। मीटिंगमे आरुणि विजिलेंस कमेटीक सदस्यक रूपमे शामिल भेलाह।
”शशांक पर कोनो तरहक कोनो आरोप सिद्ध नहि होइत छन्हि। आरुणि अहाँक विभागकेँ टेलीफोन टैपिंगक उपकरण उपलब्ध करबाओल गेल छल। मुदा अपन ऑफिसमे तँ फैक्स मशीनो 6 मास किनाकय राखल रहलाक बाद लगाओल जाइत अछि, तखन ई मशीन एखनो राखले होयत आकि किछु कंवर्शेशन रेकार्डो भेल अछि”।
”श्रीमान। ई मशीन एहि मासक पहिल तिथिकेँ आएल आ’ ओहि तिथिसँ एकर उपयोग शुरू भ’ गेल। एहि केशमे जहि स्मगलरक नाम आयल अछि, ओकर नाम ओहि सूचीमे अछि, जकर कॉल रेकॉर्ड करबाक आदेश हमरा भेटल छल। शशांकक कंवर्शेशन एहि व्यक्त्तिसँ नहि केर बराबड़ अछि।आध-आध मिनटक दू टा कंवर्शेशन।दोसर कंवर्शेशन नौ बजे रातिक छी आ’ एहि कंवर्शेशनक बाद ओहि स्मगलरक फोन अपन कर्मचारीकेँ जाइत छैक, आ’ ताहूमे मात्र आध मिनट ओ’ लगबैत अछि”।
” ई कोन तारीखक अछि”।
”पाँच तारीखक”।
” छह तारीखक भोरमे एहि स्मगलरक ओहिठाम रेड भेल छल, आ’ किछु नहि भेटल छल। ई सभ फोनक डिटेल दिअ आरुणि’।
”पहिल कॉलमे शशांक कहैत छथि, जे साढ़े आठ बजे घर पर आबि कए भेंट करू।बड्ड जरूरी गप अछि। दोसर कंवर्शेशनमे ओ’ नौ बजे तमसाइत कहैत छथि, जे नौ बाजि गेल आ’ अहाँ एखन धरि नहि अएलहुँ। एहिमे उत्तर सेहो भेटैत अछि, जे ओ’ शशांकक गेट पर ठाढ़ अछि”।
” तेसर फोनमे की वार्त्तालाप अछि”।
” तेसर फोन ओ’ स्मगलर अपन ऑफिस स्टाफकेँ साढ़े नौ बजे करैत अछि। ओ’ कर्मचारीकेँ आदेश दैत अछि, जे तुरत ऑफिस आऊ, हमहुँ पहुँचैत छी। बस एकर अतिरिक्त किछु नहि। कोनो एवीडेंस नहि भेटि सकल एहि केसमे। कहू तँ हम नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दए दिअ”।
”आरुणि। की कहैत छी अहाँ। अहाँक विभाग तँ आइ तक कोनो काज नहि कएने छल, मुदा आइ तँ सभटा कड़ी जोड़ि देलहुँ अहाँ। शशांक फोन कएलक जे भेंट करू। दोसर फोन पर ओ’ व्यक्त्ति ओकर गेट पर ठाढ़ छल। तेसर फोनमे ओकर कर्मचारी ऑफिस ओतेक रातिमे की करए जाइत अछि। रेडक खबड़ि शशांक लीक कएलन्हि। ओ’ कर्मचारी सभटा कागज हटा देलक, आ’ हमर विभागक ऑफिसर भोरमे छुच्छ हाथ घुरि कए आबि गेलाह। आब एकटा फोन आर करू। शशांकक नंबर टेप तँ नहि भ’ सकल छल, मुदा प्रक्रियाक अनुसार ओकर आवाजक सैंपल मैच करबाक चाही। ओ’ फोन उठायत तँ गलत नंबर कहि काटि दियौक”।
”सैह होयत”।
तखने ई प्रक्रिया कएल गेल।
“ई तँ ओपन आ’ शट केस अछि”। विजीलेंस कमेटीक अध्यक्ष महानिदेशककेँ बतओलन्हि। महानिदेशक शशांककेँ बजबओलन्हि आ’ ओकरा दू टा विकल्प देलन्हि।
”शशांक एहि सभ घटनाक बाद अहाँ लग दू टा विकल्प अछि। विभागसँ कंपलसरी सेवा निवृत्ति लेबय पडत अहाँकेँ। नहि तँ इंक्वायरी आगाँ बढ़त”।
शशांक कंपलसरी सेवानिवृत्ति लए लेलन्हि। विभाग छोड़ि कए चलि गेलाह।
” भाइ मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि”।
”भजार। हम तँ ओहि दिन निश्चिंत भ’ गेल छलहुँ जाहि दिन हमरा बुझबामे आओल, जे अहाँकेँ बच्चाक सभटा गप मोन अछि। काका आ’ अहाँमे कोनो अंतर नहि। मार्ग मात्र दू तरहक रहल। एहि विजयक मार्ग पर अहाँ चली ताहि हेतु, कतेक भरकाबैत छलहुँ अहाँकेँ से मोन अछि ने। मुदा ओहि दिन जखन हमरा अहाँ बच्चाक गप सभ कहए लगलहुँ तहिये निश्चिन्त भ’ गेल छलहुँ हम”।




(अनुवर्तते)

7. पद्य

नाम - ज्योति झा चौधरी ;जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८;जन्म स्थान -बेल्हवार,मधुबनी ;शिक्षा - स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्र्ल्स हाई स्कूल़,मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़,इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी);;निवास स्थान - लन्दन, यू के ;पिता -श्री शुभंकर झा,ज़मशेदपुर ;माता -श्रीमती सुधा झा,शिवीपट्टी ; ।''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सबकेँ पत्र लिखबामे केने छी।।बचपनसँ मैथिली सँ लगाव रहल अछि।-ज्योति



आधुनिक जीवनदर्शन

अतिशयोक्ति सँ विरक्ति अछि
जाबे ओ' दोसरक प्रशंसा में होय
परञ्च निंदामे किएक कंजूसी
जखन अनकर करबाक होय ।

असभ्य तऽ ओकरा बुझब
जे हमर प्रशंसकके रोकयए,
ने हम्मर कियो प्रशंसक अछि
ने समाजमे कियो असभ्य बुझाइए ।

परोपकार करनिहारके आशिष
जे हमर काज बना गेल
अन्यथा ओ सब बेरोजगार
जे आनक काजमे लागि गेल ।



मिथिलाक ध्वज ग़ीत- गजेन्द्र ठाकुर

मिथिलाक ध्वज फहरायत जगतमे,
माँ रूषलि,भूषलि,दूषलि, देखल हम,
अकुलाइत छी, भँसियाइत अछि मन।

छी विद्याक उद्योगक कर्मभूमि सँ,
पछाड़ि आयत सन्तति अहाँक पुनि,
बुद्धि, चातुर्यक आ’ शौर्यक करसँ,
विजयक प्रति करू अहँ शंका जुनि।

