Sunday, July 27, 2008

विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8 2. नाटक श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’नो एंट्री : मा प्रविश

2. नाटक

श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-1951 ई. कलकत्तामे।1966 मे 15 वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’ | 1971 ‘अमृतस्य पुत्राः’(कविता संकलन) आ’ ‘नायकक नाम जीवन’(नाटक)| 1974 मे ‘एक छल राजा’/’नाटकक लेल’(नाटक)। 1976-77 ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। 1978मे जनक आ’ अन्य एकांकी। 1981 ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। 1988 ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। 1997-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। 1998 ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। 1999 ‘अश्रु ओ परिहास’। 2002 ‘खाम खेयाली’। 2006मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आ’ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। 14 टा पी.एह.डी. आ’ 29 टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आ’ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर।
नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि-अंकीय मैथिली नाटक)
नाटककार
उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’
निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर
(मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।)
पहिल अंक जारी....विदेहक एहि आठम अंक 15 अप्रैल 2008 सँ|
नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि-अंकीय मैथिली नाटक)
पात्र–परिचय
पर्दा उठितहि –
ढोल–पिपही, बाजा–गाजा बजौनिहार–सब
दूटा चोर, जाहि मे सँ एक गोटे पॉकिट–मार आ
एकटा उचक्का
दू गोट भद्र व्यक्ति
प्रेमी
प्रेमिका
बाजार सँ घुरैत प्रौढ़ व्यक्ति
बीमा कंपनीक एजेंट
रद्दी किनै–बेचैबला
भिख-मंगनी
रमणी-मोहन
नंदी–भृंगी
कैकटा मृत सैनिक

बाद मे
नेता आ नेताक एक-दूटा चमचा/अनुयायी
अभिनेता
वाम-पंथी युवा
उच्च–वंशीय महिला

अंत मे
यम
चित्रगुप्त



प्रथम कल्लोल

[एकटा बड़का–टा दरबज्जा मंचक बीच मे देखल जाइछ। दरबज्जाक दुनू दिसि एकटा अदृश्य मुदा सक्कत देवार छैक, जे बुझि लेबाक अछि– कखनहु अभिनेता लोकनिक अभिनय–कुशलता सँ तथा कतेको वार्तालाप सँ से स्पष्ट भ’ जाइछ। मंच परक प्रकाश–व्यवस्था सँ ई पता नहि चलैत अछि जे दिन थिक अथवा राति, आलीक कनेक मद्धिम, सुर–संगत होइत सेहो कने मरियल सन।
एकटा कतार मे दस–बारह गोटे ठाढ़ छथि–जाहि मे कैकटा चोर–उचक्का, एक-दू गोटे भद्र व्यक्तित मुदा ई स्पष्ट जे हुनका लोकनिक निधन भ’ चुकल छन्हि। एकटा प्रेमी–युगल जे विष-पान क’ कए आत्म-हत्या कैल अछि, मुदा एत’ स्वर्गक (चाही त’ नरकक सेहो कहि सकै छी) द्वार लग आबि कए कने विह्वल भ’ गेल छथि जे आब की कैल जाइक। एकटा प्रौढ व्यक्तित जे बजारक झोरा ल’ कए आबि गेल छथि–बुझाइछ कोनो पथ–दुर्घटनाक शिकार भेल छथि बाजार सँ घुरैत काल। एकटा बीमा कंपनीक एजेंट सेहो छथि, किछु परेशानी छनि सेहो स्पष्ट। एकटा रद्दीबला जे रद्दी कागजक खरीद–बिक्री करैत छल, एकटा भिखमंगनी–एकटा पुतलाकेँ अपन बौआ (भरिसक ई कहै चाहैत छल जे वैह छल ओकर मुइल बालक अथवा तकर प्रतिरूप) जकाँ काँख तर नेने, एक गोट अत्यंत बूढ़ व्यक्ति सेहो, जनिक रमणी–प्रीति एखनहु कम नहि भेल छनि, हुनका हमसब रमणी–मोहने कहबनि।
सब गोटे कतार मे त’ छथि, मुदा धीरजक अभाव स्पष्ट भ’ जाइछ। क्यो-क्यो अनकाकेँ लाँघि आगाँ जैबाक प्रयास करैत छथि, त’ क्यो से देखि कए शोर करय लागैत छथि। मात्र तीन–चारिटा मृत सैनिक–जे कि सब सँ पाछाँ ठाढ़ छथि, हुनका सबमे ने कोनो विकृति लखा दैछ आ ने कोनो हड़बड़ी।
बजार-बला वृद्ध : हे – हे – हे देखै जाउ... देखि रहलछी कि नहि सबटा तमाशा... कोना–कोना क’ रहल छइ ई सब !
की ? त’ कनीटा त’ आगाँ बढ़ि जाई !
[एकटा चोर आ एकटा उचक्का केँ देखा कए बाजि रहल छथि, जे सब ओना त’ चारिम तथा पाँचम स्थान पर ढ़ाढ छैक, मुदा कतेको काल सँ अथक प्रयास क’ रहल अछि जे कोना दुनू भद्र व्यक्ति आ प्रेमी–प्रेमिका युगलकेँ पार क’ कए कतारक आगाँ पहुँचि जाई!]

