Sunday, July 27, 2008

विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8 8. संस्कृत शिक्षा(आँगा)-गजेन्द्र ठाकुरः

8. संस्कृत शिक्षा
(आँगा)
गीतम्
-गजेन्द्र ठाकुर
पथिकः चलितुं गच्छति दूरे,
तत्र आगमिष्यति लक्ष्यम् एकम्।
किमपि न चलितुमं शक्नोमि मम,
इति चिन्तयति सः पथिकः भीते।
तत्र आगच्छति साहसम् एकम्,
पृच्छति वत्स चिन्तयति किम हृदयम्।

मस्तिष्के चिन्तयतु प्राप्नुम लक्ष्यम्,
पथिकः चलति गच्छति अग्रे शीघ्रम्,
प्राप्यते लक्ष्यं सिद्धयति स्वप्नम्।

सुभाषितम्
वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्वः।

उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः।
आरिषु यः साधुः स सादुरिति कीर्तितः॥

वयम् इदानीम यत सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। लोके केचन् जनाः अस्माकम् उपकारं कुर्वन्ति, अन्य केचन् अपकारं कुर्वन्ति। ये उपकारं कुर्वन्ति तेषां विष्ये सर्वे संतुष्टाः भवन्ति, तेषां विषये साधुत्वं दर्शयन्ति एव, किन्तु यः अपकारं करोति तस्य विषये अपि यः साधुत्वं दर्शयन्ति यः तस्यापि उपकारं करोति सः वस्तुतः साधुः। अन्यथा यः मम उपकारं करोति तस्य अहम् उपकारं करोमि चेत् तत्र साधुत्वं किमपि नास्ति। यः अपकारं करोति तस्यापि यः उपकारं करोति सः वस्तुतः साधुः।

कथा

अहम् इदानीम् एकं लघु कथां वदामि।

कश्चन् ग्रामः आसीत्। तस्मिन् ग्रामे एकः पण्डितः आसीत्। सः महान् विद्वान्, अनेकेषु शास्त्रेषु निष्णातः आसीत्। सः प्रतिदिनम् अध्ययनं करोति, प्रतिदिनम् अध्यापनम् अपि करोति, प्रतिदिनं पाठं करोति। दूर-दूरतः अपि छात्राः प्रतिदिनं तस्य समीपम् आगत्य शिक्षणं प्राप्तवन्ति।, प्रतिदिनं पाठार्थम् आगछन्ति। तस्य पण्डितस्य एकः पुत्रः आसीत्। पुत्रस्य विषये पण्डितस्य महती प्रीतिः आसीत्। सः पुत्रः अपि सम्यक पठति स्म। एकस्मिन् दिने छात्राः यथापूर्वं गुरोः समीपम् आगतवन्तः। गुरुः तान् सर्वान् यथापूर्वं पाठितवान्। व्याकरण वा न्यायशास्त्रं वा किंचित्
शास्त्रं सः सर्वान् छात्राण् यथापूर्वं पाठितवान्। छात्राः सर्वे पाठं श्रुत्वा सन्तुष्टाः स्व ग्रामम् अन्नतरं गतवन्तः। सायांकालः अभवत्।
तस्मिन् दिने अकस्मात् तस्य पण्डितस्य पुत्रस्य महान् ज्वरः आगच्छ। सः औषिधम् आनीतवान्। परन्तु प्रयोजनं न भवथ। रात्रि समये सः बालकः मृतः एव अभवत्। पण्डितस्य एकः एव पुत्रः। सः पुत्रः अपि मृतः अभवत्। पण्डितस्य महत् दुःखं जातम्। सहजं सः बहुदुःखेन् एव पुत्रस्य कार्याणि याणि करिणियानि तानि सर्वानि कृतवान्। तस्य शिष्याः सर्वे अन्य ग्रामेषु निवसन्तु। ते एतां वार्त्तां न जानन्तु। अनन्तर दिने प्रातः काले ते सर्वे यथा पूर्वं पाठार्थम् आगतवन्तः। गुरुः दृष्टवान्। सर्वे छात्राः पाठार्थम् आगतवन्तः। गुरुः स्वस्थाने उपविष्टवान्। सर्वानापि पाठितवान्। प्रतिदिनम् यथा पाठयति तथैव एक घण्टा पर्यन्तं पाठनं कृतवान्। पाठः समाप्ता छात्राः सर्वे गुरोः पुत्रं न दृष्टवन्तः। अद्य पुत्रः न दृश्यते। कुत्र इति तेषां संशयाः भवन्ति। ते गुरुं पृष्टवन्तः।
भवतः पुत्रः कुत्र।
तदा गुरुः सर्वम् उक्त्तवान्।
छात्राः उक्त्तवन्तः- कीदृशः भवान्।
किमर्थम् अस्मान् पूर्वमेव न उक्त्तवान्। तदा गुरुः उक्त्तवान्- भवन्तः सर्वे दूर-दूर ग्रामतः पाठं श्रोतुम् आगतवंटः। एतावंटः शिष्याःदूरतः पाठं श्रोतुम्
आगतवन्तः। अहं पाठं न करोति चेत्, भवताम् सर्वेषाम् समयः व्यर्थः न भवति ? अतः पाठनं मम् धर्मम्।
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सम्भाषणम्
वयम् आरम्भे पूर्वतन् पठस्य किंचित् स्मरण कुर्मः।