मैथिली छथि अल्पप्राण भेल जौँ,
सन्ध्यक्षर बाजि करब हम न्योरा,
वर्ण स्फोटक बनत स्पर्शसँ हमर,
ध्वज खसत नहि हे मातु मिथिला।

Music Notation
राग वैदेही भैरव त्रिताल(मध्य लय)

स्थाई
सां

धसां धप म (-) रे – सा सा सा रे॒ म – प ध प म

सां
प ध – ध सां – सां धसां रें – सां सां धसां धप म, ध
सां धप म (-)



अन्तरा

प ध सां ध सां सां सां ध – रें॒ – मं रें॒ –सां सां
सां – ध प म - - प म रे॒ – सा रे॒ – सा सा
- रे॒ म - प ध ध सां ध सां- सां रें॒ रें॒ सां सां
मप धसां धसां रें॒सां धसां धप म,सां



8. संस्कृत शिक्षा
(आँगा)
गीतम्
-गजेन्द्र ठाकुर
पथिकः चलितुं गच्छति दूरे,
तत्र आगमिष्यति लक्ष्यम् एकम्।
किमपि न चलितुमं शक्नोमि मम,
इति चिन्तयति सः पथिकः भीते।
तत्र आगच्छति साहसम् एकम्,
पृच्छति वत्स चिन्तयति किम हृदयम्।

मस्तिष्के चिन्तयतु प्राप्नुम लक्ष्यम्,
पथिकः चलति गच्छति अग्रे शीघ्रम्,
प्राप्यते लक्ष्यं सिद्धयति स्वप्नम्।

सुभाषितम्
वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्वः।

उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः।
आरिषु यः साधुः स सादुरिति कीर्तितः॥

वयम् इदानीम यत सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। लोके केचन् जनाः अस्माकम् उपकारं कुर्वन्ति, अन्य केचन् अपकारं कुर्वन्ति। ये उपकारं कुर्वन्ति तेषां विष्ये सर्वे संतुष्टाः भवन्ति, तेषां विषये साधुत्वं दर्शयन्ति एव, किन्तु यः अपकारं करोति तस्य विषये अपि यः साधुत्वं दर्शयन्ति यः तस्यापि उपकारं करोति सः वस्तुतः साधुः। अन्यथा यः मम उपकारं करोति तस्य अहम् उपकारं करोमि चेत् तत्र साधुत्वं किमपि नास्ति। यः अपकारं करोति तस्यापि यः उपकारं करोति सः वस्तुतः साधुः।

कथा

अहम् इदानीम् एकं लघु कथां वदामि।

कश्चन् ग्रामः आसीत्। तस्मिन् ग्रामे एकः पण्डितः आसीत्। सः महान् विद्वान्, अनेकेषु शास्त्रेषु निष्णातः आसीत्। सः प्रतिदिनम् अध्ययनं करोति, प्रतिदिनम् अध्यापनम् अपि करोति, प्रतिदिनं पाठं करोति। दूर-दूरतः अपि छात्राः प्रतिदिनं तस्य समीपम् आगत्य शिक्षणं प्राप्तवन्ति।, प्रतिदिनं पाठार्थम् आगछन्ति। तस्य पण्डितस्य एकः पुत्रः आसीत्। पुत्रस्य विषये पण्डितस्य महती प्रीतिः आसीत्। सः पुत्रः अपि सम्यक पठति स्म। एकस्मिन् दिने छात्राः यथापूर्वं गुरोः समीपम् आगतवन्तः। गुरुः तान् सर्वान् यथापूर्वं पाठितवान्। व्याकरण वा न्यायशास्त्रं वा किंचित्
शास्त्रं सः सर्वान् छात्राण् यथापूर्वं पाठितवान्। छात्राः सर्वे पाठं श्रुत्वा सन्तुष्टाः स्व ग्रामम् अन्नतरं गतवन्तः। सायांकालः अभवत्।
तस्मिन् दिने अकस्मात् तस्य पण्डितस्य पुत्रस्य महान् ज्वरः आगच्छ। सः औषिधम् आनीतवान्। परन्तु प्रयोजनं न भवथ। रात्रि समये सः बालकः मृतः एव अभवत्। पण्डितस्य एकः एव पुत्रः। सः पुत्रः अपि मृतः अभवत्। पण्डितस्य महत् दुःखं जातम्। सहजं सः बहुदुःखेन् एव पुत्रस्य कार्याणि याणि करिणियानि तानि सर्वानि कृतवान्। तस्य शिष्याः सर्वे अन्य ग्रामेषु निवसन्तु। ते एतां वार्त्तां न जानन्तु। अनन्तर दिने प्रातः काले ते सर्वे यथा पूर्वं पाठार्थम् आगतवन्तः। गुरुः दृष्टवान्। सर्वे छात्राः पाठार्थम् आगतवन्तः। गुरुः स्वस्थाने उपविष्टवान्। सर्वानापि पाठितवान्। प्रतिदिनम् यथा पाठयति तथैव एक घण्टा पर्यन्तं पाठनं कृतवान्। पाठः समाप्ता छात्राः सर्वे गुरोः पुत्रं न दृष्टवन्तः। अद्य पुत्रः न दृश्यते। कुत्र इति तेषां संशयाः भवन्ति। ते गुरुं पृष्टवन्तः।
भवतः पुत्रः कुत्र।
तदा गुरुः सर्वम् उक्त्तवान्।
छात्राः उक्त्तवन्तः- कीदृशः भवान्।
किमर्थम् अस्मान् पूर्वमेव न उक्त्तवान्। तदा गुरुः उक्त्तवान्- भवन्तः सर्वे दूर-दूर ग्रामतः पाठं श्रोतुम् आगतवंटः। एतावंटः शिष्याःदूरतः पाठं श्रोतुम्
आगतवन्तः। अहं पाठं न करोति चेत्, भवताम् सर्वेषाम् समयः व्यर्थः न भवति ? अतः पाठनं मम् धर्मम्।
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सम्भाषणम्
वयम् आरम्भे पूर्वतन् पठस्य किंचित् स्मरण कुर्मः।