बीमा एजेंट : [नहि बूझि पबैत छथि जे ओ वृद्ध व्यक्ति हुनके सँ
किछु कहि रहल छथि कि आन ककरहु सँ। बजार-
बला वृद्ध सँ आगाँ छल रद्दी बेचैबला आ तकरहु
सँ आगाँ छलाह बीमा बाबू।] हमरा किछु कहलहुँ ?

बाजारी : अहाँ ओम्हर देखब त’ बूझि जायब हम की कहि
रहल छी आ ककरा दय...! [अकस्मात् अत्यंत
क्रोधक आवेश मे आबि ] हे रौ! की बुझै छहीं...
क्यो नहि देखि रहल छौ ? [बीमा बाबू केँ बजारक झोरा थम्हबैत -] हे ई धरू त’! हम देखै छी।
[कहैत शोर करैत आगाँ बढ़ि कए एकटा चोर आ उचक्का केँ कॉलर पकड़ि कए घसीटैत पुनः पाछाँ चारिम-पाँचम स्थान पर ल’ अबैत छथि, ओसब वाद–प्रतिवाद कर’ लगैत अछि -]

चोर : हमर कॉलर कियै धरै छी ?
उचक्का : हे बूढ़ौ ! हमर कमीज, फाड़ि देबैं की ?
बाजारी : कमीजे कियैक ? तोहर आँखि सेहो देबौ हम फोड़ि !
की बूझै छेँ ? क्यो किछु कहै बाला नहि छौ एत’?
उचक्का : के छै हमरा टोकै–बला एत’? देखा त’ दिय’ ?
चोर : आहि रे बा ! हम की कैल जे हमर टीक धैने छी?
दोसर चोर : (जे कि असल मे पॉकिट–मार छल) हे हे,
टीक छोड़ि दी, नंगड़ी पकड़ि लियह सरबा क !
चोर : (गोस्सा सँ) तोँ चुप रह ! बदमाश नहितन !
पॉकिटमार : (अकड़ि कए) कियै ? हम कियै नहि बाजब ?
उचक्का : (वृद्ध व्यक्तिक हाथ सँ अपना केँ छोड़बैत) ओय खुदरा !
बेसी बड़बड़ैलें त’... (हाथ सँ इशारा करैत अछि गरा
काटि देबाक)
पॉकिटमार : त’ की करबें ?
उचक्का : (भयंकर मुद्रामे आगाँ बढ़ैत) त’ देब धड़ सँ गरा केँ
अलगाय... रामपुरी देखने छह ? रामपुरी ? (कहैत एकटा
चाकू बहार करैत अछि।)
चोर : हे, की क’ रहल छी... भाइजी, छोड़ि दियौक ने !
बच्चा छै... कखनहु–कखनहु जोश मे आबि जाइ छै !
भद्र व्यक्ति 1 : (पंक्तिक आगाँ सँ) हँ, हँ... छोड़ि ने देल जाय !
उचक्का : [भयंकर मुद्रा आ नाटकीयता केँ बरकरार रखैत
पंक्तिक आगाँ दिसि जा कए... अपन रामपुरी
चाकू केँ दोसर हाथ मे उस्तरा जकाँ घसैत ] छोड़ि
दियह की मजा चखा देल जाय ? [एहन भाव–
भंगिमा देखि दुनू भद्र व्यक्ति डरै छथि–प्रेमी–
युगल अपनहिमे मगन छथि; हुनका दुनू केँ
दुनियाक आर किछु सँ कोनो लेन-देन नहि...] की ?
[घुरि कए पॉकिट–मार दिसि अबैत... तावत् ई
सब देखि बाजारी वृद्धक होश उड़ि जाइत छनि...
ओ चोरक टीक/कॉलर जे कही... छोड़ि दैत छथि
घबड़ा कए ] की रौ ? दियौ भोंकि ? आ कि…?
चोर : उचकू–भाइजी ! बच्चा छै... अपने बिरादरीक
बुझू...! [आँखि सँ इशारा करै छथि।]
उचक्का : [अट्टहास् करैत] ऐं ? अपने बिरादरीक थिकै ?
[हँसब बंद कए- पूछैत] की रौ ? कोन काज करै
छेँ?
[पॉकिट-मार डरेँ किछु बाजि नहि पबैत अछि–
मात्र दाहिना हाथक दूटा आङुर केँ कैंची जकाँ चला
कए देखबैत छैक।]
उचक्का : पॉकिट-मार थिकेँ रौ ? [पुनः हँस’ लागै छथि-छूरी केँ