ददाति ददामि दापयामि दापयति
पठति पठामि पाठयामि पाठयति
अत्र बहूनि वस्तूनि सन्ति।
करदीपः अस्ति।
अहं करदीपं स्वीकरोमि।
अहं उपनेत्रं ददामि।
स्वीकरोतु।
करदीपं ददामि।
तथा वाक्यानि वदामः।
इदानीं भवन्तः एकम् एकं वाक्यं वदन्ति एव, किम् किम् ददति।
वदन्तु।
भवती फलं ददाति।
अहं लेखनीं ददामि।
कृपया उपनेत्रं ददातु।
मम् समीपे बहूनि वस्तूनि सन्ति।
अहम् एकम् एकं वस्तु दर्शयामि।
करदीपः- कृपया करदीपं ददातु।
दंतकूर्चः- कृपया दंतकूर्चं ददातु।
ध्वनिमुद्रिकाम्
सान्द्रमुद्रिकाम्
-अन्यम् एकम् अभ्यासम् कुर्मः।
-अहम् एकम् वाक्यं लिखामि।
मयूरः पठति।
अहम् अन्नं खादामि।
चिन्तयन्तु। अहल्याः मम् अतिथिः अस्ति। सा मम् गृहम् आगच्छति। अहं कथं सम्भाषणं करोमि । श्रुणवन्तु।
भो:। आगच्छतु। उपविशतु।
कुशलं वा। आम् सर्वं कुशलम्।
अत्रापि सर्वं कुशलं।
गृहे सर्वं कुशलम्।
माता कुशलिनी अस्ति।
किंचित् पानीयं ददामि।
संकोचं मास्तु।
मास्तु।
किंचित् स्वीकरोतु।
किंचित्।
चायं ददामि।
सम्यक् अस्ति।
किंचित् स्वीकरोतु। मास्तु।
किंचित् शर्करा आवश्यकी।
किंचित् न आवश्यकम्।
सावधानं स्वीकरोतु।
कः विशेषः।
मम् गृहे श्वः पूजा अस्ति।
कस्मिन् समये पूजा।
भगिनी नास्ति वा।
सर्वे आगच्छन्तु।
आगच्छामः।
पुनर्मिलामः।
आगच्छतु।
धन्यवादः।
कुशलम् वा।
आम कुशलम्।
कः विशेषः।
विशेषः कोपि नास्ति।
गृहे सर्वं कुशलम्।
आम् कुशलम्।
पिता कार्यालयं गतवान्।
अनुजस्य परीक्षा समाप्ता।
भो विस्मृतवान्।
किमपि।
पानीयं किम् स्वीकरोति। मास्तु।
संकोचः मास्तु।
किंचित् किंचित् ददातु।
स्वीकरोतु भोः।
किम् ददामि।
फलरसम् ददातु।
अस्तु ददामि।
अन्य विशेषः कः।
कोपि नास्ति।
अस्तु अहं गच्छामि।
किंचित् कालं तिष्ठतु।
न गच्छामि।
अस्तु धन्यवादः।
आसन्दः मम् पुरतः अस्ति।
उत्पीठिका मम् पृष्ठतः अस्ति।
संगणकं पुरतः अस्ति।
कूपी पृष्ठतः अस्ति।
प्रिया मेघायाः पुरतः अस्ति।
अहल्या मेघायाः पृष्ठतः अस्ति।
विजयः पुरतः आगच्छतु।
न न पृष्ठतः गच्छतु।
प्रसन्नः दक्षिणतः अस्ति।
प्रिया मम् वामतः अस्ति।
मम् दक्षिणतः कः अस्ति।
मम् वामतः कः अस्ति।
स्वर्गः आकाशः उपरि अस्ति।
पातालं भूमिः अधः अस्ति।
रघुवंशः रामायणस्य उपरि अस्ति।
ब्रह्मसूत्रं महाभारतस्य उपरि/अधः अस्ति।
रामायणं महाभारतस्य अधः अस्ति।
पुरतः/पृष्ठतः/वामतः/दक्षिणतः/उपरि/अधः/
अहं पठयामि।
एवं तिष्ठतु।
पुरतः/पृष्ठतः/दक्षिणतः/वामतः/
हस्तम् एवं करोतु।
पुरतः/पृष्ठतः/दक्षिणतः/वामतः।
(अनुवर्तते)
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1 comment:

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...