ददाति ददामि दापयामि दापयति
पठति पठामि पाठयामि पाठयति
अत्र बहूनि वस्तूनि सन्ति।
करदीपः अस्ति।
अहं करदीपं स्वीकरोमि।
अहं उपनेत्रं ददामि।
स्वीकरोतु।
करदीपं ददामि।
तथा वाक्यानि वदामः।
इदानीं भवन्तः एकम् एकं वाक्यं वदन्ति एव, किम् किम् ददति।
वदन्तु।
भवती फलं ददाति।
अहं लेखनीं ददामि।
कृपया उपनेत्रं ददातु।
मम् समीपे बहूनि वस्तूनि सन्ति।
अहम् एकम् एकं वस्तु दर्शयामि।
करदीपः- कृपया करदीपं ददातु।
दंतकूर्चः- कृपया दंतकूर्चं ददातु।
ध्वनिमुद्रिकाम्
सान्द्रमुद्रिकाम्
-अन्यम् एकम् अभ्यासम् कुर्मः।
-अहम् एकम् वाक्यं लिखामि।
मयूरः पठति।
अहम् अन्नं खादामि।
चिन्तयन्तु। अहल्याः मम् अतिथिः अस्ति। सा मम् गृहम् आगच्छति। अहं कथं सम्भाषणं करोमि । श्रुणवन्तु।
भो:। आगच्छतु। उपविशतु।
कुशलं वा। आम् सर्वं कुशलम्।
अत्रापि सर्वं कुशलं।
गृहे सर्वं कुशलम्।
माता कुशलिनी अस्ति।
किंचित् पानीयं ददामि।
संकोचं मास्तु।
मास्तु।
किंचित् स्वीकरोतु।
किंचित्।
चायं ददामि।
सम्यक् अस्ति।
किंचित् स्वीकरोतु। मास्तु।
किंचित् शर्करा आवश्यकी।
किंचित् न आवश्यकम्।
सावधानं स्वीकरोतु।
कः विशेषः।
मम् गृहे श्वः पूजा अस्ति।
कस्मिन् समये पूजा।
भगिनी नास्ति वा।
सर्वे आगच्छन्तु।
आगच्छामः।
पुनर्मिलामः।
आगच्छतु।
धन्यवादः।
कुशलम् वा।
आम कुशलम्।
कः विशेषः।
विशेषः कोपि नास्ति।
गृहे सर्वं कुशलम्।
आम् कुशलम्।
पिता कार्यालयं गतवान्।
अनुजस्य परीक्षा समाप्ता।
भो विस्मृतवान्।
किमपि।
पानीयं किम् स्वीकरोति। मास्तु।
संकोचः मास्तु।
किंचित् किंचित् ददातु।
स्वीकरोतु भोः।
किम् ददामि।
फलरसम् ददातु।
अस्तु ददामि।
अन्य विशेषः कः।
कोपि नास्ति।
अस्तु अहं गच्छामि।
किंचित् कालं तिष्ठतु।
न गच्छामि।
अस्तु धन्यवादः।
आसन्दः मम् पुरतः अस्ति।
उत्पीठिका मम् पृष्ठतः अस्ति।
संगणकं पुरतः अस्ति।
कूपी पृष्ठतः अस्ति।
प्रिया मेघायाः पुरतः अस्ति।
अहल्या मेघायाः पृष्ठतः अस्ति।
विजयः पुरतः आगच्छतु।
न न पृष्ठतः गच्छतु।
प्रसन्नः दक्षिणतः अस्ति।
प्रिया मम् वामतः अस्ति।
मम् दक्षिणतः कः अस्ति।
मम् वामतः कः अस्ति।
स्वर्गः आकाशः उपरि अस्ति।
पातालं भूमिः अधः अस्ति।
रघुवंशः रामायणस्य उपरि अस्ति।
ब्रह्मसूत्रं महाभारतस्य उपरि/अधः अस्ति।
रामायणं महाभारतस्य अधः अस्ति।
पुरतः/पृष्ठतः/वामतः/दक्षिणतः/उपरि/अधः/
अहं पठयामि।
एवं तिष्ठतु।
पुरतः/पृष्ठतः/दक्षिणतः/वामतः/
हस्तम् एवं करोतु।
पुरतः/पृष्ठतः/दक्षिणतः/वामतः।
(अनुवर्तते)

9. मिथिला कला
(आँगा)

चित्रकार- प्रीति, गाम-जगेली(जिला पूर्णिया),बिहार, भारत)।

दशपात अरिपन
पछिला अंकमे स्त्रीगणक दशिपात अरिपन देल गेल छल। एहि बेर पुरुषक दशिपात अरिपन देल गेल अछि।
एकर नाम दसकर्मक बोध करएबाक कारण दशपात अछि, आ’ ई पुरुषक सभ संस्कारक अवसर पर लिखल जाइत अछि।
ऊपरी भागमे दू टा मयूर,कमलक फूल,शुभ मत्स्य,भीतरमे 12 टा माँछक चित्र आ’ दसटा डाढ़िक चित्र देल गेल अछि,आ’, बीचमे अष्टदल कमल।


10. संगीत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर
वर्णसँ रागक रूप-भाव प्रगट कएल जाइत छैक। एकर चारिटा प्रकार छैक।
1.स्थायी-जखन एकटा स्वर बेर-बेर अबैत अछि।ओकर अवृत्ति होइत अछि।
2.अवरोही- ऊपरसँ नीचाँ होइत स्वर समूह, एकरा अवरोही वर्ण कहल जाइत अछि।
3.आरोही- नीचाँसँ ऊपर होइत स्वर समूह, एकरा आरोही वर्ण कहल जाइत अछि।
4.संचारी-जाहिमे ऊपरका तीनू रूप लयमे होय।

लक्षण गीत: रचना जाहिमे बादी, सम्बादी,जाति आ’ गायनक समय केर निर्देशक रागक लक्षण स्पष्ट भ’ जाय।

स्थायी: कोनो गीतक पहिल भाग, जे सभ अन्तराक बाद दोहराओल जाइत अछि।
अन्तरा: जकरा एकहि बेर स्थायीक बाद गाओल जाइत अछि।
अलंकार/पलटा: स्वर समुदायक नियमबद्ध गायन/वादन भेल अलंकार।
आलाप: कोनो विशेष रागक अन्तर्गत प्रयुक्त्त भेल स्वर समुदायक विस्तारपूर्ण गायन/वादन भेल आलाप।
तान: रागमे प्रयुक्त्त भेल स्वरक त्वरित गायन/वादन भेल तान।

(अनुवर्तते)

11. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर
ज्योति पँजियार

ज्योति पँजियार छलाह सिद्ध।पम्पीपुर गामक। तंत्र-मंत्र जानएबला।धर्मराज रहथि हुनकर कुलदेवता। ज्योति पँजियारक पत्नी छलीह लखिमा।
एक बेर साधुक वेष धय धर्मराज भिक्षाक हेतु अएलाह। ज्योति पँजियार लखिमाक संग गहबर बना रहल छलाह। माय सूपमे अन्न लए क’ अयलीह। मुदा साधु कहलखिन्ह जे हम तँ भीख लेब ज्योति पँजियारक हाथेटा सँ। ज्योति पँजियार मना कए देलखिन्ह जे हम गहबर बनायब छोड़ि कए नहि आयब।साधु श्राप दए देलखिन्ह जे निर्धन भ’ जयताह ज्योति पँजियार, कुष्ठ फूटि जएतन्हि हुनका।
आस्ते-आस्ते ई घटित होमय लागल। ज्योति पँजियार बहिनिक ओहिठाम चलि गेलाह। मुदा ओतय अवहेलना भेटलन्हि। ज्योति ओतय सँ निकलि गेलाह। ओइटदल गाम पहुँचि गेलाह अपन संगी लगवारक लग। एकटा त्तंत्रिक अएलाह। कहल- बारह वर्ष धरि कदलीवनमे रहए पड़त। धर्मराजक आराधना करए पड़त। गहबड़ बनाए करची रोपी ओतए। बाँसक घर बनाऊ धर्मराजक हेतु। धर्मराज दर्शन देताह, अहाँ ठीक भ’ जायब। पँजियार चललाह, रस्तामे सैनी गाछ भेटलन्हि, ओकर छहमे सुस्तेलाह पँजियार, मुदा ओ’ गाछ सुखा गेल, अरड़ा कए खसि पड़ल।कोइलीकेँ कहलन्हि जे पानि आनि दिअ, ओ’ उड़ल तँ बिहाड़ आबि गेल। कोइली मरि गेल।पँजियार उड़ि कए पहुँचि गेलाह कदली वनमे। एकटा महिसबार कहलकन्हि जे अछ्मितपुर गाम जाऊ। महिसबार छलाह धर्मराज, बनि गेलाह भेम-भौरा। एकटा व्यक्त्ति भेटलन्हि। ओ’ कहलकन्हि जे आगू वरक गाछ भेटत, ओकर पात तोड़ू।ओहि पर अहाँक सभ प्रश्नक उत्तर रहत। ई कहि ओ’ परबा बनि गेल। वरक पात तोड़लन्हि ज्योति तँ ओहि पर लिखल छल, यैह छी अछ्मितपुर। ओतुक्का राजाकेँ बच्चा नहि छलन्हि। ज्योति आशीर्वाद देलन्हि। कहलन्हि, एकटा छगर ओहि दिन पोसब जाहि दिन गर्भ ठहरि जाय। हम कदली वनसँ आयब तँ ई छगर स्वयं खुट्ट्सँ खुजि जायत। 12 बरखक बाद ज्योति कदली वनसँ चललाह। कोइलीकेँ जीवित कए देलन्हि। सुखायल धारमे पानि आबि गेल। सैनीक गाछ हरियर कचोर भ’ जीबि उठल। अछ्मितपुर गाममे राजा कहलन्हि जे छागर आ’ पुत्र दुनू एकहि दिन मरि गेल। पँजियार पाठाकेँ जिआ देलन्हि, कहलन्हि जो तोँ कदलीवनक धारमे नाओ पर चढ़ि जो, मनुक्ख रूप भेटि जयतौक। तावत राजाक पुत्र सेहो कदलीवनसँ शिकार खेला’ कए घोड़ा पर चढ़ि कए आबि गेल। ज्योति पँजियार गाम पहुँचि गेलाह गमछामे गहबर लेने।
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 22, मंत्र 22) डाउनलोड करू।
विश्वक प्रथम देशभक्त्ति गीत
(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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12. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
पछिला अंकमे देल गेल श्रोत्रियक सातक बदलामे आठ श्रेणीमे ओ लोकनि क्रमबद्ध छथि- आ’ पञ्जीक कुल संख्या 185 अछि, जाहिमे 32 टा श्रोत्रिय आ’ 153 टा आन ब्राह्मणक श्रेणी अछि। जातुकर्ण गोत्र त्रिप्रवर जातुकर्ण/आंगीरस/भारद्वाज छथि। पहिने सभ क्यो अपन-अपन पुरखाक, आ’ वैवाहिक संबंधक लेखा स्वयं रखैत रहथि। हरसिंहदेवजी एहि हेतु एक गोट संस्थाक प्रारम्भ कलन्हि। मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ’ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक पंजी वैज्ञानिक आधार बला छल आ’ शुद्ध रूपेँ वंशावली परिचय छल। सभ ब्राह्मण कायस्थ आ’ क्षत्रिय एहिमे बराबर छलाह। मुदा महाराज माधव सिंहक समयमे शाखा पञ्जीक प्रारम्भ भेल आ’ श्रोत्रिय आदि विभाजन आ’ क्रमानुसारे छोट-पैघक आ’ ओहिसँ उपजल सामाजिक कुरीतिक प्रारम्भ भेल।

कर्ण कायस्थमे एकेटा गोत्र काश्यप अछि। मात्र मूलक अनुसारेँ उतेढ़ होइत अछि, मझौला दर्जाक गृहस्थ कहल जाइत अछि।

मूलसँ गोत्र सामान्यतः पता चलि जाइत अछि। किछु अपवादो छैक। जेना: ब्रह्मपुरा मूल, काश्यप/गौतम/वत्स/वशिष्ठ।(7टा)
करमहा- शाण्डिल्य (गौल शाखा)/ बाकी सभ वत्स गोत्री।
दुनू करमहामे विवाह संभव।
चैतन्य महाप्रभु: रमापति उपाध्याय करमहे तरौनी मूलक छलाह। ओ’ बंगाल चलि गेलाह, हुकर शिष्य रहथि चैतन्य महाप्रभु।
श्रोत्रियकेँ पुबारिपार आ’ शेषकेँ पछ्बारिपार सेहो कहल जाइत अछि।श्रोत्रियक पाँजिकेँ चौगाला(श्रेणी) मे विभक्त्त अछि। श्रोत्रिय पंञ्जीकेँ लौकित कहल जाइत अछि। कुल 8 टा चौगोल श्रेणी अछि।32 टा पञ्जी अछि। पञ्जी आ’ पानि अधोगामी होइत अछि। विवाह संबंधक कारणे समय बीतला पर उच्च श्रेणी समाप्त होइत जाइत अछि। प्रथम श्रेणी ताहि कारणसँ समाप्त भ’ गेल अछि।
शेष ब्राह्मण पछ्बारिपार कहबैत छथि। एहि मे 15 गोट श्रेणी अछि।153 टा पञ्जी अछि। एकरा नामसँ जेना महादेव झा पाँजि इत्यादि संबोधित कएल जाइत अछि।