तह लगबैत’]
चोर : कहलहुँ नहि भाईजी ? ने ई हमरा सन माँजल चोर
बनि सकल आ ने कहियो सपनहु मे सोचि सकल
जे अहाँ सन गुंडा आ बदमाशो बनि सकत !
उचक्का : बदमाश ? ककरा कहलेँ बदमाश ? आँय !
पॉकिट-मार : हमरा, हुजूर ! ओकर बात जाय दियह ! गेल छल
गिरहथक घर मे सेंध देब’... जे आइ ने जानि कत्ते टका-पैसा-गहना भेटत ! त’ पहिले बेरि मे
जागि गेल गिरहथ, आ तकर चारि–चारिटा
जवान-जहान बालक आ सँगहि आठ–आठटा
कुकुर... तेहन ने हल्ला मचा देलक जे पकड़ि कए
पीटैत–पीटैत एत’ पठा देलक ! [हँसैत... उचक्का
सेहो हँसि दैत अछि] आब बुझु ! ई केहन चोर थिक !
(मुँह दूसैत) हमरा कहैत छथि !
[कतारक आनो-आन लोक आ अंततः सब गोटे
हँसय लागैत छथि]
भद्र-व्यक्तित 1: आँय यौ,चोर थिकौं ? लागै त’ नहि छी चोर
जकाँ...
चोर : किएक ? चोर देख’ मे केहन होइत छैक ?
पॉकिट-मार : हमरा जकाँ...! (कहैत, हँसैत अछि, आरो एक-दू
गोटे हँसि दैत छथि।) चललाह भिखारी बौआ बन’... ?
की ? त’ हम तस्कर-राज छी ! [कतहु सँ एकटा
टूल आनि ताहि पर ठाढ़ होइत... मंचक आन
दिसिसँ भाषणक भंगिमा मे] सुनू, सुनू, सुनू, भाई–भगिनी! सुनू सब गोटे! श्रीमान्, श्रील 108
श्री श्री बुद्धि-शंकर महाराज तस्कर सम्राट आबि
रहल छथि! सावधान, होशियार! [एतबा कहैत टूल
पर सँ उतरि अपन हाथ-मुँहक मूकाभिनयसँ
एहन भंगिमा करैत छथि जेना कि भोंपू बजा
रहल होथि... पाछाँ सँ भोंपू – पिपहीक शब्द
कनिये काल सुनल जाइछ, जाबत ओ ‘मार्च’ करैत
चोर लग अबैत अछि...]
चोर : [कनेक लजबैत] नहि तोरा हम साथ लितहुँ ओहि
रातिकेँ, आ ने हमर पिटाइ देखबाक मौके तोरा
भैटतिहौक! [कहैत आँखि मे एक-दूइ बुन्न पानि
आबि जाइत छैक।]
पॉकिट-मार : आ-हा-हा! एहि मे लजबैक आ मोन दुखैक कोन
गप्प?
[थम्हैत, लग आबि कए] देखह! आइ ने त’
काल्हि-चोरि त’ पकड़ले जाइछ। आ एकबेर जँ भंडा-
फोड़ भ’ जाइत अछि त’ बज्जर त’ माथ पर खसबे
करत ! सैह भेल... एहि मे दुख कोन बातक ?
उचक्का : (हँसैत) हँ, दुखी कियै होइ छहक?
बाजारी : [एतबा काल आश्चर्य भए सबटा सुनि रहल छलाह।
आब रहल नहि गेलनि – अगुआ कए बाजय
लगलाह]
हे भगवान! हमर भाग मे छल स्वस्थहि शरीर मे
बिना कोनो रोग-शोक भेनहि स्वर्ग मे जायब... तैँ
हम एत’ ऐलहुँ, आ स्वर्गक द्वार पर ठ़ाढ छी
क्यू मे...! मुदा ई सब चोर–उचक्का जँ
स्वर्गे मे जायत, तखन केहन हैत ओ स्वर्ग
रहबाक लेल ?
पॉकिट-मार : से कियै बाबा ? अहाँ की बूझै छी, स्वर्ग त’ सभक
लेल होइत अछि ! एहि मे ककरहु बपौती त’ नञि।
बाजारी : [बीमा एजेंट केँ] आब बूझू ! आब....
चोर सिखाबय गुण केर महिमा,
पॉकिट–मारो करै बयान!
मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि,
पाट–कपाट त’ जय सियाराम !

[चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।]
चोर : ई त’ नीक फकरा बनि गेल यौ!
पॉकिट-मार : एम्हर तस्कर-राज त’ ओम्हर कवि-राज!
बाजारी : (खौंझैत’) कियै ? कोन गुण छह तोहर, जकर
बखान करै अयलह एत’?
पॉकिट-मार : (इंगित करैत आ हँसैत) हाथक सफाई... अपन
जेब मे त’ देखू , किछुओ बाकी अछि वा नञि...
बाजारी : [बाजारी तुरंत अपन जेब टटोलैत छथि – त’ हाथ
पॉकिटक भूर देने बाहर आबि जाइत छनि। आश्चर्य
चकित भ’ कए मुँह सँ मात्र विस्मयक आभास होइत छनि।] जा !

[बीमा बाबूकेँ आब रहल नञि गेलनि। ओ ठहक्का पाड़ि
कए हँस’ लगलाह, हुनकर देखा–देखी कैक गोटे बाजारी दिसि हाथ सँ इशारा करैत हँसि रहल छलाह।]

चोर : [हाथ उठा कए सबकेँ थम्हबाक इशारा करैत] हँसि त’
रहल छी खूब !
उचक्का : ई बात त’ स्पष्ट जे मनोरंजनो खूब भेल हैतनि।
पॉकिट-मार : मुदा अपन-अपन पॉकिट मे त’ हाथ ध’ कए देखू !

[भिखमंगनी आ प्रेमी-युगल केँ छोड़ि सब क्यो पॉकिट टेब’ लागैत’ छथि आ बैगक भीतर ताकि-झाँकि कए देख’ लागैत छथि त’ पता चलैत छनि जे सभक पाइ, आ नहि त’ बटुआ गायब भ’ गेल छनि। हुनका सबकेँ ई बात बुझिते देरी चोर, उचक्का, पॉकिट-मार आ भिख-मंगनी हँस’ लागैत छथि। बाकी सब गोटे हतबुद्धि भए टुकुर- टुकुर ताकिते रहि जाइत छथि]

भिखमंगनी : नंगटाक कोन डर चोर की उचक्का ?
जेम्हरहि तकै छी लागै अछि धक्का !
धक्का खा कए नाचब त’ नाचू ने !
खेल खेल हारि कए बाँचब त’ बाँचू ने !