(अनुवर्तते)
13. संस्कृत मिथिला –गजेन्द्र ठाकुर

सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा(बच्चा झा) (1860 ई.-1921 ई.)
(भाग-3)
पं. रत्नपाणि झाक पुत्र केँ बच्चा झाकेँ अपर गङ्गेश उपाध्याय सेहो कहल जाइत अछि। हिनकर प्रारम्भिक अध्ययन गामे पर भेलन्हि। तकरा बाद ओ’ विश्वनाथ झासँ अध्ययनक हेतु ‘ठाढ़ी’ गाम चलि गेलाह। फेर बबुजन झा आ’ ऋद्धि झासँ न्यायदर्शनक विधिवत अध्ययन कएलन्हि। फेर धर्मदत्त झा प्रसिद्ध बच्चा झा काशी गेलाह। ओतय स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वतीसँ मीमांसा, वेदान्तक अध्ययन कएलन्हि।
सन् 1886 ई. केर गप छी। एकटा पुष्करिणीक उद्घाटनक उत्सवमे दामोदर शास्त्री जी काशीसँ मिथिलाक राघोपुर ग्राममे निमंत्रित भेल छलाह। ओतय हुनकर शास्त्रार्थ परम्परानुसार बच्चा झाक विद्यागुरु ऋद्धि झासँ भेल छलन्हि। एहिमे ऋद्धि झा परास्त भेल छलाह। गुरुक पराजयक प्रतिशोध लेबाक हेतु सन् 1889 मे बच्चा झा काशी गेलाह। बच्चा झाक उम्र ओहि समयमे 29 वर्ष मात्र छलन्हि। ओ’ प्रायः दामोदर शास्त्रीकेँ लक्ष्य करैत छलाह, जे काशीक वैय्याकरणिक पण्डित लोकनिकेँ शब्द-खण्डक कोनो ज्ञान नहि छन्हि।बच्चा झा समस्त काशीक विद्वान् लोकनिकेँ शास्त्रार्थक हेतु ललकारा देलन्हि। दामोदर शास्त्रीसँ भेल शास्त्रार्थक वर्णन पछिला अंकमे कएल जा’ चुकल अछि। शास्त्रार्थ तीन दिन धरि चलल। ई शास्त्रार्थ सन्ध्यासँ शुरू होइत छल, आ’ मध्य रात्रि धरि चलैत छल।शास्त्रार्थक तेसर दिन दामोदर शास्त्री तर्क कएनाइ बन्न कए देलन्हि, आ’ श्रोताक रूपमे बच्चा झाक तर्क सुनैत रहलाह। पं शिवकुमार शास्त्री आ’ कैलाशचन्द्र शिरोमणि दू टा निर्णायक छलाह। शिरोमणिजीक दृष्टिमे वादी श्री बच्चा झाक पक्ष न्यायशास्त्रक दृष्टिसँ समुचित छल। शिवकुमारजीक सम्मतिमे प्रतिवादी श्री दामोदरशास्त्रीक पक्ष व्याकरणक मंतव्यानुसार औचित्यसम्पन्न छलन्हि।दुनू पण्डितक शास्त्रार्थ कलाक संस्तुति कएल गेल आ’ दुनू गोटेकेँ अपन सिद्धान्तक उत्कृष्ट व्यवस्थापनक लेल विजयी मानल गेल।
बच्चा झा गामेमे रहि कए अध्यापन करैत छलाह। मुदा महाराजाधिराज दरभंगा नरेश श्री रमेश्वरसिंहक अकाट्य आग्रहक कारणसँ मुजफ्फरपुरक धर्म समाज संस्कृत कॉलेजक प्रधानाचार्यक पद स्वीकार कएलन्हि।
मुदा एकर एकहि वर्षमे ओ’ शरीर त्याग कए देलन्हि। बच्चा झाजीकेँ समालोचकगण किछु उदण्ड आ’ अभिमानी मनबाक गलती करैत रहलाह अछि। मुदा एकटा उदाहरण हमरा लगमे एहन अछि, जाहिसँ ई गलत सिद्ध होइत अछि।
ई घटना एहन सन अछि। मुजफ्फरपुर धर्मसमाज संस्कृत विद्यालयमे बच्चा झा प्रधानाचार्य/अध्यक्ष पद पर छलाह, आ’ हुनकर शिष्य पं बालकृष्ण मिश्र ओतय प्रध्यापक छलाह। ओहि समय काशीक पण्डित-पत्रमे गंगाधर शास्त्रीक एकटा श्लोकक विषयमे बच्चा झा कहलन्हि, जे एहि श्लोकमे एकहि पदर्थ वारिधर एक बेर
मृदंग बजबय बला चेतन व्यक्त्तिक रूपमे आ’ दोसर बेर वैह अम्बुद- जवनिकारूपी अचेतन रूपमे वर्णित अछि। एतय पदार्थाशुद्धि अछि।
एहि पर हुनकर शिष्य बालकृष्ण टोकलखिन्ह- गुरुजी! एहिमे कोनो दोष नहि अछि। किएक तँ वारिकेँ धारण करए बला मेघ(वारिधर) केर स्थिति आकाशमे ऊपर होइत अछि, आ’ अम्बु(जल) केँ देबय बला मेघ (अम्बुद) केर स्थिति नीचाँ होइत अछि।अतः दुनूमे स्थानक भिन्नता अछि। वारिधर आ’ वारिद एहि दुनू शब्दसँ दू भिन्न अर्थ ज्ञात होइत अछि। ताहि हेतु एतय पदार्थक अशुद्धि नहि अछि।
ई श्लोक निम्न प्रकारे छल:-
मृदुमृदङ्गनिनादमनोहरे, ध्वनित वारिधरे चपला नटी।
वियति नृत्यति रङ्ग इवाम्बुदे, जवनिकामनुकुर्वति सम्प्रति॥
14. मैथिली भाषापाक (1)- गजेन्द्र ठाकुर विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary at http://www.videha.co.in/ विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे।


मूल्यांकन
अत्युत्तम- 14-15
उत्तम- 12-13
बड़-बढ़िया- 09-11

1.अरिया-दुर्भिक्ष: क. दाही ख. रौदी. ग. आरिक एक दिशि अकाल एक दिशि नहि घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
2. कोलपति: क. चोकटल ख. फूलल ग. मसुआयल. घ. बसिया।
3. दकचब: क. यत्र-तत्र काटब ख. तोड़ब ग.फोड़ब घ. घँसब।
4. थकुचब: क. आघात पहुँचायब. ख.फेकब, ग. लोकब. घ. खसब।
5. निहुछल: क. फेकल. ख. राखल. ग. देवताकेँ पूजब. घ. देवताक प्रदानार्थ अलगसँ राखब।
6. ओड़हा: क. बदाम भूजल(घूरमे) ख. सुखायल दाना. ग. तरल दाना. घ. भीजल दाना।
7.खखड़ी: क. दानाविहीन धान ख.दाना सहित धान. ग. उसनल धान घ. भुस्सा।
8. गोजू: क. डंटाकेँ पानिमे भेसू. ख. डंटाकेँ जमीनमे भेसू. ग. डंटाकेँ हवामे भेसू. घ. डंटाकेँ आगिमे भेसू।
9. बर्जब: क. त्यागब. ख. आनब. ग. सहब. घ. हँसब।
10. सिटब: क. फेँकब ख. आनि कए राखब. ग. आनि कए फेंकब. घ. विन्यासयुक्त्त करब।
11. खुटब: क. लटकायब. ख. सुखायब. ग. खुट्टा गाड़ि नापब. घ.एहिमे सँ कोनो नहि।
12. गेँटब: क. एम्हर-ओम्हर एकत्र करब ख. तराउपड़ी एकत्र करब.ग. एक पंत्तिमे राखब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
13. डपटब: क. हँसब. ख. कानब. ग. तमसायब घ. दुलार करब।
14. खटब: क. आलस्य करब. ख. फुर्ती करब. ग. अनवरत कार्य करब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
15. हँटब: क. भागब. ख. दूर जायब. ग. दबाड़ब. घ. हँसायब।
उत्तर
मैथिली भाषापाक (1) केर उत्तर:
1. ग. (खेतक आरिक एक दिशि नीक खेती एक दिशि नहि)।
2. क. चोकटल आम।
3. क. यत्र-तत्र काटब।
4. क. आघात पहुँचायब.
5. घ. देवताक प्रदानार्थ अलगसँ राखब।
6. क. बदाम भूजल(घूरमे)-खेतमे।
7. क. दानाविहीन धान(दुद्धा धान बाढ़िक पानिमे पूराडूबि गेलाक परिणाम)।
8. क. डंटाकेँ पानिमे भेसू।
9. क. त्यागब।
10. घ. विन्यासयुक्त्त करब।
11. ग. खुट्टा गाड़ि नापब।
12. ख. तराउपड़ी एकत्र करब।
13. ग. तमसायब।
14. ग. अनवरत कार्य करब।
15. ग. दबाड़ब।
मूल्यांकन
अत्युत्तम- 14-15
उत्तम- 12-13
बड़-बढ़िया- 09-11