[चोर-उचक्का–पॉकिट-मार, समवेत स्वर मे जेना धुन गाबि रहल होथि]
नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का !
आँखिएक सामने पलटल छक्का !
भिख-मंगनी : खेल–खेल हारि कए सबटा फक्का !
समवेत-स्वर : नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ?

[कहैत चारू गोटे गोल-गोल घुर’ लागै छथि आ नाचि नाचि कए कहै छथि।]

सब गोटे : आब जायब, तब जायब, कत’ ओ कक्का ?
पॉकिट मे हाथ दी त’ सब किछु लक्खा !
नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का !

बीमा-बाबू : (चीत्कार करैत) हे थम्ह’ ! बंद कर’ ई तमाशा...
चोर : (जेना बीमा-बाबूक चारू दिसि सपना मे भासि रहल
होथि एहन भंगिमा मे) तमाशा नञि... हताशा....!
उचक्का : (ताहिना चलैत) हताशा नञि... निराशा !
पॉकिट-मार : [पॉकिट सँ छह-सातटा बटुआ बाहर क’ कए देखा –
देखा कए] ने हताशा आ ने निराशा, मात्र तमाशा...
ल’ लैह बाबू छह आना, हरेक बटुआ छह आना!
[कहैत एक–एकटा बटुआ बॉल जकाँ तकर मालिकक
दिसि फेंकैत छथि आ हुनका लोकनि मे तकरा
सबटाकेँ बटौर’ लेल हड़बड़ी मचि जाइत छनि। एहि
मौकाक फायदा उठबैत चोर–उचक्का-पॉकिटमार
आ भिख-मंगनी कतारक सब सँ आगाँ जा’ कए ठाढ
भ’ जाइत छथि।]
रद्दी-बला : [जकर कोनो नुकसान नहि भेल छल-ओ मात्र मस्ती क’ रहल छल आ घटनासँ भरपूर आनन्द ल’ रहल छल।] हे बाबू– भैया लोकनि ! एकर आनन्द नञि अछि कोनो जे “भूलल-भटकल कहुना क’ कए घुरि आयल अछि हमर बटुआ”। [कहैत दू डेग बढा’ कए नाचिओ लैत’ छथि।] ई जे बुझै छी जे अहाँक धन अहीं केँ घुरि आयल... से सबटा फूसि थिक !

बीमा-बाबू : (आश्चर्य होइत) आँय ? से की ?
बाजारी : (गरा सँ गरा मिला कए) सबटा फूसि ?
भद्र-व्यक्ति 1 : की कहै छी ?
भद्र-व्यक्ति 2 : माने बटुआ त’ भेटल, मुदा भीतर ढन–ढन !
रद्दी-बला : से हम कत’ कहलहुँ ? बटुओ अहींक आ पाइयो
छैहे! मुदा एखन ने बटुआक कोनो काज रहत’ आ
ने पाइयेक!
बीमा-बाबू : माने ?
रद्दी-बला : माने नञि बुझलियैक ? औ बाबू ! आयल छी सब
गोटे यमालय... ठाढ़ छी बन्द दरबज्जाक सामने...
कतार सँ... एक–दोसरा सँ जूझि रहल छी जे के
पहिल ठाम मे रहत आ के रहत तकर बाद...?
तखन ई पाइ आ बटुआक कोन काज ?
भद्र-व्यक्ति1 : सत्ये त’! भीतर गेलहुँ तखन त’ ई पाइ कोनो काज
मे नहि लागत !
बाजारी : आँय ?
भद्र-व्यक्ति2 : नहि बुझिलियैक ? दोसर देस मे जाइ छी त’ थोड़े
चलैत छैक अपन रुपैया ? (आन लोग सँ
सहमतिक अपेक्षा मे-) छै कि नञि ?
रमणी-मोहन : (जेना दीर्घ मौनता के तोड़ैत पहिल बेरि किछु ढंग
केर बात बाजि रहल छथि एहन भंगिमा मे... एहि
सँ पहिने ओ कखनहु प्रेमी-युगलक लग जाय
प्रेमिका केँ पियासल नजरि द’ रहल छलाह त’
कखनहु भिख-मंगनिये लग आबि आँखि सँ तकर
शरीर केँ जेना पीबि रहल छलाह...) अपन प्रेमिका
जखन अनकर बियाहल पत्नी बनि जाइत छथि
तखन तकरा सँ कोन लाभ ? (कहैत दीर्घ-श्वास
त्याग करैत छथि।)
बीमा-बाबू : (डाँटैत) हे...अहाँ चुप्प रहू! क’ रहल छी बात
रुपैयाक, आ ई कहै छथि रूप दय...!
रमणी-मोहन : हाय! हम त’ कहै छलहुँ रूपा दय! (भिख-मंगनी
रमणी-मोहन लग सटल चलि आबै छैक।)
भिख-मंगनी : हाय! के थिकी रूपा ?
रमणी-मोहन : “कानि-कानि प्रवक्ष्यामि रूपक्यानि रमणी च... !
बाजारी : माने ?
रमणी-मोहन : एकर अर्थ अनेक गंभीर होइत छैक... अहाँ सन
बाजारी नहि बूझत!
भिख-मंगनी : [लास्य करैत] हमरा बुझाउ ने!

[तावत भिख-मंगनीक भंगिमा देखि कने-कने बिहुँसैत’ पॉकिट–मार लग आबि जाइत अछि।]

भिख-मंगनी : [कपट क्रोधेँ] हँसै कियै छें ? हे... (कोरा सँ पुतलाकेँ
पॉकिट-मारकेँ थम्हबैत) हे पकड़ू त’ एकरा... (कहैत
रमणी-मोहन लग जा कए) औ मोहन जी! अहाँ की
ने कहलहुँ, एखनहु धरि भीतर मे एकटा छटपटी
मचल यै’! रमणी-धमनी कोन बात’ कहलहुँ ?
रमणी-मोहन : धूर मूर्ख! हम त’ करै छलहुँ शकुन्तलाक गप्प,
मन्दोदरीक व्यथा... तोँ की बुझबेँ ?
भिख-मंगनी : सबटा व्यथा केर गप बुझै छी हम... भीख मांगि-
मांगि खाइ छी, तकर माने ई थोड़े, जे ने हमर शरीर
अछि आ ने कोनो व्यथा... ?
रमणी-मोहन : धुत् तोरी ! अपन व्यथा–तथा छोड़, आ भीतर की
छैक, ताहि दय सोच ! (कहैत बंद दरबज्जा दिसि
देखबैत छथि-)
पॉकिट-मार : (अवाक् भ’ कए दरबज्जा दिसि देखैत) भीतर ? की
छइ भीतरमे... ?
रमणी-मोहन : (नृत्यक भंगिमा करैत ताल ठोकि- ठोकि कए) भीतर?
“धा–धिन–धिन्ना... भरल तमन्ना !
तेरे-केरे-धिन-ता... आब नञि चिन्ता !”
भिख-मंगनी : (आश्चर्य भए) माने ? की छैक ई ?
रमणी-मोहन : (गर्व सँ) ‘की’ नञि... ‘की’ नञि... ‘के’ बोल !
बोल- भीतर ‘के’ छथि ? के, के छथि?
पॉकिट-मार : के, के छथि?
रमणी-मोहन : एक बेरि अहि द्वारकेँ पार कयलेँ त’ भीतर भेटती
एक सँ एक सुर–नारी,उर्वशी–मेनका–रम्भा... (बाजैत- बाजैत जेना मुँहमे पानि आबि जाइत छनि--)

भिख-मंगनी : ईः! रंभा...मेनका... ! (मुँह दूसैत) मुँह-झरकी
सब... बज्जर खसौ सबटा पर!
रमणी-मोहन : (हँसैत) कोना खसतैक बज्जर ? बज्र त’ छनि देवराज
इन्द्र लग ! आ अप्सरा त’ सबटा छथि हुनकहि
नृत्यांगना।

[भिख-मंगनीक प्रतिक्रिया देखि कैक गोटे हँस’ लगैत छथि]