15. रचना लेखन-गजेन्द्र ठाकुर विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary at http://www.videha.co.in/ विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे।

मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि, वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ’ जगतीक प्रयोग अछि।
1. गायत्री- 8-8 केर तीन पाद।
2. त्रिष्टुप- 11-11 केर 4 पाद।
3. जगती- 12-12 केर 4 पाद।
4. उष्णिक- 8-8 केर दू तकर बाद 12 वर्ण-संख्याक पाद।
5. अनुष्टुप- 8-8 केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि।
6. बृहती- 8-8 केर दू आ’ तकरा बाद 12 आ’ 8 मात्राक दू पाद।
7. पंक्त्ति- 8-8 केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ।
यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि।
(अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः।
(आ) गुण वृद्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि।
’ए’ केँ ‘अ’, ‘इ’।
‘ओ’ केँ ‘अ’, ‘उ’।
’ऐ’ केँ ‘अ’, ‘आ’।
’ए’ ‘औ’ केँ ‘अ’, वा ‘आ’ आ’ ‘ओ’।
एहू प्रकारेँ नहि भेलासँ अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि।
यथा- गायत्री(24), विराट् (22), निचृत्(23), शुद्धा(24),मुरिक् (25), स्वराट्(26) आदि।

वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ’ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। स्म्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतय आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्मे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभूतिक भाषामे रूप देल गेल अछि।
(अनुवर्तते)
नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली


1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता,बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता,विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि,मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत,जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग,याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे“ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु,ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके,अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६




आब 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ 2. मैथिली अकादमी, पटनाक मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू।

ग्राह्य / अग्राह्य


1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/ होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका’ कए तकाय तकाए
69. पैरे (on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे


71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे’
81. से/ के से’/के’
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा’
94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग ल’ग
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (to test)चिखइत
126. करइयो(willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग ल’ग
141. खेलाइ (for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो
145. केश (hair)
146. केस (court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो ड’रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के’
169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
193. से से’
194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा’
201. देखाय देखा’
202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब
204.गेलैन्ह/ गेलन्हि
205.हेबाक/ होएबाक
206.केलो/ कएलो
207. किछु न किछु/ किछु ने किछु
208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ
209. एलाक/ अएलाक
210. अः/ अह
211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन)
212.कनीक/ कनेक
213.सबहक/ सभक
214.मिलाऽ/ मिला
215.कऽ/ क
216.जाऽ/जा
217.आऽ/ आ
218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम
220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़
222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
223.कहिं/कहीं
224.तँइ/ तइँ
225.नँइ/नइँ/ नञि
226.है/ हइ
227.छञि/ छै/ छैक/छइ
228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
229.आ (come)/ आऽ(conjunction)
230. आ (conjunction)/ आऽ(come)
231.कुनो/ कोनो
२३२.गेलैन्ह-गेलन्हि
२३३.हेबाक- होएबाक
२३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ
२३५.किछु न किछ- किछु ने किछु
२३६.केहेन- केहन
२३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)
२३८. हएत-हैत
२३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ
२४०.एलाक- अएलाक
२४१.होनि- होइन
२४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)
२४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ
२४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२४५.शामिल/ सामेल
२४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं
२४७.जौँ/ ज्योँ
२४८.सभ/ सब
२४९.सभक/ सबहक
२५०.कहिं/ कहीं
२५१.कुनो/ कोनो
२५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल
२५३.कुनो/ कोनो
२५४.अः/ अह
२५५.जनै/ जनञ
२५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन)
२५७.केलन्हि/ कएलन्हि
२५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन)
२५९.कनीक/ कनेक
२६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि
२६१.निअम/ नियम
२६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़
२६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित

२६५.केर/-क/ कऽ/ के
२६६.छैन्हि- छन्हि
२६७.लगैए/ लगैये
२६८.होएत/ हएत
२६९.जाएत/ जएत
२७०.आएत/ अएत/ आओत
२७१.खाएत/ खएत/ खैत
२७२.पिअएबाक/ पिएबाक
२७३.शुरु/ शुरुह
२७४.शुरुहे/ शुरुए
२७५.अएताह/अओताह/ एताह
२७६.जाहि/ जाइ/ जै
२७७.जाइत/ जैतए/ जइतए
२७८.आएल/ अएल
२७९.कैक/ कएक
२८०.आयल/ अएल/ आएल



16. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS

Marriage dates as per KSD Samskrit University Panchang- 2008-09
november 2008 19,20,23,24,27,28,30, december 2008 1,3 february 2009 26,27, march 2009 4,9,11,12 april 2009 16,17 19,20,22,23,27,29, may 2009 3,4,6,7,8,17,20,21,24,25,31, june 20091,3,4,5,7,8,12,17,21,26,28,29 july 2009 1,2