पॉकिट-मार : हे....एकटा बात हम कहि दैत छी – ई नहि बूझू जे
दरबज्जा खोलितहि आनंदे आनंद !
बाजारी : तखन ?
बीमा-बाबू : अहू ठाम छै अशांति, तोड़-फोड़, बाढ़ि आ सूखार ?
आ कि चारू दिसि छइ हरियर, अकाससँ झहरैत
खुशी केर लहर आ माटिसँ उगलैत सोना ?
पॉकिट-मार : किएक ? जँ अशांति, तोड़-फोड़ होइत त’ नीक... की
बूझै छी, एत्तहु अहाँ जीवन–बीमा चलाब’ चाहै छी की ?
चोर : (एतबा काल उचक्का सँ फुसुर-फुसुर क’ रहल
छल आ ओत्तहि, दरबज्जा लग ठाढ़ छल– एहि
बात पर हँसैत आगाँ आबि जाइत अछि) स्वर्गमे
जीवन-बीमा ? वाह ! ई त’ बड्ड नीक गप्प !
पॉकिट-मार : देवराज इंद्रक बज्र.. बोलू कतेक बोली लगबै छी?
उचक्का : पन्द्रह करोड़!
चोर : सोलह!
पॉकिट-मार : साढे-बाईस!
बीमा-बाबू : पच्चीस करोड़!
रमणी-मोहन : हे हौ! तोँ सब बताह भेलह ? स्वर्गक राजा केर बज्र,
तकर बीमा हेतैक एक सय करोड़ सँ कम मे ? [कतहु सँ एकटा स्टूलक जोगाड़ क’ कए ताहि पर चट दय ठाढ़ भ’ कए-]


पॉकिट-मार : बोलू, बोलू भाई-सब ! सौ करोड़ !
बीमा-बाबू : सौ करोड़ एक !
चोर : सौ करोड़ दू –
रमणी-मोहन : एक सौ दस !
भिख-मंगनी : सवा सौ करोड़ !
चोर : डेढ़सौ करोड़...
भिख-मंगनी : पचपन –
चोर : साठि –
भिख-मंगनी : एकसठि –

[दूनूक आँखि–मुँह पर ‘टेनशन’ क छाप स्पष्ट भ’ जाइत छैक। ]

चोर : (खौंझैत) एक सौ नब्बै...

[एतेक बड़का बोली पर भिख-मंगनी चुप भ’ जाइत अछि।]

पॉकिट-मार : त’ भाई-सब ! आब अंतिम घड़ी आबि गेल अछि –
190 एक, 190 दू, 190...
[ठहक्का पाड़ि कए हँस’ लगलाह बाजारी, दूनू भद्र व्यक्ति आ रद्दी-बला-]
पॉकिट-मार : की भेल ?
चोर : हँस्सीक मतलब ?
बाजारी : (हँसैते कहैत छथि) हौ बाबू ! एहन मजेदार मोल-
नीलामी हम कतहु नञि देखने छी !
भद्र-व्यक्ति 1 : एकटा चोर...
भद्र-व्यक्ति 2 : त’ दोसर भिख-मंगनी...
बाजारी : आ चलबै बला पॉकिट-मार...
[कहैत तीनू गोटे हँस’ लागै छथि]
बीमा-बाबू : त’ एहि मे कोन अचरज?
भद्र-व्यक्ति 1 : आ कोन चीजक बीमाक मोल लागि रहल अछि–
त’ बज्र केर !
भद्र-व्यक्ति 2 : बज्जर खसौ एहन नीलामी पर !
बाजारी : (गीत गाब’ लागै’ छथि)
चोर सिखाबय बीमा–महिमा,
पॉकिट-मारो करै बयान !
मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि,
पाट कपाट त’ जय सियाराम !
दुनू भद्र-व्यक्ति : (एक्कहि संगे) जय सियाराम !

[पहिल खेप मे तीनू गोटे नाच’-गाब’ लागै छथि। तकर बाद धीरे-धीरे बीमा बाबू आ रद्दी-बला सेहो संग दैत छथि।]

बाजारी : कौआ बजबै हंसक बाजा
भद्र-व्यक्ति 1 : हंस गबै अछि मोरक गीत
भद्र-व्यक्ति 2 : गीत की गाओत ? छल बदनाम !
बाजारी : नाट-विराटल जय सियाराम !
समवेत : मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि।
पाट-कपाटक जय सियाराम !
[चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।]

(क्रमश:)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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1 comment:

  1. मान्यवर,
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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...