YEAR 2008-09 FESTIVALS OF MITHILAमिथिलाक पाबनि-तिहार
Year 2008
ashunyashayan vrat- 19 july अशून्यशयन व्रत mauna panchmi- 23 july मौना पंचमी

madhusravani vrat samapt 4 august मधुश्रावनी व्रत समाप्त nag panchmi 6 august नाग पंचमी
raksha bandhan/ sravani poornima 16 august रक्षा बन्धन श्रावनी पूर्णिमा kajli tritiya 19 august कजली त्रितीया

sri krishna janmashtami- 23 august श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

srikrishnashtami 24 august श्रीकृष्णाष्टमी


kushotpatan/ kushi amavasya 30 august कुशोत्पाटन / कुशी अमावस्या haritalika vrat 2 september हरितालिका व्रत

chauth chandra 3 september चौठ चन्द्र

Rishi panchmi 4 september ऋषि पंचमी


karma dharma ekadasi vrat 11 september कर्मा धर्मा एकादशी व्रत indrapooja arambh 12 september इन्द्रपूजा आरम्भ anant pooja 14 september अनंत पूजा

agastya ardhdanam 15 september अगस्त्य अर्धदानम
pitripaksh aarambh 16 september पितृपक्ष आरम्भ

vishvakarma pooja 17 september विश्वकर्मा पूजा indr visarjan 18 september इन्द्र विसर्जन

srijimootvahan vrat 22 september श्री जीमूतवाहन व्रत
matrinavmi 23 september मातृनवमी somaavatee amavasya 29 september सोमावती अमावस्या

kalashsthaapana 30 september कलशस्थापन

vilvabhimantra/ belnauti 5 october विल्वाभिमंत्र/ बेलनौति


patrika pravesh 6 october पत्रिका प्रवेश mahashtami 7 october महाष्टमी mahanavmi 8 october महानवमी vijayadasmi 9 october विजयादशमी
kojagra 14 october कोजगरा dhanteras 26 october धनतेरस

deepavali- diyabati-shyamapooj a 28 october दीयाबाती/ श्यामापूजा/ दीयाबाती annakuta-govardhan pooja 29 october अन्नकूट गोवर्धन पूजा


bratridvitiya/ chitragupt pooja 30 october भ्रातृद्वितीया

khashthi kharna 3 november षष्ठी खरना

chhathi sayankalika arghya 4 navamber छठि सायंकालिक अर्घ्य

samaa pooja arambh- chhathi vratak parana 5 november सामा पूजा आरम्भ/ छठि व्रतक पारना


akshaya navmi 7 november अक्षय नवमी

devotthan ekadasi 9 november देवोत्थान एकादशी vidyapati smriti parv11 november विद्यापति स्मृति पर्व कार्तिक धवल त्रयोदशी kaartik poornima 13 november कार्तिक पूर्णिमा
shanmasik ravi vratarambh 30 november षाणमासिक रवि व्रतारम्भ

navan parvan 4 dec. नवान पार्वन

vivah panchmi 2 december विवाह पंचमी



Year 2009
makar sankranti 14 january मकर संक्रांति

narak nivaran chaturdasi 24 january नरक निवारण चतुर्दशी

mauni amavasya 26 january मौनी अमावस्या

sarasvati pooja 31 january सरस्वती पूजा


achla saptmi- 2 february अचला सप्तमी

mahashivratri vrat 23 february महाशिवरात्रि व्रत janakpur parikrama 26 february जनकपुर परिक्रमा holika dahan 10 march होलिका दहन
holi/ saptadora11 march होली सप्ताडोरा varuni yog 24 march वारुणि योग vasant/ navratrarambh 27 march वसंत नवरात्रारम्भ basant sooryashashthi/ chhathi vrat 1 april बसंत सूर्यषष्ठी/ छठि व्रत


ramnavmi 3 april रामनवमी

mesh sankranti 14 april मेष संक्रांति jurisital 15 april जूड़िशीतल

akshya tritiya 27 april अक्षय तृतिया
shanmasik ravivrat samapt 3 may षणमासिक रविव्रत समाप्त

janki navmi 3 may vatsavitri 24 may जानकी नवमी

gangadashhara 2 june गंगादशहरा
somavati amavasya 22 june सोमवती अमावस्या
jagannath rath yatra 24 june जगन्नाथ रथयात्रा saurath sabha arambh 24 june सौराठ सभा आरम्भ


saurath sabha samapti 2 july सौराठ सभा समाप्ति harishayan ekadashi 3 july हरिशयन एकादशी
aashadhi guru poornima 7 july आषाढ़ी गुरु पूर्णिमा






DATE-LIST (year- 2009-10)
(१४१७ साल)
Marriage Days:
Nov.2009- 19, 22, 23, 27
May 2010- 28, 30
June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30
July 2010- 1, 8, 9, 14
Upanayana Days: June 2010- 21,22
Dviragaman Din:
November 2009- 18, 19, 23, 27, 29
December 2009- 2, 4, 6
Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25
March 2010- 1, 4, 5
Mundan Din:
November 2009- 18, 19, 23
December 2009- 3
Jan 2010- 18, 22
Feb 2010- 3, 15, 25, 26
March 2010- 3, 5
June 2010- 2, 21
July 2010- 1
FESTIVALS OF MITHILA
Mauna Panchami-12 July
Madhushravani-24 July
Nag Panchami-26 Jul
Raksha Bandhan-5 Aug
Krishnastami-13-14 Aug
Kushi Amavasya- 20 August
Hartalika Teej- 23 Aug
ChauthChandra-23 Aug
Karma Dharma Ekadashi-31 August
Indra Pooja Aarambh- 1 September
Anant Caturdashi- 3 Sep
Pitri Paksha begins- 5 Sep
Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep
Matri Navami- 13 Sep
Vishwakarma Pooja-17Sep
Kalashsthapan-19 Sep
Belnauti- 24 September
Mahastami- 26 Sep
Maha Navami - 27 September
Vijaya Dashami- 28 September
Kojagara- 3 Oct
Dhanteras- 15 Oct
Chaturdashi-27 Oct
Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct
Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct
Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct
Chhathi- -24 Oct
Akshyay Navami- 27 Oct
Devotthan Ekadashi- 29 Oct
Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov
Somvari Amavasya Vrata-16 Nov
Vivaha Panchami- 21 Nov
Ravi vrat arambh-22 Nov
Navanna Parvana-25 Nov
Naraknivaran chaturdashi-13 Jan
Makara/ Teela Sankranti-14 Jan
Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan
Mahashivaratri-12 Feb
Fagua-28 Feb
Holi-1 Mar
Ram Navami-24 March
Mesha Sankranti-Satuani-14 April
Jurishital-15 April
Ravi Brat Ant-25 April
Akshaya Tritiya-16 May
Janaki Navami- 22 May
Vat Savitri-barasait-12 June
Ganga Dashhara-21 June
Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul
Guru Poornima-25 Jul

DATE-LIST (year- 2009-10)
(१४१७ साल)
Marriage Days:
Nov.2009- 19, 22, 23, 27
May 2010- 28, 30
June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30
July 2010- 1, 8, 9, 14
Upanayana Days: June 2010- 21,22
Dviragaman Din:
November 2009- 18, 19, 23, 27, 29
December 2009- 2, 4, 6
Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25
March 2010- 1, 4, 5
Mundan Din:
November 2009- 18, 19, 23
December 2009- 3
Jan 2010- 18, 22
Feb 2010- 3, 15, 25, 26
March 2010- 3, 5
June 2010- 2, 21
July 2010- 1
FESTIVALS OF MITHILA
Mauna Panchami-12 July
Madhushravani-24 July
Nag Panchami-26 Jul
Raksha Bandhan-5 Aug
Krishnastami-13-14 Aug
Kushi Amavasya- 20 August
Hartalika Teej- 23 Aug
ChauthChandra-23 Aug
Karma Dharma Ekadashi-31 August
Indra Pooja Aarambh- 1 September
Anant Caturdashi- 3 Sep
Pitri Paksha begins- 5 Sep
Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep
Matri Navami- 13 Sep
Vishwakarma Pooja-17Sep
Kalashsthapan-19 Sep
Belnauti- 24 September
Mahastami- 26 Sep
Maha Navami - 27 September
Vijaya Dashami- 28 September
Kojagara- 3 Oct
Dhanteras- 15 Oct
Chaturdashi-27 Oct
Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct
Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct
Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct
Chhathi- -24 Oct
Akshyay Navami- 27 Oct
Devotthan Ekadashi- 29 Oct
Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov
Somvari Amavasya Vrata-16 Nov
Vivaha Panchami- 21 Nov
Ravi vrat arambh-22 Nov
Navanna Parvana-25 Nov
Naraknivaran chaturdashi-13 Jan
Makara/ Teela Sankranti-14 Jan
Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan
Mahashivaratri-12 Feb
Fagua-28 Feb
Holi-1 Mar
Ram Navami-24 March
Mesha Sankranti-Satuani-14 April
Jurishital-15 April
Ravi Brat Ant-25 April
Akshaya Tritiya-16 May
Janaki Navami- 22 May
Vat Savitri-barasait-12 June
Ganga Dashhara-21 June
Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul
Guru Poornima-25 Jul


VIDEHA,MITHILA,TIRBHUKTI,TIRHUT……
Mahabharata mentions King of Videha as a very pious king engaged in dis¬cussing with the sage Vasistha on some philosophical doct¬rines. Nimi Jataka says that Kalara Janaka renounced the world and brought his line to an end. On the other hand Arthasastra and Buddha Charita give a different story. In the Arthasastra it is stated that Bhoja, known by the name of Dundakya, making a lascivious attempt on a Brahmana maiden, perished along with his kingdom and relations; so also Karala, the Vaideha. The Jayamangala commentary of Bhikshu Prabha¬mati on the same passage of the Arthasastra further explains that the king Karala Vaideha on his pilgrimage to Yogesvara, seeing the crowd with curiosity, glanced a young and beautiful wife of a Brahmana, and being struck with passion, he took her forcibly to the city. The Brahmana went to the city crying angrily "Why does that town not crack where such an evil soul resides ?" Consequently the earth cracked and the king perished in it along with his whole family. Buddha Charita of Asvaghoshaalso says ‘ Karala Janaka took away a Brahmana maiden and gained nothing but ruin; still he did not give up passion.The Mahabharata refers to the old story of a great battle between Pratardana, king of Kasi according to the Ramayana, and Janaka, king of Mithila. In the time of the great Janaka, Ajatashatru, king of Kasi, could hardly conceal his jealousy of the Videhan king's fame. The list of the kings of Videha of Mithila found in the Dipavamsa later on seems to refer to kings of Varanasi, having mentioned the first and last kings of the Videha . Ajatasatru of Kasi was a rival of Janaka Vaideha on a spiritual level. He wanted to give a thousand cows to the describer of Brahma and be called by the people as a Janaka.
The heroes of -Kasi and Videha were expert bowmen. Lichchhavis had some blood relationship with the royal family of the Kasi. It is,however, nowhere , Lichchhavis put an end to the royal line of Videha.Much amity was there between Videha and Kasi,particularly in the post Bharata War period. In the pre-Bharata war period also the kings of Kasi, Vaisali and Videha had fought against their common enemies, the Haihayas and the Nagas. The use of Kali cloth by the Brahmanas of Videha shows that brisk trade was going on between these two terri-tories. At Takshasila, princes of both the kingdoms went for completing their higher education. Nami (Nimi II), king of Videha, accepted Jainism according to the Jaina tradition and accepted the religion propagated by Parsvanatha,formerly a prince of Kasi. The compound name Kasi-Videha occurs in the Kaushitaki-Upanishad. The Sankhayana Srauta¬Sutra mentions one Purohita as acting for the kings of Kosala, Kasi and Videha. Kasi people had a share in the overthrow of the Janaka dynasty.The centre of gravity in North Bihar shifts from Mithila to Vaisali. Ramayana refers to Siradhvaja Janaka's father going to the forest after giving the throne to his elder son.
There were frequent renunciations by the kings of Mithila. The most celebrated among the post-Bharata War kings of Videha was the ruler Janaka Vaideha, whose reign saw an unusual outburst of learning, sacrificial cult and intellectual activity. This attitude of non attachment is most prominently reflect¬ed in the famous royal utterances about the burning of Mithila. "My wealth is boundless, yet I have nothing. If the whole of Mithila were burnt to ashes, nothing of mine will be burnt.
There were ten kingly duties in Jatakas."Alms, morals, charity, justice, penitence, peace, mildness, mercy, meekness, patience."

Mahajanaka II was sixteen years oldwhen he had learned the three Vedas and all the sciences.A Videhan princess used to go to Takshsila for higher education and it was usual for the princess to get married after their return from Takshsila. If there were two princes, the elder became Uparaja and the younger was given the post of Senapati. After the death of the King elder ascended to the throne as a king and the younger was appointed Uparaja.
The palaces of Mithila has been magnificently described in literature.The king rode on chariot drawn by four milkwhite thorough-breds when making circuit of the capital city.The Videhan king had a Samiti, helped in administration by the Uparaja, the Purohita, the Ministers, Senapati and the Chief Judges, there was a treasurer, cashier, keeper of the umbrella,sword-bearer, female-attendants, noblemen, policemen, chariot-driver and village-heads.The army was under the Senapati having fourfold divisions, the chariots, elephants, horse¬-men and footmen. The people of Videha and Kasi used bows and arrows against their enemies. Right conduct was the only way to bliss.A thousand Vedas will not bring safety. When Uddalaka put forth the character of a Brahmana as he apparently sees in real life,i.e., as one who rejects all worldly thoughts, takes the fire with him, sprinkles water, offers sacrifices and sets up the sacrificial post, his father replies in his own way. A principal landowner of Mithila, Alara by name, becoming an ascetic. Sivah, a queen of Mithila, also adopted the ascetic life of a rishi.
The father was the first teacher. Direct contact between the teacher and the taught was emphasised. The period required for study was generally twelve years. Brahmanas did not hesitate to receive instruction from Kshatriya princess. The Brahmin of Mithila town are shown as dressed in Kasi cloth. The story of Mahajanaka II going to Suvarnabhumi (Myanmar) for trade purposes and lost his ship.There was availability of beautiful stone pieces in the Gandak river which were much later worshipped as Salagrama (a form of Vishnu). Videh contained 16000 villages, 16000 store-houses and 16000 dancing girls.Mithila city has four gates and there existed four market-towns.
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1 comment:

  1. मान्यवर,
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...